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शिव पुराण

Shiva Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished850 पृष्ठ

५०४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

विवश होकर उनकी बात नहीं मानी। वे रोहिणीमें इतने आसक्त हो गये थे कि दूसरी किसी पत्नीका कभी आदर नहीं करते थे। इस बातको सुनकर दक्ष दुःखी हो फिर स्वयं आकर चन्द्रमाको उत्तम नीतिसे समझाने तथा न्यायोचित बर्तावके लिये प्रार्थना करने लगे।

दक्ष बोले—चन्द्रमा! सुनो, मैं पहले अनेक बार तुमसे प्रार्थना कर चुका हूँ। फिर भी तुमने मेरी बात नहीं मानी। इसलिये आज शाप देता हूँ कि तुम्हें क्षयका रोग हो जाय।

सूतजी कहते हैं—दक्षके इतना कहते ही क्षणभरमें चन्द्रमा क्षयरोगसे ग्रस्त हो गये। उनके क्षीण होते ही उस समय सब ओर महान् हाहाकार मच गया। सब देवता और ऋषि कहने लगे कि 'हाय! हाय! अब क्या करना चाहिये, चन्द्रमा कैसे ठीक होंगे?' मुने! इस प्रकार दुःखमें पड़कर वे सब लोग विह्वल हो गये। चन्द्रमाने इन्द्र आदि सब देवताओं तथा ऋषियोंको अपनी अवस्था सूचित की। तब इन्द्र आदि देवता तथा वसिष्ठ आदि ऋषि ब्रह्माजीकी शरणमें गये।

उनकी बात सुनकर ब्रह्माजीने कहा—देवताओ! जो हुआ, सो हुआ। अब वह निश्चय ही पलट नहीं सकता। अतः उसके निवारणके लिये मैं तुम्हें एक उत्तम उपाय बताता हूँ। आदरपूर्वक सुनो। चन्द्रमा देवताओंके साथ प्रभास नामक शुभ क्षेत्रमें जायें और वहाँ मृत्युंजयमन्त्रका विधिपूर्वक अनुष्ठान करते हुए भगवान् शिवकी आराधना करें। अपने सामने शिवलिंगकी स्थापना करके वहाँ चन्द्रदेव नित्य तपस्या करें। इससे प्रसन्न होकर शिव उन्हें क्षयरहित कर देंगे।

तब देवताओं तथा ऋषियोंके कहनेसे ब्रह्माजीकी आज्ञाके अनुसार चन्द्रमाने वहाँ छः महीनेतक निरन्तर तपस्या की, मृत्युंजय-मन्त्रसे भगवान् वृषभध्वजका पूजन किया। दस करोड़ मन्त्रका जप और मृत्युंजयका ध्यान करते हुए चन्द्रमा वहाँ स्थिरचित्त होकर लगातार खड़े रहे। उन्हें तपस्या करते देख भक्तवत्सल भगवान् शंकर प्रसन्न हो उनके सामने प्रकट हो गये और अपने भक्त चन्द्रमासे बोले।

शंकरजीने कहा—चन्द्रदेव! तुम्हारा कल्याण हो; तुम्हारे मनमें जो अभीष्ट हो, वह वर माँगो! मैं प्रसन्न हूँ। तुम्हें सम्पूर्ण उत्तम वर प्रदान करूँगा।

चन्द्रमा बोले—देवेश्वर! यदि आप प्रसन्न हैं तो मेरे लिये क्या असाध्य हो सकता है; तथापि प्रभो! शंकर! आप मेरे शरीरके इस क्षयरोगका निवारण कीजिये। मुझसे जो अपराध बन गया हो, उसे क्षमा कीजिये।

शिवजीने कहा—चन्द्रदेव! एक पक्षमें

  • कोटिरुद्रसंहिता * ५०५

प्रतिदिन तुम्हारी कला क्षीण हो और दूसरे पक्षमें फिर वह निरन्तर बढ़ती रहे।

तदनन्तर चन्द्रमाने भक्तिभावसे भगवान् शंकरकी स्तुति की। इससे पहले निराकार होते हुए भी वे भगवान् शिव फिर साकार हो गये। देवताओंपर प्रसन्न हो उस क्षेत्रके माहात्म्यको बढ़ाने तथा चन्द्रमाके यशका विस्तार करनेके लिये भगवान् शंकर उन्हींके नामपर वहाँ सोमेश्वर कहलाये और सोमनाथके नामसे तीनों लोकोंमें विख्यात हुए। ब्राह्मणो! सोमनाथका पूजन करनेसे वे उपासकके क्षय तथा कोढ़ आदि रोगोंका नाश कर देते हैं। ये चन्द्रमा धन्य हैं, कृतकृत्य हैं, जिनके नामसे तीनों लोकोंके स्वामी साक्षात् भगवान् शंकर भूतलको पवित्र करते हुए प्रभासक्षेत्रमें विद्यमान हैं। वहीं सम्पूर्ण देवताओंने सोमकुण्डकी भी स्थापना की है, जिसमें शिव और ब्रह्माका सदा निवास माना जाता है। चन्द्रकुण्ड इस भूतलपर पापनाशन तीर्थके रूपमें प्रसिद्ध है। जो मनुष्य उसमें स्नान करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। क्षय आदि जो असाध्य रोग होते हैं, वे सब उस कुण्डमें छः मासतक स्नान करनेमात्रसे नष्ट हो जाते हैं। मनुष्य जिस फलके उद्देश्यसे इस उत्तम तीर्थका सेवन करता है, उस फलको सर्वथा प्राप्त कर लेता है—इसमें संशय नहीं है।

चन्द्रमा नीरोग होकर अपना पुराना कार्य सँभालने लगे। इस प्रकार मैंने सोमनाथकी उत्पत्तिका सारा प्रसंग सुना दिया। मुनीश्वरो ! इस तरह सोमेश्वरलिंगका प्रादुर्भाव हुआ है। जो मनुष्य सोमनाथके प्रादुर्भावकी इस कथाको सुनता अथवा दूसरोंको सुनाता है, वह सम्पूर्ण अभीष्टको पाता और सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।

(अध्याय ८-१४) ~~ ० ~~

मल्लिकार्जुन और महाकाल नामक ज्योतिर्लिंगोंके आविर्भावकी कथा तथा उनकी महिमा

सूतजी कहते हैं- महर्षियो! अब मैं मल्लिकार्जुनके प्रादुर्भावका प्रसंग सुनाता हूँ, जिसे सुनकर बुद्धिमान् पुरुष सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। जब महाबली तारकशत्रु शिवापुत्र कुमार कार्तिकेय सारी पृथ्वीकी परिक्रमा करके फिर कैलास पर्वतपर आये और गणेशके विवाह आदिकी बात सुनकर क्रौंच पर्वतपर चले गये, पार्वती और शिवजीके वहाँ जाकर अनुरोध करनेपर भी नहीं लौटे तथा वहाँसे भी बारह कोस दूर चले गये, तब शिव और पार्वती ज्योतिर्मय स्वरूप धारण करके वहाँ प्रतिष्ठित हो गये। वे दोनों पुत्रस्नेहसे आतुर हो पर्वके दिन अपने पुत्र कुमारको देखनेके लिये उनके पास जाया करते हैं। अमावस्याके दिन भगवान् शंकर स्वयं वहाँ जाते हैं और पौर्णमासीके दिन पार्वतीजी निश्चय ही वहाँ पदार्पण करती हैं। उसी दिनसे लेकर भगवान् शिवका मल्लिकार्जुन नामक एक लिंग तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध हुआ। (उसमें पार्वती और शिव दोनोंकी ज्योतियाँ प्रतिष्ठित हैं। 'मल्लिका' का अर्थ पार्वती है और 'अर्जुन' शब्द शिवका वाचक है।) उस लिंगका जो दर्शन करता है, वह समस्त पापोंसे मुक्त हो

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जाता है और सम्पूर्ण अभीष्टको प्राप्त कर लेता है। इसमें संशय नहीं है। इस प्रकार मल्लिकार्जुन नामक द्वितीय ज्योतिर्लिंगका वर्णन किया गया, जो दर्शनमात्रसे लोगोंके लिये सब प्रकारका सुख देनेवाला बताया गया है।

ऋषियोंने कहा—प्रभो! अब आप विशेष कृपा करके तीसरे ज्योतिर्लिंगका वर्णन कीजिये।

सूतजीने कहा—ब्राह्मणो! मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ, जो आप श्रीमानोंका संग मुझे प्राप्त हुआ। साधु पुरुषोंका संग निश्चय ही धन्य है। अतः मैं अपना सौभाग्य समझकर पापनाशिनी परम पावनी दिव्य कथाका वर्णन करता हूँ। तुमलोग आदरपूर्वक सुनो। अवन्ति नामसे प्रसिद्ध एक रमणीय नगरी है, जो समस्त देहधारियोंको मोक्ष प्रदान करनेवाली है। वह भगवान् शिवको बहुत ही प्रिय, परम पुण्यमयी और लोकपावनी है। उस पुरीमें एक श्रेष्ठ ब्राह्मण रहते थे, जो शुभकर्मपरायण, वेदोंके स्वाध्यायमें संलग्न तथा वैदिक कर्मोंके अनुष्ठानमें सदा तत्पर रहनेवाले थे। वे घरमें अग्निकी स्थापना करके प्रतिदिन अग्निहोत्र करते और शिवकी पूजामें सदा तत्पर रहते थे। वे ब्राह्मण देवता प्रतिदिन पार्थिव शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा किया करते थे। वेदप्रिय नामक वे ब्राह्मण देवता सम्यक् ज्ञानार्जनमें लगे रहते थे; इसलिये उन्होंने सम्पूर्ण कर्मोंका फल पाकर वह सद्गति प्राप्त कर ली, जो संतोंको ही सुलभ होती है। उनके शिवपूजापरायण चार तेजस्वी पुत्र थे, जो पिता-मातासे सद्गुणोंमें कम नहीं थे। उनके नाम थे— देवप्रिय, प्रियमेधा, सुकृत और सुव्रत। उनके सुखदायक गुण वहाँ सदा बढ़ने लगे। उनके कारण अवन्ति-नगरी ब्रह्मतेजसे परिपूर्ण हो गयी थी।

उसी समय रत्नमाल पर्वतपर दूषण नामक एक धर्मद्वेषी असुरने ब्रह्माजीसे वर पाकर वेद, धर्म तथा धर्मात्माओंपर आक्रमण किया। अन्तमें उसने सेना लेकर अवन्ति (उज्जैन)-के ब्राह्मणोंपर भी चढ़ाई कर दी। उसकी आज्ञासे चार भयानक दैत्य चारों दिशाओंमें प्रलयाग्निके समान प्रकट हो गये, परंतु वे शिवविश्वासी ब्राह्मण-बन्धु उनसे डरे नहीं। जब नगरके ब्राह्मण बहुत घबरा गये, तब उन्होंने उनको आश्वासन देते हुए कहा—'आपलोग भक्तवत्सल भगवान् शंकरपर भरोसा रखें।' यों कह शिवलिंगका पूजन करके वे भगवान् शिवका ध्यान करने लगे।

इतनेमें ही सेनासहित दूषणने आकर उन ब्राह्मणोंको देखा और कहा—'इन्हें मार डालो, बाँध लो।' वेदप्रियके पुत्र उन ब्राह्मणोंने उस समय उस दैत्यकी कही हुई वह बात नहीं सुनी; क्योंकि वे भगवान् शम्भुके ध्यानमार्गमें स्थित थे। उस दुष्टात्मा दैत्यने ज्यों ही उन ब्राह्मणोंको मारनेकी इच्छा की, त्यों ही उनके द्वारा पूजित पार्थिव शिवलिंगके स्थानमें बड़ी भारी आवाजके साथ एक गड्ढा प्रकट हो गया। उस गड्ढेसे तत्काल विकटरूपधारी भगवान् शिव प्रकट हो गये, जो महाकाल नामसे विख्यात हुए। वे दुष्टोंके विनाशक तथा सत्पुरुषोंके आश्रयदाता हैं। उन्होंने उन दैत्योंसे कहा—'अरे खल! मैं तुझ-जैसे दुष्टोंके लिये महाकाल प्रकट हुआ हूँ। तुम इन ब्राह्मणोंके निकटसे दूर भाग जाओ।'

  • कोटिरुद्रसंहिता * ५०७

ऐसा कहकर महाकाल शंकरने सेनासहित दूषणको अपने हुंकारमात्रसे तत्काल भस्म कर दिया। कुछ सेना उनके द्वारा मारी गयी और कुछ भाग खड़ी हुई। परमात्मा शिवने दूषणका वध कर डाला। जैसे सूर्यको देखकर सम्पूर्ण अन्धकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार भगवान् शिवको देखकर उसकी सारी सेना अदृश्य हो गयी। देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी। उन ब्राह्मणोंको आश्वासन दे सुप्रसन्न हुए स्वयं महाकाल महेश्वर शिवने उनसे कहा— 'तुमलोग वर माँगो।' उनकी वह बात सुनकर वे सब ब्राह्मण हाथ जोड़ भक्ति-भावसे भलीभाँति प्रणाम करके नतमस्तक हो बोले।

द्विजोंने कहा—महाकाल ! महादेव ! दुष्टोंको दण्ड देनेवाले प्रभो ! शम्भो ! आप हमें संसारसागरसे मोक्ष प्रदान करें। शिव ! आप जनसाधारणकी रक्षाके लिये सदा यहीं रहें। प्रभो ! शम्भो ! अपना दर्शन करनेवाले मनुष्योंका आप सदा ही उद्धार करें।

सूतजी कहते हैं—महर्षियो! उनके ऐसा कहनेपर उन्हें सद्गति दे भगवान् शिव अपने भक्तोंकी रक्षाके लिये उस परम सुन्दर गड्ढेमें स्थित हो गये। वे ब्राह्मण मोक्ष पा गये और वहाँ चारों ओरकी एक-एक कोस भूमि लिंगरूपी भगवान् शिवका स्थल बन गयी। वे शिव भूतलपर महाकालेश्वरके नामसे विख्यात हुए। ब्राह्मणो! उनका दर्शन करनेसे स्वप्नमें भी कोई दुःख नहीं होता। जिस-जिस कामनाको लेकर कोई उस लिंगकी उपासना करता है, उसे वह अपना मनोरथ प्राप्त हो जाता है तथा परलोकमें मोक्ष भी मिल जाता है।

(अध्याय १५-१६)


महाकालके माहात्म्यके प्रसंगमें शिवभक्त राजा चन्द्रसेन तथा गोप-बालक श्रीकरकी कथा

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! भक्तोंकी रक्षा करनेवाले महाकाल नामक ज्योतिर्लिंगका माहात्म्य भक्तिभावको बढ़ानेवाला है। उसे आदरपूर्वक सुनो। उज्जयिनीमें चन्द्रसेन नामक एक महान् राजा थे, जो सम्पूर्ण शास्त्रोंके तत्त्वज्ञ, शिवभक्त और जितेन्द्रिय थे। शिवके पार्षदोंमें प्रधान तथा सर्वलोकवन्दित मणिभद्रजी राजा चन्द्रसेनके सखा हो गये थे। एक समय उन्होंने राजापर प्रसन्न होकर उन्हें चिन्तामणि नामक महामणि प्रदान की, जो कौस्तुभमणि तथा सूर्यके समान देदीप्यमान थी। वह

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देखने, सुनने अथवा ध्यान करनेपर भी मनुष्योंको निश्चय ही मंगल प्रदान करती थी। भगवान् शिवके आश्रित रहनेवाले राजा चन्द्रसेन उस चिन्तामणिको कण्ठमें धारण करके जब सिंहासनपर बैठते, तब देवताओंमें सूर्यनारायणकी भाँति उनकी शोभा होती थी। नृपश्रेष्ठ चन्द्रसेनके कण्ठमें चिन्तामणि शोभा देती है, यह सुनकर समस्त राजाओंके मनमें उस मणिके प्रति लोभकी मात्रा बढ़ गयी और वे क्षुब्ध रहने लगे। तदनन्तर वे सब राजा चतुरंगिणी सेनाके साथ आकर युद्धमें चन्द्रसेनको जीतनेके लिये उद्यत हो गये। वे सब परस्पर मिल गये थे और उसके साथ बहुत-से सैनिक थे। उन्होंने आपसमें संकेत और सलाह करके आक्रमण किया और उज्जयिनीके चारों द्वारोंको घेर लिया। अपनी पुरीको सम्पूर्ण राजाओंद्वारा घिरी हुई देख राजा चन्द्रसेन उन्हीं भगवान् महाकालेश्वरकी शरणमें गये और मनको संदेहरहित करके दृढ़ निश्चयके साथ उपवासपूर्वक दिन-रात अनन्यभावसे महाकालकी आराधना करने लगे।

उन्हीं दिनों उस श्रेष्ठ नगरमें कोई ग्वालिन रहती थी, जिसके एकमात्र पुत्र था। वह विधवा थी और उज्जयिनीमें बहुत दिनोंसे रहती थी। वह अपने पाँच वर्षके बालकको लिये हुए महाकालके मन्दिरमें गयी और उसने राजा चन्द्रसेनद्वारा की हुई महाकालकी पूजाका आदरपूर्वक दर्शन किया। राजाके शिवपूजनका वह आश्चर्यमय उत्सव देखकर उसने भगवान्‌को प्रणाम किया और फिर वह अपने निवासस्थानपर लौट आयी। ग्वालिनके उस बालकने भी वह सारी पूजा देखी थी। अतः घर आनेपर उसने कौतूहलवश शिवजीकी पूजा करनेका विचार किया। एक सुन्दर पत्थर लाकर उसे अपने शिविरसे थोड़ी ही दूरपर दूसरे शिविरके एकान्त स्थानमें रख दिया और उसीको शिवलिंग माना। फिर उसने भक्तिपूर्वक कृत्रिम गन्ध, अलंकार, वस्त्र, धूप, दीप और अक्षत आदि द्रव्य जुटाकर उनके द्वारा पूजन करके मनःकल्पित दिव्य नैवेद्य भी अर्पित किया। सुन्दर-सुन्दर पत्तों और फूलोंसे बारंबार पूजन करके भाँति-भाँतिसे नृत्य किया और बारंबार भगवान्‌के चरणोंमें मस्तक झुकाया। इसी समय ग्वालिनने भगवान् शिवमें आसक्तचित्त हुए अपने पुत्रको बड़े प्यारसे भोजनके लिये बुलाया। परंतु उसका मन तो भगवान् शिवकी पूजामें लगा हुआ था। अतः जब बारंबार बुलानेपर भी उस बालकको भोजन करनेकी इच्छा नहीं हुई, तब उसकी माँ स्वयं उसके पास गयी और उसे शिवके आगे आँख बंद करके ध्यान लगाये बैठा देख उसका हाथ पकड़कर खींचने लगी। इतनेपर भी जब वह न उठा, तब उसने क्रोधमें आकर उसे खूब पीटा। खींचने और मारने-पीटनेपर भी जब उसका पुत्र नहीं आया, तब उसने वह शिवलिंग उठाकर दूर फेंक दिया और उसपर चढ़ायी हुई सारी पूजा-सामग्री नष्ट कर दी। यह देख बालक ‘हाय-हाय’ करके रो उठा। रोषसे भरी हुई ग्वालिन अपने बेटेको डाँट-फटकारकर पुनः घरमें चली गयी। भगवान् शिवकी पूजाको माताके द्वारा नष्ट की गयी देख वह बालक ‘देव! देव! महादेव!’ की पुकार करते हुए सहसा मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। उसके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा प्रवाहित होने

* कोटिरुद्रसंहिता *
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लगी। दो घड़ी बाद जब उसे चेत हुआ, तब उसने आँखें खोलीं।

आँख खुलनेपर उस शिशुने देखा, उसका वही शिविर भगवान् शिवके अनुग्रहसे तत्काल महाकालका सुन्दर मन्दिर बन गया, मणियोंके चमकीले खंभे उसकी शोभा बढ़ा रहे थे। वहाँकी भूमि स्फटिकमणिसे जड़ दी गयी थी। तपाये हुए सोनेके बहुत-से विचित्र कलश उस शिवालयको सुशोभित करते थे। उसके विशाल द्वार, कपाट और प्रधान द्वार सुवर्णमय दिखायी देते थे। वहाँ बहुमूल्य नीलमणि तथा हीरेके बने हुए चबूतरे शोभा दे रहे थे। उस शिवालयके मध्यभागमें दयानिधान शंकरका रत्नमय लिंग प्रतिष्ठित था। ग्वालिनके उस पुत्रने देखा, उस शिवलिंगपर उसकी अपनी ही चढ़ायी हुई पूजन-सामग्री सुसज्जित है। यह सब देख वह बालक सहसा उठकर खड़ा हो गया। उसे मन-ही-मन बड़ा आश्चर्य हुआ और वह परमानन्दके समुद्रमें निमग्न-सा हो गया। तदनन्तर भगवान् शिवकी स्तुति करके उसने बारंबार उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया और सूर्यास्त होनेके पश्चात् वह गोपबालक शिवालयसे बाहर निकला। बाहर आकर उसने अपने शिविरको देखा। वह इन्द्रभवनके समान शोभा पा रहा था। वहाँ सब कुछ तत्काल सुवर्णमय होकर विचित्र एवं परम उज्ज्वल वैभवसे प्रकाशित होने लगा। फिर वह उस भवनके भीतर गया, जो सब प्रकारकी शोभाओंसे सम्पन्न था। उस भवनमें सर्वत्र मणि, रत्न और सुवर्ण ही जड़े गये थे। प्रदोषकालमें सानन्द भीतर प्रवेश करके बालकने देखा, उसकी माँ दिव्य लक्षणोंसे लक्षित हो एक सुन्दर पलंगपर सो रही है। रत्नमय अलंकारोंसे उसके सभी अंग उद्दीप्त हो रहे हैं और वह साक्षात् देवांगनाके समान दिखायी देती है। हर्षसे विह्वल हुए उस बालकने अपनी माताको बड़े वेगसे उठाया। वह भगवान् शिवकी कृपापात्र हो चुकी थी। ग्वालिनने उठकर देखा, सब कुछ अपूर्व-सा हो गया था। उसने महान् आनन्दमें निमग्न हो अपने बेटेको छातीसे लगा लिया। पुत्रके मुखसे गिरिजापतिके कृपाप्रसादका वह सारा वृत्तान्त सुनकर ग्वालिनने राजाको सूचना दी, जो निरन्तर भगवान् शिवके भजनमें लगे रहते थे। राजा अपना नियम पूरा करके रातमें सहसा वहाँ आये और ग्वालिनके पुत्रका वह प्रभाव, जो शंकरजीको संतुष्ट करनेवाला था, देखा। मन्त्रियों और पुरोहितोंसहित राजा चन्द्रसेन वह सब कुछ देख परमानन्दके समुद्रमें डूब गये और नेत्रोंसे प्रेमके आँसू बहाते तथा प्रसन्नतापूर्वक शिवके नामका कीर्तन करते हुए उन्होंने उस बालकको हृदयसे लगा लिया। ब्राह्मणो! उस समय वहाँ बड़ा भारी उत्सव होने लगा। सब लोग आनन्दविभोर होकर महेश्वरके नाम और यशका कीर्तन करने लगे। इस प्रकार शिवका यह अद्भुत माहात्म्य देखनेसे पुरवासियोंको बड़ा हर्ष हुआ और इसीकी चर्चामें वह सारी रात एक क्षणके समान व्यतीत हो गयी।

युद्धके लिये नगरको चारों ओरसे घेरकर खड़े हुए राजाओंने भी प्रातःकाल अपने गुप्तचरोंके मुखसे वह सारा अद्भुत चरित्र सुना। उसे सुनकर सब आश्चर्यसे चकित हो गये और वहाँ आये हुए सब नरेश

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एकत्र हो आपसमें इस प्रकार बोले—'ये राजा चन्द्रसेन बड़े भारी शिवभक्त हैं; अतएव इनपर विजय पाना कठिन है। ये सर्वथा निर्भय होकर महाकालकी नगरी उज्जयिनीका पालन करते हैं। जिसकी पुरीके बालक भी ऐसे शिवभक्त हैं, वे राजा चन्द्रसेन तो महान् शिवभक्त हैं ही। इनके साथ विरोध करनेसे निश्चय ही भगवान् शिव क्रोध करेंगे और उनके क्रोधसे हम सब लोग नष्ट हो जायँगे। अतः इन नरेशके साथ हमें मेल-मिलाप ही कर लेना चाहिये। ऐसा होनेपर महेश्वर हमपर बड़ी कृपा करेंगे।'

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो ! ऐसा निश्चय करके शुद्ध हृदयवाले उन सब भूपालोंने हथियार डाल दिये। उनके मनसे वैरभाव निकल गया। वे सभी राजा अत्यन्त प्रसन्न हो चन्द्रसेनकी अनुमति ले महाकालकी उस रमणीय नगरीके भीतर गये। वहाँ उन्होंने महाकालका पूजन किया। फिर वे सब-के-सब उस ग्वालिनके महान् अभ्युदयपूर्ण दिव्य सौभाग्यकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हुए उनके घरपर गये। वहाँ राजा चन्द्रसेनने आगे बढ़कर उनका स्वागत-सत्कार किया। वे बहुमूल्य आसनोंपर बैठे और आश्चर्यचकित एवं आनन्दित हुए। गोपबालकके ऊपर कृपा करनेके लिये स्वतः प्रकट हुए शिवालय और शिवलिंगका दर्शन करके उन सब राजाओंने अपनी उत्तम बुद्धि भगवान् शिवके चिन्तनमें लगायी। तदनन्तर उन सारे नरेशोंने भगवान् शिवकी कृपा प्राप्त करनेके लिये उस गोपशिशुको बहुत-सी वस्तुएँ प्रसन्नतापूर्वक भेंट कीं। सम्पूर्ण जनपदोंमें जो बहुसंख्यक गोप रहते थे, उन सबका राजा उन्होंने उसी बालकको बना दिया।

इसी समय समस्त देवताओंसे पूजित परम तेजस्वी वानरराज हनुमान्‌जी वहाँ प्रकट हुए। उनके आते ही सब राजा बड़े वेगसे उठकर खड़े हो गये। उन सबने भक्तिभावसे विनम्र होकर उन्हें मस्तक झुकाया। राजाओंसे पूजित हो वानरराज हनुमान्‌जी उन सबके बीचमें बैठे और उस गोपबालकको हृदयसे लगाकर उन नरेशोंकी ओर देखते हुए बोले—'राजाओ ! तुम सब लोग तथा दूसरे देहधारी भी मेरी बात सुनें। इससे तुम लोगोंका भला होगा। भगवान् शिवके सिवा देहधारियोंके लिये दूसरी कोई गति नहीं है। यह बड़े सौभाग्यकी बात है कि इस गोपबालकने शिवकी पूजाका दर्शन करके उससे प्रेरणा ली और बिना मन्त्रके भी शिवका पूजन करके उन्हें पा लिया। गोपवंशकी कीर्ति बढ़ानेवाला यह बालक भगवान् शंकरका श्रेष्ठ भक्त है। इस लोकमें सम्पूर्ण भोगोंका उपभोग करके अन्तमें यह मोक्ष प्राप्त कर लेगा। इसकी वंशपरम्पराके

* कोटिरुद्रसंहिता * ५११

अन्तर्गत आठवीं पीढ़ीमें महायशस्वी नन्द उत्पन्न होंगे, जिनके यहाँ साक्षात् भगवान् नारायण उनके पुत्ररूपसे प्रकट हो श्रीकृष्ण नामसे प्रसिद्ध होंगे। आजसे यह गोपकुमार इस जगत्में श्रीकरके नामसे विशेष ख्याति प्राप्त करेगा।'

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! ऐसा कहकर अंजनीनन्दन शिवस्वरूप वानरराज हनुमान्‌जीने समस्त राजाओं तथा महाराज चन्द्रसेनको भी कृपादृष्टिसे देखा। तदनन्तर उन्होंने उस बुद्धिमान् गोपबालक श्रीकरको बड़ी प्रसन्नताके साथ शिवोपासनाके उस आचार-व्यवहारका उपदेश दिया, जो भगवान् शिवको बहुत प्रिय है। इसके बाद परम प्रसन्न हुए हनुमान्‌जी चन्द्रसेन और श्रीकरसे बिदा ले उन सब राजाओंके देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गये। वे सब राजा हर्षमें भरकर सम्मानित हो महाराज चन्द्रसेनकी आज्ञा ले जैसे आये थे, वैसे ही लौट गये। महातेजस्वी श्रीकर भी हनुमान्‌जीका उपदेश पाकर धर्मज्ञ ब्राह्मणोंके साथ शंकरजीकी उपासना करने लगा। महाराज चन्द्रसेन और गोपबालक श्रीकर दोनों ही बड़ी प्रसन्नताके साथ महाकालकी सेवा करते थे। उन्हींकी आराधना करके उन दोनोंने परम पद प्राप्त कर लिया। इस प्रकार महाकाल नामक शिवलिंग सत्पुरुषोंका आश्रय है। भक्तवत्सल शंकर दुष्ट पुरुषोंका सर्वथा हनन करनेवाले हैं। यह परम पवित्र रहस्यमय आख्यान कहा गया है, जो सब प्रकारका सुख देनेवाला है। यह शिवभक्तिको बढ़ाने तथा स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला है। (अध्याय १७)


विन्ध्यकी तपस्या, ओंकारमें परमेश्वरलिंगके प्रादुर्भाव और उसकी महिमाका वर्णन

ऋषियोंने कहा—महाभाग सूतजी! आपने अपने भक्तकी रक्षा करनेवाले महाकाल नामक शिवलिंगकी बड़ी अद्भुत कथा सुनायी है। अब कृपा करके चौथे ज्योतिर्लिंगका परिचय दीजिये—ओंकार-तीर्थमें सर्वपातकहारी परमेश्वरका जो ज्योतिर्लिंग है, उसके आविर्भावकी कथा सुनाइये।

सूतजी बोले—महर्षियो! ओंकारतीर्थमें परमेशसंज्ञक ज्योतिर्लिंग जिस प्रकार प्रकट हुआ, वह बताता हूँ; प्रेमसे सुनो। एक समयकी बात है, भगवान् नारद मुनि गोकर्ण नामक शिवके समीप जा बड़ी भक्तिके साथ उनकी सेवा करने लगे। कुछ कालके बाद वे मुनिश्रेष्ठ वहाँसे गिरिराज विन्ध्यपर आये और विन्ध्यने वहाँ बड़े आदरके साथ उनका पूजन किया। मेरे यहाँ सब कुछ है, कभी किसी बातकी कमी नहीं होती है, इस भावको मनमें लेकर विन्ध्याचल नारदजीके सामने खड़ा हो गया। उसकी वह अभिमानभरी बात सुनकर अहंकारनाशक नारद मुनि लंबी साँस खींचकर चुपचाप खड़े रह गये। यह देख विन्ध्य पर्वतने पूछा—'आपने मेरे यहाँ कौन-सी कमी देखी है? आपके इस तरह लंबी साँस खींचनेका क्या कारण है?'

५१२ * संक्षिप्त शिवपुराण *

नारदजीने कहा—भैया! तुम्हारे यहाँ सब कुछ है। फिर भी मेरु पर्वत तुमसे बहुत ऊँचा है। उसके शिखरोंका विभाग देवताओंके लोकोंमें भी पहुँचा हुआ है। किंतु तुम्हारे शिखरका भाग वहाँ कभी नहीं पहुँच सका है।

सूतजी कहते हैं—ऐसा कहकर नारदजी वहाँसे जिस तरह आये थे, उसी तरह चल दिये। परंतु विन्ध्य पर्वत 'मेरे जीवन आदिको धिक्कार है' ऐसा सोचता हुआ मन-ही-मन संतप्त हो उठा। अच्छा, 'अब मैं विश्वनाथ भगवान् शम्भुकी आराधनापूर्वक तपस्या करूँगा' ऐसा हार्दिक निश्चय करके वह भगवान् शंकरकी शरणमें गया। तदनन्तर जहाँ साक्षात् ओंकारकी स्थिति है, वहाँ प्रसन्नतापूर्वक जाकर उसने शिवकी पार्थिवमूर्ति बनायी और छः मासतक निरन्तर शम्भुकी आराधना करके शिवके ध्यानमें तत्पर हो वह अपनी तपस्याके स्थानसे हिलातक नहीं। विन्ध्याचलकी ऐसी तपस्या देखकर पार्वतीपति प्रसन्न हो गये। उन्होंने विन्ध्याचलको अपना वह स्वरूप दिखाया, जो योगियोंके लिये भी दुर्लभ है। वे प्रसन्न हो उस समय उससे बोले—'विन्ध्य! तुम मनोवांछित वर मागो। मैं भक्तोंको अभीष्ट वर देनेवाला हूँ और तुम्हारी तपस्यासे प्रसन्न हूँ।'

विन्ध्य बोला—देवेश्वर शम्भो! आप सदा ही भक्तवत्सल हैं। यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे वह अभीष्ट बुद्धि प्रदान कीजिये, जो अपने कार्यको सिद्ध करनेवाली हो।

भगवान् शम्भुने उसे वह उत्तम वर दे दिया और कहा—'पर्वतराज विन्ध्य! तुम जैसा चाहो, वैसा करो।' इसी समय देवता तथा निर्मल अन्तःकरणवाले ऋषि वहाँ आये और शंकरजीकी पूजा करके बोले—'प्रभो! आप यहाँ स्थिररूपसे निवास करें।'

देवताओंकी यह बात सुनकर परमेश्वर शिव प्रसन्न हो गये और लोकोंको सुख देनेके लिये उन्होंने सहर्ष वैसा ही किया। वहाँ जो एक ही ओंकारलिंग था, वह दो स्वरूपोंमें विभक्त हो गया। प्रणवमें जो सदाशिव थे, वे ओंकार नामसे विख्यात हुए और पार्थिवमूर्तिमें जो शिवज्योति प्रतिष्ठित हुई, उसकी परमेश्वर संज्ञा हुई (परमेश्वरको ही अमलेश्वर भी कहते हैं)। इस प्रकार ओंकार और परमेश्वर—ये दोनों शिवलिंग भक्तोंको अभीष्ट फल प्रदान करनेवाले हैं। उस समय देवताओं और ऋषियोंने उन दोनों लिंगोंकी पूजा की और भगवान् वृषभध्वजको संतुष्ट करके अनेक वर प्राप्त किये। तत्पश्चात् देवता अपने-अपने स्थानको गये और विन्ध्याचल भी अधिक प्रसन्नताका अनुभव करने लगा। उसने अपने अभीष्ट कार्यको सिद्ध किया और मानसिक परितापको त्याग दिया। जो पुरुष

* कोटिरुद्रसंहिता * ५१३

इस प्रकार भगवान् शंकरका पूजन करता है, वह माताके गर्भमें फिर नहीं आता और अपने अभीष्ट फलको प्राप्त कर लेता है—इसमें संशय नहीं।

सूतजी कहते हैं—महर्षियो ! ओंकारमें जो ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ और उसकी आराधनासे जो फल मिलता है, वह सब यहाँ तुम्हें बता दिया। इसके बाद मैं उत्तम केदार नामक ज्योतिर्लिंगका वर्णन करूँगा।

(अध्याय १८)


केदारेश्वर तथा भीमशंकर नामक ज्योतिर्लिंगोंके आविर्भावकी कथा तथा उनके माहात्म्यका वर्णन

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो ! भगवान् विष्णुके जो नर-नारायण नामक दो अवतार हैं और भारतवर्षके बदरिकाश्रमतीर्थमें तपस्या करते हैं, उन दोनोंने पार्थिव शिवलिंग बनाकर उसमें स्थित हो पूजा ग्रहण करनेके लिये भगवान् शम्भुसे प्रार्थना की। शिवजी भक्तोंके अधीन होनेके कारण प्रतिदिन उनके बनाये हुए पार्थिवलिंगमें पूजित होनेके लिये आया करते थे। जब उन दोनोंके पार्थिव-पूजन करते बहुत दिन बीत गये, तब एक समय परमेश्वर शिवने प्रसन्न होकर कहा—‘मैं तुम्हारी आराधनासे बहुत संतुष्ट हूँ। तुम दोनों मुझसे वर माँगो।’ उस समय उनके ऐसा कहनेपर नर और नारायणने लोगोंके हितकी कामनासे कहा—‘देवेश्वर ! यदि आप प्रसन्न हैं और यदि मुझे वर देना चाहते हैं तो अपने स्वरूपसे पूजा ग्रहण करनेके लिये यहीं स्थित हो जाइये।’

उन दोनों बन्धुओंके इस प्रकार अनुरोध करनेपर कल्याणकारी महेश्वर हिमालयके उस केदारतीर्थमें स्वयं ज्योतिर्लिंगके रूपमें स्थित हो गये। उन दोनोंसे पूजित होकर


789 संक्षिप्त शिवपुराण—17 A

५१४ * संक्षिप्त शिवपुराण *

सम्पूर्ण दुःख और भयका नाश करनेवाले शम्भु लोगोंका उपकार करने और भक्तोंको दर्शन देनेके लिये स्वयं केदारेश्वरके नामसे प्रसिद्ध हो वहाँ रहते हैं। वे दर्शन और पूजन करनेवाले भक्तोंको सदा अभीष्ट वस्तु प्रदान करते हैं। उसी दिनसे लेकर जिसने भी भक्तिभावसे केदारेश्वरका पूजन किया, उसके लिये स्वप्नमें भी दुःख दुर्लभ हो गया। जो भगवान् शिवका प्रिय भक्त वहाँ शिवलिंगके निकट शिवके रूपसे अंकित वलय (कंकण या कड़ा) चढ़ाता है, वह उस वलययुक्त स्वरूपका दर्शन करके समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है, साथ ही जीवन्मुक्त भी हो जाता है। जो बदरीवनकी यात्रा करता है, उसे भी जीवन्मुक्ति प्राप्त होती है। नर और नारायणके तथा केदारेश्वर शिवके रूपका दर्शन करके मनुष्य मोक्षका भागी होता है, इसमें संशय नहीं है। केदारेश्वरमें भक्ति रखनेवाले जो पुरुष वहाँकी यात्रा आरम्भ करके उनके पासतक पहुँचनेके पहले मार्गमें ही मर जाते हैं, वे भी मोक्ष पा जाते हैं—इसमें विचार करनेकी आवश्यकता नहीं है।* केदारतीर्थमें पहुँचकर वहाँ प्रेमपूर्वक केदारेश्वरकी पूजा करके वहाँका जल पी लेनेके पश्चात् मनुष्यका फिर जन्म नहीं होता। ब्राह्मणो! इस भारतवर्षमें सम्पूर्ण जीवोंको भक्तिभावसे भगवान् नर-नारायणकी तथा केदारेश्वर शम्भुकी पूजा करनी चाहिये।

अब मैं भीमशंकर नामक ज्योतिर्लिंगका माहात्म्य कहूँगा। कामरूप देशमें लोकहितकी कामनासे साक्षात् भगवान् शंकर ज्योतिर्लिंगके रूपमें अवतीर्ण हुए थे। उनका वह स्वरूप कल्याण और सुखका आश्रय है। ब्राह्मणो! पूर्वकालमें एक महापराक्रमी राक्षस हुआ था, जिसका नाम भीम था। वह सदा धर्मका विध्वंस करता और समस्त प्राणियोंको दुःख देता था। वह महाबली राक्षस कुम्भकर्णके वीर्य और कर्कटीके गर्भसे उत्पन्न हुआ था तथा अपनी माताके साथ सह्य पर्वतपर निवास करता था। एक दिन समस्त लोकोंको दुःख देनेवाले भयानक पराक्रमी दुष्ट भीमने अपनी मातासे पूछा—'माँ! मेरे पिताजी कहाँ हैं? तुम अकेली क्यों रहती हो? मैं यह सब जानना चाहता हूँ। अतः यथार्थ बात बताओ।'

कर्कटी बोली—बेटा! रावणके छोटे भाई कुम्भकर्ण तेरे पिता थे। भाईसहित उस महाबली वीरको श्रीरामने मार डाला। मेरे पिताका नाम कर्कट और माताका नाम पुष्कसी था। विराध मेरे पति थे, जिन्हें पूर्वकालमें रामने मार डाला। अपने प्रिय स्वामीके मारे जानेपर मैं अपने माता-पिताके पास रहती थी। एक दिन मेरे माता-पिता अगस्त्य मुनिके शिष्य सुतीक्ष्णको अपना आहार बनानेके लिये गये। वे बड़े तपस्वी और महात्मा थे। उन्होंने कुपित होकर मेरे माता-पिताको भस्म कर डाला। वे दोनों मर गये। तबसे मैं अकेली होकर बड़े दुःखके साथ इस पर्वतपर रहने लगी। मेरा कोई अवलम्ब नहीं रह गया। मैं असहाय और


* केदारेशस्य भक्ता ये मार्गस्थास्तस्य वै मृताः। तेऽपि मुक्ता भवन्त्येव नात्र कार्या विचारणा॥
(शि० पु० कोटिरुद्रसंहिता १९। २२)

* कोटिरुद्रसंहिता * ५१५

दुःखसे आतुर होकर यहाँ निवास करती थी। इसी समय महान् बल-पराक्रमसे सम्पन्न राक्षस कुम्भकर्ण जो रावणके छोटे भाई थे, यहाँ आये। उन्होंने बलात् मेरे साथ समागम किया। फिर वे मुझे छोड़कर लंका चले गये। तत्पश्चात् तुम्हारा जन्म हुआ। तुम भी पिताके समान ही महान् बलवान् और पराक्रमी हो। अब मैं तुम्हारा ही सहारा लेकर यहाँ कालक्षेप करती हूँ।

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! कर्कटीकी यह बात सुनकर भयानक पराक्रमी भीम कुपित हो यह विचार करने लगा कि ‘मैं विष्णुके साथ कैसा बर्ताव करूँ? इन्होंने मेरे पिताको मार डाला। मेरे नाना-नानी भी उनके भक्तके हाथसे मारे गये। विराधको भी इन्होंने ही मार डाला और इस प्रकार मुझे बहुत दुःख दिया। यदि मैं अपने पिताका पुत्र हूँ तो श्रीहरिको अवश्य पीड़ा दूँगा।'

ऐसा निश्चय करके भीम महान् तप करनेके लिये चला गया। उसने ब्रह्माजीकी प्रसन्नताके लिये एक हजार वर्षोंतक महान् तप किया। तपस्याके साथ-साथ वह मन-ही-मन इष्टदेवका ध्यान किया करता था। तब लोकपितामह ब्रह्मा उसे वर देनेके लिये गये और इस प्रकार बोले।

ब्रह्माजीने कहा—भीम! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ; तुम्हारी जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो।

भीम बोला—देवेश्वर! कमलासन! यदि आप प्रसन्न हैं और मुझे वर देना चाहते हैं तो आज मुझे ऐसा बल दीजिये, जिसकी कहीं तुलना न हो।

सूतजी कहते हैं—ऐसा कहकर उस राक्षसने ब्रह्माजीको नमस्कार किया और ब्रह्माजी भी उसे अभीष्ट वर देकर अपने धामको चले गये। ब्रह्माजीसे अत्यन्त बल पाकर राक्षस अपने घर आया और माताको प्रणाम करके शीघ्रतापूर्वक बड़े गर्वसे बोला—'माँ! अब तुम मेरा बल देखो। मैं इन्द्र आदि देवताओं तथा इनकी सहायता करनेवाले श्रीहरिका महान् संहार कर डालूँगा।' ऐसा कहकर भयानक पराक्रमी भीमने पहले इन्द्र आदि देवताओंको जीता और उन सबको अपने-अपने स्थानसे निकाल बाहर किया। तदनन्तर देवताओंकी प्रार्थनासे उनका पक्ष लेनेवाले श्रीहरिको भी उसने युद्धमें हराया। फिर प्रसन्नतापूर्वक पृथ्वीको जीतना प्रारम्भ किया। सबसे पहले वह कामरूप देशके राजा सुदक्षिणको जीतनेके लिये गया। वहाँ राजाके साथ उसका भयंकर युद्ध हुआ। दुष्ट असुर भीमने ब्रह्माजीके दिये हुए वरके प्रभावसे शिवके आश्रित रहनेवाले महावीर महाराज सुदक्षिणको परास्त कर दिया और सब सामग्रियोंसहित उनका राज्य तथा सर्वस्व अपने अधिकारमें कर लिया। भगवान् शिवके प्रिय भक्त धर्मप्रेमी परम धर्मात्मा राजाको भी उसने कैद कर लिया और उनके पैरोंमें बेड़ी डालकर उन्हें एकान्त स्थानमें बंद कर दिया। वहाँ उन्होंने भगवान्‌की प्रीतिके लिये शिवकी उत्तम पार्थिवमूर्ति बनाकर उन्हींका भजन-पूजन आरम्भ कर दिया। उन्होंने बारंबार गंगाजीकी स्तुति की और मानसिक स्नान आदि करके पार्थिव-पूजनकी विधिसे शंकरजीकी पूजा सम्पन्न की। विधिपूर्वक भगवान् शिवका ध्यान करके वे प्रणवयुक्त पंचाक्षरमन्त्र (ॐ नमः


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५१६* संक्षिप्त शिवपुराण *

शिवाय)—का जप करने लगे। अब उन्हें दूसरा कोई काम करनेके लिये अवकाश नहीं मिलता था। उन दिनों उनकी साध्वी पत्नी राजवल्लभा दक्षिणा प्रेमपूर्वक पार्थिव-पूजन किया करती थीं। वे दम्पति अनन्यभावसे भक्तोंका कल्याण करनेवाले भगवान् शंकरका भजन करते और प्रतिदिन उन्हींकी आराधनामें तत्पर रहते थे। इधर वह राक्षस वरके अभिमानसे मोहित हो यज्ञकर्म आदि सब धर्मोंका लोप करने लगा और सबसे कहने लगा—'तुम लोग सब कुछ मुझे ही दो।' महर्षियो! दुरात्मा राक्षसोंकी बहुत बड़ी सेना साथ ले उसने सारी पृथ्वीको अपने वशमें कर लिया। वह वेदों, शास्त्रों, स्मृतियों और पुराणोंमें बताये हुए धर्मका लोप करके शक्तिशाली होनेके कारण सबका स्वयं ही उपभोग करने लगा।

तब सब देवता तथा ऋषि अत्यन्त पीड़ित हो महाकोशीके तटपर गये और शिवका आराधन तथा स्तवन करने लगे। उनके इस प्रकार स्तुति करनेपर भगवान् शिव अत्यन्त प्रसन्न हो देवताओंसे बोले—'देवगण तथा महर्षियो! मैं प्रसन्न हूँ। वर माँगो। तुम्हारा कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ?'

देवता बोले—देवेश्वर! आप अन्तर्यामी हैं, अतः सबके मनकी सारी बातें जानते हैं। आपसे कुछ भी अज्ञात नहीं है। प्रभो! महेश्वर! कुम्भकर्णसे उत्पन्न कर्कटीका बलवान् पुत्र राक्षस भीम ब्रह्माजीके दिये हुए वरसे शक्तिशाली हो देवताओंको निरन्तर पीड़ा दे रहा है। अतः आप इस दुःखदायी राक्षसका नाश कर दीजिये। हमपर कृपा कीजिये, विलम्ब न कीजिये।

शम्भुने कहा—देवताओ! कामरूप देशके राजा सुदक्षिण मेरे श्रेष्ठ भक्त हैं। उनसे मेरा एक संदेश कह दो। फिर तुम्हारा सारा कार्य शीघ्र ही पूरा हो जायगा। उनसे कहना—'कामरूप देशके अधिपति महाराज सुदक्षिण! प्रभो! तुम मेरे विशेष भक्त हो। अतः प्रेमपूर्वक मेरा भजन करो। दुष्ट राक्षस भीम ब्रह्माजीका वर पाकर प्रबल हो गया है। इसीलिये उसने तुम्हारा तिरस्कार किया है। परंतु अब मैं उस दुष्टको मार डालूँगा, इसमें संदेह नहीं है।'

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! तब उन सब देवताओंने प्रसन्नतापूर्वक वहाँ जाकर उन महाराजसे शम्भुकी कही हुई सारी बात कह सुनायी। उनसे वह संदेश कहकर देवताओं और महर्षियोंको बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ और वे सब-के-सब शीघ्र ही अपने-अपने आश्रमको चले गये।

इधर भगवान् शिव भी अपने गणोंके साथ लोकहितकी कामनासे अपने भक्तकी रक्षा करनेके लिये सादर उसके निकट गये और गुप्तरूपसे वहीं ठहर गये। इसी समय कामरूपनरेशने पार्थिव शिवके सामने गाढ़ ध्यान लगाना आरम्भ किया। इतनेमें ही किसीने राक्षससे जाकर कह दिया कि राजा तुम्हारे (नाशके) लिये कोई पुरश्चरण कर रहे हैं।

यह समाचार सुनते ही वह राक्षस कुपित हो उठा और उनको मार डालनेकी इच्छासे नंगी तलवार हाथमें लिये राजाके पास गया। वहाँ पार्थिव आदि जो सामग्री स्थित थी, उसे देखकर तथा उसके प्रयोजन और स्वरूपको समझकर राक्षसने यही माना कि राजा मेरे लिये कुछ कर रहा है।


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* कोटिरुद्रसंहिता * ५१७

अतः 'सब सामग्रियोंसहित इस नरेशको मैं बलपूर्वक अभी नष्ट कर देता हूँ, ऐसा विचारकर उस महाक्रोधी राक्षसने राजाको बहुत डाँटा और पूछा 'क्या कर रहे हो?' राजाने भगवान् शंकरपर रक्षाका भार सौंपकर कहा—'मैं चराचर जगत्के स्वामी भगवान् शिवका पूजन करता हूँ।' तब राक्षस भीमने भगवान् शंकरके प्रति बहुत तिरस्कारयुक्त दुर्वचन कहकर राजाको धमकाया और भगवान् शंकरके पार्थिव-लिंगपर तलवार चलायी। वह तलवार उस पार्थिवलिंगका स्पर्श भी नहीं करने पायी कि उससे साक्षात् भगवान् हर वहाँ प्रकट हो गये और बोले—'देखो, मैं भीमेश्वर हूँ और अपने भक्तकी रक्षाके लिये प्रकट हुआ हूँ। मेरा पहलेसे ही यह व्रत है कि मैं सदा अपने भक्तकी रक्षा करूँ। इसलिये भक्तोंको सुख देनेवाले मेरे बलकी ओर दृष्टिपात करो।'

ऐसा कहकर भगवान् शिवने पिनाकसे उसकी तलवारके दो टुकड़े कर दिये। तब उस राक्षसने फिर अपना त्रिशूल चलाया, परंतु शम्भुने उस दुष्टके त्रिशूलके भी सैकड़ों टुकड़े कर डाले। तदनन्तर शंकरजीके साथ उसका घोर युद्ध हुआ जिससे सारा जगत् क्षुब्ध हो उठा। तब नारदजीने आकर भगवान् शंकरसे प्रार्थना की।

नारद बोले—लोगोंको भ्रममें डालने-वाले महेश्वर ! मेरे नाथ ! आप क्षमा करें, क्षमा करें। तिनकेको काटनेके लिये कुल्हाड़ा चलानेकी क्या आवश्यकता है। शीघ्र ही इसका संहार कर डालिये।

नारदजीके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर भगवान् शम्भुने हुंकारमात्रसे उस समय समस्त राक्षसोंको भस्म कर डाला। मुने ! सब देवताओंके देखते-देखते शिवजीने उन सारे राक्षसोंको दग्ध कर दिया। तदनन्तर भगवान् शंकरकी कृपासे इन्द्र आदि समस्त देवताओं और मुनीश्वरोंको शान्ति मिली तथा सम्पूर्ण जगत् स्वस्थ हुआ। उस समय देवताओं और विशेषतः मुनियोंने भगवान् शंकरसे प्रार्थना की कि 'प्रभो ! आप यहाँ लोगोंको सुख देनेके लिये सदा निवास करें। यह देश निन्दित माना गया है। यहाँ आनेवाले लोगोंको प्रायः दुःख ही प्राप्त होता है। परंतु आपका दर्शन करनेसे यहाँ सबका कल्याण होगा। आप भीमशंकरके नामसे विख्यात होंगे और सबके सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि करेंगे। आपका यह ज्योतिर्लिंग सदा पूजनीय और समस्त आपत्तियोंका निवारण करनेवाला होगा।'

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो ! उनके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर लोकहितकारी एवं भक्तवत्सल परम स्वतन्त्र शिव प्रसन्नता-पूर्वक वहीं स्थित हो गये।

(अध्याय १९—२१)


विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग और उनकी महिमाके प्रसंगमें पंचक्रोशीकी महत्ताका प्रतिपादन

सूतजी कहते हैं—मुनिवरो ! अब मैं काशीके विश्वेश्वर नामक ज्योतिर्लिंगका माहात्म्य बताऊँगा, जो महापातकोंका भी नाश करनेवाला है। तुमलोग सुनो, इस भूतलपर जो कोई भी वस्तु दृष्टिगोचर होती है, वह सच्चिदानन्दस्वरूप, निर्विकार एवं

५१८ * संक्षिप्त शिवपुराण *

सनातन ब्रह्मरूप है। अपने कैवल्य (अद्वैत)-भावमें ही रमनेवाले उन अद्वितीय परमात्मामें कभी एकसे दो हो जानेकी इच्छा जाग्रत् हुई।* फिर वे ही परमात्मा सगुणरूपमें प्रकट हो शिव कहलाये। वे शिव ही पुरुष और स्त्री दो रूपोंमें प्रकट हो गये। उनमें जो पुरुष था, उसका ‘शिव’ नाम हुआ और जो स्त्री हुई, उसे ‘शक्ति’ कहते हैं। उन चिदानन्दस्वरूप शिव और शक्तिने स्वयं अदृष्ट रहकर स्वभावसे ही दो चेतनों (प्रकृति और पुरुष)-की सृष्टि की। मुनिवरो! उन दोनों माता-पिताओंको उस समय सामने न देखकर वे दोनों प्रकृति और पुरुष महान् संशयमें पड़ गये। उस समय निर्गुण परमात्मासे आकाशवाणी प्रकट हुई—‘तुम दोनोंको तपस्या करनी चाहिये। फिर तुमसे परम उत्तम सृष्टिका विस्तार होगा।’

वे प्रकृति और पुरुष बोले—‘प्रभो! शिव! तपस्याके लिये तो कोई स्थान है ही नहीं। फिर हम दोनों इस समय कहाँ स्थित होकर आपकी आज्ञाके अनुसार तप करें।’

तब निर्गुण शिवने तेजके सारभूत पाँच कोस लंबे-चौड़े शुभ एवं सुन्दर नगरका निर्माण किया, जो उनका अपना ही स्वरूप था। वह सभी आवश्यक उपकरणोंसे युक्त था। उस नगरका निर्माण करके उन्होंने उसे उन दोनोंके लिये भेजा। वह नगर आकाशमें पुरुषके समीप आकर स्थित हो गया। तब पुरुष—श्रीहरिने उस नगरमें स्थित हो सृष्टिकी कामनासे शिवका ध्यान करते हुए बहुत वर्षोंतक तप किया। उस समय परिश्रमके कारण उनके शरीरसे श्वेत जलकी अनेक धाराएँ प्रकट हुईं, जिनसे सारा शून्य आकाश व्याप्त हो गया। वहाँ दूसरा कुछ भी दिखायी नहीं देता था। उसे देखकर भगवान् विष्णु मन-ही-मन बोल उठे—यह कैसी अद्भुत वस्तु दिखायी देती है? उस समय इस आश्चर्यको देखकर उन्होंने अपना सिर हिलाया, जिससे उन प्रभुके सामने ही उनके एक कानसे मणि गिर पड़ी। जहाँ वह मणि गिरी, वह स्थान मणिकर्णिका नामक महान् तीर्थ हो गया। जब पूर्वोक्त जलराशिमें वह सारी पंचक्रोशी डूबने और बहने लगी, तब निर्गुण शिवने शीघ्र ही उसे अपने त्रिशूलके द्वारा धारण कर लिया। फिर विष्णु अपनी पत्नी प्रकृतिके साथ वहीं सोये। तब उनकी नाभिसे एक कमल प्रकट हुआ और उस कमलसे ब्रह्मा उत्पन्न हुए। उनकी उत्पत्तिमें भी शंकरका आदेश ही कारण था। तदनन्तर


* ‘स द्वितीयमैच्छत्’ (बृहदारण्यक उ०—१।४।३) इस श्रुतिसे भी यही बात सिद्ध होती है।

* कोटिरुद्रसंहिता * ५१९

उन्होंने शिवकी आज्ञा पाकर अद्भुत सृष्टि आरम्भ की। ब्रह्माजीने ब्रह्माण्डमें चौदह भुवन बनाये। ब्रह्माण्डका विस्तार महर्षियोंने पचास करोड़ योजनका बताया है। फिर भगवान् शिवने यह सोचा कि 'ब्रह्माण्डके भीतर कर्मपाशसे बँधे हुए प्राणी मुझे कैसे प्राप्त कर सकेंगे?' यह सोचकर उन्होंने मुक्तिदायिनी पंचक्रोशीको इस जगत्में छोड़ दिया।

“यह पंचक्रोशी काशी लोकमें कल्याणदायिनी, कर्मबन्धनका नाश करनेवाली, ज्ञानदात्री तथा मोक्षको प्रकाशित करनेवाली मानी गयी है। अतएव मुझे परम प्रिय है। यहाँ स्वयं परमात्माने 'अविमुक्त' लिंगकी स्थापना की है। अतः मेरे अंशभूत हरे! तुम्हें कभी इस क्षेत्रका त्याग नहीं करना चाहिये।'' ऐसा कहकर भगवान् हरने काशीपुरीको स्वयं अपने त्रिशूलसे उतार कर मर्त्यलोकके जगत्में छोड़ दिया। ब्रह्माजीका एक दिन पूरा होनेपर जब सारे जगत्का प्रलय हो जाता है, तब भी निश्चय ही इस काशीपुरीका नाश नहीं होता। उस समय भगवान् शिव इसे त्रिशूलपर धारण कर लेते हैं और जब ब्रह्माद्वारा पुनः नयी सृष्टि की जाती है, तब इसे फिर वे इस भूतलपर स्थापित कर देते हैं। कर्मोंका कर्षण करनेसे ही इस पुरीको 'काशी' कहते हैं। काशीमें अविमुक्तेश्वरलिंग सदा विराजमान रहता है। वह महापातकी पुरुषोंको भी मोक्ष प्रदान करनेवाला है। मुनीश्वरो! अन्य मोक्षदायक धामोंमें सारूप्य आदि मुक्ति प्राप्त होती है। केवल इस काशीमें ही जीवोंको सायुज्य नामक सर्वोत्तम मुक्ति सुलभ होती है। जिनकी कहीं भी गति नहीं है, उनके लिये वाराणसी पुरी ही गति है। महापुण्यमयी पंचक्रोशी करोड़ों हत्याओंका विनाश करनेवाली है। यहाँ समस्त अमरगण भी मरणकी इच्छा करते हैं। फिर दूसरोंकी तो बात ही क्या है। यह शंकरकी प्रिय नगरी काशी सदा भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाली है।

कैलासके पति, जो भीतरसे सत्त्वगुणी और बाहरसे तमोगुणी कहे गये हैं, कालाग्नि रुद्रके नामसे विख्यात हैं। वे निर्गुण होते हुए भी सगुणरूपमें प्रकट हुए शिव हैं। उन्होंने बारंबार प्रणाम करके निर्गुण शिवसे इस प्रकार कहा।

रुद्र बोले—विश्वनाथ! महेश्वर! मैं आपका ही हूँ, इसमें संशय नहीं है। साम्ब महादेव! मुझ आत्मजपर कृपा कीजिये। जगत्पते! लोकहितकी कामनासे आपको सदा यहीं रहना चाहिये। जगन्नाथ! मैं आपसे प्रार्थना करता हूँ। आप यहाँ रहकर जीवोंका उद्धार करें।

सूतजी कहते हैं—तदनन्तर मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले अविमुक्तने भी शंकरसे बारंबार प्रार्थना करके नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए ही प्रसन्नतापूर्वक उनसे कहा।

अविमुक्त बोले—कालरूपी रोगके सुन्दर औषध देवाधिदेव महादेव! आप वास्तवमें तीनों लोकोंके स्वामी तथा ब्रह्मा और विष्णु आदिके द्वारा भी सेवनीय हैं। देव! काशीपुरीको आप अपनी राजधानी स्वीकार करें। मैं अचिन्त्य सुखकी प्राप्तिके लिये यहाँ सदा आपका ध्यान लगाये स्थिरभावसे बैठा रहूँगा। आप ही मुक्ति देनेवाले तथा सम्पूर्ण कामनाओंके पूरक हैं, दूसरा कोई नहीं। अतः आप परोपकारके

५२० * संक्षिप्त शिवपुराण *

लिये उमासहित सदा यहाँ विराजमान रहें। सदाशिव! आप समस्त जीवोंको संसार-सागरसे पार करें। हर! मैं बारंबार प्रार्थना करता हूँ कि आप अपने भक्तोंका कार्य सिद्ध करें।

सूतजी कहते हैं—ब्राह्मणो! जब विश्वनाथने भगवान् शंकरसे इस प्रकार प्रार्थना की, तब सर्वेश्वर शिव समस्त लोकोंका उपकार करनेके लिये वहाँ विराजमान हो गये। जिस दिनसे भगवान् शिव काशीमें आ गये, उसी दिनसे काशी सर्वश्रेष्ठ पुरी हो गयी। (अध्याय २२)


वाराणसी तथा विश्वेश्वरका माहात्म्य

सूतजी कहते हैं—मुनीश्वरो! मैं संक्षेपसे ही वाराणसी तथा विश्वेश्वरके परम सुन्दर माहात्म्यका वर्णन करता हूँ, सुनो। एक समयकी बात है कि पार्वतीदेवीने लोक-हितकी कामनासे बड़ी प्रसन्नताके साथ भगवान् शिवसे अविमुक्त क्षेत्र और अविमुक्त लिंगका माहात्म्य पूछा।

तब परमेश्वर शिवने कहा—यह वाराणसीपुरी सदाके लिये मेरा गुह्यतम क्षेत्र है और सभी जीवोंकी मुक्तिका सर्वथा हेतु है। इस क्षेत्रमें सिद्धगण सदा मेरे व्रतका आश्रय ले नाना प्रकारके वेष धारण किये मेरे लोकको पानेकी इच्छा रखकर जितात्मा और जितेन्द्रिय हो नित्य महायोगका अभ्यास करते हैं। उस उत्तम महायोगका नाम है पाशुपत योग। उसका श्रुतियोंद्वारा प्रतिपादन हुआ है। वह भोग और मोक्षरूप फल प्रदान करनेवाला है। महेश्वरि! वाराणसीपुरीमें निवास करना मुझे सदा ही अच्छा लगता है। जिस कारणसे मैं सब कुछ छोड़कर काशीमें रहता हूँ, उसे बताता हूँ, सुनो। जो मेरा भक्त तथा मेरे तत्त्वका ज्ञानी है, वे दोनों अवश्य ही मोक्षके भागी होते हैं। उनके लिये तीर्थकी अपेक्षा नहीं है। विहित और अविहित दोनों प्रकारके कर्म उनके लिये समान हैं। उन्हें जीवन्मुक्त ही समझना चाहिये। वे दोनों कहीं भी मरें, तुरंत ही मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। यह मैंने निश्चित बात कही है। सर्वोत्तमशक्ति देवी उमे! इस परम उत्तम अविमुक्त तीर्थमें जो विशेष बात है, उसे तुम मन लगाकर सुनो। सभी वर्ण और समस्त आश्रमोंके लोग चाहे वे बालक, जवान या बूढ़े, कोई भी क्यों न हों—यदि इस पुरीमें मर जायँ तो मुक्त हो ही जाते हैं, इसमें संशय नहीं है। स्त्री अपवित्र हो या पवित्र, कुमारी हो या विवाहिता, विधवा हो या वन्ध्या, रजस्वला, प्रसूता, संस्कारहीना अथवा जैसी-तैसी—कैसी ही क्यों न हो, यदि इस क्षेत्रमें मरी हो तो अवश्य मोक्षकी भागिनी होती है—इसमें संदेह नहीं है। स्वेदज, अण्डज, उद्भिज्ज अथवा जरायुज प्राणी जैसे यहाँ मरनेपर मोक्ष पाता है, वैसे और कहीं नहीं पाता। देवि! यहाँ मरनेवालेके लिये न ज्ञानकी अपेक्षा है न भक्तिकी; न कर्मकी आवश्यकता है न दानकी; न कभी संस्कृतिकी अपेक्षा है और न धर्मकी ही; यहाँ नामकीर्तन, पूजन तथा उत्तम जातिकी भी अपेक्षा नहीं होती। जो मनुष्य मेरे इस मोक्षदायक क्षेत्रमें निवास करता है, वह चाहे जैसे मरे, उसके लिये मोक्षकी प्राप्ति

* कोटिरुद्रसंहिता *
५२१

सुनिश्चित है। प्रिये! मेरा यह दिव्य पुर गुह्यसे भी गुह्यतर है। ब्रह्मा आदि देवता भी इसके माहात्म्यको नहीं जानते। इसलिये यह महान् क्षेत्र अविमुक्त नामसे प्रसिद्ध है; क्योंकि नैमिष आदि सभी तीर्थोंसे यह श्रेष्ठ है। यह मरनेपर अवश्य मोक्ष देनेवाला है। धर्मका सार सत्य है, मोक्षका सार समता है तथा समस्त क्षेत्रों एवं तीर्थोंका सार यह 'अविमुक्त' तीर्थ (काशी) है—ऐसी विद्वानोंकी मान्यता है। इच्छानुसार भोजन, शयन, क्रीड़ा तथा विविध कर्मोंका अनुष्ठान करता हुआ भी मनुष्य यदि इस अविमुक्त तीर्थमें प्राणोंका परित्याग करता है तो उसे मोक्ष मिल जाता है। जिसका चित्त विषयोंमें आसक्त है और जिसने धर्मकी रुचि त्याग दी है, वह भी यदि इस क्षेत्रमें मृत्युको प्राप्त होता है तो पुनः संसार-बन्धनमें नहीं पड़ता। फिर जो ममतासे रहित, धीर, सत्त्वगुणी, दम्भहीन, कर्मकुशल और कर्तापनके अभिमानसे रहित होनेके कारण किसी भी कर्मका आरम्भ न करनेवाले हैं, उनकी तो बात ही क्या है। वे सब मुझमें ही स्थित हैं।

इस काशीपुरीमें शिवभक्तोंद्वारा अनेक शिवलिंग स्थापित किये गये हैं। पार्वति! वे सम्पूर्ण अभीष्टोंको देनेवाले और मोक्षदायक हैं। चारों दिशाओंमें पाँच-पाँच कोस फैला हुआ यह क्षेत्र 'अविमुक्त' कहा गया है, यह सब ओरसे मोक्षदायक है। जीवको मृत्युकालमें यह क्षेत्र उपलब्ध हो जाय तो उसे अवश्य मोक्षकी प्राप्ति होती है। यदि निष्पाप मनुष्य काशीमें मरे तो उसका तत्काल मोक्ष हो जाता है और जो पापी मनुष्य मरता है, वह कायव्यूहोंको प्राप्त होता है। उसे पहले यातनाका अनुभव करके ही पीछे मोक्षकी प्राप्ति होती है। सुन्दरि! जो इस अविमुक्त क्षेत्रमें पातक करता है, वह हजारों वर्षोंतक भैरवी यातना पाकर पापका फल भोगनेके पश्चात् ही मोक्ष पाता है। शतकोटि कल्पोंमें भी अपने किये हुए कर्मका क्षय नहीं होता। जीवको अपने द्वारा किये गये शुभाशुभ कर्मका फल अवश्य ही भोगना पड़ता है। केवल अशुभ कर्म नरक देनेवाला होता है, केवल शुभ कर्म स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला होता है तथा शुभ और अशुभ दोनों कर्मोंसे मनुष्ययोनिकी प्राप्ति बतायी गयी है। अशुभ कर्मकी कमी और शुभ कर्मकी अधिकता होनेपर उत्तम जन्म प्राप्त होता है। शुभ कर्मकी कमी और अशुभ कर्मकी अधिकता होनेपर यहाँ अधम जन्मकी प्राप्ति होती है। पार्वति! जब शुभ और अशुभ दोनों ही कर्मोंका क्षय हो जाता है, तभी जीवको सच्चा मोक्ष प्राप्त होता है। यदि किसीने पूर्वजन्ममें आदरपूर्वक काशीका दर्शन किया है, तभी उसे इस जन्ममें काशीमें पहुँचकर मृत्युकी प्राप्ति होती है। जो मनुष्य काशी जाकर गंगामें स्नान करता है, उसके क्रियमाण और संचित कर्मका नाश हो जाता है। परंतु प्रारब्ध कर्म भोगे बिना नष्ट नहीं होता, यह निश्चित बात है। जिसकी काशीमें मुक्ति हो जाती है, उसके प्रारब्ध कर्मका भी क्षय हो जाता है। प्रिये! जिसने एक ब्राह्मणको भी काशीवास करवाया है, वह स्वयं भी काशीवासका अवसर पाकर मोक्ष लाभ करता है।

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* संक्षिप्त शिवपुराण *

सूतजी कहते हैं—मुनिवरो! इस तरह काशीका तथा विश्वेश्वरलिंगका प्रचुर माहात्म्य बताया गया है, जो सत्पुरुषोंको भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला है। इसके बाद मैं त्र्यम्बक नामक ज्योतिर्लिंगका माहात्म्य बताऊँगा, जिसे सुनकर मनुष्य क्षणभरमें समस्त पापोंसे मुक्त हो जाता है।
(अध्याय २३)



### त्र्यम्बक ज्योतिर्लिंगके प्रसंगमें महर्षि गौतमके द्वारा किये गये परोपकारकी कथा, उनका तपके प्रभावसे अक्षय जल प्राप्त करके ऋषियोंकी अनावृष्टिके कष्टसे रक्षा करना; ऋषियोंका छलपूर्वक उन्हें गोहत्यामें फँसाकर आश्रमसे निकालना और शुद्धिका उपाय बताना

सूतजी कहते हैं—मुनिवरो! सुनो, मैंने सद्गुरु व्यासजीके मुखसे जैसी सुनी है, उसी रूपमें एक पापनाशक कथा तुम्हें सुना रहा हूँ। पूर्वकालकी बात है, गौतम नामसे विख्यात एक श्रेष्ठ ऋषि रहते थे, जिनकी परम धार्मिक पत्नीका नाम अहल्या था। दक्षिण-दिशामें जो ब्रह्मगिरि है, वहीं उन्होंने दस हजार वर्षोंतक तपस्या की थी। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षियो! एक समय वहाँ सौ वर्षोंतक बड़ा भयानक अवर्षण हो गया। सब लोग महान् दुःखमें पड़ गये। इस भूतलपर कहीं गीला पत्ता भी नहीं दिखायी देता था। फिर जीवोंका आधारभूत जल कहाँसे दृष्टिगोचर होता। उस समय मुनि, मनुष्य, पशु, पक्षी और मृग— सब वहाँसे दसों दिशाओंको चले गये। तब गौतम ऋषिने छः महीनेतक तप करके वरुणको प्रसन्न किया। वरुणने प्रकट होकर वर माँगनेको कहा—ऋषिने वृष्टिके लिये प्रार्थना की। वरुणने कहा—‘देवताओंके विधानके विरुद्ध वृष्टि न करके मैं तुम्हारी इच्छाके अनुसार तुम्हें सदा अक्षय रहनेवाला जल देता हूँ। तुम एक गड्ढा तैयार करो।’

उनके ऐसा कहनेपर गौतमने एक हाथ गहरा गड्ढा खोदा और वरुणने उसे दिव्य जलके द्वारा भर दिया तथा परोपकारसे सुशोभित होनेवाले मुनिश्रेष्ठ गौतमसे कहा—‘महामुने! कभी क्षीण न होनेवाला यह जल तुम्हारे लिये तीर्थरूप होगा और पृथ्वीपर तुम्हारे ही नामसे इसकी ख्याति होगी। यहाँ किये हुए दान, होम, तप, देवपूजन तथा पितरोंका श्राद्ध—सभी अक्षय होंगे।’

ऐसा कहकर उन महर्षिसे प्रशंसित हो वरुणदेव अन्तर्धान हो गये। उस जलके द्वारा दूसरोंका उपकार करके महर्षि गौतमको भी बड़ा सुख मिला। महात्मा पुरुषका आश्रय मनुष्योंके लिये महत्त्वकी ही प्राप्ति करानेवाला होता है। महान् पुरुष ही महात्माके उस स्वरूपको देखते और समझते हैं, दूसरे अधम मनुष्य नहीं। मनुष्य जैसे पुरुषका सेवन करता है, वैसा ही फल पाता है। महान् पुरुषकी सेवासे महत्ता मिलती है और क्षुद्रकी सेवासे क्षुद्रता। उत्तम पुरुषोंका यह स्वभाव ही है कि वे दूसरोंके दुःखको नहीं सहन कर पाते। अपनेको दुःख प्राप्त हो जाय, इसे भी स्वीकार कर लेते हैं,

* कोटिरुद्रसंहिता * ५२३

किंतु दूसरोंके दुःखका निवारण ही करते हैं। दयालु, अभिमानशून्य, उपकारी और जितेन्द्रिय—ये पुण्यके चार खंभे हैं, जिनके आधारपर यह पृथ्वी टिकी हुई है।$^१$

तदनन्तर गौतमजी वहाँ उस परम दुर्लभ जलको पाकर विधिपूर्वक नित्य-नैमित्तिक कर्म करने लगे। उन मुनीश्वरने वहाँ नित्य-होमकी सिद्धिके लिये धान, जौ और अनेक प्रकारके नीवार बोआ दिये। तरह-तरहके धान्य, भाँति-भाँतिके वृक्ष और अनेक प्रकारके फल-फूल वहाँ लहलहा उठे। यह समाचार सुनकर वहाँ दूसरे-दूसरे सहस्रों ऋषि-मुनि, पशु-पक्षी तथा बहुसंख्यक जीव जाकर रहने लगे। वह वन इस भूमण्डलमें बड़ा सुन्दर हो गया। उस अक्षय जलके संयोगसे अनावृष्टि वहाँके लिये दुःखदायिनी नहीं रह गयी। उस वनमें अनेक शुभकर्मपरायण ऋषि अपने शिष्य, भार्या और पुत्र आदिके साथ वास करने लगे। उन्होंने कालक्षेप करनेके लिये वहाँ धान बोआ दिये। गौतमजीके प्रभावसे उस वनमें सब ओर आनन्द छा गया।

एक बार वहाँ गौतमके आश्रममें जाकर बसे हुए ब्राह्मणोंकी स्त्रियाँ जलके प्रसंगको लेकर अहल्यापर नाराज हो गयीं। उन्होंने अपने पतियोंको उकसाया। उन लोगोंने गौतमका अनिष्ट करनेके लिये गणेशजीकी आराधना की। भक्तपराधीन गणेशजीने प्रकट होकर वर माँगनेके लिये कहा—तब ये बोले—'भगवन्! यदि आप हमें वर देना चाहते हैं तो ऐसा कोई उपाय कीजिये, जिससे समस्त ऋषि डाँट-फटकारकर गौतमको आश्रमसे बाहर निकाल दें।'

गणेशजीने कहा—ऋषियो! तुम सब लोग सुनो। इस समय तुम उचित कार्य नहीं कर रहे हो। बिना किसी अपराधके उनपर क्रोध करनेके कारण तुम्हारी हानि ही होगी। जिन्होंने पहले उपकार किया हो, उन्हें यदि दुःख दिया जाय तो वह अपने लिये हितकारक नहीं होता। जब उपकारीको दुःख दिया जाता है, तब उससे इस जगत्में अपना ही नाश होता है।$^२$ ऐसी तपस्या करके उत्तम फलकी सिद्धि की जाती है। स्वयं ही शुभ फलका परित्याग करके अहितकारक फलको नहीं ग्रहण किया जाता। ब्रह्माजीने जो यह कहा है कि असाधु कभी साधुताको और साधु कभी असाधुताको नहीं ग्रहण करता, यह बात निश्चय ही ठीक जान


१-उत्तमानां स्वभावोऽयं परदुःखासहिष्णुता ॥
स्वयं दुःखं च सम्प्राप्तं मन्यतेऽन्यस्य वार्यते ।
दयालुर्मदस्पर्श उपकारी जितेन्द्रियः ॥
एतैश्च पुण्यस्तम्भैस्तु चतुर्भिर्धार्यते मही।
(शि० पु० कोटि० सं० २४। २४–२६)

२-अपराधं बिना तस्मै क्रुध्यतां हानिरेव च॥
उपस्कृतं पुरा यैस्तु तेभ्यो दुःखं हितं नहि।
यदा च दीयते दुःखं तदा नाशो भवेदिह॥
(शि० पु० को० रु० सं० २५। १४-१५)