शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र द्वारा
पंचमपटलः । ( १४७ ) पादसे लेकर मस्तकपर्य्यन्त शरीरके वायुका पोषणक- रते हैं ॥ ७३ ॥ ७४ ॥ ७५ ॥ मूलम्-नाडीभिराभिः सर्वाभिर्वायुः सञ्चर- ते यदा ॥ तदैवान्नरसो देहे साम्येनेह प्रव- र्त्तते ॥ ७६ ॥ टीका-जब सब नाडीके साथ वायु चलताहै तब अन्नका रस शरीरमें समभावसे प्रवृत्त होता है ॥ ७६ ॥ मूलम्-चतुर्दशानां तत्रेह व्यापारे मुख्य- भागतः ॥ ता अनुग्रत्वहीनाश्च प्राणस- ञ्चारनाडिकाः ॥ ७७ ॥ टीका-सर्व नाडियोंमें पूर्वोक्त चौदह नाडी शरीर- के मुख्य व्यापारको करतीहैं यह प्राण सञ्चार करने- वाली चौदह नाडीमें परस्पर कोई किसीसे न्यून अधिक नहीं है ॥ ७७ ॥ मूलम्-गुदाद्द्व्यंगुलतश्चोर्ध्वं मेढ्रैकांगुलत- स्त्वधः ॥ एवञ्चास्ति समं कन्दं समता चतुरंगुलम् ॥ ७८ ॥ टीका-गुदासे दो अङ्गुल ऊपर और मेढ्र अर्थात् लिङ्गमूलसे एक अंगुल नीचे चार अंगुल विस्तारक- न्दका प्रमाण है॥ ७८ ॥
( १४८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । मूलम्-पश्चिमाभिमुखी योनिर्गुदमेढ्रान्त- रालगा ॥ तत्र कन्दं समाख्यातं तत्रास्ति कुण्डली सदा ॥ ७९ ॥ संवेष्ट्य सकला नाडीः सार्द्धत्रिकुटिलाकृतिः॥ मुखे निवे- श्य सा पुच्छं सुषुम्णाविवरे स्थिता॥८०॥ टीका-गुदा और मेढ्रके मध्यमें जो योनि है वह पश्चिमाभिमुखी अर्थात् पीछेको मुख है उसी स्थानमें कन्दहै और उसी स्थानमें सर्वदा कुण्डलिनीकी स्थिति है यह कुण्डलिनी सकल नाडीको घेरके साढे तीन फेरा कुटिल आकृतिसे अपने मुखमें पुच्छको लेके सुषुम्णा विवरमें स्थित है ॥ ७९ ॥ ८० ॥ मूलम्-सुप्ता नागोपमा ह्येषा स्फुरन्ती प्रभया स्वया ॥ अहिवत्सन्धिसंस्थाना वाग्देवी बीजसंज्ञिका ॥ ८१ ॥ टीका-यह कुण्डलिनी सर्पके समान निद्रिता अपनी प्रभासे प्रकाशमान है और सर्पके सदृश संधि- में स्थित है और वाग्देवी है अर्थात् कुण्डलिनीहीसे वाक्य उच्चारण होताहै और बीज संज्ञक है अर्थात् सं- सारकी बीज है ॥ ८१ ॥ मूलम्-ज्ञेया शक्तिरियं विष्णोर्निर्मला स्वर्ण
पंचमपटलः । ( १४९ ) भास्वरा॥सत्त्वं रजस्तमश्चेति गुणत्रयप्र- सूतिका ॥ ८२ ॥ टीका-यह कुण्डलिनी देवी ईश्वरकी शक्तिमें तप्त स्वर्णके समान निर्मल तेजप्रभा है और सत्व, रज, तम, यह तीनों गुणकी माता है ॥ ८२ ॥ मूलम्-तत्र बन्धूकपुष्पाभं कामबीजं प्रकी- र्तितम् ॥ कलहेमसमं योगे प्रयुक्ताक्षररू- पिणम् ॥ ८३ ॥ टीका-जिस स्थानमें कुण्डलिनी है उसी स्थानमें बन्धूकपुष्पके समान रक्तवर्ण कामबीजकी स्थिति कहीगई है वह कामबीज तप्तस्वर्णके समान स्वरूप- योगयुक्तद्वारा चिंतनीय है ॥ ८३ ॥ मूलम्--सुषुम्णापि च संश्लिष्टा बीजं तत्र वरं स्थितम्॥शरच्चंद्रनिभं तेजस्स्वयमेतत्स्फु- रत्स्थितम्॥८४ ॥सूर्यकोटिप्रतीकाशं च- न्द्रकोटिसुशीतलम् ॥ एतत्रयं मिलित्वैव देवी त्रिपुरभैरवी ॥बीजसंज्ञं परं तेजस्तदे- व परिकीर्तितम् ॥ ८५ ॥ टीका-जिस स्थानमें कुण्डलिनी स्थित है सुषुम्णा उसी स्थानमें कामबीजके साथ स्थित है और वह बीज
(१५०) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । शारच्चन्द्रके समान प्रकाशमान तेज है और वह आप- ही कोटि सूर्यके समान प्रकाश और कोटिचन्द्रके समान शीतल है यह तीनों मिलके अर्थात् कुण्डलिनी सुषुम्णा, बीजकुण्डलिनीका नाम त्रिपुरभैरवी देवी है यह कुण्ड- लिनी परमतेजमानहै और उसकी बीजसंज्ञाहै॥८४॥८५॥ मूलम्--क्रियाविज्ञानशक्तिभ्यां युतं यत्प- रितो भ्रतत्॥८६॥ उत्तिष्ठद्दिशतस्त्वम्भः सूक्ष्मं शोणशिखायुतम्॥योनिस्यं तत्परं तेजः स्वयंभूलिंगसंज्ञितम् ॥ ८७ ॥ टीका--वह बीज क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्तिसे युक्त होके शरीरमें भ्रमण करताहै और कभी ऊर्ध्वगामी हो- ताहै और कभी जलमें प्रवेश करताहै और सूक्ष्म प्रज्व- लित अग्निके समान शिखायुत परमतेजवीर्यकी स्थिति योनिस्यानमें है और स्वयम्भू लिङ्गसंज्ञा है॥८६॥८७॥ मूलम्--आधारपद्ममेतद्धि योनिर्यस्यास्ति कन्दतः ॥ परिस्फुरद्वादिसान्तचतुर्वर्ण चतुर्दलम् ॥ ८८ ॥ टीका--यह जो कहाहै इसको आधारपद्म कहते हैं और इस पद्मके मूलमें योनिकी स्थितिहै यह पद्म परम प्रकाशमान-व-से स-तक अर्थात् व-श-ष-स चारवर्ण और चारदल करके शोभित है ॥ ८८ ॥
पंचमपटलः । ( १५१ ) मूलम्-कुलाभिधं सुवर्णाभं स्वयम्भूलि- ङ्गसंगतम् ॥ द्विरण्डो यत्र सिद्धोऽस्ति डाकिनी यत्र देवता ॥८९॥ तत्पद्ममध्य- गा योनिस्तत्र कुण्डलिनी स्थिता ॥ त- स्याऊर्ध्वे स्फुरत्तेजः कामबीजं भ्रमन्मत- म् ॥ ९०॥ यः करोति सदा ध्यानं मूला- धारे विचक्षणः ॥ तस्य स्याद्दार्दुरी सिद्धि- र्भूमित्यागक्रमेण वै ॥ ९१ ॥ टीका-यह कमल कुलाभिध है अर्थात् कुलनाम है और स्वर्णके समान कांतिहै और स्वयंभूलिङ्गसे युक्त है और उस पद्ममें द्विरण्डनामक सिद्ध और डाकिनी देवता अधिष्ठात्री है और गणेश देवता है और उस पद्मके मध्यमें योनि है उस योनिमें कुण्डलिनीकी स्थि- तिहै और उस कुण्डलिनीके ऊपर दीप्तिमान् तेजस्व- रूप कामबीज भ्रमण करताहै जो बुद्धिमान् पुरुष इस मूलाधार पद्मका सर्वदा ध्यान करते हैं उनको दार्दुरी वृत्ति सिद्ध होती है और क्रमसे भूमिको त्यागके आ- काशगमन करते हैं ॥ ८९ ॥ ९० ॥ ९१ ॥ मूलम्-वपुषः कान्तिरुत्कृष्टा जठराग्निविव-
( १५२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । र्धनम् ॥ आरोग्यञ्च पटुत्वञ्च सर्वज्ञत्वञ्च जायते ॥ ९२ ॥ टीका-यह ध्यान करनेसे शरीरमें उत्तम कांति होती है और जठराग्नि वर्धित होताहै और शरीर आरोग्य रहताहै और पटुता और सर्वज्ञता अर्थात् सर्व वस्तुका ज्ञान उत्पन्न होता है ॥ ९२ ॥ मूलम्-भूतं भव्यं भविष्यञ्च वेत्ति सर्वं सका- रणम् ॥ अश्रुतान्यपि शास्त्राणि सरहस्यं वदेद्ध्रुवम् ॥ ९३ ॥ टीका-फिर भूत, भविष्य, वर्तमान तीनोंकाल और सर्व वस्तुके कारणका ज्ञान होताहै और जो शास्त्र कभी श्रवण नहीं कियाहै उसको रहस्यसहित व्या- ख्या करनेकी शक्ति निश्चय उत्पन्न होती है ॥ ९३ ॥ मूलम्-वक्त्रे सरस्वती देवी सदा नृत्यति नि- र्भरम् ॥ मन्त्रसिद्धिर्भवेत्तस्य जपादेव न संशयः ॥ ९४ ॥ टीका-योगीके मुखमें सर्वदा निरंतर सरस्वती दे- वी नृत्य करती है और योगीकी जपमात्रसे मन्त्रादिकी सिद्धि होती है इसमें संशय नहीं है ॥ ९४ ॥ मूलम्-जरामरणदुःखौघान्नाशयति गुरोर्व-
पंचमपटलः । ( १५३ ) चः॥इदं ध्यानं सदा कार्यं पवनाभ्यासि- ना परम् ॥ ध्यानमात्रेण योगीन्द्रो मु- च्यते सर्वकिल्बिषात् ॥ ९५ ॥ टीका-गुरुका वचन जग मृत्यु आदि जो दुःखका समूह है उसको नाश करदेताहै पवनाभ्यासी साधकको यह परमध्यान सर्वदा करनेके योग्य है ध्यानमात्रसे योगीन्द्र सर्वपापसे मुक्त होजाताहै ॥ ९५ ॥ मूलम्-मूलपद्मं यदा ध्यायेद्योगी स्वायं- म्भुलिङ्गकम् ॥ तदा तत्क्षणमात्रेण पापौ- घं नाशयेद्ध्रुवम् ॥ ९६ ॥ टीका-योगी जब मूलाधार पद्म स्वयम्भूलिङ्गसंयु- क्तका ध्यानकरे तो उसीक्षण निश्चय पापके समूहका नाश करदेगा ॥ ९६ ॥ मूलम्-यं यं कामयते चित्ते तं तं फलमवा- प्नुयात् ॥ निरन्तरकृताभ्यासात्तं पश्यति विमुक्तिदम् ॥९७॥ बहिरभ्यन्तरे श्रेष्ठं पू- जनीयं प्रयत्नतः ॥ ततः श्रेष्ठतमं ह्येतन्ना- न्यदस्ति मतं मम ॥ ९८ ॥ टीका--जो साधक मूलाधार पद्मका ध्यान करते हैं वह अपने चित्तमें जोजो वस्तुकी इच्छा करते हैं सो सो
( १५४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । सर्व वस्तु उनको प्राप्त होती हैं और सर्वदा यत्नपूर्वक यह अभ्यास करनेसे बाहर भीतर श्रेष्ठ पूजनीय मुक्ति- दायी परमात्माको देखते हैं हे पार्वति ! इससे श्रेष्ठतम दूसरा योग नहीं है यह हमारा मतहै ॥ ९७ ॥ ९८ ॥ मूलम्-आत्मसंस्थं शिवं त्यक्ता बहिःस्थं यः समर्चयेत् ॥ हस्तस्थं पिण्डमुत्सृज्य भ्रमते जीविताशया ॥ ९९ ॥ टीका-मनुष्य शरीरस्थ शिवको त्यागके बाहरके देवताको पूजते हैं जैसे हाथके पिंडको त्यागके जीवके रक्षार्थ अन्य पिंडके हेतु लोग भ्रमण करतेहैं ॥ ९९ ॥ मूलम्-आत्मलिंगार्चनं कुर्यादनालस्यं दि- ने दिने ॥ तस्य स्यात्सकलासिद्धिर्नात्र कार्या विचारणा ॥ १००॥ निरन्तरकृता- भ्यासात्षण्मासैः सिद्धिमाप्नुयात् ॥ तस्य वायुप्रवेशोपि सुषुम्णायाम्भवेद्ध्रुवम् ॥ ॥ १०१ ॥ मनोजयञ्च लभते वायुबिन्दु- विधारणात् ॥ ऐहिकामुष्मिकीसिद्धिर्भ- वेन्नैवात्र संशयः ॥ १०२ ॥ टीका-जो आलस्यको त्यागके शरीरस्थ परमा- त्माका नित्य पूजन करेगा उसको सकलसिद्धि प्राप्त-
पंचमपटलः। ( १५५ ) होगी इसमें संशय नहीं है यदि इसका अभ्यास निर- न्तर करे तो छःमासमें सिद्धि प्राप्तहोगी और उसके सुषुम्णानाडीमें निश्चय वायु प्रवेश करेगा और मनको जीतलेगा और वायु बिन्दु का धारण सिद्धहोगा और इसलोक और परलोककी सिद्धि प्राप्त होगी इसमें संशय नहीं है ॥ १०० ॥ १०१ ॥ १०२ ॥ अथ स्वाधिष्ठानचक्रविवरणम् । मूलम्-द्वितीयन्तु सरोजञ्च लिंगमूले व्य- वस्थितम्॥वादिलान्तं च षड्वर्णं परिभा- स्वरषड्दलम् ॥ १०३ ॥ स्वाधिष्ठानाभिधं तत्तु पंकजं शोणरूपकम्॥ बाणाख्योय- त्रासिद्धोऽस्ति देवी यत्रास्ति राकिणी १०४ टीका-दूसरा पद्म जो लिङ्गमूलमें स्थितहै वह- व से लतक- अर्थात-व-भ-म-य-र-ल-यह-छःवर्णोंकरके युक्त है और छः दलसे शोभितहै.यह रक्तवर्णपद्मका नाम स्वा- धिष्ठानहै और इस स्थानमें बाणनामक सिद्ध और राकि- णी देवी अधिष्ठात्रीहै और ब्रह्मा देवता हैं॥१०३॥१०४॥ मूलम्-यो ध्यायति सदा दिव्यं स्वाधिष्ठा- नारविन्दकम् ॥ तस्य कामाङ्गनाः सर्वा भजन्ते काममोहिताः॥ १०५ ॥
( १५६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । टीका-जो पुरुष यह दिव्य स्वाधिष्ठानपद्मका सर्वदा ध्यान करते हैं उनको कामरूपिणी स्त्री कामसे मोहित होके भजतीहैं अर्थात् सेवा करती हैं ॥ १०५ ॥ मूलम्-विविधञ्चाश्रुतं शास्त्रं निःशङ्को वै व- देद्ध्रुवम् ॥ सर्वरोगविनिर्मुक्तो लोके चरति निर्भयः ॥ १०६ ॥ टीका-विविधशास्त्र जो कभी श्रवण नहीं किय हो उसकोभी इस पद्मके ध्यानके प्रभावसे निःशंक कहेगा और सर्वरोगसे मुक्तहोके आनन्दपूर्वक संसारमें विचरेगा ॥ १०६ ॥ मूलम्-मरणं खाद्यते तेन स केनापि न खा- द्यते ॥ तस्य स्यात्परमा सिद्धिरणिमादि- गुणप्रदा ॥१०७॥ वायुः सञ्चरते देहे रस- वृद्धिर्भवेद्ध्रुवम् ॥ आकाशपङ्कजगलत्पीय़ू- षमपि वर्द्धते ॥ १०८ ॥ टीका-यह साधक मृत्युको नाश करदेताहै और वह किसीसे नष्ट नहीं होता और उस साधकको गुण देनेवाली अणिमादि सिद्धि प्राप्त होती हैं और उसके शरीरमें वायु संचार करताहै अर्थात् सुषुम्णामें प्रवेश करताहै और निश्चय रसकी वृद्धि होतीहै और सह-
पंचमपटलः । ( १५७ ) षद्दलकमलसे जो अमृत स्रवताहै उसकी वृद्धि होती है ॥ १०७ ॥ १०८ ॥ अथ मणिपूरचक्रविवरणम् । मूलम्-तृतीयं पङ्कजं नाभौ मणिपूरकसंज्ञ- कम्॥दशारंडादिफान्तार्ण शोभितं हेमवर्ण कम् ॥ १०९॥ रुद्राख्यो यत्र सिद्धोऽस्ति सर्वमङ्गलदायकः ॥ तत्रस्था लाकिनी- नाम्नी देवी परमधार्मिका ॥ ११० ॥ टीका-मणिपूरनामक तीसरा पद्म जो नाभिस्थलमें है वह हेमवर्ण दशदलकरके शोभितहै और-ड-से फ-तक अर्थात् ड-ढ-ण-त-थ-द-ध-न-प-फ-यह दश- वर्णसे युक्त है और उस स्थानमें सर्वमंगलदाता रु- द्रनामक सिद्ध और लाकिनी देवी अधिष्ठात्री और विष्णुदेवता हैं ॥ १०९ ॥ ११० ॥ मूलम्-तस्मिन् ध्यानं सदा योगी करोति मणिपूरके ॥ तस्य पातालसिद्धिः स्यान्नि- रन्तरसुखावहा ॥१११॥ ईप्सितञ्च भवे- ल्लोके दुःखरोगविनाशनम् ॥ कालस्य व- ञ्चनञ्चापि परदेहप्रवेशनम् ॥ ११२ ॥ टीका-जो साधक इस मणिपूरचक्रको सर्वदा ध्या-
( १५८ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । न करतेहैं सो सर्वसिद्धिदात्री जो पातालसिद्धि है उसको लाभ करते हैं और उनका दुःख रोगविनाश होके सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं और कालको नि- रादर कर देतेहैं और परदेहमें प्रवेश करनेकी शक्ति उत्पन्न होती है ॥ १११ ॥ ११२ ॥ मूलम्-जाम्बूनदादिकरणं सिद्धानां दर्शनं भवेत् ॥ ओषधीदर्शनञ्चापि निधीनां द- र्शनं भवेत् ॥ ११३ ॥ टीका-यह साधकको सुवर्णआदि रचना करनेकी शक्ति होतीहै और देवतोंका दर्शन और निधि और ओषधीका दर्शन होताहै ॥ ११३ ॥ मूलम्-हृदयेऽनाहतंनाम चतुर्थं पङ्कजं भ- वेत् ॥११४॥ कादिठान्तार्णसंस्थानं द्वाद- शारसमन्वितम् ॥ अतिशोणं वायुबीजं प्रसादस्थानमीरितम् ॥ ११५ ॥ टीका-हृदयस्थानमें जो अनाहतनामक चतुर्थ पद्म है वह-क-से-ठ-तक अर्थात् क-ख-ग-घ-ङ-च-छ- ज-झ-ञ-ट-ठ-यह बारह वर्ण और बारहदलसे युक्त है और अति उज्ज्वल रक्तवर्णसे शोभायमान है और
पंचमपटलः । ( १५९ ) वह प्रसन्नस्थान वायुका बीज अर्थात् प्राणवायुका आधार है ॥ ११४ ॥ ११५ ॥ मूलम्-पद्मस्थं तत्परं तेजो बाणलिंगं प्रकीर्तितम् ॥ यस्य स्मरणमात्रेण दृष्टा- दृष्टफलं लभेत् ॥ ११६ ॥ टीका-उस हृदयकमलमें जो परमतेज है उसीको बाणलिङ्ग कहते हैं जिसके ध्यानमात्रसे साधक इस लोक और परलोकका उत्तमफल आनंदपूर्वक लाभ करते हैं ॥ ११६ ॥ मूलम्-सिद्धः पिनाकी यत्रास्ते काकिनी यत्र देवता ॥ एतस्मिन्सततं ध्यानं हृ- त्पाथोजे करोति यः ॥ क्षुभ्यन्ते तस्य कान्ता वै कामार्ता दिव्ययोषितः ॥११७॥ टीका-जिस पद्ममें पिनाकी, सिद्ध और काकिनी देवी अधिष्ठात्री हैं उस हृदयस्थपद्ममें जो साधक सर्वदा ध्यान करताहै उसके समीप कामार्ता सुन्दर स्त्री अप्सरा आदि मोहित होजाती हैं ॥ ११७ ॥ मूलम्-ज्ञानञ्चाप्रतिमं तस्य त्रिकालवि- षयम्भवेत् ॥ दूरश्रुतिर्दूरदृष्टिः स्वेच्छया खगतां व्रजेत् ॥ ११८ ॥
( १६० ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेत । टीका-उस साधकको अपूर्वज्ञान उत्पन्न होताहै और त्रिकालदर्शी होताहै और दूरशब्द श्रवण करने और दूरकी सूक्ष्मवस्तु देखनेकी शक्ति उत्पन्न होतीहै और स्वेच्छासे आकाशमें गमन करताहै ॥ ११८॥ मूलम्-सिद्धानां दर्शनञ्चापि योगिनीदर्शनं तथा ॥ भवेत्खेचरसिद्धिश्च खेचराणां जयन्तथा॥११९॥यो ध्यायति परं नित्यं बाणलिंगं द्वितीयकम् ॥ खेचरी भूचरी सिद्धिर्भवेत्तस्य न संशयः ॥ १२० ॥ टीका-जो साधक यह दूसरे परमबाणलिङ्गका नि- त्य ध्यान करताहै उसको देवता और योगिनीका दर्शन होताहै और आकाशमें गमन करनेकी शक्ति होजाती है और आकाशगामीसे जय प्राप्त होतीहै और खेचरी भूचरी सिद्ध होती है इसमें संशय नहीं है ॥११९ ॥१२०॥ मूलम्-एतद्ध्यानस्य माहात्म्यं कथितुं नै- व शक्यते॥ ब्रह्माद्याः सकला देवा गोपा- यन्ति परन्त्विदम् ॥ १२१ ॥ टीका-हे देवी ! इस अनाहत पद्मके ध्यानके माहात्म्य- को कोई नहीं कहसकता और इस ध्यानको ब्रह्मा आदि सकलदेवता गोप्य रखते हैं ॥ १२१ ॥
पंचमपटलः । ( १६१ ) अथ विशुद्धचक्रविवरणम् । मूलम्-कण्ठस्थानस्थितं पद्मं विशुद्धं नाम- पञ्चमम् ॥ १२२ ॥ सुहेमाभं स्वरोपेतं षोडशस्वरसंयुतम् ॥ छगलाण्डोऽस्ति सिद्धोत्र शाकिनी चाधिदेवता ॥ १२३ ॥ टीका-कंठस्थानमें जो पांचवां विशुद्धनामक क- मल है वह स्वर्णके समान कांतिसे शोभित है और सो- लह स्वर अर्थात् अ-आ-इ-ई-उ-ऊ-ऋ-ॠ-ऌ-ॡ-ए-ऐ- ओ-औ-अं-अः-से युक्त है और छगलांड सिद्ध और शा- किनीदेवी अधिष्ठात्री और जीवात्मा देवता इस स्थान- में सदा विराजमान हैं ॥ १२२ ॥ १२३ ॥ मूलम्-ध्यानं करोतियो नित्यं स योगीश्व- रपण्डितः॥ किन्त्वस्य योगिनोऽन्यत्र वि- शुद्धाख्ये सरोरुहे ॥ चतुर्वेदा विभासन्ते सरहस्या निधेरिव ॥ १२४ ॥ टीका-जो पुरुष इस विशुद्धपद्मका नित्य ध्यान करतेहैं सो योगीश्वर पंडित हैं और इस विशुद्धपद्ममें उस पुरुषको चारोंवेद रहस्यसहित समुद्रके रत्नवत् प्रकाश होते हैं ॥ १२४ ॥ मूलम्-इहस्थाने स्थितो योगी यदा क्रोध-
( १६२ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । वशो भवेत् ॥तदा समस्तं त्रैलोक्यं कम्प- ते नात्र संशयः ॥ १२५ ॥ टीका-यह विशुद्धपद्ममें जब योगी मन और प्रा- णको स्थित करके यदि क्रोध करे तो अवश्य चराचर त्रैलोक्य कम्पायमान होजाय इसमें सन्देह नहीं ॥१२५॥ मूलम्-इह स्थाने मनो यस्य दैवायाति लयं यदा ॥ तदा बाह्यं परित्यज्य स्वा- न्तरे रमते ध्रुवम् ॥ १२६ ॥ टीका-यह कमलमें साधकका मन दैवात् जब लय होताहै तब सकल बाह्यविषयको त्यागके योगी- का मन और प्राण शरीरके अंतरहीमें निश्चय रमण करताहै ॥ १२६ ॥ मूलम्-तस्य न क्षतिमायाति स्वशरीरस्य शक्तिः ॥ संवत्सरसहस्रेऽपि वज्रातिक- ठिनस्य वै ॥ १२७॥ यदा त्यजति त- द्ध्यानं योगींद्रोऽवनिमण्डले ॥ तदा वर्ष- सहस्राणि मन्यते तत्क्षणं कृती ॥ १२८ ॥ टीका-उस योगीका शरीर वज्रसेभी कठोर होजा- ताहै और उसको स्वशरीरकी शक्तिसे किसीप्रकारकी हानि नहीं होतीहै और सहस्रवर्ष समाधिके पीछे जब
पंचमपटलः । ( १६३ ) उस ध्यानको छोडके योगीकी चित्तवृत्ति संसारमें आ- वेगी तब उस सहस्रवर्षके योगी एकक्षण व्यतीत भया मानेगा ॥ १२७ ॥ १२८ ॥ अथ आज्ञाचक्रविवरणम् । मूलम्--आज्ञापद्मं भ्रुवोर्मध्ये हक्षोपेतं द्विप- त्रकम्॥शुक्लाभं तन्महाकालः सिद्धो दे- व्यत्र हाकिनी ॥ १२९ ॥ टीका-भ्रूके मध्यमें जो आज्ञापद्म है उसमें हं-क्षं- दो बीज हैं और सुंदर श्वेतवर्ण दो पत्र हैं और उस स्था- नमें महाकाल सिद्ध है और हाकिनीदेवी अधिष्ठात्री और परमात्मा देवता है ॥ १२९ ॥ मूलम्-शरच्चंद्रनिभं तत्राक्षरबीजं विजृंभितं॥ पुमान् परमहंसोऽयं यज्ज्ञात्वा नावसी- दति ॥ १३०॥ तत्र देवः परन्तेजः सर्वत- न्त्रेषु मन्त्रिणः ॥ चिन्तयित्वा परां सिद्धिं लभते नात्र संशयः ॥ १३१ ॥ टीका-उस आज्ञापद्मके मध्यमें शरच्चंद्रके समा- न परमतेज चंद्रबीज अर्थात् . ठं बीज विराजमान है इसके ज्ञान होनेसे परमहंस पुरुषको कभी कष्ट नहीं होता यह परमतेजका प्रकाश सर्वतंत्रों करके गो-
( १६४ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेत । पित है इसके चिंतनमात्रसे अवश्य परम सिद्धिलाभ होताहै ॥ १३० ॥ १३१ ॥ मूलम्-तुरीयं त्रितयं लिंगं तदाहं मुक्तिदा- यकः ॥ ध्यानमात्रेण योगीन्द्रो मत्समो भवति ध्रुवम् ॥ १३२ ॥ टीका-हे पार्वती ! उस स्थानमें तुरीया तृतीयलिंग हमीं मुक्तिके दाता हैं इसके ध्यानमात्रसे योगीन्द्र निश्चय हमारे तुल्य होजायगा ॥ १३२ ॥ मूलम्-इडा हि पिंगला ख्याता वरणासीति होच्यते ॥ वाराणसी तयोर्मध्ये विश्वना- थोत्र भाषितः ॥ १३३ ॥ टीका-इस शरीरमें जो दो इडा और पिंगला ना- डी हैं उनको वरणा और असी कहते हैं यह वरणा और असीके मध्यमें स्वयं विश्वनाथजी विराजमान हैं. ता- त्पर्य यह है कि , यह इडा और पिंगलाके मध्यमें जो स्थानहै उसीको शिवजीने वाराणसी कहाहै ॥ १३३ ॥ मूलम्-एतत्क्षेत्रस्य माहात्म्यमृषिभिस्त- तत्त्वदर्शिभिः ॥ शास्त्रेषु बहुधा प्रोक्तं परं तत्त्वं सुभाषितम् ॥ १३४ ॥ टीका-यह वाराणसी क्षेत्रके माहात्म्यको तत्त्वद-
पंचमपटलः । ( १६५ ) र्शी ऋषिलोगोंने अनेक शास्त्रोंमें बहुत प्रकारसे परम- तत्त्व कहाहै ॥ १३४ ॥ मूलम्-सुषुम्णा मेरुणा याता ब्रह्मरन्ध्रं य- तोऽस्ति वै ॥ ततश्चैषा परावृत्त्य तदाज्ञा- पद्मदक्षिणे ॥ १३५ ॥ वामनासापुटं या- ति गंगेति परिगीयते ॥ १३६ ॥ टीका-सुषुम्नानाडी मेरुदंडद्वारा जहां ब्रह्मरन्ध्र है उस स्थानमें गई है और इडानाडी मेरुतक जायके लौटीहै और आज्ञाचक्रके दक्षिणभाग होके वामनासापु- टको गई है इसको गङ्गा कहतेहैं ॥ १३५ ॥ १३६ ॥ मूलम्--ब्रह्मरन्ध्रे हि यत्पद्मं सहस्रारं व्यव- स्थितम्॥तत्र कन्देहि या योनिस्तस्यां च- न्द्रो व्यवस्थितः ॥१३७॥ त्रिकोणाकार- तस्तस्याः सुधा क्षरति सन्ततम्॥इडाया- ममृतं तत्र समं स्रवति चन्द्रमाः॥१३८॥ अमृतं वहति द्वारा धारारूपं निरन्तरम् ॥ वामनासापुटं याति गंगेत्युक्ता हि यो- गिभिः ॥ १३९ ॥ टीका-ब्रह्मरन्ध्रमें जो सहस्रदल पद्म है उस पद्मके कन्दमें योनि है उस योनिमें चन्द्रमा विराजमान है
( १६६ ) शिवसंहिता भाषाटीकासमेता । और वही त्रिकोणाकार योनीसे चन्द्रविगलित अमृत सर्वदा स्रवता है सो अमृत चंद्रमासे इडानाडीद्वारा समभावसे निरन्तर धारारूप गमन करता है और उस इडानाडीकी गति वामनासापुटमें है उस हेतुसे योगी लोग इस नाडीको गंगा कहतेहैं ॥१३७॥१३८॥१३९॥ मूलम्-आज्ञापङ्कजदक्षांसाद्वामनासापुटंग- ता ॥ उदग्वहेति तन्नेडा गंगेति समुदा- हृता ॥ १४० ॥ टीका-वह इडानाडी आज्ञापद्मके दक्षिणभागसे वामनासापुटको गमन करती है इसीको उदग्वाहिनी गंगा कहते हैं ॥ १४०॥ मूलम्-ततो द्वयोर्हि मध्ये तु वाराणसी वि- चिन्तयेत् ॥ तदाकारा पिंगलापि तदाज्ञा- कमलोत्तरे ॥ दक्षनासापुटे याति प्रोक्ता- स्माभिरसीति वै ॥ १४१ ॥ टीका-यह इडा और पिङ्गलाके मध्यस्थानको वाराणसी चिन्तनाकरे और इडानाडीके 'समान पि- ङ्गलाभी उस आज्ञाकमलके वामभागसे दक्ष नासा- पुटको गई है इस हेतुसे हेदेवी ! इस पिङ्गलाको हमने असी कहाहै ॥ १४१ ॥