भारतकोश
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श्री राम कथा में भारत की सभी समस्याओं का समाधान

Shri Ram Katha Mein Bharat Ki Sabhi Samasyaon Ka Samadhan

राजीव दीक्षित / रोबिन बसराना द्वारा

स्रोत: Rashtraniti & Ram Katha Discourse · Swadeshi Robin Basrana · 2017 (उद्गम)

DevanagariHindipublished32 पृष्ठ

आएगा वरना यह रावण राज यही चलता जाएगा जो अंग्रेजों ने चलाया था अब वही काले अंग्रेज चला रहे हैं बस इतना ही अंतर है, पहले गोरे अंग्रेज चला रहे थे, अब काले अंग्रेज चला रहे हैं, अभी इसके बाद मैं श्री राम जी की कथा में एक ऐसे अंश पर आता हूँ जो बीच का अंश है जिसको मैंने बाद के लिए रखा था, राम जी की कथा में एक स्थान पर ऐसा है जब वह वन चले गए और उनके पिताजी का स्वर्गवास हो गया तो उनके छोटे भाई भरत राम जी के पास आए और उनसे कहे कि चलो भाई वापस आपकी गद्दी, आप संभालो पिता जी का स्वर्गवास हो गया है, तो राम और भरत का संवाद है और मेरा मानना यह है कि भारत की सभी राम कथाओं का सबसे केंद्रीय स्थान अगर कोई है, तो वह राम भरत संवाद है इसमें आप सब कुछ समझ सकते हैं पूरी दुनिया पूरा ब्रह्मांड पूरी व्यवस्था है, सब इसी में समाहित है भरत राम का संवाद अगर रामचरितमानस में पढ़ना हो तो अयोध्या कांड में है वाल्मीकि रामायण में पढ़ना हो तो वहां भी है, रघुवंशम जो कालिदास की सबसे सुंदर कृति है उसमें एक सर्ग है 12 नंबर का सर्ग, उसमें भरत राम संवाद है और 12वीं सर्ग का एक उपसर्ग है, जिसको श्री कालिदास ने नाम दिया है कश्चित् सर्ग अद्भुत है, कंबन रामायण में बहुत विस्तार से है, कालिदास का रघुवंशम बहुत विस्तार से है, राम चरित्र मानस में थोड़ा संक्षेप में है, वाल्मीकि रामायण में थोड़ा विस्तार में है, यह जो सर्ग है बहुत ही अद्भुत है। मैं मानता हूँ की राम कथा में इससे अच्छा कोई अंश नहीं है। इसमें राम से मिलने के लिए जब भरत आते हैं, और बताते हैं कि पिताजी की मृत्यु हो गई है, राज्य को चलाना मेरे लिए तो मुश्किल है, आपको चलना पड़ेगा, तो राम जी उनसे कई प्रश्न पूछ रहे हैं, और सारे प्रश्न हमें बताते हैं कि राम राज्य कैसा होता है? और महात्मा गाँधी ने इसी राम-राज्य की बात कही है, तो भरत आये, हाल-चाल पूछा, गले लगकर रोये, फिर शान्ति के साथ बैठे हैं भरत। और राम जी का पहला प्रश्न जो भरत से पूछ रहे हैं वो यह कि “तुम जिस राज्य से आये हो आयोध्या का राज्य, तुम कहते हो कि राम का राज्य है, मेरा राज्य है, तो मैं पूछता हूँ, कि इस राज्य को चलाने के लिए, नीति, नियम, कानून के बारे में मैं प्रश्न करता हूँ, तुम उनका उत्तर ‘हाँ’ में देते हो तो मैं मानूंगा, कि वो राम राज्य है और ‘ना’ में दे रहे तो मैं नहीं मानता कि वो राम-राज्य है।

भरत – “आप प्रश्न पूछिए, जितनी मेरी हैसियत है, क्षमता है, मैं दूंगा”

श्री राम – “तुम अपने राज्य के आचार्यों का, गुरुओं का, वैद्यों का, पुरोहितों का, अग्रजों का ऐसा ही सम्मान करते हो, जैसा मैं करता था”?

भरत – “हाँ, मेरी कोशिश तो यही है, कि मैं सभी अग्रजों का सम्मान करूँ, मेरी कोशिश तो यही है, मैं मेरे गुरुओं का सम्मान करूँ, मैं कोशिश यही करता हूँ कि आचार्य का सम्मान करूँ, लेकिन पुरोहित के बारे में मुझे थोड़ी आशंका रहती है”

श्री राम – “क्यों इसमें आशंका क्या है? पुरोहितो तो कर्मकांड ही कराते हैं, तो तुमने क्या मान लिया वह गुरुओं से नीचे है? क्या वह आचार्यों से कम है”?

भरत – “मेरे मन में कभी कभी ऐसा प्रश्न आता है कि पुरोहितों को इतना ही सम्मान क्यों देना जितना आचार्य को जितना गुरुओं को जितना किसी और, क्योंकि हम मानते हैं भगवान तो घट-घट में हैं, ईश्वर तो हर कण में व्याप्त है पुरोहित कर्मकांड की तरफ लेकर जाते हैं और तरीके बता देते है पूजा के, जबकि ईश्वर तो कण-कण में हैं, घट-घट में है, भावना से ईश्वर है, पुरोहिताई में क्या है”?

रामजी का उत्तर सुनिए वह कहते हैं।

श्री राम – “देखो भरत यह पुरोहित तुम्हारे राज्य की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी है जरा समझो इस बात को रीढ़ की हड्डी है, पूरी अर्थव्यवस्था इन पुरोहितों के दम से चलती है”

भरत कहते हैं “समझ में नहीं आ रहा” तब राम कह रहे हैं “धर्मस्य मूलम अर्थम, अर्थस्य मूलं कामम” और इसी बात को राम जी के जाने के कुछ लाख साल के बाद चाणक्य बोल कर गए ‘धर्मस्य मूलम अर्थम, अर्थस्य मूलं कामम’। पहले मुझे ऐसा लगता था जब तक मैंने कंब रामायण नहीं पढ़ी थी, और यह रघुवंशम नहीं पढ़ी थी तो मैं मानता था धर्मस्य मूलम अर्थम, अर्थस्य मूलं कामम, इसके मूल रचयिता चाणक्य है, जो बड़े अर्थशास्त्री रहे इस देश में। लेकिन अब पता चला है कि चाणक्य से लाखों साल पहले रामचंद्र जी यह कह रहे हैं वह कहते हैं कि अगर तुम्हारी अर्थव्यवस्था मजबूत है तो धर्म मजबूत होगा और अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में पुरोहितों का सबसे बड़ा योगदान है तो फिर भी भरत को समझ में नहीं आ रहा तो रामचंद्र जी और उदाहरण देकर कहते हैं कि “देखो पुरोहित क्या करता है पुरोहित पूजा करता है और पूजा करवाता है किसी कथा की, सत्यनारायण की, जो भी करवाता है, लेकिन एक लिस्ट बनाता है, कि 10 घंटे ले आना एकदम कोरे होने चाहिए, 20 मीटर कपड़ा ले आना एकदम नया होना चाहिए, इतनी चूड़ियां ले आना बिना पहनी हुई होनी चाहिए, 10 किलो घी ले आना, यह सामग्री ले आना, यह ले आना, ऐसा-वैसा कर लेना”। मैंने यह एक रामायण में लिस्ट देखी तो कम से कम 108 थी, राम समझा रहे देखो “जब पूजा भगवान की कराएगा वह तो भावना से भी हो सकती है लेकिन जान पूछ कर वह वही चीजें बताएगा क्योंकि कारीगर जो इन चीजों को बनाएगा वह भी तो चाहिए”, उस दिन मेरे समझ में आया श्री राम जी की परिभाषा की पुरोहित मार्केटिंग मैनेजर होते हैं। अब समझ में आया इनसे बड़ा मार्केटिंग मैनेजर कौन होगा? अब देखो वह कह रहे हैं घंटे ले आना कुम्हार का काम बढ़ा कि नहीं, फिर घंटे के ऊपर ढकने के लिए ढक्कन और ले आना, तो कुम्हार का काम और बढ़ा, बिक्री बढ़ी, फिर कहते हैं कुल्लड़ ले आना उस पर प्रसाद रखेंगे तो मिट्टी में पवित्रता होती है, पवित्रता तो हर चीजों में होती है लेकिन मिट्टी के नए-नए बर्तन पूजा में लाएगा और ऐसी और सैकड़ों पूजा होती जाएगी तो कुम्हारों का काम जिंदगी भर चलता रहेगा, तो कारीगरों को जिंदा रखना है तो वह पुरोहित ही है वह नए-नए कपड़े मंगाते हैं तो जुलाहो का काम चलेगा, बुनकरों का काम चलेगा, धुनकरो का काम चलेगा, वह बांस मगवायेगा, नया-नया घी मगवाया जायेगा, जिससे यज्ञ कराना है तो घी बनाने वालों का काम चलेगा, उनकी गाय की संख्या बढ़ेगी

क्योंकि घी बिकेगा और घी को जलाकर फूँक देना है ताकि नया घी हमेशा बनता रहेगा”, यह बहुत दूर की बात है तो राम जब इस बात को बहुत विस्तार से समझाते हैं, तब भरत कहते हैं, “क्षमा करना भाई मुझे यह समझ में नहीं आता था, अब पता चल गया है कि पुरोहित राज्य व्यवस्था के अर्थ को समझते हैं, इसलिए वह भी आचार्य और गुरुओं के समकक्ष हैं, तो राम कहते हैं “देखो कभी कभी ऐसा हो जाए कि गुरुओं का सम्मान कुछ कम हो या आचार्यों का कम हो जाए लेकिन पुरोहितों का कम नहीं होने देना है, क्योंकि यह है तो राज्य की अर्थव्यवस्था है, अर्थव्यवस्था मजबूत है तो धन टिकेगा, धन टिकेगा तो राज्य बढेगा”। यह प्रसंग हमारी आंखें खोलने वाला है आज तक हमारे देश में पुरोहितों को गाली देने का काम आधुनिक पढ़े-लिखे लोगों ने बहुत किया है कि यह पौगा है ऐसे शंख बजाते हैं, ऐसे घंटे बजा देते हैं, यहाँ हमको इतना ही दिखाई देता है इसके आगे का कुछ दिखाई नहीं देता, कि वह कितनी बड़ी इकोनॉमी चला रहे हैं और राम आगे का प्रश्न पूछ रहे हैं कि “पुरोहित का सम्मान करो उनका ध्यान रखना कि वे कभी पैसें के लिए कुछ ना करते हो”, एक पुरोहित ऐसे आए जो पैसा लेकर पूजा कराते हैं तो राम कहते हैं कि “ऐसा पुरोहित है तो उनका सम्मान करने की जरूरत नहीं है क्योंकि जो ज्यादा पैसा देगा वह उसी का माल की बिक्री बढ़ जाएगी इसलिए पुरोहित उन्हीं का सम्मान करना है, जब पैसा खुद ना लेते हो और कारीगरों का माल भी बिकवाने में मदद करें, तो बिना पैसे लिए जो पूजा कराएँ वह पुरोहित है, पैसे लेकर जो कराएँ राम उसको अच्छा नहीं मानते तो अगला ही प्रश्न वह कहते हैं कि क्या तुम्हारे राज्य के पुरोहित पैसा लेकर पूजा कराते हैं अगर कराते हैं तो उनको किनारे रख दो तो भरत कह रहे हैं कि “मैं यहाँ से लौटकर ऐसे ही व्यवस्था कर लूँगा जो बिना पैसे के पूजा कराएँ” तो राम कह रहे हैं कि “पुरोहित को तो जिस घर में पूजा करानी है वहाँ का पानी भी ग्रहण नहीं करना चाहिए, क्योंकि जो बड़ा काम वह करने जा रहा है और घर का पानी-पीने लगे खाना ही खाना लगे तो लालच भाव आएगा और वह अपनी पुरोहिताई से दूर हो जाएगा अब इसको जरा समझे थोड़े विस्तार में की पुरोहित पूजा कराने वाले के घर खाना ना खाए, पानी ना पिए, अंग्रेजों ने इसी को प्रचार किया है कि छुआछूत मचाते हैं पानी भी नहीं पीते, मूर्ख अंग्रेजों को पता नहीं था कि वह श्रीराम की किसी बात का पालन करते हैं जिसके घर पूजा कराते उसके घर पानी भी नहीं पीना, पानी कहीं और जाकर पीना है। अंग्रेजों ने इसको छुआछूत से जोड़ दिया और हिंदुस्तान के कुछ मूर्ख इतिहासकारों ने उस पर पुस्तकों पर पुस्तक लिख डाली कि ये छुआछूत मचाते हैं, यह तो गरीबों के घर का पानी नहीं पीते, यह तो नीची जाति और ऊँची जाति करते रहते हैं, यह ऊँची-नीची जाति का प्रश्न नहीं, था जिनके घर पूजा कराने गये हैं, वह कोई भी जाति का हो, कोई भी संप्रदाय का हो, वहाँ पर पानी नहीं पीना है, भोजन नहीं ग्रहण करना है, दक्षिणा नहीं लेनी है, प्रसाद नहीं लेना है, यह श्री राम बोल कर गए तो उनका पालन करते हैं, फिर आगे का प्रश्न वह पूछते हैं “भरत तुम सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठते हो”? तो भरत कहते “हां”

श्री राम – “वही काम करते हो जो मैं करता हूँ, प्रजा के बीच जाते हो वहां जाकर उनका दुख-दर्द सुनते हो उनका हाल-चाल लेते हो लौट कर आ कर मंत्री मंडल की मीटिंग बुलाकर उसमें बात करते हो या नहीं करते”।

भरत – “हां मैं नियमित रूप से करता हूँ लेकिन कोई-कोई दिन प्रमाद आ जाता है मैं सुबह नहीं उठ पाता क्योंकि मेरे कुछ पुराने संस्कार है जो नाना के यहां से आए हैं तो उनके चलते कभी-कभी होता है तो राम कहते हैं “अब तुम राजा हो सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठना बिना अवरोध के प्रजा के बीच जाकर दुख दर्द सुनना” तो श्री राम कहते हैं, “तुम राम राज्य के अधिकारी हो तो राम राज्य की परिभाषा है, कि राजा हमेशा प्रजा के बीच में जाकर दुख-दर्द ले”।

भारत का कौन सा प्रधानमंत्री सुबह-सुबह प्रजा के बीच में जाता है? कोई जो प्रतिदिन प्रजा के बीच जाकर उनका दुख दर्द सुनकर आए, गलती से कोई हेलीकॉप्टर में बैठकर आते हैं तो बाढ़ राहत का काम देखने के लिए, जो दिखाई नहीं देता इतनी ऊंचाई से। अभी मैंने सुना है कि राजस्थान में 100 साल का रिकॉर्ड टूटा है बाढ़ का तो यहां के जो राजा है मुख्यमंत्री वह हेलीकॉप्टर में बैठकर ऐसे-ऐसे स्थानों में गए जहां बाढ़ ही नहीं आई थी, तो पत्रकार को पूछा गया कि तुम भी तो बैठे थे मुख्यमंत्री के साथ, तो कहा कि हां बैठे था, तो तुमने क्यों नहीं बताया, तो उसने कहा जो बताने के लिए कहा गया था उतना ही बताया, तो हमारे मंत्री महोदय, मुख्यमंत्री महोदय, प्रधानमंत्री महोदय, राज्यपाल महोदय, प्रजा के बीच में तो नहीं जाते, वो तो उड़न खटोले पर बैठे रहते हैं कहीं धूम टहल के चक्कर लगाते आ जाते हैं जहाँ बाढ़ राहत का काम होता रहता है। साल भर ऐसे ही चलता रहता है, राम कहते हैं कि “राजा को हमेशा प्रजा के बीच में ब्रह्म मुहूर्त में उठकर जाना चाहिए”, कौन प्रधानमंत्री ब्रह्म मुहूर्त में उठता है? हिंदुस्तान का पता नहीं कितने प्रधानमंत्री आए थे, रात भर दारू पीते सुबह उठने का तो प्रश्न ही नहीं है, कितने मुख्यमंत्री है जो दारू में ही डूबे रहते हैं, फिर वह आगे का प्रश्न पूछ रहे हैं कि “तुम तुम्हारे जो एडवाइजर(सलाहकार) है इनमें से किस पर भरोसा करते हो जो पैसे लेकर काम करते हैं या जो अवैतनिक सेवाएं करते हैं”। एडवाइजर दो तरीके के हैं एक तो वह जिनको पगार देते हैं, एक ऐसे हैं जो बिना पगार के काम करते हैं, तो भरत कहते हैं, “मैं तो ज्यादा भरोसा उन पर करता हूँ जो बिना पगार के कार्य करते हैं”। तो श्रीराम कहते हैं कि, “वही सही सलाह देंगे, जो तुमसे धन ले गए या संपत्ति ले गए वह तुम्हारा मूड देखेंगे, कि तुम क्या चाहते हो वही बोलेंगे।”,

तो आजकल हमारे देश में कोई प्रधानमंत्री अवैतनिक सलाहकार रखता ही नहीं है, सब वैतनिक सलाहकार है, मंत्रियों की सुविधाएं सभी सलाहकारों को है। तो प्रधानमंत्री को ऐसी सलाह देते हैं, जो प्रधानमंत्री चाहते हैं वैसे ही देश चलता है।

फिर राम जी आगे कह रहे हैं कि “जब तुम मंत्रिमंडल की बैठक करते हो तो कोई मंत्री ऐसा तो नहीं जो अंदर की बात बाहर जाकर बोलता हो,

तो भरत कह रहे हैं कि “नहीं! मेरे राज्य के मंत्रिमंडल में तो नहीं”।

तो राम कहते हैं कि “ध्यान रखना अगर मंत्रिमंडल के अंदर की बात बाहर गई तो राज्य चल नहीं पायेगा”।

जब हमारे हिंदुस्तान में कैबिनेट की मीटिंग चल रही होती है तो अंदर से कोई आ जाता है और न्यूज़ पेपर वालों को खबर देकर चला जाता है। एकदम से खबर अगले दिन हेड लाइन में आ जाती है, सब एक दूसरे पर आरोप लगाते हैं की खबर कहाँ से ली हुई? हमें तो नहीं मालूम।

तो राम कहते हैं कि “अंदर के कोई फैसले बाहर लीक होते हैं तो ऐसे मंत्रियों को रखना नहीं तुरंत निकाल कर बाहर कर देना” फिर आगे वह पूछते हैं कि “तुम कभी भी कोई योजना बनाते हो तो धन की व्यवस्था कैसे करते हो? क्या प्रजा के ऊपर टैक्स लगाते हो नहीं? कर लगाते हो या अपने राज्य का फालतू खर्च कम करके उससे योजना बनाते हो?” तो भरत कह रहे हैं कि “मैं कोशिश करता हूँ कि मेरे राज्य के फालतू खर्च कम करके और इसी से प्रजा की भलाई के काम करूँ, नए टैक्स लगाने में मुझे विश्वास नहीं है, क्योंकि आप मानते हो ज्यादा टैक्स अच्छे नहीं है”।

आजादी के समय में सरकार 12-13 तरह के टैक्स लेती थी, अब आजादी के 60 साल बाद 63 टैक्स हो चुके हैं और फिर भी वित्त मंत्री का पेट नहीं भरता, हर समय कहते हैं और टैक्स लाओ और टैक्स लाओ, हर दिन उनका स्टेटमेंट होता है, ज्यादा से ज्यादा लोगों को इनकम टैक्स में फंसा दो, 7.5 लाख करोड़ रुपए हम हर साल टैक्स में भरते हैं, फिर भी सरकार का पेट नहीं भरता।

राम जी कहते हैं कि “फालतू खर्च कम करो उससे प्रजा का विकास करो।”

आज की सरकार के 90% खर्च फालतू है, यह सरकार खुद कहती है। फालतू खर्च माने प्रधानमंत्री की पगार, प्रधानमंत्री का वेतन, प्रधानमंत्री के मंत्रिमंडल का वेतन, राष्ट्रपति का वेतन, मुख्यमंत्रियों का वेतन, राज्यपालों का वेतन, सरकारी अधिकारियों का वेतन, कर्मचारियों का वेतन, जिससे विकास का कोई काम नहीं। हमारी सरकार के कुल खर्च का 90% यही खर्च है, मात्र 10% खर्च उपयोग किया जाता है।

राम जी उल्टा कह रहे हैं वह भरत को कह रहे हैं कि “10% खर्च तो अपना होना चाहिए और 90% खर्च प्रजा के ऊपर होना चाहिए”।

अब श्री राम जी की कल्पना में मैं बजट बना रहा हूँ राम राज्य का बजट और अगले साल उस पर बात करूँगा, ऐसा बजट होना चाहिए जिसमें 10% खर्च फालतू का हो, सरकार का हो, बाकी 90% खर्च विकास पर हो, तो बजट ऐसा होना चाहिए, बजट ऐसा तो नहीं कि उनके राज्य में बचत नहीं होता होगा, तब समझ में आएगा कि राम राज्य का बजट कैसा होगा? फिर वह कहते हैं कि “तुम्हारी जो सुरक्षा व्यवस्था है वह तुम्हारे कुल खर्च से 15% के ज्यादा नहीं होनी चाहिए, अधिक से अधिक और कम से कम 5% रहना चाहिए फिर वह आगे कह रहे हैं कि “तुम तुम्हारे राज्य के अधिकारियों और मंत्रियों में कालिटी देखते हो या चापलूसी गुण देखते हो, या उनकी चापलूसी वह तुम्हारे आगे पीछे हां जी -

हां जी करते घूमते हैं, ऐसे लोगों को मंत्री बनाते हो या जो तुम्हारे गलत को गलत कहे सही को सही कहे और तुम्हें सही सलाह दे ऐसे लोगों को मंत्री बनाते हो? तो भरत कहते हैं “हां मैं कोशिश तो करता हूँ बिना चापलूसी करने वालों को मंत्री बनाता हूँ।”

फिर वह आगे पूछ रहे हैं कि “तुम्हारे राज्य में भ्रष्टाचार कितना है”?

तब भरत कह रहे हैं “मेरे राज्य का कुल खर्चा का 1% या उससे कम भ्रष्टाचार है”।

तो राम कहते हैं कि “3% से ऊपर नहीं जाना चाहिए अगर गया तो राज्य व्यवस्था पूरी बदलनी पड़ेगी करप्शन है, लेकिन 3% के ऊपर नहीं।” आज हमारे देश में कुल खर्च का 70% करप्शन है, आज की तारीख में।

फिर राम जी पूछ रहे हैं कि “तुम तुम्हारे राज्य में जो लोग चोरी करते हैं अपराध करते हैं, बेईमानी करते हैं, उनको दण्ड देते हो या नहीं?

तो भरत कहते हैं “दण्ड तो देता हूँ, लेकिन जेल में देता हूँ”।

तो राम जी कह रहे हैं, “दण्ड जेल में नहीं खुले में मिलना चाहिए, मुकदमा जेल में चलना चाहिए”। वह कह रहे हैं जिसको भी दण्ड दो खुले में दो, ताकि प्रजा को मालूम हो कि इस बेईमानी का, इस चोरी का यह दंड है, मुकदमा जेल में चलाओ।”

अभी यहां क्या होता है? दण्ड जेल में होता है, मुकदमा खुले में चलता है। माने रामराज्य का बिल्कुल उल्टा, रावण राज्य का इंसाफ।

राम पूछ रहे हैं कि “तुम प्रजा से सुझाव मांगते हो, अपने बारे में या अपने राज्य के बारे में? तो प्रजा क्या कहती है”?

भरत कहते हैं कि “नियमित रूप से सुझाव लेता हूँ”

राम कहते हैं तो “ठीक है! तो फिर वह पूछ रहे हैं तुम तुम्हारे मंत्रियों का ज्यादा समय प्रमाद में मनोरंजन में, या मौज मस्ती में, तो नहीं बीतता”

भरत कह रहे हैं कि “नहीं! मेरे सब मंत्री मेहनत से काम करते हैं, कोई मनोरंजन नहीं करता, कोई मौज मजा नहीं लेता”,

राम जी ने कहा “यह आपके लिए नहीं है, यह प्रजा के लिए है, राजा को नहीं करना”।

फिर वह आज हमारे यहां क्या होता है? प्रधानमंत्री महीने-महीने भर की छुट्टी पर चले गए यूरोप के यात्रा पर चले गए, राष्ट्रपति चले गए, मुख्यमंत्री चले गए, राज्यपाल चले गए।

राम जी बोल कर गए कि राजा को नहीं करना यह काम प्रजा करें तो ठीक, राजा तो कर ही नहीं सकता, सोच भी नहीं सकता,

फिर वह आगे प्रश्न पूछ रहे हैं कि “क्या तुम्हारी सेना तुम्हारे पूरे अधिकार में है? क्या तुम्हारी सेना तुम्हारे सभी आदेशों को मानती है? क्या सेना में तुम्हारे यहां कोई विद्रोह तो नहीं है?

तो भरत कहते हैं “नहीं है!”

श्री राम कहते हैं, “फिर तुम निश्चित हो सकते हो”।

फिर श्री राम कहते हैं की “सेना में जो सैनिक वीरता दिखाते हैं उनको तुम पुरस्कृत करते हो या नहीं”?

भरत – “हां करता हूं”

श्री राम – “तो यह दूसरों के लिए अच्छा है”, फिर वो पूछ रहे हैं कि “जब तुम फैसला लेते हो तो तुम्हारे सब मंत्री एकमत होते हैं या नहीं, आम राय होती है या नहीं”।

तो भरत कह रहे हैं, “नहीं! कभी-कभी ऐसा भी होता है, कि 50 मंत्री एक तरफ होते हैं और 51 एक तरफ, या 49 एक तरफ 51 एक तरफ, तो फिर मैं 51 वालों की बात मान लेता हूं”।

तो राम कहते हैं “यह अच्छा नहीं है, सबको एक राय होना चाहिए, तभी तुम्हारा राज्य ज्यादा दिन तक चल पायेगा”।

हमारी संसद इसी पर चल रही है जो 51 कह दे वह कानून जो 49 कहे वह कानून नहीं, चाहे वह कितना भी सत्य हो। अभी संसद में ज्यादा सांसदों ने कहा “वेतन भत्ते बढ़ाओ”, तो बढ़ा दिया, कुछ अल्पसंख्यक थे जिन्होंने मना किया, तो उनकी किसी ने सुना नहीं।

राम जी कहते हैं “यह माइनॉरिटी या मैजोरिटी नहीं, एक राय होनी चाहिए, आम राय होनी चाहिए, और जब तक आमराय नहीं बने, तब तक फैसला मत करो, बार-बार बैठो बार-बार बैठो, हमारे यहां प्रजातंत्र के सभी सिद्धांतों को श्री राम जी कह कर चले गए, अब यह हमारा दुर्भाग्य है हमने उनको देखा नहीं, रघुवंशम में बहुत सारे प्रिंसिपल है, हमारी सरकार ने अंग्रेजों की नकल करके पार्लियामेंट डेमोक्रेसी लाए, यदि श्री राम की डेमोक्रेसी लाए होती तो सभी शहीदों की आत्मा को शांति मिल गई होती।

ऐसे-ऐसे बहुत अच्छे प्रश्न किए और यह सारे प्रश्न इतने अद्भुत है, कि एक-एक प्रश्न पर मैं आधे घंटे, 1 घंटे बात कर सकता हूं, लेकिन मैं केवल ध्यान में लाना चाहता हूं, कि श्री राम के राज्य की व्यवस्था कैसी है? रामराज्य कैसा है? और रामराज्य कोई कपोल कल्पना नहीं है, ठोस धरातल पर खड़ी हुई एक धारणा है, जिसमें गणतंत्र है प्रजा का, और राम जी यह सब प्रश्नों का उत्तर जब ले लेंते हैं, भरत से फिर कहते हैं कि “तुम यह सब कर ही रहे हो तो रामराज्य ही चला रहे हो, मेरे आने की जरूरत नहीं है, तुम जाओ मेरी जरूरत जब पड़ेगी, जब तुम रास्ते से भटक जाओगे तब वह कहते हैं कि “कम से कम अपनी खड़ाऊ तो दे दो, वही लेकर जाता हूं, तो ठीक है ले जाओ, लेकिन विचार यह है, इसके हिसाब से राज्य चलाओ इससे अलग मत चलाओ।

तो गांधीजी बार-बार बार-बार रामराज्य की कल्पना कर रहे हैं तो यही कल्पना कर रहे हैं, मैंने कोशिश किया है कि यह जो रामराज्य की कल्पना छुटी पड़ी है, क्योंकि इस पर बात नहीं हुई है, चर्चा नहीं हुई है, मैंने तो जितने भी राम कथा कहने वाले सब से बात की किसी ने मुझे संतुष्ट नहीं किया, हर जगह निराशा हाथ लगी, और राम के दूसरे दूसरे रूपों की बहुत चर्चा करते हैं, राम बड़े कोमल है, राम बड़े दयालु है, उनकी आंखें बहुत सुंदर है, उनके हाथ बहुत सुंदर है, और अजान बाहू है, इन बातों में घंटो-घंटो निकाल सकते हैं, आपको रुला सकते हैं, आपके साथ वह भी रो सकते हैं, लेकिन राम की जिंदगी का जो असली कर्म है उस पर बात नहीं करते। कई राम कथा सुनाने वालों के यहां मैं चुपचाप बैठा हूं कि अब कहेंगे अब कहेंगे, लेकिन बात ही नहीं आती, भरत राम संवाद की बात आती है, तो राम ने गले से लगा लिया और राम के आंसू बहने लगे भरत के भी आंसू बहने लगे, लेकिन यह जो मूल बात कर रहे हैं यह सब बोल कर जाते हैं, शायद उनके मन में

इसको कहने की नैतिकता नहीं हो या हिम्मत नहीं हो, क्योंकि आदमी दूसरे को कहता है, उससे ज्यादा अपने को कहता है, जब मैं बोलता हूँ तो मुझे लगता है कि मैं दूसरों से नहीं अपने से बात कर रहा हूँ, क्योंकि कोई भी बोलने से पहले आदमी अपने से बोलता है, शायद वह नहीं बोल पाते और मैं पूरी विनम्रता से कहता हूँ, आज हिंदुस्तान में जो राम कथा हो रही है और राम की कथा नहीं है, वह व्यापार की कथाएं हैं, उसमें कोई आएगा, आपसे डील करेगा, भैया मुझको इतने लाख चाहिए, आप दे सकते हो तो आप कराओ, आप नहीं दे सकते तो मैं दूसरे से बात करता हूँ, यह सुविधाएं चाहिए, यह सुख चाहिए, इतना पैसा चाहिए, इतना चढ़ावा आना चाहिए, उसके बाद ऐसा होना चाहिए, वैसा होना चाहिए, ऐ.सी. होना चाहिए।

फिर रामचंद्र जी के वन गमन की कहानी ऐ.सी. मंच से सुनाएंगे, दुख का पहाड़ टूट पड़ा श्रीराम पर और हम ए.सी. में बैठ कर उनकी कहानी सुनेंगे, कि रामचंद्र जी को यह दुख है, कि रामचंद्र जी को वह दुख है, तो मुझे लगता है कि हम रामराज्य की तरफ तो बढ़ नहीं पा रहे हैं, राम की कथा का व्यवसाय जरूर इस देश में चल पड़ा है, धंधा भी चल पड़ा है, मेरी ऐसी मान्यता है कि इस देश को रामकथा के व्यवसाय से निकाला जाए और इसको राम के राज्य की तरफ ले जाने वाला कोई प्रेरणा पुंज बनाया जाए। मेरा यह मानना है कि 60 साल से राम कथा सुनने के बाद राम जी का चरित्र प्रवेश नहीं करता है, तो इसको सुनने सुनाने से कोई फायदा नहीं है, और मेरा यह मानना है अगर राम कथा सुनाने से देश रामराज्य की ओर बढ़ने की ओर एक कदम उठता है, तो इसमें बहुत सार्थकता है तो मैं राम जी की कथा को इस दृष्टि से देखता हूँ, कि भारत की आज की सभी समस्याओं का समाधान यह करेगी और इस देश में राम राज्य की स्थापना करेगी, तब जाकर इसकी सार्थकता सिद्ध होगी और शायद राम भी यही चाहते थे। अगर वह व्यवसाय और व्यापार वाले व्यक्ति होते तो यह प्रश्न नहीं पूछते कि तुम ऐसे पुरोहितों को सम्मान नहीं करना, जब पैसे के लिए काम करें उनको बाहर करें, ऐसे ही पुरोहितों का सम्मान करना जो किसी के घर का पानी भी ना पिए निस्वार्थ भाव से काम करें, राम आदर्श बने हैं, मर्यादा पुरुषोत्तम बने हैं, तब जब उन्होंने महल छोड़ा सुख छोड़े हैं और अपनी सुविधाएं छोड़ी, साधारण व्यक्ति के कष्टों को सहकर जीवन का अनुभव किया है, और उनके बीच में से ऐसे-ऐसे लोगों को तपस्वी बनाकर खड़ा किया है, जिन्होंने चक्रवर्ती का पद संभाला है, तब वह मर्यादा पुरुषोत्तम बने जब तक उनका महलों का जीवन है, कोई उनको मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं कहता, महल छोड़कर वन में चले गए हैं और आदर्श की स्थापना करने में लगे हुए हैं, तब वह मर्यादा पुरुषोत्तम बने हैं, तो हम मर्यादा पुरुषोत्तम राम की बात करें, उनके रामराज्य की बात करें और कुछ कोशिश करें कि कम से कम कुछ सपना तो देखें इस देश में रामराज्य लाना है, जो हमारे शहीदों का अधूरा है, गांधी जी तो कहते थे कि आजादी के बाद कुछ करना है, तो राम राज्य ही लाएंगे तो मैं मानता हूँ कि यदि हम सब मिलकर इस रामराज्य को लाने में थोड़ा भी लग जाए तो कोई मुश्किल नहीं है कि अगले 3-5 वर्षों में राम राज्य नहीं आयेगा, और इस देश के हर नेता से, प्रधानमंत्री से, मुख्यमंत्री से, राज्यपाल से, एक ही प्रश्न पूछें, तुम राम राज्य के लिए कर क्या रहे हो? रामराज्य में 10% खर्चा फालतू, 90% खर्चा प्रजा के लिए होता है, क्या तुम कर रहे हो? नहीं कर रहे हो तो

छोड़ दो कुर्सी, हम किसी ऐसे को लायेगे, राम-राज्य स्थापित करने में मदद करे, तो मैं मानता हूँ इसको, अभियान के रूप में चलाना है, हम लोग कोशिश कर रहे हैं, स्वदेशी अभियान इस देश में चलाने की, लेकिन एक अभियान ऐसा भी चले, जो राम-राज्य की स्थापना इस देश में कराये, मैं राम जी की आखिरी बात आपसे कहता हूँ, जब विभीषण को राम जी राजा बना रहे हैं, सोने की लंका विभीषण को सौंप कर जा रहे हैं, तो विभीषण उनको कहते हैं, कि “आप यही रह सकते हैं, मैं आपके नीचे काम कर सकता हूँ, मुझे कोई तकलीफ नहीं है, आप सम्राट रहे, राजा रहे”।

श्री राम कहते हैं, मेरी जो मातृभूमि है, वह स्वर्ग से भी महान है, इसलिए मुझे लौटना तो मातृभूमि में है, तुम्हारी ये सोने की लंका तुम्हें मुबारक है, मेरे लिए तो ये मिट्टी के समान है, मेरी तो मातृभूमि स्वर्ग से भी महान है, ये बात हम कभी ना भूलें, श्री राम जी की ये बात हमारे हृदय में रहें, हमारी मातृभूमि स्वर्ग से भी महान है, अमेरिका, यूरोप चाहे सोने की लंका हो, वो हमारे लिए मिट्टी की धूल के बराबर हैं, यदि ये बात हमें समझ में आ जाये, श्री राम जी की, तो भारत से गये, 2 करोड़ NRI, एक क्षण में अमेरिका यूरोप छोड़ देगे, और उनकी बुद्धि और पैसे का सारा उपयोग, इस देश के विकास के लिए हो जायेगा, और ये देश सच में सोने की चिट्ठिया बन जायेगा, इसी के साथ मैं सबको प्रणाम करता हूँ, और श्री राम आप सभी को ऐसी प्रेरणा दे, हम सब मिलकर उनके राज्य की स्थापना करने में लग जाये।

धन्यवाद

- राजीव दीक्षित जी

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The logo is circular and features the colors of the Indian flag: orange at the top, white in the middle, and green at the bottom. In the center, there is a stylized graphic of a hand holding a torch in one hand and an open book in the other. Overlaid on the white section of the flag is the text 'स्वदेशी अभियान' in a bold, black, sans-serif font.