श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
१०३२
- रामचरितमानस *
वेद-पुराण पवित्र पर्वत हैं। श्रीरामजीकी नाना प्रकारकी कथाएँ उन पर्वतोंमें सुन्दर खाने हैं। संत पुरुष [उनकी इन खानोंके रहस्यको जाननेवाले] मर्मी हैं और सुन्दर बुद्धि [खोदनेवाली] कुदाल है। हे गरुड़जी! ज्ञान और वैराग्य—ये दो उनके नेत्र हैं ॥ ७ ॥
भाव सहित खोजइ जो प्रानी । पाव भगति मनि सब सुख खानी ॥ मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा । राम ते अधिक राम कर दासा ॥
जो प्राणी उसे प्रेमके साथ खोजता है, वह सब सुखोंकी खान इस भक्तिरूपी मणिको पा जाता है। हे प्रभो! मेरे मनमें तो ऐसा विश्वास है कि श्रीरामजीके दास श्रीरामजीसे भी बढ़कर हैं ॥ ८ ॥
राम सिंधु घन सज्जन धीरा । चंदन तरु हरि संत समीरा ॥ सब कर फल हरि भगति सुहाई । सो बिनु संत न काहूँ पाई ॥
श्रीरामचन्द्रजी समुद्र हैं तो धीर संत पुरुष मेघ हैं। श्रीहरि चन्दनके वृक्ष हैं तो संत पवन हैं। सब साधनोंका फल सुन्दर हरिभक्ति ही है। उसे संतके बिना किसीने नहीं पाया ॥ ९ ॥
अस बिचारि जोइ कर सतसंगा । राम भगति तेहि सुलभ बिहंगा ॥
ऐसा विचारकर जो भी संतोंका संग करता है, हे गरुड़जी! उसके लिये श्रीरामजीकी भक्ति सुलभ हो जाती है ॥ १० ॥
दो०—ब्रह्म पयोनिधि मंदर ग्यान संत सुर आहिं ।
कथा सुधा मथि काढ़हिं भगति मधुरता जाहिं ॥ १२० ( क ) ॥
ब्रह्म (वेद) समुद्र है, ज्ञान मन्दराचल है और संत देवता हैं, जो उस समुद्रको मथकर कथारूपी अमृत निकालते हैं, जिसमें भक्तिरूपी मधुरता बसी रहती है ॥ १२० (क) ॥
बिरति चर्म असि ग्यान मद लोभ मोह रिपु मारि ।
जय पाइअ सो हरि भगति देखु खगेस बिचारि ॥ १२० ( ख ) ॥
वैराग्यरूपी ढालसे अपनेको बचाते हुए और ज्ञानरूपी तलवारसे मद, लोभ और मोहरूपी वैरियोंको मारकर जो विजय प्राप्त करती है, वह हरिभक्ति ही है; हे पक्षिराज! इसे विचारकर देखिये ॥ १२० (ख) ॥
पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ । जौँ कृपाल मोहि ऊपर भाऊ ॥
नाथ मोहि निज सेवक जानी । सस प्रस्न मम कहहु बखानी ॥
पक्षिराज गरुड़जी फिर प्रेमसहित बोले—हे कृपालु! यदि मुझपर आपका प्रेम है, तो हे नाथ! मुझे अपना सेवक जानकर मेरे सात प्रश्नोंके उत्तर बखानकर कहिये ॥ १ ॥
प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा । सब ते दुर्लभ कवन सरीरा ॥
बड़ दुख कवन कवन सुख भारी । सोउ संछेपहिं कहहु बिचारी ॥
- उत्तरकाण्ड *
१०३३
हे नाथ! हे धीरबुद्धि! पहले तो यह बताइये कि सबसे दुर्लभ कौन-सा शरीर है? फिर सबसे बड़ा दुःख कौन है और सबसे बड़ा सुख कौन है, यह भी विचारकर संक्षेपमें ही कहिये॥ २ ॥
संत असंत मरम तुम्ह जानहु । तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु ॥ कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला । कहहु कवन अघ परम कराला ॥
संत और असंतका मर्म (भेद) आप जानते हैं, उनके सहज स्वभावका वर्णन कीजिये। फिर कहिये कि श्रुतियोंमें प्रसिद्ध सबसे महान् पुण्य कौन-सा है और सबसे महान् भयंकर पाप कौन है? ॥ ३ ॥
मानस रोग कहहु समुझाई । तुम्ह सर्वग्य कृपा अधिकाई ॥ तात सुनुहु सादर अति प्रीती । मैं संछेप कहउँ यह नीती ॥
फिर मानस-रोगोंको समझाकर कहिये। आप सर्वज्ञ हैं और मुझपर आपकी कृपा भी बहुत है। [काकभुशुण्डिजीने कहा—] हे तात! अत्यन्त आदर और प्रेमके साथ सुनिये। मैं यह नीति संक्षेपसे कहता हूँ ॥ ४ ॥
नर तन सम नहीं कवनिउ देही । जीव चराचर जाचत तेही ॥ नरक स्वर्ग अपर्ग निसेनी । ग्यान बिराग भगति सुभ देनी ॥
मनुष्य-शरीरके समान कोई शरीर नहीं है। चर-अचर सभी जीव उसकी याचना करते हैं। यह मनुष्य-शरीर नरक, स्वर्ग और मोक्षकी सीढ़ी है तथा कल्याणकारी ज्ञान, वैराग्य और भक्तिको देनेवाला है ॥ ५ ॥
सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर । होहिं बिषय रत मंद मंद तर ॥ काँच किरिच बदलें ते लेहीं । कर ते डारि परम मनि देहीं ॥
ऐसे मनुष्य-शरीरको धारण (प्राप्त) करके भी जो लोग श्रीहरिका भजन नहीं करते और नीचसे भी नीच विषयोंमें अनुरक्त रहते हैं, वे पारसमणिको हाथसे फेंक देते हैं और बदलेमें काँचके टुकड़े ले लेते हैं ॥ ६ ॥
नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं । संत मिलन सम सुख जग नाहीं ॥ पर उपकार बचन मन काया । संत सहज सुभाउ खगराया ॥
जगत्में दरिद्रताके समान दुःख नहीं है तथा संतोंके मिलनके समान जगत्में सुख नहीं है। और हे पक्षिराज! मन, वचन और शरीरसे परोपकार करना, यह संतोंका सहज स्वभाव है ॥ ७ ॥
संत सहहिं दुख पर हित लागी । पर दुख हेतु असंत अभागी ॥ भूर्ज तरू सम संत कृपाला । पर हित निति सह बिपति बिसाला ॥
१०३४
- रामचरितमानस *
संत दूसरोंकी भलाईके लिये दुःख सहते हैं और अभागे असंत दूसरोंको दुःख पहुँचानेके लिये। कृपालु संत भोजके वृक्षके समान दूसरोंके हितके लिये भारी विपत्ति सहते हैं (अपनी खालतक उधड़वा लेते हैं) ॥ ८ ॥
सन इव खल पर बंधन करई। खाल कढ़ाइ बिपत्ति सहि मरई॥ खल बिनु स्वारथ पर अपकारी। अहि मूषक इव सुनु उरगारी॥
किन्तु दुष्ट लोग सनकी भाँति दूसरोंको बाँधते हैं और [उन्हें बाँधनेके लिये] अपनी खाल खिंचवाकर विपत्ति सहकर मर जाते हैं। हे सपोंके शत्रु गरुड़जी! सुनिये; दुष्ट बिना किसी स्वार्थके साँप और चूहेके समान अकारण ही दूसरोंका अपकार करते हैं ॥ ९ ॥
पर संपदा बिनासि नसाहीं। जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं॥ दुष्ट उदय जग आरति हेतू। जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू॥
वे परायी सम्पत्तिका नाश करके स्वयं नष्ट हो जाते हैं, जैसे खेतीका नाश करके ओले नष्ट हो जाते हैं। दुष्टका अभ्युदय (उन्नति) प्रसिद्ध अधम ग्रह केतुके उदयकी भाँति जगत्के दुःखके लिये ही होता है ॥ १० ॥
संत उदय संतत सुखकारी। बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी॥ परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा। पर निंदा सम अघ न गरीसा॥
और संतोंका अभ्युदय सदा ही सुखकर होता है, जैसे चन्द्रमा और सूर्यका उदय विश्वभरके लिये सुखदायक है। वेदोंमें अहिंसाको परम धर्म माना है और परनिन्दाके समान भारी पाप नहीं है ॥ ११ ॥
हर गुर निंदक दादुर होई। जन्म सहस्त्र पाव तन सोई॥ द्विज निंदक बहु नरक भोग करि। जग जनमड़ बायस सरीर धरि॥
शंकरजी और गुरुकी निन्दा करनेवाला मनुष्य (अगले जन्ममें) मेढक होता है और वह हजार जन्मतक वही मेढकका शरीर पाता है। ब्राह्मणोंकी निन्दा करनेवाला व्यक्ति बहुत-से नरक भोगकर फिर जगत्में कौएका शरीर धारण करके जन्म लेता है ॥ १२ ॥
सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी। रौरव नरक परहिं ते प्रानी॥ होहिं उलूक संत निंदा रत। मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत॥
जो अभिमानी जीव देवताओं और वेदोंकी निन्दा करते हैं, वे रौरव नरकमें पड़ते हैं। संतोंकी निन्दामें लगे हुए लोग उलू होते हैं, जिन्हें मोहरूपी रात्रि प्रिय होती है और ज्ञानरूपी सूर्य जिनके लिये बीत गया (अस्त हो गया) रहता है ॥ १३ ॥
सब कै निंदा जे जड़ करहीं। ते चमगादुर होइ अवतरहीं॥ सुनहु तात अब मानस रोगा। जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा॥
- उत्तरकाण्ड *
१०३५
जो मूर्ख मनुष्य सबकी निन्दा करते हैं, वे चमगादड़ होकर जन्म लेते हैं। हे तात! अब मानस-रोग सुनिये, जिनसे सब लोग दुःख पाया करते हैं ॥ १४ ॥
मोह सकल व्याधिन्ह कर मूला । तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला ॥ काम बात कफ लोभ अपारा । क्रोध पित्त नित छाती जारा ॥
सब रोगोंकी जड़ मोह (अज्ञान) है। उन व्याधियोंसे फिर और बहुत-से शूल उत्पन्न होते हैं। काम बात है, लोभ अपार (बढ़ा हुआ) कफ है और क्रोध पित्त है जो सदा छाती जलाता रहता है ॥ १५ ॥
प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई । उपजइ सन्यपात दुखदाई ॥ विषय मनोरथ दुर्गम नाना । ते सब सूल नाम को जाना ॥
यदि कहैं ये तीनों भाई (वात, पित्त और कफ) प्रीति कर लें (मिल जायें) तो दुःखदायक सन्निपात रोग उत्पन्न होता है। कठिनतासे प्राप्त (पूर्ण) होनेवाले जो विषयोंके मनोरथ हैं, वे ही सब शूल (कष्टदायक रोग) हैं; उनके नाम कौन जानता है (अर्थात् वे अपार हैं) ॥ १६ ॥
ममता दादु कंडु इरषाई । हरष विषाद गरह बहुताई ॥ पर सुख देखि जरनि सोइ छई । कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई ॥
ममता दाद है, ईर्ष्या (डाह) खुजली है, हर्ष-विषाद गलेके रोगोंकी अधिकता है (गलगंड, कण्ठमाला या घेघा आदि रोग हैं), पराये सुखको देखकर जो जलन होती है, वही क्षयी है। दुष्टता और मनकी कुटिलता ही कोढ़ है ॥ १७ ॥
अहंकार अति दुखद डमरुआ । दंभ कपट मद मान नेहरुआ ॥ तूस्वा उदरवृद्धि अति भारी । त्रिबिधि ईषना तरुन तिजारी ॥
अहंकार अत्यन्त दुःख देनेवाला डमरू (गाँठका) रोग है। दम्भ, कपट, मद और मान नहरुआ (नसोंका) रोग है। तृष्णा बड़ा भारी उदरवृद्धि (जलोदर) रोग है। तीन प्रकार (पुत्र, धन और मान) की प्रबल इच्छाएँ प्रबल तिजारी हैं ॥ १८ ॥
जुग बिधि ज्वर मतसर अबिबेका । कहैं लणि कहौं कुरोग अनेका ॥
मतसर और अविवेक दो प्रकारके ज्वर हैं। इस प्रकार अनेकों बुरे रोग हैं, जिन्हें कहाँतक कहूँ ॥ १९ ॥
दो०—एक व्याधि बस नर मरहिं ए असाधि बहु व्याधि ।
पीड़हिं संतत जीव कहुँ सो किमि लहै समाधि ॥ १२१ ( क ) ॥
एक ही रोगके वश होकर मनुष्य मर जाते हैं, फिर ये तो बहुत-से असाध्य रोग हैं। ये जीवको निरन्तर कष्ट देते रहते हैं, ऐसी दशामें वह समाधि (शान्ति) को कैसे प्राप्त करे? ॥ १२१ ( क ) ॥
१०३६
- रामचरितमानस *
नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान ।
भेषज पुनि कोटिन्ह नहिं रोग जाहिं हरिजान ॥ १२१ ( ख ) ॥
नियम, धर्म, आचार (उत्तम आचरण), तप, ज्ञान, यज्ञ, जप, दान तथा और भी करोड़ों ओषधियाँ हैं, परन्तु हे गरुड़जी! उनसे ये रोग नहीं जाते ॥ १२१ (ख) ॥
एहि बिधि सकल जीव जग रोगी । सोक हरष भय प्रीति बियोगी ॥ मानस रोग कछुक मैं गाए । हहिं सब कें लिख बिरलेन्ह पाए ॥
इस प्रकार जगत्में समस्त जीव रोगी हैं, जो शोक, हर्ष, भय, प्रीति और वियोगके दुःखसे और भी दुखी हो रहे हैं। मैंने ये थोड़े-से मानस-रोग कहे हैं। ये हैं तो सबको, परन्तु इन्हें जान पाये हैं कोई विरले ही ॥ १ ॥
जाने ते छीजहिं कछु पापी । नास न पावहिं जन परितापी ॥ बिषय कुपथ्य पाइ अंकुरे । मुनिहु हृदयँ का नर बापुरे ॥
प्राणियोंको जलानेवाले ये पापी (रोग) जान लिये जानेसे कुछ क्षीण अवश्य हो जाते हैं, परन्तु नाशको नहीं प्राप्त होते। विषयरूप कुपथ्य पाकर ये मुनियोंके हृदयमें भी अंकुरित हो उठते हैं, तब बेचारे साधारण मनुष्य तो क्या चीज हैं ॥ २ ॥
राम कृपाँ नासहिं सब रोगा । जौँ एहि भाँति बनै संजोगा ॥ सदगुर वैद बचन बिस्वासा । संजम यह न बिषय कै आसा ॥
यदि श्रीरामजीकी कृपासे इस प्रकारका संयोग बन जाय तो ये सब रोग नष्ट हो जायें। सदुरुस्सी वैद्यके वचनमें विश्वास हो। विषयोंकी आशा न करे, यही संयम (परहेज) हो ॥ ३ ॥
रघुपति भगति सजीवन मूरी । अनूपान श्रद्धा मति पूरी ॥ एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं । नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं ॥
श्रीरघुनाथजीकी भक्ति संजीवनी जड़ी है। श्रद्धासे पूर्ण बुद्धि ही अनुपान (दवाके साथ लिया जानेवाला मधु आदि) है। इस प्रकारका संयोग हो तो वे रोग भले ही नष्ट हो जायें, नहीं तो करोड़ों प्रयत्नोंसे भी नहीं जाते ॥ ४ ॥
जानिअ तब मन बिरुज गोसाँई । जब उर बल बिराग अधिकाई ॥ सुमति छुधा बाढ़इ नित नई । बिषय आस दुर्बलता गई ॥
हे गोसाई! मनको नीरोग हुआ तब जानना चाहिये, जब हृदयमें वैराग्यका बल बढ़ जाय, उत्तम बुद्धिरूपी भूख नित नयी बढ़ती रहे और विषयोंकी आशारूपी दुर्बलता मिट जाय ॥ ५ ॥
- उत्तरकाण्ड *
१०३७
बिमल ग्यान जल जब सो नहाई । तब रह राम भगति उर छाई ॥ सिव अज सुक सनकादिक नारद । जे मुनि ब्रह्म बिचार बिसारद ॥
[इस प्रकार सब रोगोंसे छूटकर] जब मनुष्य निर्मल ज्ञानरूपी जलमें स्नान कर लेता है, तब उसके हृदयमें रामभक्ति छा रहती है। शिवजी, ब्रह्माजी, शुक्रदेवजी, सनकादि और नारद आदि ब्रह्मविचारमें परम निपुण जो मुनि हैं, ॥ ६ ॥
सब कर मत खगनायक एहा । करिअ राम पद पंकज नेहा ॥ श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं । रघुपति भगति बिना सुख नाहीं ॥
हे पक्षिराज! उन सबका मत यही है कि श्रीरामजीके चरणकमलोंमें प्रेम करना चाहिये। श्रुति, पुराण और सभी ग्रन्थ कहते हैं कि श्रीरघुनाथजीकी भक्तिके बिना सुख नहीं है ॥ ७ ॥
कमठ पीठ जामहिं बरु बारा । बंध्यासुत बरु काहुहि मारा ॥ फूलहिं नभ बरु बहुबिधि फूला । जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला ॥
कछुएकी पीठपर भले ही बाल उग आवें, बाँझका पुत्र भले ही किसीको मार डाले, आकाशमें भले ही अनेकों प्रकारके फूल खिल उठें; परन्तु श्रीहरिसे विमुख होकर जीव सुख नहीं प्राप्त कर सकता ॥ ८ ॥
तूषा जाइ बरु मृगजल पाना । बरु जामहिं सस सीस बिषाना ॥ अंधकारु बरु रबिहि नसावै । राम बिमुख न जीव सुख पावै ॥
मृगतृष्णाके जलको पीनेसे भले ही प्यास बुझ जाय, खरगोशके सिरपर भले ही सींग निकल आवें, अन्धकार भले ही सूर्यका नाश कर दे; परन्तु श्रीरामसे विमुख होकर जीव सुख नहीं पा सकता ॥ ९ ॥
हिम ते अनल प्रगट बरु होई । बिमुख राम सुख पाव न कोई ॥
बर्फसे भले ही अग्नि प्रकट हो जाय (ये सब अनहोनी बातें चाहे हो जायें), परन्तु श्रीरामसे विमुख होकर कोई भी सुख नहीं पा सकता ॥ १० ॥
दो०— बारि मर्थें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल ।
बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल ॥ १२२ (क) ॥
जलको मथनेसे भले ही घी उत्पन्न हो जाय और बालू [को पेरेने] से भले ही तेल निकल आवे; परन्तु श्रीहरिके भजन बिना संसाररूपी समुद्रसे नहीं तरा जा सकता, यह सिद्धान्त अटल है ॥ १२२ (क) ॥
मसकहि करइ बिरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन ।
अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन ॥ १२२ (ख) ॥
१०३८
- रामचरितमानस *
प्रभु मच्छरको ब्रह्मा कर सकते हैं और ब्रह्माको मच्छरसे भी तुच्छ बना सकते हैं। ऐसा विचारकर चतुर पुरुष सब सन्देह त्यागकर श्रीरामजीको ही भजते हैं ॥ १२२ (ख) ॥
श्लोक— विनिश्चितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे।
हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते ॥ १२२ (ग) ॥
मैं आपसे भलीभाँति निश्चित किया हुआ सिद्धान्त कहता हूँ—मेरे वचन अन्यथा (मिथ्या) नहीं हैं कि जो मनुष्य श्रीहरिका भजन करते हैं, वे अत्यन्त दुस्तर संसारसागरको [सहज ही] पार कर जाते हैं ॥ १२२ (ग) ॥
कहेउँ नाथ हरि चरित अनूपा । ब्यास समास स्वमति अनुरूपा ॥ श्रुति सिद्धांत इहइ उरगारी । राम भजिअ सब काज बिसारी ॥
हे नाथ! मैंने श्रीहरिका अनुपम चरित्र अपनी बुद्धिके अनुसार कहीं विस्तारसे और कहीं संक्षेपसे कहा। हे सर्पके शत्रु गरुड़जी! श्रुतियोंका यही सिद्धान्त है कि सब काम भुलाकर (छोड़कर) श्रीरामजीका भजन करना चाहिये ॥ १ ॥
प्रभु रघुपति तजि सेइअ काही । मोहि से सठ पर ममता जाही ॥ तुम्ह बिग्यानरूप नहिं मोहा । नाथ कीन्हि मो पर अति छोहा ॥
प्रभु श्रीरघुनाथजीको छोड़कर और किसका सेवन (भजन) किया जाय, जिनका मुझ-जैसे मूर्खपर भी ममत्व (स्नेह) है। हे नाथ! आप विज्ञानरूप हैं, आपको मोह नहीं है। आपने तो मुझपर बड़ी कृपा की है ॥ २ ॥
पूँछिहु राम कथा अति पावनि । सुक सनकादि संभु मन भावनि ॥ सत संगति दुर्लभ संसारा । निमिष दंड भरि एकउ बारा ॥
जो आपने मुझसे शुक्रदेवजी, सनकादि और शिवजीके मनको प्रिय लगनेवाली अति पवित्र रामकथा पूछी। संसारमें घड़ीभरका अथवा पलभरका एक बारका भी सत्संग दुर्लभ है ॥ ३ ॥
देखु गरुड़ निज हृदयँ बिचारी । मैं रघुबीर भजन अधिकारी ॥ सकुनाधम सब भाँति अपावन । प्रभु मोहि कीन्ह बिदित जग पावन ॥
हे गरुड़जी! अपने हृदयमें विचारकर देखिये, क्या मैं भी श्रीरामजीके भजनका अधिकारी हूँ? पक्षियोंमें सबसे नीच और सब प्रकारसे अपवित्र हूँ। परन्तु ऐसा होनेपर भी प्रभुने मुझको सारे जगत्को पवित्र करनेवाला प्रसिद्ध कर दिया [अथवा प्रभुने मुझको जगत्प्रसिद्ध पावन कर दिया] ॥ ४ ॥
दो०— आजु धन्य मैं धन्य अति जद्यपि सब बिधि हीन।
निज जन जानि राम मोहि संत समागम दीन ॥ १२३ (क) ॥
- उत्तरकाण्ड *
१०३१
यद्यपि मैं सब प्रकारसे हीन (नीच) हूँ, तो भी आज मैं धन्य हूँ, अत्यन्त धन्य हूँ, जो श्रीरामजीने मुझे अपना 'निज जन' जानकर संत-समागम दिया (आपसे मेरी भेंट करायी) ॥ १२३ (क) ॥
नाथ जथामति भाषेउँ राखेउँ नहिं कछु गोड़।
चरित सिंधु रघुनायक थाह कि पावइ कोड़॥ १२३ (ख) ॥
हे नाथ! मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार कहा, कुछ भी छिपा नहीं रखा। [फिर भी] श्रीरघुवीरके चरित्र समुद्रके समान है; क्या उनकी कोई थाह पा सकता है? ॥ १२३ (ख) ॥
सुमिरि राम के गुन गन नाना । पुनि पुनि हरष भुसुंडि सुजाना ॥ महिमा निगम नेति करि गाई । अतुलित बल प्रताप प्रभुताई ॥
श्रीरामचन्द्रजीके बहुत-से गुणसमूहोंका स्मरण कर-करके सुजान भुशुण्डिजी बार-बार हर्षित हो रहे हैं। जिनकी महिमा वेदोंने 'नेति-नेति' कहकर गायी है; जिनका बल, प्रताप और प्रभुत्व (सामर्थ्य) अतुलनीय है; ॥ १ ॥
सिव अज पूज्य चरन रघुराई । मो पर कृपा परम मृदुलाई ॥ अस सुभाउ कहुँ सुनउँ न देखउँ । केहि खगेस रघुपति सम लेखउँ ॥
जिन श्रीरघुनाथजीके चरण शिवजी और ब्रह्माजीके द्वारा पूज्य हैं, उनकी मुझपर कृपा होनी उनकी परम कोमलता है। किसीका ऐसा स्वभाव कहीं न सुनता हूँ, न देखता हूँ। अतः हे पक्षिराज गरुड़जी! मैं श्रीरघुनाथजीके समान किसे गिन्हूँ (समझूँ)? ॥ २ ॥
साधक सिद्ध बिमुक्त उदासी । कवि कोबिद कृतग्य संन्यासी ॥ जोगी सूर सुतापस ग्यानी । धर्म निरत पंडित बिग्यानी ॥
साधक, सिद्ध, जीवनमुक्त, उदासीन (विरक्त), कवि, विद्वान्, कर्म [रहस्य] के ज्ञाता, संन्यासी, योगी, शूरवीर, बड़े तपस्वी, ज्ञानी, धर्मपरायण, पण्डित और विज्ञानी ॥ ३ ॥
तरहिं न बिनु सेए मम स्वामी । राम नमामि नमामि नमामी ॥ सरन गाँ मो से अघ रासी । होहिं सुद्ध नमामि अबिनासी ॥
ये कोई भी मेरे स्वामी श्रीरामजीका सेवन (भजन) किये बिना नहीं तर सकते। मैं उन्हीं श्रीरामजीको बार-बार नमस्कार करता हूँ। जिनकी शरण जानेपर मुझ-जैसे पापराशि भी शुद्ध (पापरहित) हो जाते हैं, उन अबिनाशी श्रीरामजीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ ४ ॥
दो०—जासु नाम भव भेषज हरन घोर त्रय सूल ।
सो कृपाल मोहि तो पर सदा रहउ अनुकूल ॥ १२४ (क) ॥
१०४०
- रामचरितमानस *
जिनका नाम जन्म-मरणरूपी रोगकी [अव्यर्थ] औषध और तीनों भयंकर पीड़ाओं (आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक दुःखों) को हरनेवाला है, वे कृपालु श्रीरामजी मुझपर और आपपर सदा प्रसन्न रहें ॥ १२४ (क) ॥
सुनि भुसुंडि के बचन सुभ देखि राम पद नेह।
बोलेउ प्रेम सहित गिरा गरुड़ बिगत संदेह ॥ १२४ (ख) ॥
भुशुण्डिजीके मंगलमय वचन सुनकर और श्रीरामजीके चरणोंमें उनका अतिशय प्रेम देखकर सन्देहसे भलीभाँति छूटे हुए गरुड़जी प्रेमसहित वचन बोले ॥ १२४ (ख) ॥
मैं कृतकृत्य भयउँ तव बानी । सुनि रघुबीर भगति रस सानी ॥ राम चरन नूतन रति भई । माया जनित बिपति सब गई ॥
श्रीरघुवीरके भक्ति-रसमें सनी हुई आपकी वाणी सुनकर मैं कृतकृत्य हो गया। श्रीरामजीके चरणोंमें मेरी नवीन प्रीति हो गयी और मायासे उत्पन्न सारी विपत्ति चली गयी ॥ १ ॥
मोह जलधि बोहित तुम्ह भए । मो कहँ नाथ बिबिध सुख दए ॥ मो पहिँ होइ न प्रति उपकारा । बंदउँ तव पद बारहिँ बारा ॥
मोहरूपी समुद्रमें डूबते हुए मेरे लिये आप जहाज हुए। हे नाथ! आपने मुझे बहुत प्रकारके सुख दिये (परम सुखी कर दिया)। मुझसे इसका प्रत्युपकार (उपकारके बदलेमें उपकार) नहीं हो सकता। मैं तो आपके चरणोंकी बार-बार वन्दना ही करता हूँ ॥ २ ॥
पूरन काम राम अनुरागी । तुम्ह सम तात न कोउ बड़भागी ॥ संत बिटप सरिता गिरि धरनी । पर हित हेतु सबन्ह कै करनी ॥
आप पूर्णकाम हैं और श्रीरामजीके प्रेमी हैं। हे तात! आपके समान कोई बड़भागी नहीं है। संत, वृक्ष, नदी, पर्वत और पृथ्वी—इन सबकी क्रिया पराये हितके लिये ही होती है ॥ ३ ॥
संत हृदय नवनीत समाना । कहा कबिन्ह परि कहै न जाना ॥ निज परिताप द्रवइ नवनीता । पर दुख द्रवहिँ संत सुपुनीता ॥
संतोंका हृदय मक्खनके समान होता है, ऐसा कवियोंने कहा है; परन्तु उन्होंने [असली बात] कहना नहीं जाना। क्योंकि मक्खन तो अपनेको ताप मिलनेसे पिघलता है और परम पवित्र संत दूसरोंके दुःखसे पिघल जाते हैं ॥ ४ ॥
जीवन जन्म सुफल मम भयऊ । तव प्रसाद संसय सब गयऊ ॥ जानेहु सदा मोहि निज किंकर । पुनि पुनि उमा कहइ बिहंगबर ॥
- उत्तरकाण्ड *
१०४१
मेरा जीवन और जन्म सफल हो गया। आपकी कृपासे सब सन्देह चला गया। मुझे सदा अपना दास ही जानियेगा। [शिवजी कहते हैं—] हे उमा! पक्षिश्रेष्ठ गरुड़जी बार-बार ऐसा कह रहे हैं ॥५॥
दो०— तासु चरन सिरु नाड़ करि प्रेम सहित मतिधीर ।
गयउ गरुड़ बैकुंठ तब हृदयै राखि रघुबीर ॥ १२५ (क) ॥
उन (भुशुण्डिजी) के चरणोंमें प्रेमसहित सिर नवाकर और हृदयमें श्रीरघुवीरको धारण करके धीरबुद्धि गरुड़जी तब वैकुण्ठको चले गये ॥ १२५ (क) ॥
गिरिजा संत समागम सम न लाभ कछु आन ।
बिनु हरि कृपा न होइ सो गावहिं बेद पुरान ॥ १२५ (ख) ॥
हे गिरिजे! संत-समागमके समान दूसरा कोई लाभ नहीं है। पर वह (संत-समागम) श्रीहरिकी कृपाके बिना नहीं हो सकता, ऐसा वेद और पुराण गाते हैं ॥ १२५ (ख) ॥
कहेउँ परम पुनीत इतिहासा । सुनत श्रवन छूटहिं भव पासा ॥
प्रनत कल्पतरु करुना पुंजा । उपजइ प्रीति राम पद कंजा ॥
मैंने यह परम पवित्र इतिहास कहा, जिसे कानोंसे सुनते ही भवपाश (संसारके बन्धन) छूट जाते हैं और शरणागतोंको [उनके इच्छानुसार फल देनेवाले] कल्पवृक्ष तथा दयाके समूह श्रीरामजीके चरणकमलोंमें प्रेम उत्पन्न होता है ॥ १ ॥
मन क्रम बचन जनित अघ जाई । सुनहिं जे कथा श्रवन मन लाई ॥
तीर्थार्टन साधन समुदाई । जोग बिराग ग्यान निपुनाई ॥
जो कान और मन लगाकर इस कथाको सुनते हैं, उनके मन, वचन और कर्म (शरीर) से उत्पन्न सब पाप नष्ट हो जाते हैं। तीर्थयात्रा आदि बहुत-से साधन, योग, वैराग्य और ज्ञानमें निपुणता,— ॥ २ ॥
नाना कर्म धर्म व्रत दाना । संजम दम जप तप मख नाना ॥
भूत दया द्विज गुर सेवकाई । बिद्या विनय बिबेक बड़ाई ॥
अनेकों प्रकारके कर्म, धर्म, व्रत और दान, अनेकों संयम, दम, जप, तप और यज्ञ, प्राणियोंपर दया, ब्राह्मण और गुरुकी सेवा; विद्या, विनय और विवेककी बड़ाई [आदि]— ॥ ३ ॥
जहैं लगि साधन बेद बखानी । सब कर फल हरि भगति भवानी ॥
सो रघुनाथ भगति श्रुति गाई । राम कृपाँ काहूँ एक पाई ॥
जहाँतक वेदोंने साधन बतलाये हैं, हे भवानी! उन सबका फल श्रीहरिकी भक्ति ही है। किन्तु श्रुतियोंमें गायी हुई वह श्रीरघुनाथजीकी भक्ति श्रीरामजीकी कृपासे किसी एक (विरले) ने ही पायी है ॥ ४ ॥
१०४२
- रामचरितमानस *
दो०—मुनि दुर्लभ हरि भगति नर पावहिं बिनहिं प्रयास। जे यह कथा निरंतर सुनहिं मानि बिस्वास॥ १२६॥
किन्तु जो मनुष्य विश्वास मानकर यह कथा निरन्तर सुनते हैं, वे बिना ही परिश्रम उस मुनिदुर्लभ हरिभक्तिको प्राप्त कर लेते हैं ॥ १२६॥
सोड़ सर्वग्य गुनी सोड़ ग्याता । सोड़ महि मंडित पंडित दाता॥ धर्म परायन सोड़ कुल त्राता । राम चरन जा कर मन राता॥
जिसका मन श्रीरामजीके चरणोंमें अनुरक्त है, वही सर्वज्ञ (सब कुछ जाननेवाला) है, वही गुणी है, वही ज्ञानी है। वही पृथ्वीका भूषण, पण्डित और दानी है। वही धर्मपरायण है और वही कुलका रक्षक है ॥ १॥
नीति निपुन सोड़ परम सयाना । श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना॥ सोड़ कबि कोबिद सोड़ रनधीरा । जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा॥
जो छल छोड़कर श्रीरघुवीरका भजन करता है, वही नीतिमें निपुण है, वही परम बुद्धिमान् है। उसीने वेदोंके सिद्धान्तको भलीभाँति जाना है। वही कवि, वही विद्वान् तथा वही रणधीर है ॥ २॥
धन्य देस सो जहँ सुरसरी । धन्य नारि पतिव्रत अनुसरी॥ धन्य सो भूपु नीति जो करई । धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई॥
वह देश धन्य है जहाँ श्रीगङ्गाजी हैं, वह स्त्री धन्य है जो पातिव्रत-धर्मका पालन करती है। वह राजा धन्य है जो न्याय करता है और वह ब्राह्मण धन्य है जो अपने धर्मसे नहीं डिगता ॥ ३॥
सो धन धन्य प्रथम गति जाकी । धन्य पुन्य रत मति सोड़ पाकी॥ धन्य घरी सोड़ जब सतसंगा । धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा॥
वह धन धन्य है जिसकी पहली गति होती है (जो दान देनेमें व्यय होता है)। वही बुद्धि धन्य और परिपक्व है जो पुण्यमें लगी हुई है। वही घड़ी धन्य है जब सत्संग हो और वही जन्म धन्य है जिसमें ब्राह्मणकी अखण्ड भक्ति हो ॥ ४॥
[धनकी तीन गतियाँ होती हैं—दान, भोग और नाश। दान उत्तम है, भोग मध्यम है और नाश नीच गति है। जो पुरुष न देता है, न भोगता है, उसके धनकी तीसरी गति होती है।]
दो०—सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत। श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत॥ १२७॥
हे उमा! सुनो। वह कुल धन्य है, संसारभरके लिये पूज्य है और परम पवित्र है, जिसमें श्रीरघुवीरपरायण (अनन्य रामभक्त) विनम्र पुरुष उत्पन्न हो ॥ १२७॥
- उत्तरकाण्ड *
१०४३
मति अनुरूप कथा मैं भाषी । जद्यपि प्रथम गुप्त करि राखी ॥ तव मन प्रीति देखि अधिकाई । तब मैं रघुपति कथा सुनाई ॥
मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार यह कथा कही, यद्यपि पहले इसको छिपाकर रखा था । जब तुम्हारे मनमें प्रेमकी अधिकता देखी तब मैंने श्रीरघुनाथजीकी यह कथा तुमको सुनायी ॥ १ ॥
यह न कहिअ सठही हठसीलहि । जो मन लाइ न सुन हरि लीलहि ॥ कहिअ न लोभिहि क्रोधिहि कामिहि । जो न भजइ सचराचर स्वामिहि ॥
यह कथा उनसे न कहनी चाहिये जो शठ (धूर्त) हों, हठी स्वभावके हों और श्रीहरिकी लीलाको मन लगाकर न सुनते हों । लोभी, क्रोधी और कामीको, जो चराचरके स्वामी श्रीरामजीको नहीं भजते, यह कथा नहीं कहनी चाहिये ॥ २ ॥
द्विज द्रोहिहि न सुनाइअ कबहूँ । सुरपति सरिस होइ नृप जबहूँ ॥ राम कथा के तेइ अधिकारी । जिन्ह कें सत संगति अति प्यारी ॥
ब्राह्मणोंके द्रोहीको, यदि वह देवराज (इन्द्र) के समान ऐश्वर्यवान् राजा भी हो, तब भी यह कथा कभी न सुनानी चाहिये । श्रीरामकी कथाके अधिकारी वे ही हैं जिनको सत्संगति अत्यन्त प्रिय है ॥ ३ ॥
गुर पद प्रीति नीति रत जेई । द्विज सेवक अधिकारी तेई ॥ ता कहैं यह बिसेष सुखदाई । जाहि प्रानप्रिय श्रीरघुराई ॥
जिनकी गुरुके चरणोंमें प्रीति है, जो नीतिपरायण हैं और ब्राह्मणोंके सेवक हैं, वे ही इसके अधिकारी हैं, और उसको तो यह कथा बहुत ही सुख देनेवाली है, जिसको श्रीरघुनाथजी प्राणके समान प्यारे हैं ॥ ४ ॥
दो०—राम चरन रति जो चह अथवा पद निर्बान ।
भाव सहित सो यह कथा करउ श्रवन पुट पान ॥ १२८ ॥
जो श्रीरामजीके चरणोंमें प्रेम चाहता हो या मोक्षपद चाहता हो, वह इस कथारूपी अमृतको प्रेमपूर्वक अपने कानरूपी दोनेसे पिये ॥ १२८ ॥
राम कथा गिरिजा मैं बरनी । कलि मल समनि मनोमल हरनी ॥ संसृति रोग सजीवन मूरी । राम कथा गावहिं श्रुति सूरौ ॥
हे गिरिजे ! मैंने कलियुगके पापोंका नाश करनेवाली और मनके मलको दूर करनेवाली रामकथाका वर्णन किया । यह रामकथा संसृति (जन्म-मरण)-रूपी रोगके [नाशके] लिये संजीवनी जड़ी है, वेद और विद्वान् पुरुष ऐसा कहते हैं ॥ १ ॥
१०४४
- रामचरितमानस *
एहि महाँ रुचिर सप्त सोपाना । रघुपति भगति केर पंथाना ॥ अति हरि कृपा जाहि पर होई । पाऊँ देइ एहिं मारग सोई ॥
इसमें सात सुन्दर सीढ़ियाँ हैं, जो श्रीरघुनाथजीकी भक्तिको प्राप्त करनेके मार्ग हैं। जिसपर श्रीहरिकी अत्यन्त कृपा होती है, वही इस मार्गपर पैर रखता है ॥ २ ॥
मन कामना सिद्धि नर पावा । जे यह कथा कपट तजि गावा ॥ कहहिं सुनहिं अनुमोदन करहीं । ते गोपद इव भवनिधि तरहीं ॥
जो कपट छोड़कर यह कथा गाते हैं, वे मनुष्य अपनी मनःकामनाकी सिद्धि पा लेते हैं। जो इसे कहते-सुनते और अनुमोदन (प्रशंसा) करते हैं, वे संसाररूपी समुद्रको गौके खुरसे बने हुए गड्ढेकी भाँति पार कर जाते हैं ॥ ३ ॥
सुनि सब कथा हृदय अति भाई । गिरिजा बोली गिरा सुहाई ॥ नाथ कृपाँ मम गत संदेहा । राम चरन उपजेउ नव नेहा ॥
[याज्ञवल्क्यजी कहते हैं—] सब कथा सुनकर श्रीपार्वतीजीके हृदयको बहुत ही प्रिय लगी और वे सुन्दर वाणी बोलीं—स्वामीकी कृपासे मेरा सन्देह जाता रहा और श्रीरामजीके चरणोंमें नवीन प्रेम उत्पन्न हो गया ॥ ४ ॥
दो०—मैं कृतकृत्य भइऊँ अब तव प्रसाद बिस्वेस । उपजी राम भगति दृढ़ बीते सकल कलेस ॥ १२९ ॥
हे विश्वनाथ! आपकी कृपासे अब मैं कृतार्थ हो गयी। मुझमें दृढ़ रामभक्ति उत्पन्न हो गयी और मेरे सम्पूर्ण क्लेश बीत गये (नष्ट हो गये) ॥ १२९ ॥
यह सुभ संभु उमा संबादा । सुख संपादन समन बिषादा ॥ भव भंजन गंजन संदेहा । जन रंजन सज्जन प्रिय एहा ॥
शम्भु-उमाका यह कल्याणकारी संवाद सुख उत्पन्न करनेवाला और शोकका नाश करनेवाला है। जन्म-मरणका अन्त करनेवाला, सन्देहोंका नाश करनेवाला, भक्तोंको आनन्द देनेवाला और संत पुरुषोंको प्रिय है ॥ १ ॥
राम उपासक जे जग माहीं । एहि सम प्रिय तिन्ह कें कछु नाही ॥ रघुपति कृपाँ जथामति गावा । मैं यह पावन चरित सुहावा ॥
जगत्में जो (जितने भी) रामोपासक हैं, उनको तो इस रामकथाके समान कुछ भी प्रिय नहीं है। श्रीरघुनाथजीकी कृपासे मैंने यह सुन्दर और पवित्र करनेवाला चरित्र अपनी बुद्धिके अनुसार गाया है ॥ २ ॥
- उत्तरकाण्ड *
१०४५
एहिं कलिकाल न साधन दूजा । जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा ॥ रामहि सुमिरिअ गाड़अ रामहि । संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि ॥
[तुलसीदासजी कहते हैं—] इस कलिकालमें योग, यज्ञ, जप, तप, ब्रत और पूजन आदि कोई दूसरा साधन नहीं है। बस, श्रीरामजीका ही स्मरण करना, श्रीरामजीका ही गुण गाना और निरन्तर श्रीरामजीके ही गुणसमूहोंको सुनना चाहिये ॥ ३ ॥
जासु पतित पावन बड़ बाना । गावहिं कवि श्रुति संत पुराना ॥ ताहि भजहि मन तजि कुटिलाई । राम भजें गति केहिं नहिं पाई ॥
पतितोंको पवित्र करना जिनका महान् (प्रसिद्ध) बाना है—ऐसा कवि, वेद, संत और पुराण गाते हैं—रे मन! कुटिलता त्यागकर उन्हींको भज। श्रीरामको भजनेसे किसने परम गति नहीं पायी? ॥ ४ ॥
छं०—पाई न केहिं गति पतित पावन राम भजि सुनु सठ मना । गनिका अजामिल व्याध गीध गजादि खल तारे घना ॥ आभीर जमन किरात खस स्वपचादि अति अघरूप जे । कहि नाम बारक तेपि पावन होहिं राम नमामि ते ॥
अरे मूर्ख मन! सुन, पतितोंको भी पावन करनेवाले श्रीरामको भजकर किसने परमगति नहीं पायी? गणिका, अजामिल, व्याध, गीध, गज आदि बहुत-से दुष्टोंको उन्होंने तार दिया। आभीर, यवन, किरात, खस, श्वपच (चाण्डाल) आदि जो अत्यन्त पापरूप ही हैं, वे भी केवल एक बार जिनका नाम लेकर पवित्र हो जाते हैं, उन श्रीरामजीको मैं नमस्कार करता हूँ ॥ १ ॥
रघुबंस भूषण चरित यह नर कहहिं सुनहिं जे गावहीं । कलि मल मनोमल धोड़ बिनु श्रम राम धाम सिधावहीं ॥ सत पंच चौपाई मनोहर जानि जो नर उर धरै । दारुन अविद्या पंच जनित बिकार श्री रघुबर हरै ॥
जो मनुष्य रघुवंशके भूषण श्रीरामजीका यह चरित्र कहते हैं, सुनते हैं और गाते हैं, वे कलियुगके पाप और मनके मलको धोकर बिना ही परिश्रम श्रीरामजीके परम धामको चले जाते हैं। [अधिक क्या] जो मनुष्य पाँच-सात चौपाइयोंको भी मनोहर जानकर [अथवा रामायणकी चौपाइयोंको श्रेष्ठ पंच (कर्तव्याकर्तव्यका सच्चा निर्णायक) जानकर उनको] हृदयमें धारण कर लेता है, उसके भी पाँच प्रकारकी अविद्याओंसे उत्पन्न विकारोंको श्रीरामजी हरण कर लेते हैं। (अर्थात् सारे रामचरित्रकी तो बात ही क्या है, जो पाँच-सात चौपाइयोंको भी समझकर उनका अर्थ हृदयमें धारण कर लेते हैं, उनके भी अविद्याजनित सारे क्लेश श्रीरामचन्द्रजी हर लेते हैं) ॥ २ ॥
१०४६
- रामचरितमानस *
सुंदर सुजान कृपा निधान अनाथ पर कर प्रीति जो। सो एक राम अकाम हित निर्बानप्रद सम आन को ॥ जाकी कृपा लवल्लेस ते मतिमंद तुलसीदासहूँ। पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नहीं कहूँ ॥
[परम] सुन्दर, सुजान और कृपानिधान तथा जो अनार्थोपर प्रेम करते हैं, ऐसे एक श्रीरामचन्द्रजी ही हैं। इनके समान निष्काम (निःस्वार्थ) हित करनेवाला (सुहृद्) और मोक्ष देनेवाला दूसरा कौन है? जिनकी लेशमात्र कृपासे मन्दबुद्धि तुलसीदासने भी परम शान्ति प्राप्त कर ली, उन श्रीरामजीके समान प्रभु कहीं भी नहीं हैं ॥ ३ ॥
दो०—मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर।
अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर ॥ १३०(क) ॥
हे श्रीरघुवीर! मेरे समान कोई दीन नहीं है और आपके समान कोई दीनोंका हित करनेवाला नहीं है। ऐसा विचारकर हे रघुवंशमणि! मेरे जन्म-मरणके भयानक दुःखका हरण कर लीजिये ॥ १३० (क) ॥
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभिहि प्रिय जिमि दाम।
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम ॥ १३०(ख) ॥
जैसे कामीको स्त्री प्रिय लगती है और लोभीको जैसे धन प्यारा लगता है, वैसे ही हे रघुनाथजी! हे रामजी! आप निरन्तर मुझे प्रिय लगिये ॥ १३० (ख) ॥
श्लोक— यत्पूर्व प्रभुणा कृतं सुकविना श्रीशम्भुना दुर्गमं श्रीमद्रामपदाब्जभक्तिमनिशं प्राप्यै तु रामायणम् ।
मत्वा तद्रघुनाथनामनिरतं स्वान्तस्तमःशान्तये
भाषाबद्धमिदं चकार तुलसीदासस्तथा मानसम् ॥ १ ॥
श्रेष्ठ कवि भगवान् श्रीशंकरजीने पहले जिस दुर्गम मानस-रामायणकी, श्रीरामजीके चरणकमलोंमें नित्य-निरन्तर [अनन्य] भक्ति प्राप्त होनेके लिये, रचना की थी, उस मानस-रामायणको श्रीरघुनाथजीके नाममें निरत मानकर अपने अन्तःकरणके अन्धकारको मिटानेके लिये तुलसीदासने इस मानसके रूपमें भाषाबद्ध किया ॥ १ ॥
पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञानभक्तिप्रदं मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरं शुभम् ।
- उत्तरकाण्ड *
१०४७
श्रीमद्भामचरितमानसमिदं भक्त्यावगाहन्ति ये
ते संसारपतङ्गधोरकरिगैर्दह्वान्ति नो मानवाः ॥ २ ॥
यह श्रीरामचरितमानस पुण्यरूप, पापोंका हरण करनेवाला, सदा कल्याणकारी, विज्ञान और भक्तिको देनेवाला, माया, मोह और मलका नाश करनेवाला, परम निर्मल प्रेमरूपी जलसे परिपूर्ण तथा मंगलमय है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस मानससरोवरमें गोता लगाते हैं, वे संसाररूपी सूर्यकी अति प्रचण्ड किरणोंसे नहीं जलते ॥ २ ॥
मासपारायण, तीसवाँ विश्राम
नवाह्नपारायण, नवाँ विश्राम
इति श्रीमद्भामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने सममः सोपानः समाप्तः।
कलियुगके समस्त पापोंका नाश करनेवाले श्रीरामचरितमानसका
यह सातवाँ सोपान समाप्त हुआ।
—◆◆◆—
श्रीरामायणजीकी आरती
आरति श्रीरामायनजी की। कीरति कलित ललित सिय पी की॥
गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद। बालमीक बिग्यान बिसारद॥
सुक सनकादि सेष अरु सारद। बरनि पवनसुत कीरति नीकी॥
गावत बेद पुरान अष्टदस। छओ सास्त्र सब ग्रंथन को रस॥
मुनि जन धन संतन को सरबस। सार अंस संमत सबही की॥
गावत संतत संभु भवानी। अरु घटसंभव मुनि बिग्यानी॥
ब्यास आदि कबिबर्ज बखानी। कागभुसुंडि गुरुड के ही की॥
कलिमल हरनि बिषय रस फीकी। सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की॥
दलन रोग भव मूरि अमी की। तात मात सब बिधि तुलसी की॥
॥ श्रीहरिः ॥
गोस्वामी तुलसीदासजीकी संक्षिप्त जीवनी
प्रयागके पास चित्रकूट जिलेमें राजापुर नामक एक ग्राम है, वहाँ आत्माराम दूबे नामके एक प्रतिष्ठित सरयूपारीण ब्राह्मण रहते थे। उनकी धर्मपत्नीका नाम हुलसी था। संवत् १५५४ की श्रावण शुक्ला सप्तमीके दिन अभुक्त मूल नक्षत्रमें इन्हीं भाग्यवान् दम्पतिके यहाँ बारह महीनेतक गर्भमें रहनेके पश्चात् गोस्वामी तुलसीदासजीका जन्म हुआ। जन्मते समय बालक तुलसीदास रोये नहीं, किन्तु उनके मुखसे 'राम' का शब्द निकला। उनके मुखमें बत्तीसों दाँत मौजूद थे। उनका डील-डौल पाँच वर्षके बालकका-सा था। इस प्रकारके अद्भुत बालकको देखकर पिता अमङ्गलकी शङ्कासे भयभीत हो गये और उसके सम्बन्धमें कई प्रकारकी कल्पनाएँ करने लगे। माता हुलसीको यह देखकर बड़ी चिन्ता हुई। उन्होंने बालकके अनिष्टकी आशङ्कासे दशमीकी रातको नवजात शिशुको अपनी दासीके साथ उसके ससुराल भेज दिया और दूसरे दिन स्वयं इस असार संसारसे चल बसीं। दासीने, जिसका नाम चुनियाँ था, बड़े प्रेमसे बालकका पालन-पोषण किया। जब तुलसीदास लगभग साढ़े पाँच वर्षके हुए, चुनियाँका भी देहान्त हो गया, अब तो बालक अनाथ हो गया। वह द्वार-द्वार भटकने लगा। इसपर जगज्जननी पार्वतीको उस होनहार बालकपर दया आयी। वे ब्राह्मणीका वेष धारणकर प्रतिदिन उसके पास जातीं और उसे अपने हाथों भोजन करा जातीं।
इधर भगवान् शंकरजीकी प्रेरणासे रामशैलपर रहनेवाले श्रीअनन्तानन्दजीके प्रिय शिष्य श्रीनरहर्यानन्दजीने इस बालकको ढूँढ़ निकाला और उसका नाम रामबोला रखा। उसे वे अयोध्या ले गये और वहाँ संवत् १५६१ माघ शुक्ला पञ्चमी शुक्रवारको उसका यज्ञोपवीत-संस्कार कराया। बिना सिखाये ही बालक रामबोलाने गायत्री-मन्त्रका उच्चारण किया, जिसे देखकर सब लोग चकित हो गये। इसके बाद नरहरि स्वामीने वैष्णवोंके पाँच संस्कार करके रामबोलाको राममन्त्रकी दीक्षा दी और अयोध्याहीमें रहकर उन्हें विद्याध्ययन कराने लगे। बालक रामबोलाकी बुद्धि बड़ी प्रखर थी। एक बार गुरुमुखसे जो सुन लेते थे, उन्हें वह कण्ठस्थ हो जाता था। वहाँसे कुछ दिन बाद गुरु-शिष्य दोनों शूकरक्षेत्र (सोरों) पहुँचे। वहाँ श्रीनरहरिजीने तुलसीदासको रामचरित सुनाया। कुछ दिन बाद वे काशी चले आये। काशीमें शेषसनातनजीके पास रहकर तुलसीदासने पन्द्रह वर्षतक वेद-वेदाङ्गका अध्ययन किया। इधर उनकी
[१०५०]
लोकवासना कुछ जाग्रत् हो उठी और अपने विद्यागुरुसे आज्ञा लेकर वे अपनी जन्मभूमिको लौट आये। वहाँ आकर उन्होंने देखा कि उनका परिवार सब नष्ट हो चुका है। उन्होंने विधिपूर्वक अपने पिता आदिका श्राद्ध किया और वहीं रहकर लोगोंको भगवान् रामकी कथा सुनाने लगे।
संवत् १५८३ ज्येष्ठ शुक्ला १३ गुरुवारको भारद्वाजगोत्रकी एक सुन्दरी कन्याके साथ उनका विवाह हुआ और वे सुखपूर्वक अपनी नवविवाहिता वधूके साथ रहने लगे। एक बार उनकी स्त्री भाईके साथ अपने मायके चली गयी। पीछे-पीछे तुलसीदासजी भी वहाँ जा पहुँचे। उनकी पत्नीने इसपर उन्हें बहुत धिक्कारा और कहा कि ‘मेरे इस हाड़-मांसके शरीरमें जितनी तुम्हारी आसक्ति है, उससे आधी भी यदि भगवान्में होती तो तुम्हारा बेड़ा पार हो गया होता।’
तुलसीदासजीको ये शब्द लग गये। वे एक क्षण भी नहीं रुके, तुरंत वहाँसे चल दिये।
वहाँसे चलकर तुलसीदासजी प्रयाग आये। वहाँ उन्होंने गृहस्थवेशका परित्याग कर साधुवेश ग्रहण किया। फिर तीर्थाटन करते हुए काशी पहुँचे। मानसरोवरके पास उन्हें काकभुशुण्डिजीके दर्शन हुए।
काशीमें तुलसीदासजी रामकथा कहने लगे। वहाँ उन्हें एक दिन एक प्रेत मिला, जिसने उन्हें हनुमान्जीका पता बतलाया। हनुमान्जीसे मिलकर तुलसीदासजीने उनसे श्रीरघुनाथजीका दर्शन करानेकी प्रार्थना की। हनुमान्जीने कहा, ‘तुम्हें चित्रकूटमें रघुनाथजीके दर्शन होंगे।’ इसपर तुलसीदासजी चित्रकूटकी ओर चल पड़े।
चित्रकूट पहुँचकर रामघाटपर उन्होंने अपना आसन जमाया। एक दिन वे प्रदक्षिणा करने निकले थे। मार्गमें उन्हें श्रीरामके दर्शन हुए। उन्होंने देखा कि दो बड़े ही सुन्दर राजकुमार घोड़ोंपर सवार होकर धनुष-बाण लिये जा रहे हैं। तुलसीदासजी उन्हें देखकर मुग्ध हो गये, परंतु उन्हें पहचान न सके। पीछेसे हनुमान्जीने आकर उन्हें सारा भेद बताया तो वे बड़ा पश्चाताप करने लगे। हनुमान्जीने उन्हें सान्त्वना दी और कहा प्रातःकाल फिर दर्शन होंगे।
संवत् १६०७ की मौनी अमावस्या बुधवारके दिन उनके सामने भगवान् श्रीराम पुनः प्रकट हुए। उन्होंने बालकरूपमें तुलसीदासजीसे कहा—बाबा! हमें चन्दन दो। हनुमान्जीने सोचा, वे इस बार भी धोखा न खा जायें, इसलिये उन्होंने तोतेका रूप धारण करके यह दोहा कहा—
चित्रकूट के घाट पर भड़ संतन की भीर।
तुलसिदास चंदन घिसें तिलक देत रघुबीर॥
तुलसीदासजी उस अद्भुत छबिको निहारकर शरीरकी सुधि भूल गये।
[१०५१]
भगवान्ने अपने हाथसे चन्दन लेकर अपने तथा तुलसीदासजीके मस्तकपर लगाया और अन्तर्धान हो गये।
संवत् १६२८ में ये हनुमान्जीकी आज्ञासे अयोध्याकी ओर चल पड़े। उन दिनों प्रयागमें माघमेला था। वहाँ कुछ दिन वे ठहर गये। पर्वके छः दिन बाद एक वटवृक्षके नीचे उन्हें भरद्वाज और याज्ञवल्क्य मुनिके दर्शन हुए। वहाँ उस समय वही कथा हो रही थी, जो उन्होंने सूकरक्षेत्रमें अपने गुरुसे सुनी थी। वहाँसे ये काशी चले आये और वहाँ प्रह्लादघाटपर एक ब्राह्मणके घर निवास किया। वहाँ उनके अंदर कवित्वशक्तिका स्फुरण हुआ और वे संस्कृतमें पद्य-रचना करने लगे। परंतु दिनमें वे जितने पद्य रचते, रात्रिमें वे सब लुप्त हो जाते। यह घटना रोज घटती। आठवें दिन तुलसीदासजीको स्वप्न हुआ। भगवान् शंकरने उन्हें आदेश दिया कि तुम अपनी भाषामें काव्य-रचना करो। तुलसीदासजीकी नींद उचट गयी। वे उठकर बैठ गये। उसी समय भगवान् शिव और पार्वती उनके सामने प्रकट हुए। तुलसीदासजीने उन्हें साष्टाङ्ग प्रणाम किया। शिवजीने कहा—‘तुम अयोध्यामें जाकर रहो और हिन्दीमें काव्य-रचना करो। मेरे आशीर्वादिसे तुम्हारी कविता सामवेदके समान फलवती होगी।’ इतना कहकर श्रीगौरीशंकर अन्तर्धान हो गये। तुलसीदासजी उनकी आज्ञा शिरोधार्य कर काशीसे अयोध्या चले आये।
संवत् १६३१का प्रारम्भ हुआ। उस साल रामनवमीके दिन प्रायः वैसा ही योग था जैसा त्रेतायुगमें रामजन्मके दिन था। उस दिन प्रातःकाल श्रीतुलसीदासजीने श्रीरामचरितमानसकी रचना प्रारम्भ की। दो वर्ष, सात महीने, छब्बीस दिनमें ग्रन्थकी समाप्ति हुई। संवत् १६३३के मार्गशीर्ष शुक्लपक्षमें रामविवाहके दिन सातों काण्ड पूर्ण हो गये।
इसके बाद भगवान्की आज्ञासे तुलसीदासजी काशी चले आये। वहाँ उन्होंने भगवान् विश्वनाथ और माता अन्नपूर्णाको श्रीरामचरितमानस सुनाया। रातको पुस्तक श्रीविश्वनाथजीके मन्दिरमें रख दी गयी। सबेरे जब पट खोला गया तो उसपर लिखा हुआ पाया गया—‘सत्यं शिवं सुन्दरम्।’ और नीचे भगवान् शंकरकी सही थी। उस समय उपस्थित लोगोंने ‘सत्यं शिवं सुन्दरम्’ की आवाज भी कानोंसे सुनी।
इधर पण्डितोंने जब यह बात सुनी तो उनके मनमें ईर्ष्या उत्पन्न हुई। वे दल बाँधकर तुलसीदासजीकी निन्दा करने लगे और उस पुस्तकको भी नष्ट कर देनेका प्रयत्न करने लगे। उन्होंने पुस्तक चुरानेके लिये दो चोर भेजे। चोरोंने जाकर देखा कि तुलसीदासजीकी कुटीके आस पास दो वीर धनुष बाण लिये पहरा दे रहे हैं। वे बड़े ही सुन्दर श्याम और गौर वर्णके थे। उनके दर्शनसे चोरोंकी बुद्धि शुद्ध हो गयी। उन्होंने उसी समयसे चोरी करना छोड़ दिया और भजनमें लग गये।