श्रीरामचरितमानस
Shri Ramcharitmanas
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
- अयोध्याकाण्ड *
६०७
हे स्वामी! आप सुजान हैं, सभीके हृदयकी और मुझ सेवकके मनकी रुचि, लालसा (अभिलाषा) और रहनी जानकर, हे प्रणतपाल! आप सब किसीका पालन करेंगे और हे देव! दोनों तरफको ओर-अन्ततक निबाहेंगे ॥ २ ॥
अस मोहि सब बिधि भूरि भरोसो । किऐँ बिचारु न सोचु खरो सो ॥ आरति मोर नाथ कर छोहू । दुहुँ मिलि कीन्ह ठीठु हठि मोहू ॥
मुझे सब प्रकारसे ऐसा बहुत बड़ा भरोसा है। विचार करनेपर तिनकेके बराबर (जरा-सा) भी सोच नहीं रह जाता। मेरी दीनता और स्वामीका स्नेह दोनोंने मिलकर मुझे जबर्दस्ती ठीठ बना दिया है ॥ ३ ॥
यह बड़ दोषु दूरि करि स्वामी । तजि सकोच सिखइअ अनुगामी ॥ भरत बिनय सुनि सबहिँ प्रसंसी । खीर नीर बिबरन गति हंसी ॥
हे स्वामी! इस बड़े दोषको दूर करके संकोच त्यागकर मुझ सेवकको शिक्षा दीजिये। दूध और जलको अलग-अलग करनेमें हंसिनीकी-सी गतिवाली भरतजीकी विनती सुनकर उसकी सभीने प्रशंसा की ॥ ४ ॥
दो०—दीनबंधु सुनि बंधु के बचन दीन छलहीन। देस काल अवसर सरिस बोले रामु प्रबीन ॥ ३१४ ॥
दीनबन्धु और परम चतुर श्रीरामजी भाई भरतजीके दीन और छलरहित बचन सुनकर देश, काल और अवसरके अनुकूल बचन बोले— ॥ ३१४ ॥
तात तुम्हारि मोरि परिजन की । चिंता गुरहि नृपहि घर बन की ॥ माथे पर गुर मुनि मिथिलेसू । हमहि तुम्हहि सपनेहुँ न कलेसू ॥
हे तात! तुम्हारी, मेरी, परिवारकी, घरकी और वनकी सारी चिन्ता गुरु वसिष्ठजी और महाराज जनकजीको है। हमारे सिरपर जब गुरुजी, मुनि विश्वामित्रजी और मिथिलापति जनकजी हैं, तब हमें और तुम्हें स्वप्नमें भी क्लेश नहीं है ॥ १ ॥
मोर तुम्हार परम पुरुषारथु । स्वारथु सुजसु धरमु परमारथु ॥ पितु आयसु पालिहिं दुहु भाई । लोक बेद भल भूप भलाई ॥
मेरा और तुम्हारा तो परम पुरुषार्थ, स्वार्थ, सुयश, धर्म और परमार्थ इसीमें है कि हम दोनों भाई पिताजीकी आज्ञाका पालन करें। राजाकी भलाई (उनके व्रतकी रक्षा) से ही लोक और वेद दोनोंमें भला है ॥ २ ॥
गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें । चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें ॥ अस बिचारि सब सोच बिहाई । पालहु अवध अवधि भरि जाई ॥
गुरु, पिता, माता और स्वामीकी शिक्षा (आज्ञा) का पालन करनेसे कुमार्गपर भी चलनेसे पैर गड़ेंमें नहीं पड़ता (पतन नहीं होता)। ऐसा विचारकर सब सोच छोड़कर अवध जाकर अवधिपर उसका पालन करो ॥ ३ ॥
६०८
- रामचरितमानस *
देसु कोसु परिजन परिवारु । गुर पद रजहिं लाग छरुभारु ॥ तुम्ह मुनि मातु सचिव सिख मानी । पालेहु पुहुमि प्रजा रजधानी ॥
देश, खजाना, कुटुम्ब, परिवार आदि सबकी जिम्मेदारी तो गुरुजीकी चरण-रजपर है। तुम तो मुनि वसिष्ठजी, माताओं और मन्त्रियोंकी शिक्षा मानकर तदनुसार पृथ्वी, प्रजा और राजधानीका पालन (रक्षा)-भर करते रहना ॥ ४ ॥
दो०—मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहूँ एक ।
पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक ॥ ३१५ ॥
तुलसीदासजी कहते हैं—[श्रीरामजीने कहा—] मुखिया मुखके समान होना चाहिये, जो खाने-पीनेको तो एक (अकेला) है, परन्तु विवेकपूर्वक सब अंगोंका पालन-पोषण करता है ॥ ३१५ ॥
राजधरम सरबसु एतनोई । जिमि मन माहँ मनोरथ गोई ॥ बंधु प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती । बिनु अधार मन तोषु न साँती ॥
राजधर्मका सर्वस्व (सार) भी इतना ही है। जैसे मनके भीतर मनोरथ छिपा रहता है। श्रीरघुनाथजीने भाई भरतको बहुत प्रकारसे समझाया। परन्तु कोई अवलम्बन पाये बिना उनके मनमें न सन्तोष हुआ, न शान्ति ॥ १ ॥
भरत सील गुर सचिव समाजू । सकुच सनेह बिबस रघुराजू ॥ प्रभु करि कृपा पाँवरीं दीन्हीं । सादर भरत सीस धरि लीन्हीं ॥
इधर तो भरतजीका शील (प्रेम) और उधर गुरुजनों, मन्त्रियों तथा समाजकी उपस्थिति! यह देखकर श्रीरघुनाथजी संकोच तथा स्नेहेके विशेष वशीभूत हो गये। (अर्थात् भरतजीके प्रेमवश उन्हें पाँवरी देना चाहते हैं, किन्तु साथ ही गुरु आदिका संकोच भी होता है।) आखिर [भरतजीके प्रेमवश] प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने कृपाकर खड़ाऊँ दे दीं और भरतजीने उन्हें आदरपूर्वक सिरपर धारण कर लिया ॥ २ ॥
चरनपीठ करुनानिधान के । जनु जुग जामिक प्रजा प्रान के ॥ संपुट भरत सनेह रतन के । आखर जुग जनु जीव जतन के ॥
करुनानिधान श्रीरामचन्द्रजीके दोनों खड़ाऊँ प्रजाके प्राणोंकी रक्षाके लिये मानो दो पहरेदार हैं। भरतजीके प्रेमरूपी रत्नके लिये मानो डिब्बा है और जीवके साधनके लिये मानो राम-नामके दो अक्षर हैं ॥ ३ ॥
कुल कपाट कर कुसल करम के । बिमल नयन सेवा सुधरम के ॥ भरत मुदित अवलंब लहे तें । अस सुख जस सिय रामु रहे तें ॥
रघुकुल [की रक्षा] के लिये दो किवाड़ हैं। कुशल (श्रेष्ठ) कर्म करनेके लिये दो हाथकी भाँति (सहायक) हैं। और सेवारूपी श्रेष्ठ धर्मके सुझानेके लिये निर्मल नेत्र हैं। भरतजी इस अवलम्बके मिल जानेसे परम आनन्दित हैं। उन्हें ऐसा ही सुख हुआ, जैसा श्रीसीतारामजीके रहनेसे होता ॥ ४ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
६०१
दो०—मागेउ बिदा प्रनामु करि राम लिए उर लाइ।
लोग उचाटे अमरपति कुटिल कुअवसरु पाइ ॥ ३१६ ॥
भरतजीने प्रणाम करके विदा माँगी, तब श्रीरामचन्द्रजीने उन्हें हृदयसे लगा लिया। इधर कुटिल इन्द्रने बुरा मौका पाकर लोगोंका उच्चाटन कर दिया ॥ ३१६ ॥
सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी। अवधि आस सम जीवनि जी की ॥
नतरु लखन सिय राम बियोगा। हहरि मरत सब लोग कुरोगा ॥
वह कुचाल भी सबके लिये हितकर हो गयी। अवधिकी आशाके समान ही वह जीवनके लिये संजीवनी हो गयी। नहीं तो (उच्चाटन न होता तो) लक्ष्मणजी, सीताजी और श्रीरामचन्द्रजीके वियोगरूपी बुरे रोगसे सब लोग घबड़ाकर (हाय-हाय करके) मर ही जाते ॥ १ ॥
रामकृपाँ अवरेब सुधारी। बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी ॥
भेंटत भुज भरि भाइ भरत सो। राम प्रेम रसु कहि न परत सो ॥
श्रीरामजीकी कृपाने सारी उलझन सुधार दी। देवताओंकी सेना जो लूटने आयी थी, वही गुणदायक (हितकारी) और रक्षक बन गयी। श्रीरामजी भुजाओंमें भरकर भाई भरतसे मिल रहे हैं। श्रीरामजीके प्रेमका वह रस (आनन्द) कहते नहीं बनता ॥ २ ॥
तन मन बचन उमग अनुरागा। धीर धुरंधर धीरजु त्यागा ॥
बारिज लोचन मोचत बारी। देखि दसा सुर सभा दुखारी ॥
तन, मन और वचन तीनोंमें प्रेम उमड़ पड़ा। धीरजकी धुरीको धारण करनेवाले श्रीरघुनाथजीने भी धीरज त्याग दिया। वे कमलसदृश नेत्रोंसे [प्रेमाश्रुओंका] जल बहाने लगे। उनकी यह दशा देखकर देवताओंकी सभा (समाज) दुःखी हो गयी ॥ ३ ॥
मुनिगन गुर धुर धीर जनक से। ग्यान अनल मन कसें कनक से ॥
जे बिरंचि निरलेप उपाए। पदुम पत्र जिमि जग जल जाए ॥
मुनिगण, गुरु वसिष्ठजी और जनकजी-सरीखे धीरधुरन्धर जो अपने मनोंको ज्ञानरूपी अग्निमें सोनेके समान कस चुके थे, जिनको ब्रह्माजीने निलेंप ही रचा और जो जगतरूपी जलमें कमलके पतेकी तरह ही (जगत्में रहते हुए भी जगत्से अनासक्त) पैदा हुए, ॥ ४ ॥
दो०—तेउ बिलोकि रघुबर भरत प्रीति अनूप अपार।
भाए मगन मन तन बचन सहित बिराग बिचार ॥ ३१७ ॥
वे भी श्रीरामजी और भरतजीके उपमारहित अपार प्रेमको देखकर वैराग्य और विवेकसहित तन, मन, वचनसे उस प्रेममें मग्न हो गये ॥ ३१७ ॥
६१०
- रामचरितमानस *
जहाँ जनक गुर गति मति भोरी । प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी ॥ बरनत रघुबर भरत बियोगू । सुनि कठोर कबि जानिहि लोगू ॥
जहाँ जनकजी और गुरु वसिष्ठजीकी बुद्धिकी गति कुण्ठित हो गयी, उस दिव्य प्रेमको प्राकृत (लौकिक) कहनेमें बड़ा दोष है। श्रीरामचन्द्रजी और भरतजीके वियोगका वर्णन करते सुनकर लोग कविको कठोरहृदय समझेंगे ॥ १ ॥
सो सकोच रसु अकथ सुबानी । समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी ॥ भेंटि भरतु रघुबर समुझाए । पुनि रिपुदवनु हरषि हियँ लाए ॥
वह संकोच-रस अकथनीय है। अतएव कविकी सुन्दर वाणी उस समय उसके प्रेमको स्मरण करके सकुचा गयी। भरतजीको भेंटकर श्रीरघुनाथजीने उनको समझाया। फिर हर्षित होकर शत्रुघ्नजीको हृदयसे लगा लिया ॥ २ ॥
सेवक सचिव भरत रुख पाई । निज निज काज लगे सब जाई ॥ सुनि दारुन दुखु दुहुँ समाजा । लगे चलन के साजन साजा ॥
सेवक और मन्त्री भरतजीका रुख पाकर सब अपने-अपने काममें जा लगे। यह सुनकर दोनों समाजोंमें दारुण दुःख छा गया। वे चलनेकी तैयारियाँ करने लगे ॥ ३ ॥
प्रभु पद पदुम बंदि दोउ भाई । चले सीस धरि राम रजाई ॥ मुनि तापस बनदेव निहोरी । सब सनमानि बहोरि बहोरी ॥
प्रभुके चरणकमलोंकी वन्दना करके तथा श्रीरामजीकी आज्ञाको सिरपर रखकर भरत-शत्रुघ्न दोनों भाई चले। मुनि, तपस्वी और वनदेवता सबका बार-बार सम्मान करके उनकी विनती की ॥ ४ ॥
दो०—लखनहि भेंटि प्रनामु करि सिर धरि सिय पद धूरि।
चले सप्रेम असीस सुनि सकल सुमंगल मूरि ॥ ३१८ ॥
फिर लक्ष्मणजीको क्रमशः भेंटकर तथा प्रणाम करके और सीताजीके चरणोंकी धूलिको सिरपर धारण करके और समस्त मङ्गलोंके मूल आशीर्वाद सुनकर वे प्रेमसहित चले ॥ ३१८ ॥
सानुज राम नृपहि सिर नाई । कीन्हि बहुत बिधि बिनय बड़ाई ॥ देव दया बस बड़ दुखु पायउ । सहित समाज काननहिं आयउ ॥
छोटे भाई लक्ष्मणजीसमेत श्रीरामजीने राजा जनकजीको सिर नवाकर उनकी बहुत प्रकारसे विनती और बड़ाई की [और कहा—] हे देव! दयावश आपने बहुत दुःख पाया। आप समाजसहित वनमें आये ॥ १ ॥
पुर पगु धारिअ देड़ असीसा । कीन्ह धीर धरि गवनु महीसा ॥ मुनि महिदेव साधु सनमाने । बिदा किए हरि हर सम जाने ॥
- अयोध्याकाण्ड *
६११
अब आशीर्वाद देकर नगरको पथारिये। यह सुन राजा जनकजीने धीरज धरकर गमन किया। फिर श्रीरामचन्द्रजीने मुनि, ब्राह्मण और साधुओंको विष्णु और शिवके समान जानकर सम्मान करके उनको विदा किया ॥ २ ॥
सासु समीप गए दोउ भाई। फिरे बंदि पग आसिष पाई॥ कौसिक बामदेव जाबाली। पुरजन परिजन सचिव सुचाली॥
तब श्रीराम-लक्ष्मण दोनों भाई सास (सुनयनाजी) के पास गये और उनके चरणोंकी वन्दना करके आशीर्वाद पाकर लौट आये। फिर विश्वामित्र, वामदेव, जाबालि और शुभ आचरणवाले कुटुम्बी, नगरनिवासी और मन्त्री— ॥ ३ ॥
जथा जोगु करि बिनय प्रनामा। बिदा किए सब सानुज रामा॥ नारि पुरुष लघु मध्य बड़ेरे। सब सनमानि कृपानिधि फेरे॥
सबको छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित श्रीरामचन्द्रजीने यथायोग्य विनय एवं प्रणाम करके विदा किया। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजीने छोटे, मध्यम (मझले) और बड़े सभी श्रेणीके स्त्री-पुरुषोंका सम्मान करके उनको लौटाया ॥ ४ ॥
दो०—भरत मातु पद बंदि प्रभु सुचि सनेहँ मिलि भेंटि।
बिदा कीन्ह सजि पालकी सकुच सोच सब मेटि ॥ ३१९ ॥
भरतकी माता कैकेयीके चरणोंकी वन्दना करके प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने पवित्र (निश्छल) प्रेमके साथ उनसे मिल-भेंटकर तथा उनके सारे संकोच और सोचको मिटाकर पालकी सजाकर उनको विदा किया ॥ ३१९ ॥
परिजन मातु पितहि मिलि सीता। फिरी प्रानप्रिय प्रेम पुनीता॥ करि प्रनामु भेंटों सब सासू। प्रीति कहत कवि हियँ न हुलासू॥
प्राणप्रिय पति श्रीरामचन्द्रजीके साथ पवित्र प्रेम करनेवाली सीताजी नैहरके कुटुम्बियोंसे तथा माता-पितासे मिलकर लौट आयीं। फिर प्रणाम करके सब सासुओंसे गले लगकर मिलीं। उनके प्रेमका वर्णन करनेके लिये कविके हृदयमें हुलास (उत्साह) नहीं होता ॥ १ ॥
सुनि सिख अभिमत आसिष पाई। रही सीय दुहु प्रीति समाई॥ रघुपति पटु पालकीं मगाई। करि प्रबोधु सब मातु चढ़ाई॥
उनकी शिक्षा सुनकर और मनचाहा आशीर्वाद पाकर सीताजी सासुओं तथा माता-पिता दोनों ओरकी प्रीतिमें समायी (बहुत देरतक निमग्न) रहीं! [तब] श्रीरघुनाथजीने सुन्दर पालकियों मँगवारीं और सब माताओंको आश्वासन देकर उनपर चढ़ाया ॥ २ ॥
बार बार हिलि मिलि दुहु भाई। सम सनेहँ जननीं पहुँचाई॥ साजि बाजि गज बाहन नाना। भरत भूप दल कीन्ह पयाना॥
दोनों भाइयोंने माताओंसे समान प्रेमसे बार-बार मिल-जुलकर उनको पहुँचाया। भरतजी और राजा जनकजीके दलोंने घोड़े, हाथी और अनेकों तरहकी सवारियाँ सजाकर प्रस्थान किया ॥ ३ ॥
६१२
- रामचरितमानस *
हृदयँ रामु सिय लखन समेता । चले जाहिँ सब लोग अचेता ॥ बसह बाजि गज पसु हियँ हारें । चले जाहिँ परबस मन मारें ॥
सीताजी एवं लक्ष्मणजीसहित श्रीरामचन्द्रजीको हृदयमें रखकर सब लोग बेसुध हुए चले जा रहे हैं। बैल, घोड़े, हाथी आदि पशु हृदयमें हारे (शिथिल) हुए परवश मनमारे चले जा रहे हैं ॥ ४ ॥
दो०—गुरु गुरतिय पद बंदि प्रभु सीता लखन समेत ।
फिरे हरष बिसमय सहित आए परन निकेत ॥ ३२० ॥
गुरु वसिष्ठजी और गुरुपत्नी अरुन्धतीजीके चरणोंकी वन्दना करके सीताजी और लक्ष्मणजीसहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी हर्ष और विषादके साथ लौटकर पर्णकुटीपर आये ॥ ३२० ॥
विदा कीन्ह सनमानि निषादू । चलेउ हृदयँ बड़ विरह बिषादू ॥ कोल किरात भिल्ल बनचारी । फेरे फिरे जोहारि जोहारी ॥
फिर सम्मान करके निषादराजको विदा किया। वह चला तो सही, किन्तु उसके हृदयमें विरहका बड़ा भारी विषाद था। फिर श्रीरामजीने कोल, किरात, भील आदि वनवासी लोगोंको लौटाया। वे सब जोहार-जोहारकर (वन्दना कर-करके) लौटे ॥ १ ॥
प्रभु सिय लखन बैठि बट छाहीं । प्रिय परिजन बियोग बिलखाहीं ॥ भरत सनेह सुभाउ सुबानी । प्रिया अनुज सन कहत बखानी ॥
प्रभु श्रीरामचन्द्रजी, सीताजी और लक्ष्मणजी बड़की छायामें बैठकर प्रियजन एवं परिवारके वियोगसे दुखी हो रहे हैं। भरतजीके स्नेह, स्वभाव और सुन्दर वाणीको बखान-बखानकर वे प्रिय पत्नी सीताजी और छोटे भाई लक्ष्मणजीसे कहने लगे ॥ २ ॥
प्रीति प्रतीति बचन मन करनी । श्रीमुख राम प्रेम बस बरनी ॥ तेहि अवसर खग मृग जल मीना । चित्रकूट चर अचर मलीना ॥
श्रीरामचन्द्रजीने प्रेमके वश होकर भरतजीके बचन, मन, कर्मकी प्रीति तथा विश्वासका अपने श्रीमुखसे वर्णन किया। उस समय पक्षी, पशु और जलकी मछलियाँ, चित्रकूटके सभी चेतन और जड़ जीव उदास हो गये ॥ ३ ॥
बिबुध बिलोकि दसा रघुबर की । बरषि सुमन कहि गति घर घर की ॥ प्रभु प्रनामु करि दीन्ह भरोसो । चले मुदित मन डर न खरो सो ॥
श्रीरघुनाथजीकी दशा देखकर देवताओंने उनपर फूल बरसाकर अपनी घर-घरकी दशा कही (दुखड़ा सुनाया)। प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने उन्हें प्रणाम कर आश्वासन दिया। तब वे प्रसन्न होकर चले, मनमें जरा-सा भी डर न रहा ॥ ४ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
६१३
दो०—सानुज सीय समेत प्रभु राजत परन कुटीर। भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर॥ ३२१ ॥
छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजीसमेत प्रभु श्रीरामचन्द्रजी पर्णकुटीमें ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो वैराग्य, भक्ति और ज्ञान शरीर धारण करके शोभित हो रहे हों ॥ ३२१ ॥
मुनि महिसुर गुर भरत भुआलू। राम बिरहँ सबु साजु बिहालू॥ प्रभु गुन ग्राम गनत मन माहीं। सब चुपचाप चले मग जाहीं॥
मुनि, ब्राह्मण, गुरु वसिष्ठजी, भरतजी और राजा जनकजी—सारा समाज श्रीरामचन्द्रजीके विरहमें विह्वल है। प्रभुके गुणसमूहोंका मनमें स्मरण करते हुए सब लोग मार्गमें चुपचाप चले जा रहे हैं ॥ १ ॥
जमुना उतरि पार सबु भयऊ। सो बासरु बिनु भोजन गयऊ॥ उतरि देवसरि दूसर बासू। रामसखाँ सब कीन्ह सुपासू॥
[पहले दिन] सब लोग यमुनाजी उतरकर पार हुए। वह दिन बिना भोजनके ही बीत गया। दूसरा मुकाम गङ्गाजी उतरकर (गङ्गापार शृङ्गवेरपुरमें) हुआ। वहाँ रामसखा निषादराजने सब सुप्रबन्ध कर दिया ॥ २ ॥
सई उतरि गोमतीं नहाए। चौथें दिवस अवधपुर आए॥ जनकु रहे पुर बासर चारी। राज काज सब साज सँभारी॥
फिर सई उतरकर गोमतीजीमें स्नान किया और चौथे दिन सब अयोध्याजी जा पहुँचे। जनकजी चार दिन अयोध्याजीमें रहे और राजकाज एवं सब साज-सामानको सँभालकर, ॥ ३ ॥
सौँपि सचिव गुर भरतहि राजू। तेरहुति चले साजि सबु साजू॥ नगर नारि नर गुर सिख मानी। बसे सुखेन राम रजधानी॥
तथा मन्त्री, गुरुजी तथा भरतजीको राज्य सौंपकर, सारा साज-सामान ठीक करके तिरहुतको चले। नगरके स्त्री-पुरुष गुरुजीकी शिक्षा मानकर श्रीरामजीकी राजधानी अयोध्याजीमें सुखपूर्वक रहने लगे ॥ ४ ॥
दो०—राम दरस लागि लोग सब करत नेम उपबास। तजि तजि भूषण भोग सुख जिअत अवधि कीँ आस॥ ३२२ ॥
सब लोग श्रीरामचन्द्रजीके दर्शनके लिये नियम और उपवास करने लगे। वे भूषण और भोग-सुखोंको छोड़-छाड़कर अवधिकी आशापर जी रहे हैं ॥ ३२२ ॥
सचिव सुसेवक भरत प्रबोधे। निज निज काज पाइ सिख ओधे॥ पुनि सिख दीन्हि बोलि लघु भाई। सौँपी सकल मातु सेवकाई॥
६१४
- रामचरितमानस *
भरतजीने मन्त्रियों और विश्वासी सेवकोंको समझाकर उद्यत किया। वे सब सीख पाकर अपने-अपने काममें लग गये। फिर छोटे भाई शत्रुघ्नीको बुलाकर शिक्षा दी और सब माताओंकी सेवा उनको सौंपी ॥ १ ॥
भूसुर बोलि भरत कर जोरे । करि प्रनाम बय बिनय निहोरे ॥ ऊँच नीच कारजु भल पोचू । आयसु देब न करब सँकोचू ॥
ब्राह्मणोंको बुलाकर भरतजीने हाथ जोड़कर प्रणाम कर अवस्थाके अनुसार विनय और निहोरा किया कि आपलोग ऊँचा-नीचा (छोटा-बड़ा), अच्छा-मन्दा जो कुछ भी कार्य हो, उसके लिये आज्ञा दीजियेगा। संकोच न कीजियेगा ॥ २ ॥
परिजन पुरजन प्रजा बोलाए । समाधानु करि सुबस बसाए ॥ सानुज गे गुर गेहँ बहोरी । करि दंडवत कहत कर जोरी ॥
भरतजीने फिर परिवारके लोगोंको, नागरिकोंको तथा अन्य प्रजाको बुलाकर, उनका समाधान करके उनको सुखपूर्वक बसाया। फिर छोटे भाई शत्रुघ्नीसहित वे गुरुजीके घर गये और दण्डवत् करके हाथ जोड़कर बोले— ॥ ३ ॥
आयसु होइ त रहँ सनेमा । बोले मुनि तन पुलकि सपेमा ॥ समुद्गब कहब करब तुम्ह जोई । धरम सारु जग होइहि सोई ॥
आज्ञा हो तो मैं नियमपूर्वक रहूँ! मुनि वसिष्ठजी पुलकितशरीर हो प्रेमके साथ बोले—हे भरत! तुम जो कुछ समझोगे, कहोगे और करोगे, वही जगत्में धर्मका सार होगा ॥ ४ ॥
दो०— सुनि सिख पाड़ असीस बड़ि गनक बोलि दिनु साधि ।
सिंधासन प्रभु पादुका बैठारे निरुपाधि ॥ ३२३ ॥
भरतजीने यह सुनकर और शिक्षा तथा बड़ा आशीर्वाद पाकर ज्योतिषियोंको बुलाया और दिन (अच्छा मुहूर्त) साधकर प्रभुकी चरणपादुकाओंको निर्विघ्नतापूर्वक सिंहासनपर विराजित कराया ॥ ३२३ ॥
राम मातु गुर पद सिरु नाई । प्रभु पद पीठ रजायसु पाई ॥ नंदिगावँ करि परन कुटीरा । कीन्ह निवासु धरम धुर धीरा ॥
फिर श्रीरामजीकी माता कौसल्याजी और गुरुजीके चरणोंमें सिर नवाकर और प्रभुकी चरणपादुकाओंकी आज्ञा पाकर धर्मकी धुरी धारण करनेमें धीर भरतजीने नन्दिग्राममें पर्णकुटी बनाकर उसीमें निवास किया ॥ १ ॥
जटाजूट सिर मुनिपट धारी । महि खनि कुस साँथरी सँवारी ॥ असन बसन बासन ब्रत नेमा । करत कठिन रिषिधरम सप्रेमा ॥
- अयोध्याकाण्ड *
६१५
सिरपर जटाजूट और शरीरमें मुनियोंके [वलकल] वस्त्र धारण कर, पृथ्वीको खोदकर उसके अंदर कुशकी आसनी बिछायी। भोजन, वस्त्र, बरतन, व्रत, नियम—सभी बातोंमें वे ऋषियोंके कठिन धर्मका प्रेमसहित आचरण करने लगे ॥ २ ॥
भूषन बसन भोग सुख भूरी । मन तन बचन तजे तिन तूरी ॥ अवध राजु सुर राजु सिहाई । दसरथ धनु सुनि धनदु लजाई ॥
गहने-कपड़े और अनेकों प्रकारके भोग-सुखोंको मन, तन और वचनसे तृण तोड़कर (प्रतिज्ञा करके) त्याग दिया। जिस अयोध्याके राज्यको देवराज इन्द्र सिहाते थे और [जहाँके राजा] दशरथजीकी सम्पत्ति सुनकर कुबेर भी लजा जाते थे, ॥ ३ ॥
तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा । चंचरीक जिमि चंपक बागा ॥ रमा बिलासु राम अनुरागी । तजत बमन जिमि जन बड़भागी ॥
उसी अयोध्यापुरीमें भरतजी अनासक्त होकर इस प्रकार निवास कर रहे हैं जैसे चम्पाके बागमें भौरा। श्रीरामचन्द्रजीके प्रेमी बड़भागी पुरुष लक्ष्मीके विलास [भोगैश्वर्य] को वमनकी भाँति त्याग देते हैं (फिर उसकी ओर ताकते भी नहीं) ॥ ४ ॥
दो०—राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति । चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति ॥ ३२४ ॥
फिर भरतजी तो [स्वयं] श्रीरामचन्द्रजीके प्रेमके पात्र हैं। वे इस (भोगैश्वर्यत्यागरूप) करनीसे बड़े नहीं हुए (अर्थात् उनके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है)। [पृथ्वीपरका जल न पीनेकी] टेकसे चातककी और नीर-क्षीर-विवेककी विभूति (शक्ति) से हंसकी भी सराहना होती है ॥ ३२४ ॥
देह दिनहुँ दिन दूबरि होई । घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई ॥ नित नव राम प्रेम पनु पीना । बद्धत धरम दलु मनु न मलीना ॥
भरतजीका शरीर दिनोंदिन दुबला होता जाता है। तेज (अन्न, घृत आदिसे उत्पन्न होनेवाला मेद*) घट रहा है। बल और मुखछबि (मुखकी कान्ति अथवा शोभा) वैसी ही बनी हुई है। रामप्रेमका प्रण नित्य नया और पुष्ट होता है, धर्मका दल बढ़ता है और मन उदास नहीं है (अर्थात् प्रसन्न है) ॥ १ ॥
- संस्कृत-कोषमें 'तेज' का अर्थ मेद मिलता है और यह अर्थ लेनेसे 'घटइ' के अर्थमें भी किसी प्रकारकी खींच-तान नहीं करनी पड़ती।
जिमि जलु निघटत सरद प्रकासे । बिलसत बेतस बनज बिकासे ॥ सम दम संजम नियम उपासा । नखत भरत हिय बिमल अकासा ॥
जैसे शरद-ऋतुके प्रकाश [विकास] से जल घटता है, किन्तु बेंत शोभा पाते हैं और कमल विकसित होते हैं। शम, दम, संजम, नियम और उपवास आदि भरतजीके हृदयरूपी निर्मल आकाशके नक्षत्र (तारागण) हैं ॥ २ ॥
६१६
- रामचरितमानस *
ध्रुव बिस्वासु अवधि राका सी । स्वामि सुरति सुरबीधि बिकासी ॥ राम पेम बिधु अचल अदोषा । सहित समाज सोह नित चोखा ॥
विश्वास ही [उस आकाशमें] ध्रुवतारा है, चौदह वर्षकी अवधि [का ध्यान] पूर्णमाके समान है और स्वामी श्रीरामजीकी सुरति (स्मृति) आकाशगङ्गा-सरीखी प्रकाशित है। रामप्रेम ही अचल (सदा रहनेवाला) और कलङ्करहित चन्द्रमा है। वह अपने समाज (नक्षत्रों) सहित नित्य सुन्दर सुशोभित है ॥ ३ ॥
भरत रहनि समुद्भनि करतूती । भगति बिरति गुन बिमल बिभूती ॥ बरनत सकल सुकबि सकुचाहीं । सेस गनेस गिरा गमु नाहीं ॥
भरतजीकी रहनी, समझ, करनी, भक्ति, वैराग्य, निर्मल गुण और ऐश्वर्यका वर्णन करनेमें सभी सुकवि सकुचाते हैं; क्योंकि वहाँ [औरोंकी तो बात ही क्या] स्वयं शेष, गणेश और सरस्वतीकी भी पहुँच नहीं है ॥ ४ ॥
दो०—नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति । मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति ॥ ३२५ ॥
वे नित्यप्रति प्रभुकी पादुकाओंका पूजन करते हैं, हृदयमें प्रेम समाता नहीं है। पादुकाओंसे आज्ञा माँग-माँगकर वे बहुत प्रकार (सब प्रकारके) राज-काज करते हैं ॥ ३२५ ॥
पुलक गात हिउँ सिय रघुबीरू । जीह नामु जप लोचन नीरू ॥ लखन राम सिय कानन बसहीं । भरतु भवन बसि तप तनु कसहीं ॥
शरीर पुलकित है, हृदयमें श्रीसीता-रामजी हैं। जीभ राम-नाम जप रही है, नेत्रोंमें प्रेमका जल भरा है। लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजी तो वनमें बसते हैं, परन्तु भरतजी घरहीमें रहकर तपके द्वारा शरीरको कस रहे हैं ॥ १ ॥
दोउ दिसि समुद्भि कहत सबु लोगू । सब बिधि भरत सराहन जोगू ॥ सुनि ब्रत नेम साधु सकुचाहीं । देखि दसा मुनिराज लजाहीं ॥
दोनों ओरकी स्थिति समझकर सब लोग कहते हैं कि भरतजी सब प्रकारसे सराहने योग्य हैं। उनके ब्रत और नियमोंको सुनकर साधु-संत भी सकुचा जाते हैं और उनकी स्थिति देखकर मुनिराज भी लज्जित होते हैं ॥ २ ॥
परम पुनीत भरत आचरनू । मधुर मंजु मुद मंगल करनू ॥ हरन कठिन कलि कलुष कलेसू । महामोह निसि दलन दिनेसू ॥
भरतजीका परम पवित्र आचरण (चरित्र) मधुर, सुन्दर और आनन्द-मङ्गलोंका करनेवाला है। कलियुगके कठिन पापों और क्लेशोंको हरनेवाला है। महामोहरूपी रात्रिको नष्ट करनेके लिये सूर्यके समान है ॥ ३ ॥
- अयोध्याकाण्ड *
६१७
पाप पुंज कुंजर मृगराजू। समन सकल संताप समाजू॥ जन रंजन भंजन भव भारू। राम सनेह सुधाकर सारू॥
पापसमूहरूपी हाथीके लिये सिंह है। सारे सन्तापोंके दलका नाश करनेवाला है। भक्तोंको आनन्द देनेवाला और भवके भार (संसारके दुःख)-का भञ्जन करनेवाला तथा श्रीरामप्रेमरूपी चन्द्रमाका सार (अमृत) है॥ ४ ॥
छं०—सिय राम प्रेम पियूष पूरन होत जनमु न भरत को। मुनिमनअगम जम नियम सम दम बिषम ब्रत आचरत को ॥ दुख दाह दारिद दंभ दूषन सुजस मिस अपहरत को। कलिकाल तुलसी से सठन्हि हठि राम सनमुख करत को ॥
श्रीसीतारामजीके प्रेमरूपी अमृतसे परिपूर्ण भरतजीका जन्म यदि न होता तो मुनियोंके मनको भी अगम यम, नियम, शम, दम आदि कठिन व्रतोंका आचरण कौन करता? दुःख, सन्ताप, दरिद्रता, दम्भ आदि दोषोंको अपने सुयशके बहाने कौन हरण करता? तथा कलिकालमें तुलसीदास-जैसे शठोंको हठपूर्वक कौन श्रीरामजीके सम्मुख करता?
सो०—भरत चरित करि नेमु तुलसी जो सादर सुनहिं। सीय राम पद पेमु अवसि होइ भव रस बिरति ॥ ३२६ ॥
तुलसीदासजी कहते हैं—जो कोई भरतजीके चरित्रको नियमसे आदरपूर्वक सुनेंगे, उनको अवश्य ही श्रीसीतारामजीके चरणोंमें प्रेम होगा और सांसारिक विषय-रससे वैराग्य होगा ॥ ३२६ ॥
मासपारायण, इक्कीसवाँ विश्राम
इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने द्वितीयः सोपानः समाप्तः।
कलियुगके सम्पूर्ण पापोंको विध्वंस करनेवाले श्रीरामचरितमानसका
यह दूसरा सोपान समाप्त हुआ।
( अयोध्याकाण्ड समाप्त )
अत्रिके अतिथि
करि पूजा कहि बचन सुहाए। दिए मूल फल प्रभु मन भाए॥
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
श्रीजानकीवल्लभो विजयते
श्रीरामचरितमानस
तृतीय सोपान
अरण्यकाण्ड
श्लोक
मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णन्दुमानन्ददं वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम् । मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्वःसम्भवं शङ्करं वन्दे ब्रह्मकुलं कलङ्कशमनं श्रीरामभूप्रियम् ॥ १ ॥
धर्मरूपी वृक्षके मूल, विवेकरूपी समुद्रको आनन्द देनेवाले पूर्णचन्द्र, वैराग्यरूपी कमलके [विकसित करनेवाले] सूर्य, पापरूपी घोर अन्धकारको निश्चय ही मिटानेवाले, तीनों तापोंको हरनेवाले, मोहरूपी बादलोंके समूहको छिन्न-भिन्न करनेकी विधि (क्रिया)-में आकाशसे उत्पन्न पवनस्वरूप, ब्रह्माजीके वंशज (आत्मज) तथा कलङ्कनाशक महाराज श्रीरामचन्द्रजीके प्रिय श्रीशङ्करजीकी मैं वन्दना करता हूँ ॥ १ ॥
सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुं पीताम्बरं सुन्दरं पाणौ बाणशरासनं कटिलसत्तूणीरभारं वरम् । राजीवायतलोचनं धृतजटाजूटेन संशोभितं सीतालक्ष्मणसंयुतं पथिगतं रामाभिरामं भजे ॥ २ ॥
६२०
- रामचरितमानस *
जिनका शरीर जलयुक्त मेघोंके समान सुन्दर (श्यामवर्ण) एवं आनन्दघन है, जो सुन्दर [वलकलका] पीतवस्त्र धारण किये हैं, जिनके हाथोंमें बाण और धनुष हैं, कमर उत्तम तरकसके भारसे सुशोभित है, कमलके समान विशाल नेत्र हैं और मस्तकपर जटाजूट धारण किये हैं, उन अत्यन्त शोभायमान श्रीसीताजी और लक्ष्मणजीसहित मार्गमें चलते हुए आनन्द देनेवाले श्रीरामचन्द्रजीको मैं भजता हूँ ॥ २ ॥
सो०—उमा राम गुन गूढ़ पंडित मुनि पावहिं बिरति। पावहिं मोह बिमूढ़ जे हरि बिमुख न धर्म रति॥
हे पार्वती! श्रीरामजीके गुण गूढ़ हैं, पण्डित और मुनि उन्हें समझकर वैराग्य प्राप्त करते हैं। परन्तु जो भगवान्से विमुख हैं और जिनका धर्ममें प्रेम नहीं है, वे महामूढ़ [उन्हें सुनकर] मोहको प्राप्त होते हैं।
पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई॥ अब प्रभु चरित सुनहु अति पावन। करत जे बन सुर नर मुनि भावन॥
पुरवासियोंके और भरतजीके अनुपम और सुन्दर प्रेमका मैंने अपनी बुद्धिके अनुसार गान किया। अब देवता, मनुष्य और मुनियोंके मनको भानेवाले प्रभु श्रीरामचन्द्रजीके वे अत्यन्त पवित्र चरित्र सुनो, जिन्हें वे वनमें कर रहे हैं ॥ १ ॥
एक बार चुनि कुसुम सुहाए। निज कर भूषन राम बनाए॥ सीतहि पहिराए प्रभु सादर। बैठे फटिक सिला पर सुंदर॥
एक बार सुन्दर फूल चुनकर श्रीरामजीने अपने हाथोंसे भाँति-भाँतिके गहने बनाये और सुन्दर स्फटिकशिलापर बैठे हुए प्रभुने आदरके साथ वे गहने श्रीसीताजीको पहनाये ॥ २ ॥
सुरपति सुत धरि बायस बेषा। सठ चाहत रघुपति बल देखा॥ जिमि पिपीलिका सागर थाहा। महा मंदमति पावन चाहा॥
देवराज इन्द्रका मूर्ख पुत्र जयन्त कौएका रूप धरकर श्रीरघुनाथजीका बल देखना चाहता है। जैसे महान् मन्दबुद्धि चींटी समुद्रका थाह पाना चाहती हो ॥ ३ ॥
सीता चरन चोंच हति भागा। मूढ़ मंदमति कारन कागा॥ चला रुधिर रघुनायक जाना। सीक धनुष सायक संधाना॥
वह मूढ़, मन्दबुद्धि कारणसे (भगवान्के बलकी परीक्षा करनेके लिये) बना हुआ कौआ सीताजीके चरणोंमें चोंच मारकर भागा। जब रक्त बह चला, तब श्रीरघुनाथजीने जाना और धनुषपर सीक (सरकंडे)का बाण सन्धान किया ॥ ४ ॥
दो०—अति कृपाल रघुनायक सदा दीन पर नेह। ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुन गेह॥ १ ॥
- अरण्यकाण्ड *
६२१
श्रीरघुनाथजी, जो अत्यन्त ही कृपालु हैं और जिनका दीनोंपर सदा प्रेम रहता है, उनसे भी उस अवगुणोंके घर मूर्ख जयन्तने आकर छल किया ॥ १ ॥
प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा । चला भाजि बायस भय पावा ॥ धरि निज रूप गयउ पितु पाहीं । राम बिमुख राखा तेहि नाहीं ॥
मन्त्रसे प्रेरित होकर वह ब्रह्मबाण दौड़ा। कौआ भयभीत होकर भाग चला। वह अपना असली रूप धरकर पिता इन्द्रके पास गया, पर श्रीरामजीका विरोधी जानकर इन्द्रने उसको नहीं रखा ॥ १ ॥
भा निरास उपजी मन त्रासा । जथा चक्र भय रिषि दुर्बासा ॥ ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका । फिरा श्रमित व्याकुल भय सोका ॥
तब वह निराश हो गया, उसके मनमें भय उत्पन्न हो गया; जैसे दुर्बासा ऋषिको चक्रसे भय हुआ था। वह ब्रह्मलोक, शिवलोक आदि समस्त लोकोंमें थका हुआ और भय-शोकसे व्याकुल होकर भागता फिरा ॥ २ ॥
काहूँ बैठन कहा न ओही । राखि को सकड़ राम कर द्रोही ॥ मातु मृत्यु पितु समन समाना । सुधा होड़ बिष सुनु हरिजाना ॥
[पर रखना तो दूर रहा] किसीने उसे बैठनेतकके लिये नहीं कहा। श्रीरामजीके द्रोहीको कौन रख सकता है? [काकभुशुण्डिजी कहते हैं—] हे गरुड़! सुनिये, उसके लिये माता मृत्युके समान, पिता यमराजके समान और अमृत विषके समान हो जाता है ॥ ३ ॥
मित्र करड़ सत रिपु कै करनी । ता कहँ बिबुधनदी बैतरनी ॥ सब जगु ताहि अनलहु ते ताता । जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता ॥
मित्र सैकड़ों शत्रुओंकी-सी करनी करने लगता है। देवनदी गङ्गाजी उसके लिये वैतरणी (यमपुरीकी नदी) हो जाती है। हे भाई! सुनिये, जो श्रीरघुनाथजीके विमुख होता है, समस्त जगत् उसके लिये अग्निये भी अधिक गरम (जलानेवाला) हो जाता है ॥ ४ ॥
नारद देखा बिकल जयंता । लागि दया कोमल चित संता ॥ पठवा तुरत राम पहिं ताही । कहेसि पुकारि प्रनत हित पाही ॥
नारदजीने जयन्तको व्याकुल देखा तो उन्हें दया आ गयी; क्योंकि संतोंका चित बड़ा कोमल होता है। उन्होंने उसे [समझाकर] तुरंत श्रीरामजीके पास भेज दिया। उसने [जाकर] पुकारकर कहा— हे शरणागतके हितकारी! मेरी रक्षा कीजिये ॥ ५ ॥
आतुर सभय गहेसि पद जाई । त्राहि त्राहि दयाल रघुराई ॥ अतुलित बल अतुलित प्रभुताई । मैं मतिमंद जानि नहिं पाई ॥
६२२
- रामचरितमानस *
आतुर और भयभीत जयन्तने जाकर श्रीरामजीके चरण पकड़ लिये [और कहा—] हे दयालु रघुनाथजी! रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये। आपके अतुलित बल और आपकी अतुलित प्रभुता (सामर्थ्य)—को मैं मन्दबुद्धि जान नहीं पाया था ॥ ६ ॥
निज कृत कर्म जनित फल पायउँ । अब प्रभु पाहि सरन तकि आयउँ ॥ सुनि कृपाल अति आरत बानी । एकनयन करि तजा भवानी ॥
अपने किये हुए कर्मसे उत्पन्न हुआ फल मैंने पा लिया। अब हे प्रभु! मेरी रक्षा कीजिये। मैं आपकी शरण तककर आया हूँ। [शिवजी कहते हैं—] हे पार्वती! कृपालु श्रीरघुनाथजीने उसकी अत्यन्त आर्त [दुःखभरी] वाणी सुनकर उसे एक आँखका काना करके छोड़ दिया ॥ ७ ॥
सो०—कीन्ह मोह बस द्रोह जद्यपि तेहि कर बध उचित ।
प्रभु छाड़ेउ करि छोह को कृपाल रघुबीर सम ॥ २ ॥
उसने मोहवश द्रोह किया था, इसलिये यद्यपि उसका वध ही उचित था, पर प्रभुने कृपा करके उसे छोड़ दिया। श्रीरामजीके समान कृपालु और कौन होगा? ॥ २ ॥
रघुपति चित्रकूट बसि नाना । चरित किए श्रुति सुधा समाना ॥ बहुरि राम अस मन अनुमाना । होइहि भीर सबहिं मोहि जाना ॥
चित्रकूटमें बसकर श्रीरघुनाथजीने बहुत—से चरित्र किये, जो कानोंको अमृतके समान [प्रिय] हैं। फिर (कुछ समय पश्चात्) श्रीरामजीने मनमें ऐसा अनुमान किया कि मुझे सब लोग जान गये हैं, इससे [यहाँ] बड़ी भीड़ हो जायगी ॥ १ ॥
सकल मुनिन्ह सन बिदा कराई । सीता सहित चले द्वौ भाई ॥ अत्रि के आश्रम जब प्रभु गयऊ । सुनत महामुनि हरषित भयऊ ॥
[इसलिये] सब मुनियोंसे विदा लेकर सीताजीसहित दोनों भाई चले! जब प्रभु अत्रिजीके आश्रममें गये, तो उनका आगमन सुनते ही महामुनि हर्षित हो गये ॥ २ ॥
पुलकित गात अत्रि उठि धाए । देखि रामु आतुर चलि आए ॥ करत दंडवत मुनि उर लाए । प्रेम बारि द्वौ जन अन्हवाए ॥
शरीर पुलकित हो गया, अत्रिजी उठकर दौड़े। उन्हें दौड़े आते देखकर श्रीरामजी और भी शीघ्रतासे चले आये। दण्डवत् करते हुए ही श्रीरामजीको [उठाकर] मुनिने हृदयसे लगा लिया और प्रेमाश्रुओंके जलसे दोनों जनोंको (दोनों भाइयोंको) नहला दिया ॥ ३ ॥
देखि राम छबि नयन जुड़ाने । सादर निज आश्रम तब आने ॥ करि पूजा कहि बचन सुहाए । दिए मूल फल प्रभु मन भाए ॥
- अरण्यकाण्ड *
६२३
श्रीरामजीकी छबि देखकर मुनिके नेत्र शीतल हो गये। तब वे उनको आदरपूर्वक अपने आश्रममें ले आये। पूजन करके सुन्दर वचन कहकर मुनिने मूल और फल दिये, जो प्रभुके मनको बहुत रुचे ॥ ४ ॥
सो०—प्रभु आसन आसीन भरि लोचन सोभा निरखि।
मुनिबर परम प्रबीन जोरि पानि अस्तुति करत ॥ ३ ॥
प्रभु आसनपर विराजमान हैं। नेत्र भरकर उनकी शोभा देखकर परम प्रवीण मुनिश्रेष्ठ हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे— ॥ ३ ॥
छं०—नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं।
भजामि ते पदांबुजं। अकामिनां स्वधामदं ॥ १ ॥
हे भक्तवत्सल! हे कृपालु! हे कोमल स्वभाववाले! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। निष्काम पुरुषोंको अपना परमधाम देनेवाले आपके चरणकमलोंको मैं भजता हूँ ॥ १ ॥
निकाम श्याम सुंदरं। भवांबुनाथ मंदरं।
प्रफुल्ल कंज लोचनं। मदादि दोष मोचनं ॥ २ ॥
आप नितान्त सुन्दर श्याम, संसार [आवागमन] रूपी समुद्रको मथनेके लिये मन्दराचलरूप, फूले हुए कमलके समान नेत्रोंवाले और मद आदि दोषोंसे छुड़ानेवाले हैं ॥ २ ॥
प्रलंब बाहु विक्रमं। प्रभोऽप्रमेय वैभवं।
निषंग चाप सायकं। धरं त्रिलोक नायकं ॥ ३ ॥
हे प्रभो! आपकी लंबी भुजाओंका पराक्रम और आपका ऐश्वर्य अप्रमेय (बुद्धिके परे अथवा असीम) है। आप तरकस और धनुष-बाण धारण करनेवाले तीनों लोकोंके स्वामी, ॥ ३ ॥
दिनेश वंश मंडनं। महेश चाप खंडनं।
मुनींद्र संत रंजनं। सुरारि वृंद भंजनं ॥ ४ ॥
सूर्यवंशके भूषण, महादेवजीके धनुषको तोड़नेवाले, मुनिराजों और संतोंको आनन्द देनेवाले तथा देवताओंके शत्रु असुरोंके समूहका नाश करनेवाले हैं ॥ ४ ॥
मनोज वैरि वंदितं। अजादि देव सेवितं।
विशुद्ध बोध विग्रहं। समस्त दूषणापहं ॥ ५ ॥
आप कामदेवके शत्रु महादेवजीके द्वारा वन्दित, ब्रह्मा आदि देवताओंसे सेवित, विशुद्ध ज्ञानमय विग्रह और समस्त दोषोंको नष्ट करनेवाले हैं ॥ ५ ॥
नमामि इंदिरा पतिं। सुखाकरं सतां गतिं।
भजे सशक्ति सानुजं। शची पति प्रियानुजं ॥ ६ ॥
६२४
- रामचरितमानस *
हे लक्ष्मीपते! हे सुर्योंकी खान और सत्यरुषोंकी एकमात्र गति! मैं आपको नमस्कार करता हूँ। हे शचीपति (इन्द्र) के प्रिय छोटे भाई (वामनजी)! स्वरूपा-शक्ति श्रीसीताजी और छोटे भाई लक्ष्मणजीसहित आपको मैं भजता हूँ॥ ६ ॥
त्वदंघ्रि मूल ये नराः। भजंति हीन मत्सराः। पतंति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि संकुले॥ ७ ॥
जो मनुष्य मत्सर (डाह) रहित होकर आपके चरणकमलोंका सेवन करते हैं, वे तर्क-वितर्क (अनेक प्रकारके सन्देह) रूपी तरङ्गोंसे पूर्ण संसाररूपी समुद्रमें नहीं गिरते (आवागमनके चक्करमें नहीं पड़ते)॥ ७ ॥
विविक्त वासिनः सदा। भजंति मुक्तये मुदा। निरस्य इंद्रियादिकं। प्रयांति ते गतिं स्वकं॥ ८ ॥
जो एकान्तवासी पुरुष मुक्तिके लिये, इंद्रियादिका निग्रह करके (उन्हें विषयोंसे हटाकर) प्रसन्नतापूर्वक आपको भजते हैं, वे स्वकीय गतिको (अपने स्वरूपको) प्राप्त होते हैं॥ ८ ॥
तमेकमद्भुतं प्रभुं। निरीहमीश्वरं विभुं। जगदुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलं॥ ९ ॥
उन (आप) को जो एक (अद्वितीय), अद्भुत (मायिक जगत्से विलक्षण), प्रभु (सर्वसमर्थ), इच्छारहित, ईश्वर (सबके स्वामी), व्यापक, जगदगुरु, सनातन (नित्य), तुरीय (तीनों गुणोंसे सर्वथा परे) और केवल (अपने स्वरूपमें स्थित) हैं॥ ९ ॥
भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभं। स्वभक्त कल्प पादपं। समं सुसेव्यमन्वहं॥ १० ॥
[तथा] जो भावप्रिय, कुयोगियों (विषयी पुरुषों)के लिये अत्यन्त दुर्लभ, अपने भक्तोंके लिये कल्पवृक्ष (अर्थात् उनकी समस्त कामनाओंको पूर्ण करनेवाले), सम (पक्षपातरहित) और सदा सुखपूर्वक सेवन करनेयोग्य हैं; मैं निरन्तर भजता हूँ॥ १० ॥
अनूप रूप भूपतिं। नतोऽहमूर्विजा पतिं। प्रसीद मे नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि मे॥ ११ ॥
हे अनुपम सुन्दर! हे पृथ्वीपति! हे जानकीनाथ! मैं आपको प्रणाम करता हूँ। मुझपर प्रसन्न होइये, मैं आपको नमस्कार करता हूँ। मुझे अपने चरणकमलोंकी भक्ति दीजिये॥ ११ ॥
पठंति ये स्तवं इदं। नरादरेण ते पदं। व्रजंति नात्र संशयं। त्वदीय भक्ति संयुताः॥ १२ ॥
जो मनुष्य इस स्तुतिको आदरपूर्वक पढ़ते हैं, वे आपकी भक्तिसे युक्त होकर आपके परमपदको प्राप्त होते हैं, इसमें सन्देह नहीं॥ १२ ॥
- अरण्यकाण्ड *
६२५
दो०—बिनती करि मुनि नाइ सिरु कह कर जोरि बहोरि।
चरन सरोरुह नाथ जनि कबहुँ तजै मति मोरि ॥ ४ ॥
मुनिने [इस प्रकार] विनती करके और फिर सिर नवाकर, हाथ जोड़कर कहा—हे नाथ! मेरी बुद्धि आपके चरणकमलोंको कभी न छोड़े ॥ ४ ॥
अनुसुइया के पद गहि सीता। मिली बहोरि सुसील बिनीता ॥ रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई। आसिष देइ निकट बैठाई ॥
फिर परम शीलवती और विनम्र श्रीसीताजी [अत्रिजीकी पत्नी] अनसूयाजीके चरण पकड़कर उनसे मिलीं। ऋषिपत्नीके मनमें बड़ा सुख हुआ। उन्होंने आशिष देकर सीताजीको पास बैठा लिया ॥ १ ॥
दिव्य बसन भूषण पहिराए। जे नित नूतन अमल सुहाए ॥ कह रिषिबधू सरस मृदु बानी। नारिधर्म कछु ब्याज बखानी ॥
और उन्हें ऐसे दिव्य वस्त्र और आभूषण पहनाये, जो नित्य-नये निर्मल और सुहावने बने रहते हैं। फिर ऋषिपत्नी उनके बहाने मधुर और कोमल वाणीसे स्त्रियोंके कुछ धर्म बखानकर कहने लगीं ॥ २ ॥
मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी ॥ अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेही ॥
हे राजकुमारी! सुनिये, माता, पिता, भाई सभी हित करनेवाले हैं, परन्तु ये सब एक सीमातक ही [सुख] देनेवाले हैं। परन्तु हे जानकी! पति तो [मोक्षरूप] असीम [सुख] देनेवाला है। वह स्त्री अधम है, जो ऐसे पतिकी सेवा नहीं करती ॥ ३ ॥
धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी ॥ बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अंध बधिर क्रोधी अति दीना ॥
धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री—इन चारोंकी विपत्तिके समय ही परीक्षा होती है। वृद्ध, रोगी, मूर्ख, निर्धन, अन्धा, बहरा, क्रोधी और अत्यन्त ही दीन— ॥ ४ ॥
ऐसेहु पति कर किऐँ अपमाना। नारि पाव जमपुर दुख नाना ॥ एकड़ धर्म एक व्रत नेमा। कार्यँ बचन मन पति पद प्रेमा ॥
ऐसे भी पतिका अपमान करनेसे स्त्री यमपुरमें भाँति-भाँतिके दुःख पाती है। शरीर, बचन और मनसे पतिके चरणोंमें प्रेम करना स्त्रीके लिये, बस, यह एक ही धर्म है, एक ही व्रत है और एक ही नियम है ॥ ५ ॥
६२६
- रामचरितमानस *
जग पतिव्रता चारि बिधि अहहीं। बेद पुरान संत सब कहहीं॥ उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहूँ आन पुरुष जग नाहीं॥
जगत्में चार प्रकारकी पतिव्रताएँ हैं वेद, पुराण और संत सब ऐसा कहते हैं कि उत्तम श्रेणीकी पतिव्रताके मनमें ऐसा भाव बसा रहता है कि जगत्में [मेरे पतिको छोड़कर] दूसरा पुरुष स्वप्रमं भी नहीं है ॥ ६ ॥
मध्यम परपति देखइ कैसें। भ्राता पिता पुत्र निज जैसें॥ धर्म बिचारि समुझि कुल रहई। सो निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कहई॥
मध्यम श्रेणीकी पतिव्रता पराये पतिको कैसे देखती है, जैसे वह अपना सगा भाई, पिता या पुत्र हो। (अर्थात् समान अवस्थावालेको वह भाईके रूपमें देखती है, बड़ेको पिताके रूपमें और छोटेको पुत्रके रूपमें देखती है।) जो धर्मको विचारकर और अपने कुलकी मर्यादा समझकर बची रहती है, वह निकृष्ट (निम्नश्रेणीकी) स्त्री है, ऐसा वेद कहते हैं ॥ ७ ॥
बिनु अवसर भय तें रह जोई। जानेहु अधम नारि जग सोई॥ पति बंचक परपति रति करई। रौरव नरक कल्प सत परई॥
और जो स्त्री मौका न मिलनेसे या भयवश पतिव्रता बनी रहती है, जगत्में उसे अधम स्त्री जानना। पतिको धोखा देनेवाली जो स्त्री पराये पतिसे रति करती है, वह तो सौ कल्पतक रौरव नरकमें पड़ी रहती है ॥ ८ ॥
छन सुख लागि जनम सत कोटी। दुख न समुझ तेहि सम को खोटी॥ बिनु श्रम नारि परम गति लहई। पतिव्रत धर्म छाड़ि छल गहई॥
क्षणभरके सुखके लिये जो सौ करोड़ (असंख्य) जन्मोंके दुःखको नहीं समझती, उसके समान दुष्टा कौन होगी। जो स्त्री छल छोड़कर पातिव्रत-धर्मको ग्रहण करती है, वह बिना ही परिश्रम परम गतिको प्राप्त करती है ॥ ९ ॥
पति प्रतिकूल जनम जहाँ जाई। बिधवा होइ पाड़ तरुनाई॥
किन्तु जो पतिके प्रतिकूल चलती है, वह जहाँ भी जाकर जन्म लेती है, वहीं जवानी पाकर (भरी जवानीमें) विधवा हो जाती है ॥ १० ॥
सो०— सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ।
जसु गावत श्रुति चारि अजहुँ तुलसिका हरिहि प्रिय ॥ ५ ( क ) ॥
स्त्री जन्मसे ही अपवित्र है, किन्तु पतिकी सेवा करके वह अनायास ही शुभ गति प्राप्त कर लेती है। [पातिव्रतधर्मके कारण ही] आज भी 'तुलसीजी' भगवान्को प्रिय हैं और चारों वेद उनका यश गाते हैं ॥ ५ ( क ) ॥