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श्रीरामचरितमानस

Shri Ramcharitmanas

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,058 पृष्ठ
  • उत्तरकाण्ड *

१३१

दो०—रमानाथ जहाँ राजा सो पुर बरनि कि जाइ। अनिमादिक सुख संपदा रहौँ अवध सब छाइ ॥ २९ ॥

स्वयं लक्ष्मीपति भगवान् जहाँ राजा हों, उस नगरका कहीं वर्णन किया जा सकता है? अणिमा आदि आठों सिद्धियों और समस्त सुख-सम्पत्तियाँ अयोध्यामें छा रही हैं ॥ २९ ॥

जहाँ तहाँ नर रघुपति गुन गावहिं। बैठि परसपर इहइ सिखावहिं ॥ भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि। सोभा सील रूप गुन धामहि ॥

लोग जहाँ-तहाँ श्रीरघुनाथजीके गुण गाते हैं और बैठकर एक-दूसरेको यही सीख देते हैं कि शरणागतका पालन करनेवाले श्रीरामजीको भजो; शोभा, शील, रूप और गुणोंके धाम श्रीरघुनाथजीको भजो ॥ १ ॥

जलज बिलोचन स्यामल गातहि। पलक नयन इव सेवक त्रातहि ॥ धृत सर रुचिर चाप तूनीरहि। संत कंज बन रबि रनधीरहि ॥

कमलनयन और साँवले शरीरवालेको भजो। पलक जिस प्रकार नेत्रोंकी रक्षा करते हैं उसी प्रकार अपने सेवकोंकी रक्षा करनेवालेको भजो। सुन्दर बाण, धनुष और तरकस धारण करनेवालेको भजो। संतरूपी कमलवनके [खिलानेके] लिये सूर्यरूप रणधीर श्रीरामजीको भजो ॥ २ ॥

काल कराल ब्याल खगराजहि। नमत राम अकाम ममता जहि ॥ लोभ मोह मृगजूथ किरातहि। मनसिज करि हरि जन सुखदातहि ॥

कालरूपी भयानक सर्पके भक्षण करनेवाले श्रीरामरूप गरुड़जीको भजो। निष्कामभावसे प्रणाम करते ही ममताका नाश कर देनेवाले श्रीरामजीको भजो। लोभ-मोहरूपी हरिनोंके समूहके नाश करनेवाले श्रीरामरूप किरातको भजो। कामदेवरूपी हाथीके लिये सिंहरूप तथा सेवकोंको सुख देनेवाले श्रीरामजीको भजो ॥ ३ ॥

संसय सोक निबिड़ तम भानुहि। दनुज गहन घन दहन कृसानुहि ॥ जनकसुता समेत रघुबीरहि। कस न भजहु भंजन भव भीरहि ॥

संशय और शोकरूपी घने अन्धकारके नाश करनेवाले श्रीरामरूप सूर्यको भजो। राक्षसरूपी घने वनको जलानेवाले श्रीरामरूप अग्निको भजो। जन्म-मृत्युके भयको नाश करनेवाले श्रीजानकीजीसमेत श्रीरघुवीरको क्यों नहीं भजते? ॥ ४ ॥

बहु बासना मसक हिम रासिहि। सदा एकरस अज अबिनासिहि ॥ मुनि रंजन भंजन महि भारहि। तुलसिदास के प्रभुहि उदारहि ॥

बहुत-सी वासनाओंरूपी मच्छरोंको नाश करनेवाले श्रीरामरूप हिमराशि (बर्फके ढेर) को भजो। नित्य एकरस, अजन्मा और अविनाशी श्रीरघुनाथजीको भजो। मुनियोंको आनन्द देनेवाले, पृथ्वीका भार उतारनेवाले और तुलसीदासके उदार (दयालु) स्वामी श्रीरामजीको भजो ॥ ५ ॥

१४०

  • रामचरितमानस *

दो०—एहि बिधि नगर नारि नर करहिं राम गुन गान। सानुकूल सब पर रहहिं संतत कृपानिधान ॥ ३० ॥

इस प्रकार नगरके स्त्री-पुरुष श्रीरामजीका गुण-गान करते हैं और कृपानिधान श्रीरामजी सदा सबपर अत्यन्त प्रसन्न रहते हैं ॥ ३० ॥

जब ते राम प्रताप खगेसा। उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा ॥ पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका। बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका ॥

[काकभुशुण्डिजी कहते हैं—] हे पक्षिराज गरुड़जी! जबसे रामप्रतापरूपी अत्यन्त प्रचण्ड सूर्य उदित हुआ, तबसे तीनों लोकोंमें पूर्ण प्रकाश भर गया है। इससे बहुतोंको सुख और बहुतोंके मनमें शोक हुआ ॥ १ ॥

जिन्हहि सोक ते कहउँ बखानी। प्रथम अबिद्या निसा नसानी ॥ अघ उलूक जहाँ तहाँ लुकाने। काम क्रोध कैरव सकुचाने ॥

जिन-जिनको शोक हुआ, उन्हें मैं बखानकर कहता हूँ। [सर्वत्र प्रकाश छा जानेसे] पहले तो अविद्यारूपी रात्रि नष्ट हो गयी। पापरूपी उलू जहाँ-तहाँ छिप गये और काम-क्रोधरूपी कुमुद मुँद गये ॥ २ ॥

बिबिध कर्म गुन काल सुभाऊ। ए चकोर सुख लहहिं न काऊ ॥ मत्सर मान मोह मद चोरा। इन्ह कर हुनर न कवनहिँ ओरा ॥

भाँति-भाँतिके [बन्धनकारक] कर्म, गुण, काल और स्वभाव—ये चकोर हैं, जो [रामप्रतापरूपी सूर्यके प्रकाशमें] कभी सुख नहीं पाते। मत्सर (डाह), मान, मोह और मदरूपी जो चोर हैं, उनका हुनर (कला) भी किसी ओर नहीं चल पाता ॥ ३ ॥

धरम तड़ाग ग्यान बिग्याना। ए पंकज बिकसे बिधि नाना ॥ सुख संतोष बिराग बिबेका। बिगत सोक ए कोक अनेका ॥

धर्मरूपी तालाबमें ज्ञान, विज्ञान—ये अनेकों प्रकारके कमल खिल उठे। सुख, संतोष, वैराग्य और विवेक—ये अनेकों चकवे शोकरहित हो गये ॥ ४ ॥

दो०—यह प्रताप रबि जाकें उर जब करइ प्रकास। पछिले बाढ़हिं प्रथम जे कहे ते पावहिं नास ॥ ३१ ॥

यह श्रीरामप्रतापरूपी सूर्य जिसके हृदयमें जब प्रकाश करता है, तब जिनका वर्णन पीछेसे किया गया है, वे (धर्म, ज्ञान, विज्ञान, सुख, सन्तोष, वैराग्य और विवेक) बढ़ जाते हैं और जिनका वर्णन पहले किया गया है, वे (अविद्या, पाप, काम, क्रोध, कर्म, काल, गुण, स्वभाव आदि) नाशको प्राप्त होते (नष्ट हो जाते) हैं ॥ ३१ ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१४१

भ्रातन्ह सहित रामु एक बारा । संग परम प्रिय पवनकुमारा ॥ सुंदर उपवन देखन गए । सब तरु कुसुमित पल्लव नए ॥

एक बार भाइयोंसहित श्रीरामचन्द्रजी परम प्रिय हनुमान्जीको साथ लेकर सुन्दर उपवन देखने गये। वहाँके सब वृक्ष फूले हुए और नये पत्तोंसे युक्त थे ॥ १ ॥

जानि समय सनकादिक आए । तेज पुंज गुन सील सुहाए ॥ ब्रह्मानन्द सदा लयलीना । देखत बालक बहुकालीना ॥

सुअवसर जानकर सनकादि मुनि आये, जो तेजके पुञ्ज, सुन्दर गुण और शीलसे युक्त तथा सदा ब्रह्मानन्दमें लवलीन रहते हैं। देखनेमें तो वे बालक लगते हैं, परन्तु हैं बहुत समयके ॥ २ ॥

रूप धरें जनु चारिउ बेदा । समदरसी मुनि बिगत बिभेदा ॥ आसा बसन व्यसन यह तिन्हहीं । रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं ॥

मानो चारों वेद ही बालकरूप धारण किये हों। वे मुनि समदर्शी और भेदरहित हैं। दिशाएँ ही उनके वस्त्र हैं। उनके एक ही व्यसन है कि जहाँ श्रीरघुनाथजीकी चरित्र-कथा होती है वहाँ जाकर वे उसे अवश्य सुनते हैं ॥ ३ ॥

तहाँ रहे सनकादि भवानी । जहँ घटसंभव मुनिबर ग्यानी ॥ राम कथा मुनिबर बहु बरनी । ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी ॥

[शिवजी कहते हैं—] हे भवानी! सनकादि मुनि वहाँ गये थे (वहींसे चले आ रहे थे) जहाँ ज्ञानी मुनिश्रेष्ठ श्रीअगस्त्यजी रहते थे। श्रेष्ठ मुनिने श्रीरामजीकी बहुत-सी कथाएँ वर्णन की थीं, जो ज्ञान उत्पन्न करनेमें उसी प्रकार समर्थ हैं, जैसे अरणि लकड़ीसे अग्नि उत्पन्न होती है ॥ ४ ॥

दो०—देखि राम मुनि आवत हरषि दंडवत कीन्ह।

स्वागत पूँछि पीत पट प्रभु बैठन कहँ दीन्ह ॥ ३२ ॥

सनकादि मुनियोंको आते देखकर श्रीरामचन्द्रजीने हर्षित होकर दण्डवत् की और स्वागत (कुशल) पूछकर प्रभुने [उनके] बैठनेके लिये अपना पीताम्बर बिछा दिया ॥ ३२ ॥

कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई । सहित पवनसुत सुख अधिकाई ॥ मुनि रघुपति छबि अतुल बिलोकी । भए मगन मन सके न रोकी ॥

फिर हनुमान्जीसहित तीनों भाइयोंने दण्डवत् की, सबको बड़ा सुख हुआ। मुनि श्रीरघुनाथजीकी अतुलनीय छबि देखकर उसीमें मग्न हो गये। वे मनको रोक न सके ॥ १ ॥

स्यामल गात सरोरुह लोचन । सुंदरता मंदिर भव मोचन ॥ एकटक रहे निमेष न लावहिं । प्रभु कर जोरें सीस नवावहिं ॥

१४२

  • रामचरितमानस *

वे जन्म-मृत्यु [के चक्र] से छुड़ानेवाले, श्यामशरीर, कमलनयन, सुन्दरताके धाम श्रीरामजीको टकटकी लगाये देखते ही रह गये, पलक नहीं मारते। और प्रभु हाथ जोड़े सिर नवा रहे हैं ॥ २ ॥

तिन्ह कै दसा देखि रघुबीरा । स्वत नयन जल पुलक सरीरा ॥ कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे । परम मनोहर बचन उचारे ॥

उनकी [प्रेमविह्वल] दशा देखकर [उन्हींकी भाँति] श्रीरघुनाथजीके नेत्रोंसे भी [प्रेमाश्रुओंका] जल बहने लगा और शरीर पुलकित हो गया। तदनन्तर प्रभुने हाथ पकड़कर श्रेष्ठ मुनियोंको बैठाया और परम मनोहर वचन कहे— ॥ ३ ॥

आजु धन्य मैं सुनहु मुनीसा । तुम्हरेँ दरस जाहिँ अघ खीसा ॥ बड़े भाग पाड़ब सतसंगा । बिनिहिँ प्रयास होहिँ भवभंगा ॥

हे मुनीश्वरो! सुनिये, आज मैं धन्य हूँ। आपके दर्शनोहीसे [सारे] पाप नष्ट हो जाते हैं। बड़े ही भाग्यसे सत्संगकी प्राप्ति होती है, जिससे बिना ही परिश्रम जन्म-मृत्युका चक्र नष्ट हो जाता है ॥ ४ ॥

दो०—संत संग अपर्ग कर कामी भव कर पंथ ।

कहहिँ संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ ॥ ३३ ॥

संतका संग मोक्ष (भव-बन्धनसे छूटने) का और कामीका संग जन्म-मृत्युके बन्धनमें पड़नेका मार्ग है। संत, कवि और पण्डित तथा वेद, पुराण [आदि] सभी सदग्रन्थ ऐसा कहते हैं ॥ ३३ ॥

सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी । पुलकित तन अस्तुति अनुसारी ॥ जय भगवंत अनंत अनामय । अनघ अनेक एक करुनामय ॥

प्रभुके वचन सुनकर चारों मुनि हर्षित होकर, पुलकित शरीरसे स्तुति करने लगे—हे भगवन्! आपकी जय हो। आप अन्तरहित, विकाररहित, पापरहित, अनेक (सब रूपोंमें प्रकट), एक (अद्वितीय) और करुणामय हैं ॥ १ ॥

जय निर्गुन जय जय गुन सागर । सुख मंदिर सुंदर अति नागर ॥ जय इंदिरा रमन जय भूधर । अनुपम अज अनादि सोभाकर ॥

हे निर्गुण! आपकी जय हो। हे गुणके समुद्र! आपकी जय हो, जय हो। आप सुखके धाम, [अत्यन्त] सुन्दर और अति चतुर हैं। हे लक्ष्मीपति! आपकी जय हो। हे पृथ्वीके धारण करनेवाले! आपकी जय हो। आप उपमारहित, अजन्मा, अनादि और शोभाकी खान हैं ॥ २ ॥

ग्यान निधान अमान मानप्रद । पावन सुजस पुरान बेद बद ॥ तग्य कृतग्य अग्यता भंजन । नाम अनेक अनाम निरंजन ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१४३

आप ज्ञानके भण्डार, [स्वयं] मानरहित और [दूसरोंको] मान देनेवाले हैं। वेद और पुराण आपका पावन सुन्दर यश गाते हैं। आप तत्त्वके जाननेवाले, की हुई सेवाको माननेवाले और अज्ञानका नाश करनेवाले हैं। हे निरञ्जन (मायारहित)! आपके अनेकों (अनन्त) नाम हैं और कोई नाम नहीं है (अर्थात् आप सब नामोंके परे हैं) ॥ ३ ॥

सर्वं सर्वगतं सर्वं उरालय । बससि सदा हम कहँ परिपालय ॥ द्वंद बिपति भव फंद बिभंजय । हृदि बसि राम काम मद गंजय ॥

आप सर्वरूप हैं, सबमें व्याप्त हैं और सबके हृदयरूपी घरमें सदा निवास करते हैं; [अतः] आप हमारा परिपालन कीजिये। [राग-द्वेष, अनुकूलता-प्रतिकूलता, जन्म-मृत्यु आदि] द्वन्द्व, बिपति और जन्म-मृत्युके जालको काट दीजिये। हे रामजी! आप हमारे हृदयमें बसकर काम और मदका नाश कर दीजिये ॥ ४ ॥

दो०—परमानंद कृपायतन मन परिपूर्ण काम । प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम ॥ ३४ ॥

आप परमानन्दस्वरूप, कृपाके धाम और मनकी कामनाओंको परिपूर्ण करनेवाले हैं। हे श्रीरामजी! हमको अपनी अविचल प्रेमा-भक्ति दीजिये ॥ ३४ ॥

देहु भगति रघुपति अति पावनि । त्रिबिधि ताप भव दाप नसावनि ॥ प्रनत काम सुरधेनु कलपतरु । होइ प्रसन्न दीजै प्रभु यह बरु ॥

हे रघुनाथजी! आप हमें अपनी अत्यन्त पवित्र करनेवाली और तीनों प्रकारके तापों और जन्म-मरणके क्लेशोंका नाश करनेवाली भक्ति दीजिये। हे शरणागतोंकी कामना पूर्ण करनेके लिये कामधेनु और कल्पवृक्षरूप प्रभो! प्रसन्न होकर हमें यही वर दीजिये ॥ १ ॥

भव बारिधि कुंभज रघुनायक । सेवत सुलभ सकल सुख दायक ॥ मन संभव दारुन दुख दारय । दीनबंधु समता बिस्तारय ॥

हे रघुनाथजी! आप जन्म-मृत्युरूप समुद्रको सोखनेके लिये अगस्त्य मुनिके समान हैं। आप सेवा करनेमें सुलभ हैं तथा सब सुखोंके देनेवाले हैं। हे दीनबन्धो! मनसे उत्पन्न दारुण दुःखोंका नाश कीजिये और [हममें] समदृष्टिका विस्तार कीजिये ॥ २ ॥

आस त्रास इरिषादि निवारक । विनय बिबेक बिरति बिस्तारक ॥ भूप मौलि मनि मंडन धरनी । देहि भगति संसृति सरि तरनी ॥

आप [विषयोंकी] आशा, भय और ईर्ष्या आदिके निवारण करनेवाले हैं तथा विनय, विवेक और वैराग्यके विस्तार करनेवाले हैं। हे राजाओंके शिरोमणि एवं पृथ्वीके भूषण श्रीरामजी! संसृति (जन्म-मृत्युके प्रवाह)-रूपी नदीके लिये नौकारूप अपनी भक्ति प्रदान कीजिये ॥ ३ ॥

मुनि मन मानस हंस निरंतर । चरन कमल बंदित अज संकर ॥ रघुकुल केतु सेतु श्रुति रच्छक । काल करम सुभाउ गुन भच्छक ॥

१४४

  • रामचरितमानस *

हे मुनियोंँके मनरूपी मानसरोवरमें निरन्तर निवास करनेवाले हंस! आपके चरणकमल ब्रह्माजी और शिवजीके द्वारा वन्दित हैं। आप रघुकुलके केतु, वेदमर्यादाके रक्षक और काल, कर्म, स्वभाव तथा गुण [—रूप बन्धनों] के भक्षक (नाशक) हैं ॥ ४ ॥

तारन तरन हरन सब दूषन। तुलसिदास प्रभु त्रिभुवन भूषन॥

आप तरन-तारन (स्वयं तेरे हुए और दूसरोंको तारनेवाले) तथा सब दोषोंको हरनेवाले हैं। तीनों लोकोंके विभूषण आप ही तुलसीदासके स्वामी हैं ॥ ५ ॥

दो०—बार बार अस्तुति करि प्रेम सहित सिरु नाइ।

ब्रह्म भवन सनकादि गे अति अभीष्ट बर पाइ॥ ३५ ॥

प्रेमसहित बार-बार स्तुति करके और सिर नवाकर तथा अपना अत्यन्त मनचाहा वर पाकर सनकादि मुनि ब्रह्मलोकको गये ॥ ३५ ॥

सनकादिक बिधि लोक सिधाए। भ्रातन्ह राम चरन सिर नाए॥

पूछत प्रभुहि सकल सकुचाहीं। चितवहिं सब मारुतसुत पाहीं॥

सनकादि मुनि ब्रह्मलोकको चले गये। तब भाइयोंने श्रीरामजीके चरणोंमें सिर नवाया। सब भाई प्रभुसे पूछते सकुचाते हैं। [इसलिये] सब हनुमान्जीकी ओर देख रहे हैं ॥ १ ॥

सुनी चहहिं प्रभु मुख कै बानी। जो सुनि होइ सकल भ्रम हानी॥

अंतरजामी प्रभु सभ जाना। बूझत कहहु काह हनुमाना॥

वे प्रभुके श्रीमुखकी वाणी सुनना चाहते हैं, जिसे सुनकर सारे भ्रमोंका नाश हो जाता है। अन्तर्यामी प्रभु सब जान गये और पूछने लगे—कहो हनुमान्! क्या बात है? ॥ २ ॥

जोरि पानि कह तब हनुमंता। सुनहु दीनदयाल भगवंता॥

नाथ भरत कछु पूँछन चहहीं। प्रस्न करत मन सकुचत अहहीं॥

तब हनुमान्जी हाथ जोड़कर बोले—हे दीनदयालु भगवान्! सुनिये। हे नाथ! भरतजी कुछ पूछना चाहते हैं, पर प्रश्न करते मनमें सकुचा रहे हैं ॥ ३ ॥

तुम्ह जानहु कपि मोर सुभाऊ। भरतहि मोहि कछु अंतर काऊ॥

सुनि प्रभु बचन भरत गहे चरना। सुनहु नाथ प्रनतारति हरना॥

[भगवान्ने कहा—] हनुमान्! तुम तो मेरा स्वभाव जानते ही हो। भरतके और मेरे बीचमें कभी भी कोई अन्तर (भेद) है? प्रभुके वचन सुनकर भरतजीने उनके चरण पकड़ लिये [और कहा—] हे नाथ! हे शरणागतके दुःखोंको हरनेवाले! सुनिये ॥ ४ ॥

दो०—नाथ न मोहि संदेह कछु सपनेहूँ सोक न मोह।

केवल कृपा तुम्हारिहि कृपानंद संदोह॥ ३६ ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१४५

हे नाथ! न तो मुझे कुछ सन्देह है और न स्वप्नमें भी शोक और मोह है। हे कृपा और आनन्दके समूह! यह केवल आपकी ही कृपाका फल है ॥ ३६ ॥

करउँ कृपानिधि एक ढिठाई। मैं सेवक तुम्ह जन सुखदाई॥ संतन्ह कै महिमा रघुराई। बहु बिधि बेद पुरानन्ह गाई॥

तथापि हे कृपानिधान! मैं आपसे एक धृष्टता करता हूँ। मैं सेवक हूँ और आप सेवकको सुख देनेवाले हैं [इससे मेरी धृष्टताको क्षमा कीजिये और मेरे प्रश्नका उत्तर देकर सुख दीजिये]। हे रघुनाथजी! वेद-पुराणोंने संतोंकी महिमा बहुत प्रकारसे गायी है ॥ १ ॥

श्रीमुख तुम्ह पुनि कीन्हि बड़ाई। तिन्ह पर प्रभुहि प्रीति अधिकाई॥ सुना चहउँ प्रभु तिन्ह कर लच्छन। कृपासिंधु गुन ग्यान बिचच्छन॥

आपने भी अपने श्रीमुखसे उनकी बड़ाई की है और उनपर प्रभु (आप) का प्रेम भी बहुत है। हे प्रभो! मैं उनके लक्षण सुनना चाहता हूँ। आप कृपाके समुद्र हैं और गुण तथा ज्ञानमें अत्यन्त निपुण हैं ॥ २ ॥

संत असंत भेद बिलगाई। प्रनतपाल मोहि कहहु बुझाई॥ संतन्ह के लच्छन सुनु भाता। अगनित श्रुति पुरान बिख्याता॥

हे शरणागतका पालन करनेवाले! संत और असंतके भेद अलग-अलग करके मुझको समझाकर कहिये। [श्रीरामजीने कहा—] हे भाई! संतोंके लक्षण (गुण) असंख्य हैं, जो वेद और पुराणोंमें प्रसिद्ध हैं ॥ ३ ॥

संत असंतन्हि कै असि करनी। जिमि कुठार चंदन आचरनी॥ काटइ परसु मलय सुनु भाई। निज गुन देइ सुगंध बसाई॥

संत और असंतोंकी करनी ऐसी है जैसे कुल्हाड़ी और चन्दनका आचरण होता है। हे भाई! सुनो, कुल्हाड़ी चन्दनको काटती है [क्योंकि उसका स्वभाव या काम ही वृक्षोंको काटना है]; किन्तु चन्दन [अपने स्वभाववश] अपना गुण देकर उसे (काटनेवाली कुल्हाड़ीको) सुगन्धसे सुवासित कर देता है ॥ ४ ॥

दो०—ताते सुर सीसन्ह चढ़त जग बल्लभ श्रीखंड।

अनल दाहि पीटत घनहिं परसु बदन यह दंड ॥ ३७ ॥

इसी गुणके कारण चन्दन देवताओंके सिरोंपर चढ़ता है और जगत्का प्रिय हो रहा है और कुल्हाड़ीके मुखको यह दण्ड मिलता है कि उसको आगमें जलाकर फिर घनसे पीटते हैं ॥ ३७ ॥

बिषय अलंपट सील गुनाकर। पर दुख दुख सुख सुख देखे पर॥ सम अभूतरिपु बिमद बिरागी। लोभामरष हरष भय त्यागी॥

१४६

  • रामचरितमानस *

संत विषयोंमें लम्पट (लिस) नहीं होते, शील और सदगुणोंकी खान होते हैं। उन्हें पराया दुःख देखकर दुःख और सुख देखकर सुख होता है। वे [सबमें, सर्वत्र, सब समय] समता रखते हैं, उनके मन कोई उनका शत्रु नहीं है, वे मदसे रहित और वैराग्यवान् होते हैं तथा लोभ, क्रोध, हर्ष और भयका त्याग किये हुए रहते हैं ॥ १ ॥

कोमलचित्त दीनन्ह पर दाय। मन बच क्रम मम भगति अमाया ॥ सबहि मानप्रद आपु अमानी। भरत प्रान सम मम ते प्रानी ॥

उनका चित्त बड़ा कोमल होता है। वे दीनोंपर दया करते हैं तथा मन, वचन और कर्मसे मेरी निष्कपट (विशुद्ध) भक्ति करते हैं। सबको सम्मान देते हैं, पर स्वयं मानरहित होते हैं। हे भरत! वे प्राणी (संतजन) मेरे प्राणोंके समान हैं ॥ २ ॥

बिगत काम मम नाम परायन। सांति बिरति बिनती मुदितायन ॥ शीतलता सरलता मयत्री। द्विज पद प्रीति धर्म जनयत्री ॥

उनको कोई कामना नहीं होती। वे मेरे नामके परायण होते हैं। शान्ति, वैराग्य, विनय और प्रसन्नताके घर होते हैं। उनमें शीतलता, सरलता, सबके प्रति मित्रभाव और ब्राह्मणके चरणोंमें प्रीति होती है, जो धर्मोंको उत्पन्न करनेवाली है ॥ ३ ॥

ए सब लच्छन बसहिं जासु उर। जानेहु तात संत संतत फुर ॥ सम दम नियम नीति नहिं डोलहिं। परुष बचन कबहुँ नहिं बोलहिं ॥

हे तात! ये सब लक्षण जिसके हृदयमें बसते हों, उसको सदा सच्चा संत जानना। जो शम (मनके निग्रह), दम (इन्द्रियोंके निग्रह), नियम और नीतिसे कभी विचलित नहीं होते और मुखसे कभी कठोर वचन नहीं बोलते; ॥ ४ ॥

दो०—निंदा अस्तुति उभय सम ममता मम पद कंज।

ते सज्जन मम प्रानप्रिय गुन मंदिर सुखपुंज ॥ ३८ ॥

जिन्हें निन्दा और स्तुति (बड़ाई) दोनों समान हैं और मेरे चरणकमलोंमें जिनकी ममता है, वे गुणोंके धाम और सुखकी राशि संतजन मुझे प्राणोंके समान प्रिय हैं ॥ ३८ ॥

सुनहु असंतन्ह केर सुभाऊ। भूलेहुँ संगति करिअ न काऊ ॥ तिन्ह कर संग सदा दुखदाई। जिमि कपिलहि घालइ हरहाई ॥

अब असंतों (दुष्टों) का स्वभाव सुनो; कभी भूलकर भी उनकी संगति नहीं करनी चाहिये। उनका संग सदा दुःख देनेवाला होता है। जैसे हरहाई (बुरी जातिकी) गाय कपिला (सीधी और दुधार) गायको अपने संगसे नष्ट कर डालती है ॥ १ ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१४७

खलन्ह हृदयँ अति ताप बिसेषी । जरहिं सदा पर संपति देखी ॥ जहँ कहँ निंदा सुनहिं पराई । हरषहिं मनहुँ परी निधि पाई ॥

दुष्टोंके हृदयमें बहुत अधिक संताप रहता है। वे परायी सम्पत्ति (सुख) देखकर सदा जलते रहते हैं। वे जहाँ कहीं दूसरेकी निन्दा सुन पाते हैं, वहाँ ऐसे हर्षित होते हैं मानो रास्तेमें पड़ी निधि (खजाना) पा ली हो ॥ २ ॥

काम क्रोध मद लोभ परायन । निर्दय कपटी कुटिल मलायन ॥ बयरु अकारन सब काहू सों । जो कर हित अनहित ताहू सों ॥

वे काम, क्रोध, मद और लोभके परायण तथा निर्दयी, कपटी, कुटिल और पापोंके घर होते हैं। वे बिना ही कारण सब किसीसे वैर किया करते हैं। जो भलाई करता है उसके साथ भी बुराई करते हैं ॥ ३ ॥

झूठइ लेना झूठइ देना । झूठइ भोजन झूठ चबेना ॥ बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा । खाइ महा अहि हृदय कठोरा ॥

उनका झूठा ही लेना और झूठा ही देना होता है। झूठा ही भोजन होता है और झूठा ही चबेना होता है (अर्थात् वे लेने-देनेके व्यवहारमें झूठका आश्रय लेकर दूसरोंका हक मार लेते हैं अथवा झूठी डींग हाँका करते हैं कि हमने लाखों रुपये ले लिये, करोड़ोंका दान कर दिया। इसी प्रकार खाते हैं चनेकी रोटी और कहते हैं कि आज खूब माल खाकर आये। अथवा चबेना चबाकर रह जाते हैं और कहते हैं हमें बढ़िया भोजनसे वैराग्य है, इत्यादि। मतलब यह कि वे सभी बातोंमें झूठ ही बोला करते हैं।) जैसे मोर [बहुत मीठा बोलता है, परन्तु उस] का हृदय ऐसा कठोर होता है कि वह महान् विषैले साँपोंको भी खा जाता है। वैसे ही वे भी ऊपरसे मीठे बचन बोलते हैं [परन्तु हृदयके बड़े ही निर्दयी होते हैं] ॥ ४ ॥

दो०—पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद । ते नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद ॥ ३९ ॥

वे दूसरोंसे द्रोह करते हैं और परायी स्त्री, पराये धन तथा परायी निन्दामें आसक्त रहते हैं। वे पामर और पापमय मनुष्य नर-शरीर धारण किये हुए राक्षस ही हैं ॥ ३९ ॥

लोभइ ओढ़न लोभइ डासन । सिस्त्रोदर पर जमपुर त्रास न ॥ काहू की जों सुनहिं बड़ाई । स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई ॥

लोभ ही उनका ओढ़ना और लोभ ही बिछौना होता है (अर्थात् लोभहीसे वे सदा घिरे हुए रहते हैं)। वे पशुओंके समान आहार और मैथुनके ही परायण होते हैं, उन्हें यमपुरका भय नहीं लगता। यदि किसीकी बड़ाई सुन पाते हैं, तो वे ऐसी [दुःखभरी] साँस लेते हैं मानो उन्हें जूड़ी आ गयी हो ॥ १ ॥

१४८

  • रामचरितमानस *

जब काहू कै देखहिं बिपती । सुखी भए मानहुँ जग नृपती ॥ स्वारथ रत परिवार बिरोधी । लंपट काम लोभ अति क्रोधी ॥

और जब किसीकी विपत्ति देखते हैं, तब ऐसे सुखी होते हैं मानो जगत्भरके राजा हो गये हों। वे स्वार्थपरायण, परिवारवालोंके विरोधी, काम और लोभके कारण लम्पट और अत्यन्त क्रोधी होते हैं ॥ २ ॥

मातु पिता गुर बिप्र न मानहिं । आपु गए अरु घालहिं आनहिं ॥ करहिं मोह बस द्रोह परावा । संत संग हरि कथा न भावा ॥

वे माता, पिता, गुरु और ब्राह्मण किसीको नहीं मानते। आप तो नष्ट हुए ही रहते हैं, [साथ ही अपने संगसे] दूसरोंको भी नष्ट करते हैं। मोहवश दूसरोंसे द्रोह करते हैं। उन्हें न संतोंका संग अच्छा लगता है, न भगवान्की कथा ही सुहाती है ॥ ३ ॥

अवगुन सिंधु मंदमति कामी । बेद बिदूषक परधन स्वामी ॥ बिप्र द्रोह पर द्रोह बिसेषा । दंभ कपट जियँ धरें सुबेषा ॥

वे अवगुणोंके समुद्र, मन्दबुद्धि, कामी (रागयुक्त), वेदोंके निन्दक और जबर्दस्ती पराये धनके स्वामी (लूटनेवाले) होते हैं। वे दूसरोंसे द्रोह तो करते ही हैं; परन्तु ब्राह्मण-द्रोह विशेषतासे करते हैं। उनके हृदयमें दम्भ और कपट भरा रहता है, परन्तु वे [ऊपरसे] सुन्दर वेष धारण किये रहते हैं ॥ ४ ॥

दो०—ऐसे अधम मनुज खल कृतजुग त्रेताँ नाहिं।

द्वापर कछुक बृंद बहु होइहहिं कलिजुग माहिं ॥ ४० ॥

ऐसे नीच और दुष्ट मनुष्य सत्ययुग और त्रेतामें नहीं होते। द्वापरमें थोड़े-से होंगे और कलियुगमें तो इनके झुंड-के-झुंड होंगे ॥ ४० ॥

पर हित सरिस धर्म नहिं भाई । पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ॥ निर्नय सकल पुरान बेद कर । कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर ॥

हे भाई! दूसरोंकी भलाईके समान कोई धर्म नहीं है और दूसरोंको दुःख पहुँचानेके समान कोई नीचता (पाप) नहीं है। हे तात! समस्त पुराणों और वेदोंका यह निर्णय (निश्चित सिद्धान्त) मैंने तुमसे कहा है, इस बातको पण्डितलोग जानते हैं ॥ १ ॥

नर सरीर धरि जे पर पीरा । करहिं ते सहहिं महा भव भीरा ॥ करहिं मोह बस नर अघ नाना । स्वार्थ रत परलोक नसाना ॥

मनुष्यका शरीर धारण करके जो लोग दूसरोंको दुःख पहुँचाते हैं, उनको जन्म-मृत्युके महान् संकट सहने पड़ते हैं। मनुष्य मोहवश स्वार्थपरायण होकर अनेकों पाप करते हैं, इसीसे उनका परलोक नष्ट हुआ रहता है ॥ २ ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१४१

कालरूप तिन्ह कहैं मैं भ्राता । सुभ अरु असुभ कर्म फल दाता ॥ अस बिचारि जे परम सयाने । भजहिं मोहि संसृत दुख जाने ॥

हे भाई! मैं उनके लिये कालरूप (भयंकर) हूँ और उनके अच्छे और बुरे कर्मोंका [यथायोग्य] फल देनेवाला हूँ! ऐसा विचारकर जो लोग परम चतुर हैं वे संसार [के प्रवाह] को दुःखरूप जानकर मुझे ही भजते हैं ॥ ३ ॥

त्यागहिं कर्म सुभासुभ दायक । भजहिं मोहि सुर नर मुनि नायक ॥ संत असंतन्ह के गुन भाषे । ते न परहिं भव जिन्ह लखि राखे ॥

इसीसे वे शुभ और अशुभ फल देनेवाले कर्मोंको त्याग कर देवता, मनुष्य और मुनियोंके नायक मुझको भजते हैं। [इस प्रकार] मैंने संतों और असंतोंके गुण कहे। जिन लोगोंने इन गुणोंको समझ रखा है, वे जन्म-मरणके चक्करमें नहीं पड़ते ॥ ४ ॥

दो०— सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक ।

गुन यह उभय न देखिअहिं देखिअ सो अबिबेक ॥ ४१ ॥

हे तात! सुनो, मायासे रचे हुए ही अनेक (सब) गुण और दोष हैं (इनकी कोई वास्तविक सत्ता नहीं है)। गुण (विवेक) इसीमें है कि दोनों ही न देखे जायँ, इन्हें देखना ही अविवेक है ॥ ४१ ॥

श्रीमुख बचन सुनत सब भाई । हरषे प्रेम न हृदयँ समाई ॥ करहिं बिनय अति बारहिं बारा । हनुमान हियँ हरष अपारा ॥

भगवान्के श्रीमुखसे ये वचन सुनकर सब भाई हर्षित हो गये। प्रेम उनके हृदयोंमें समाता नहीं। वे बार-बार बड़ी विनती करते हैं। विशेषकर हनुमान्जीके हृदयमें अपार हर्ष है ॥ १ ॥

पुनि रघुपति निज मंदिर गए । एहि बिधि चरित करत नित नए ॥ बार बार नारद मुनि आवहिं । चरित पुनीत राम के गावहिं ॥

तदनन्तर श्रीरामचन्द्रजी अपने महलको गये। इस प्रकार वे नित्य नयी लीला करते हैं। नारद मुनि अयोध्यामें बार-बार आते हैं और आकर श्रीरामजीके पवित्र चरित्र गाते हैं ॥ २ ॥

नित नव चरित देखि मुनि जाहीं । ब्रह्मलोक सब कथा कहाहीं ॥ सुनि बिरंचि अतिसय सुख मानहिं । पुनि पुनि तात करहु गुन गानहिं ॥

मुनि यहाँसे नित्य नये-नये चरित्र देखकर जाते हैं और ब्रह्मलोकमें जाकर सब कथा कहते हैं। ब्रह्माजी सुनकर अत्यन्त सुख मानते हैं [और कहते हैं—] हे तात! बार-बार श्रीरामजीके गुणोंका गान करो ॥ ३ ॥

सनकादिक नारदहि सराहिं । जद्यपि ब्रह्म निरत मुनि आहिं ॥ सुनि गुन गान समाधि बिसारी । सादर सुनहिं परम अधिकारी ॥

१५०

  • रामचरितमानस *

सनकादि मुनि नारदजीकी सराहना करते हैं। यद्यपि वे (सनकादि) मुनि ब्रह्मनिष्ठ हैं, परन्तु श्रीरामजीका गुणगान सुनकर वे भी अपनी ब्रह्मसमाधिको भूल जाते हैं और आदरपूर्वक उसे सुनते हैं। वे [रामकथा सुननेके] श्रेष्ठ अधिकारी हैं ॥४॥

दो०—जीवनमुक्त ब्रह्मपर चरित सुनहिं तजि ध्यान।

जे हरि कथाँ न करहिं रति तिन्ह के हिय पाषान ॥ ४२ ॥

सनकादि मुनि-जैसे जीवनमुक्त और ब्रह्मनिष्ठ पुरुष भी ध्यान (ब्रह्म-समाधि) छोड़कर श्रीरामजीके चरित्र सुनते हैं। यह जानकर भी जो श्रीहरिकी कथासे प्रेम नहीं करते, उनके हृदय [सचमुच ही] पत्थर [के समान] हैं ॥४२॥

एक बार रघुनाथ बोलाए। गुर द्विज पुरबासी सब आए॥ बैठे गुर मुनि अरु द्विज सज्जन। बोले बचन भगत भव भंजन॥

एक बार श्रीरघुनाथजीके बुलाये हुए गुरु वसिष्ठजी, ब्राह्मण और अन्य सब नगरनिवासी सभामें आये। जब गुरु, मुनि, ब्राह्मण तथा अन्य सब सज्जन यथायोग्य बैठ गये, तब भक्तोंके जन्म-मरणको मिटानेवाले श्रीरामजी वचन बोले— ॥१॥

सुनहु सकल पुरजन मम बानी। कहउँ न कछु ममता उर आनी॥ नहिं अनीति नहिं कछु प्रभुताई। सुनहु करहु जो तुम्हहि सोहाई॥

हे समस्त नगरनिवासियो! मेरी बात सुनिये। यह बात मैं हृदयमें कुछ ममता लाकर नहीं कहता हूँ। न अनीतिकी बात कहता हूँ और न इसमें कुछ प्रभुता ही है। इसलिये [संकोच और भय छोड़कर, ध्यान देकर] मेरी बातोंको सुन लो और [फिर] यदि तुम्हें अच्छी लगे, तो उसके अनुसार करो! ॥२॥

सोइ सेवक प्रियतम मम सोई। मम अनुसासन मानै जोई॥ जों अनीति कछु भाषों भाई। तौ मोहि बरजहु भय बिसराई॥

वही मेरा सेवक है और वही प्रियतम है, जो मेरी आज्ञा माने। हे भाई! यदि मैं कुछ अनीतिकी बात कहूँ तो भय भुलाकर (बेखटके) मुझे रोक देना ॥३॥

बड़ें भाग मानुष तनु पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा॥ साधन धाम मोच्छ कर द्वारा। पाड़ न जेहिं परलोक सँवारा॥

बड़े भाग्यसे यह मनुष्यशरीर मिला है। सब ग्रन्थोंने यही कहा है कि यह शरीर देवताओंको भी दुर्लभ है (कठिनतासे मिलता है)। यह साधनका धाम और मोक्षका दरवाजा है। इसे पाकर भी जिसने परलोक न बना लिया, ॥४॥

  • उत्तरकाण्ड *

१५१

दो०—सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ। कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोस लगाइ ॥ ४३ ॥

वह परलोकमें दुःख पाता है, सिर पीट-पीटकर पछताता है तथा [अपना दोष न समझकर] कालपर, कर्मपर और ईश्वरपर मिथ्या दोष लगाता है ॥ ४३ ॥

एहि तन कर फल बिषय न भाई। स्वर्गाउ स्वल्प अंत दुखदाई ॥ नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं। पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं ॥

हे भाई! इस शरीरके प्राप्त होनेका फल विषयभोग नहीं है। [इस जगत्के भोगोंकी तो बात ही क्या] स्वर्गका भोग भी बहुत थोड़ा है और अन्तमें दुःख देनेवाला है। अतः जो लोग मनुष्यशरीर पाकर विषयोंमें मन लगा देते हैं, वे मूर्ख अमृतको बदलकर विष ले लेते हैं ॥ १ ॥

ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई। गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई ॥ आकर चारि लच्छ चौरासी। जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी ॥

जो पारसमणिको खोकर बदलेमें घुँघची ले लेता है, उसको कभी कोई भला (बुद्धिमान्) नहीं कहता। यह अविनाशी जीव [अण्डज, स्वेदज, जरायुज और उद्भिज] चार खानों और चौरासी लाख योनियोंमें चक्कर लगाता रहता है ॥ २ ॥

फिरत सदा माया कर प्रेरा। काल कर्म सुभाव गुन घेरा ॥ कबहुँक करि करुना नर देही। देत ईस बिनु हेतु सनेही ॥

मायाकी प्रेरणासे काल, कर्म, स्वभाव और गुणसे घिरा हुआ (इनके वशमें हुआ) यह सदा भटकता रहता है। बिना ही कारण स्नेह करनेवाले ईश्वर कभी विरले ही दया करके इसे मनुष्यका शरीर देते हैं ॥ ३ ॥

नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो। सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो ॥ करनधार सदगुर दृढ़ नावा। दुर्लभ साज सुलभ करि पावा ॥

यह मनुष्यका शरीर भवसागर [से तारने] के लिये बेड़ा (जहाज) है। मेरी कृपा ही अनुकूल वायु है। सदगुरु इस मजबूत जहाजके कर्णधार (खेनेवाले) हैं। इस प्रकार दुर्लभ (कठिनासे मिलनेवाले) साधन सुलभ होकर (भगवत्कृपासे सहज ही) उसे प्राप्त हो गये हैं, ॥ ४ ॥

दो०—जो न तैरै भव सागर नर समाज अस पाइ। सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ ॥ ४४ ॥

जो मनुष्य ऐसे साधन पाकर भी भवसागरसे न तरे, वह कृतघ्न और मन्द-बुद्धि है और आत्महत्या करनेवालेकी गतिको प्राप्त होता है ॥ ४४ ॥

१५२

  • रामचरितमानस *

जों परलोक इहाँ सुख चहहू। सुनि मम बचन हदयँ दूढ़ गहहू॥ सुलभ सुखद मारग यह भाई। भगति मोरि पुरान श्रुति गाई॥

यदि परलोकमें और यहाँ दोनों जगह सुख चाहते हो, तो मेरे बचन सुनकर उन्हें हृदयमें दृढ़तासे पकड़ रखो। हे भाई! यह मेरी भक्तिका मार्ग सुलभ और सुखदायक है, पुराणों और वेदोंने इसे गाया है ॥ १ ॥

ग्यान अगम प्रत्यूह अनेका। साधन कठिन न मन कहुँ टेका॥ करत कष्ट बहु पावइ कोऊ। भक्ति हीन मोहि प्रिय नहीं सोऊ॥

ज्ञान अगम (दुर्गम) है, [और] उसकी प्राप्तिमें अनेकों विघ्न हैं। उसका साधन कठिन है और उसमें मनके लिये कोई आधार नहीं है। बहुत कष्ट करनेपर कोई उसे पा भी लेता है, तो वह भी भक्तिरहित होनेसे मुझको प्रिय नहीं होता ॥ २ ॥

भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी। बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी॥ पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता। सतसंगति संसृति कर अंता॥

भक्ति स्वतन्त्र है और सब सुखोंकी खान है। परन्तु सत्संग (संतोंके संग) के बिना प्राणी इसे नहीं पा सकते। और पुण्यसमूहके बिना संत नहीं मिलते। सत्संगति ही संसृति (जन्म-मरणके चक्र)का अन्त करती है ॥ ३ ॥

पुन्य एक जग महुँ नहीं दूजा। मन क्रम बचन बिप्र पद पूजा॥ सानुकूल तेहि पर मुनि देवा। जो तजि कपटु करइ द्विज सेवा॥

जगत्में पुण्य एक ही है, [उसके समान] दूसरा नहीं। वह है—मन, कर्म और बचनसे ब्राह्मणोंके चरणोंकी पूजा करना। जो कपटका त्याग करके ब्राह्मणोंकी सेवा करता है, उसपर मुनि और देवता प्रसन्न रहते हैं ॥ ४ ॥

दो०—औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउँ कर जोरि।

संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि॥ ४५ ॥

और भी एक गुप्त मत है, मैं उसे सबसे हाथ जोड़कर कहता हूँ कि शङ्करजीके भजन बिना मनुष्य मेरी भक्ति नहीं पाता ॥ ४५ ॥

कहहु भगति पथ कवन प्रयासा। जोग न मख जप तप उपवासा॥ सरल सुभाव न मन कुटिलाई। जथा लाभ संतोष सदाई॥

कहो तो, भक्तिमार्गमें कौन-सा परिश्रम है? इसमें न योगकी आवश्यकता है, न यज्ञ, जप, तप और उपवासकी! [यहाँ इतना ही आवश्यक है कि] सरल स्वभाव हो, मनमें कुटिलता न हो और जो कुछ मिले उसीमें सदा सन्तोष रखे ॥ १ ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१५३

मोर दास कहाइ नर आसा । करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा ॥ बहुत कहउँ का कथा बढाई । एहि आचरण बस्य मैं भाई ॥

मेरा दास कहलाकर यदि कोई मनुष्योंकी आशा करता है, तो तुम्हीं कहो, उसका क्या विश्वास है ? (अर्थात् उसकी मुझपर आस्था बहुत ही निर्बल है ।) बहुत बात बढ़ाकर क्या कहूँ ? हे भाइयो ! मैं तो इसी आचरणके वशमें हूँ ॥ २ ॥

बैर न बिग्रह आस न त्रासा । सुखमय ताहि सदा सब आसा ॥ अनारंभ अनिकेत अमानी । अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी ॥

न किसीसे वैर करे, न लड़ाई-झगडा करे, न आशा रखे, न भय ही करे । उसके लिये सभी दिशाएँ सदा सुखमयी हैं । जो कोई भी आरम्भ (फलकी इच्छासे कर्म) नहीं करता, जिसका कोई अपना घर नहीं है (जिसकी घरमें ममता नहीं है), जो मानहीन, पापहीन और क्रोधहीन है, जो [भक्ति करनेमें] निपुण और विज्ञानवान् है ॥ ३ ॥

प्रीति सदा सज्जन संसर्गा । तून सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा ॥ भगति पच्छ हठ नहिं सठताई । दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई ॥

संतजनोंके संसर्ग (सत्संग) से जिसे सदा प्रेम है, जिसके मनमें सब विषय यहाँतक कि स्वर्ग और मुक्तितक [भक्तिके सामने] तृणके समान हैं, जो भक्तिके पक्षमें हठ करता है, पर [दूसरेके मतका खण्डन करनेकी] मूर्खता नहीं करता तथा जिसने सब कुतर्कोंको दूर बहा दिया है, ॥ ४ ॥

दो०—मम गुन ग्राम नाम रत गत ममता मद मोह । ता कर सुख सोइ जानइ परानंद संदोह ॥ ४६ ॥

जो मेरे गुणसमूहोंके और मेरे नामके परायण है, एवं ममता, मद और मोहसे रहित है, उसका सुख वही जानता है, जो [परमात्मरूप] परमानन्दराशिको प्राप्त है ॥ ४६ ॥

सुनत सुधासम बचन राम के । गहे सबनि पद कृपाधाम के ॥ जननि जनक गुर बंधु हमारे । कृपा निधान प्रान ते प्यारे ॥

श्रीरामचन्द्रजीके अमृतके समान बचन सुनकर सबने कृपाधामके चरण पकड़ लिये [और कहा—] हे कृपानिधान ! आप हमारे माता, पिता, गुरु, भाई सब कुछ हैं और प्राणोंसे भी अधिक प्रिय हैं ॥ १ ॥

तनु धनु धाम राम हितकारी । सब बिधि तुम्ह प्रनतारति हारी ॥ असि सिख तुम्ह बिनु देइ न कोऊ । मातु पिता स्वारथ रत ओऊ ॥

१५४

  • रामचरितमानस *

और हे शरणागतके दुःख हरनेवाले रामजी! आप ही हमारे शरीर, धन, घर-द्वार और सभी प्रकारसे हित करनेवाले हैं। ऐसी शिक्षा आपके अतिरिक्त कोई नहीं दे सकता। माता-पिता [हितैषी हैं और शिक्षा भी देते हैं] परन्तु वे भी स्वार्थपरायण हैं [इसलिये ऐसी परम हितकारी शिक्षा नहीं देते] ॥ २ ॥

हेतु रहित जग जुग उपकारी । तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी ॥ स्वारथ मीत सकल जग माहीं । सपनेहूँ प्रभु परमारथ नाहीं ॥

हे असुरोंके शत्रु! जगत्में बिना हेतुके (निःस्वार्थ) उपकार करनेवाले तो दो ही हैं—एक आप, दूसरे आपके सेवक। जगत्में [शेष] सभी स्वार्थके मित्र हैं। हे प्रभो! उनमें स्वप्नमें भी परमार्थका भाव नहीं है ॥ ३ ॥

सब के बचन प्रेम रस साने । सुनि रघुनाथ हृदयँ हरषाने ॥ निज निज गृह गए आयसु पाई । बरनत प्रभु बतकही सुहाई ॥

सबके प्रेमरसमें सने हुए वचन सुनकर श्रीरघुनाथजी हृदयमें हर्षित हुए। फिर आज्ञा पाकर सब प्रभुकी सुन्दर बातचीतका वर्णन करते हुए अपने-अपने घर गये ॥ ४ ॥

दो०—उमा अवधबासी नर नारि कृत्तारथ रूप । ब्रह्म सच्चिदानंद घन रघुनायक जहाँ भूप ॥ ४७ ॥

[शिवजी कहते हैं—] हे उमा! अयोध्यामें रहनेवाले पुरुष और स्त्री सभी कृत्तार्थस्वरूप हैं; जहाँ स्वयं सच्चिदानन्दघन ब्रह्म श्रीरघुनाथजी राजा हैं ॥ ४७ ॥

एक बार बसिष्ठ मुनि आए । जहाँ राम सुखधाम सुहाए ॥ अति आदर रघुनायक कीन्हा । पद पखारि पादोदक लीन्हा ॥

एक बार मुनि बसिष्ठजी वहाँ आये जहाँ सुन्दर सुखके धाम श्रीरामजी थे। श्रीरघुनाथजीने उनका बहुत ही आदर-सत्कार किया और उनके चरण धोकर चरणामृत लिया ॥ १ ॥

राम सुनहु मुनि कह कर जोरी । कृपासिंधु बिनती कछु मोरी ॥ देखि देखि आचरन तुम्हारा । होत मोह मम हृदयँ अपारा ॥

मुनिने हाथ जोड़कर कहा—हे कृपासागर श्रीरामजी! मेरी कुछ विनती सुनिये! आपके आचरणों (मनुष्योचित चरित्रों) को देख-देखकर मेरे हृदयमें अपार मोह (भ्रम) होता है ॥ २ ॥

महिमा अमिति बेद नहीं जाना । मैं केहि भाँति कहउँ भगवाना ॥ उपरोहित्य कर्म अति मंदा । बेद पुरान सुमृति कर निंदा ॥

हे भगवन्! आपकी महिमाकी सीमा नहीं है, उसे वेद भी नहीं जानते। फिर मैं किस प्रकार कह सकता हूँ? पुरोहितीका कर्म (पेशा) बहुत ही नीचा है। वेद, पुराण और स्मृति सभी इसकी निन्दा करते हैं ॥ ३ ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१५५

जब न लेउँ मैं तब बिधि मोही । कहा लाभ आगें सुत तोही ॥ परमात्मा ब्रह्म नर रूपा । होइहि रघुकुल भूषण भूपा ॥

जब मैं उसे (सूर्यवंशकी पुरोहितीका काम) नहीं लेता था, तब ब्रह्माजीने मुझे कहा था—हे पुत्र! इससे तुमको आगे चलकर बहुत लाभ होगा। स्वयं ब्रह्म परमात्मा मनुष्यरूप धारण कर रघुकुलके भूषण राजा होंगे ॥ ४ ॥

दो०—तब मैं हृदयँ बिचारा जोग जग्य ब्रत दान। जा कहँ करिअ सो पैहउँ धर्म न एहि सम आन ॥ ४८ ॥

तब मैंने हृदयमें विचार किया कि जिसके लिये योग, यज्ञ, ब्रत और दान किये जाते हैं, उसे मैं इसी कर्मसे पा जाऊँगा; तब तो इसके समान दूसरा कोई धर्म ही नहीं है ॥ ४८ ॥

जप तप नियम जोग निज धर्मा । श्रुति संभव नाना सुभ कर्मा ॥ ग्यान दया दम तीरथ मज्जन । जहँ लगि धर्म कहत श्रुति सज्जन ॥

जप, तप, नियम, योग, अपने-अपने [वर्णाश्रमके] धर्म, श्रुतियोंसे उत्पन्न (वेदविहित) बहुत-से शुभ कर्म, ज्ञान, दया, दम (इन्द्रियनिग्रह), तीर्थस्नान आदि जहाँतक वेद और संतजनोंने धर्म कहे हैं [उनके करनेका]— ॥ १ ॥

आगम निगम पुरान अनेका । पढ़े सुने कर फल प्रभु एका ॥ तव पद पंकज प्रीति निरंतर । सब साधन कर यह फल सुंदर ॥

[तथा] हे प्रभो! अनेक तन्त्र, वेद और पुराणोंके पढ़ने और सुनेका सर्वोत्तम फल एक ही है और सब साधनोंका भी यही एक सुन्दर फल है कि आपके चरणकमलोंमें सदा-सर्वदा प्रेम हो ॥ २ ॥

छूटइ मल कि मलहि के धोएँ । घृत कि पाव कोइ बारि बिलोएँ ॥ प्रेम भगति जल बिनु रघुराई । अभिअंतर मल कबहँ न जाई ॥

मैंलसे धोनेसे क्या मैल छूटता है? जलके मथनेसे क्या कोई घी पा सकता है? [उसी प्रकार] हे रघुनाथजी! प्रेम-भक्तिरूपी [निर्मल] जलके बिना अन्तःकरणका मल कभी नहीं जाता ॥ ३ ॥

सोइ सर्वग्य तग्य सोइ पंडित । सोइ गुन गूह बिग्यान अखंडित ॥ दच्छ सकल लच्छन जुत सोई । जाकें पद सरोज रति होई ॥

वही सर्वज्ञ है, वही तत्त्वज्ञ और पण्डित है, वही गुणोंका घर और अखण्ड विज्ञानवान् है; वही चतुर और सब सुलक्षणोंसे युक्त है, जिसका आपके चरणकमलोंमें प्रेम है ॥ ४ ॥

१५६

  • रामचरितमानस *

दो०—नाथ एक बार मागउँ राम कृपा करि देहु। जन्म जन्म प्रभु पद कमल कबहुँ घटै जनि नेहु ॥ ४९ ॥

हे नाथ! हे श्रीरामजी! मैं आपसे एक बार माँगता हूँ, कृपा करके दीजिये। प्रभु (आप) के चरणकमलोंमें मेरा प्रेम जन्म-जन्मान्तरमें भी कभी न घटे ॥ ४९ ॥

अस कहि मुनि बसिष्ठ गृह आए । कृपासिंधु के मन अति भाए ॥ हनुमान भरतादिक भ्राता । संग लिए सेवक सुखदाता ॥

ऐसा कहकर मुनि बसिष्ठजी घर आये। वे कृपासागर श्रीरामजीके मनको बहुत ही अच्छे लगे। तदनन्तर सेवकोंको सुख देनेवाले श्रीरामजीने हनुमान्जी तथा भरतजी आदि भाइयोंको साथ लिया ॥ १ ॥

पुनि कृपाल पुर बाहेर गए । गज रथ तुरग मगावत भए ॥ देखि कृपा करि सकल सराहे । दिए उचित जिन्ह जिन्ह तेइ चाहे ॥

और फिर कृपालु श्रीरामजी नगरके बाहर गये और वहाँ उन्होंने हाथी, रथ और घोड़े मँगाये। उन्हें देखकर, कृपा करके प्रभुने सबकी सराहना की और उनको जिस-जिसने चाहा, उस-उसको उचित जानकर दिया ॥ २ ॥

हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई । गए जहाँ सीतल अवैराई ॥ भरत दीन्ह निज बसन डसाई । बैठे प्रभु सेवहिं सब भाई ॥

संसारके सभी श्रमोंको हरनेवाले प्रभुने [हाथी, घोड़े आदि बाँटनेमें] श्रमका अनुभव किया और [श्रम मिटानेको] वहाँ गये जहाँ सीतल अमराई (आमोंका बगीचा) थी। वहाँ भरतजीने अपना वस्त्र बिछा दिया। प्रभु उसपर बैठ गये और सब भाई उनकी सेवा करने लगे ॥ ३ ॥

मारुतसुत तब मारुत करई । पुलक बपुष लोचन जल भरई ॥ हनुमान सम नहीं बड़भागी । नहीं कोउ राम चरन अनुरागी ॥ गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई । बार बार प्रभु निज मुख गाई ॥

उस समय पवनपुत्र हनुमान्जी पवन (पंखा) करने लगे। उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया। [शिवजी कहने लगे—] हे गिरिजे! हनुमान्जीके समान न तो कोई बड़भागी है और न कोई श्रीरामजीके चरणोंका प्रेमी ही है, जिनके प्रेम और सेवाकी [स्वयं] प्रभुने अपने श्रीमुखसे बार-बार बढ़ाई की है ॥ ४-५ ॥

दो०—तेहिं अवसर मुनि नारद आए करतल बीन। गावन लगे राम कल कीरति सदा नबीन ॥ ५० ॥

  • उत्तरकाण्ड *

१५७

उसी अवसरपर नारद मुनि हाथमें बीणा लिये हुए आये। वे श्रीरामजीकी सुन्दर और नित्य नवीन रहनेवाली कीर्ति गाने लगे ॥५०॥

मामवलोक्य पंकज लोचन । कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन ॥ नील तामरस स्याम काम अरि । हृदय कंज मकरंद मधुप हरि ॥

कृपापूर्वक देख लेनेमात्रसे शोकके छुड़ानेवाले हे कमलनयन! मेरी ओर देखिये (मुझपर भी कृपादृष्टि कीजिये)। हे हरि! आप नील कमलके समान श्यामवर्ण और कामदेवके शत्रु महादेवजीके हृदयकमलके मकरन्द (प्रेम-रस) के पान करनेवाले भ्रमर हैं ॥ १ ॥

जातुधान बरुथ बल भंजन । मुनि सज्जन रंजन अघ गंजन ॥ भूसुर ससि नव बृंद बलाहक । असरन सरन दीन जन गाहक ॥

आप राक्षसोंकी सेनाके बलको तोड़नेवाले हैं। मुनियों और संतजनोंको आनन्द देनेवाले और पापोंके नाश करनेवाले हैं। ब्राह्मणरूपी खेतीके लिये आप नये मेघसमूह हैं और शरणहीनोंको शरण देनेवाले तथा दीन जनोंको अपने आश्रयमें ग्रहण करनेवाले हैं ॥ २ ॥

भुज बल बिपुल भार महि खंडित । खर दूषण विराध बध पंडित ॥ रावनारि सुखरूप भूपबर । जय दसरथ कुल कुमुद सुधाकर ॥

अपने बाहुबलसे पृथ्वीके बड़े भारी बोझको नष्ट करनेवाले, खर-दूषण और विराधके बध करनेमें कुशल, रावणके शत्रु, आनन्दस्वरूप, राजाओंमें श्रेष्ठ और दशरथके कुलरूपी कुमुदिनीके चन्द्रमा श्रीरामजी! आपकी जय हो ॥ ३ ॥

सुजस पुरान बिदित निगमागम । गावत सुर मुनि संत समागम ॥ कारुनीक व्यलीक मद खंडन । सब बिधि कुसल कोसला मंडन ॥

आपका सुन्दर यश पुराणों, वेदोंमें और तन्त्रादि शास्त्रोंमें प्रकट है। देवता, मुनि और संतोंके समुदाय उसे गाते हैं। आप करुणा करनेवाले और झूठे मदका नाश करनेवाले, सब प्रकारसे कुशल (निपुण) श्रीअयोध्याजीके भूषण ही हैं ॥ ४ ॥

कलि मल मथन नाम ममताहन । तुलसिदास प्रभु पाहि प्रनत जन ॥

आपका नाम कलियुगके पापोंको मथ डालनेवाला और ममताको मारनेवाला है। हे तुलसीदासके प्रभु! शरणागतकी रक्षा कीजिये ॥ ५ ॥

दो०—प्रेम सहित मुनि नारद बरनि राम गुन ग्राम । सोभासिंधु हृदयै धरि गए जहाँ बिधि धाम ॥ ५१ ॥

श्रीरामचन्द्रजीके गुणसमूहोंका प्रेमपूर्वक वर्णन करके मुनि नारदजी शोभाके समुद्र प्रभुको हृदयमें धरकर जहाँ ब्रह्मलोक है वहाँ चले गये ॥ ५१ ॥

१५८

  • रामचरितमानस *

गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा । मैं सब कही मोरि मति जथा ॥ राम चरित सत कोटि अपारा । श्रुति सारदा न बरनै पारा ॥

[शिवजी कहते हैं—] हे गिरिजे! सुनो, मैंने यह उज्ज्वल कथा, जैसी मेरी बुद्धि थी, वैसी पूरी कह डाली। श्रीरामजीके चरित्र सौ करोड़ [अथवा] अपार हैं। श्रुति और सारदा भी उनका वर्णन नहीं कर सकते ॥ १ ॥

राम अनंत अनंत गुनानी । जन्म कर्म अनंत नामानी ॥ जल सीकर महि रज गनि जाहीं । रघुपति चरित न बरनि सिराहीं ॥

भगवान् श्रीराम अनन्त हैं; उनके गुण अनन्त हैं; जन्म, कर्म और नाम भी अनन्त हैं। जलकी बूँदें और पृथ्वीके रज-कण चाहे गिने जा सकते हों, पर श्रीरघुनाथजीके चरित्र वर्णन करनेसे नहीं चुकते ॥ २ ॥

बिमल कथा हरि पद दायनी । भगति होइ सुनि अनपायनी ॥ उमा कहिउँ सब कथा सुहाई । जो भुसुंडि खगपतिहि सुनाई ॥

यह पवित्र कथा भगवान्के परमपदको देनेवाली है। इसके सुननेसे अविचल भक्ति प्राप्त होती है। हे उमा! मैंने वह सब सुन्दर कथा कही जो काकभुशुण्डिजीने गरुड़जीको सुनायी थी ॥ ३ ॥

कछुक राम गुन कहेउँ बखानी । अब का कहौं सो कहहु भवानी ॥ सुनि सुभ कथा उमा हरषानी । बोली अति बिनीत मृदु बानी ॥

मैंने श्रीरामजीके कुछ थोड़े-से गुण बखानकर कहे हैं। हे भवानी! सो कहो, अब और क्या कहूँ? श्रीरामजीकी मङ्गलमयी कथा सुनकर पार्वतीजी हर्षित हुई और अत्यन्त विनम्र तथा कोमल वाणी बोली— ॥ ४ ॥

धन्य धन्य मैं धन्य पुरारी । सुनेउँ राम गुन भव भय हारी ॥

हे त्रिपुरारि! मैं धन्य हूँ, धन्य-धन्य हूँ जो मैंने जन्म-मृत्युके भयको हरण करनेवाले श्रीरामजीके गुण (चरित्र) सुने ॥ ५ ॥

दो०— तुम्हरी कृपाँ कृपायतन अब कृतकृत्य न मोह।

जानेउँ राम प्रताप प्रभु चिदानंद संदोह ॥ ५२ (क) ॥

हे कृपाथाम! अब आपकी कृपासे मैं कृतकृत्य हो गयी। अब मुझे मोह नहीं रह गया। हे प्रभु! मैं सच्चिदानन्दधन प्रभु श्रीरामजीके प्रतापको जान गयी ॥ ५२ (क) ॥

नाथ तवानन ससि स्वत कथा सुधा रघुबीर।

श्रवन पुटन्हि मन पान करि नहिं अघात मतिधीर ॥ ५२ (ख) ॥