श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
‘काकुत्स्थवीर रघुनन्दन! आप सर्वोत्कृष्ट राजर्षि हैं। अतः पहले आपको ही यह उत्तम काव्य सुनना चाहिये, दूसरेको नहीं’॥ २२ ॥
इतना कहकर तीनों लोकोंके स्वामी ब्रह्माजी देवताओं एवं उनके बन्धु-बान्धवोंके साथ अपने लोकको चले गये॥ २३ ॥
वहाँ जो ब्रह्मलोकमें रहनेवाले महातेजस्वी महात्मा ऋषि विद्यमान थे, वे ब्रह्माजीकी आज्ञा पाकर भावी वृत्तान्तोंसे युक्त उत्तरकाण्डको सुननेकी इच्छासे लौट आये (उनके साथ ब्रह्मलोकमें नहीं गये)॥ २४ १/२ ॥
तत्पश्चात् देवाधिदेव ब्रह्माजीकी कही हुई उस शुभ वाणीको याद करके परम तेजस्वी श्रीरामजीने महर्षि वाल्मीकिसे इस प्रकार कहा— ॥ २५ १/२ ॥
‘भगवन्! ये ब्रह्मलोकके निवासी महर्षि मेरे भावी चरित्रोंसे युक्त उत्तरकाण्डका शेष अंश सुनना चाहते हैं। अतः कल सबेरेसे ही उसका गान आरम्भ हो जाना चाहिये’॥ २६ ॥
ऐसा निश्चय करके श्रीरघुनाथजीने जनसमुदायको बिदा कर दिया और कुश तथा लवको साथ लेकर वे अपनी पर्णशालामें आये। वहाँ सीताका ही चिन्तन करते-करते उन्होंने रात व्यतीत की॥ २७-२८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अट्ठानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९८ ॥
निन्यानबेवाँ सर्ग
निन्यानबेवाँ सर्ग
सीताके रसातल-प्रवेशके पश्चात् श्रीरामकी जीवनचर्या, रामराज्यकी स्थिति तथा माताओंके परलोक-गमन आदिका वर्णन
रात बीतनेपर जब सबेरा हुआ, तब श्रीरामचन्द्रजीने बड़े-बड़े मुनियोंको बुलाकर अपने दोनों पुत्रोंसे कहा— 'अब तुम निःशङ्क होकर शेष रामायणका गान आरम्भ करो'॥ १ ॥
महात्मा महर्षियोंके यथास्थान बैठ जानेपर कुश और लवने भगवान्के भविष्य जीवनसे सम्बन्ध रखनेवाले उत्तरकाण्डका, जो उस महाकाव्यका एक अंश था, गान आरम्भ किया॥ २ ॥
इधर अपनी सत्यरूप सम्पत्तिके बलसे सीताजीके रसातलमें प्रवेश कर जानेपर उस यज्ञके अन्तमें भगवान् श्रीरामका मन बहुत दुःखी हुआ॥ ३ ॥
विदेहकुमारीको न देखनेसे उन्हें यह सारा संसार सूना जान पड़ने लगा। शोकसे व्यथित होनेके कारण उनके मनको शान्ति नहीं मिली॥ ४ ॥
तदनन्तर श्रीरघुनाथजीने सब राजाओंको, रीछों, वानरों और राक्षसोंको, जनसमुदायको तथा मुख्य-मुख्य ब्राह्मणोंको भी धन देकर बिदा किया। इस प्रकार विधिपूर्वक यज्ञको समाप्त करके कमलनयन श्रीरामने सबको बिदा करनेके पश्चात् उस समय सीताका मन-ही-मन स्मरण करते हुए अयोध्यामें प्रवेश किया॥ ५-६ १/२ ॥
यज्ञ पूरा करके रघुकुलनन्दन राजा श्रीराम अपने दोनों पुत्रोंके साथ रहने लगे। उन्होंने सीताके सिवा दूसरी किसी स्त्रीसे विवाह नहीं किया। प्रत्येक यज्ञमें जब-जब धर्मपत्नीकी आवश्यकता होती, श्रीरघुनाथजी सीताकी स्वर्णमयी प्रतिमा बनवा लिया करते थे॥ ७-८ ॥
उन्होंने दस हजार वर्षोंतक यज्ञ किये। कितने ही अश्वमेध यज्ञों और उनसे दसगुने वाजपेय यज्ञोंका अनुष्ठान किया, जिसमें असंख्य स्वर्णमुद्राओंकी दक्षिणाएँ दी गयी थीं॥ ९ ॥
श्रीमान् रामने पर्याप्त दक्षिणाओंसे युक्त अग्निष्टोम, अतिरात्र, गोसव तथा अन्य बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान किया, जिनमें अपार धनराशि खर्च की गयी॥ १० ॥
इस प्रकार राज्य करते हुए महात्मा भगवान् श्रीरघुनाथजीका बहुत बड़ा समय धर्मपालनके प्रयत्नमें ही बीता॥ ११ ॥
रीछ, वानर और राक्षस भी श्रीरामकी आज्ञाके अधीन रहते थे। भूमण्डलके सभी राजा प्रतिदिन श्रीरघुनाथजीको प्रसन्न रखते थे॥ १२ ॥
श्रीरामके राज्यमें मेघ समयपर वर्षा करते थे। सदा सुकाल ही रहता था—कभी अकाल नहीं पड़ता था। सम्पूर्ण दिशाएँ प्रसन्न दिखायी देती थीं तथा नगर और जनपद हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरे रहते थे॥ १३ ॥
श्रीरामके राज्यशासन करते समय किसीकी अकाल-मृत्यु नहीं होती थी। प्राणियोंको कोई रोग नहीं सताता था और संसारमें कोई उपद्रव खड़ा नहीं होता था॥ १४ ॥
इसके बाद दीर्घकाल व्यतीत होनेपर पुत्र-पौत्रोंसे घिरी हुईं परम यशस्विनी श्रीराममाता कौसल्या कालधर्म (मृत्यु) को प्राप्त हुईं॥ १५ ॥
सुमित्रा और यशस्विनी कैकेयीने भी उन्हींके पथका अनुसरण किया। ये सभी रानियाँ जीवनकालमें नाना प्रकारके धर्मका अनुष्ठान करके अन्तमें साकेतधामको प्राप्त हुईं और बड़ी प्रसन्नताके साथ वहाँ राजा दशरथसे मिलीं। उन महाभागा रानियोंको सब धर्मोंका पूरा-पूरा फल प्राप्त हुआ॥ १६-१७ ॥
श्रीरघुनाथजी समय-समयपर अपनी सभी माताओंके निमित्त बिना किसी भेदभावके तपस्वी ब्राह्मणोंको बड़े-बड़े दान दिया करते थे॥ १८ ॥
धर्मात्मा श्रीराम श्राद्धमें उपयोगी उत्तमोत्तम वस्तुएँ ब्राह्मणोंको देते तथा पितरों और देवताओंको संतुष्ट करनेके लिये बड़े-बड़े दुस्तर यज्ञों (पिण्डात्मक पितृयज्ञों) का अनुष्ठान करते थे॥ १९ ॥
इस प्रकार यज्ञोंके द्वारा सर्वदा विविध धर्मोंका पालन करते हुए श्रीरघुनाथजीके कई हजार वर्ष सुख-पूर्वक बीत गये॥ २० ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें निन्यानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९९ ॥
सौवाँ सर्ग
सौवाँ सर्ग
केकयदेशसे ब्रह्मर्षि गार्ग्यका भेंट लेकर आना और उनके संदेशके अनुसार श्रीरामकी आज्ञासे कुमारोंसहित भरतका गन्धर्वदेशपर आक्रमण करनेके लिये प्रस्थान
कुछ कालके पश्चात् केकयदेशके राजा युधाजित्ने अपने पुरोहित अमित तेजस्वी ब्रह्मर्षि गार्ग्यको, जो अङ्गिराके पुत्र थे, महात्मा श्रीरघुनाथजीके पास भेजा॥
उनके साथ श्रीरामचन्द्रजीको परम उत्तम प्रेमोपहारके रूपमें अर्पण करनेके लिये उन्होंने दस हजार घोड़े, बहुत-से कम्बल (कालीन और शाल आदि), नाना प्रकारके रत्न, विचित्र-विचित्र सुन्दर वस्त्र तथा मनोहर आभूषण भी दिये थे॥ २-३ ॥
परम बुद्धिमान् श्रीमान् राघवेन्द्रने जब सुना कि मामा अश्वपति-पुत्र युधाजित्के भेजे हुए महर्षि गार्ग्य बहुमूल्य भेंट-सामग्री लिये अयोध्यामें पधार रहे हैं, तब उन्होंने भाइयोंके साथ एक कोस आगे बढ़कर उनकी अगवानी की और जैसे इन्द्र बृहस्पतिकी पूजा करते हैं, उसी प्रकार महर्षि गार्ग्यका पूजन (स्वागत-सत्कार) किया॥ ४-५ ॥
इस प्रकार महर्षिका आदर-सत्कार करके उस धनको ग्रहण करनेके पश्चात् उन्होंने उनका तथा मामाके घरका सारा कुशल-समाचार पूछा। फिर जब वे महाभाग ब्रह्मर्षि सुन्दर आसनपर विराजमान हो गये, तब श्रीरामने उनसे इस प्रकार पूछना आरम्भ किया—॥ ६ १/२ ॥
‘ब्रह्मर्षे! मेरे मामाने क्या संदेश दिया है, जिसके लिये साक्षात् बृहस्पतिके समान वाक्यवेत्ताओंमें श्रेष्ठ आप पूज्यपाद महर्षिने यहाँ पधारनेका कष्ट किया है’॥
श्रीरामका यह प्रश्न सुनकर महर्षिने उनसे अद्भुत कार्य-विस्तारका वर्णन आरम्भ किया—॥ ८ १/२ ॥
‘महाबाहो! आपके मामा नरश्रेष्ठ युधाजित्ने जो प्रेमपूर्वक संदेश दिया है, उसे यदि रुचिकर जान पड़े तो सुनिये॥ ९ १/२ ॥
‘उन्होंने कहा है कि यह जो फल-मूलोंसे सुशोभित गन्धर्वदेश सिन्धु नदीके दोनों तटोंपर बसा हुआ है, बड़ा सुन्दर प्रदेश है॥ १० १/२ ॥
‘वीर रघुनन्दन! गन्धर्वराज शैलूषकी संतानें तीन करोड़ महाबली गन्धर्व, जो युद्धकी कलामें कुशल और अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न हैं, उस देशकी रक्षा करते हैं॥
‘काकुत्स्थ! महाबाहो! आप उन गन्धर्वोंको जीतकर वहाँ सुन्दर गन्धर्वनगर बसाइये। अपने लिये उत्तम साधनोंसे सम्पन्न दो नगरोंका निर्माण कीजिये। वह देश बहुत सुन्दर है। वहाँ दूसरे किसीकी गति नहीं है। आप उसे अपने अधिकारमें लेना स्वीकार करें। मैं आपको ऐसी सलाह नहीं देता, जो अहितकारक हो’॥ १२-१३ ॥
महर्षि और मामाका वह कथन सुनकर श्रीरघुनाथजीको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने ‘बहुत अच्छा’ कहकर भरतकी ओर देखा॥ १४ ॥
तदनन्तर श्रीराघवेन्द्रने उन ब्रह्मर्षिसे प्रसन्नतापूर्वक हाथ जोड़कर कहा—‘ब्रह्मर्षे! ये दोनों कुमार तक्ष और पुष्कल, जो भरतके वीर पुत्र हैं, उस देशमें विचरेंगे और मामासे सुरक्षित रहकर धर्मपूर्वक एकाग्रचित्त हो उस देशका शासन करेंगे॥ १५-१६ ॥
‘ये दोनों कुमार भरतको आगे करके सेना और सेवकोंके साथ वहाँ जायँगे तथा उन गन्धर्वपुत्रोंका संहार करके अलग-अलग दो नगर बसायेंगे॥ १७ ॥
‘उन दोनों श्रेष्ठ नगरोंको बसाकर उनमें अपने दोनों पुत्रोंको स्थापित करके अत्यन्त धर्मात्मा भरत फिर मेरे पास लौट आयेंगे’॥ १८ ॥
ब्रह्मर्षिसे ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजीने भरतको वहाँ सेनाके साथ जानेकी आज्ञा दी और दोनों कुमारोंका पहले ही राज्याभिषेक कर दिया॥ १९ ॥
तत्पश्चात् सौम्य नक्षत्र (मृगशिरा) में अङ्गिराके पुत्र महर्षि गार्ग्यको आगे करके सेना और कुमारोंके साथ भरतने यात्रा की॥ २० ॥
इन्द्रद्वारा प्रेरित हुई देवसेनाके समान वह सेना नगरसे बाहर निकली। भगवान् श्रीराम भी दूरतक उसके साथ-साथ गये। वह देवताओंके लिये भी दुर्जय थी॥
मांसाहारी जन्तु और बड़े-बड़े राक्षस युद्धमें रक्तपानकी इच्छासे भरतके पीछे-पीछे गये॥ २२ ॥
अत्यन्त भयंकर कई हजार मांसभक्षी भूतसमूह गन्धर्व-पुत्रोंका मांस खानेके लिये उस सेनाके साथ-साथ गये॥ २३ ॥
सिंह, बाघ, सूअर और आकाशचारी पक्षी कई हजारकी संख्यामें सेनाके आगे-आगे चले॥ २४ ॥
मार्गमें डेढ़ महीने बिताकर हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरी हुई वह सेना कुशलपूर्वक केकयदेशमें जा पहुँची॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें सौवाँ सर्ग पूरा हुआ॥
१०० ॥
एक सौ एकवाँ सर्ग
एक सौ एकवाँ सर्ग
भरतका गन्धर्वोंपर आक्रमण और उनका संहार करके वहाँ दो सुन्दर नगर बसाकर अपने दोनों पुत्रोंको सौंपना और फिर अयोध्याको लौट आना
केकयराज युधाजित्ने जब सुना कि महर्षि गार्ग्यके साथ स्वयं भरत सेनापति होकर आ रहे हैं, तब उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई॥ १ ॥
वे केकयनरेश भारी जनसमुदायके साथ निकले और भरतसे मिलकर बड़ी उतावलीके साथ इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले गन्धर्वोंके देशकी ओर चले॥ २ ॥
भरत और युधाजित् दोनोंने मिलकर बड़ी तीव्रगतिसे सेना और सवारियोंके साथ गन्धर्वोंकी राजधानीपर धावा किया॥ ३ ॥
भरतका आगमन सुनकर वे महापराक्रमी गन्धर्व युद्धकी इच्छासे एकत्र हो सब ओर जोर-जोरसे गर्जना करने लगे॥ ४ ॥
फिर तो दोनों ओरकी सेनाओंमें बड़ा भयंकर और रोंगटे खड़े कर देनेवाला युद्ध छिड़ गया। वह महाभयंकर संग्राम लगातार सात राततक चलता रहा, परंतु दोनोंमेंसे किसी भी एक पक्षकी विजय नहीं हुई॥ ५ ॥
चारों ओर खूनकी नदियाँ बह चलीं। तलवार, शक्ति और धनुष उस नदीमें विचरनेवाले ग्राहोंके समान जान पड़ते थे, उनकी धारामें मनुष्योंकी लाशें बह जाती थीं॥ ६ ॥
तब रामानुज भरतने कुपित होकर गन्धर्वोंपर कालदेवताके अत्यन्त भयंकर अस्त्रका, जो संवर्त नामसे प्रसिद्ध है, प्रयोग किया॥ ७ ॥
इस प्रकार महात्मा भरतने क्षणभरमें तीन करोड़ गन्धर्वोंका संहार कर डाला। वे गन्धर्व कालपाशसे बद्ध हो संवर्तास्त्रसे विदीर्ण कर डाले गये॥ ८ ॥
ऐसा भयंकर युद्ध देवताओंने भी कभी देखा हो, यह उन्हें याद नहीं आता था। पलक मारते-मारते वैसे पराक्रमी महामनस्वी समस्त गन्धर्वोंका संहार हो जानेपर कैकेयीकुमार भरतने उस समय वहाँ दो समृद्धिशाली सुन्दर नगर बसाये॥ ९-१० ॥
मनोहर गन्धर्वदेशमें तक्षशिला नामकी नगरी बसाकर उसमें उन्होंने तक्षको राजा बनाया और गान्धारदेशमें पुष्कलावत नगर बसाकर उसका राज्य पुष्कलको सौंप दिया॥ ११ ॥
वे दोनों नगर धन-धान्य एवं रत्नसमूहोंसे भरे थे। अनेकानेक कानन उनकी शोभा बढ़ाते थे। गुणविस्तारकी दृष्टिसे वे मानो परस्पर होड़ लगाकर संघर्षपूर्वक आगे बढ़ रहे थे॥ १२ ॥
दोनों नगरोंकी शोभा परम मनोहर थी। दोनों स्थानोंका व्यवहार (व्यापार) निष्कपट, शुद्ध एवं सरल था। दोनों ही नगर उद्यानों (बाग-बगीचों) तथा नाना प्रकारकी सवारियोंसे भरे-पूरे थे। उनके भीतर अलग-अलग कई बाजार थे॥ १३ ॥
दोनों श्रेष्ठ पुरोंकी रमणीयता देखते ही बनती थी। अनेक ऐसे विस्तृत पदार्थ उनकी शोभा बढ़ाते थे, जिनका नाम अभीतक नहीं लिया गया है। सुन्दर श्रेष्ठ गृह तथा बहुत-से सतमहले मकान वहाँकी श्रीवृद्धि कर रहे थे॥ १४ ॥
अनेकानेक शोभासम्पन्न देवमन्दिरों तथा ताल, तमाल, तिलक और मौलसिरी आदिके वृक्षोंसे भी उन दोनों नगरोंकी शोभा एवं रमणीयता बढ़ गयी थी॥ १५ ॥
पाँच वर्षोंमें उन राजधानियोंको अच्छी तरह आबाद करके श्रीरामके छोटे भाई कैकेयीकुमार महाबाहु भरत फिर अयोध्यामें लौट आये॥ १६ ॥
वहाँ पहुँचकर श्रीमान् भरतने द्वितीय धर्मराजके समान महात्मा श्रीरघुनाथजीको उसी तरह प्रणाम किया, जैसे इन्द्र ब्रह्माजीको प्रणाम करते हैं॥ १७ ॥
तत्पश्चात् उन्होंने गन्धर्वोंके वध और उस देशको अच्छी तरह आबाद करनेका यथावत् समाचार कह सुनाया। सुनकर श्रीरघुनाथजी उनपर बहुत प्रसन्न हुए॥ १८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें एक सौ एकवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०२ ॥
एक सौ दोवाँ सर्ग
एक सौ दोवाँ सर्ग
श्रीरामकी आज्ञासे भरत और लक्ष्मणद्वारा कुमार अङ्गद और चन्द्रकेतुकी कारुपथ देशके विभिन्न राज्योंपर नियुक्ति
भरतके मुँहसे गन्धर्वदेशका समाचार सुनकर भाइयोंसहित श्रीरामचन्द्रजीको बड़ी प्रसन्नता हुई। तत्पश्चात् श्रीराघवेन्द्र अपने भाइयोंसे यह अद्भुत वचन बोले—॥ १ ॥
‘सुमित्रानन्दन! तुम्हारे ये दोनों कुमार अङ्गद और चन्द्रकेतु धर्मके ज्ञाता हैं। इनमें राज्यकी रक्षाके लिये उपयुक्त दृढ़ता और पराक्रम है॥ २ ॥
‘अतः मैं इनका भी राज्याभिषेक करूँगा। तुम इनके लिये किसी अच्छे देशका चुनाव करो, जो रमणीय होनेके साथ ही विघ्न-बाधाओंसे रहित हो और जहाँ ये दोनों धनुर्धर वीर आनन्दपूर्वक रह सकें॥ ३ ॥
‘सौम्य! ऐसा देश देखो, जहाँ निवास करनेसे दूसरे राजाओंको पीड़ा या उद्वेग न हो, आश्रमोंका भी नाश न करना पड़े और हमलोगोंको किसीकी दृष्टिमें अपराधी भी न बनना पड़े’॥ ४ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर भरतने उत्तर दिया— ‘आर्य! यह कारुपथ नामक देश बड़ा सुन्दर है। वहाँ किसी प्रकारकी रोग-व्याधिका भय नहीं है॥ ५ ॥
‘वहाँ महात्मा अङ्गदके लिये नयी राजधानी बसायी जाय तथा चन्द्रकेतु (या चन्द्रकान्त) के रहनेके लिये ‘चन्द्रकान्त’ नामक नगरका निर्माण कराया जाय, जो सुन्दर और आरोग्यवर्धक हो’॥ ६ ॥
भरतकी कही हुई इस बातको श्रीरघुनाथजीने स्वीकार किया और कारुपथ देशको अपने अधिकारमें करके अङ्गदको वहाँका राजा बना दिया॥ ७ ॥
क्लेशरहित कर्म करनेवाले भगवान् श्रीरामने अङ्गदके लिये ‘अङ्गदीया’ नामक रमणीय पुरी बसायी, जो परम सुन्दर होनेके साथ ही सब ओरसे सुरक्षित भी थी॥ ८ ॥
चन्द्रकेतु अपने शरीरसे मल्लके समान हृष्ट-पुष्ट थे; उनके लिये मल्ल देशमें ‘चन्द्रकान्ता’ नामसे विख्यात दिव्य पुरी बसायी गयी, जो स्वर्गकी अमरावती नगरीके समान सुन्दर थी॥ ९ ॥
इससे श्रीराम, लक्ष्मण और भरत तीनोंको बड़ी प्रसन्नता हुर्इ। उन सभी रणदुर्जय वीरोंने स्वयं उन कुमारोंका अभिषेक किया॥ १० ॥
एकाग्रचित्त तथा सावधान रहनेवाले उन दोनों कुमारोंका अभिषेक करके अङ्गदको पश्चिम तथा चन्द्रकेतुको उत्तर दिशामें भेजा गया॥ ११ ॥
अङ्गदके साथ तो स्वयं सुमित्राकुमार लक्ष्मण गये और चन्द्रकेतुके सहायक या पार्श्वक भरतजी हुए॥
लक्ष्मण अङ्गदीया पुरीमें एक वर्षतक रहे और उनका दुर्धर्ष पुत्र अङ्गद जब दृढ़तापूर्वक राज्य सँभालने लगा, तब वे पुनः अयोध्याको लौट आये॥ १३ ॥
इसी प्रकार भरत भी चन्द्रकान्ता नगरीमें एक वर्षसे कुछ अधिक कालतक ठहरे रहे और चन्द्रकेतुका राज्य जब दृढ़ हो गया, तब वे पुनः अयोध्यामें आकर श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंकी सेवा करने लगे॥ १४ ॥
लक्ष्मण और भरत दोनोंका श्रीरामचन्द्रजीके चरणोंमें अनन्य अनुराग था। दोनों ही अत्यन्त धर्मात्मा थे। श्रीरामकी सेवामें रहते उन्हें बहुत समय बीत गया, परंतु स्नेहाधिक्यके कारण उनको कुछ भी ज्ञात न हुआ॥ १५ ॥
वे तीनों भार्ड पुरवासियोंके कार्यमें सदा संलग्न रहते और धर्मपालनके लिये प्रयत्नशील रहा करते थे। इस प्रकार उनके दस हजार वर्ष बीत गये॥ १६ ॥
धर्म साधनके स्थानभूत अयोध्यापुरीमें वैभवसम्पन्न होकर रहते हुए वे तीनों भार्ड यथासमय घूम-फिरकर प्रजाकी देखभाल करते थे। उनके सारे मनोरथ पूर्ण हो गये थे तथा वे महायज्ञमें आहुति पाकर प्रज्वलित हुए दीप्त तेजस्वी गार्हपत्य, आहवनीय और दक्षिण नामक त्रिविध अग्नियोंके समान प्रकाशित होते थे॥ १७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें एक सौ दोवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०२ ॥
एक सौ तीनवाँ सर्ग
एक सौ तीनवाँ सर्ग
श्रीरामके यहाँ कालका आगमन और एक कठोर शर्तके साथ उनका वार्ताके लिये उद्यत होना
तदनन्तर कुछ समय और बीत जानेपर जब कि भगवान् श्रीराम धर्मपूर्वक अयोध्याके राज्यका पालन कर रहे थे, साक्षात् काल तपस्वीके रूपमें राजभवनके द्वारपर आया॥ १ ॥
उसने द्वारपर खड़े हुए धैर्यवान् एवं यशस्वी लक्ष्मणसे कहा—'मैं एक भारी कार्यसे आया हूँ। तुम श्रीरामचन्द्रजीसे मेरे आगमनकी सूचना दे दो॥ २ ॥
'महाबली लक्ष्मण! मैं अमित तेजस्वी महर्षि अतिबलका दूत हूँ और एक आवश्यक कार्यवश श्रीरामचन्द्रजीसे मिलने आया हूँ'॥ ३ ॥
उसकी वह बात सुनकर सुमित्राकुमार लक्ष्मणने बड़ी उतावलीके साथ भीतर जाकर श्रीरामचन्द्रजीसे उस तापसके आगमनकी सूचना दी—॥ ४ ॥
'महातेजस्वी महाराज! आप अपने राजधर्मके प्रभावसे इहलोक और परलोकपर भी विजयी हों। एक महर्षि दूतके रूपमें आपसे मिलने आये हैं। वे तपस्याजनित तेजसे सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे हैं'॥ ५ ॥
लक्ष्मणकी कही हुई वह बात सुनकर श्रीरामने कहा—'तात! उन महातेजस्वी मुनिको भीतर ले आओ, जो कि अपने स्वामीके संदेश लेकर आये हैं'॥ ६ ॥
तब 'जो आज्ञा' कहकर सुमित्राकुमार उन मुनिको भीतर ले आये। वे तेजसे प्रज्वलित होते और अपनी प्रखर किरणोंसे दग्ध करते हुए-से जान पड़ते थे॥ ७ ॥
अपने तेजसे दीप्तिमान् रघुकुलतिलक श्रीरामके पास पहुँचकर ऋषिने उनसे मधुर वाणीमें कहा—'रघुनन्दन! आपका अभ्युदय हो'॥ ८ ॥
महातेजस्वी श्रीरामने उन्हें पाद्य-अर्घ्य आदि पूजनोपचार समर्पित किया और शान्तभावसे उनका कुशल-समाचार पूछना आरम्भ किया॥ ९ ॥
श्रीरामके पूछनेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ महायशस्वी मुनि कुशल-समाचार बताकर दिव्य सुवर्णमय आसनपर विराजमान हुए॥ १० ॥
तदनन्तर श्रीरामने उनसे कहा — ‘महामते! आपका स्वागत है। आप जिनके दूत होकर यहाँ पधारे हैं, उनका संदेश सुनाइये’॥ ११ ॥
राजसिंह श्रीरामके द्वारा इस प्रकार प्रेरित होनेपर मुनि बोले— ‘यदि आप हमारे हितपर दृष्टि रखें तो जहाँ हम और आप दो ही आदमी रहें, वहीं इस बातको कहना उचित है॥ १२ ॥
‘यदि आप मुनिश्रेष्ठ अतिबलके वचनपर ध्यान दें तो आपको यह भी घोषित करना होगा कि जो कोऽइ मनुष्य हम दोनोंकी बातचीत सुन ले अथवा हमें वार्तालाप करते देख ले, वह आप (श्रीराम) का वध्य होगा’॥ १३ ॥
श्रीरामने ‘तथास्तु’ कहकर इस बातके लिये प्रतिज्ञा की और लक्ष्मणसे कहा — ‘महाबाहो! द्वारपालको बिदा कर दो और स्वयं ड्योढ़ीपर खड़े होकर पहरा दो॥
‘सुमित्रानन्दन! जो ऋषि और मेरी—दोनोंकी कही हुऽइ बात सुन लेगा या बात करते हमें देख लेगा, वह मेरे द्वारा मारा जायगा’॥ १५ ॥
इस प्रकार अपनी बात ग्रहण करनेवाले लक्ष्मणको दरवाजेपर तैनात करके श्रीरघुनाथजीने समागत महर्षिसे कहा— ‘मुने! अब आप निःशङ्क होकर वह बात कहिये, जिसे कहना आपको अभीष्ट है अथवा जिसे कहनेके लिये ही आप यहाँ भेजे गये हैं। मेरे हृदयमें भी उसे सुननेके लिये उत्कण्ठा है’॥ १६-१७ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें एक सौ तीनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०३ ॥
एक सौ चारवाँ सर्ग
एक सौ चारवाँ सर्ग
कालका श्रीरामचन्द्रजीको ब्रह्माजीका संदेश सुनाना और श्रीरामका उसे स्वीकार करना
महाबली महान् सत्त्वशाली महाराज! पितामह भगवान् ब्रह्माने जिस उद्देश्यसे मुझे यहाँ भेजा है और जिसके लिये मैं यहाँ आया हूँ; वह सब बताता हूँ; सुनिये॥ १ ॥
शत्रु-नगरीपर विजय पानेवाले वीर! पूर्वावस्थामें अर्थात् हिरण्यगर्भकी उत्पत्तिके समय मैं मायाद्वारा आपसे उत्पन्न हुआ था, इसलिये आपका पुत्र हूँ। मुझे सर्वसंहारकारी काल कहते हैं॥ २ ॥
लोकनाथ प्रभु भगवान् पितामहने कहा है कि ‘सौम्य! आपने लोकोंकी रक्षाके लिये जो प्रतिज्ञा की थी, वह पूरी हो गयी॥ ३ ॥
‘पूर्वकालमें समस्त लोकोंको मायाके द्वारा स्वयं ही अपनेमें लीन करके आपने महासमुद्रके जलमें शयन किया था। फिर इस सृष्टिके प्रारम्भमें सबसे पहले मुझे उत्पन्न किया ॥ ४ ॥
‘इसके बाद विशाल फण और शरीरसे युक्त एवं जलमें शयन करनेवाले ‘अनन्त’ संज्ञक नागको मायाद्वारा प्रकट करके आपने दो महाबली जीवोंको जन्म दिया, जिनका नाम था मधु और कैटभ; इन्हींके अस्थि-समूहोंसे भरी हुई यह पर्वतोंसहित पृथिवी तत्काल प्रकट हुई, जो ‘मेदिनी’ कहलायी॥ ५-६ ॥
‘आपकी नाभिसे सूर्य-तुल्य तेजस्वी दिव्य कमल प्रकट हुआ, जिसमें आपने मुझको भी उत्पन्न किया और प्रजाकी सृष्टि रचनेका सारा कार्यभार मुझपर ही रख दिया॥ ७ ॥
‘जब मुझपर यह भार रख दिया गया, तब मैंने आप जगदीश्वरकी उपासना करके प्रार्थना की— ‘प्रभो! आप सम्पूर्ण भूतोंमें रहकर उनकी रक्षा कीजिये; क्योंकि आप ही मुझे तेज (ज्ञान और क्रिया-शक्ति) प्रदान करनेवाले हैं’॥ ८ ॥
‘तब आप मेरा अनुरोध स्वीकार करके प्राणियोंकी रक्षाके लिये अपरिमेय सनातन पुरुषरूपसे जगतपालक विष्णुके रूपमें प्रकट हुए॥ ९ ॥
‘फिर आपने ही अदितिके गर्भसे परम पराक्रमी वामनरूपमें अवतार लिया। तबसे आप अपने भाई इन्द्रादि देवताओंकी शक्ति बढ़ाते और आवश्यकता पड़नेपर उनकी रक्षाके लिये उद्यत रहते हैं॥ १० ॥
‘जगदीश्वर! जब रावणके द्वारा प्रजाका विनाश होने लगा, उस समय आपने उस निशाचरका वध करनेकी इच्छासे मनुष्य-शरीरमें अवतार लेनेका निश्चय किया॥ ११ ॥
‘और स्वयं ही ग्यारह हजार वर्षोंतक मर्त्यलोकमें निवास करनेकी अवधि निश्चित की थी॥ १२ ॥
‘नरश्रेष्ठ! आप मनुष्य-लोकमें अपने संकल्पसे ही किसीके पुत्ररूपमें प्रकट हुए हैं। इस अवतारमें आपने अपनी जितने समयतककी आयु निश्चित की थी, वह पूरी हो गयी; अतः अब आपके लिये यह हमलोगोंके समीप आनेका समय है॥ १३ ॥
‘वीर महाराज! यदि और अधिक कालतक यहाँ रहकर प्रजाजनोंका पालन करनेकी इच्छा हो तो आप रह सकते हैं। आपका कल्याण हो। रघुनन्दन! अथवा यदि परमधाममें पधारनेका विचार हो तो अवश्य आवें। आप विष्णुदेवके स्वधाममें प्रतिष्ठित होनेपर सम्पूर्ण देवता सनाथ एवं निश्चिन्त हो जायँ— ऐसा पितामहने कहा है’॥ १४-१५ ॥
कालके मुखसे कहे गये पितामह ब्रह्माके संदेशको सुनकर श्रीरघुनाथजी हँसते हुए उस सर्वसंहारी कालसे बोले—॥ १६ ॥
‘काल! देवाधिदेव ब्रह्माजीका यह परम अद्भुत वचन सुननेको मिला; इसलिये तुम्हारे आनेसे मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है॥ १७ ॥
‘तीनों लोकोंके प्रयोजनकी सिद्धिके लिये ही मेरा यह अवतार हुआ था, वह उद्देश्य अब पूरा हो गया; इसलिये तुम्हारा कल्याण हो; अब मैं जहाँसे आया था वहीं चलूँगा॥ १८ ॥
‘काल! मैंने मनसे तुम्हारा चिन्तन किया था। उसीके अनुसार तुम यहाँ आये हो; अतः इस विषयको लेकर मेरे मनमें कोई विचार नहीं है। सर्वसंहारकारी काल! मुझे सभी कार्योंमें सदा देवताओंका वशवर्ती होकर ही रहना चाहिये, जैसा कि पितामहका कथन है’॥ १९ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें एक सौ चारवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०४ ॥
एक सौ पाँचवाँ सर्ग
एक सौ पाँचवाँ सर्ग
दुर्वासाके शापके भयसे लक्ष्मणका नियम भङ्ग करके श्रीरामके पास इनके आगमनका समाचार देनेके लिये जाना, श्रीरामका दुर्वासा मुनिको भोजन कराना और उनके चले जानेपर लक्ष्मणके लिये चिन्तित होना
इन दोनोंमें इस प्रकार बातचीत हो ही रही थी कि महर्षि दुर्वासा राजद्वारपर आ पहुँचे। वे श्रीरामचन्द्रजीसे मिलना चाहते थे॥ १ ॥
उन मुनिश्रेष्ठने सुमित्राकुमार लक्ष्मणके पास जाकर कहा—'तुम शीघ्र ही मुझे श्रीरामचन्द्रजीसे मिला दो। उनसे मिले बिना मेरा एक काम बिगड़ रहा है'॥ २ ॥
मुनिकी यह बात सुनकर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मणने उन महात्माको प्रणाम करके यह बात कही—॥ ३ ॥
'भगवन्! बताइये, आपका कौन-सा काम है? क्या प्रयोजन है? और मैं आपकी कौन-सी सेवा करूँ? ब्रह्मन्! इस समय श्रीरघुनाथजी दूसरे कार्यमें संलग्न हैं; अतः दो घड़ीतक उनकी प्रतीक्षा कीजिये'॥ ४ ॥
यह सुनकर मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा रोषसे तमतमा उठे और लक्ष्मणकी ओर इस प्रकार देखने लगे, मानो अपनी नेत्राग्निसे उन्हें भस्म कर डालेंगे। साथ ही उनसे इस प्रकार बोले—॥ ५ ॥
'सुमित्राकुमार! इसी क्षण श्रीरामको मेरे आगमनकी सूचना दो। यदि अभी-अभी उनसे मेरे आगमनका समाचार नहीं निवेदन करोगे तो मैं इस राज्यको, नगरको, तुमको, श्रीरामको, भरतको और तुमलोगोंकी जो संतति है, उसको भी शाप दे दूँगा। मैं पुनः इस क्रोधको अपने हृदयमें धारण नहीं कर सकूँगा'॥ ६-७ ॥
उन महात्माका यह घोर वचन सुनकर लक्ष्मणने उनकी वाणीसे जो निश्चय प्रकट हो रहा था, उसपर मन-ही-मन विचार किया॥ ८ ॥
'अकेले मेरी ही मृत्यु हो, यह अच्छा है; किंतु सबका विनाश नहीं होना चाहिये' अपनी बुद्धिद्वारा ऐसा निश्चय करके लक्ष्मणने श्रीरघुनाथजीसे दुर्वासाके आगमनका समाचार निवेदन किया॥ ९ ॥
लक्ष्मणकी बात सुनकर राजा श्रीराम कालको बिदा करके तुरंत ही निकले और अत्रिपुत्र दुर्वासासे मिले॥ १०॥
अपने तेजसे प्रज्वलित-से होते हुए महात्मा दुर्वासाको प्रणाम करके श्रीरघुनाथजीने हाथ जोड़कर पूछा— ‘महर्षे! मेरे लिये क्या आज्ञा है?’॥ ११॥
श्रीरघुनाथजीकी कही हुई उस बातको सुनकर प्रभावशाली मुनिवर दुर्वासा उनसे बोले— ‘धर्मवत्सल! सुनिये॥ १२॥
‘निष्पाप रघुनन्दन! मैंने एक हजार वर्षोंतक उपवास किया। आज मेरे उस व्रतकी समाप्तिका दिन है, इसलिये इस समय आपके यहाँ जो भी भोजन तैयार हो, उसे मैं ग्रहण करना चाहता हूँ’॥ १३॥
यह सुनकर राजा श्रीरघुनाथजी मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने उन मुनिश्रेष्ठको तैयार भोजन परोसा॥ १४॥
वह अमृतके समान अन्न ग्रहण करके दुर्वासा मुनि तृप्त हुए और श्रीरघुनाथजीको साधुवाद दे अपने आश्रमपर चले आये॥ १५॥
मुनिवर दुर्वासाके अपने आश्रमको चले जानेपर लक्ष्मणके बड़े भाई श्रीराम कालके वचनोंका स्मरण करके दुःखी हो गये॥ १६॥
भयंकर भावी भ्रातृवियोगके दृश्यको दृष्टिपथमें लानेवाले कालके उस वचनपर विचार करके श्रीरामके मनमें बड़ा दुःख हुआ। उनका मुँह नीचेको झुक गया और वे कुछ बोल न सके॥ १७॥
तत्पश्चात् कालके वचनोंपर बुद्धिपूर्वक सोचविचार करके महायशस्वी श्रीरघुनाथजी इस निर्णयपर पहुँचे कि ‘अब यह सब कुछ भी न रहेगा।’ ऐसा सोचकर वे चुप हो रहे॥ १८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें एक सौ पाँचवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०५॥
एक सौ छठाँ सर्ग
एक सौ छठाँ सर्ग
श्रीरामके त्याग देनेपर लक्ष्मणका सशरीर स्वर्गगमन
श्रीरामचन्द्रजी राहुग्रस्त चन्द्रमाके समान दीन हो गये थे, उन्हें सिर झुकाये खेद करते देख लक्ष्मणने बड़े हर्षके साथ मधुर वाणीमें कहा— ॥ १ ॥
‘महाबाहो! आपको मेरे लिये संताप नहीं करना चाहिये; क्योंकि पूर्वजन्मके कर्मोंसे बँधी हुई कालकी गति ऐसी ही है॥ २ ॥
‘सौम्य! आप निश्चिन्त होकर मेरा वध कर डालें और ऐसा करके अपनी प्रतिज्ञाका पालन करें। काकुत्स्थ! प्रतिज्ञा भङ्ग करनेवाले मनुष्य नरकमें पड़ते हैं॥ ३ ॥
‘महाराज! यदि आपका मुझपर प्रेम है और यदि आप मुझे कृपापात्र समझते हैं तो निःशङ्क होकर मुझे प्राणदण्ड दें। रघुनन्दन! आप अपने धर्मकी वृद्धि करें’॥ ४ ॥
लक्ष्मणके ऐसा कहनेपर श्रीरामकी इन्द्रियाँ चञ्चल हो उठीं—वे धैर्यसे विचलित-से हो गये और मन्त्रियों तथा पुरोहितजीको बुलाकर उन सबके बीचमें वह सारा वृत्तान्त बताने लगे। श्रीरघुनाथजीने दुर्वासाके आगमन और तापसरूपधारी कालके समक्ष की हुई प्रतिज्ञाकी बात भी बतायी॥ ५-६ ॥
यह सुनकर सब मन्त्री और उपाध्याय चुपचाप बैठे रह गये (कोई कुछ बोल न सका)। तब महातेजस्वी वसिष्ठजीने यह बात कही— ॥ ७ ॥
‘महाबाहो! महायशस्वी श्रीराम! इस समय जो रोंगटे खड़े कर देनेवाला विकट विनाश आनेवाला है (तुम्हारे साथ ही बहुत-से प्राणियोंका जो साकेत-गमन होनेवाला है) और लक्ष्मणके साथ जो वियोग हो रहा है, यह सब मैंने तपोबलद्वारा पहलेसे ही देख लिया है॥ ८ ॥
‘काल बड़ा प्रबल है। तुम लक्ष्मणका परित्याग कर दो। प्रतिज्ञा झूठी न करो; क्योंकि प्रतिज्ञाके नष्ट होनेपर धर्मका लोप हो जायगा॥ ९ ॥
‘धर्मका लोप होनेपर चराचर प्राणियों, देवताओं तथा ऋषियोंसहित सारी त्रिलोकी नष्ट हो जायगी। इसमें संशय नहीं है॥ १० ॥
‘अतः पुरुषसिंह! तुम त्रिभुवनकी रक्षापर दृष्टि रखते हुए लक्ष्मणको त्याग दो और उनके बिना अब धर्मपूर्वक स्थित रहकर सम्पूर्ण जगत्को स्वस्थ एवं सुखी बनाओ’॥ ११ ॥
वहाँ एकत्र हुए मन्त्री, पुरोहित आदि सब सभासदोंकी उस सभाके बीच वसिष्ठ मुनिकी कही हुई वह बात सुनकर श्रीरामने लक्ष्मणसे कहा—॥ १२ ॥
‘सुमित्रानन्दन! मैं तुम्हारा परित्याग करता हूँ, जिससे धर्मका लोप न हो। साधु पुरुषोंका त्याग किया जाय अथवा वध—दोनों समान ही हैं’॥ १३ ॥
श्रीरामके इतना कहते ही लक्ष्मणके नेत्रोंमें आँसू भर आये। वे तुरंत वहाँसे चल दिये। अपने घरतक नहीं गये॥
सरयूके किनारे जाकर उन्होंने आचमन किया और हाथ जोड़ सम्पूर्ण इन्द्रियोंको वशमें करके प्राणवायुको रोक लिया॥ १५ ॥
लक्ष्मणने योगयुक्त होकर श्वास लेना बंद कर दिया है—यह देख इन्द्र आदि सब देवता, ऋषि और अप्सराएँ उस समय उनपर फूलोंकी वर्षा करने लगीं॥
महाबली लक्ष्मण अपने शरीरके साथ ही सब मनुष्योंकी दृष्टिसे ओझल हो गये। उस समय देवराज इन्द्र उन्हें साथ लेकर स्वर्गमें चले गये॥ १७ ॥
भगवान् विष्णुके चतुर्थ अंश लक्ष्मणको आया देख सभी देवता हर्षसे भर गये और उन सबने प्रसन्नतापूर्वक लक्ष्मणकी पूजा की॥ १८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें एक सौ छठाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०६ ॥
एक सौ सातवाँ सर्ग
एक सौ सातवाँ सर्ग
वसिष्ठजीके कहनेसे श्रीरामका पुरवासियोंको अपने साथ ले जानेका विचार तथा कुश और लवका राज्याभिषेक करना
लक्ष्मणका त्याग करके श्रीराम दुःख-शोकमें मग्न हो गये तथा पुरोहित, मन्त्री और महाजनोंसे इस प्रकार बोले— ॥ १ ॥
‘आज मैं अयोध्याके राज्यपर धर्मवत्सल वीर भाई भरतका राजाके पदपर अभिषेक करूँगा। उसके बाद वनको चला जाऊँगा॥ २ ॥
‘शीघ्र ही सब सामग्री जुटाकर ले आओ। अब अधिक समय नहीं बीतना चाहिये। मैं आज ही लक्ष्मणके पथका अनुसरण करूँगा’॥ ३ ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी यह बात सुनकर प्रजावर्गके सभी लोग धरतीपर माथा टेककर पड़ गये और प्राणहीन-से हो गये॥ ४ ॥
श्रीरघुनाथजीकी वह बात सुनकर भरतका तो होश ही उड़ गया। वे राज्यकी निन्दा करने लगे और इस प्रकार बोले— ॥ ५ ॥
‘राजन्! रघुनन्दन! मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि आपके बिना मुझे राज्य नहीं चाहिये, स्वर्गका भोग भी नहीं चाहिये॥ ६ ॥
‘राजन्! नरेश्वर! आप इन कुश और लवका राज्याभिषेक कीजिये। दक्षिण कोशलमें कुशको और उत्तर कोशलमें लवको राजा बनाइये॥ ७ ॥
‘तेज चलनेवाले दूत शीघ्र ही शत्रुघ्नके पास भी जायँ और उन्हें हमलोगोंकी इस महायात्राका वृत्तान्त सुनायें। इसमें विलम्ब नहीं होना चाहिये’॥ ८ ॥
भरतकी बात सुनकर तथा पुरवासियोंको नीचे मुख किये दुःखसे संतप्त होते देख महर्षि वसिष्ठने कहा— ॥
‘वत्स श्रीराम! पृथ्वीपर पड़े हुए इन प्रजाजनोंकी ओर देखो। इनका अभिप्राय जानकर इसीके अनुसार कार्य करो। इनकी इच्छाके विपरीत करके इन बेचारोंका दिल न दुखाओ’॥ १० ॥
वसिष्ठजीके कहनेसे श्रीरघुनाथजीने प्रजाजनोंको उठाया और सबसे पूछा—'मैं आपलोगोंका कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ?'॥ ११ ॥
तब प्रजावर्गके सभी लोग श्रीरामसे बोले—'रघुनन्दन! आप जहाँ भी जायेंगे, आपके पीछे-पीछे हम भी वहीं चलेंगे॥ १२ ॥
'काकुत्स्थ! यदि पुरवासियोंपर आपका प्रेम है, यदि हमपर आपका परम उत्तम स्नेह है तो हमें साथ चलनेकी आज्ञा दीजिये। हम अपने स्त्री-पुत्रोंसहित आपके साथ ही सन्मार्गपर चलनेको उद्यत हैं॥ १३ ॥
'स्वामिन्! आप तपोवनमें या किसी दुर्गम स्थानमें अथवा नदी या समुद्रमें—जहाँ कहीं भी जायँ, हम सबको साथ ले चलें। यदि आप हमें त्याग देने योग्य नहीं मानते हैं तो ऐसा ही करें॥ १४ ॥
'यही हमारे ऊपर आपकी सबसे बड़ी कृपा होगी और यही हमारे लिये आपका परम उत्तम वर होगा। आपके पीछे चलनेमें ही हमें सदा हार्दिक प्रसन्नता होगी'॥ १५ ॥
पुरवासियोंकी दृढ़ भक्ति देख श्रीरामने 'तथास्तु' कहकर उनकी इच्छाका अनुमोदन किया और अपने कर्तव्यका निश्चय करके श्रीरघुनाथजीने उसी दिन दक्षिण कोशलके राज्यपर वीर कुशको और उत्तर कोशलके राजसिंहासनपर लवको अभिषिक्त कर दिया। अभिषिक्त हुए अपने उन दोनों महामनस्वी पुत्र कुश और लवको गोदमें बिठाकर उनका गाढ़ आलिङ्गन करके महाबाहु श्रीरामने बारम्बार उन दोनोंके मस्तक सूँघे; फिर उन्हें अपनी-अपनी राजधानीमें भेज दिया॥ १६—१८ ॥
उन्होंने अपने एक-एक पुत्रको कँइ हजार रथ, दस हजार हाथी और एक लाख घोड़े दिये॥ १९ ॥
दोनों भाँइ कुश और लव प्रचुर रत्न और धनसे सम्पन्न हो गये। वे हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे घिरे रहने लगे। उन दोनोंको श्रीरामने उनकी राजधानियोंमें भेज दिया॥
इस प्रकार उन दोनों वीरोंको अभिषिक्त करके अपने-अपने नगरमें भेजकर श्रीरघुनाथजीने महात्मा शत्रुघ्नके पास दूत भेजे॥ २१ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें एक सौ सातवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १०७ ॥