शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
महर्षि शुक्राचार्य द्वारा
स्रोत: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (उद्गम)
चतुर्थोऽध्याये विद्याकलानिरूपणप्रकरणम् २२९
विचार पूर्ण तर्क होता है तथा जो काणादादि वैशेषिक दार्शनिकों का मत है उसे 'तर्क' वा 'न्याय' कहते हैं।
पुरुषोऽष्टौ प्रकृतयो विकाराः षोडशेति च ॥ ४८ ॥
तत्त्वादिसंख्यावैशिष्ट्यात्सांख्यमित्यभिधीयते ।
सांख्य लक्षण — जिसमें एक पुरुष, आठ-प्रकृति, सोलह विकार अर्थात् १ कूटस्थ पुरुष, १ प्रकृति, २ महत्तत्त्व, ३ अहङ्कार, ५ तन्मात्राएं— शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, ये आठ प्रकृतियाँ, तथा १ आकाश, २ वायु, ३ अग्नि, ४ जल, ५ पृथ्वी ये ५ महाभूत, १ हस्त, २ पाद, ३ जिह्वा, ४ लिङ्ग, ५ गुदा ये ५ कर्मेन्द्रियाँ, १ श्रवण, २ त्वक्, ३ चक्षु, ४ रसना, ५ घ्राण ये ५ ज्ञानेन्द्रियाँ और १ उभयेन्द्रिय मन ये १६ विकार। इस प्रकार से २५ तत्त्वादि की संख्या (गणना) की विशेषता है अतः उसे 'सांख्य' शास्त्र कहते हैं।
ब्रह्मैकमद्वितीयं स्यान्नाना नेहास्ति किञ्चन ॥ ४९ ॥
मायिकं सर्वमज्ञानाद्भाति वेदान्तिनां मतम् ।
वेदान्त लक्षण — एक, अद्वितीय, अनिर्वचनीय ब्रह्म ही इस संसार में है, नाना प्रकार की जो वस्तुयें दिखाई पड़ रही हैं वे सत्य नहीं हैं वस्तुतः माया से उत्पन्न हुई अज्ञान से सत्यवत् प्रतीत होती हैं। यह वेदान्तियों का मत है।
चित्तवृत्तिनिरोधस्तु प्राणसंयमनादिभिः ॥ ५० ॥
तद्योगशास्त्रं विज्ञेयं यस्मिन्ध्यानसमाधितः ।
योग लक्षण — जिसमें एकाग्रता के साथ ध्यान एवं कुम्भकादि प्राणायाम द्वारा चित्त की वृत्तियों का निरोध करना बताया गया हो उसे 'योग' शास्त्र कहते हैं।
प्राग्वृत्तकथनं चैक-राजकृत्यमिषादितः ॥ ५१ ॥
यस्मिन्स इतिहासः स्यात्पुरावृत्तः स एव हि ।
इतिहास लक्षण — जिसमें किसी मुख्य राजा के चरित्र-वर्णन के छल आदि के द्वारा प्राचीन व्यवहारों का वर्णन हो उसे 'इतिहास' और 'पुरावृत्त' भी कहते हैं।
सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च ॥ ५२ ॥
वंशानुचरितं यस्मिन् पुराणं तद्धि कीर्तितम् ।
पुराण लक्षण — जिसमें सर्ग (सृष्टि), प्रतिसर्ग, प्रलय, वंश, मन्वन्तर तथा वंशों का चरित ये सब वर्णित हों उसे 'पुराण' कहते हैं।
वर्णादिधर्मस्मरणं यत्र वेदाबिरोधकम् ॥ ५३ ॥
कीर्तनं चार्थशास्त्राणां स्मृतिः सा च प्रकीर्तिता ।
स्मृति लक्षण — जिसमें वेद से अविरुद्ध (वेदसंमित) चारो वर्णों एवं
२३० शुक्रनीतिः
आश्रमों के धर्मों का स्मरण (वर्णन) तथा अर्थशास्त्र का भलीभांति प्रतिपादन किया गया हो, उसे 'स्मृति' कहते हैं।
युक्तिर्बलीयसी यत्र सर्वं स्वाभाविकं मतम् ॥ ५४ ॥
कस्यापि नेश्वरः कर्त्ता न वेदो नास्तिकं हि तत् ।
नास्तिक मत लक्षण— जिसमें युक्ति (तर्क) को सर्वश्रेष्ठ प्रमाण माना गया हो एवं प्रत्येक वस्तु की सृष्टि स्वभावतः उत्पन्न हुई मानी जाय। और ईश्वर को जगत् का कर्त्ता तथा वेद दोनों को भी न माना जाय। उसे 'नास्तिकमत' कहते हैं।
श्रुतिस्मृत्यविरोधेन राजवृत्तादि-शासनम् ॥ ५५ ॥
सुयुक्त्याऽर्थार्जनं यत्र ह्यर्थशास्त्रं तदुच्यते ।
अर्थशास्त्र लक्षण— जिसमें श्रुति तथा स्मृति के अविरुद्ध (संभव) राजाओं के लिये आचरण के विषय में उपदेश किया गया हो तथा अच्छे कौशल से धन अर्जन करने की विधि कही गई हो, उसे 'अर्थशास्त्र' कहते हैं।
शशादिभेदतः पुंसामनुकूलादिभेदतः ॥ ५६ ॥
पद्मिन्यादिप्रभेदेन स्त्रीणां स्वीयादिभेदतः ।
तत्कामशास्त्रं सत्त्वादेर्लग्नं यत्रास्ति चोभयोः ॥ ५७ ॥
कामशास्त्र लक्षण— जिसमें पुरुषों के शश, मृग, अश्व, हस्ती रूप से जातिभेद तथा अनुकूल, धृष्ट, शठ आदि नायक-भेद एवं स्त्रियों के पद्मिनी, चित्रिणी, शङ्खिनी तथा हस्तिनी रूप से जातिभेद तथा स्वीया, परकीया, वेश्या आदि-नायिकाभेद एवं दोनों (स्त्री तथा पुरुष) के अनुरागादि के लक्षण विशेष रूप से वर्णित हों उसे 'कामशास्त्र' कहते हैं।
प्रासादप्रतिमाराम-गृहवाप्यादिसंस्कृतिः ।
कथिता यत्र तच्छिल्पशास्त्रमुक्तं महर्षिभिः ॥ ५८ ॥
शिल्पशास्त्र लक्षण— जिसमें प्रासाद (राजभवन-देवमन्दिर), प्रतिमा (मूर्ति), उद्यान गृह, बावली आदि का सुन्दर रीति से निर्माण तथा संस्कार करने की विधि वर्णित हो उसे महर्षियों ने 'शिल्पशास्त्र' कहा है।
समन्यूनाधिकत्वेन सारूप्यादिप्रभेदतः ।
अन्योन्यगुणभूषा तु वर्ण्यतेऽलङ्कृतिश्च सा ॥ ५९ ॥
अलङ्कार शास्त्र लक्षण— जिसमें समता, न्यूनता तथा अधिकता और सादृश्य आदि भेद से परस्पर शब्द तथा अर्थ के गुणों के वैचित्र्य रूप 'अलङ्कृति' (अलङ्कार) का वर्णन हो उसे 'अलङ्कारशास्त्र' कहते हैं।
सरसालङ्कृतादुष्ट-शब्दार्थं काव्यमेव तत् ।
विलक्षणचमत्कारबीजं पद्यादिभेदतः ॥ ६० ॥
चतुर्थोऽध्याये विद्याकलानिरूपणप्रकरणम् १३१
**काव्य लक्षण—**रस तथा अलङ्कार से युक्त, दोषरहित शब्द और अर्थ युक्त कवि की रचना को 'काव्य' कहते हैं। और वह पद्य-गद्यादि भेद से युक्त होकर विचक्षण चमत्कारजनक होता है।
लोकसंकेततोऽर्थानां सुग्रहा वाक् तु देशिकी ।
**देशभाषा लक्षण—**लोगों के संकेत से अर्थों को जल्दी से बोध करानेवाली वाणी को 'देशभाषा' कहते हैं।
बिना कौशिकशास्त्रीयसंकेतैः कार्यसाधिका ॥ ६१ ॥
यथा कालोचिता वाग्बाऽवसरौक्तिस्तु सा स्मृता ।
**अवसरोक्ति लक्षण—**कोश तथा शास्त्र-संबन्धी संकेत के बिना ही अर्थ का बोध करानेवाली समयानुसार उचित कही हुई वाणी को 'अवसरोक्ति' कहते हैं।
ईश्वरः कारणं यत्रादृश्योऽस्ति जगतः सदा ॥ ६२ ॥
श्रुतिस्मती बिना धर्माधर्मौस्तस्ततश्च यावनम् ।
श्रुत्यादिभिन्नधर्मोऽस्ति यत्र तद्यावनं मतम् ॥ ६३ ॥
**यावन ग्रन्थ तथा मत लक्षण—**जिसमें सदा अदृश्य रहनेवाला ईश्वर जगत् का कारण माना गया है और श्रुति-स्मृति के बिना धर्म तथा अधर्म की व्यवस्था की गई है, उसे 'यावन (यवनों का) ग्रन्थ' कहते हैं। जिसमें श्रुति आदि से भिन्न धर्म का प्रतिपादन किया गया है उसे 'यावन (यवनों का) मत' कहते हैं।
कल्पितश्रुतिमूलो वाऽमूलो लोकैर्धृतः सदा ।
देशादिधर्मः स ज्ञेयो देशे देशे कुले कुले ॥ ६४ ॥
**देशादि धर्म लक्षण—**हर एक देश तथा कुल में जो लोगों के द्वारा कल्पित वेदमूलक या वेदमूलक से भिन्न (मूलरहित) आचार सदा धारण किया गया है उसे 'देशादिधर्म' कहते हैं।
पृथक्पृथक्तु विद्यानां लक्षणं संप्रकाशितम् ।
कलानां न पृथङ्नाम लक्ष्म चास्तीह केवलम् ॥ ६५ ॥
इस प्रकार से पृथक् २ विद्याओं के लक्षणों का तो वर्णन भलीभांति किया गया, किन्तु केवल कलाओं का नाम तथा लक्षण पृथक् रूप से नहीं यहाँ कहा जा सका।
पृथक्पृथक् क्रियाभिर्हि कलाभेदस्तु जायते ।
यां यां कलां समाश्रित्य तन्नाम्ना जातिरुच्यते ॥ ६६ ॥
क्योंकि कलाओं का क्रिया द्वारा ही पृथक् २ भेद होता है। और जिस २ कला का आश्रय लेकर लोग जीविका चलाते हैं उन कलाओं के नाम से उनकी जातियां कही जाती हैं।
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हावभावादिसंयुक्तं नर्तनं तु कला स्मृता ।
अनेकवाद्यविकृतौ ज्ञानं तद्वादनं कला ॥ ६७ ॥
गान्धर्व वेदोक्त ७ कलाओं के लक्षण— १—हाव-भाव के साथ नाचने को 'नृत्यकला' कहते हैं । २—अनेक प्रकार के वाद्य यन्त्रों (बाजों) के बनाने तथा बजाने के ज्ञान को 'वाद्य' तथा 'वादन' कला कहते हैं ।
वस्त्रालङ्कारसंधानं स्त्रीपुंसोश्च कला स्मृता ।
अनेकरूपाविर्भावकृतिज्ञानं कला स्मृता ॥ ६८ ॥
३. स्त्री तथा पुरुष को वस्त्र तथा आभूषण को सुन्दर रीति से पहनाने को 'वस्त्रालङ्कार संधान' कला कहते हैं । ४. अनेक प्रकार के रूप-प्रगट करने की विधि का जानना 'रूप प्रकाशन कला' कहते हैं ।
शय्यास्तरणसंयोग-पुष्पादिग्रथनं कला ।
द्यूताद्यनेकक्रीडाभी रञ्जनं तु कला स्मृता ॥ ६९ ॥
५. शय्या तथा बिछोने को भलीभांति लगाकर उस पर पुष्प आदि को सुन्दर गूंथ या सजा कर रखने को भी कला कहते हैं । ६. द्यूत (जूआ) आदि अनेक क्रीडाओं (खेलों) द्वारा मनोरंजन करने को भी कला कहते हैं।
अनेकासनसन्धाने रतेर्ज्ञानं कला स्मृता ।
कलासप्तकमेतद्धि गान्धर्वे समुदाहृतम् ॥ ७० ॥
७. अनेक प्रकार का आसन करके रति (मैथुन) करने के ज्ञान को भी कला कहते हैं । इन ७ कलाओं का वर्णन 'गान्धर्ववेद' में किया गया है ।
मकरन्दासवादीनां मद्यादीनां कृतिः कला ।
शल्यगूढाहृतौ ज्ञानं शिराव्रणव्यधे कला ॥ ७१ ॥
आयुर्वेदोक्त १० कलाओं के लक्षण— ८. मकरन्द (पुष्परस) से आसवादि मादक द्रव्य तथा मद्यादि बनाने को भी कला कहते हैं । ९. गिरे हुये शल्य (विंधे हुये कांटा आदि) को सुखपूर्वक निकालने तथा सिराओं पर उत्पन्न हुये व्रण को शस्त्र से चीरने के ज्ञान को भी कला कहते हैं ।
हीङ्गादिरससंयोगा-न्नादिसंपाचनं कला ।
वृक्षादिप्रसवारोपपालनादिकृतिः कला ॥ ७२ ॥
१०. हींग आदि द्रव्यों तथा लवणादि रसों के संयोग से अन्नादि के पकाने को भी कला कहते हैं । ११. वृक्षादि के फलने, लगाने तथा रक्षा करके बड़ा करने की क्रिया को जानना भी कला कहते हैं ।
पाषाणधात्वादिद्रुतिस्तद्भस्मकरणं कला ।
यावदिक्षुविकाराणां कृतिज्ञानं कला स्मृता ॥ ७३ ॥
१२. पत्थरों का तोड़ना तथा स्वर्णादि धातुओं को गलाना और उनको
चतुर्थाध्याये विद्याकलानिरूपणप्रकरणम् २३३
असर करना भी कला कही जाती है। १३. जितने गुडादि हैं उनके बनाने की विधि जानना कला है।
धात्वौषधीनां संयोग-क्रियाज्ञानं कला स्मृता ।
धातुसांकर्यपार्थक्य-करणं तु कला स्मृता ॥ ७४ ॥
१४. स्वर्णादि धातुओं तथा औषधियों के मिलाने तथा प्रयोग करने के ज्ञान को भी कला कहते हैं। १५. स्वर्णादि धातुओं को एकत्र मिल जाने के बाद पुनः पृथक् करने को भी कला कहते हैं।
संयोगापूर्वविज्ञानं धात्वादीनां कला स्मृता ।
क्षारनिष्कासनज्ञानं कलासंज्ञं तु तत्स्मृतम् ॥ ७५ ॥
कलादशकमेतद्धि ह्यायुर्वेदागमेषु च ।
१६. धात्वादिकों के अपूर्व रीति से संयोग करने के ज्ञान को भी कला कहते हैं। १७. क्षार निकालने को भी कला कहते हैं। ये १० कलायें आयुर्वेद-शास्त्र के ग्रन्थों में वर्णित हैं।
शस्त्रसन्धानविक्षेपः पदाद्विन्यासतः कला ॥ ७६ ॥
संध्याघाताकृष्टिमैदैर्मल्लयुद्धं कला स्मृता ।
धनुर्वेदोक्त ५ कलाओं के लक्षण— १८. पैर आदि को पैतरे के साथ रखते हुये निशाना साध कर शस्त्रों के चलाने को भी कला कहते हैं। १९. सन्धि स्थानों पर प्रहार करना तथा पकड़ कर खींचना आदि भेदों के साथ मल्लयुद्ध (कुश्ती लड़ना) करने को भी कला कहते हैं।
बाहुयुद्धन्तु मल्लाना-मशास्त्रं मुष्टिभिः स्मृतम् ॥ ७७ ॥
मृतस्य तस्य न स्वर्गो यशो नेहापि विद्यते ।
बिना शस्त्र के केवल मुष्टियों (मुक्कों) द्वारा प्रहार करते हुये मल्लों का युद्ध होता है उसे 'बाहुयुद्ध' कहते हैं। इसमें जो मरता है उसको न तो स्वर्ग और न इस लोक में यश ही प्राप्त होता है।
बलदर्पविनाशान्तं नियुद्धं यशसे रिपोः ॥ ७८ ॥
न कस्यासीत कुर्याद् वा प्राणान्तं बाहुयुद्धकम् ।
शत्रु के बल के दर्पका नाश होने तक होनेवाला युद्ध किसके यश के लिये नहीं होता है ? अर्थात् सबके लिये होता है। अतः जब तक प्राण न निकल जाय तब तक बाहुयुद्ध करना ही चाहिये।
कृतप्रतिकृतैश्चित्रैर्बाहुभिश्च सुसङ्कटैः ॥ ७९ ॥
सन्निपातावघातैश्च प्रमादोन्मथनैस्तथा ।
कृतं निपीडनं ज्ञेयं तन्मुक्तिस्तु प्रतिक्रिया ॥ ८० ॥
बाहु का प्रहार करना, बाहुप्रहार को रोकना, नाना प्रकार से बाहुप्रहार
२३४ | शुक्रनीतिः
करना, अत्यन्त भीषण बाहु प्रहार करना, शत्रु के ऊपर लगातार बाहुप्रहार करना, और बाहुप्रहार से चोट पहुँचाना तथा असावधान होने पर शत्रु को बाहुओं से मसल डालना इत्यादि रीतियों से किये हुये बाहुयुद्ध को 'निपीड़न' कहते हैं। इससे अपने को बचा लेने को 'प्रतिक्रिया' कहते हैं। ये सब बाहुयुद्ध की कला के अन्दर ही माने जाते हैं।
कलाऽभिलक्षिते देशे यन्त्राद्यस्त्रनिपातनम्।
वाद्यसङ्केततो व्यूहरचनादि कला स्मृता ॥८१॥
२०. लक्ष्य के स्थान पर युद्ध-यन्त्रादि तथा अस्त्रों को फेंकना (निशाना लगाकर अस्त्र चलाना) भी कला है। २१. युद्ध के बाजों के संकेत से व्यूहरचना आदि करना भी कला है।
गजाश्वरथगत्या तु युद्धसंयोजनं कला।
कलापञ्चकमेतद्धि धनुर्वेदागमे स्थितम् ॥८२॥
२२. हाथियों, घोड़ों तथा रथों को विशेष रूप से चलाने के द्वारा युद्ध का आयोजन करना भी कला है। ये पांच कलायें धनुर्वेद शास्त्र में कही हुई हैं।
विविधासनमुद्राभिर्देवतातोषणं कला।
सारथ्यं च गजाश्वादेर्गतिशिक्षा कला•स्मृता ॥८३॥
पृथक् ४ कलाओं के लक्षण—२३. अनेक प्रकार के पद्मासनादि आसनों तथा मत्स्य-कूर्मादि मुद्राओं द्वारा देवता को संतुष्ट करना भी कला है। २४. रथ हांकने को एवं २५. हाथी तथा घोड़े को चाल सिखाने को भी कला कहते हैं।
मृत्तिकाकाष्ठपाषाणधातुभाण्डादिसत्क्रिया ।
पृथक्कलाचतुष्कन्तु चित्राद्यालेखनं कला ॥८४॥
२६-२९. मिट्टी, काष्ठ, पत्थर तथा धातु के वर्त्तन आदि को सुन्दर रीति से बनाना ये भी पृथक् २ चार कलायें हैं। ३०. चित्र आदि का सुन्दर लिखना भी कला है।
तडागवापीप्रासादसमभूमिक्रिया कला ।
घट्याद्यनेकयन्त्राणां वाद्यानां तु कृतिः कला ॥८५॥
तडागकूपादि कलाओं के लक्षण—३१. तालाब, बावड़ी, राजभवन तथा भूमि को समतल बनाने की क्रिया भी कला है। ३२. घड़ी आदि अनेक यन्त्रों को बनाना भी कला है। ३३. और अनेक प्रकार के बाजों को बनाना भी कला है।
हीनमध्यादिसंयोग-वर्णाद्यै रञ्जनं कला।
जलवाय्वग्निसंयोगनिरोधैश्च क्रिया कला ॥८६॥
चतुर्थोऽध्याये विद्याकलानिरूपणप्रकरणम् । २३५
३४. हीन, मध्यम तथा उत्तम रूप से मिलाये हुये रङ्ग आदि के द्वारा वस्त्रादि रंगना भी कला है। ३५. जल, वायु और अग्नि के संयोग और निरोध के द्वारा बाष्प (भाफ) यन्त्र बनाकर उससे कार्य करना भी कला है।
नौकारथादियानानां कृतिज्ञानं कला स्मृता ।
सूत्रादिरज्जुकरणं विज्ञानं तु कला स्मृता ॥ ८७ ॥
३६. नौका, रथ आदि सवारियों के निर्माण करने के ज्ञान को भी कला कहते हैं। ३७. सूत्र आदि से रस्सी तैयार करना भी कला है।
अनेकतन्तुसंयोगैः पटबन्धः कला स्मृता ।
वेधादिसदसज्ज्ञानं रत्नानां च कला स्मृता ॥ ८८ ॥
३८. अनेक सूत्रों के संयोग से कपड़ा बुनना भी कला है। ३९. रत्नों में छिद्र करना तथा उसके अच्छे-बुरे का जानना भी कला है।
स्वर्णादीनां तु याथात्म्य-विज्ञानं च कला स्मृता ।
कृत्रिमस्वर्णरत्नादि-क्रियाज्ञानं कला स्मृता ॥ ८९ ॥
४०. स्वर्णादि धातुओं को भलीभांति परखना भी कला है। ४१. कृत्रिम सोना तथा रत्नादि बनाना भी कला है।
स्वर्णाद्यलङ्कारकृतिः कला लेपादिसत्कृतिः ।
मार्दवादिक्रियाज्ञानं चर्मणां तु कला स्मृता ॥ ९० ॥
४२. स्वर्णादि का आभूषण बनाना तथा स्वर्णादि का पानी चढ़ाना भी कला है। ४३. चमड़ों को मृदु बनाना (सिझाना) भी कला है।
पशुचर्माङ्गनिर्हार-क्रियाज्ञानं कला स्मृता ।
दुग्धदोहादिविज्ञानं घृतान्तन्तु कला स्मृता ॥ ९१ ॥
४४. पशुओं के चमड़ों को उनके शरीर से अलग करने की रीति जानना भी कला है। ४५. दूध दुहना आदि से लेकर घी बनाने पर्यन्त क्रियाओं का जानना भी कला है।
सीवने कञ्चुकादीनां विज्ञानं तु कलात्मकम् ।
बाह्वादिभिश्च तरणं कलासंज्ञं जले स्मृतम् ॥ ९२ ॥
४६. कञ्चुक (पहिनने के वस्त्र) आदि वस्त्रों को सीने की क्रिया जानना भी कला है। ४७. जल में बाहु आदि से तैरना भी कला है।
मार्जने गृहभाण्डादेर्विज्ञानं तु कला स्मृता ।
वस्त्रसंमार्जनं चैव क्षुरकर्म कले ह्युभे ॥ ९३ ॥
४८. गृह के धातु के बर्तनों को सफा करना भी कला है। ४९. वस्त्र भलीभांति सफा करना, ५०. और बाल बनाना ये दोनों भी कलाये हैं।
तिलमांसादिस्नेहानां कला निष्कासने कृतिः ।
२३६ | शुक्रनीतिः
सीराद्याकर्षणे ज्ञानं वृक्षाद्यारोहणे कला ॥ ९४ ॥
५१. तिल और मांस आदि से तेल निकालने की क्रिया भी कला है। ५२. हल चलाने की और वृक्ष आदि पर चढ़ने की क्रिया जानना भी कला है ।
मनोऽनुकूलसेवायांः कृतिज्ञानं कला स्मृता ।
वेणुतृणादिपात्राणां कृतिज्ञानं कला स्मृता ॥ ९५ ॥
५३. मनोऽनुकूल सेवा करने की क्रिया जानना भी कला है । ५४. बांस तथा तृण आदि का पात्र बनाने की क्रिया भी कला है ।
काचपात्रादिकरणविज्ञानं तु कला स्मृता ।
संसेचनं संहरणं जलानां तु कला स्मृता ॥ ९६ ॥
५५. काच ( सीसे ) के पात्रादि बनाने की क्रिया भी कला है । ५६. जलों के द्वारा सींचना और जल का आवश्यकतानुसार लाना और निकालना भी कला है ।
लोहाभिसारशस्त्रास्त्रकृतिज्ञानं कला स्मृता ।
गजाश्ववृषभोष्ट्राणां पल्याणादिक्रिया कला ॥ ९७ ॥
५७. लोह के अस्त्र-शस्त्रादि बनाने की क्रिया भी कला है । ५८. हाथी, घोड़े तथा ऊंटों के पीठ पर रखने योग्य गद्दी-जीन आदि बनाने की क्रिया भी कला है ।
शिशोः संरक्षणे ज्ञानं धारणे क्रीडने कला ।
सुयुक्तताडनज्ञान-मपराधिजने कला ॥ ९८ ॥
५९. शिशु की रक्षा करने, गोदी में धारण करने तथा क्रीड़ा कराने की क्रिया जानना भी कला है । ६०. अपराधी लोगों को उचित मारने-पीटने की क्रिया जानना भी कला है ।
नानादेशीयवर्णानां सुसम्यग्लेखनं कला ।
ताम्बूलरक्षादिकृति-विज्ञानं तु कला स्मृता ॥ ९९ ॥
६१. अनेक देशों की वर्ण-मालाओं को सुन्दर रीति से लिख लेना भी कला है । ६२. ताम्बूल ( पान ) की रक्षा ( रखने ) आदि की क्रिया जानना भी कला है ।
आदानमाशुकारित्वं प्रतिदानं चिरक्रिया ।
कलासु द्वौ गुणौ ज्ञेयौ द्वे कले परिकीर्तिते ॥ १०० ॥
६३-६४. कलाओं के करने में शीघ्रता के साथ उसे करना 'आदान' और देर तक करते रहना 'प्रतिदान' कहलाता है अथवा किसी के ग्रहण करने
चतुर्थोऽध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २३७
चतुर्थोऽध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २३७
में शीघ्रता करना और देने में विलम्ब करना ये दोनों यद्यपि गुण हैं तथापि पृथक् २ ही कलायें मानी गई हैं ।
चतुःषष्टिकला ह्येताः संक्षेपेण निदर्शिताः ।
यां यां कलां समाश्रित्य तां तां कुर्यात्स एव हि ॥ १०१ ॥
इति शुक्रनीतौ चतुर्थाध्यायस्य राष्ट्रे आद्यं विद्याकलानिरूपणं नाम तृतीयं प्रकरणम् ।
संक्षेप से ये ६४ कलायें कही गईं । इनमें से जिस २ कला का जो मनुष्य आश्रय लेकर उसमें निपुण बनता है । सर्वथा निपुणता के साथ करने के लिये उसी २ कला को सदा उसे करते रहना चाहिये ।
इस प्रकार शुक्रनीति की भाषाटीका के चतुर्थाध्याय में आद्य विद्याकला-निरूपण-नाम तृतीय प्रकरण समाप्त ।
चतुर्थाध्यायस्य लोकधर्म-निरूपणं नाम चतुर्थं प्रकरणम् ।
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिः क्रमात् ।
चत्वार आश्रमाश्चैते ब्राह्मणस्य सदैव हि ॥ १ ॥
अन्येषामन्त्यहीनाश्च क्षत्रविट्शूद्रकर्मणाम् ।
४ आश्रमों का नाम निर्देश— ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यासी इन चारों के क्रम से ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य, वानप्रस्थ, संन्यास ये ४ आश्रम सदा ब्राह्मणों के ही होते हैं । इनमें से आखिरी संन्यास को छोड़कर शेष ३ आश्रम ब्राह्मण से अन्य क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रों के होते हैं ।
विद्यार्थी ब्रह्मचारी स्यात् सर्वेषां पालने गृही ॥ २ ॥
वानप्रस्थः सन्दमने संन्यासी मोक्षसाधने ।
४ आश्रमों में कृत्यों का निर्देश— विद्या पढ़ने के लिये ब्रह्मचारी, सभी आश्रमों के पालनार्थ गृही ( गृहस्थ ), इन्द्रियों के दमनार्थ वानप्रस्थ, मोक्ष-साधनार्थ संन्यासी बनना उचित होता है ।
वर्तयन्त्यन्यथा दण्ड्या या वर्णाश्रमजातयः ॥ ३ ॥
जो वर्ण आश्रम तथा जाति के लोग अपने २ धर्म के विरुद्ध आचरण करते हैं वे राजा के द्वारा दण्डनीय होते हैं ।
यदि राज्ञोपेक्षितानि दण्डतोऽशिक्षितानि च ।
कुलान्यकुलतां यान्ति ह्यकुलानि कुलीनताम् ॥ ४ ॥
यदि राजा उपेक्षा कर देवे और दण्ड द्वारा शिक्षा न देवे तो उच्च कुलवालेः
| २३८ | शुक्रनीतिः |
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नीच कुल के भाव को एवं नीच कुलवाले उच्च कुल के भाव को धारण करने लगते हैं अर्थात् सब स्वेच्छाचारी हो जाते हैं ।
देवपूजां नैव कुर्यात् स्त्री शूद्रस्तु पतिं विना ।
जपस्तपस्तीर्थसेवा-प्रव्रज्या-मन्त्रसाधनम् ॥ ५ ॥
स्त्री और शूद्र को देवपूजादि न करने का निर्देश— स्त्री तथा शूद्र को क्रम से पति तथा स्वामी की सेवा छोड़ कर जप, तप, तीर्थ-सेवन, संन्यास, मन्त्र की साधना और देवता की पूजा नहीं ही करनी चाहिये ।
न विद्यते पृथक् स्त्रीणां त्रिवर्गविधिसाधनम् ।
स्त्रियों के लिये पतिसेवा से अन्य धर्म का निषेध— स्त्रियों के लिये पति की सेवा को छोड़कर अन्य कोई धर्म, अर्थ तथा काम की सिद्धि के लिये साधन नहीं है ।
पत्युः पूर्वं समुत्थाय देहशुद्धिं विधाय च ॥ ६ ॥
उत्थाप्य शयनीयानि कृत्वा वेश्मविशोधनम् ।
मार्जनैर्लेपनैः प्राप्य सानलं यवसाङ्गणम् ॥ ७ ।
शोधयेद्यज्ञपात्राणि स्निग्धान्युष्णेन वारिणा ।
प्रोक्षणीयानि तान्येव यथास्थानं प्रकल्पयेत् ॥ ८ ॥
शोधयित्वा तु पात्राणि पूरयित्वा तु धारयेत् ।
स्त्रियों के नित्य कृत्यों का निर्देश— स्त्री प्रतिदिन पति से पूर्व शय्या से उठकर शरीर-शुद्धि ( मुख-प्रक्षालनादि ) करके और बिछी हुई शय्या को उठाकर रखने के बाद झाडू से बुहार कर तथा लीपकर गृह की सफाई करे। उसके बाद अग्नियुक्त तथा घास पड़े हुये आंगन में पहुँच कर वहां की सफाई करे। और घृत से चिकने यज्ञपात्रों को गर्म जल से धोकर पोछकर पुनः उन्हें अपने २ स्थानों पर रख दे। और उन्हें रखने के पूर्व खूब सुखाकर ( जिससे जल का अंश न रहने पावे ) पुनः घृतादि से पूर्ण करके यथास्थान रख देवे ।
महानसस्थ-पात्राणि बहिः प्रक्षाल्य सर्वशः ॥ ९ ॥
मृद्भिस्तु शोधयेच्चुल्लीं तत्राग्निं सेन्धनं न्यसेत् ।
स्मृत्वा नियोगपात्राणि रसान्नान्नद्रविणानि च ॥ १० ॥
कृतपूर्वाह्णकार्य्यं श्वशुरावभिवादयेत् ।
उसके बाद रसोईगृह के पात्रों को बाहर निकालकर चारो तरफ से खूब मांज-धोकर मिट्टी से चुल्ली तथा रसोई घर लीपकर वहां पर अग्नि तथा लकड़ी रख देवे और उस दिन कार्य में आनेवाले पात्रों एवं लवणादि रस, अन्न तथा धन का ख्याल करके उसकी व्यवस्था करती रहे। पश्चात् पूर्वाह्ण
चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २३६
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(दिन के पूर्व भाग) के सब कृत्यों को समाप्त करके स्त्री सास तथा श्वशुर को जाकर प्रणाम करे ।
ताभ्यां भर्त्रा पितृभ्यां वा भ्रातृमातुलबान्धवैः ॥ ११ ॥ वस्त्रालङ्काररत्नानि प्रदत्तान्येव धारयेत् ।
और वह सास-श्वशुर, पति, माता-पिता, भाई, मामा, बान्धव (कुटुम्ब के लोग) इन सबों से दिये गये ही वस्त्र, अलङ्कार तथा रत्नों को धारण करे ।
मनोवाक्कर्मभिः शुद्धा पतिदेशानुवर्तिनी ॥ १२ ॥ छायेवानुगता स्वच्छा सखीव हितकर्मसु । दासीव दिष्टकार्येषु भार्या भर्तुः सदा भवेत् ॥ १३ ॥
मन, वचन तथा कर्म से पवित्र एवं निर्मल रहकर पति की आज्ञा के अनुसार चलनेवाली, छाया की भांति अनुगमन करनेवाली, हितकर कार्यों में सखी (मित्र) की भांति और बताये हुये कार्यों में दासी की भांति सदा स्त्री को अपने स्वामी के निकट रहना चाहिये ।
ततोऽन्नसाधनं कृत्वा पतये बिनिवेद्य सा । वैश्वदेवोद्धृतैरन्नैर्भोजनीयांश्च भोजयेत् ॥ १४ ॥
उसके बाद वह अन्न पकाकर पति के सामने रख कर वैश्वदेव से बचे हुये अन्न से भोजन कराने योग्य लोगों को भोजन करावे ।
पतिं च तदनुज्ञाता शिष्टमन्नाद्यमात्मना । भुक्त्वा नयेदहःशेषं सदाऽऽयव्ययचिन्तया ॥ १५ ॥
और पति को भोजन कराने के बाद उनकी आज्ञा लेकर बचे हुये अन्नादि को स्वयं भोजन कर सदा आय तथा व्यय का विचार करते हुये दिन के अवशिष्ट भाग को बितावे ।
पुनः सायं पुनः प्रातर्गृहशुद्धिं विधाय च । कृतान्नसाधना साध्वी सभृत्यं भोजयेत् पतिम् ॥ १६ ॥
फिर शाम को प्रातःकाल की भांति दुबारा गृह की सफाई करके भोजन बनाकर साध्वी स्त्री भृत्यों के सहित पति को भोजन करावे ।
नातितृप्ता स्वयं भुक्त्वा गृहनीतिं विधाय च । आस्तृत्य साधु शयनं ततः परिचरेत्पतिम् ॥ १७ ॥
उसके बाद स्वयं भी अत्यन्त अधिक भोजन नहीं किये हुई अवशिष्ट नियमित गृहकृत्य को समाप्त कर शय्या बिछा उस पर पति को सुलाकर उसकी भलीभांति पैर दबाना आदि परिचर्या करे ।
सुप्ते पतौ तदभ्यास्य स्वयं तद्गतमानसा । अनग्ना चाप्रमत्ता च निष्कामा विजितेन्द्रिया ॥ १८ ॥
| २४० | शुक्रनीतिः |
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नोच्चैर्वदेन्न परुषं न बह्वाहूतिमप्रियम् ।
न केनचिच्च विवदे-दप्रलापविवादिनी ॥ १९ ॥
न चास्य व्ययशीला स्यान्न धर्म्मार्थविरोधिनी ।
पति के सो जाने पर स्वयं भी पति में मनको लगाते हुये उसकी शय्या पर सो जावे। और स्त्री कभी नग्न न रहे, असावधानी न करे, किसी वस्तु की कामना न प्रगट करे, इन्द्रियों को अपने वश में रक्खे, उच्चस्वर से बात-चीत न करे, न कठोर स्वर से बोले, और न किसी को बहुत पुकारे, न अप्रिय वचन कहे, न किसी के साथ विवाद करे, और यदि विवाद करना ही पड़े तो विवाद के समय निरर्थक वचन न बोले, और पति का अधिक धनव्यय कराने-वाली एवं धर्म तथा अर्थ सम्बन्धी कार्यों का विरोध करनेवाली भी न होवे ।
प्रमादोन्मादरोषेर्ष्या-वचनान्यतिनिन्दिताम् ॥ २० ॥
पैशुन्यहिंसाविषय-मोहाहंकारदर्पताम् ।
नास्तिक्यसाहसस्तेय-दम्भान् साध्वी विवर्जयेत् ॥ २१ ॥
**साध्वी स्त्रियों को पैशुन्यादि-त्याग का निर्देश—**और साध्वी स्त्री असाव-धानता, उन्मत्तता, क्रोध तथा ईर्ष्या को प्रगट करनेवाले वचनों को एवं अति-निन्दित चुगलखोरी, हिंसा, विषयों के प्रति मोह, अहङ्कार, अपनी श्रेष्ठता, नास्तिकता, सहसा कार्य कर बैठना, चोरी, दम्भ इन सबों को छोड़ देवे।
एवं परिचरन्ती सा पतिं परमदैवतम् ।
यशस्यमिह यात्येव परत्रैषा सलोकताम् ॥ २२ ॥
**यथोक्त पति सेवा से पतिलोक जाने का निर्देश—**इस प्रकार से पति को ही परम देवता मानकर परिचर्या करती हुई वह स्त्री इस लोक में सुन्दर यश तथा परलोक में पतिलोक को प्राप्त करती है।
योषितो नित्यकर्मोक्तं नैमित्तिकमथोच्यते ।
रजसो दर्शनादेषा सर्व्वमेव परित्यजेत् ॥ २३ ॥
**स्त्रियों के नैमित्तिक कृत्यों का निर्देश—**इस भांति से स्त्रियों के नित्य कर्मों का वर्णन किया गया, अब नैमित्तिक कर्मों का वर्णन कर रहे हैं। वह स्त्री रजोदर्शन के दिन से उक्त सभी नित्य कर्मों का परित्याग कर देवे।
सर्व्वैरलक्षिता शीघ्रं लज्जिताऽन्तर्गृहे वसेत् ।
एकाम्बरा कृशा दीना स्नानालङ्कारवर्जिता ॥ २४ ॥
और सबसे अलक्षित होकर लजाई हुई गृह के अन्दर निवास करे। उस समय एक वस्त्र धारण करके कृश तथा दीन के समान स्नान तथा अलङ्कार से हीन होकर रहे।
स्वपेद् भूमावप्रमत्ता क्षपेदेवमहस्त्रयम् ।
चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २४१
चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २४१
भूमि पर शयन करे, प्रमाद से रहित होकर इस प्रकार से तीन दिन तक व्यतीत करे।
स्नायीत सा त्रिरात्र्यन्ते सचैलाभ्युदिते रवौ ॥ २५ ॥
रजस्वला स्त्री की शुद्धि के समय का निर्देश—इसके बाद तीन रात्रि व्यतीत होने के बाद वह सूर्य के उदय होने पर सारे वस्त्रों के सहित स्नान करे।
विलोक्य भर्तृवदनं शुद्धा भवति धर्मतः ।
कृतशौचा पुनः कर्म पूर्ववच्च समाचरेत् ॥ २६ ॥
उसके बाद पति का मुख देखकर धर्म करने के योग्य शुद्ध हो जाती है । फिर शुद्ध हुई वह पूर्ववत् पुनः कर्म करना प्रारम्भ करे ।
द्विजस्त्रीणामयं धर्मः प्रायोऽन्यासामपीष्यते ।
कृषिपण्यादिपुंकृत्यै भवेयुस्ताः प्रसाधिकाः ॥ २७ ॥
यह द्विजाति ( ब्राह्मण-क्षत्रिय-वैश्य ) की स्त्रियों के लिये धर्म है किन्तु प्रायः अन्य जाति की स्त्रियों के लिये भी उचित है । वे शूद्रजाति की स्त्रियां कृषि तथा वस्तु बेचना आदि पुरुष के कृत्यों में साथ २ कार्य करनेवाली होती हैं, अतः वे नहीं भी इस धर्मं का पालन कर पाती हैं ।
सङ्गीतैर्मधुराऽऽलापैः स्वायत्तस्तु पतिर्यथा ।
भवेत्तथाऽऽचरेयुर्वै मायाभिः कामकेलिभिः ॥ २८ ॥
पतिव्रता स्त्रियों के कर्त्तव्यों का निर्देश—पति जिस प्रकार से अपने अधीन हो सके उसी प्रकार से गाना-बजाना, मधुर बातचीत, मोहित करनेवाली कामक्रीडा इत्यादि का आचरण करना स्त्रियों को उचित है ।
मृते भर्तरि सङ्गच्छेद् भर्तुर्वा पालयेद् व्रतम् ।
परवेश्मरुचिर्न स्याद् ब्रह्मचर्ये स्थिता सती ॥ २९ ॥
पति के मरने पर साथ सती हो जाये अथवा वैधव्य व्रत का पालन करती हुई पतिव्रत और गार्हस्थ्य कर्म का पालन करे । उस समय दूसरे के घर में जाने या रहने की रुचि न करे, और ब्रह्मचर्य व्रत में स्थित रहे ।
भोजनं वर्जयेन्नित्यं तथा• प्रोषितभर्तृका ।
देवताराधनपरा तिष्ठेद् भर्तृहिते रता ॥ ३० ॥
धारयेन्मङ्गलार्थानि किञ्चिदाभरणानि च ।
तथा प्रोषितभर्तृका ( जिसका स्वामी परदेश चला गया हो वह ) स्त्री शरीर को आभूषणादि से मण्डित करना त्याग देवे । पति के हित में लीन रहकर देवता की आराधना में तत्पर रहे । और केवल मङ्गल ( सधवा ) सूचक चूड़ी-नथ आदि थोड़े आभूषणों को धारण करे ।
नास्ति भर्तृसमो नाथो नास्ति भर्तृसमं सुखम् ॥ ३१ ॥
१६ शु०
२४२ | शुक्रनीतिः
विसृज्य धनसर्वस्वं भर्ता वै शरणं स्त्रियः ।
**पति के समान अन्य स्वामी और पति-सेवा समान अन्य सुख का निषेध—**पति के समान कोई दूसरा स्वामी नहीं है, पति का साथ या उसकी सेवा के समान कोई सुख नहीं है क्योंकि धन तथा सम्पूर्ण वस्तु का परित्याग करके रहनेवाली स्त्री का केवल पति ही आश्रय होता है ।
मितं ददाति हि पिता मितं भ्राता मितं सुतः ॥ ३२ ॥
अमितस्य प्रदातारं भर्तारं का न पूजयेत् ।
और पिता, भाई और पुत्र ये सब परिमित सुख देनेवाले होते हैं अतः अपरिमित सुख देनेवाले अपने पति की कौन स्त्री नहीं पूजन करे अर्थात् सभी को पूजन करना चाहिये ।
शूद्रो वर्णश्चतुर्थोऽपि वर्णत्वाद्धर्ममर्हति ॥ ३३ ॥
वेदमन्त्रस्वधास्वाहा-वषट्कारादिभिर्विना ।
पुराणोयुक्तमन्त्रैश्च नमोऽन्तैः कर्म केवलम् ॥ ३४ ॥
**शूद्र-धर्म का निर्देश—**शूद्र भी चौथा वर्ण कहा जाता है अतः वर्ण होने से उसे भी धर्म करना उचित है । अत एव वह वेदमन्त्र, स्वाहा, स्वधा तथा वषट्कार आदि का उच्चारण न करके केवल पुराणोक्त मन्त्रों से अन्त में 'नमः' पद जोड़ कर कर्म करने के योग्य होता है ।
विप्रवद्विप्रभिन्नासु क्षत्रभिन्नासु क्षत्रवत् ।
प्रजाताः कर्म कुर्युर्वै वैश्यभिन्नासु वैश्यवत् ॥ ३५ ॥
**संकर जाति के नियम का निर्देश—**ब्राह्मण की विवाहिता स्त्री में उत्पन्न हुये लोगों को ब्राह्मण की भांति, क्षत्रिय की विवाहिता स्त्री में उत्पन्न हुये लोगों को क्षत्रिय की भांति, वैश्य की विवाहिता स्त्री में उत्पन्न हुये लोगों को वैश्य की भांति कर्म करना चाहिये ।
वैश्यासु क्षत्रविप्राभ्यां जातः शूद्रासु शूद्रवत् ।
अधमादुत्तमायां तु जातः शूद्राधमः स्मृतः ॥ ३६ ॥
स शूद्रादनु सत्कुर्यान्नाममन्त्रेण सर्वदा ।
ब्राह्मण या क्षत्रिय से वैश्य या शूद्र जाति की स्त्री में उत्पन्न हुआ शूद्र के तुल्य कर्म करे । अधम से उत्तम वर्ण की स्त्री में उत्पन्न हुआ शूद्राधम कहा हुआ है । अतः वह शूद्र से हीन होने से मन्त्र के स्थान पर केवल नाम लेकर उसी से सदा सत्कर्म करे ।
ससङ्करचतुर्वर्णा एकत्रैकत्र यावनाः ॥ ३७ ॥
वेदभिन्नप्रमाणास्ते प्रत्यगुत्तरवासिनः ।
एक तरफ सङ्कीर्णजातियों के साथ ब्राह्मणादि चारो वर्ण रहते हैं और एक
चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २४३
तत्र यवनधर्म के माननेवाले लोग रहते हैं। और वे वेद से भिन्न कुरान को प्रमाण माननेवाले एवं पश्चिमोत्तर दिशा में निवास करनेवाले हैं।
तदाचार्यैश्च तच्छास्त्रं निर्मितं तद्धितार्थकम् ॥ ३८ ॥
व्यवहाराय या नीतिरुभयोरविवादिनी ।
और उन यवनों के आचार्यों ने उनके हितार्थ शास्त्र भी बनाये हैं। जिसमें उनके व्यवहार के लिये लोक और परलोक के विरुद्ध न रहनेवाली नीति का वर्णन किया गया है।
कदाचिद् बीजमाहात्म्यात् क्षेत्रमाहात्म्यतः क्वचित् ॥ ३६ ॥
नीचोत्तमत्वं भवति श्रेष्ठत्वं क्षेत्रबीजतः ।
कभी बीज (पुरुष) के गौरव से, कभी क्षेत्र (स्त्री) के गौरव से नीच तथा उत्तम के भाव को सन्तान प्राप्त करती है और कभी क्षेत्र तथा बीज दोनों के गौरव से श्रेष्ठता को प्राप्त करती है।
विश्वामित्रश्च वशिष्ठो मतङ्गो नारदादयः ॥ ४० ॥
तपोविशेषैः सम्प्राप्ता उत्तमत्वं न जातितः ।
क्षत्रिय से उत्पन्न हुये विश्वामित्र, स्वर्ग की वेश्या से उत्पन्न हुये वशिष्ठ, साधारण जाति में उत्पन्न हुये मतङ्ग और दासी के पुत्र नारद आदि भी विशेष तप करने से ही उत्तमता को प्राप्त हुये, न कि जाति से।
स्वस्वजात्युक्तधर्मो यः पूर्वैराचरितः सदा ॥ ४१ ॥
तमाचरेच्च सा जातिर्दण्ड्या स्यादन्यथा नृपैः ।
जातिवर्णाश्रमान् सर्वान् पृथक् चिह्नैः सुलक्षयेत् ॥ ४२ ॥
जिसके पूर्वजों ने अपनी २ जाति के लिये कहे हुये जिस धर्म का सदा आचरण किया है उसको उसीका आचरण करना चाहिये। अन्यथा आचरण करने पर उस जाति के लोग राजा द्वारा दण्डनीय होते हैं। और जाति, वर्ण तथा आश्रम के सभी लोगों को पृथक् २ चिह्नों द्वारा पहचान लेना चाहिये।
यन्त्राणि धातुकाराणां संरक्षेद्दीक्ष्य सर्वदा ।
राजा को स्वर्णकारादिकों को सदा कार्य में नियुक्त करने का निर्देश—
स्वर्णादि धातु का कार्य करनेवाले सुनार आदि लोगों के यन्त्रों (औजारों) की परीक्षा करके राजा को उनके पास रहने देना चाहिये।
कारूशिल्पिगणान् राष्ट्रे रक्षेत् कार्यानुमानतः ॥ ४३ ॥
अधिकान् कृषिकृत्ये वा भृत्यवर्गे नियोजयेत् ।
चौराणां पितृभूतास्ते स्वर्णकारादयस्त्वतः ॥ ४४ ॥
कार्यों की अधिकता तथा कमी का विचार करके तद्नुसार राज्य में कारू (बढ़ई) और शिल्पी (चित्रकार) गणों को राजा बसावे। यदि अधिक हों
२४४ शुक्रनीतिः
तो उन्हें खेती के कार्यों में अथवा नौकरों द्वारा किये जानेवाले किसी कार्यों में लगा दे क्योंकि वे सुनार आदि चोरों के पिता के जगह पर रहते हैं अर्थात् चोरी का माल खरीदकर उनकी पिता के समान रक्षा करते हैं अतः उनकी निगरानी करता रहे।
गङ्झागृहं पृथग् ग्रामात्तस्मिन् रक्षेत्तु मद्यपान् ।
मदिरागृह को ग्राम से पृथक् रखने का निर्देश— और मदिरा बिकने का स्थान ग्राम से बाहर अलग रख कर उसी में मद्यपी लोगों को रखना चाहिये।
न दिवा मद्यपानं हि राष्ट्रे कुर्याद्धि कर्हिचित् ॥ ४५ ॥
दिन में मद्य पीने के निषेध का निर्देश— और राज्य में किसी को दिन में मद्यपान नहीं करने देना चाहिये ।
ग्रामे ग्राम्यान् वने वन्यान् वृक्षान् संरोपयेन्नृपः ।
उत्तमान् विंशतिकरैर्मध्यमांस्तिथिशस्ततः ॥ ४६ ॥
सामान्यान् दशहस्तैश्च कनिष्ठान् पञ्चभिः करैः ।
अजाविगोशकृद्भिर्वा जलैर्मांसैश्च पोषयेत् ॥ ४७ ॥
वृक्षारोपण और पोषण के नियम— ग्राम में होनेवाले वृक्षों को ग्राम में तथा जङ्गल में होनेवाले वृक्षों को जंगल में राजा रोपण करावे, उनमें परस्पर उत्तम को २० हाथ की दूरी पर, मध्यम को १५ हाथ, साधारण को १० हाथ, सबसे निकृष्ट को ५ हाथ की दूरी पर रोपण करवाना चाहिये । और बकरी, भेड़ और गौ की विष्ठा की खाद तथा जल और मांस की खाद देकर उनका पोषण करवाना चाहिये ।
उदुम्बराश्वत्थवटचिञ्चाचन्दनजम्भलाः ।
कदम्बाशोकबकुलबिल्वाम्रातकपित्थकाः ॥ ४८ ॥
राजादनाम्रपुन्नागतूदकाष्ठाम्लचम्पकाः ।
नीपकोकाम्रसरलदाडिमाक्षोटभिस्सटाः ॥ ४९ ॥
शिंशपाशिग्रुबदर-निम्बजम्बीरक्षीरिका ।
खर्जूरदेवकरजफल्गुतापिच्छसिम्भलाः ॥ ५० ॥
कुदालो लवली धात्री क्रमुको मातुलुङ्ककः ।
लकुचो नारिकेलश्च रम्भाऽन्ये सत्फला द्रुमाः ॥ ५१ ॥
सुपुष्पाश्चैव ये वृक्षा ग्रामाभ्यर्णे नियोजयेत् ।
ग्राम्य वृक्षों के नामों का निर्देश— गूलर, पीपल, बर्गेद, इमली, चन्दन, जम्बल (जम्बीरी नींबू), कदम्ब, अशोक, वकुल, विल्व, आमड़ा, कैथ, राजादन (चिरौंजी), आम, पुंनाग, तूदकाष्ठ (वृक्ष विशेष), अम्ल, चम्पा, नीप (जलकदम्ब), कोकम, सरल (चीड़), अनार, अखरोट, भिस्सट, शीशम, शिग्रु
चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २४५
(सहजन) बैर, नीम, जम्भीर, खिरनी, खजूर, देवकरञ्ज, फल्गु ( अञ्जीर ), तापिच्छ, (तमाल ), सिम्बल, कुद्दाल, लवङ्गी ( हरफारेवड़ी ), आंवला, सुपारी, बिजौरा नीबू, बड़हर, नारियल, केला आदि तथा अन्य भी अच्छे फलवाले जो वृक्ष हों उन्हें ग्राम के समीप में लगाना चाहिये।
वामभागेऽथवोद्यानं कुर्याद् वा वासगृहे शुभम् ॥ ५२ ॥
**बगीचा लगाने के स्थान का निर्देश—**निवासगृह के वामभाग में अथवा निवासगृह के हाते के अन्दर ही सुन्दर बगीचा लगाना चाहिये।
सायं प्रातस्तु घर्मान्ते शीतकाले दिनान्तरे ।
वसन्ते पञ्चमेऽह्नस्तु सेच्या वर्षासु न क्वचित् ॥ ५३ ॥
**वृक्षों को ऋतुभेद से सींचने के समयों का निर्देश—**और ग्रीष्म ऋतु में प्रातः तथा सायंकाल में, शीत काल में एक दिन का अन्तर देकर अर्थात् तीसरे दिन, वसन्त ऋतु में दिन के पञ्चम मुहूर्त्त में अथवा पांचवे दिन पर वृक्षों को सींचना चाहिये किन्तु वर्षा में कभी भी नहीं सींचना चाहिये।
फलनाशे कुलुत्थैश्च माषैर्मुद्गैर्यवैस्तिलैः ।
शृतशीतपयःसेकः फलपुष्पाय सर्वदा ॥ ५४ ॥
**वृक्ष के नष्ट न होने का उपाय—**यदि वृक्ष के फल नष्ट हो जाते हों तो इसके लिये कुलथी, उरद, मूंग, जौ, तिल इनमें से किसी एक को डालकर खौटाकर शीतल किये हुये जल-से सीचना चाहिये। इससे वृक्ष सदा फल-फूल देने लगते हैं।
मत्स्याम्भसा तु सेकेन वृद्धिर्भवति शाखिनाम् ।
आविकाजशकृच्चूर्णं यवचूर्णं तिलानि च ॥ ५५ ॥
गोमांसमुदकञ्चेति सप्तरात्रं निधापयेत् ।
उत्सेकः सर्ववृक्षाणां फलपुष्पादिवृद्धिदः ॥ ५६ ॥
**वृक्षों के फल-पुष्प-वृद्धि का उपाय—**मछली के धोने के बाद उसी जल से सींचने से वृक्षों की वृद्धि होती है। और भेड़ तथा बकरी की विष्ठा का चूर्ण, तिल तथा गोमांस और जल इन सबों को सात रात्रि तक वृक्ष के मूल के भीतर देना चाहिये। वृक्षों में इन सबों के प्रयोग से फल और पुष्प की वृद्धि अत्यन्त होती है।
ये च कण्टकिनो वृक्षाः खदिराद्यास्तथापरे ।
आरण्यकास्ते विज्ञेयास्तेषां तत्र नियोजनम् ॥ ५७ ॥
**आरण्य वृक्षों के रोपण के स्थान और नामों का निर्देश—**और जो वृक्ष कटिदार तथा अन्य खैर आदि के हैं, वे जंगली कहाते हैं। इनका रोपण जंगलों में करना चाहिये।
२४६ | शुक्रनीतिः
खदिराश्मन्तशाकाग्निमन्थस्योनाकबन्बुलाः ।
तमाल-शाल-कुटज-धवार्ज्जुनपलाशकाः ॥ ५८ ॥
सप्तपर्ण-शमीतुङ्ग-देवदारु-विकङ्कताः ।
करमर्दैङ्गुदीभूर्ज-विषमुष्टि-करीरकाः ॥ ५९ ॥
शल्लकी काश्मरी पाठा तिन्दुको बीजसारकः ।
हरीतकी च भल्लातः शम्पाकोऽर्कैश्च पुष्करः ॥ ६० ॥
अरिमेदश्च पीतद्रुः शाल्मलिश्च बिभीतकः ।
नरवेलो महावृक्षोऽपरे ये मधूकादयः ॥ ६१ ॥
प्रतानवत्यः स्तम्बिन्यो गुल्मिन्यश्च तथैव च ।
ग्राम्या ग्रामे वने वन्या नियोज्यास्ते प्रयत्नतः ॥ ६२ ॥
जैसे— खैर, अश्मन्तक, सागौन, अरणी, सोनापाठा, बबूर, तमाल, शाल, कुटज (खोरया), अर्जुन, पलाश, धव, सतवन, शमी, तून, देवदारु, विकङ्कत, करौंदा, इङ्गुदी, भोजपत्र, कुचिला, करीर, सलई, खम्भार, पाढ़र, तेंदू, विजय-सार, हरड़, भिलावा, शम्याक, आक, पोहकर, दुर्गन्ध खैर, पीतद्रु, सेमर, बहेड़ा, नरवेल, महावृक्ष और अन्य जो महुआ आदि एवं प्रतान (लम्बी २ पतली शाखाओं) वाली, गुच्छोंवाली, गुल्म (मूल) वाली लतायें हैं इनमें से जो ग्राम में होनेवाले हैं उन्हें ग्राम में और जो वन में होनेवाले हैं उन्हें वन में यत्नपूर्वक लगाना चाहिये।
कूपवापीपुष्करिण्यस्तडागाः सुगमास्तथा ।
कार्याः खाताद् द्वित्रिगुण-विस्तारपदधानिकाः ॥ ६३ ॥
कूपादि में उतरने योग्य सीढ़ियों के बनाने का निर्देश— कूआ, बावली, छोटा तालाब, बड़ा तालाब आदि जलाशय ऐसे बनवाने चाहिये जिसमें लोग सुगमता से उतर सकें। और जलाशय की गहराई से दुगुनी या तिगुनी विस्तार में उसके चारों ओर सीढ़ियां बनवानी चाहिये।
यथा तथा ह्यनेकाश्च राष्ट्रे स्याद्विपुलं जलम् ।
नदीनां सेतवः कार्या निबन्धाः सुमनोहराः ॥ ६४ ॥
नौकादिजलयानानि पारगानि नदीषु च ।
देश में विपुल जल होने एवं पुल आदि बनवाने का प्रबन्ध करने का निर्देश— इस तरह के बहुत से जलाशय राज्य में बनवाना चाहिये, जिससे बहुत जल उनमें भरा रहे। अनेक प्रकार के अत्यन्त मनोहर नदियों में पुल भी बनवाना चाहिये। और नदियों को पार करने के लिये उनमें नौका आदि जलयान बनवाकर रखना चाहिये।
यज्जातिपूज्यो यो देवस्तद्विद्यायाश्च यो गुरुः ॥ ६५ ॥
चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २४७
तद्दान्यानि तज्जातिगृहपङ्क्तिमुखे न्यसेत् ।
जात्यनुकूल पूज्य देव तथा गुरु के गृह बनाने के स्थान का निर्देश— जिस जाति के जो पूज्य देवता हों और उनको विद्या पढ़ानेवाले जो गुरु हों उनके गृह उस जाति के लोगों के मकानों की पंक्ति के संमुख बनाने चाहिये ।
शृङ्गाटके ग्राममध्ये विष्णोर्वा शंकरस्य च ॥ ६६ ॥
गणेशस्य रवेर्देव्याः प्रासादान् क्रमशोऽन्यसेत् ।
ग्राम के चौराहे पर विष्णु आदि के मन्दिर बनाने का निर्देश— गांव के चौराहे या गांव के मध्य में विष्णु, शंकर, गणेश, सूर्य तथा देवी इन पञ्चदेवों के मन्दिर क्रमशः बनाने चाहिये ।
मेर्वादिषोडशविधलक्षणान् सुमनोहरान् ॥ ६७ ॥
वर्तुलांश्चतुरस्रान् वा यन्त्राकारान् समण्डपान् ।
प्राकारगोपुरगणयुतान् द्वित्रिगुणोच्छ्रितान् ॥ ६८ ॥
यथोक्तान्तःसुप्रतिमाञ्जलमूलान् विचित्रितान् ।
मेरु आदि मन्दिर के १६ प्रकारों का सलक्षण निर्देश— जो मन्दिर मेरु आदि १६ प्रकार के लक्षणों से युक्त, अत्यन्त मनोहर, गोलाकार, चौकोर या यन्त्राकार से युक्त, मण्डप, प्राकार ( परकोटा ) तथा प्रधान विशाल द्वारों से युक्त, परिचारक वर्गों से युक्त, लम्बाई-चौड़ाई से दुगुना या तिगुने ऊंचे हों और जिनके मध्य में शास्त्रोक्त रीति से बनी हुई सुन्दर देवमूर्त्तियां रखी हों । एवं जिनके चारों ओर खाइयों में जल भरा हो तथा जिनमें नाना प्रकार के चित्र बने हों ।
रम्यः सहस्रशिखरः सपादशतभूमिकः ॥ ६६ ॥
सहस्रहस्तविस्तार उच्छ्रायः स्यान्मेरुसंज्ञकः ।
जिस मन्दिर में १ हजार कंगूरे बने हों और १२५ पगभूमि हो, तथा जिसका १ हजार हाथ का विस्तार तथा ऊंचाई हो, वह मेरु संज्ञक होता है ।
ततस्ततोऽष्टांशहीना अपरे मन्दरादयः ॥ ७० ॥
मन्दरो ऋक्षमाली च द्युमणिश्चन्द्रशेखरः ।
माल्यवान् पारियात्रश्च रत्नशीर्षश्च धातुमान् ॥ ७१ ॥
पद्मकोशः पुष्पहासः श्रीकरः स्वस्तिकाभिधः ।
महापद्मः पद्मकूटः षोडशो विजयाभिधः ॥ ७२ ॥
इससे उत्तरोत्तर अष्टांश हीन अन्य मन्दर आदि नामवाले मन्दिर होते हैं। जिनके नाम क्रम से २. मन्दर, ३. ऋक्षमाली, ४. द्युमणि, ५. चन्द्रशेखर, ६. माल्यवान्, ७. पारियात्र, ८. रत्नशीर्ष, ९. धातुमान्, १०. पद्मकोश,
२४८ | शुक्रनीतिः
११. पुष्पहास, १२. श्रीकर, १३. स्वस्तिक, १४. महापद्म, १५. पद्मकूट, १६. विजय ये सब हैं।
तन्मण्डपश्च तत्तुल्यः पादन्यूनोच्छ्रितः पुरः ।
स्वाराध्यदेवताध्यानैः प्रतिमास्तेषु योजयेत् ॥ ७३ ॥
**मेर्वादियों के अनुसार उनके मण्डपों के प्रमाणों का निर्देश—**उन मन्दिरों के मण्डप ( देवताभवन ) उन्हीं के अनुरूप उनकी ऊँचाई से चतुर्थांश कम ऊँचे आगे भाग में बनाने चाहिये। उनमें अपने आराध्य देवताओं के ध्यान के अनुसार देवता की मूर्तियां स्थापित करनी चाहिये।
ध्यानयोगस्य संसिद्धयै प्रतिमालक्षणं स्मृतम् ।
प्रतिमाकारको मर्त्यो यथा ध्यानरतो भवेत् ॥ ७४ ॥
तथा नान्येन मार्गेण प्रत्यक्षेणापि वा खलु ।
**ध्यान योग में प्रतिमा की साधनमुख्यता का निर्देश—**ध्यान योग की भलीभांति सिद्धि के लिये प्रतिमारूपी साधन मुख्य कहा है, क्योंकि प्रतिमा बनानेवाला मनुष्य जैसा ध्यान में लीन हो जाता है वैसा निश्चय अन्य मार्ग से या प्रत्यक्ष देवता के देखने से भी ध्यान में लीन नहीं हो सकता है।
प्रतिमा सैकती पैष्टी लेख्या लेप्या च मृन्मयी ॥ ७५ ॥
वार्क्षी पाषाणधातूत्था स्थिरा ज्ञेया यथोत्तरा ।
**बालू से लेकर धातु पर्यन्त की बनी प्रतिमाओं की उत्तरोत्तर स्थिरता की अधिकता का निर्देश—**प्रतिमायें बालू की, चावल आदि को पीस कर उसके पिण्ड की, चित्र की, लेप की, मिट्टी की, काष्ठ की, पाषाण की, धातु की बनती हैं। ये उत्तरोत्तर एक से दूसरी अधिक स्थिर होती हैं।
यथोक्तावयवैः पूर्णा पुण्यदा सुमनोहरा ॥ ७६ ॥
अन्यथाऽऽयुर्धनहरा नित्यं दुःखविवर्द्धिनी ।
**शास्त्रोक्त तथा अन्यथा रीति से बनी प्रतिमा के फल—**यदि प्रतिमा शास्त्रोक्त नियमानुसार अङ्गों से परिपूर्ण बनी हो तो वह पुण्य देनेवाली तथा अत्यन्त मनोहर होती है। यदि अन्यथा रीति से बनी हो तो आयु तथा धन को हरण करनेवाली और नित्य दुःख को बढ़ानेवाली होती है।
देवानां प्रतिबिम्बानि कुर्याच्छ्रेयस्कराणि च ॥ ७७ ॥
स्वर्ग्याणि मानवादीनामस्वर्ग्यान्यशुभानि च ।
**देव-प्रतिमा की शुभकारिता मानव-प्रतिमा की अशुभकारिता का निर्देश—**देवताओं की प्रतिमायें बनवानी चाहिये क्योंकि वे शुभकारक तथा स्वर्गदायक होती हैं। और मनुष्यों की प्रतिमायें तो अशुभकारक तथा स्वर्ग देनेवाली नहीं होती हैं।