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शुकसप्तति : एक आलोचनात्मक अध्ययन

Shuksaptati: Ek Alochanatmak Adhyayan

श्रीमती हिमांशु द्विवेदी द्वारा

DevanagariHindipublished208 पृष्ठ

बोध होने लगा। इस प्रकार आध्यात्मिक जगत मे जो 'ब्रह्मानन्द' का वाचक था, वही काव्य जगत् में 'ब्रह्मानन्द सहोदर काव्यतत्व' का वाचक हो गया।

रस की परिभाषा :

भिन्न-भिन्न काव्यशास्त्रियो ने रस की परिभाषा भिन्न-भिन्न प्रकार से की है। भरत का प्रसिद्ध रससूत्र “विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पत्तिः।”¹ रस की परिभाषा के रूप में सर्वत्र उद्धृत किया जाता है। यद्यपि भरत के सूत्र मे रस की परिभाषा नहीं अपितु रस की प्रक्रिया की ओर संकेत मिलता है, किन्तु अधिकांश काव्यशास्त्री, रस की परिभाषा के रूप मे इसी सूत्र को उद्धृत करते हैं। अतएव यह सूत्र रस-सिद्धान्त का मूल बीज बन गया है। अस्तु।

काव्य प्रकाशकार-आचार्य मम्मट ने रस के स्वरूप को इस प्रकार बताया है-‘लोक में रति आदि रूप स्थायी भाव के जो कारण, कार्य और सहकारी होते हैं वे यदि नाटक या काव्य मे प्रयुक्त होते हैं तो क्रमश. विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी भाव कहलाते हैं और उन विभाव (आलम्बन या उद्दीपन) आदि रूप कारण, कार्य तथा सहकारियो के योग से व्यक्त वह (रति आदि रूप) स्थायी भाव रस कहलाता है।’²

इस प्रकार भारतीय वाङ्गमय में 'रस' की परिभाषा द्विविध हो सकती है। जो आचार्य रस को विषयगत् या काव्य सौन्दर्य मानते हैं- उनके अनुसार नाट्यसौन्दर्य या काव्य सौन्दर्य ही रस है। उसकी अनुभूति सामाजिक या पाठक को हर्षादि अनुभूतियों के रूप मे होती है। नाट्याचार्य भरत, अलङ्कारवादी भामह, रीतिवादी वामन एवं दण्डी तथा वक्रोक्तिवादी कुन्तक के अनुसार रस का यही स्वरूप हो सकता है। इन आचार्यों के अनुसार रस आस्वाद्य है।


1 काव्यप्रकाश, चतुर्थउल्लास, पृष्ठ स० 100 –
आचार्यमम्मट
2

कारणान्यथ कार्याणि सहकारीणि यानि च।
रत्यादे. स्थायिनो लोके तानि चेन्नाट्यकाव्ययोः।
विभावा अनुभावास्तत् कथ्यन्ते व्यभिचारिण ।
व्यक्त. स तैर्विभावाद्यैः स्थायी भावो रस स्मृत ।।

काव्यप्रकाश, चतुर्थउल्लास, सूत्र स० 43, पृष्ठ स० 95 – आचार्य मम्मट

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जो आचार्य रस को विषयिगत मानते है, वे रस को वस्तु में नहीं अपितु व्यक्ति की चेतना मे स्थापित करते हुए नाट्य.सौन्दर्य या काव्य सौन्दर्य जनित आनन्दानुभूति को ही रस की सज्ञा देते है। आनन्दवर्धन, अभिनवगुप्त, मम्मट, विश्वनाथ तथा पंडित राजजगन्नाथ आदि आचार्यों को रस का यही स्वरूप मान्य है इस प्रकार आनन्दवर्धन से लेकर अद्यतन यही परिभाषा रस विश्वजनीन-सी हो गयी है। इनके अनुसार रस स्थायीभाव का आनन्दमय आस्वाद्य रूप है।

रस के अंङ्ग :

रस के प्रमुख तीन अंङ्ग हैं-विभाव, अनुभाव एवं व्यभिचारीभाव इन सबके सामान्य गुण-योग से ही रस-निष्पत्ति सम्भव बताई गयी है।¹

1- विभाव : लोक मे प्रचलित हेतु, कारण अथवा निमित्त शब्दों के लिए रस शास्त्र में पृथक रूप से 'विभाव' शब्द को ग्रहण किया जाता है। शास्त्र में वाचिक, आङ्गिक एव सात्विक अभिनय के सहारे चित्तवृत्तियों का विशेष रूप से विभावन अथवा ज्ञापन कराने वाले हेतु, कारण अथवा निमित्त को विभाव कहते हैं। 'विभावन' का अर्थ केवल ज्ञापन नहीं अपितु उसका अर्थ आस्वाद योग्यता तक पहुँचाना भी है। अतएव हम कह सकते हैं कि विभाव वासना-रूप में अत्यन्त सूक्ष्म रूप से अवस्थित रति आदि स्थायी भावों को आस्वाद योग्य बनाते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं-आलम्बन, उद्दीपन। चित्तवृत्ति-विशेष के विषयभूत विभाव को आलम्बन कहते हैं और उस निमित्त रूप सामग्री को जिससे जागृत भाव अधिकाधिक उद्दीप्त होता है-उद्दीपन विभाव कहते हैं।² आलम्बन के दो भेद होते हैं-विषय तथा आश्रय, इत्यादि भावों के जागृत होने के कारण-स्वरूप विभाव ही विषय कहलाते हैं तथा जिस व्यक्ति में स्थायीभाव जागरित होते हैं, वह उनका आश्रय होने से आश्रय कहलाता है।³


1 नाट्यशास्त्र, पृष्ठ-80
2 रसगङ्गाधर, पृ० 33
3 सा० कौ०, पृ० 29

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2- अनुभाव : भावजागर्ति के पश्चात होने वाले अङ्ग-विकारों को अनुभाव कहते हैं। इनकी व्युत्पत्ति के अनुसार (अनु पश्चाद् भावः उत्पत्तिः, येषाम् अथवा अनुपश्चाद् भावो यस्य सोऽनुभावः) स्थायीभावों के जागरित होने के पश्चात् उत्पन्न होने के कारण इन्हे कार्यरूप ही मानना चाहिए।¹ आचार्य विश्वनाथ ने रसोद्बोध की दृष्टि से विभाव, अनुभाव तथा व्याभिचारी तीनों को ही कारण माना है।² पण्डितराज जगन्नाथ भी रस की अनुभावना कराने वाले कारणों को अनुभाव कहते हैं।

व्यभिचारीभाव :

व्यभिचारी शब्द मे वि+अभि+चर् धातु का योग दिखाई पडता है । अतएव वाक्, अंङ्ग सत्त्वादि द्वारा विविध प्रकार के रसानुकूल संचरण करने वाले भावों को व्यभिचारी अथवा संचारी भाव कहते है।³ व्याभिचारी भाव स्थायी भाव के परिपोषक तथा उन्हें रसावस्था तक पहुँचाने वाले होते हैं, अस्थिरता उनका विशेषगुण है। स्थायी भाव के साथ इनका सम्बन्ध वारिधि के साथ कल्लोलों का सा है। उनका आविर्भाव-तिरोभाव होता रहता है।⁴ इसलिए उन्हें अचिर, अनवस्थित, जन्म वाला तथा संचारी भी कहते हैं। स्थायित्व के सहायक मात्र कहे जा सकते हैं। 'काव्य प्रकाश' ने स्पष्टतः इन्हें स्थायीभाव का सहकारी कहा है।⁵ इनकी संख्या तैंतीस मानी गयी है।⁶

स्थायीभाव :

स्थायी भाव मानव-मन की सूक्ष्म कृतियो से सम्बन्धित अथवा वासना रूप से प्रमाता के चित्त में सदैव रहने वाले भावों को कहते हैं। कारण के अनुपस्थित रहने पर भी स्थायीभाव की सत्ता रहती है, जबकि शेष भाव कारण के अभाव में निश्शेष हो


1 सा० द०, पृ० 3/132-33
2 सा० द०, पृ० 3/14
3 ना०सा०चौ०,पृष्ठ 84
4 दाशरूपक 4/7
5 काव्य प्रकाश, 4/27-28, सूत्र 43
6 काव्य प्रकाश पेज स०-100, चतुर्थउल्लास

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जाते है। काव्य में स्थायी भाव ही अनुकूल विभाव-अनुभाव तथा व्यभिचारी भावों के संयोग से रस रूप प्राप्त करने में समर्थ होता है।

स्थायी भाव अपने विरोधी अविरोधी किसी भी भाव से नष्ट नहीं होते।¹ ये स्वयं दूसरे भावो को अपने में अन्तर्हित कर लेते हैं। अन्य भावों को अपने वशवर्ती कर लेते हैं। इनमे चिरकालस्थायित्व, आप्रबन्ध-स्थायित्व अथवा अविच्छिन्न प्रवाहमयता होती है। स्थायीभाव चर्वणीय एवं आनन्ददायी होते है। स्थायी भाव की वासनारुपता के सम्बन्ध में अभिनवगुप्त ने सर्वप्रथम विचार किया, जिसका अनुसरण परवर्ती आचार्यों ने किया । भरत ने इनकी संख्या आठ मानी², कालान्तर में इनकी संख्या नौ दस तक पहुँच गयी। इनके नाम हैं- रति, हास, शोक, क्रोध, उत्साह, भय, जुगुप्सा, विस्मय, निर्वेद।³

शुकसप्तति में अङ्गीरस :

शुकसप्तति कथाग्रन्थ श्रृंगार रस से परिपूर्ण कथाग्रन्थ है। जिसमें श्रृंगार के दोनो भेद सयोग और विप्रलम्भ का स्वरूप प्राप्त होता है।

साहित्य शास्त्र के आचार्यों ने श्रृंगार को श्रेष्ठ तथा अधिक व्यापक स्वरूप में स्वीकार किया है।⁴ आनन्दवर्धन ने भी उसे मधुर रस माना है। (शृङ्गर एव मधुरः परः प्रह्लादनोरसः ) श्रृङ्गार रस दो प्रकार का होता है- संयोग⁵ तथा विप्रलम्भ⁶ मम्मट ने भी श्रृङ्गार के दो भेद-माने हैं- 1. सम्भोग श्रृंगार 2. विप्रलम्भ श्रृंगार।⁷ किन्तु दोनों ही अवस्थाओ मे इसका स्थायीभाव रति ही है, जो विभावानुभाव तथा व्यभिचारी भाव से


1 दशरूपक 4/34 सा० द० 3/174, रस०ग०पृ० 31
2 अष्टौ नाट्ये रसाः स्मृता। नाट्य द०
3

रतिहासश्च शोकश्च क्रोधोत्साहौ भय तथा।
जुगुप्सा विस्मयश्चेति स्थायिभावा प्रकीर्तिता।
काव्यप्रकाश, पेज सं० 96, सूत्र संख्या 45

4 ना०शा०, 6/45, पृ० 300
5 सा०द०, 3/290, पृ० 148
6 सा०द०, 3/187, पृ० 233
7 काव्य प्रकाश पेज स०-121, चतुर्थउल्लास

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पुष्ट होकर शृङ्गार रस-रूप में प्रतिफलित होता है। नायक-नायिका परस्पर इसके आश्रय एवं आलम्बन होते हैं। उनके परस्पर दर्शन, कटाक्ष, प्रस्वेद, रोमांच, आश्रु, भूविक्षोपादि आङ्गिक व्यापार अनुभाव कहे जाते हैं । इसमे तैंतीस व्यभिचारी भाव होते हैं।

आरम्भ में ही शुकसप्तति मे विप्रलम्भ शृङ्गार का वर्णन कवि ने किया है। 'काव्यानुशासन' के अनुसार विप्रल्लभ शृङ्गार की निरूक्ति इस प्रकार है- 'सम्भोगसुखास्वादलोभेन विशेषेण प्रलभ्यते आत्माऽत्रेोति विप्रलम्भः।' तात्पर्य यह है कि नायक-नायिका के परस्परनुराग मे मिलन नैराश्य ही विप्रलम्भ है। इसीलिए नाट्यदर्पणकार कहते है- 'परस्परानुरक्तयोरपि विलासिनोः पारतन्त्र्योदर घटनं चित्तविश्लेषणे वा विप्रलम्भः' । आचार्य विश्वनाथ विप्रलम्भ के स्वरूप का विवेचन करते हुए कहते है- इसमें नायक-नायिका का परस्परानुराग हुआ करता है, किन्तु परस्पर मिलन नहीं होने पाता।¹

वियोग मे रति का भाव लगा रहता है और यही रति भाव विप्रलम्भ शृंग्गार को करूण से भिन्न बनाता है। पुनर्मिलन की आशा वियोग में संयोग का सुख-स्वप्न दिखाती है। संयोग मे जो आनन्द प्रियजन के मिलन से होता है, वह वियोग मे प्रियजन के चिन्तन तथा गुणकथनादि के माध्यम से होता है। इसमें प्रतिक्षण नायक का स्मरण होता रहता है। इस स्मरण जन्य संयोग में जो सुख है, वह उसे प्रत्यय-सयोग से भी अधिक श्रेष्ठता देता है। इसमें गुरूजनों की लज्जा का न भय है, न वियोग की उत्साह-शून्य करने वाली शंङ्का। इसीलिए लोग वियोग को सुखद माना करते है।² यदि वियोग में यह सुख न होता तो दुःख सहकर भी प्राणी वियोग में मग्न क्यो रहते है?

विप्रलम्भ श्रृंगार के चार भेद हैं- पूर्वराग, मान, प्रवास, करूण।³


1 सा०द०, 3/187
2 कबीर
3 सा०द०, 3/187, पृ० 232

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आचार्य मम्मट ने विप्रलम्भशृङ्गार को अभिलाष, ईर्ष्या, विरह, प्रवास, तथा, शाप, पाँच, प्रकार का माना है।$^1$ जैसा कि पूर्व में कहा जा चुका है कि मुख्य कथा शुकसप्तति के अन्तर्गत प्रवास विप्रलम्भ का दिग्दर्शन हुआ है। मदनविनोद और प्रभावती की इस कथा मे आश्रय प्रभावती ओर आलम्बन मदनविनोद है, पत्नी को विदेश छोडकर जाना उद्दीपन विभाव है, प्रभावती का उदास रहना, चिन्ता करना, कुमार्ग पर जाने के लिए उद्यत होना आदि अनुभाव हैं, चिन्ता, दैन्य, चपलता मोह आदि व्यभिचारी भाव हैं।

शुकसप्तति के अधिकांश कथाओं में मुख्य रूप से संयोग शृङ्गार का वर्णन कवि ने किया है। पति के कार्यवश विदेश चले जाने पर अथवा कार्यवश घर से बाहर जाने पर उनकी पत्नियों काम सन्तप्ता होकर व्यभिचार मार्ग का अवलम्ब लेती हैं। इसीलिये अधिकांश कथायें शृङ्गारिक अनुभावों से भरी पडी हैं। इन कथाओं में कही-कहीं आश्रय, नायिका हैं और आलम्बन उपपति है तो कहीं पर पुरूष आश्रय और परकीया नायिका आलम्बन है। जैसे-

द्वितीय कथा: में वीर नामक यशोदेवी का पुत्र आश्रय है और आलम्बन शशिप्रभा है। आश्रय वीर द्वारा भोजन आदि न करना अपनी हृदय पीड़ा को माता से निवेदन करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्याभिचारीभाव है।

तृतीय कथा : में कुटिल नामक धूर्त विमल का रूप धारण करने वाला आश्रय है और आलम्बन विमल की दोनों पत्नियाँ हैं जिसे देखकर कुटिल धूर्त के हृदय में कामभावना जागृत होती है। धूर्त विमल का दोनों पत्नियों के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव है।

चतुर्थ कथा : में शूर विष्णु नामक ब्राह्मण आश्रय है और गोविन्द नामक मूर्ख की पत्नी विषकन्या आलम्बन है, जिसे देखकर विष्णु के हृदय में काम भावना जागृत


1 अभिलाषविरहेर्ष्याप्रवासशापहेतुक इति पञ्चविधः।
काव्यप्रकाश, चतुर्थ उल्लास, पृ० 123 ।

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होती है। विष्णु का विषकन्या के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव है।

दशमकथा : में उपपति आलम्बन है और देवसाख्य की दोनों पत्नियाँ शृङ्गारवती और सुभगा आश्रय हैं। उपपति को देखकर देवसाख्य की पत्नियो के हृदय में कामभावना जागृत होती है। शृङ्गारवती और सुभगा का उपपति के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

एकादशी कथा : में रम्भिका आश्रय है और ब्राह्मण पुत्र आलम्बन है, जिसे देखकर परपुरूष मे आसक्त रहने वाली रम्भिका के हृदय में कामभावना जागृत होती है। रम्भिका का परपुरूष से सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

द्वादशी कथा : में कुम्हार की स्त्री शोभिका आश्रय है और उपपति आलम्बन है जिसे देखकर परपुरुष में आसक्त रहने वाली शोभिका के हृदय में कामभावना जागृत होती है। शोभिका का परपुरूष के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

त्रयोदशी कथा : मे वणिक् पत्नी राजिका आश्रय है और उपपति आलम्बन है। उपपति को देखकर राजिका के हृदय मे कामभावना जागृत होती है। उपपति के साथ राजिका का सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

चतुर्दशी कथा : मे धनश्री आश्रय है और पर पुरुष आलम्बन परपुरूष को देखकर धनश्री के हृदय मे काम भावना जागृत होती है। धनश्री का परपुरूष के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

पञ्चदशी कथा : में गुणाकर की पत्नी श्रिया देवी आश्रय है और सुबुद्धि नामक वणिक् आलम्बन है। वाणिक् को देखकर श्रियादेवी के हृदय में कामभावना जागृत होती है और श्रिया देवी का सुबुद्धि के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

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षोडशी कथा : में जनवल्लभ वणिक् की पत्नी मुग्धिका आश्रय है और परपुरूष आलम्बन है। परपुरूष को देखकर मुग्धिका के हृदय में कामभावना जागृत होती है और मुग्धिका का परपुरूष के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

त्र्योदशी कथा : में वणिक् पत्नी स्वच्छन्दा आश्रय है और सोढाक नामक सेठ आलम्बन है। सोढाक को देखकर स्वच्छन्दा के हृदय में कामभावना जागृत होती है और स्वच्छन्दा का सोढाक के साथ संभोग करना आदि अनुभाव है चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव है।

बीसवीं कथा : मे सूर नामक किसान की पत्नी केलिका आश्रय है और ब्राह्मण आलम्बन। ब्राह्मण को देखकर केलिका के हृदय ने काम भावना जागृत होती है और केलिका का ब्राह्मण के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

इक्कीसवीं कथा : में वणिक् पत्नी मन्दोदरी आश्रय है और राजपुत्र आलम्बन। राजपुत्र को देखकर मन्दोदरी के हृदय मे कामभावना जागृत होती है। राजपुत्र के साथ मन्दोदरी का सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

बाईसवीं कथा : में किसान की पत्नी माढुका आश्रय हैं और सूरपाल आलम्बन। सूरपाल को देखकर माढुका के हृदय में काम भावना जागृत होती है। सूरपाल का माढुका के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

तेईसवीं कथा : में बणिक् पुत्र राम आश्रय है। कलावती नामक वेश्या आलम्बन। कलावती को देखकर राम के हृदय में कामभावना जागृत होती है और राम का कलावती के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

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चौबीसवीं कथा : मे देवक नामक पुरूष आश्रय है। धनिक की पत्नी सज्जनी आलम्बन। सज्जनी को देखकर देवक के हृदय में कामभावना जागृत होती है। देवक का सज्जनी के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य हर्ष, आदि व्यभिचारीभाव हैं।

छब्बीसवीं कथा : में देवसाख्य ग्रामाध्यक्ष और पुत्र धवल आश्रय है। क्षेमराज की पत्नी रत्नादेवी आलम्बन है। रत्नादेवी को देखकर उन दोनो के हृदय में कामभावना जागृत होती है। उन दोनों का रत्नादेवी के घर जाना और सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

सत्ताईसवीं कथा : में वणिक् पत्नी मोहिनी आश्रय है। कुमुख नामक धूर्त आलम्बन है। कुमुख को देखकर मोहिनी के हृदय मे कामभावना जागृत होती है। मोहिनी का कुमुख के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

अट्ठाईसवीं कथा : मे प्रभाकर नामक ब्राह्मण आश्रय है। जरसाख्य की पत्नी देविका पुंश्चली आलम्बन है। देविका को देखकर प्रभाकर के हृदय में कामभावना जागृत होती है। प्रभाकर का देविका के साथ से सम्भोग करना अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

उन्तीसवीं कथा : में वणिक् पत्नी सुन्दरी आश्रय है। मोहन नामक उपपति आलम्बन है। मोहन को देखकर सुन्दरी के हृदय मे कामभावना जागृत होती है। मोहन का सुन्दरी के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव हैं। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव है।

इकतीसवीं कथा : में वीर रस का वर्णन प्राप्त होता है खरगोश आश्रय है ,पिङ्गल नामक सिंह आलम्बन है। खरगोश का सिंह के पास जाना, सिंह को कुयें में उसकी परछाई दिखाना आदि अनुभाव है। श्रय, धृति, चपलता, आवेश आदि व्यभिचारीभाव हैं।

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बत्तीसर्वीं कथा : में सोहड़ की पत्नी राजिनी आश्रय है। संकेत किया गया उपपति आलम्बन। उपपति को देखकर राजिनी के हृदय में कामभावना जागृत होती है राजिनी का उपपति के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव है।

चौतीसर्वीं कथा : में शम्भु नामक विप्र आश्रय है। खेती की रखवाली करने वाली सुन्दर बालिका आलम्बन। बालिका को देखकर शम्भु के हृदय में कामभावना जागृत होती है। शम्भु का बालिका के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

पैंतीसवी कथा : मे शम्बक नामक वणिक् आश्रय है। बर्तन बेचने वाले बनिया की पत्नी आलम्बन । वणिक् पत्नी को देखकर शम्बक के हृदय में कामभावना जागृत होती है। शम्बक का वणिक् पत्नी के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

सैंतीसर्वीं कथा : में सूरपति की पुत्री सुभगा आश्रय है। पूर्णपाल नामक हलवाला आलम्बन। पूर्णपाल को देखकर सुभगा के हृदय में कामभावना जागृत होती है। सुभगा का हलवाहे के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव है।

अड़तीसर्वीं कथा : मे प्रियंवद नामक विप्र आश्रय है। वणिक् पत्नी पुँश्चली आलम्बन। पुँश्चली को देखकर ब्राह्मण के हृदय मे कामभावना जागृत होती है। प्रियंवद का वणिक् पत्नी के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

चालीसर्वीं कथा . मे कुबुद्धि आश्रय है सुबुद्धि की पत्नी आलम्बन। सुबुद्धि की पत्नी को देखकर कुबुद्धि के हृदय में कामभावना जागृत होती है। कुबुद्धि का मित्र की पत्नी के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारभाव हैं।


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बयालीसवीं कथा : में भय रस का वर्णन प्राप्त होता है। सिंह आश्रय है और व्याघ्रमारी आलम्बन है। डरना, भागना सिंह का व्याघ्रमारी के पास जाना आदि अनुभाव है। त्रास, आवेग आदि व्याभिचारीभाव हैं।

तैंतालीसवीं कथा : में भी भय रस का वर्णन मिलता है। शृंगाल आश्रय है और व्याघ्रमारी आलम्बन है। आलम्बन की चेष्टायें जैसे बाघ खाने के लिये अधिक क्रोधित होना आदि उद्दीपन विभाव है। व्याघ्रमारी द्वारा बाघ खाने के लिये झपटना आदि अनुभाव है। शंका, असूया, मद, आवेग आदि व्याभिचारीभाव हैं।

पैंतालीसवीं कथा : में विष्णु नामक रति लोलुप ब्राह्मण आश्रय है। रति प्रिया नामक गणिका आलम्बन। रतिप्रिया को देखकर ब्राह्मण के हृदय में कामभावना जागृत होती है। रतिप्रिया का ब्राह्मण के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य हर्ष आदि व्यभिचारीभाव है।

तिरपनवीं कथा : में दोहड की पत्नी देविका आश्रय है। उपपति आलम्बन। उपपति को देखकर देविका के हृदय में काम भावना जागृत होती है। देविका का उपपति के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

सत्तावनवीं कथा : में राजा की पत्नी चन्द्रलेखा आश्रय है। शुभंकर नामक राजपण्डित आलम्बन। राजपण्डित को देखकर चन्द्रलेखा के हृदय में कामभावना जागृत होती है। चन्द्रलेखा का राजपण्डित के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

अट्ठावनवीं कथा : में परपुरुषों में आसक्त रहने वाली राजड पत्नी दुःशीला आश्रय है और गणेश जी आलम्बन हैं। दुःशीला द्वारा नृत्य आदि करना अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष चपलता आदि व्याभिचारीभाव हैं।

[ 152 ]

उनसठवीं कथा : में राजपूत की पत्नी रूक्मिणी आश्रय है। परपुरूष आलम्बन। परपुरूष को देखकर रूक्मिणी के हृदय में कामभावना जागृत होती है। परपुरूष के साथ रूक्मिणी का सम्भोग करना अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

इकसठवीं कथा : में वणिक् पत्नी तेजुका आश्रय है और परपुरूष आलम्बन है। परपुरूष को देखकर तेजुका के हृदय में कामभावना जागृत होती है। परपुरूष के साथ तेजुका का सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

बासठवीं कथा : में राजपूत की पत्नियाँ शोभिका और तेजिका आश्रय हैं और पर पुरूष आलम्बन है परपुरूष को देखकर दोनों के हृदय में कामभावना जागृत होती है। परपुरूष के साथ दोनों का सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव है।

चौसठवीं कथा : में सोमराज की पत्नी मण्डुका आश्रय है। परपुरूष आलम्बन है। परपुरूष को देखकर मण्डुका के हृदय में कामभावना जागृत होती है। मण्डुका का पुरपुरूष के साथ सम्भोग करना आदि अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष चपलता आदि व्यभिचारीभाव हैं।

अड़सठवीं कथा : में केशव नामक ब्राह्मण आश्रय हैं। वणिक् पुत्री आलम्बन। वणिक्-पुत्री को देखकर केशव के हृदय में कामभावना जागृत होती है। वणिक् पुत्री का केशव के ओंठ चूमना अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

उनहत्तरवीं कथा : में वणिक् पत्नी वेजिका आश्रय है उपपति आलम्बन। उपपति को देखकर वेजिका के हृदय में कामभावना जागृत होती है। उपपति के साथ वेजिका का सम्भोग करना अनुभाव है। चिन्ता, दैन्य, हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

सत्तरवीं कथा : में गन्धर्व रूप धारण करने वाला विद्याधर आश्रय है। गन्धर्व पत्नी मदनमञ्जरी आलम्बन। मदनमञ्जरी को देखकर विद्याधर के हृदय में कामभावना जागृत होती है। चिन्ता, दैन्य हर्ष आदि व्यभिचारीभाव हैं।

[ 153 ]

अन्ततोगत्वा हम यही कह सकते है कि शुकसप्तति में वर्णित 70 कहानियों में प्राय अधिकांश कहानियाँ श्रृंगार रस, विशेष रूप से संयोग श्रृंगार से परिपूर्ण हैं। सिर्फ कुछ ही कथाओं में भय,वीर आदि रसों के अल्प रस का वर्णन मिलता है। इसके अतिरिक्त कुछ कहानियाँ ऐसी भी हैं। जिनमे स्पष्ट रूप से रस का चित्रण नहीं है इसलिए उन कहानियो का वर्णन नही किया गया है।

(द) अलंकार :

'अलंङ्कारोति इति अलङ्कार.' अथवा 'अलंङ्क्रियते अनेन इति अलंकारः' अर्थात् अलङ्कार वह है, जो किसी वस्तु की शोभा बढ़ाये अथवा जिसके द्वारा किसी वस्तु की शोबाबढाई जाये।

जिस प्रकार लोक व्यवहार में कटक, कुण्डल आदि आभूषण पुरूष या रमणी के शारीरिक शोभा को बढाकर उसके भीतरी सौन्दर्य को भी निखार देते हैं, उसी प्रकार काव्य में वर्णित अलंकार कविता-कामिनी के शरीर स्थानी शब्द और अर्थ की शोभा बढाकर उसके माध्यम से काव्यात्मा रस के भी उपस्कारक होते हैं।

वस्तुत. काव्य में वर्णित अलङ्कार सम्पूर्ण काव्य के शोभावर्धक न होकर, काव्य में वर्णित, काव्य मे निहित किसी तत्व विशेष की शोभा बढ़ाते हैं। अतः आचार्य मम्मट अलङ्कार को परिभाषित करते हुए कहते हैं-

उपकुर्वन्ति त सन्त येऽङ्द्वारेण जातुचित्।

हारादिवदलङ्कारास्तेऽनुप्रासोपमादयः।¹

शुकसप्तति में काव्यात्मा रस के उपस्कारक रूप में अलंङ्कारों का वर्णन हुआ है। कहीं भी अलङ्कारों के अत्यधिक प्रयोग के कारण बोझिल कविता दृष्टिगोचर नहीं होती। सरल प्रवृत्ति के अलङ्कारों का प्रयोग कर कवि ने भाषा को सहज गति प्रदान


1 काव्य प्रकाश, अष्टम उल्लास, सूत्र स० 87, पृष्ठ सं०, 381

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की है। शुकसप्तति में कहीं भी कठिन प्रकार के अलंङ्कारों का प्रयोग नहीं हुआ है। उपमा, उत्प्रेक्षा, अर्थान्तरन्यास, मालादीपक, निर्दशना, प्रतिवस्तूपमा आदि सरल प्रवृत्ति के अलंङ्कारों का वर्णन मिलता हैं।

उपमा का लक्षण -

साधर्म्यमुपमा भेदे ।¹

उपमान तथा उपमेय का भेद होने पर उनके साधर्म्यका वर्णन उपमा कहलाता है।

शुकसप्तति में उपमा :

शुकसप्तति में यूँ तो उपमा का प्रयोग पग-पग पर हुआ है। सामान्य से सामान्य बात को भी व्यक्त करने के लिए कवि ने उपमा का आश्रय लिया है किन्तु उन कथनो में उपमा का कोई विशेष सौन्दर्य लक्षित नही होता है। अतएव कुछ विशेष उदाहरण दिये जा रहे हैं जिनमें यत्किंच्यत् उपमा का सौन्दर्य दर्शनीय है–

भोगिनः कञ्चुकासक्ताः क्रूराः कुटिलगामिनः ।
दुःखोसर्पणीयाश्च राजानो भुजगा इव ।²

भोगी (1. भोग भोगने वाले, 2- फणवाले), कञ्चुक (1. कवच 2. केचुल) से आवृत्त, क्रूर, कुटिलगामी (1. कुटिलतापूर्वक व्यवहार करने वाले 2. टेढ़े चलने वाले) राजा, सर्पों के समान बडी कठिनाई से प्रापणीय (अनुकूल) होते हैं।

गच्छ देवि न ते दोषो गच्छन्त्याः परवेश्मनि ।
यदि काचिच्छरीरे ते बुद्धिः सर्षपचौरवत् ।³

देवि जाओ। पराये घर जाने में तुम्हें दोष नहीं लगेगा किन्तु यदि तुममें उस सरसों चुराने वाले के समान बुद्धि हो।


¹ काव्य प्रकाश दशम् उल्लास, सूत्र स० 124, पृष्ठ स० 443
² शुकसप्तति, श्लोक सं० 35, पृष्ठ सं० 33
³ शुकसप्ततिः, श्लोक सं० 115 पृष्ठ स० 97

[ 155 ]

शशिना हरिणा चैव बलिना कुशभूभुजा।
कुशशक्तिच्छलत्यागसम्पद्यस्य न खण्डयते।¹

चन्द्रमा, विष्णु, बलि और राजा कुश क्रमश. जिसकी शीतलता, छल,त्याग और सम्पत्ति को खण्डित नहीं करते अर्थात् शीतलता में वह चन्द्रमा के समान, छल में विष्णु के समान, त्याग में बलि के समान और सम्पत्ति में राजा कुश के समान था।

प्राचीमुखे विभातीन्दुरुदयाद्रिशिरः स्थितः।
द्वीपस्त्रिभुवनस्येव प्रच्छन्नस्य तमिस्त्रया।²

पूर्व दिशा मे उदयाचल के अग्रभाग पर स्थित चन्द्रमा अन्धकाराच्छन्न त्रिभुवन का दीप सा शोभित हो रहा है।

कहीं-कहीं पात्रों के गुणों का वर्णन करने के लिए कावे ने उपमा का सहारा लिया है जैसे-

किं तस्य वर्ण्यते राज्ञः प्रजापालनशालिनः।
यस्मिंल्लोके न दृष्टा हि दोषा रविकरैरिव।³

उस प्रजापालक राजा का क्या वर्णन करें? जिसके लोक में शासन करते समय दोष नही दिखाये देते, जैसे सूर्य-किरणो से रात लुप्त हो जाती है।

व्रज देवि न तेऽयुक्तं ब्रजनं गजगामिनी।
व्याघ्रमारीव बुद्धिस्ते द्वितीयापि यदि स्थिरा।।⁴

गजगामिनी! यदि व्याघ्रमारी की द्वितीय बुद्धि की भाँति तुम्हारी भी बुद्धि स्थिर हो तो जाओ, तुम्हारा जाना अनुचित नहीं है।


1 शुकसप्तति, श्लोक सं० 138 पृष्ठ स० 116
2 शुकसप्तति, श्लोक सं० 146 पृष्ठ सं० 119
3 शुकसप्तति, श्लोक स० 139 पृष्ठ स० 116
4 शुकसप्तति, श्लोक स० 212 पृष्ठ स० 182

[ 156 ]

उत्पन्ना युक्तिकार्येषु बुद्धिर्यस्य न हीयते।
स एव तरते दुर्ग जलान्ते वानरो यथा।।¹

संकट के समय युक्ति की अपेक्षा रखने वाले कार्यों में जिसकी बुद्धि नष्ट नहीं होती वही विपत्ति को पार कर जाता है, जैसे जल के भीतर वानर ने किया था।

व्रजन्ति ते मूढधियः पराभवं भवन्ति मायाविषु ये न मायिनः ।
प्रविश्य हि घ्नन्ति शठास्तथाविधानसंवृताङ्गान्निशिताइवेषवः।²

जो लोग कपटीजनों के साथ कपटपूर्ण व्यवहार नही करते, वे पराभव को प्राप्त होते हैं, उन सरल प्रकृति लोगों को विश्वास उत्पन्न कर शठ, खुले शरीरवालों को बाण की भाँति नष्ट कर देते हैं।

उत्प्रेक्षा का लक्षण :

'सम्भावनमथोत्प्रेक्षा प्रकृतस्य समेन यत् ।³

किसी प्रकृत अर्थात प्रस्तुत वस्तु (उपमेय) की अप्रस्तुत (उपमान) के रूप में सम्भावना करना ही उत्प्रेक्षा है। जैसे-शुकसप्तति में प्रयुक्त उपमा के कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं-

मणिकुट्टिममार्गेषु शोभते रविविस्तरः।
शेषफणमणिरागो वसुधामिवोपागतः।⁴

मणिमय भूमितल वाले मार्गों पर पड़ी सूर्य की किरणें ऐसी शोभित होती हैं मानो शेषनाग के सिरो की मणियों की चमक और रंग सर्वत्र भूमि पर फैला हुआ है।

उदयाचलमारूढो भाति चन्द्रो निशामुखे।
यामिनीवनितोत्सङ्गः शुल्क. कृष्णशिरःस्थितः।।⁵


1 शुकसप्तति, श्लोक स० 319, पृष्ठ स० 268
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 123, पृष्ठ स० 106
3 काव्य प्रकाश, सूत्र स० 139, पृष्ठ स० 460
4 शुकसप्तति, श्लोक स० 137, पृष्ठ स० 115
5 शुकसप्तति, श्लोक सं० 147, पृष्ठ सं० 119

[ 157 ]

सायंकाल उदयाचल पर आरूढ़ चन्द्रमा शोभित हो रहा है, मानों रात्रिरूप नायिका के उत्संग में रजत मुद्रा है जिसका शिरोभाग काला है।

अर्थान्तरन्यास का लक्षण :

सामान्यं वा विशेषो वा तदन्येन समर्थ्यते।
यत्तु सोऽर्थान्तरन्यासः साधर्म्येणेतरेण वा।।¹

जहाँ विशेष द्वारा सामान्य का अथवा सामान्य द्वारा विशेष का, कारण द्वारा कार्य का अथवा कार्य द्वारा कारण का—साधर्म्य अथवा वैधर्म्य के माध्यम से समर्थन किया जाता है वहाँ अर्थान्तरन्यास अलंकार होता है। जैसे—

रामो हेममृगं न वेत्ति नहुषो याने युनक्ति द्विजान्
विप्रादेव सवत्सधेनुहरणे जाता मतिश्चार्जुने।
द्यूते भ्रातृचतुष्टयं च महिषी धर्मात्मजो दत्तवान्
प्रायः सत्पुरुषोऽप्यनर्थसमये बुद्धया परित्यज्यते।।²

राम स्वर्ण का (मिथ्या) मृग नहीं जान पाये। नहुष ने पालकी में ब्राह्मणों को युक्त कर दिया। कार्तवीर्य को ब्राह्मण जमदग्नि से ही सवत्सा धेनु के हरने का विचार हुआ। युधिष्ठिर ने द्यूतक्रीड़ा में चारों भाई और रानी को दाँव पर लगा दिया। प्रायः विपत्ति के समय सत्पुरुष भी बुद्धिभ्रष्ट हो जाते हैं।

अप्रधानः प्रधानः स्याद्यदि सेवेत पार्थिवम्।
प्रधानोऽप्यप्रधानः स्याद्यदि सेवाविवर्जितः।।³

यदि राजा की सेवा करें तो साधारण व्यक्ति भी असाधारण तथा मुख्य हो जाय। यदि राजा की सेवा करने से वञ्चित रहा तो असाधारण तथा मुख्य व्यक्ति भी साधारण एव नगण्य हो जाता है।


1 काव्य प्रकाश, सूत्र स० 164, पृष्ठ स० 500
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 64, पृष्ठ सं० 49
3 शुकसप्तति, श्लोक स० 38, पृष्ठ स० 34-35

[ 158 ]

दीपक का लक्षण :

सकृद्वृत्तिस्तु धर्मस्य प्रकृताप्रकृतात्मनाम्।
सैव क्रियासु वह्वीषु कारकस्येति दीपकम्।¹

जहाँ अप्रस्तुत (अप्रकृत अथवा उपमान) तथा प्रस्तुत (प्रकृत अथवा उपमेय) पदार्थों मे एक ही धर्म का सम्बन्ध हो अथवा (जहाँ) अनेक क्रियाओं का एक ही कारक हो, वही दीपक अलङ्कार होता है। जैसे–

हसन्नपि नृपो हन्ति मानयन्नपि दुर्जनः।
स्पृशन्नपि गजो हन्ति जिघ्रन्नपि भुजंगमः।²

हँसता हुआ भी राजा, सम्मान करता हुआ भी दुष्ट, स्पर्श करता हुआ भी गज, सूँघता हुआ भी सर्प, प्राणों को हरता है।


मालदीपक का लक्षण :

मालादीपकमाद्यं चेद्यथोत्तरगुणावहम्।³

यदि पूर्व–पूर्व (वस्तु) उत्तर–उत्तर की उपकारक (गुणाधायक) हो तो मालादीपक अलङ्कार होता है। जैसे–

उत्तमाः स्वगुणैः ख्याता माध्यमाश्च पितुर्गुणैः।
अधमा मातुलैः ख्याता श्वशुरैश्चाधमाधमाः।⁴

उत्तम व्यक्ति अपने गुणो से, मध्यम व्यक्ति पिता के गुणों से, अधम व्यक्ति मामा के गुणो से तथा अधमों में अधम–महा अधम व्यक्ति ससुर के गुणों से प्रसिद्धि प्राप्त करते है।


1 काव्य प्रकाश, सूत्र सं० 155, पृष्ठ स० 487
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 36, पृष्ठ स० 33-34
3 काव्य प्रकाश, सूत्र स० 156, पृष्ठ स० 489
4 शुकसप्तति, श्लोक स० 66, पृष्ठ स० 52

[ 159 ]

निदर्शना का लक्षण :

अभवन् वस्तुसम्बन्ध उपमापरिकल्पकः निदर्शना।¹

जहाँ वस्तुओ का परस्पर सम्बन्ध सम्भव (अबाधित) अथवा असम्भव (बाधित) होता हुआ उनके बिम्ब-प्रतिविम्बभाव का बोधन करे वहाँ निदर्शना अलङ्कार होता है।

जैसे-

विश्वासप्रतिपन्नानां वञ्चने का विदग्धता।
अङ्कमारुह्य सुप्तं हि हन्तुं किं नाम पौरुषम्।।²

विश्वास करने वाले व्यक्ति को धोखा देना कौन सा पाण्डित्य है? अंक में स्थित सोये व्यक्ति को मारना कौन सी पौरुष की बात है?

रूपक का लक्षण :

तद्रूपकमभेदो य उपमानोपमेययोः।³

उपमान और उपमेय का (जिनका भेद प्रसिद्ध है उनका सादृश्यातिशयवश) जो अभेद (वर्णन) है वह रूपक अलंकार है। जैसे-

धूर्तोऽसौ मत्सुतालुब्धो धनहीनो भवत्यसौ।
मनोभवग्रहग्रस्तो असमञ्जसमीदृशम।⁴

यह धनहीन धूर्त कामदेव रूप ग्रह से ग्रस्त हो मेरी पुत्री पर लुब्ध होता है- उसके साथ रमण करना चाहता है। इस प्रकार यह युक्ति युक्त बात नहीं है (जो हमें चोरी लगा रहा है)।

सन्मार्गे तावदास्ते प्रभवति पुरुषस्तावदेवेन्द्रियाणां
लज्जां तावद्विधत्ते विनयमति समालम्बते तावदेव।


1 काव्य प्रकाश, सूत्र स० 148 पृष्ठ स० 474
2 शुकसप्तति, श्लोक स० 71 पृष्ठ स० 55-56
3 काव्यप्रकाश, सूत्र स० 138 पृष्ठ स० 463
4 शुकसप्तति, श्लोक स० 72 पृष्ठ स० 56

[ 160 ]

भ्रूचापाकृष्टमुक्ताः श्रवणपथजुषो नीलपक्ष्माण एते।
यावल्लीलावतीनां न हृदि धृतिमुषो दृष्टिबाणाः पतन्ति।¹

पुरूष तभी तक सन्मार्ग पर ठहरा रहता है, तभी तक इन्द्रियों के निरोध में समर्थ होता है, तभी तक लज्जा करता है, तभी तक विनय अपनाये रहता है, जब तक (कर्णपर्यन्त) खिंचे भ्रूरूप चाप से छोडे गये, लोचनपर्यन्त विस्तृत, नील बरौनीरूप पक्षवाले, धैर्य को विनष्ट करने वाले, सुन्दरियों के ये नेत्ररूप बाण हृदय में नहीं चुभते है।

अत्रान्तरे विशालाक्षि चन्द्रो हन्तुं तमोरिपुम्।
उदयाद्रिशिरः स्थातुमुद्यतोंऽशुभटैर्वृतः।।²

हे आयत लोचने! इस बीच में अन्धकार रूप शत्रु का विनाश करने के लिए चन्द्रमा किरण रूप योद्धाओं समेत उदयाचल के शिखर पर स्थित होने के लिये उद्यत हुआ।

प्रतिवस्तूपमा का लक्षण :

प्रतिवस्तूपमा तु सा।
सामान्यस्य द्विरेकस्य यत्र वाक्यद्वये स्थितिः।³

जहा एक ही साधारणधर्म को दो वाक्यों में दो बार (भिन्न शब्दों से) कहा जाय वह प्रतिवस्तूमा (अलंङ्कार) होती है। जैसे-

त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्राम जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवी त्यजेत्।।⁴

कुल की रक्षाके लिये एक को त्याग देना चाहिये। गाँव की रक्षा के लिये कुल को त्याग देना चाहिए। जनपद (देश) की रक्षा के लिये गाँव को तथा अपनी रक्षा के लिये पृथिवी (देश) को त्याग देना चाहिये।


1 शुकसप्तति, श्लोक स० 118, पृष्ठ स० 99-100
2 शुकसप्तति, श्लोक सं० 145, पृष्ठ स० 119
3 काव्य प्रकाश, सूत्र स० 153, पृष्ठ स० 484
4 शुकसप्तति, श्लोक स० 37, पृष्ठ स० 34

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