सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर) द्वारा
१. प्रथम उपदेश: पिण्डोत्पत्ति विचार (परमपद, शक्ति-विकास एवं षट्चक्र स्वरूप)
शिव शक्ति में सन्निहित हैं। गोरखनाथजी ने परमात्मा के स्वरूप-दिग्दर्शन में मत व्यक्त किया है :— अनामेति स्वयमनादिसिद्धं एकमेवानादिनिधनं सिद्धसिद्धान्त- प्रसिद्धं तस्येच्छामात्र धर्माधर्मिणो निजाशक्तिः प्रसिद्धा । ( सिद्धसिद्धान्तपद्धति १।५ ) यह परमेश्वर नाम से परे है, स्वयंज्योति, अनादिसिद्ध है, यह उत्पत्ति, विनाश, सृजन और संहार से सर्वथा अतीत, अविनाशी है। यह अपनी चैतन्य- शक्ति-सच्चिदानन्दस्वरूपिणी परमेश्वरी शक्ति से सबकी उत्पत्ति और संहार का कर्ता अथवा कारण है । यह चैतन्यस्वरूप परब्रह्म सिद्धसिद्धान्त में प्रतिपाद्य अथवा ध्येय है । इसकी निजाशक्ति ही संकल्पशक्ति अथवा इच्छाशक्ति है । इसी शक्ति से यह निग्रहानुग्रहधर्मी है । निग्रहशक्ति कर्म का फल देती है, अनुग्रहशक्ति स्वरूप प्रदान करती है । सिद्धसिद्धान्तपद्धति में गोरखनाथजी ने निजाशक्ति, पराशक्ति अपराशक्ति, सूक्ष्मासक्ति और कुण्डलिनी महाशक्ति का सांकेतिक निरूपण करते हुए उनके कार्य और रूप का विवेचन प्रस्तुत किया । जो पुरुष माया और अज्ञान से विमूढ़ होकर वैषयिक भोगों में आबद्ध रहता है, उसके लिये जगज्जननी कुण्ड- लिनी बन्धनकारिणी होती है, पर जो मुद्राबन्ध, चक्रभेदन और प्राणायाम के द्वारा इस महाशक्ति को जगा लेता है, उसे यह मोक्ष प्रदान करती है; इस 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' ग्रंथ में हठयोग का अक्षय भाण्डार है । जिस तरह पांचभौतिक पिण्ड का अधिष्ठाता जीवात्मा होता है, उस तरह परपिण्ड का अधिष्ठाता सगुण- साकाररूप में अभिव्यक्त निरंजन, निराकार, चिन्मय, सच्चिदानन्दस्वरूप शिव होता है, ईश्वर होता है, निराकार की साकार अभिव्यक्ति का यही यौगिक रहस्य है कि पंचशक्तियों, निजा, परा, अपरा सूक्ष्मा और कुण्डलिनी में स्वरूपतः अन्तर्लीन परब्रह्म परमेश्वर इन्हीं के गुणों में आत्मप्रकाशन करता है । 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में यौगिक दृष्टि से पिण्डविचार अन्तर्दर्शन और ध्यान पर आधारित है । हमारा शरीर शिवशक्ति की अभिव्यक्ति का पवित्र माध्यम है और इसमें लोकलोकान्तर, समस्त ब्रह्माण्ड का रहस्य भरा पड़ा है । हमारे शरीर में नवचक्र, सोलह आधार, त्रिलक्ष्य और पंचव्योम स्थित हैं । गोरखनाथजी ने अपनी रचना 'गोरक्षशतक' में कहा है कि जिस योगी को इनका ज्ञान नहीं है, वह नाममात्र के लिये योगी है । हमारे शरीर में सुषुम्ना नाड़ी ब्रह्ममार्ग के रूप में प्रसिद्ध है । जीवात्मारूपी साधक अथवा योगी के लिये इस [ ५
ब्रह्ममार्ग में स्थित नौचक्र ( गोरखनाथजी ने 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में नवचक्र और 'गोरक्षशतक' आदि में षट्चक्र बताये हैं ) ही विश्रामस्थल स्वीकार किये गये हैं । सभी चक्रों का भेदन होने पर सुषुम्ना का प्रवाह सीधा हो जाता है और जीवात्मा ( योगसाधक ) ब्रह्मरन्ध्र में प्राणसिद्धि के सहारे शिवस्वरूप हो जाता है । वह व्यावहारिक अथवा लोकचेतना से ऊपर उठकर समाधिस्तर पर पारमार्थिक चेतना में विहार करता है । इन चक्रों के भेदन से महाकुण्डलिनीका प्रबोधन होता है । कुण्डलिनीशक्ति की अभिव्यक्ति का स्थान मूलाधार है । यह शक्ति साक्षात् गौरीस्वरूपिणी है। इसके ध्यान से साधक की मनोकामनाएँ पूरी होती हैं । स्वाधिष्ठानचक्र में गोरखनाथजी ने प्रवालांकुर-मूँगे के अग्र भाग की तरह लाल रंग के शिवलिंग की स्थिति बतायी है । योगसाधक प्रबुद्ध कुण्डलिनी द्वारा आलिंगित शिवलिंग का ध्यान कर योगशक्ति प्राप्त करता है । नाभिचक्र अथवा मणिपुर में कुण्डलिनी मध्यमा शक्ति कही जाती है । इसके ध्यान से सात्विक वृत्तियाँ प्रवाहित होती हैं । कुण्डलिनी-जागरण के ही सन्दर्भ में हृदय-चक्र अथवा अनाहत चक्र में स्थित लिंग की आकारवाली ज्योति का नाम गोरखनाथजी ने हंसकला कहा है । इसके ध्यान से इन्द्रियाँ वश में होती हैं और कंठचक्र अथवा विशुद्धचक्र में ज्योतिर्मयी सुषुम्ना को अनाहतकला नाम दिया गया है। इसकी उपासना से जल, स्थल, पाषाण में प्रतिघात नहीं होता, संकल्प की सिद्धि होती है । योगी जागतिक शक्तियों पर विजय प्राप्त करता है । वह ॐकार परमेश्वर के नादरूप का साक्षात्कार कर लेता है । आज्ञाचक्र अथवा भ्रू चक्र में सुषुम्ना अंगुष्ठमात्र दीप- शिखाकार हो जाती है, यही ज्ञाननेत्र है। इसका ध्यान करने से योगी शाश्वत चैतन्य-ज्योति से एकाकार हो जाता है । सप्तमं भ्रू चक्रं मध्यममङ्गुष्ठमात्रं ज्ञाननेत्रं दीपशिखाकारं ध्यायेत् वाचां सिद्धिर्भवति । (सिद्धसिद्धान्तपद्धति २।७ ) गोरखनाथजी ने आठवें चक्र को निर्वाण-चक्र कहा है और नौवें को आकाशचक्र कहा है । दोनों के ध्यान से क्रमशः मोक्ष और अलख-निरंजन में स्वरूप-स्थिति प्राप्त होती है । इस तरह नौ चक्रों के भेदन द्वारा सहज स्वरूप की प्राप्ति होती है, ब्रह्ममार्ग से जीवात्मा की यात्रा पूरी होती है । यही शाश्वत विश्राम कहा गया है। गोरखनाथजी की योगदृष्टि में जीवात्मा का यही शाश्वत विश्राम ध्येय है । ६ ]
'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में महायोगी गोरखनाथजी ने सूक्ष्म'तिसूक्ष्म तथा अमित मार्मिक रूप में अष्टांगयोग का वर्णन किया है, जो बहुत लाभप्रद है। यद्यपि 'गोरक्षशतक' आदि में षडंगयोग का ही विवेचन है तथापि 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में अष्टांगयोग के निरूपण में समग्रयोगदर्शन का स्वारस्य भर दिया गया है। गोरखनाथजी ने कहा है कि सभी इन्द्रियों को उनके विषयों से हटाकर शान्ति प्राप्त करना ही यम है। मन की समस्त वृत्तियों का नियंत्रण नियम है। यथालाभ सन्तोष करना चाहिये। गुरु के शरणागत होकर रहना चाहिये। चेतनमात्र आत्मा में ( स्वरूप में ) स्थिति ही आसन है। शरीर में प्राण की स्थिरता ही प्राणायाम है। देहरूपी रथ के स्वामी रथी आत्मा की अश्वरूपी इन्द्रियों को उनके विषयों से प्रत्याहारित करना प्रत्याहार है। समस्त जगत् के प्राणी और पदार्थों को आत्मरूप देखना, उनमें आत्मा की दृढ़ धारणा करना धारणा है। परब्रह्म में अभिन्न आत्मा का वायुरहित दीप के समान निश्चल नित्यप्रकाशरूप से ध्यान करना चाहिये। यही निरंजन ध्यान है। गोरखनाथजी ने अपने शिष्टपुराण लघु ग्रन्थ में कहा है—'निरंजन उपरान्ति ध्यान नाहीं'। सर्वान्तर्यामी, सर्वव्यापक परमात्मा सच्चिदानन्दस्वरूप अलख-निरंजन ही ध्येय है। अखण्ड आत्मस्वरूप में संस्थिति ही उन्मनी अथवा सहज समाधि है। जब तक समाधि में ध्याता, ध्येय, ध्यान की स्थिति है, तब तक सबीज समाधि है, केवल ध्येयाकार वृत्ति का होना निर्बीज समाधि है। गोरखनाथजी के वचन हैं :— यम इति उपशमः सर्वेन्द्रियजय आहारनिद्राशीतवातातपजयश्चैवं शनैः शनैः साधयेत् । नियम इति मनोवृत्तिनां नियमनमित्येकान्तवासो निःसङ्गतौदासीन्यं यथाप्राप्तिसन्तुष्टिर्वैरस्यं गुरुचरणावरूढ़त्वमिति । आसनमिति स्वस्वरूपे समासन्नता । प्राणायाम इति प्राणस्य स्थिरता । प्रत्याहारमिति चैतन्यतुरङ्गाणां प्रत्याहरणं विकारग्रसनोत्पन्नविकार- स्यापि निवृत्तिर्भवतीति प्रत्याहारलक्षणम् । धारणेति सा वाह्याभ्यन्तर एकमेवनिstatus/निज? -> एकमेवनिstatus? no: एकमेवनिजतत्त्वस्वरूपमेवान्तःकरणेन साधयेद् यथा यद्यदुत्पद्यते तत्त- न्निराकारे धारयेत् स्वात्मानं निर्वातिदीपमिव संधारयेदिति धारणा- लक्षणम् । अथध्यानमिति कश्चन परमार्द्धैतस्य भावः स एवात्मेति यथा यद्यत्स्फुरति तत्तत्स्वरूपमेवेति भावयेत् सर्वभूतेषु समदृष्टिश्च इति ध्यानलक्षणम् । सर्वतत्त्वानां समावस्था निरुद्यमत्वमनायासस्थितिमत्व- मिति समाधिलक्षणम् । ( सिद्धसिद्धान्तपद्धति २ । ३२-३६ ) [ ७ ]
भगवान् गोरखनाथजी ने 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में योगसिद्धि का स्वरूप परमात्म साक्षात्कार बताया है, अष्टांगयोग का यही फल है। नाथयोग का सैद्धान्तिक आधार तथा भगवान् गोरखनाथ द्वारा प्रतिपादित सिद्धामृतमार्ग के, महायोगज्ञान का आधार है व्यष्टिशरीर (पिण्ड) में अखिल ब्रह्माण्ड की सृष्टि अथवा तात्विक व्यापकता की अपरोक्षानुभूति । कहा गया है कि जो कुछ ब्रह्माण्ड में है, वही हमारे व्यष्टिपिण्ड में विद्यमान है, पर वह जड़ विज्ञान के अन्तर्गत प्राकृतिक शक्ति का समन्वयात्मक विश्लेषण नहीं है, यह तो आत्मा का अथवा चिन्मयसच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्मपरमात्मा का स्वरूपगत तात्विक समत्वबोध है, सर्वव्यापक है। गोरखनाथजी ने 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' की रचना में यह सिद्ध किया है कि हमारा व्यष्टि-शरीर मात्र भौतिक शरीर नहीं है, यद्यपि यह भौतिक रूप में पंचतत्वों से आकारित है तथापि यह एक आध्यात्मिक तत्व में अभिव्यक्त है । यह आध्यात्मिकतत्व शरीर-व्यष्टि-पिण्ड को अपनी पाँच भौतिक सीमाओं और बन्धनों से मुक्त होने की सामर्थ्य प्रदान करने में पूर्णक्षम और शक्तिमान् है । पिण्डमध्ये चराचरं यो जानाति स योगी पिण्डसंवित्तिर्भवति । (सिद्धसिद्धान्तपद्धति ३।१) इस व्यष्टिशरीर में ही जो योगी सकल चराचर जगत् को व्याप्त जानता है, वह पिण्डसंवित्ति होता है । सृष्टि दो तरह की है, व्यष्टिरूप, समष्टिरूप । व्यष्टि-सृष्टि में अन्तःकरणाभिमानी अस्मदादि जीव हैं और समष्टि-सृष्टि- ब्रह्माण्ड में विराट् हिरण्यगर्भादि की अभिव्यक्ति है। यह ब्रह्माण्ड अधिक चिरस्थायी स्वीकार किया गया है, यह अस्मदादि शरीरों का कारण और नियन्ता है, व्यष्टिशरीर क्षणभंगुर और विनश्वर है । इस व्यष्टिपिण्ड में जीवात्मा आता है और इसका त्याग कर निकल जाता है। जीव व्यष्टि-शरीर में कर्मबन्धन में पड़ता है और योगाभ्यास आदि के द्वारा समष्टि, व्यापकपिण्ड में, परमात्मा में अन्तर्लीनता ही उसके परमपद में प्रतिष्ठित होने का स्वरूप है । ब्रह्माण्ड के समस्त रहस्य का शरीरपिण्ड में भेदन करने वाला योगी अथवा युक्त जीवात्मा परमशान्त, निष्कल, निरंजन, परब्रह्मपरमेश्वर आदिनाथ के स्वरूप में स्थित हो जाता है, यही परमपद अथवा परमकैवल्य है । निस्सन्देह समस्त भौतिक वस्तुओं की समस्त कार्य-कारणात्मक क्रियायें और विकास की समस्त प्रक्रियायें तथा ब्रह्माण्ड में वस्तुओं के नवीनतम स्तरों के प्रकट होने की प्रक्रियायें एक शाश्वत-अनन्त परब्रह्म ८ ]
गोरक्षपीठाधीश्वर महन्त अवेद्यनाथ
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परमेश्वर की स्वच्छन्द सृजनेच्छा या इच्छा से शासित होती है। यह सर्वथा निर्विवाद है कि एकही परमात्मा अपनी असीम आध्यात्मिक शक्ति के द्वारा इन समस्त विभिन्नताओं के रूप में अभिव्यक्त होकर उनमें रमण करता है । शिवशक्ति की ब्रह्माण्ड और पिण्ड से प्रापंचिक आत्माभिव्यक्ति की प्रक्रिया व्यक्तियों में आनन्दमय आध्यात्मिक चेतना और अस्तित्व के समस्त स्तरों की आध्यात्मिकता और एकता के प्रकट होनेपर पूर्ण हो जाती है, इसकी सिद्धि तत्वज्ञानी योगियों के जीवन में होती है । सिद्धसिद्धान्त में योगसिद्धि के लिये मन, बुद्धि आदि सभी आध्यात्मिक सत्तायें हैं। योगी का लक्ष्य एक आत्मा को समस्त प्रकार के शरीर में देखना और समस्त प्रापंचिक सत्ताओं के मौलिक आध्यात्मिक स्वरूप का ज्ञान प्राप्त करना है। यही पिण्ड, प्रापंचिक सत्ता तथा ब्रह्माण्ड-व्यवस्था का मौलिक ज्ञान है। ज्यों-ज्यों योग विज्ञानी अपनी आन्तरिक शक्तियों को उत्तरोत्तर उन्नत करने वाले चक्रों, आधारों आदि को कुण्डलिनी-जागरण, नादानुसन्धान तथा प्राणसाधना और मन के उन्मनीकरण द्वारा सक्रिय अथवा उर्ध्वमुख करता है, त्यों-त्यों उसे ऐसा प्रतीत होता है कि उसका व्यष्टिपिण्ड ( शरीर ) शुद्ध आध्यात्मिक चेतना के प्रवाह में स्थूलता और भौतिकता से ऊपर उठकर अधिक तेजस्वी रूप में आध्यात्मिक स्वरूप में प्रतिष्ठित होता जा रहा है। जब व्यावहारिक चेतना यथेष्ट शुद्ध और आलोकित हो जाती है, तब पूर्ण का प्रत्येक अंश में पूर्ण रूप में अनुभव किया जाता है । सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड-व्यवस्था प्रत्येक पिण्ड में अनुभवगम्य हो जाती है और समस्त व्यष्टि-पिण्डों की मौलिक एकता स्वतः अभिव्यक्त हो उठती है । योगी की दृष्टि वस्तुओं के धरातल का ही स्पर्श कर नहीं लौटती, वह तो समस्त वस्तुओं की आत्मा में, चिन्मय सत्ता में प्रवेश करती है। उसके लिये ब्रह्माण्ड में स्थित सूर्य, चन्द्र, लोक-लोकान्तर, द्वीप, सागर, नक्षत्र आदि व्यष्टि-पिण्ड में आध्यात्मिक धरातल पर सच्चिदानन्दस्वरूप में आभासित होते हैं। पांचभौतिक व्यष्टिशरीर में ही व्यावहारिक रूप से अनन्त शाश्वत ब्रह्माण्ड-व्यवस्था के दर्शन किये जा सकते हैं। योगदृष्टि की प्राप्ति होनेपर योगी स्वयं को विराट् पुरुष के रूप में अनुभव करने लग जाता है । योगी विभिन्न स्वरूप में अभिव्यक्त परमात्मा को और समस्त लोकों को अपने भीतर प्रत्यक्ष देखता है और ब्रह्माण्डदर्शन का आनन्दोपभोग करता है। वह जाति, वर्ग, सम्प्रदाय, वर्ण आदि से ऊपर उठकर अपने व्यष्टिपिण्ड में सभी को एकात्मभूत समझता है । 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में गोरखनाथजी ने स्वयं अपना अनुभव व्यक्त करते हुए कहा है कि इस शरीर में जो सुख है, वही स्वर्ग है और जो दुःख है, वही [ ६
नरक है। सकाम कर्म ही बन्धन का कारण है। संकल्परहितता और निर्विकल्पता ही मुक्ति है। यद्यपि अज्ञानी इस निर्विकल्पता को निद्रारूप मानते हैं, तथापि वह अखण्ड आत्मबोधरूप स्थिति है, इस बोध-स्थिति में जागते रहना ही जीवन्मुक्ति है। योगी इस जीवन्मुक्ति में निरन्तर रमण कर समष्टि-पिण्ड—ब्रह्माण्ड और व्यष्टिपिण्ड—शरीर में तात्विक एकात्मकता का रसास्वादन करता है। यत्सुखं तत्स्वर्गं, यद्दुःखं तन्नरकं, यत्कर्मतद्वन्धनं, यन्निर्विकल्पं तन्मुक्तिः, स्वरूपदशायां निद्रादौ स्वात्मजागरः शान्तिर्भवति । एवं सर्वदेहेषु विश्वरूपपरमेश्वरः परमात्माऽखण्डस्वभावेन घटे घटे चित्स्वरूपो तिष्ठति ।। एवं पिण्डसंवित्तिर्भवति । ( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ३।१३ ) असीम, अखण्ड, निरंजन परमेश्वर प्रत्येक शरीर में विद्यमान है, यही परम सद्विवेक अथवा महायोगज्ञान है। हमारे नाथयोग में जीवात्मा का शिव और शक्ति के साथ योगज्ञानपूर्वक अभेद होना ही समरसरूप मोक्ष कहा जाता है। 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में परमात्मा की निजाशक्ति की महिमा का विलक्षण विवेचन हमारे महायोगी गोरखनाथ ने किया है। यह परमेश्वर की स्वकीया शक्ति है। यह तत्वतः परमकैवल्यस्वरूपिणी महामाया है, मोक्षदायिनी परमेश्वरी है। सिद्धसिद्धान्त के अन्तर्गत शिव को शक्ति की आत्मा कहा जा सकता है और शक्ति शिव का अभिव्यक्ति-माध्यम है। शिव के पारमार्थिक स्वरूप में निहित शक्ति एक अनन्त और शाश्वत रूप में सक्रिय ऊर्जा है। शिव शक्ति की आत्मा है तो शक्ति शिव का शरीर है। शरीर का तात्पर्य आकार से है। शिव शक्ति का पारमार्थिक रूप है तो शक्ति शिव का प्रापंचिक स्तर है। शिव से भिन्न और स्वतंत्र शक्ति का अस्तित्व ही नहीं है। महायोगी गोरखनाथजी ने अपनी 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' रचना में कुण्डलिनी के जागरण और महत्ता पर मौलिक प्रकाश डाला है। शरीर में कुण्डलिनी अप्रबुद्ध और प्रबुद्ध रूप में विद्यमान है। मूलाधार में स्थित कुण्डलिनी जबतक योगसाधना के द्वारा प्रबुद्ध नहीं की जाती, तबतक देहासक्त संसार के विषयभोगों में आबद्ध लोगों के लिये यह शोक, मोह, चिन्ता व्यापार आदि के द्वारा बन्धन- कारिणी है। जबतक यह मूलाधार में प्रसुप्त है, अधोमुखी है, तबतक प्राणियों को जन्म, मरण के फल से प्रभावित करती रहती है। प्रबुद्ध कुण्डलिनी जब समुत्थित होकर सहस्रार का भेदन कर परमशिव में अन्तर्लीन हो जाती है, तब वह योग- १० ]
सिद्ध पुरुष के जन्म-मरण दुःखरूप फलों को देनेवाले कर्म ( के प्रभाव ) और मन के विकारों को नष्ट करने में समर्थ होती है । समस्त जागतिक बन्धनों-अविद्या- अन्धकार के परिणामों और विपाकों का प्रबुद्ध कुण्डलिनी के ब्रह्मरन्ध्र में प्रवेश करने पर अन्त हो जाता है । योगी पूर्णकाम और शिवपद में स्वस्थ हो जाता है, वह परमपद में अलख निरंजन की ज्योति से महिमान्वित हो उठता है । गोरखनाथ ने कहा है :- सा विमर्शरूपिणी योगिनः स्वस्वरूपमवगच्छन्तीति सुप्रसिद्धा । ( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ४ । १५ ) यह कुण्डलिनी समस्त कार्यों के ऊपर विद्यमान है, यह विमर्शरूपविद्या है, यह प्रबुद्ध होने पर योगियों को आत्मा के स्वरूप का व्यापक ज्ञान करा देती है । योगी की दृष्टि में यही आत्मदर्शन है । यद्यपि कुण्डलिनी एक है पर स्थान और स्थूल-सूक्ष्मभेद से अधः, मध्य और ऊर्ध्व कही गयी है । गोरखनाथजी ने कुण्डलिनी- जागरण के द्वारा परमपद की प्राप्ति का संकेत किया है :- मध्यशक्तिप्रबोधेन अधः शक्तिनिकुञ्चनात् । ऊर्ध्वशक्तिनिघातेन प्राप्यते परमं पदम् ॥ ( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ४ । १६ ) हमारे नाथयोग में शक्ति के अभ्युत्थान से परमपद में योगसाधक का प्रतिष्ठित होना ही उसकी महती योगसिद्धि है। जिस महामाया-मूलशक्ति अथवा मूलमाया के बल पर परमेश्वर जगत् की रचना करता है, वह मूलाधार में स्थित है, उस शक्ति को जगाकर उसके ध्यान से जब योगी सम्पूर्ण चैतन्यस्वरूप में आत्माभिव्यक्त हो उठता है, तब वह सृजन और सहार में परमेश्वर की ही तरह समर्थ हो जाता है । उसकी सम्पूर्ण सत्ता, अहंता, क्रियाशक्ति, सच्चिदा- नन्दपरमेश्वर की महाशक्ति में अन्तर्लीन हो उठती है । मूलाधार में स्थित कुण्डलिनी समस्त प्राणिमात्र का जीवनाधार है, यह प्रत्येक जीवात्मा के शरीर में व्यापक और अतिसूक्ष्म है । यह अपने स्थूल रूप में स्थूल सृष्टि की रचनात्मक शक्ति है, इसलिये इसे सृष्टि-कुण्डलिनी कहा जाता है । मध्यमा कुण्डलिनी चिद्रूपिणी है । यही जीव का वास्तविक स्वरूप है । यह शक्ति चंचल मन और इन्द्रियों के विषय-भोगों के रस में रमण करने वाले जीवात्मा को अपने निर्मल, शुद्धस्वरूप में—आत्मचैतन्य-प्रकाश में स्थापित कर देती है । [ ११
यह जीवात्मा पूर्वजन्मकृत सत्कर्म के फल से इस जन्म में सद्गुरु की कृपा से जब मध्यमा कुण्डलिनी को जगा लेता है, तब वह योगसिद्धि के द्वारा सहजानन्द स्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाता है । यह निराकार चैतन्यस्वरूपिणी सूक्ष्म महाशक्ति है । योगिनां परमानन्दतया कुण्डलिनी या निश्चयभूता वर्तते सा सूक्ष्मा निराकारा । ( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ४ । २२ ) मध्यमा-कुण्डलिनी के प्रबोधन के उपरान्त जो शक्ति ब्रह्म के अखण्ड- स्वरूप, सच्चिदानन्द का साक्षात्कार कराने में तत्पर होती है, वह ऊर्ध्वशक्ति कही जाती है । शिव और शक्ति की अभेदता ही परमपद की प्राप्ति में ऊर्ध्वशक्तिनिपात का हेतु है । गोरखनाथजी ने स्वसंवेद्य, अनुभवैकगम्य निरंजनतत्व का पिण्डपद सामरस्यपरकयोगविज्ञान के स्तर पर निर्वचन किया । यह महत्तत्व स्वतःसिद्ध स्वरूप चैतन्यप्रकाश से ही वेद्य है । इस स्वचेतनप्रकाश के माध्यम से ही ब्रह्माण्ड में स्थित सूर्य, चन्द्र, अग्नि, विद्युत् आदि ज्योतिःस्वरूप पदार्थ प्रत्याभासित होते हैं । गोरखनाथजी ने कहा है : परमपदमिति स्वसंवेद्यमत्यन्तभासाभासकमयम् । ( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ५ । २ ) यही योगसम्मत परमधाम है, जिसका निर्वचन साधनसापेक्ष हो ही नहीं सकता । निर्विकल्प समाधि के द्वारा ही सहज शून्य में ॐकारपदातीत परमपद की स्वाभिव्यक्ति सहज सिद्ध है । योगसिद्ध महापुरुष गुरु की कृपाकटाक्ष-ज्योति से श्रद्धानिष्ठ योगाभ्यासी को स्वसंवेद्य परमपद का अनुभव होता है तो हो जाता है । गुरु के कृपाकटाक्ष के सम्बल द्वारा मन, इन्द्रियों आदि के संयमपूर्वक अपने पिण्ड का परपिण्ड के साथ सामरस्य स्थापित कर सच्चिदानन्द परब्रह्म का योगी रसास्वादन करता है । "तस्माद् गुरुकटाक्षपातात् स्वसंवेद्यतया च महासिद्धयोगिभिः स्वकीयं पिण्डं निरुत्थानानुभवेन समरसं क्रियत इति सिद्धान्तः ।" ( सिद्धसिद्धान्त पद्धति ५ ७ ) १२ ]
स्वपरपिण्डादि अभेद रूप परमपद की प्राप्ति का उपाय ही सिद्धमत में निरुत्थान कहा जाता है। योगी के लिये यह आवश्यक है कि यदि वह कैवल्यपद का अनुभव पाना चाहता है तो अवधूत गुरु की कृपा प्राप्त करे। 'सिद्धसिद्धान्त- पद्धति' में गोरखनाथजी ने शिव के वचन को उद्धृत कर योगमार्ग की श्रेष्ठता प्रतिपादित की है। योगमार्गात्परो मार्गो नास्तिनास्ति श्रुतौ स्मृतौ । शास्त्रेष्वन्येषु सर्वेषु शिवेन कथितः पुरा ॥ ( सिद्ध सि० प० ५ । २२ ) जड़-पदार्थों का योग नहीं होता है, जड़ और चेतन का संयोग होता है, जीवात्मा द्वारा परमात्मा में अभिन्नता की अनुभूति ही योग है। यही श्रेयस्कर योगमार्ग है। महायोगी गोरखनाथ का कथन है कि परमात्मा से अभिन्न जीवात्मा का शाश्वत चैतन्यस्वरूप योगमार्गपरक सहज, संयम, सोपाय और अद्वैतक्रम से ही लक्षित होता है। जीवात्मा द्वारा परमात्मस्वरूप की स्वानुभूति ही सहज ज्ञान है। इन्द्रियों और मन को अपने विषयों से प्रत्याहारित कर आत्मा में प्रवृत्त करना ही संयम है। अपने स्वप्रकाश आत्मा को सर्वत्र व्यापक और अभेद जानकर उसी में स्वस्थ रहना ही स्थिति है, इस स्थिति का जिस ज्ञान द्वारा अनुभव होता है, वही सोपाय ज्ञान है। परमतत्व की अपरोक्षानुभूति ही अद्वैतक्रमलक्षित परमपद है। गोरखनाथजी का उपदेशामृत है कि साधना की सिद्धि के लिये योगी को अपने गुरु के उपदिष्ट योगज्ञान में पूर्णश्रद्धावान् होकर अपने व्यष्टिपिण्ड में समस्त ब्रह्माण्डनायक अलखनिरंजन की पूर्ण अनुभूति कर परपिण्ड से समरसीकरणपूर्वक अज्ञान-अन्धकार का उच्छेदकर परमपद में स्थित हो जाना नितान्त समीचीन और कल्याणकारी है। परमपद-प्राप्ति की दिशा में गुरु का अनुग्रह ही प्रमुख साधन है, इस अनुग्रह के तीन क्रम हैं—शक्तिपात, करुणावलोकन और उपदेश। उपदेशसम्बन्धी अनुग्रह का तात्पर्य यह है कि गुरु आत्मज्ञान के प्रकाश में पांच- भौतिक जड़ पदार्थों के मिथ्यात्व का निर्देशन कर अपने शिष्य को सत्स्वरूप में स्वस्थ रहने का सदुपदेश प्रदान करता है। शिष्य में विशेष श्रद्धा और साधना के प्रति सत्कार-बुद्धि देखकर गुरु अपनी योगशक्ति से उसे कृतार्थ कर सत्स्वरूप में स्थित कर देता है। यही शक्तिपात है। करुणावलोकन भी एक प्रकार का शक्तिपात है। कथनाच्छक्तिपाताद्वायद्वापादावलोकनात् । प्रसादात्स्वगुरोः सम्यक् प्राप्यते परमं पदम् ॥ ( सि० सि० प० ५ । ६५ ) [ १३
हमारे सिद्धामृतमार्ग में इसी सिद्धान्त का पोषण है कि जो मन्त्रोपदेश या करूणावलोकन मात्र से शिष्य को परम विश्राम में अधिष्ठित कर देता है, वही सद्गुरु है । गोरखनाथजी की शिक्षा है :- अतएव परमपदप्राप्त्यर्थं सद्गुरुः सदावन्दनोयः । ( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ५।७० ) यह निर्विवाद है कि गुरु के कृपापात्र शिष्य की सम्पूर्ण मानसिक वृत्तियों का आत्मस्वरूप में लय हो जाने पर उसे स्वतः जीवात्मा-परमात्मा के ऐक्य का रसानुभव सुलभ हो जाता है। सांसारिक बाह्य विषयों में आसक्त बुद्धि में शान्ति और मुक्ति की अमृतमन्दाकिनी की अजस्र धारा प्रवाहित हो उठती है। पिण्डपद- सामरस्य का आनन्द प्राप्त हो जाता है । गोरखनाथजी ने 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में अवधूत योगी के लक्षण का निरूपण कर संन्यास की वास्तविक गरिमा प्रकाशित की है। उनकी योगदृष्टि में अवधूत योगी वह है, जो सामरस्य के आदर्श को पूर्णतया सिद्ध कर लेता है और स्वसंवेद्य परमतत्त्व का रसास्वादन करता रहता है। अवधूत योगी अहंकार, अज्ञान, संकीर्ण दृष्टिकोण तथा समस्त इच्छाओं, वासनाओं, चिन्ताओं, दुःखों और द्वन्द्वों तथा बन्धनों से मुक्त होकर आत्मस्वरूप में निरन्तर प्रवृत्त रहता है। वह उन्मनी समाधि की अवस्था में परमपद का प्रत्यक्ष ज्ञान प्राप्त कर लेता है, निरपेक्ष अनुभूति के प्रकाश से अपनी चेतना के बौद्धिक, मानसिक और प्राणीय स्तरों को भी प्रकाशित कर देता है। सांसारिक जीवन और लोकव्यवहार के सामान्य कार्यों को करते हुए भी उसकी समाधि-अवस्था निर्विकार और सहज बनी रहती है। ऐसा अवधूत योगी वास्तव में नाथ कहा जाता है। वह स्वामी होता है, सद्गुरु होता है। गोरखनाथजी साक्षात् शिव अवधूत थे, उनका योगदर्शन वास्तव में पूर्ण आत्मज्ञान के आलोक से सम्पन्न मनःस्थिति में स्वयं उनके तथा अन्य सिद्ध महा- योगियों के द्वारा अनुभूत सत्य के प्रकाश में निम्नस्तरीय सामान्य मानवीय अनुभूतियों तथा चेतना के सामान्य ऐन्द्रिक स्तर एवं पूर्ण ज्ञानालोकित स्तर के मध्यवर्ती असामान्य स्तर की रहस्यमयी अनुभूतियों की व्याख्या प्रस्तुत करता है। गोरखनाथजी की दृष्टि में अवधूत योगी वह है, जो अविद्या, अस्मिता, रागद्वेष, अभिनिवेश, पंच क्लेशों के पाश-बन्धन से तथा बाल्य, यौवन और जरा, जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति के प्रपंच से मुक्त होकर मन को उन्मन कर अलख निरंजन में रम जाता है। गोरखनाथजी के वचन हैं :- १४ ]
अवधूततनुर्योगी निराकारपदे स्थितः । सर्वेषां दर्शनानाञ्चस्वस्वरूपं प्रकाशते ॥ ( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ६ । ३३ ) गोरखनाथजी ने सहज सिद्धमत का ही आश्रय ग्रहण करने का उपदेश दिया है । तस्मात् सिद्धमतं स्वभावसमयं धीरः सदा संश्रयेत् । ( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ६ । ७५ ) जब योग की साधना में शुद्ध स्वरूपानन्द का बोध हो जाता है, तब अविद्यारूप भ्रान्ति और सुख-दुःखादि द्वन्द्वात्मक प्रपंचों की स्वतः सहज निवृत्ति हो जाती है। योगी निरतिशयानन्द की प्राप्ति करता है । नाथयोगियों में व्यवहृत 'आदेश' शब्द का गोरखनाथजी ने बड़ा उपयुक्त आशय व्यक्त किया है । आत्मा, परमात्मा और जीवात्मा की अभेदता ही सत्य है, इस सत्य का अनुभव या दर्शन हमारे सिद्धामृत मार्ग में 'आदेश' कहलाता है । व्यावहारिक चेतना की आध्यात्मिक प्रबुद्धता जीवात्माऔरआत्मा तथा परमात्मा की अभिन्नता के साक्षात्कार में निहित है । इन तथ्यों का ध्यान रखते हुए जब योगी एक-दूसरे का अभिवादन करते हैं अथवा गुरुपद में प्रणत होते हैं तो 'आदेश- आदेश' का उच्चारण कर जीवात्मा, विश्वात्मा और परमात्मा के तादात्म्य का स्मरण कराते हैं । आत्मेति परमात्मेति जीवात्मेति विचारणे । त्रयाणामैक्यसंभूतिरादेश इति कीर्तितः ॥ आदेश इति सद्वाणीं सर्वद्वन्द्वक्षयापहाम् । यो योगिनं प्रतिवदेत् सयात्यात्मानमैश्वरम् ॥ ( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ६ । ६४-६५ ) 'आदेश' के उच्चारण मात्र से ही समस्त दुःखों का नाश हो जाता है । 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' परमेश्वरसम्बन्धी सिद्धयोगशास्त्र है, यह महादिव्य, अलौकिक सिद्धसिद्धान्त का योगदर्शन है । इसके पाठ से समस्त सन्देहों का नाश हो जाता है और सिद्धामृतमार्गसम्मत योगसाधन-प्रक्रिया का रहस्य स्वतः प्रकाशित हो उठता है । गोरखनाथजी ने कहा है :-- [ १५
एतच्छास्त्रं महादिव्य रहस्यं पारमेश्वरम् । सिद्धान्तं सर्वसारञ्च नानासंकेतनिर्णयम् ॥ सिद्धाना प्रकट सिद्धं सद्यः प्रत्ययकारकम् । आत्मानन्दकरं नित्यं सर्वसन्देहनाशनम् ॥ ( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ६ । ६७-६८ ) यद्यपि सिद्धसिद्धान्तपद्धति में योग के दार्शनिक पक्ष का प्रतिपादन ही विशेष रूप से परिलक्षित है तथापि साधनासम्वन्धी सूक्ष्मातिसूक्ष्म प्रकियात्मक रहस्यों के अनुभवपूर्ण विवेचन से भी यह सर्वथा सम्पन्न है । यह हमारे नाथयोग का अद्भूत वाङमय है । हमारे मन में कई वर्षों पहले यह संकल्प उदित हुआ था कि इसका शुद्ध संस्कृतपाठसहित हिन्दी में सहज सुबोध भाष्य की प्रस्तुतिपूर्वक प्रकाशन हो । हमारी इच्छा थी कि हमारे गोरक्षसिद्धयोगपीठ से इस तरह का लोकप्रिय संस्करण नाथयोग के सत्सिद्धान्तों के प्रचार-प्रसार में सहायक हो । श्रीगोरखनाथ मन्दिर, गोरखपुर से प्रकाशित होने वाले "योगवाणी" मासिक के सम्पादक रामलालजी श्रीवास्तव ने हिन्दी में सहज-सुबोध भाष्य प्रस्तुत कर 'सिद्ध- सिद्धान्तपद्धति' की यौगिक गरिमा ही नहीं बढ़ायी, हमारी इच्छा और पवित्र संकल्प की पूर्ति में भी अपनी महनीय भूमिका निवाही है । उनके अनुभवपूर्ण मार्मिक भाष्य से 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' को समझने में योगसाधकों को बड़ी सुगमता होगी । हम इस कार्य के लिये उन्हें हृदय से आशीर्वाद प्रदान करते हैं । शिवगोरक्ष भगवान् गोरखनाथजी ने 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' के रूप में अद्भुत योगशास्त्र प्रदान किया और इसका सूक्ष्म रहस्य उनके चरणाश्रय से ही समझ में आ सकता है । हम उन्हीं के मांगलिक वचन ( सि० सि० प० ६ । ११५ ) के प्रकाशन में बड़े आत्मविश्वास से यह कहने का साहस करते हैं कि योगसाधकों-भक्तों पर अनुग्रह- स्वरूप परमानन्ददायक गणपतिनाम का तेज सिद्धसिद्धान्त के प्रकाश से प्राणीमात्र की चेतना को आलोकित करे । विद्वात्वर्थनिचयं भक्तानुग्रहमूर्त्तिमत् । स्मरानन्दभरं चेतो गाणपत्यभिधं महः । गोरखनाथ-मन्दिर, गोरखपुर महन्त अवेद्यनाथ विजयादशमी २०३८ वि० (गोरक्षपीठाधीश्वर) १६ ]
सिद्धसिद्धान्तपद्धति महायोगी शिवगोरक्ष भगवान् गोरखनाथजी ने 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' ऐसे असाधारण तथा अपूर्व, परमदिव्य योगशास्त्र की रचना कर आधिदैविक, आधि- दैहिक और आधिभौतिक दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति प्रकाशित कर आध्यात्मिक मुक्ति का विधान प्रशस्त किया। यह विधान ही सिद्ध-साधना-पद्धति में सिद्धान्त कहा गया है। यह पिण्डगत साधना की ब्रह्माण्ड में अखण्ड परमात्मस्वरूप की अनुभूति का सच्छास्त्र है। गोरखनाथजी की दृष्टि में यह सिद्धान्त का सार है, श्रेयस्कर और प्रासादिक अथवा निर्मल है। 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' का उपसंहार करते हुए उन्होंने अभिमत व्यक्त किया है। 'पिण्डे सर्वगतं विधानममलं सिद्धान्तसारं वरम्।' (सिद्धसिद्धान्तपद्धति ६।६३) नाथ-सम्प्रदाय अथवा सिद्धामृत मार्ग ही नहीं, सम्पूर्ण नाथयोग तथा सामान्य-असामान्य योग-साधना के धरातल पर 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' गोरखनाथजी की अप्रतिम देन है। पतञ्जलि का योगदर्शन तो योग के आदिवक्ता भगवान् हिरण्यगर्भ के योगानुशासन का सूत्रात्मक संकेत मात्र है और महर्षि ने आरम्भ में ही हिरण्यगर्भ की योगकृति का सन्दर्भ व्यक्त किया है : 'अथ योगानुशासनम्' (योगसूत्र १।१) इस सन्दर्भ का तात्पर्य यह है कि पतञ्जलि ने योग का जो कुछ भी निदर्शन किया है, उसका आधार-वाङ्मय हिरण्यगर्भ का 'योगानुशासन' है। महाभारत में योग के वक्ता हिरण्यगर्भ का उल्लेख है। हिरण्यगर्भो योगस्य वक्ता नान्यः पुरातनः। (महाभारत शान्ति० ३४७।६५) [ १७
यद्यपि गोरखनाथजी की योगदृष्टि में हिरण्यगर्भ का 'योगानुशासन' था, तथापि उन्होंने पार्वती के प्रति शिव द्वारा सप्तशृंग पर उपदिष्ट महाज्ञान का, जिसका महायोगीन्द्र मत्स्येन्द्रनाथ ने श्रवण कर उन्हें गुरु-परम्परा को सजीव रखने के लिए प्रदान किया था, 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में नाथयोग के रूप में स्पष्ट प्रतिपादन है। हिरण्यगर्भ के 'योगानुशासन' से यही 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' की विशिष्टता है और यही कारण है कि गोरखनाथजी की यह रचना निरन्तर अपनी मौलिकता में प्रतिष्ठित है और योगसाधना की सिद्धि के स्तर पर भविष्य में भी प्राणवान् अंग के रूप में स्वीकृति होती रहेगी । गोरखनाथजी ने 'सिद्धसिद्धान्त पद्धति' शास्त्र को महादिव्य पारमेश्वर रहस्य का सिद्धान्त कहा है । सिद्धों का अनुभवस्वरूप 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' योगशास्त्र साक्षात् अनुभव है, आत्मानन्द प्रदान करने वाला है और सर्वसन्देहनाशक है, सत्स्वरूप है । एतच्छास्त्रं महादिव्यं रहस्यं पारमेश्वरम् । सिद्धान्तं सर्वसारस्य नानासंकेतनिर्णयम् ॥ सिद्धानां प्रकटं सिद्धं सद्यः प्रत्ययकारकम् । आत्मानन्दकरं नित्यं सर्वसन्देहनाशनम् ॥ ( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ६ । ६७-६८ ) गोरखनाथजी द्वारा उपदिष्ट योग महाज्ञान ही नाथयोग-मार्ग का साधन तत्व है । यही कारण है कि नाथयोगमार्ग को सिद्धमत, सिद्धामृत मार्ग अथवा अवधूत-मार्ग कहा गया है । यद्यपि नाथ-सम्प्रदाय में अनेक महत्वपूर्ण योगग्रन्थों की रचना हो सकी है, तथापि 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' ग्रन्थ ऐसा सिद्धान्त-प्रतिपादक दूसरा ग्रन्थ कोई है ही नहीं । वास्तव में यह योगदर्शन का सम्पूर्ण विवेचनात्मक विचार-वाङ्मय है और इस योगज्ञान में गोरखनाथजी ने बड़ी रहस्यमयी सूक्ष्म- दृष्टि के द्वारा साधन-प्रक्रिया भर दी है, पर उसका अभ्यास सिद्धपुरुष अथवा अवधूत गुरु की ही देख-रेख में सम्भव है । 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' के गहन परिशीलन से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि इस अप्रतिम नाथयोगशास्त्र में योगदर्शन तथा प्रक्रिया—साधनाभ्यास का सफल समन्वय हो सका है । योगविषय का प्रतिपादन 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में गोरखनाथजी ने करते हुए जिस प्रत्यक्षानुभूति-अपरोक्षानुभूति के सहारें परमात्मा के अखण्ड—अलख निरञ्जन स्वरूप का निजाशक्ति के समाश्रय में वर्णन किया है, वह अन्यत्र असाध्य भले ही न हो, दुर्लभ तो है ही । इस योगशास्त्र के छः अध्यायों में पिण्डोत्पत्ति, पिण्ड-
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विचार, पिण्डसंवित्ति, पिण्डाधार, पिण्डपदसमरसभाव और नित्यावधूत-लक्षण का उपदेश करते हुए गोरखनाथजी ने हठयोग - प्राण-साधना के परिप्रेक्ष्य में परम पद की प्राप्ति को ही नाथयोग का प्रतिपाद्य स्वीकार किया है । उन्होंने समस्त तत्वों की समावस्था के निरुद्यम-सहज स्थिति को समाधि कहते हुए उसकी असम्प्रज्ञात-चरमावस्था में परमपद की प्राप्ति सिद्ध की है । उन्होंने नाथयोग का परम तत्व इस सिद्धान्त में स्थिर किया है कि पिण्ड में अखण्ड ब्रह्माण्ड की सहज अभिव्यक्ति के माध्यम से परमात्म ज्योति का पूर्ण साक्षात्कार होता है । यही सिद्ध-मार्ग कहा गया है । गोरखनाथजी ने अपनी प्रसिद्ध रचना 'योगबीज' में इस कथन की प्रामाणिकता अंकित की है । नानामार्गैस्तु दुष्प्राप्यं कैवल्यं परमं पदम् । सिद्धमार्गेण लभ्येत नान्यथा शिवभाषितम् ॥ उन्होंने इस कथन की पुष्टि के लिये इसे शिवभाषित - शिव-उपदिष्ट कह कर इसके सत्सिद्धान्तस्वरूप की रक्षा की है। उन्होंने परमपद को स्वसंवेद्य कहा है, स्वसंवेद्य कह कर योगमार्ग का सर्वतन्त्रस्वरूप स्पष्ट किया है । 'स्वसंवेद्यमेव परमपदम् ।' ( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ५ । ४ ) यद्यपि परम पद स्वसंवेद्य है, अपरोक्षानुभवैकगम्य है, तथापि जिस साधक पर सद्गुरु की कृपा नहीं होती अथवा जो साधक सद्गुरु के योगोपदेशामृत से वंचित रह जाता है, वह परम पद को प्राप्त नहीं कर सकता है । प्रसादात्सद्गुरोः सम्यक् प्राप्यते परमं पदम् ।
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- + अतएव - परमपदप्राप्त्यर्थं स सद्गुरुः सदा वन्दनीयः ॥ ( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ५ । ६५, ७० ) इस परम पद की प्राप्ति की दिशा में अधः शक्ति के रूप में प्रसुप्त कुण्डलिनी का प्रबोधन आवश्यक है । मूलाधार में सुप्त कुण्डलिनी अपनी सुप्तावस्था से जाग कर मणिपूरक और अनाहत चक्र को पार करने के उपरान्त प्रकाशस्वरूपिणी हो उठती है । यह मध्याशक्ति कहलाती है और आज्ञाचक्र का भेदन कर ऊर्ध्वशक्ति के रूप में सहस्रार में प्रवेश कर शिवस्वरूप हो जाती है । [ १६
'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' रचना निस्सन्देह सिद्धों के सिद्धान्त का अक्षर वाङ्मय है और सिद्धपुरुषों द्वारा परम्परा से स्वीकृत है । इसकी लोकप्रियता का प्रमाण यह है कि अभी प्रायः दो सौ साल पहले काशी के प्रसिद्ध नाथयोगमर्मज्ञ बलभद्र ने इसके सारतत्व को स्वरचित श्लोकों में अनुस्यूत कर 'सिद्धसिद्धान्त संग्रह' का प्रणयन किया, जो इस योग-ग्रन्थ को समझने का एक विशिष्ट माध्यम है । किन्हीं कृष्णराज के निर्देश से बलभद्र ने 'सिद्धसिद्धान्तसंग्रह' रूप पुण्यकार्य सम्पादित किया था । उनका कथन है : यत्पदाब्जरजः स्पर्शादरजस्कं मनो भवेत् । स एव गुरुनाथो मे कृपासिन्धुः प्रसीदताम् ॥ अथो ये सिद्धसिद्धान्तपद्धतौ सुनिरूपिताः । संग्रहं तनुते तेषां कश्चिच्छ्रीकृष्णतुष्टये ॥ ( सिद्धसिद्धान्तसंग्रह १ । १-२ ) बलभद्र ने श्रीनाथ गुरु—साक्षात् श्रीगोरखनाथ के ही पदकमलों में प्रणति के परिणामस्वरूप उनकी प्रसन्नता अथवा अनुग्रह से मन का अरजस्क—निर्मल होना स्वीकार किया है। उन्होंने 'सिद्धसिद्धान्तसंग्रह' में 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' का साधारणीकरण किया है । 'सिद्धसिद्धान्तसंग्रह' का प्रकाशन महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज ने सन् १६२५ में सरस्वती भवन 'टेक्स्ट सीरीज' के अन्तर्गत काशी से किया था । मैंने संस्कृत का मूलपाठ अत्यन्त संशोधितरूप में सिद्धपूरवाड़ा कुटी गान्धारा, जालन्धर द्वारा प्रकाशित और सम्राट प्रेस, पहाड़ी धीरज दिल्ली द्वारा मुद्रित 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' से लिया है । यह अत्यन्त प्रामाणिक और शुद्ध है तथा इसके दो संस्करण सन् १६४० ई० और १६७१ ई० में क्रमशः प्रकाशित हो चुके हैं । इसकी संस्कृत टीका महामहोपाध्याय द्रव्येश झा ने लिखी है और इसका हिन्दी रूपान्तर योगी भीष्मनाथ ने किया है । मैंने अपने हिन्दी रूपान्तर में द्रव्येश झा महोदय की टीका से भी थोड़ी-बहुत सहायता ली है, इससे मैं अपने हिन्दी-भाष्य को अधिक सुगम-सहज-सुबोध कर सका । 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' के उपर्युक्त संस्करण का अंग्रेजी में सारतत्व प्रस्तुत करने में डॉ० कल्याणी मल्लिक ने भी उपयोग किया और इस तरह 'सिद्धसिद्धान्त- पद्धति' की लोकप्रियता बढ़ाने में उनका योगदान कम नहीं है । गोरखनाथ २० ]
एण्ड दि कनफटा योगीज' अंग्रेजी ग्रन्थ के प्रणेता महामति ब्रिग्स ने भी 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' की चर्चा की है और गोरखनाथकृत इस रचना के अतिरिक्त उन्होंने नित्यानन्दकृत 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' नामक एक और रचना का उल्लेख किया है। 'गोरक्षसिद्धान्त संग्रह' में इन्हीं नित्यानन्द को नित्यनाथ कहा गया है और उसमें नित्यनाथकृत 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' से दो-तीन श्लोक उद्धृत हैं, जो बहुत ही मार्मिक हैं और गोरक्षसिद्धान्त का विशिष्ट प्रतिपादन करते हैं । उनमें से ( १।३ ) एक है : न ब्रह्मा विष्णुरुद्रौ न सुरपति सुरा नैव पृथ्वी न चापो नैवाग्निर्नार्पि वायुर्न च गगनतलं नो दिशा नैव कालः । नो वेदा नैव यज्ञा न च रविशशिनौ नो विधिर्नैव कल्पाः स्वयं ज्योतिः सत्यमेकं जयति तव पदं सच्चिदानन्दमूर्ते । सच्चिदानन्दस्वरूप परमेश्वर ! आप के परमपदतक ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र, इन्द्र और देवगण, पृथ्वी, जल, अग्नि वायु, आकाश, दिशाएँ, काल, वेद, यज्ञ, सूर्य और चन्द्रमा, विधि-कल्प की भी पहुँच नहीं है, एकमात्र सत्स्वरूप निजा शक्ति—ज्योति ही उस परम पद में अभिव्यक्त है । महायोगी गोरखनाथजी ने 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में योगसाधकों के संतोष और आत्मतृप्ति के लिये यह सिद्धान्त स्थिर किया है कि जो कुछ भी इस शरीर में सुखानुभव है, वही स्वर्ग है और जो दुःख है, वही नरक है। सकाम कर्म ही बन्धन है, निर्विकल्पता ही मुक्ति है, द्वैत-प्रपंच की शान्ति से ही यह मुक्ति सुलभ होती है । यत्सुखं तत्स्वर्गं यद्दुःखं तन्नरकं, यत्कर्म तद्बन्धनं यन्निर्विकल्पं तन्मुक्तिः । ( सिद्धसिद्धान्तपद्धति ३ । १३ ) यह स्वीकार करना नितान्त युक्तिसंगत और अत्यन्त समीचीन है कि महायोगी गोरखनाथजी ने 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में सनातन, परम्परागत योग का स्वरूप साधना और दर्शन के स्तर पर सुनिश्चित किया। योग सार्वभौम जीवन- दर्शन का प्रयोगात्मक सर्वश्रेष्ठ विज्ञान है, जिसके समाश्रय में सांख्य, न्याय, वैशेषिक, पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा को क्रमशः प्रकृति-पुरुष के तत्वात्मक [ २१
सम्बन्ध, दुःख की आत्यन्तिक निवृत्ति, जड़ से असंगता, असत् से परे सद्ज्ञान की प्रतिष्ठा, कर्म में परमेश्वर की आराधना और आत्मज्ञान अथवा अखण्ड ब्रह्मज्ञान में स्वरूपबोध के उद्गम का मूल प्रवाह दर्शनीय है । योग के सम्बन्ध में प्राचीन काल से ही तन्त्र और देहात्मवादी दर्शनों के परिप्रेक्ष्य में अनेकानेक भ्रामक और गलत धारणाओं से सत्य के प्रति जिज्ञासु साधकों को दिग्भ्रमित होना पड़ा । महायोगज्ञानामृत से तृप्त होने वाले उत्सुक प्राणियों को विभिन्न साम्प्रदायिक और दार्शनिक मान्यताओं के कठघरों में बड़ी- बड़ी प्रताड़नायें सहने पर भी सत्स्वरूप का बोध दुर्लभ होता गया । योग के सत्सिद्धान्तों को अपनी-अपनी मान्यताओं के वाग्जाल में उलझा कर योगमार्ग में सही प्रगति की दिशा में बढ़ने वालों को बड़े-बड़े तथाकथित आत्मज्ञानियों और परमात्मतत्व की चर्चा करने वालों ने भ्रमित कर दिया । अतएव, 'सिद्धसिद्धान्त- पद्धति' ऐसे भ्रमित जिज्ञासुओं के लिये एक ध्रुव अक्षर प्रकाश है, जिसके द्वारा चिरकाल तक लोग योग का सही-सही मूल्यांकन करते हुए साधना में अनायास सहजसिद्ध स्वरूपबोध प्राप्त करते रहेंगे । 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' की रचना की आधारशिला है परमपद की सहज प्राप्ति, जिसमें जीवात्मा और परमात्मा में अभेदता—सम्पूर्ण सामरस्य अथवा ऐक्य की स्थापना हो जाती है । यह निर्विवाद है कि जहाँ पातञ्जल योग का दर्शन समाप्त होता है, वहाँ नाथयोग-ज्ञान का साधना और दार्शनिकता के स्तर पर आरम्भ होता है । महर्षि पतञ्जलि ने अपने योगानुशासन के प्रकाश में चित्तवृत्तिनिरोध को योगसिद्ध कर द्रष्टा के स्वरूपावस्थान को उसका अमोघ फल बताया है । 'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्' ( पातञ्जलयोग० १ । ३ ) गोरखनाथजी ने 'सिद्धसिद्धान्तपद्धति' में अष्टांगयोग का स्वरूप विवेचित करते हुए इस चित्तवृत्तिनिरोधरूप पातञ्जल योग को नियम के अन्तर्गत निश्चित कर मत व्यक्त किया है । 'नियम इति मनोवृत्तिनां नियमनम्' ( सि० सि० प० २ । ३३ ) इस तरह मनोवृत्ति के नियमन में ही पतञ्जलि द्वारा स्वीकृत योग की प्रतिष्ठा कर 'तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्' को 'आसनमिति स्वस्वरूपे समा २२ ]