संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
- ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६२३
लाखोंतक पहुँच गयी। वे सब ब्राह्मणोंके सेवक हुए। तत्पश्चात् देवताओंके चले जानेपर सब ब्राह्मण इस स्थानपर निवास करने लगे। राजन् ! तबसे वहाँके ब्राह्मण निर्भय हो पुत्र-पौत्रोंके साथ रहते और वेदोंका पाठ करते हैं। वे वेदज्ञ विद्वान् कभी शास्त्रोंका अर्थ सुनाते, कभी कोई भगवान् विष्णुका जप करते, कोई शिवजीके गुण गाते, कोई ब्रह्माजीके नाम लेते और कोई यमसूक्तका जप करते हैं। कितने ही याजक बनकर यज्ञ एवं अग्निहोत्रकी उपासना करते हैं। वे स्वाहाकार, स्वधाकार और वषट्कारके शब्दोंसे चराचर प्राणियोंसहित सम्पूर्ण त्रिलोकीको परिपूर्ण करते रहते हैं। वहाँके वैश्य भी बड़े दक्ष होते हैं और सदा ब्राह्मणोंकी सेवाके लिये उत्कण्ठित रहते हैं। वे धर्मारण्यके दिव्य प्रदेशमें सुस्थिर होकर बसते हैं और ब्राह्मणोंके लिये अन्न, पान, समिधा, कुश तथा फल आदिका प्रबन्ध करते हैं। पुष्पोपहारका संग्रह करना, स्नान किये हुए वस्त्रको धोना, उपले आदि बनाना, झाड़ने-बुहारनेका काम करना तथा कूटना और पीसना आदि कार्य उन वैश्योंकी स्त्रियाँ करती थीं। ब्रह्मा, विष्णु और शिवके वचनसे सब लोग उन ब्राह्मणोंकी सेवा करते थे। तबसे सब ब्राह्मण स्वस्थ हो, हर्षपूर्वक दिन-रात ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदिकी उपासना करने लगे।
लोलजिह्वाक्षका वध, गणेशजीकी उत्पत्ति और देवताओंद्वारा उनका स्तवन
व्यासजी बोले— तत्पश्चात् कुछ काल बीतनेपर जब सत्ययुगकी समाप्ति हुई, तब त्रेताके प्रारम्भमें 'लोलजिह्वाक्ष' नामका एक राक्षस हुआ, जो समस्त राक्षसोंका राजा था। उसने ब्राह्मणोंसे सेवित उस परम पवित्र एवं सुन्दर धर्मारण्यमें द्वेषवश आग लाग दी। अपने नगरको जलते देख वे श्रेष्ठ ब्राह्मण भाग खड़े हुए। तब श्रीमाता आदि देवियाँ क्रोधमें भरकर उस राक्षसको फटकारती हुई उसपर प्रहार करने लगीं। राक्षसने उन देवियोंको देखकर भयंकर सिंहनाद किया। उस समय धर्मारण्यमें बड़ा भारी कोलाहल मच गया। उसे सुनकर इन्द्रने नलकूबरको भेजा। नलकूबर वहाँ गये और श्रीमाता तथा लोलजिह्वाक्षमें जो महान् युद्ध चल रहा था, उसको उन्होंने देखा। जैसा देखा, वैसा ही इन्द्रके आगे निवेदन किया। यह समाचार सुनकर भगवान् विष्णु सुदर्शन चक्र लेकर सत्यलोकसे पृथ्वीपर आये। धर्मारण्यमें पहुँचकर उन्होंने चक्र चलाया। तब लोलजिह्वाक्ष राक्षस मूर्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा और प्राण त्यागकर परम धामको चला गया। देवता और गन्धर्वोंने हर्षमें भरकर जगदीश्वर भगवान् विष्णुका स्तवन किया। उस नगरको उजड़ा हुआ देख भगवान् विष्णुने कहा—'ऋषियोंके आश्रममें निवास करनेवाले वे सब ब्राह्मण कहाँ हैं?' देवता और गन्धर्वोंने इधर-उधर भगे हुए ब्राह्मणोंको खोज निकाला तथा इस प्रकार कहा—'ब्राह्मणो! उस अधम राक्षसको भगवान् वासुदेवने अपने चक्रसे काट डाला है।' यह सुनकर ब्राह्मणोंके नेत्र हर्षसे खिल उठे और उन सबने अपने-अपने स्थानमें प्रवेश किया तथा भगवान् श्रीलक्ष्मीपतिसे कहा—'प्रभो! आपने सत्यलोकसे आकर ब्राह्मणोंके हितके लिये इस मन्दिररूपी नगरकी पुनः स्थापना की है। इसलिये संसारमें यह सत्यमन्दिरके नामसे विख्यात होगा। सत्ययुगमें यह धर्मारण्य था, त्रेतामें इसका नाम सत्यमन्दिर होगा।' भगवान् विष्णुने 'तथास्तु' कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार की।
गणेशजीका मस्तक-छेदन
गणेशजीको गजमस्तक-दान
- ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६२५
तदनन्तर वे सब ब्राह्मण अपने पुत्र-पौत्र, पत्नी और सेवकोंके साथ पूर्ववत् निवास करने लगे।
उस नगरके पूर्वभागमें धर्मेश्वर, दक्षिणमें गणेश, पश्चिममें सूर्यदेव और उत्तरमें साक्षात् स्वयम्भू ब्रह्माजीका स्थान है।
युधिष्ठिरजीने पूछा—महाभाग ! गणेशजीको किसने स्थापित किया ?
व्यासजी बोले—महाराज ! पूर्वकालमें सब देवताओंने धर्मारण्यमें दुर्गाजीके पुत्र गणेशजीको स्थापित किया था। अब मैं गणेशजीकी उत्पत्तिका कारण बतलाता हूँ। एक समय पार्वतीजीने अपने अंगोंमें उबटन लगाया और उससे जो मैल निकली, उसे हाथपर रखकर उसकी एक सुन्दर स्वरूप प्रतिमा बना दी। फिर उसमें उन्होंने जीवका भी संचार कर दिया। तब वह बालक उनके आगे उठकर खड़ा हो गया और मातासे बोला—'आज्ञा दीजिये, मैं कौन-सा कार्य करूँ?'
पार्वतीजीने कहा—मैं जबतक स्नान करूँ, तबतक तुम मेरे द्वारपर खड़े रहो। महादेवजीके इस प्रकार आज्ञा देनेपर गणेशजी हथियार ले द्वारपर खड़े हो गये। इसी समय महादेवजी आये और उन्होंने घरके भीतर प्रवेश करनेका विचार किया। किंतु द्वारपर खड़े हुए बालकने उन्हें भीतर नहीं जाने दिया। इससे महादेवजी कुपित हो उठे और दोनों पिता-पुत्रमें परस्पर युद्ध होने लगा। महादेवजीने त्रिशूलसे उस बालकका मस्तक काट डाला। अपने पुत्रको मरकर गिरा हुआ देख पार्वतीजी फूट-फूटकर रोने लगीं। पार्वतीजीको दुःखी देखकर भगवान् शंकरको बड़ी चिन्ता हुई। इतनेमें ही उनकी दृष्टि वहाँ आये हुए गजासुरपर पड़ी। उस महादैत्यको देखकर भगवान् शंकरने उसे मार डाला और उसका मस्तक लेकर पार्वतीके बनाये हुए बालकके धड़से जोड़ दिया। तब वह बालक उठकर खड़ा हो गया। शिवजीने उसका नाम गजानन रखा। फिर सब देवताओं और मुनियोंने मिलकर गणेशजीका स्तवन किया।
देवता बोले—भगवन् ! आपको नमस्कार है। आप देवताओंके ईश्वर तथा गणोंके स्वामी हैं, आपको नमस्कार है। गजानन ! आप महादेवजीके भी अधिदेवता हैं, आपको नमस्कार है। गणाध्यक्ष ! आप भक्तिप्रिय देवता हैं, आपको नमस्कार है।
इन शुभ स्तोत्रोंद्वारा स्तुति करनेपर गणोंके स्वामी गणेशजी अत्यन्त प्रसन्न होकर इस प्रकार बोले—देवताओ ! मैं तुमपर बहुत सन्तुष्ट हूँ, तुम कोई मनोवांछित वस्तु माँगो, मैं तुम्हें देता हूँ।
देवता बोले—महाभाग ! आप यहीं रहकर हमारा कार्य-साधन करें। धर्मारण्यमें रहनेवाले ब्राह्मण, वैश्यजन, धार्मिक पुरुष तथा वर्णाश्रमसे भिन्न मनुष्योंका भी आप सदा संरक्षण करें। आपके प्रसादसे यहाँके ब्राह्मण और महाबली वैश्य सदा धन और सुखसे सम्पन्न हों। जबतक सूर्य, चन्द्रमा और पृथ्वी रहे, तबतक आप यहीं रहकर सबकी रक्षा करते रहें।
गणेशजीने 'एवमस्तु' कहकर उनकी प्रार्थना स्वीकार की। तब देवताओंने हर्षमें भरकर गणेशजीका पूजन किया। संसारके दूसरे लोगोंने भी विघ्ननिवारणके लिये उनकी पूजा की। इसीलिये गणेशजी विवाह, उत्सव और यज्ञमें पहले पूजित होते हैं। धर्मारण्यमें रहनेवाले लोगोंपर वे सर्वदा प्रसन्न रहते हैं।
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६२६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
संज्ञाकी तपस्या, अश्विनीकुमारोंका जन्म तथा वकुलादित्यकी स्थापना
व्यासजी कहते हैं— महाभाग युधिष्ठिर ! भगवान् शंकरके पश्चिम भागमें कश्यपनन्दन भगवान् सूर्यकी स्थापना की गयी है। वह स्थान रविक्षेत्र कहलाता है। वहीं रूप और यौवनसे सम्पन्न नासत्य नामसे प्रसिद्ध महादिव्य दोनों अश्विनीकुमार उत्पन्न हुए, जो देवलोकके वैद्योंके रूपमें प्रसिद्ध हैं। विश्वकर्माकी पुत्री संज्ञा अंशुमाली भगवान् सूर्यको ब्याही गयी थी। संज्ञाके यमराज और यमुना—ये दो सन्तान उत्पन्न हुईं। यमुना महानदीके रूपमें प्रसिद्ध हुई। संज्ञाको भगवान् सूर्यका तेज सहन नहीं होता था। अतः उसने अपनी छायाका ही आवाहन करके उससे कहा—'तुम मेरी ही भाँति भगवान् सूर्यकी सेवामें उपस्थित रहो। मेरे पुत्रोंसे और मेरे पतिदेव सूर्यदेवसे सदा उत्तम बर्ताव करना, ऐसा कहकर संज्ञादेवी पिताके घर चली गयी। वहाँ उसने अपने पिता विश्वकर्माका दर्शन किया और विश्वकर्माने भी बड़े आदरसे उन्हें रखा। कुछ समयतक वे पिताके घरमें ही टिकी रहीं। तब उनके धर्मज्ञ पिता विश्वकर्माने अपनी पुत्रीसे प्रेमपूर्वक कहा—'बेटी ! यहाँ तुम्हारे रहनेसे धर्मका लोप हो रहा है, क्योंकि अपने बन्धु-बान्धवोंके साथ स्त्रियोंका अधिक कालतक रहना उनके लिये यशकारक नहीं होता। स्त्री पतिके घरमें रहे, तभी उसकी शोभा है। इसलिये तुम पतिके घर जाओ।' पिताके ऐसा कहनेपर संज्ञाने 'बहुत अच्छा' कहकर उनका आदर किया और वहाँसे निकलकर उत्तर कुरुको प्रस्थान किया। वे सूर्यके तेजसे भयभीत थीं, अतः घोड़ीका रूप धारण करके वहाँ तपस्या करने लगीं। इधर भगवान् सूर्यने अपनी दूसरी पत्नीको संज्ञा ही समझकर उसके गर्भसे दो पुत्र और एक सुन्दर कन्याको जन्म दिया। छाया अपनी सन्तानोंके प्रति जैसा प्रेमपूर्ण बर्ताव करती थी, वैसा संज्ञाकी कन्या एवं पुत्रोंके साथ नहीं करती थी। लाड़-प्यार तथा भोजन आदिमें वह प्रतिदिन भेदभाव करती थी। यमुनाने तो उसके इस बर्तावको सह लिये किंतु यमराजसे नहीं सहा गया। उन्होंने पिताके समीप जाकर प्रणामपूर्वक कहा—'तात ! यह मेरी माता नहीं है।' यह सुनकर भगवान् सूर्यने छाया-संज्ञाको बुलाकर पूछा—'देवी ! संज्ञा कहाँ चली गयीं?' उनके बार-बार पूछनेपर भी जब उसने नहीं बताया, तब वे क्रोधमें आकर शाप देनेको उद्यत हो गये। इससे भयभीत हो उसने सब वृत्तान्त ज्यों-का-त्यों बता दिया। यथार्थ बात ज्ञात होनेपर सूर्यदेव विश्वकर्माके घर गये और विश्वकर्मासे उन्होंने संज्ञाके विषयमें पूछा। वे बोले—'देव ! संज्ञा आपके भेजनेसे मेरे घर आयी अवश्य थी, किंतु मैंने उसे पुनः वहीं भेज दिया।' यह सुनकर भगवान् सूर्यने समाधिमें स्थित होकर देखा कि संज्ञा घोड़ीका रूप धारण करके उत्तर कुरुमें तपस्या कर रही हैं। उन्होंने ध्यानके द्वारा यह भी समझ लिया कि तेजसे असह्य होनेके कारण वह मेरी ओर देखनेमें समर्थ न हो सकी। आज पचास वर्ष व्यतीत हो गये। उसने पृथ्वीपर जाकर तपस्या की है। तब भगवान् सूर्य शीघ्रतापूर्वक संज्ञाके पास गये। उस समय वे धर्मारण्यपुरमें आकर तपस्यामें संलग्न थीं। भगवान् सूर्यको आया हुआ देख सूर्यपत्नी संज्ञा पुनः घोड़ीके रूपमें स्थित हो गयीं। तब भगवान् सूर्य भी अश्व हो गये। फिर उन दोनोंका मिलन हुआ। इससे वे दोनों अश्विनीकुमार जुड़वें प्रकट हुए। उनके दाहिने खुरसे पृथ्वी विदीर्ण हो जानेके कारण वहाँ एक कुण्ड बन गया और उसमें जल प्रकट हो गया। इसी प्रकार पिछले चरणोंसे भी एक दूसरा कुण्ड
- ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६२७
बन गया। उसमें स्नान करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है और उसका शरीर कोढ़ आदि रोगोंसे पीड़ित नहीं होता। राजन्! इस प्रकार तुमसे अश्विनीकुमारोंकी उत्पत्तिका वृत्तान्त बतलाया। देवताओंने वहाँ भगवान् सूर्यको वकुलवनके स्वामीके रूपमें स्थापित किया। साथ ही वहाँ संज्ञारानी और दोनों अश्विनीकुमारोंकी भी स्थापना की गयी। जो मनुष्य इन्द्रियोंको संयममें रखकर श्रद्धापूर्वक सूर्यकुण्डमें स्नान करता है, वह महानरकमें पड़े हुए पितरोंका भी उद्धार कर देता है। जो श्रद्धापूर्वक देवताओं और पितरोंका तर्पण करके उस कुण्डका जल पीता है, उसका पुण्य कोटिगुना होता है। रविवारयुक्त सप्तमीमें तथा चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके समय जो सूर्यकुण्डमें स्नान करते हैं, वे फिर गर्भमें नहीं जाते। संक्रान्ति, व्यतीपात और वैधृति योगमें, पर्वोंके अवसरपर, शुक्ल और कृष्ण पक्षकी पूर्णिमा, अमावास्या एवं चतुर्दशीको जो सूर्यकुण्डमें स्नान करता है, उसे कोटि यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। जो मनुष्य एकचित्त होकर वकुलादित्यका पूजन करता है, वह जबतक सूर्यदेव तपते हैं तबतक परम धाममें निवास करता है। उसे कभी सर्पका भय नहीं होता। भूत और प्रेत आदिकी बाधा भी नहीं प्राप्त होती। जो मनुष्य रोगग्रस्त हो, वह सूर्यकुण्डमें छः महीनेतक स्नान करनेसे सभी रोगोंसे मुक्त हो जाता है। युधिष्ठिर! जो मनुष्य इस धर्मारण्यक्षेत्रमें कन्यादान करता है, वह उस विवाहयज्ञसे पवित्रचित्त होकर ब्रह्मलोकमें पूजित होता है। इस क्षेत्रमें गोदान, शय्यादान, मूँगा, घोड़ा, दासी, भैंस, तिल एवं सुवर्णका दान करना चाहिये। रविवारयुक्त सप्तमी तिथिमें जो वकुलादित्यका स्मरण करता है, उसे ज्वर आदि रोगों, शत्रुओं तथा व्याधियोंसे भय नहीं प्राप्त होता।
**युधिष्ठिरजीने पूछा—**मुने! वहाँ भगवान् सूर्यका वकुलार्क अथवा वकुलादित्य नाम कैसे पड़ा?
**व्यासजी बोले—**राजेन्द्र! जब संज्ञारानीने भगवान् सूर्यकी प्राप्ति तथा उनके तेजकी शान्तिके लिये एकचित्त होकर वकुल-वृक्षके नीचे तपस्या की, उस समय उस वृक्षके नीचे आकर भगवान् सूर्य बहुत शान्त हो गये। तभी रानीने दो परम मनोहर दिव्यरूपधारी पुत्र उत्पन्न किये। इसीसे भगवान् सूर्यका नाम वकुलार्क हुआ। जो वहाँ स्नान करता है, उसे कोई व्याधि पीड़ा नहीं देती तथा वह धर्म, अर्थ एवं कामको प्राप्त करता है। वहाँ छः महीनेमें मनुष्यको सिद्धि प्राप्त होती है और वह अन्तमें मोक्ष पाता है।
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इन्द्रेश्वरकी स्थापना और उनकी महिमा, देवमज्जनक तड़ागका माहात्म्य तथा लोहासुरके अत्याचारसे धर्मारण्यकी जनताका पलायन
**व्यासजी कहते हैं—**भारत! धर्मारण्यपुरसे उत्तर दिशामें देवराज इन्द्रने भगवान् शंकरको प्रसन्न करनेके लिये तीन सौ वर्षोंतक अत्यन्त दुष्कर तप किया। वृत्रासुरके वधसे जो पाप लगा था, उसको दूर करनेके लिये ही इन्द्र जितेन्द्रिय एवं एकाग्रचित्त होकर भगवान् शंकरकी आराधनामें लगे थे। उस समय भगवान् चन्द्रशेखर उनकी तपस्यासे बहुत प्रसन्न हुए और उनके समीप आकर बोले—‘देवराज! तुम जो कुछ माँगते हो, उसे मैं दूँगा।’
**इन्द्रने कहा—**देवेश्वर! कृपासिन्धु महेश्वर! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो वृत्रासुरके मरनेसे जो पाप लगा है, उसका नाश कीजिये।
| ६२८ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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**भगवान् शिवने कहा—**देवराज ! धर्मारण्यमें ब्रह्महत्या किसीको पीड़ा नहीं दे सकती। गोहत्या, द्विजहत्या, बालहत्या और स्त्रीहत्या भी मेरे, ब्रह्माजीके, भगवान् विष्णुके तथा यमराजके वचनसे कभी यहाँ प्रवेश नहीं करती। अतः तुम इस तीर्थमें प्रवेश करके स्नान करो।
**इन्द्रने कहा—**दयासिन्धो ! महेश्वर ! यदि आप मुझपर सन्तुष्ट हैं तो मेरे नामसे यहाँ स्थापित हों।
तब महादेवजीने 'तथास्तु' कहकर इन्द्रकी प्रार्थना स्वीकार की और लोगोंके हितकी इच्छासे सबके पापोंकी शुद्धिके लिये धर्मारण्यमें इन्द्रेश्वर नामसे वे विराजमान हुए। जो मनुष्य सदा भक्तिपूर्वक पुष्प और धूप आदिसे भगवान् इन्द्रेश्वरका पूजन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। विशेषतः माघ मासमें अष्टमी और चतुर्दशी तिथिको सब पापोंकी शुद्धिके लिये भगवान् शिवकी पूजा करनेवाला पुरुष शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो चतुर्दशी तिथिमें सांग रुद्रजप करता है, वह सब पापोंसे शुद्धचित्त हो परम पदको प्राप्त होता है। जो कुष्ठ आदि महारोगोंसे ग्रस्त होते हैं, वे स्नानमात्रसे शुद्ध हो दिव्य देह धारण कर लेते हैं। जो स्नान करके देवाधिदेव इन्द्रेश्वरका पूजन करता है, वह ज्वरके बन्धनसे छूट जाता है। जो वन्ध्या, दुर्भाग्यवती, काकवन्ध्या, जिसकी सन्तान मर जाती हो, वह, मृतवत्सा तथा महादुष्टा नारी कुण्डमें भगवान् शिवके आगे स्नान करके एकचित्तसे उनकी पूजा करती है, वह स्नानमात्रसे ही शुद्ध हो जाती है।
इस प्रकार इन्द्रको बहुतसे वरदान देकर पिनाकधारी भगवान् शंकर देवता और असुरोंसे सेवित हो अपने धामको चले गये। तत्पश्चात् महातेजस्वी इन्द्र भी अपनी पुरीको गये। इन्द्रपुत्र जयन्तने भी वहाँ उत्तम शिवलिंगकी स्थापना की है। उस लिंगमें स्थित भगवान् शिव जयन्तके द्वारा अपनी स्तुति सुनकर सदा उनपर सन्तुष्ट रहते हैं।
राजन् ! वहाँ 'धराक्षेत्र' नामक तीर्थ है, जिसमें 'देवमज्जनक' नामक उत्तम तड़ाग शोभा पाता है। आश्विन कृष्णा चतुर्दशीके दिन उसमें स्नान और जलपान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। विधिपूर्वक उपवास करके देवेश्वर भगवान् शिवकी पूजा करनेसे शाकिनी, डाकिनी, वेताल, पितर, ग्रह और नक्षत्र पीड़ा नहीं देते। वहाँ सांग रुद्रजप करनेसे सब पापोंसे छुटकारा मिल जाता है और अनेक प्रकारके रोग नष्ट हो जाते हैं। यह देवमज्जनक तड़ागका शुभ माहात्म्य बतलाया गया। इस प्रसंगके स्मरण और कीर्तनसे कायिक, वाचिक और मानसिक तीनों प्रकारके पाप नष्ट हो जाते हैं। जो इस माहात्म्यको सुनता है, वह सब प्रकारके सुखसे सम्पन्न होता है।
त्रेतायुगकी बात है। 'लोहासुर' नामक एक मदोन्मत्त राक्षस ब्राह्मणका वेष धारण करके सदा धर्मारण्य क्षेत्रमें आता और वहाँके धर्मज्ञ ब्राह्मणोंको सताया करता था। वह उस क्षेत्रके शूद्रों और वैश्योंको डंडोंसे पीटता था। यज्ञ आदिको विध्वंस करता और होमकी सामग्री खा जाता था। वहाँकी वेदी और बावली आदिको देखकर वह मोहवश उन सबको अपवित्र कर दिया करता था। उस स्थानमें जो-जो पुण्यभूमि थी, उसे लोहासुरने मल-मूत्र डालकर गंदा कर दिया। उसके डरसे व्याकुल हो सब ब्राह्मण परिवारसहित सब दिशाओंमें भाग गये। वैश्य भी भयभीत होकर ब्राह्मणोंके ही पीछे चले गये। महान् भयसे व्याकुल हो दूर जाकर सब शूद्रों और ब्राह्मणोंके साथ मिलकर वैश्योंने कुछ विचार किया और सब एक मत होकर परम पवित्र 'मुक्तारण्य' नामक निर्जन वनमें चले गये। वहाँ थोड़ी ही दूरपर उन्होंने निवास बनाया और उस गाँवको 'वजिङ्ग्' नामसे बसाया। वह गाँव संसारमें 'शम्भुग्राम'के नामसे विख्यात हुआ।
* ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६२९
तदनन्तर भयसे भागे हुए कुछ वैश्योंने थोड़ी दूर जाकर 'मण्डल' नामसे एक गाँव बसाया। कुछ वैश्य ब्राह्मणोंके यूथसे अलग होकर किसी दूसरे मार्गमें जा पहुँचे और धर्मारण्यसे थोड़ी ही दूर जाकर इस चिन्तामें पड़े कि हमलोग कहाँ चले आये। वहाँ उन्होंने 'अडालंज' नामसे प्रसिद्ध एक ग्राम बसाया। जिस गाँवका आदिनिवासी वैश्य जिस नामसे प्रसिद्ध था, उसी नामसे उस गाँवकी प्रसिद्धि हुई। सब वैश्य और ब्राह्मण भयसे व्याकुल हो मोहको प्राप्त हुए। इसलिये उन्होंने अपनी निवास-भूमिका नाम 'मोहमयी' रखा। इस प्रकार सब लोग धर्मारण्यसे दसों दिशाओंकी ओर पलायन कर गये। ब्राह्मण और वैश्य कोई भी धर्मारण्यमें नहीं ठहर सके। उस समय सब तीर्थोंका भूषणरूप परम दुर्लभ धर्मारण्य क्षेत्र उजाड़ हो गया। लोहासुरने उसकी बड़ी दुर्दशा कर डाली। वह दानव उस स्थानके तीर्थोंका नाश और ब्राह्मणोंका निष्कासन करके बहुत प्रसन्न हो अपने घरको चला गया।
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सरस्वती नदी, द्वारकातीर्थ एवं गोवत्स आदि तीर्थोंकी महिमा
सूतजी बोले—अब मैं धर्मारण्यतीर्थके उत्तम माहात्म्यकी दूसरी कथा कहता हूँ। धर्मारण्यमें सत्यलोकसे जिस प्रकार सरस्वतीजी लायी गयीं, वह प्रसंग सुनिये। एक समय प्रभातकालीन सूर्यके समान तेजस्वी तथा सब शास्त्रोंमें प्रवीण महामुनिसेवित महर्षि मार्कण्डेयजीको भक्तिपूर्वक प्रणाम करके सब ऋषियोंने कहा—'भगवन्! आपने ब्रह्माजीकी पुत्री जिस सरस्वती नदीको उतारा है, वह दर्शनसे प्राणियोंके पापोंका नाश करनेवाली और पुण्य देनेवाली है, उसके माहात्म्यका वर्णन कीजिये।'
मार्कण्डेयजी बोले—ब्राह्मणो! मैंने शरणार्थियोंको शरण देनेवाली सरस्वती देवीको भाद्रपद मासके शुक्ल पक्षकी पुण्यमयी द्वादशी तिथिको धर्मारण्यके अन्तर्गत द्वारावतीतीर्थमें उतारा था। द्वारावतीतीर्थ मुनियों और गन्धर्वोंसे सेवित है। उक्त तिथिको उस तीर्थमें पिण्डदान आदि करना चाहिये। उसमें पितरोंको दिया हुआ अक्षय होता है और श्राद्धकर्ता भी उसके पुण्यफलको प्राप्त होता है। यह महत्त्वपूर्ण उपाख्यान पापोंका नाशक एवं पुण्यदायक है। पवित्र वस्तुओंमें पवित्र और महापातकोंका निवारण करनेवाला है। सरस्वतीका जल समस्त मंगलोंके लिये मंगलकारक और परम पवित्र है। प्रभास तीर्थके मध्यमें सरस्वतीका जो पुण्यमय जल है, वह क्या ऊपरके लोकोंमें सुलभ है? सरस्वतीका जल मनुष्योंकी ब्रह्महत्याको भी दूर करता है। सरस्वतीमें स्नान और देवता-पितरोंका तर्पण करके पश्चात् पिण्ड देनेवाले मनुष्य फिर कभी माताका दूध पीनेवाले शिशु नहीं होते। जैसे कामधेनु गौएँ मनोवांछित फल देनेवाली होती हैं, उसी प्रकार सरस्वती नदी भी स्वर्ग और मोक्षकी एकमात्र हेतु है।
व्यासजी कहते हैं—मार्कण्डेयजीने सरस्वती देवीको यहाँ लाकर वैकुण्ठका दरवाजा खोल दिया है। जो फलकी आकांक्षासे यहाँ शरीर-त्याग करते हैं, वे उस फलको पाते हैं और अन्तमें भगवान् विष्णुका सायुज्य प्राप्त कर लेते हैं। अधिक कहनेसे क्या लाभ; मनुष्योंको सदैव विष्णुलोक प्राप्त करनेकी इच्छासे द्वारकामें ही शरीर-त्याग करना चाहिये। द्वारकामें मृत्युको प्राप्त हुए मनुष्य सब पापोंसे छूटकर भगवान् विष्णुके धाममें जाते हैं। उस तीर्थमें स्नान करके जो मनुष्य भगवान् विष्णुका पूजन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो विष्णुधामको जाता है। वह सब तीर्थोंमें उत्तम तीर्थ है, जहाँ साक्षात् श्रीहरि निवास
६३० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
करते और उस तीर्थमें रहनेवाले मनुष्यके सब पापोंको हर लेते हैं। द्वारकातीर्थ मोक्ष चाहनेवाले मनुष्योंको मुक्ति देनेवाला, धनार्थियोंको धन देनेवाला तथा आयु, सुख एवं सम्पूर्ण मनोवांछित फल प्रदान करनेवाला है। जो मनुष्य वहाँ एकादशीमें उपवास करके श्राद्ध करता है, वह नरकोंसे सब पितरोंका उद्धार कर देता है।
वहाँ द्वारकाके समीप मार्कण्डेयजीसे उपलक्षित एक गोवत्स नामक तीर्थ है, जो पृथ्वीमें सर्वत्र विख्यात है। उस तीर्थमें जगत्पति उमाकान्त भगवान् शिव गायके बछड़ेके रूपमें अवतीर्ण हो स्वयम्भू लिंगरूपसे विराज रहे हैं। पूर्वकालमें बलाहक नामके एक शत्रुविजयी राजा थे, जो महान् बलवान् और भगवान् शिवके परम भक्त थे। एक दिन जब वे शिकार खेलनेमें लगे थे, उनके किसी पैदल सैनिकने मृगोंके झुण्डमें एक गायके बछड़ेको स्थित देखकर राजासे कहा— 'नृपश्रेष्ठ! मैंने मृगोंके समुदायमें एक गायका बछड़ा देखा है, जो उन्हींमें हिला-मिला है। उसकी माँ उसके साथ नहीं है।' राजाने उस नौकरसे कहा— 'तू मुझे उस बछड़ेको दिखा।' तब उस पैदल सेवकने वनमें जाकर राजाको वह बछड़ा दिखाया। उस समय पैदल सैनिकोंके भयसे मृगोंका वह झुण्ड पीलु वृक्षकी झाड़ीकी ओर भागा। तब गायका बछड़ा भी उसी ओर चला। राजा उसे पकड़नेके लिये झाड़ीमें घुस गये और ज्यों ही उसे पकड़ने लगे त्यों ही वह उज्ज्वल शिवलिंगके रूपमें परिणत हो गया। यह देखकर राजाको बड़ा विस्मय हुआ। वे सोचने लगे— 'यह क्या बात है।' तबतक उस शिवलिंगके मध्य भागमें उन्होंने गायके बछड़ेको स्थित देखा। अब उनके मनमें यह निश्चय हो गया कि 'अवश्य ही गायके बछड़ेके रूपमें साक्षात् भगवान् महेश्वर विराजमान हैं।' तदनन्तर उन्हें ले जानेके लिये उद्यत हो राजाने उस शिवलिंगको उखाड़नेका प्रयत्न किया, किंतु वे उस देवलिंगको किसी प्रकार उठा न सके। तब राजाके साथ सब देवताओंने भगवान् शंकरसे प्रार्थना की।
देवता बोले— भगवन्! सर्वदेवेश्वर! प्रभो! आपको सब लोकोंका हित-साधन करनेकी इच्छासे शुक्ल लिंगरूपसे स्थित होना चाहिये।
श्रीमहादेवजीने कहा— देवताओ! मैं यहाँ सदा ही लिंगरूपसे स्थित रहूँगा। भाद्रपद मासके कृष्ण पक्षमें अमावास्याके दिन मेरा प्राकट्य हुआ है, इसलिये उस दिन विधिपूर्वक स्नान करके जो लोग इस शिवलिंगका पूजन करेंगे, उन्हें भय नहीं होगा। यहाँ पिण्डदान करनेसे पूर्वजोंको सदाके लिये उत्तम लोककी प्राप्ति होगी। घोर रौरव, कुम्भीपाक तथा अन्य अनेक नरकोंमें गिरे हुए अथवा पशु-पक्षियोंकी योनिमें पड़े हुए जो पितर हैं, उन्हें यहाँ एक बार पिण्डदान करनेसे अक्षय गतिकी प्राप्ति होती है।
तदनन्तर राजा बलाहकने सब देवताओंके समीप उस शिवलिंगको स्थापित किया और लोकहितकी कामनासे अनेक प्रकारके दान दिये। जबतक वे उस लिंगकी पूजा करते रहे, तभीतक साक्षात् भगवान् शिव भी वहाँ आ गये।
शिवजीने कहा— जो मनुष्य आजकी रातमें श्रद्धा और भक्तिसे इस देवेश्वर शिवकी पूजा करेंगे, उन्हें अक्षय पुण्यकी प्राप्ति होगी। जो गीता-शास्त्रका पाठ करते हुए जागरण करेंगे, वे मनुष्य अपनी एक सौ एक पीढ़ियोंका उद्धार कर देंगे।
यह देवाधिदेव भगवान् शिवका अद्भुत लिंग है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इसका माहात्म्य सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। गोवत्स नामसे विख्यात शिवलिंग मनुष्योंको परम पुण्य प्रदान करनेवाला है। वह अनेक जन्मोंके पापोंका नाश कर देता है, ऐसा मार्कण्डेयजीका वचन है। जिनका चित्त पापसे दूषित है, उनके पापयुक्त
* ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६३१
शरीरकी शुद्धिके लिये उस तीर्थमें स्नान करना आवश्यक है। गोवत्सतीर्थमें एक बार किया हुआ स्नान भी मनुष्योंको रुद्रलोक प्रदान करनेवाला है। वहाँ विशेषतः भाद्रपद मासमें पक्षके अन्तमें कूपके तटपर तर्पण और श्राद्ध करनेसे कलियुगमें पितरोंको अधिक तृप्ति होती है। गयामें इक्कीस बार तर्पण करनेपर पितरोंको जो परम तृप्ति होती है, वह गंगकूपमें एक बार तर्पण करनेसे ही हो जाती है। गोवत्स महादेवके समीप ही गंगकूप विद्यमान है। वहाँ तिल और जलसे भी तर्पण करनेपर पितर सद्गतिको प्राप्त होते हैं, नरकोंसे छूट जाते हैं। उस तीर्थमें मुनीश्वरगण गोदानकी प्रशंसा करते हैं। वहाँ दो पीलुके वृक्ष स्थित हैं। वहीं मुनिसेवित गोवत्सतीर्थ है, जो स्नानसे स्वर्ग देनेवाला, आचमनसे पापकी शुद्धि करनेवाला, कीर्तनसे पुण्य उत्पन्न करनेवाला और सेवनसे मोक्ष देनेवाला है।
गोवत्सतीर्थसे नैर्ऋत्य कोणमें 'लोहयष्टि' दीख पड़ती है। वहाँ स्वयम्भू लिंगके रूपमें साक्षात् भगवान् शंकर विराजमान हैं। भाद्रपद (आश्विन)-की अमावास्याके दिन लोहयष्टिमें श्राद्ध करनेपर पितर प्रेतयोनिसे मुक्त हो स्वर्गमें क्रीड़ा करते हैं। पितरलोग यह कहते हैं 'क्या हमारे कुलमें भी ऐसा कोई पुरुष उत्पन्न होगा, जो श्राद्धपक्षमें आश्विनकी अमावास्याके दिन लोहयष्टि तीर्थमें हमारे लिये तिल, जल, पिण्डदान अथवा केवल जल ही प्रदान करेगा?' मुनि कहते हैं—'यदि पितर अधिक प्रिय हों तो भाद्रपद (आश्विन)-की अमावास्या तिथिको उनके लिये अवश्य श्राद्ध करना चाहिये।' जो सरस्वतीके जलमें स्नान करके दूधसे और श्वेत तिलोंसे पितरोंका तर्पण करता है, उसके पितर अवश्य तृप्त होते हैं। लोहयष्टि तीर्थमें भक्ति-भावसे तर्पण करनेपर मनुष्य स्वयं भी तृप्तिको प्राप्त होता है। जल देनेवाला तृप्ति और अन्न देनेवाला अक्षय सुख पाता है। फल देनेवाला पितृभक्त पुत्र और अभय देनेवाला आरोग्य लाभ करता है। न्यायोपार्जित धनमेंसे जो थोड़ा भी दान दिया जाय, तो वह महान् फल देनेवाला होता है। उस तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य भगवान् शिवका पार्षद होता है।
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संक्षेपसे श्रीरामचन्द्रजीके सम्पूर्ण चरित्रका वर्णन
व्यासजी कहते हैं—पूर्वकालमें त्रेतायुग आनेपर भगवान् विष्णुका अंश सूर्यवंशमें रघुवंशशिरोमणि कमलनयन श्रीरामचन्द्रजीके रूपमें अवतीर्ण हुआ। श्रीराम और लक्ष्मण अभी काकपक्षधारी बालक थे, तभी पिताकी आज्ञासे वे विश्वामित्रके अनुगामी हो गये। राजा दशरथने यज्ञकी रक्षाके लिये उन अपने दोनों कुमारोंको विश्वामित्रजीकी सेवामें सौंप दिया था। वे दोनों वीर धनुष और बाण धारण करके पिताकी आज्ञाका पालन करनेके लिये चले। रास्तेमें जाते हुए उन दोनों भाइयोंके समक्ष ताड़का नामवाली राक्षसी विघ्न डालनेके लिये आ खड़ी हुई। तब विश्वामित्र मुनिकी आज्ञासे श्रीरामचन्द्रजीने ताड़काको मार डाला। विश्वामित्रजीने श्रीरामचन्द्रजीको धनुर्वेद विद्याका उपदेश भी दिया। रघुनाथजीके चरणोंके स्पर्शसे शिलारूपधारिणी अहल्या, जो इन्द्रके साथ संयोग होनेके कारण शापवश प्रस्तर हो गयी थी, पुनः गौतम-वधूके रूपमें प्रकट हो गयी। विश्वामित्रजीका यज्ञ आरम्भ होनेपर रघुनाथजीने मारीचको मार भगाया और सुबाहुको अपने उत्तम बाणोंसे मौतके घाट उतार दिया। उन्होंने राजा जनकके घरमें रखे हुए महादेवजीके धनुषको तोड़ डाला और अयोनिजा सीताके साथ विवाह किया। जब वे अयोध्याको लौटने लगे, तब रास्तेमें परशुरामजी
६३२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
मिले। उन्हें जीतकर श्रीरामचन्द्रजी सीताके साथ घर आये। तत्पश्चात् सत्ताईसवें वर्षकी आयुमें जब श्रीरामचन्द्रजीको युवराज पद दिया जाने लगा, तब कैकेयीने राजासे दो वर माँगे। उनमेंसे एक वरके द्वारा यह माँगा कि 'श्रीराम जटा धारण करके चौदह वर्षोंके लिये वनमें चले जायँ और दूसरे वरसे यह माँग लिया कि भरत युवराज-पदके अधिकारी हों।' कैकेयी भोली-भाली थी। उसने मन्थराके बहकानेसे ऐसा वर माँगा। राजा दशरथने जानकी और लक्ष्मणके साथ श्रीरामचन्द्रजीको वनवास दे दिया। श्रीरामचन्द्रजी तीन राततक केवल जल पीकर रहे। चौथे दिन फलाहार किया और पाँचवें दिन चित्रकूटमें पहुँचकर उन्होंने पर्णकुटी बनायी। उस समय राजा दशरथ श्रीरामचन्द्रजीका नाम लेते हुए स्वर्गको सिधारे। उन्होंने ऋषिके शापको सफल बनाकर स्वर्गलोकको प्रस्थान किया। उसके बाद भरत और शत्रुघ्न चित्रकूटमें आये। भरतने पिताके स्वर्गगामी होनेका समाचार बतलाकर श्रीरामचन्द्रजीको घर लौट चलनेके लिये समझाया। जब वे लौटनेको राजी न हुए, तब उनकी चरणपादुका लेकर भरत और शत्रुघ्न नन्दिग्रामको लौट आये। वहाँ दोनों भाई राज्यकी रक्षा करते हुए श्रीरामकी चरणपादुकाके पूजनमें तत्पर रहे।
श्रीरामचन्द्रजी महात्मा अत्रिसे मिलकर दण्डकारण्यमें आये और राक्षसोंका वध आरम्भ किया। सबसे पहले विराध मारा गया। उसके बाद साढ़े बारह वर्षोंतक श्रीरामचन्द्रजी पंचवटीमें टिके रहे। वहाँ उन्होंने लक्ष्मणजीके द्वारा 'शूर्पणखा' नामक राक्षसीको कुरूप करा दिया। जानकीके साथ वनमें विचरते हुए श्रीरामचन्द्रजीके आश्रमके समीप भयंकर राक्षस रावण आया। वह सीताका अपहरण करनेके लिये आया था। माघ मासके कृष्ण पक्षकी अष्टमी तिथिको वृन्द मुहूर्तमें जब राम और लक्ष्मण दोनों आश्रमसे बाहर चले गये थे, दशमुख रावणने सीताको अकेली पाकर हर लिया। रावण पहले मारीचके आश्रमपर गया था। मारीच मृगरूपमें आकर लक्ष्मणसहित श्रीरामको दूर हटा ले गया था। तब श्रीरामचन्द्रजीने मृगरूपधारी मारीचको मार डाला और पुनः लौटकर जब वे आश्रमपर आये, तब उसे सीतासे रहित एवं सूना देखा।
उधर सीता रावणके द्वारा हरी जानेपर कुररीकी भाँति विलाप करने लगी—'हा राम! हा राम! मुझे राक्षस हरकर लिये जाता है, आप आकर मुझे बचाइये, मेरी रक्षा कीजिये।' जैसे भूखा बाज चीत्कार करती हुई चिड़ियाको उठा ले जाता है, वैसे ही राक्षस रावण जनकनन्दिनी सीताको हरकर लिये जा रहा था। यह समाचार सुनकर पक्षिराज जटायुने राक्षसराज रावणसे युद्ध किया। अन्तमें रावणने उन्हें घायल करके गिरा दिया। माघ कृष्णा नवमीको रावणके घरमें निवास करनेवाली सीताकी खोज करते हुए दोनों भाई राम और लक्ष्मण जटायुसे मिले। उसके मुखसे राक्षसद्वारा हरी गयी सीताका समाचार पाकर श्रीरामने भक्तिपूर्वक पक्षिराजका दाहादि संस्कार किया। फिर आगे-आगे श्रीराम और उनके पीछे लक्ष्मण चले। पम्पासरोवरके निकट पहुँचकर उन्होंने शबरीपर अनुग्रह किया। फिर पम्पासरोवरके जलका आचमन करके श्रीरामजी हनुमान्जीसे मिले। तदनन्तर रघुनाथजीने हनुमान् एवं सुग्रीवसे मैत्री की। सुग्रीवके पास आकर उन्होंने बाली नामक वानरको मारा। तत्पश्चात् श्रीरामदेवने अपनी प्राणवल्लभा सीताकी खोजके लिये हनुमान् आदि प्रमुख वानरोंको भेजा। हनुमान्जी श्रीरामकी अँगूठी लेकर गये। दसवें महीनेमें सम्पातीने हनुमान्जीको सीताका पता बतलाया। सम्पातीके कहनेसे हनुमान्जी सौ
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योजन समुद्र लाँघकर लंकामें पहुँचे और रातभर सब ओर सीताकी खोज करते रहे। रात्रि समाप्त होते-होते हनुमान्जीको सीताका दर्शन हुआ। द्वादशीको हनुमान्जी अशोक वृक्षपर बैठे रहे। उसी रातमें उन्होंने जानकीजीके विश्वासके लिये उत्तम कथा कही। तदनन्तर त्रयोदशीको अक्षकुमार आदिके साथ युद्ध हुआ। त्रयोदशीको ही मेघनादने ब्रह्मास्त्रसे हनुमान्को बाँध लिया। ब्रह्मास्त्रसे बँधे होनेपर भी वायुपुत्र हनुमान्जीने राक्षसराज रावणको कितने ही रूखे एवं कठोर वचन सुनाये। तब राक्षसोंने उनकी पूँछमें आग लगा दी। उसी आगसे हनुमान्जीने समस्त लंकाको जला डाला और वे पूर्णिमाको पुनः महेन्द्र पर्वतपर लौट आये। मार्गशीर्ष प्रतिपदासे पाँच दिनतक रास्तेमें रहकर वे मधुवनमें आये और षष्ठीको मधुवनका विध्वंस किया। फिर सप्तमीको श्रीरामचन्द्रजीकी सेवामें पहुँचकर पहचान देते हुए सब समाचार निवेदन किया। सीताजीकी मणि देकर श्रीरामसे उन्होंने सब बातें बतायीं। फिर अष्टमीको उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमें, जब विजयसंज्ञक मुहूर्त व्यतीत हो रहा था, ठीक दोपहरके समयमें श्रीरामचन्द्रजीने प्रस्थान किया। रामने दक्षिण दिशामें जानेकी प्रतिज्ञा करते हुए कहा—'मैं समुद्रको लाँघकर भी राक्षसराज रावणका वध करूँगा। दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थान करते समय श्रीरामचन्द्रजीके साथी वानरराज सुग्रीव हुए। सात दिनोंमें समुद्रके तटपर सेनाकी छावनी पड़ी। पौष शुक्ला प्रतिपदासे लेकर तृतीयातक सेनासहित श्रीरामचन्द्रजीकी उपस्थिति सागरके तटपर हुई। चतुर्थीको विभीषण आकर श्रीरामचन्द्रजीसे मिले। पंचमीको समुद्र पार करनेके विषयमें विचार किया गया। उसके बाद चार दिनतक श्रीरामचन्द्रजीने समुद्रके किनारे उपवास-व्रत किया। चौथे दिन समुद्रसे वर प्राप्त हुआ। साथ ही समुद्रने समुद्र-पार करनेका उपाय बताया। दशमीसे सेतु बाँधनेका कार्य प्रारम्भ हुआ और त्रयोदशीको पूरा हो गया। चतुर्दशीको सुबेल पर्वतपर पहुँचकर श्रीरामचन्द्रजीने सेनाका पड़ाव डाला। पूर्णिमासे लेकर द्वितीयातक तीन दिनोंमें सारी सेना समुद्र पार करके लंका पहुँच गयी। तत्पश्चात् शुभलक्षण श्रीरामने सीताको प्राप्त करनेके लिये शूरवीर वानरोंकी सेनाके साथ लंकापुरीको चारों ओरसे घेर लिया। तृतीयासे लेकर दशमीतक आठ दिनोंतक सेना टिकी रही। एकादशीके दिन शुक और सारण इन दो मन्त्रियोंका आगमन हुआ। पौष कृष्णा द्वादशीको सेनाकी गणना की गयी। कपिश्रेष्ठ सुग्रीवने अपनी सेनाके बलाबलका वर्णन किया। त्रयोदशीसे लेकर अमावास्यातक तीन दिन लंकामें रावणने अपनी सेनाका संगठन, उसकी गणना एवं सैनिकोंमें युद्धके लिये उत्साह भरनेका कार्य किया। माघ शुक्ला प्रतिपदाको अंगदजी दूत बनकर रावणके दरबारमें गये। द्वितीयाके दिन सीताजीको मायासे उनके पतिके कटे हुए मस्तक आदिका दर्शन कराया गया। उस दिनसे सात दिनोंतक अर्थात् अष्टमी तिथितक राक्षसों और वानरोंमें घमासान युद्ध हुआ। माघ शुक्ला नवमीकी रातमें मेघनादने युद्ध करके राम और लक्ष्मणको नागपाशमें बाँध लिया। इससे सब कपीश्वर व्याकुल और हताश हो गये। तब वायुके उपदेशसे श्रीरघुनाथजीने गरुड़का स्मरण किया। दशमीको गरुड़जी नागपाशसे छुड़ानेके लिये आये। फिर माघ शुक्ला एकादशीसे लेकर दो दिनतक युद्ध बंद रहा। द्वादशीको हनुमान्जीने धूम्राक्षका और त्रयोदशीको उन्होंने ही अकम्पनका वध किया। रावणने श्रीरामको मायामयी सीताका दर्शन कराकर समस्त सैनिकोंको भयभीत कर दिया। माघ शुक्ला चतुर्दशीसे लेकर कृष्ण पक्षकी प्रतिपदातक तीन दिनमें
६३४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
नीलने प्रहस्तका वध किया। माघ कृष्णा द्वितीयासे लेकर चतुर्थीतक तीन दिनोंमें श्रीरामचन्द्रजीने तुमुल युद्ध करके रावणको रणस्थलसे मार भगाया। पंचमीसे अष्टमीतक रावणद्वारा जगाया हुआ कुम्भकर्ण चार दिनतक केवल भोजन ही करता रहा। नवमीसे चार दिनतक कुम्भकर्णने युद्ध किया और बहुतसे वानरोंको खा डाला। अन्तमें वह श्रीरामचन्द्रजीके हाथसे मारा गया। अमावास्याके दिन लंकामें उसके लिये शोक मनाया गया। फाल्गुन शुक्ला प्रतिपदासे लेकर चतुर्थीतक चार दिनोंमें नरान्तक आदि पाँच राक्षस मारे गये। पंचमीसे सप्तमीतक तीन दिनोंमें अतिकायका वध हुआ। अष्टमीसे द्वादशीतक पाँच दिनोंमें निकुम्भ और कुम्भ मारे गये। फिर चार दिनोंमें मकराक्षका वध किया गया। फाल्गुन कृष्णा द्वितीयाके दिन मेघनाद पराजित हुआ। तीजसे लेकर सप्तमीतक पाँच दिन दवा आदि लानेकी व्यग्रताके कारण युद्ध बंद रहा। अष्टमीको दुर्बुद्धि रावणने शोकके आवेगसे मायामयी मैथिलीका वध किया। तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजीने सेनाके द्वारा इसका पूर्णतः निश्चय किया। फिर त्रयोदशीसे पाँच दिनोंमें लक्ष्मणजीने विख्यात बल और पराक्रमवाले मेघनादको युद्धमें मार डाला। चतुर्दशीको रावणने युद्ध बंद करके यज्ञकी दीक्षा ली। फिर अमावास्याके दिन वह युद्धके लिये निकला। चैत्र शुक्ला प्रतिपदासे लेकर पाँच दिनतक रावण लगातार युद्ध करता रहा। इस युद्धमें बहुत-से राक्षसोंका संहार हुआ। फिर तीन दिनोंतक रावणके रथ, घोड़े आदि मारे गये। चैत्र शुक्ला नवमीको लक्ष्मणजीको शक्ति लगी। तब श्रीरामचन्द्रजीने क्रोधमें भरकर दशमुख रावणको खदेड़ दिया। फिर विभीषणकी सलाहसे हनुमान्जी लक्ष्मणके लिये ओषधि लानेको द्रोणाचल पर्वतपर गये और वहाँसे विशल्या (संजीवनी बूटी) ले आकर उन्होंने लक्ष्मणको पिलायी। दशमीके दिन युद्ध बंद रहा। रातमें राक्षसों ने युद्ध आरम्भ किया। एकादशीके दिन श्रीरामचन्द्रजीके पास मातलि नामक सारथिके साथ इन्द्रका रथ आ पहुँचा। चैत्र शुक्ला द्वादशीसे लेकर कृष्णा चतुर्दशीतक अठारह दिनोंमें श्रीरामचन्द्रजीने द्वन्द्वयुद्ध करके रावणको मार डाला। अमावास्याके दिन रावण आदि राक्षसोंके दाह-संस्कार हुए। इस प्रकार घोर संग्राम होनेपर श्रीरामचन्द्रजीको विजय प्राप्त हुई। माघ शुक्ला द्वितीयासे लेकर चैत्र कृष्णा चतुर्दशीतक सत्तासी दिनके संग्राममें केवल पंद्रह दिन युद्ध बंद रहा। शेष बहत्तर दिन युद्ध चालू रहा। वैशाख शुक्ला प्रतिपदाको श्रीरामचन्द्रजी रणभूमिमें ही रहे। द्वितीयाके दिन उन्होंने विभीषणका लंकाके राज्यपर अभिषेक किया। तृतीयाको सीताकी शुद्धि हुई, देवताओंसे वरदान प्राप्त हुआ। उसी दिन दशरथजीका आगमन हुआ और उनके द्वारा भी सीताजीकी पवित्रताके विषयमे अनुमोदन प्राप्त हुआ।
इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी राक्षसोंद्वारा कष्टमें डाली हुई परम पवित्र जानकीको बड़े प्रेमसे ग्रहण करके वहाँसे लौटे। वैशाखकी चतुर्थीको श्रीरामचन्द्रजी पुष्पक विमानपर बैठे और आकाशमार्गसे अयोध्यापुरीकी ओर चल दिये। चौदहवाँ वर्ष पूर्ण होनेपर वैशाख शुक्ला पंचमीको श्रीरामचन्द्रजी अपने दलबलके साथ भरद्वाज आश्रमपर आकर रहे। फिर षष्ठीको पुष्पक विमानसे वे नन्दिग्राममें आये। सप्तमीमें अयोध्याके राज्यपर रघुनाथजीका अभिषेक हुआ। चौदह महीने दस दिनतक सीताको रामसे अलग रावणके घरमें रहना पड़ा था। बयालीसवें वर्षमें श्रीरामचन्द्रजीने राज्यकार्य प्रारम्भ किया। उस समय सीताजीकी आयु पैंतीस वर्षकी थी। चौदह वर्षके बाद ही
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श्रीरामने अयोध्यापुरीमें प्रवेश किया था। उस समय रावणका दर्प दलन करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी बहुत प्रसन्न थे। उन्होंने अपने भाइयोंके साथ ग्यारह हजार वर्षोंतक राज्य किया। राज्यका पालन करनेके पश्चात् वे सबके साथ परम धाममें गये। रामराज्यमें सब लोग बहुत प्रसन्न रहते थे। सभी धन-धान्यसे सम्पन्न तथा पुत्र-पौत्रोंसे भरे-पूरे थे। बादल इच्छाके अनुसार पानी बरसाते थे, अन्नकी उपज कई गुनी अधिक होती थी, गौएँ घड़ाभर दूध देती थीं और वृक्षोंमें सदैव फल लगे रहते थे। श्रीरामचन्द्रजीके राज्यमें किसीको आधि-व्याधि नहीं सताती थी, सभी स्त्रियाँ पतिव्रता होती थीं, पुरुष पिता-माताकी भक्ति करनेवाले होते थे, ब्राह्मण सदा वेदपाठमें लगे रहते, क्षत्रिय ब्राह्मणोंकी सेवा करते और वैश्यलोग ब्राह्मणों एवं गौओंमें सदा भक्ति रखते थे। उस समय वर्णसंकरता और कर्मसंकरताका नाम नहीं सुना जाता था। कोई भी स्त्री वन्ध्या, दुर्भाग्यवती, काकवन्ध्या, मृतवत्सा अथवा विधवा नहीं थी। सधवा स्त्रीको कभी विलाप नहीं करना पड़ता था। कोई भी माता-पिता और गुरुकी अवहेलना नहीं करते थे। प्रत्येक मनुष्य पुण्य करता और बड़े-बूढ़ोंकी आज्ञा नहीं टालता था। कोई दूसरेकी भूमिपर अधिकार नहीं जमाते थे। सभी परायी स्त्रियोंसे विमुख रहते थे। कोई मनुष्य परनिन्दक, दरिद्र, रोगी, चोर, जुआरी, शराबी और पापी नहीं था। सुवर्ण चुरानेवाला, गुरुपत्नीगमन करनेवाला, ब्रह्महत्या, स्त्रीहत्या और बालहत्या करनेवाला तथा झूठ बोलनेवाला एक भी मनुष्य नहीं था। कोई किसीकी जीविका नष्ट नहीं करता और झूठी गवाही नहीं देता था। शठ, कृतघ्न और मलिन मनुष्य कहीं देखनेको भी नहीं मिलता था। ब्राह्मण वेदोंके पारंगत विद्वान् होते थे और सदा सर्वत्र उनकी पूजा होती थी। अत्यन्त विख्यात रामराज्यमें कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं था, जो व्रतका पालन करनेवाला एवं ईश्वरका भक्त न हो। राज्य करते हुए श्रीरामचन्द्रजीके पास उनके पुरोहित महाभाग वसिष्ठ मुनि अनेक तीर्थोंमें भ्रमण करके आये। श्रीरामचन्द्रजीने अभ्युत्थान, अर्घ्य, पाद्य और मधुपर्क आदिके द्वारा मुनियोंसहित गुरु वसिष्ठका पूजन किया। तत्पश्चात् मुनिवर वसिष्ठने श्रीरामचन्द्रजीसे उनके राज्य, अश्व, हाथी, खजाना, देश, उत्तम बन्धु तथा सेवकोंके विषयमें कुशल-समाचार पूछा। श्रीरामचन्द्रजीने कहा—'गुरुदेव! आपके प्रसादसे मेरे लिये सर्वत्र कुशल है।' तदनन्तर श्रीरामने मुनिवर वसिष्ठजीसे उनकी पत्नी और पुत्रके कुशल-मंगलका समाचार पूछा। तब वसिष्ठजीने भूमण्डलमें जिन-जिन क्षेत्रों, तीर्थों और देवालयोंका सेवन किया था, उन सबकी चर्चा करते हुए सर्वत्र अपना कुशल-मंगल बतलाया। इससे कमलनयन श्रीरामचन्द्रजी बड़े विस्मित होकर वसिष्ठजीसे उत्तमोत्तम तीर्थका माहात्म्य पूछने लगे।
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वसिष्ठजीके द्वारा भिन्न-भिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन, श्रीरामकी धर्मारण्ययात्रा, वहाँके भगे हुए ब्राह्मणोंको पुनः लाकर बसाना और सत्यमन्दिरकी स्थापना करना
श्रीरामचन्द्रजीने कहा— भगवन्! आपने जिन-जिन तीर्थोंका सेवन किया है, उनमें सबसे उत्तम तीर्थ कौन है, यह मुझे बताइये। सीताका अपहरण होनेपर मैंने बहुत-से ब्रह्मराक्षसोंका वध किया है। उस पापकी शुद्धिके लिये आप मुझे किसी ऐसे तीर्थका परिचय दीजिये, जो उत्तम-से-उत्तम हो।
वसिष्ठजी बोले— गंगा, नर्मदा, तापी, यमुना, सरस्वती, गण्डकी, गोमती और पूर्णा—ये सभी नदियाँ परम पावन हैं। इन सबमें नर्मदा और त्रिपथगामिनी गंगा श्रेष्ठ हैं। रघुनन्दन! श्रीगंगाजी दर्शनमात्रसे ही सब पापोंको जला देती हैं। कलियुगमें नर्मदाका दर्शन करनेसे सौ जन्मोंके, समीप जानेसे तीन सौ जन्मोंके और जलमें स्नान करनेसे एक हजार जन्मोंके पापोंका वह नाश कर देती हैं। नर्मदाके तटपर जाकर साग और मूल-फलसे भी एक ब्राह्मणको भोजन करानेसे कोटि ब्राह्मणोंको भोजन देनेका फल होता है। जो सौ योजन दूरसे भी गंगा-गंगाका उच्चारण करता है, वह सब पापोंसे मुक्त होता और भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है*। फाल्गुन (चैत्र) मासके अन्तमें अमावस्या तिथिको तथा भाद्रपद (आश्विन) कृष्ण पक्षमें गंगाजीके तटपर जाकर जो मनुष्य स्नान, पितरोंका तर्पण और पिण्डदान करता है, वह अक्षय फलका भागी होता है। तापी नदीका स्मरण करनेपर महापातकियोंके भी सात गोत्रोंका उद्धार हो जाता है। यमुनामें स्नान करनेसे मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता है और महापातकोंसे युक्त होनेपर भी परम गतिको प्राप्त होता है। कार्तिककी पूर्णिमाको कृत्तिका नक्षत्रका योग होनेपर जो सरस्वती नदीमें स्नान करता है, वह गरुड़की पीठपर बैठकर उत्तम देवताओंके मुखसे अपनी स्तुति सुनता हुआ वैकुण्ठधामको जाता है। जो कार्तिक मासमें प्राची सरस्वतीके जलमें स्नान करके भगवान् प्राचीमाधवकी स्तुति करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। जो गण्डकी (नारायणी) नदीके पुण्यतीर्थमें स्नान करता और शालग्रामशिलाकी पूजा करता है, उसका फिर जन्म नहीं होता है। जो द्वारकावासी श्रीकृष्णके समीप गोमतीके जलकी लहरोंमें स्नान करता है, वह चतुर्भुजरूप धारण करके वैकुण्ठधाममें आनन्दका अनुभव करता है। चर्मण्वती (चम्बल) नदीको नमस्कार करके
* गंगा गङ्गेति यो ब्रूयाद् योजनानां शतैरपि। मुच्यते सर्वपापेभ्यो विष्णुलोकं स गच्छति॥
(स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ३१। ७)
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जो उसके जलका स्पर्श करता है, वह पहले और पीछेकी दस-दस पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है। दोनोंका संगम देखकर अथवा समुद्रकी ध्वनि सुनकर ब्रह्महत्यासे युक्त मनुष्य भी पवित्र हो परम गतिको प्राप्त होता है। जो मनुष्य माघ मासमें प्रयागमें गोता लगाता है, वह इहलोकमें सुख भोगकर अन्तमें विष्णुधामको प्राप्त होता है। जो मनुष्य प्रभासक्षेत्रमें तीन राततक ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक निवास करते हैं, वे यमलोक एवं कुम्भीपाक आदिका दर्शन नहीं करते। जो मनुष्य नैमिषारण्यमें निवास करता है, वह देवत्वको प्राप्त होता है। श्रीराम! जो मनुष्य कुरुक्षेत्रमें चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहणके अवसरपर स्नान करके सुवर्णदान करता है, उसका इस लोकमें पुनर्जन्म नहीं होता। जो मनुष्य इस पृथ्वीपर कपिला गौको स्पर्श करके दान देता है, वह कामधेनु गौओंके निवासभूत ऋषिलोकको जाता है। जो वैशाख मासमें उज्जयिनीपुरीमें क्षिप्राके जलमें स्नान करता है, वह अपने सहस्रों पूर्वजोंको घोर रौरव नरकसे छुटकारा दिला देता है। जो मनुष्य तीन दिनोंतक सिन्धुनदी अथवा समुद्रमें स्नान करता है, वह सब पापोंसे शुद्धचित्त हो कैलासमें आनन्द भोगता है। कोटितीर्थमें स्नान करके कोटीश्वर शिवका दर्शन करनेवाला मनुष्य कहीं भी ब्रह्महत्या आदि पापोंसे लिप्त नहीं होता। महान् अपवित्र स्थानमें जानेवाले अज्ञानी जीव भी यदि भगवान्के चरणोंसे प्रकट हुई गंगाका जल पी लें तो उनका सब पाप नष्ट हो जाता है। जो मनुष्य सूर्योदयकालमें वेदवती नदीमें स्नान करता है, वह सब रोगोंसे मुक्त हो उत्तम सुखका भागी होता है। रघुनन्दन! प्रायः सभी तीर्थ स्नान, जलपान तथा गोता लगानेसे अनायास ही मनुष्योंके सब पापोंका नाश कर देते हैं। सब तीर्थोंमें उत्तम तीर्थ धर्मारण्य बतलाया जाता है; क्योंकि ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि देवताओंने पूर्वकालमें सबसे पहले इसी तीर्थको स्थापित किया था। सब वनों और तीर्थोंमें विशेषतः धर्मारण्यसे बढ़कर भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला दूसरा कोई तीर्थ नहीं है। स्वर्गके देवता भी धर्मारण्यनिवासी मनुष्योंकी सराहना करते हैं।
रघुनन्दन! द्वारका, काशी, त्रिशूलधारी शिव तथा भैरव—ये सब जैसे मुक्तिदायक हैं, उसी प्रकार धर्मारण्य भी मोक्ष देनेवाला उत्तम तीर्थ है। यह सुनकर महाधनुर्धर श्रीरामचन्द्रजी बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने सीतादेवी और अपने भाइयोंके साथ तीर्थयात्राके लिये प्रस्थान किया। उनके पीछे कपीश्वर हनुमान्जी, माता कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी, लक्ष्मण, भरत, सेनासहित शत्रुघ्न, अयोध्याके अन्यान्य निवासी तथा प्रजावर्गके लोग भी गये। तीर्थयात्राकी विधिका पालन करनेके लिये घरसे चले हुए राजा श्रीरामने अपने कुलके आचार्य महर्षि वसिष्ठसे कहा—'मुने! यह बड़े आश्चर्यकी बात है कि आदिमें यह धर्मारण्य क्षेत्र हुआ या द्वारका हुई। धर्मारण्य क्षेत्रकी उत्पत्ति कितने कालसे हुई है, यह बताइये।'
वसिष्ठजी बोले—महाराज! मैं नहीं जानता कि यह क्षेत्र कितने दिनोंसे प्रकट है। दीर्घजीवी लोमश और जाम्बवान् इसका कारण जानते होंगे। शरीरमें जो अनेक जन्म-जन्मान्तरोंका किया हुआ पाप संचित है, उन सभी पापोंका उत्तम प्रायश्चित्त यह धर्मारण्य क्षेत्र माना गया है।
वसिष्ठजीका यह वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने वहाँ जानेका विचार करके यात्रा-विधिका पालन किया। फिर वसिष्ठजीको आगे करके महामाण्डलिक राजाओं (सामन्तों)-के साथ पुरश्चरणविधि पूर्ण कर उत्तर दिशाकी ओर प्रस्थान किया। आगे जाकर फिर वे पश्चिम दिशाकी ओर मुड़ गये। गाँव-से-गाँव, देश-से-देश और वन-से-वनको लाँघते हुए आगे बढ़ते चले गये। सेना, सामान, हजारों हाथी, घोड़े, करोड़ों रथ आदि वाहनों और असंख्य शिविकाओंके साथ श्रीरघुनाथजी
६३८ / * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
यात्रा कर रहे थे। वे हाथीपर बैठकर नाना प्रकारसे मैत्रीभाव प्रदर्शित करनेवाले विभिन्न देशोंको देखते हुए जा रहे थे। उनके ऊपर श्वेत छत्र तना हुआ था और उनके पार्श्व भागमें सुन्दर चँवर डुलाया जा रहा था।
दसवें दिन श्रीरामचन्द्रजी परम उत्तम धर्मारण्य क्षेत्रके निकट पहुँच गये। धर्मारण्यके समीप ही 'माण्डलिकपुर' को देखकर श्रीरामने अपनी सेनाके साथ रातमें वहीं निवास किया। उन्होंने सुना, धर्मारण्य क्षेत्र इस समय निर्जन एवं उजाड़ होकर बड़ा भयानक प्रतीत होता है। वहाँ बाघ और सिंह भरे हुए हैं। यक्ष और राक्षस निवास करते हैं। धर्मारण्य अब केवल जंगल रह गया है। जनताके मुखसे ये सारी बातें सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने कहा—'तुमलोग चिन्ता न करो।' उन्होंने वहाँके व्यवसायकुशल, शूरवीर, महान् बली एवं पराक्रमी तथा समर्थ वैश्योंको बुलाकर कहा—'तुमलोग मेरी यह सोनेकी पालकी शीघ्र ले चलो, जिससे मैं अभी धर्मारण्यमें पहुँच जाऊँ। वहाँ स्नान और जलपान करनेसे मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।' इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजीसे प्रेरित होकर उन सभी वैश्योंने 'तथास्तु' कहकर पालकी उठायी और उन्हें धर्मारण्यमें पहुँचा दिया। सेनासहित श्रीरामने जब उस क्षेत्रमें प्रवेश किया तब प्रत्येक वाहनकी गति मन्द हो गयी। बाजोंकी आवाज भी कम हो गयी, हाथी मन्द गतिसे चलने लगे, घोड़ोंकी भी यही दशा हुई। यह सब देखकर श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने विनयपूर्वक मुनिश्रेष्ठ गुरु वसिष्ठसे पूछा—'मुनीश्वर! यह क्या बात है? सब वाहनोंकी गति मन्द हो गयी, यह तो एक विचित्र बात है?' तब तीनों कालोंकी बात जाननेवाले मुनि वसिष्ठने कहा—'राम! यह धर्मक्षेत्र आ गया। इस पुरातन तीर्थमें पैदल यात्रा करनी चाहिये। ऐसा करनेसे पीछे सेनाको सुख मिलेगा।' तब श्रीरामचन्द्रजी सेनाके साथ पैदल चलने लगे। जाते-जाते वे 'मधुवासनक' नामवाले परम पावन ग्राममें पहुँचे। वहाँ गुरु वसिष्ठकी बतायी हुई पद्धतिसे भाँति-भाँतिके उपहारोंद्वारा प्रतिष्ठाविधिके साथ मातृकाओंका पूजन किया। तदनन्तर श्रीरामने सुवर्णा नदीके दक्षिण तटपर हरिक्षेत्रका निरीक्षण किया और यज्ञके योग्य बहुत-से स्थलोंको देखा। उस समय रघुनाथजीने धर्मस्थानका निरीक्षण करके अपने-आपको कृतार्थ माना और सुवर्णाके उत्तर तटपर सैनिकोंको उतारकर स्वयं उस क्षेत्रमें भ्रमण करने लगे। वहाँके सभी तीर्थों और देवमन्दिरोंमें जा-जाकर श्रीरामने सभी शास्त्रोक्त कर्म विधिपूर्वक सम्पन्न किये। उन्होंने बड़ी श्रद्धाके साथ विधिपूर्वक पितरोंका श्राद्ध किया। स्थानसे वायव्य कोणमें सुवर्णाके दोनों तटोंपर श्रीरामेश्वर और कामेश्वरका स्थापन किया। इन सब विधियोंका पालन करके वे अपनी पत्नी सीताके साथ रात्रिमें उस नदीके तटपर ही सोये। जब आधी रात हुई, तब सबके सो जानेपर भी धर्मवत्सल श्रीराम अकेले जागते रहे। उस समय उन्हें किसी स्त्रीके रोनेका शब्द सुनायी दिया। वह करुणाजनक बातें कहकर उस रातमें कुररीकी भाँति विलाप कर रही थी। श्रीरामने उसी क्षण गुप्तचर भेजकर उस स्त्रीका निरीक्षण कराया। करुणाजनक स्वरसे क्रन्दन करती हुई उस व्याकुल नारीको देखकर श्रीरामके दूतोंने पूछा—'सुन्दरी! तुम कौन हो? देवी हो या दानवी? किसने तुम्हें भय पहुँचाया है? किसने तुम्हारा धन लूट लिया है, जिससे व्याकुल हो बार-बार तुम कठोर शब्दोंका उच्चारण करती हुई रो रही हो? सच-सच बताओ, राजा श्रीराम तुम्हारा समाचार पूछते हैं?' उस स्त्रीने उत्तर दिया—'दूतो! अपने स्वामीको ही मेरे पास भेज दो, जिससे मैं अपने मानसिक दुःखको उनसे कहूँ और शान्ति पाऊँ।' 'बहुत अच्छा' कहकर दूत लौट गये और उन्होंने श्रीरामचन्द्रजीके पास जाकर सब बातें कह सुनायीं।
- ब्राह्मखण्ड-धर्मारण्य-माहात्म्य * ६३९
दूतमण्डली—भगवान्! उस स्त्रीने कहा है कि श्रीरामचन्द्रजी ही मेरे दुःखका निवारण कर सकते हैं; अतः तुम्हारा कल्याण हो, तुम उन्हींको भेज दो।
यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी तुरंत वहाँ गये और दुःखसे सन्तप्त हुई उस अबलाको देखकर वे स्वयं भी दुखी हो गये। उस समय उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर पूछा—'शुभे! तुम कौन हो?
किसकी पत्नी हो? किसने तुम्हें दुखी करके इस निर्जन वनमें निकाल दिया है? किसने तुम्हारा धन लूटा है? ये सब बातें मेरे सामने कहो।'
उनके इस प्रकार पूछनेपर उस स्त्रीने मधुर वाणीमें प्रेमपूर्वक श्रीरामचन्द्रजीका स्तवन किया—परमात्मन्! आप सनातन परमेश्वर एवं सबका दुःख हरनेवाले हैं। जिसके लिये आपका अवतार हुआ था, वह कार्य आपने पूरा कर लिया। रावण, कुम्भकर्ण, मेघनाद, खर, दूषण, त्रिशिरा, मारीच और अक्षयकुमार आदि असंख्य भयानक राक्षसोंको आपने समरांगणमें परास्त किया है। लोकेश! मैं आपकी उत्तम कीर्तिका वर्णन क्या कर सकती हूँ, जब साक्षात् ब्रह्माजी आपकी नाभिसे प्रकट कमलसे उत्पन्न हुए हैं और जैसे वटके बीजमें महान् वटवृक्षकी स्थिति मानी गयी है, उसी प्रकार उन्होंने इस सम्पूर्ण विश्वको आपके उदरमें विराजमान देखा है। श्रीराम! संसारमें राजा दशरथ तथा आपकी माता कौशल्या धन्य हैं, जिनकी कुक्षिसे आप प्रकट हुए हैं। वह कुल धन्य है, जिसमें आप स्वयं आये हैं। वह अयोध्या नगरी धन्य है, जिसे आपकी जन्मभूमि होनेका गौरव मिला है। वे लोग धन्य हैं, जो आपकी शरणमें रहते हैं। वे महर्षि वाल्मीकि धन्य हैं, जिन्होंने मुख्य-मुख्य ब्राह्मणोंके लिये अपनी बुद्धिसे भावी रामायणकी रचना की। आपके द्वारा यह रघुकुल अत्यन्त पवित्र हो गया है। लोकमें जो साधारण राजा होता है, उसे भी सब लोग भगवान् विष्णुका अंश समझते हैं। परंतु आप तो अपने रमणीय गुणोंसे सुशोभित स्वयं ही साक्षात् विष्णु हैं। लोकहितका कोई भी कार्य, जिसे करनेका विचार करके आपने यहाँ अवतार लिया है, करते समय आपके मार्गमें कभी कोई विघ्न-बाधा न आवे। इस प्रकार स्तुति करके उसने श्रीरामजीसे कहा—'रघुनन्दन! आप-जैसे स्वामीके रहते हुए जो मैं दीर्घकालसे सूनी हो रही हूँ, यह आपका ही दोष है। मुझे धर्मारण्य क्षेत्रकी अधिदेवता समझिये। आज बारह वर्ष हो गये, मैं यहीं दुःखमें डूबी रहती हूँ। महामते! आजसे आप यहाँकी निर्जनता दूर कीजिये। इस तीर्थमें निवास करनेवाले ब्राह्मण लोहाकके भयसे सब दिशाओंमें भाग गये हैं, उन्हींके साथ सब वैश्य भी दुःखी होकर भिन्न-भिन्न स्थानोंमें चले गये। यद्यपि देवताओंने यहाँ आक्रमण करके उस महामायावी दुर्जय एवं दुर्धर्ष दैत्यको मार डाला है तथापि उसके भयसे अत्यन्त शंकित रहनेवाले मनुष्य अबतक यहाँ लौटकर
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नहीं आ रहे हैं। बारह वर्ष बीत गये, यहाँका प्रत्येक घर अनाथकी भाँति सूनसान पड़ा है। जिस बावलीमें स्नान और दानके लिये उद्यत मनुष्योंकी भीड़ लगती थी, उसीमें अब सूअर कूदते हैं। जहाँ ब्राह्मणलोग निरन्तर सामवेदका गान करते थे, वहाँ अब सियारिनोंके अत्यन्त भयंकर शब्द सुनायी देते हैं। जहाँ घर-घरमें अग्निहोत्रका धूम दृष्टिगोचर होता था, वहीं अत्यन्त भयंकर दावानल धूएँके साथ दिखायी देता है। जिस सभामण्डपमें मन्त्रजप करनेवाले ब्राह्मण बैठा करते थे, वहीं अब गवय, रीछ और स्याही आदि जीव बैठते हैं। यहाँ जो ऊँची-ऊँची यज्ञकी चौकोर वेदियाँ बनी थीं, वे अब बाँबीकी मिट्टीके ढेरसे घिरी दिखायी देती हैं। नृपश्रेष्ठ श्रीराम! अब मेरा निवास-स्थान इस दशाको पहुँच गया है। यहाँसे जो ब्राह्मण चले गये, इसका मुझे बहुत दुःख है। नरेश्वर! मुझे इस संकटपूर्ण अवस्थासे उबारिये।'
यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजी बोले—'आपके ब्राह्मण चारों दिशाओंमें चले गये हैं। मैं न तो उनकी संख्या जानता हूँ और न उनके नाम-गोत्रसे ही मेरा परिचय है। अतः उनकी जाति और गोत्रके विषयमें आप यथार्थ रूपसे बताइये, जिससे उन सबको यहाँ ले आकर मैं अपने-अपने स्थानपर बसाऊँ।'
श्रीमाता बोली—नरेश्वर! ब्रह्मा, विष्णु और शिवने जिन्हें यहाँ स्थापित किया था, वे वेदोंके पारंगत विद्वान् ब्राह्मण अठारह हजारकी संख्यामें यहाँ रहते थे। तीनों वेदोंकी विद्यामें उनकी बड़ी ख्याति है। वे प्रतिष्ठित ब्राह्मण चौंसठ गोत्रोंके हैं। उनके साथ छत्तीस हजार वैश्य थे, जो धर्मपरायण, सदाचारी और ब्राह्मणोंकी सेवामें संलग्न रहनेवाले थे। जहाँ संज्ञारानीके साथ राजा वकुलादित्य नामसे विख्यात भगवान् सूर्य विराजते हैं; जहाँ दोनों अश्विनीकुमार हैं, जहाँ व्ययकी पूर्ति करनेवाले साक्षात् कुबेर हैं, वही यह धर्मारण्य क्षेत्र है, जिसकी अधिष्ठातृदेवी मैं मानी गयी हूँ। मैं यहाँकी भट्टारिका (स्वामिनी) हूँ।
श्रीसूतजी कहते हैं—उस स्थानके जो आचार और वहाँ रहनेवालोंके जो कुलाचार थे, उन सब प्राचीन वृत्तान्तोंको श्रीमाताने श्रीरामचन्द्रजीके आगे निवेदन किया। उसकी बात सुनकर रघुनाथजीको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने कहा—'आपने मुझसे सत्य-सत्य बातें बतायी हैं। अतः मैं इसी नामसे यहाँ नगर बसाऊँगा। यह नगर तीनों लोकोंमें उत्तम सत्यमन्दिरके नामसे विख्यात होगा।' यों कहकर श्रीरामचन्द्रजीने अपने एक लाख सेवकोंको ब्राह्मणोंको बुला लानेके लिये भेजा और कहा—'जिस देश, प्रदेश, नदी, तट, वन अथवा ग्राममें जहाँ-जहाँ धर्मारण्यनिवासी ब्राह्मण गये हों, वहाँ-वहाँसे अर्घ्य-पाद्य आदिके द्वारा उनकी पूजा करके उन्हें तुमलोग शीघ्र यहाँ बुला लाओ। मैं तभी यहाँ भोजन करूँगा, जब उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके दर्शन कर लूँगा।'
भगवान्का यह आदेश सुनकर उनके आज्ञापालक दूत सब दिशाओंमें चले गये। उन्होंने सब ब्राह्मणोंको खोज निकाला और उन्हें पाकर सब-के-सब बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने शास्त्रोक्त विधानसे अर्घ्य-पाद्य आदिके द्वारा उन सबका पूजन किया, स्तुति की और विनययुक्त बर्ताव करते हुए श्रीरामचन्द्रजीका अनुरोध सुनाकर उन सबको धर्मारण्य चलनेके लिये आमन्त्रित किया। तदनन्तर वे सभी वेद-शास्त्रपरायण ब्राह्मण सेवकोंके साथ वहाँ जानेको उद्यत हुए और बड़े आदरपूर्वक श्रीरामके समीप गये। उन्हें देखकर दशरथनन्दन महाराज रामके अंगोंमें हर्षसे रोमांच हो आया और उन्होंने अपनेको कृतार्थ-सा माना। वे बड़े वेगसे उठकर पैदल ही उनकी अगवानीके लिये
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गये और धरतीपर घुटने टेककर आनन्दके आँसू बहाते हुए दोनों हाथ जोड़कर बोले—'ब्राह्मणो! मैं ब्राह्मणके ही प्रसादसे लक्ष्मीपति हूँ, ब्राह्मणके ही प्रसादसे धरणीधर हूँ, ब्राह्मणके ही प्रसादसे जगतीपति हूँ और ब्राह्मणके ही प्रसादसे मेरा राम नाम है*।' श्रीरामचन्द्रजीके ऐसा कहनेपर वे ब्राह्मण बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने जय-जयकार एवं आशीर्वादसे उनका सम्मान करते हुए कहा—'रघुनन्दन! आप दीर्घायु हों।' श्रीरामने उन्हें पुनः प्रणाम करके पाद्य, अर्घ्य और आसन आदिके द्वारा उनका सत्कार किया और दण्डवत् प्रणाम करके स्तुति की। तत्पश्चात् हाथ जोड़कर उनके चरणोंकी वन्दना की। फिर विचित्र प्रकारके आसन और सोनेके आभूषण समर्पित किये। अँगूठी, यज्ञोपवीत और कानोंके कुण्डल दिये। इतना ही नहीं, उन्होंने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके लिये अनेक रंगकी सौ-सौ गायें भी दीं, जो बछड़ेवाली थीं और जिनके थन घड़ेके समान थे। उनकी पीठपर वस्त्र ओढ़ाया गया था, गलेमें घंटे बँधे थे, सींग सोनेसे और खुर चाँदीसे मढ़े गये थे। उनका पृष्ठभाग ताम्रपत्रसे विभूषित था और दूध दुहनेके लिये प्रत्येक गायके साथ एक-एक काँसेका पात्र था।
तत्पश्चात् श्रीराम बोले—ब्राह्मणो! मैं श्रीमाताकी आज्ञासे इस तीर्थका जीर्णोद्धार करूँगा। आपलोग इस कार्यके लिये मुझे आज्ञा दें और मेरा दान ग्रहण करें। सत्पात्रको ही दान देना चाहिये। अपात्रको कुछ नहीं दिया जाता; क्योंकि सुपात्र नौकाकी भाँति सदा पार उतारता है और अपात्र लोहपिण्डके समान केवल डुबानेवाला होता है। द्विजो! केवल जातिमात्रसे ब्राह्मणता नहीं आती है, उसके साथ-साथ ब्राह्मणोचित कर्म भी होना चाहिये। संसारमें क्रिया बलवती होती है। कर्महीन ब्राह्मणोंको दान देनेसे कहाँसे फल प्राप्त होगा? इस कारण सत्यवादी ब्राह्मण ही परम पूजनीय माने गये हैं। अब यज्ञकार्य प्रारम्भ होनेवाला है, इसमें आपलोग सदा कृपा करें।
तब वे सब ब्राह्मण आपसमें मिलकर विचार करने लगे। उनमेंसे कुछ ब्राह्मणोंने श्रीरामचन्द्रजीसे इस प्रकार कहा—'रघुनन्दन! हम सब शिलोञ्छवृत्तिसे जीविका चलानेवाले हैं। पूर्ण सन्तोषका आश्रय लेकर धर्मानुष्ठानमें लगे रहते हैं। अतः हमें दान लेनेसे कोई प्रयोजन नहीं है। राजाका प्रतिग्रह बड़ा भयंकर होता है, अतः हम भयदायक प्रतिग्रह नहीं लेना चाहते।' उन ब्राह्मणोंमेंसे कुछ एकाहित व्रतवाले थे। वे दिनमें एक बार भोजन करते थे। कुछ अमृतवृत्तिसे रहते थे—बिना माँगे जो कुछ मिल जाय, उसीपर सन्तोष करते थे। कुछ कुम्भीधान्य संज्ञावाले ब्राह्मण थे, वे एक घड़ेसे अधिक धान्यका संग्रह नहीं करते थे। कुछ ब्राह्मण यजन-याजन, अध्ययन-अध्यापन और दान तथा प्रतिग्रह—इन छः कर्मोंमें तत्पर रहते थे। वे सभी ब्राह्मण ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीन मूर्तियोंके स्थापित किये हुए थे। सबके स्वभाव और गुण पृथक्-पृथक् थे। कुछ ब्राह्मण इस प्रकार बोले—'हमलोग ब्रह्मा, विष्णु और शिव—इन तीनों स्वरूपोंकी आज्ञा लिये बिना कैसे प्रतिग्रह स्वीकार कर सकते हैं। जबतक ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओंने नहीं कहा, तबतक हमने किसीका ताम्बूल भी स्वीकार नहीं किया है।'
यह सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने महात्मा वसिष्ठजीसे परामर्श किया और गुरुके साथ ही उन्होंने ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि देवताओंका स्मरण
* विप्रप्रसादात्कमलावरोऽहं विप्रप्रसादाद्धरणीधरोऽहम्। विप्रप्रसादाज्जगतीपतिश्च विप्रप्रसादान्मम राम नाम ॥
(स्क० पु०, ब्रा० ध० मा० ३२। ६०)
भगवान् रामचन्द्रका दान