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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

सहस्रार
गुह्चक्र
उन्मनी १६
१५ समनी
व्यापिका १४
१३ शक्ति
महानाद १२
११ नाद
निरोधिका १०
९ अर्धेन्दु
बिन्दु ८
७ आज्ञाचक्र
५ विशुद्ध
अनाहत् ४
हृदयचक्र
मणिपूर ३
२ स्वाधिष्ठान
योनिस्थान
१ मूलाधार
कन्द
स्वयंभूलिङ्ग
कुण्डलिनी


श्री हिरालाल
देवास

The different yogic plexuses

सौंदर्य लहरी ९५


और लहरी से ल हीं लेकर हादि विद्या के तीनों कूटों को ग्रहण किया जा सकता है । कं * सुख वाचक शब्द है, कं ब्रह्म और प्राण वाचक भी है देखे छान्दोग्य (४, १०, ५) । इस श्लोक की अगले श्लोक से संगति करने से हादि विद्या को षट् चक्र वेध विद्या समझना चाहिये ।

षट् चक्र वेध अर्थात उन्नेय भूमिका ।

[ ९ ]

महीं मूलाधारे कमपि मणिपूरे हुतवहं
स्थितं स्वाधिष्ठाने हृदिमरुतमाकाशमुपरि ।
मनोऽपि भ्रूमध्ये सकलमपि भित्वाकुलपथं
सहस्रारे पद्मे सह रहसि पत्या विहरसि ॥

अर्थः— पृथिवी तत्व को मूलाधार में और जल को भी ( मूलाधार में ही ) मणिपूर में अग्नितत्व को जिसकी स्थिति स्वाधिष्ठान में है, हृदय में वायु तत्व को और ऊपर विशुद्ध चक्र ) में आकाश तत्व को, और मन को भी भ्रूमध्य में, इस प्रकार सकल कुल पथ ( शक्ति के मार्ग ) का वेध करके तू सहस्रार पद्म में अपने पति के साथ एकान्त में विहार करती है ।

सं० टि० यहां अन्तर्याग का वर्णन है, कुण्डलिनी शक्ति का षट चक्र वेध पूर्वक आरोहण बताया गया है ।


* नोट:—कं शिरः सुख वारिषु-विश्वः, सुखशीर्ष जलेषु कं इति मेदिनी ।

९६ सौन्दर्य लहरी

व्याख्या:— षट् चक्र निरूपण, शिव संहिता और अन्य ग्रन्थों में विना मतभेद षट् चक्रों का क्रम इस प्रकार देखने में आता है कि गुदा के पास पृथिवी तत्व का मूलाधार चक्र है, उपस्थ के निकट जल तत्व का स्वाधिष्ठान चक्र, नाभि के पास अग्नि तत्व का मणिपूर चक्र, हृदय के पास वायु तत्व का अनाहत चक्र, कंठ में आकाश तत्व का विशुद्ध चक्र और भ्रूमध्य के पास मनस्चक्र है, जिसको आज्ञा चक्र कहते हैं । परन्तु सौन्दर्य लहरी में इस क्रम में अन्तर दिखता है जिसके अनुसार उपस्थ के पास जल तत्व का मणिपूर और नाभि में आग्नेय स्वाधिष्ठान चक्र होना चाहिये । तत्वों का क्रम तो वह ही है परन्तु चक्रों के नामों के क्रम से उपस्थ के चक्र का नाम मणिपूर और नाभि चक्र का नाम स्वाधिष्ठान प्रतीत होता है । शंकर भगवत्पाद ने यद्यपि इन दो चक्रों के स्थानों का संकेत नहीं किया है, परन्तु नाम क्रम से यह ही प्रतीत होता है कि उनको, उपस्थ वाले चक्र का नाम मणिपूर और नाभि के चक्र का नाम स्वाधिष्ठान अभिमत था । परन्तु हमारी राय में ऐसा नहीं है, केवल तत्वों के वेध क्रम में अन्तर है । समयाचार के मतानुसार उपस्थ वाले चक्र का वेध करना उचित नहीं समझा गया, क्योंकि इस चक्र के वेध से काम वासना की वृद्धि होकर बज्रौली इत्यादि क्रियाओं द्वारा ऊर्द्धरेता होने की सिद्धि प्राप्त की जाती है, जो कौलाचार को अभीष्ट है, समयाचार को नहीं । इसलिये यहां समयाचार के अनुसार वेध क्रम दिया गया है । वह इस प्रकार है कि मूलाधार के वेध द्वारा पृथिवी तत्व का और साथ ही जल तत्व का भी वहां ही वेध किया जाना चाहिये । 'अपि' शब्द का 'कं'

सौंदर्य लहरी ९७


के साथ प्रयोग इस बात की ओर संकेत करता है, नहीं तो अपि शब्द वृथा सा दिखता है। फिर स्वाधिष्ठान को छोडकर नाभि वाले मणिपूर में अग्नि का बेध किया जाता है परन्तु अग्नि तत्व की स्थिति योनि स्थान में होने के कारण स्वाधिष्ठान में दिखाई गई है अर्थात् स्वाधिष्ठान चक्र में नीचे अग्नि ऊपर जल दोनों का संधि स्थान है क्योंकि योनि स्थान मूलाधार और स्वाधिष्ठान के मध्य भाग में स्थित है इसलिये अग्नि के प्रदीप्त होने पर मूलाधारस्थ पृथिवी और स्वाधिष्ठानस्थ जल दोनों का बेध मूलाधर के बेध के साथ हो जायगा।

हमारे इस मत को हंसोपनिषत् से पुष्टि मिलती है। वहां गुदा चक्र से वायु का उत्थान करके मणिपूर चक्र में ले जाने का विधान किया गया है, बीच में स्वाधिष्ठान चक्र का बेध न करके उसकी तीन बार प्रदक्षिणा करने की आज्ञा है।

गुदमवष्टभ्याध राद्वायुमुत्थाप्य स्वाधिष्ठानं त्रिःप्रदक्षिणी-
कृत्य मणिपूरकं च गत्वाऽनाहतमतिक्रम्य विशुद्धौप्राणान् निरुध्या-
ज्ञामनुध्यायन् ब्रह्मरंध्रं ध्यायन् त्रिमात्रोऽहमित्येवं सर्वदा ध्यायेत् ।

**अर्थः—**गुदाद्वार को रोक कर आधार चक्र से वायु को उठा कर स्वाधिष्ठान की ३ बार परिक्रमा करके मणिपूर जाकर, अनाहतचक्र का अतिक्रमण करके विशुद्धचक्र में प्राणों का निरोध करे और आज्ञाचक्र में ध्यान करता हुआ, फिर ब्रह्मरंध्र का ध्यान करता हुआ मैं तीन मात्रा से युक्त ॐ हूं ऐसा सदा ध्यान करे। अर्थात् मैं जाग्रतावस्था में वैश्वानर अकार, स्वप्नावस्था में तैजस् उकार और

९८ सौंदर्य लहरी

सुषुप्ति में प्राज्ञ मकार हूं, इस प्रकार सदा ध्यान करता हुआ शुद्ध- स्फटिक सदृश नाद का आधार चक्र से ब्रह्मरंध्र पर्यन्त ध्यान करना चाहिये ।

बिन्दु और बीज के योग से नाद की उत्पत्ति होती है । कहा है

बिन्दुःशिवात्मको बीज शक्तिर्नादस्तयोर्मितः । समवायः समाख्यातः सर्वागमविशारदैः ॥

स्थूल रूप में बिंदु शुक्र है और बीज रज है और उर्द्धरेता होने पर दोनों का समवाय अर्थात् कुण्डलिनी का जागरण नाद कहलाता है । समयाचार की विधि भावना प्रधान होती है और भावना युक्त साधन द्वारा ही सिद्धि प्राप्त की जाती है, कौलाचार में जो उर्ध्वरेतस् की सिद्धि स्वाधिष्ठान चक्र के वेध द्वारा की जाती है, वह समयाचार वाला आज्ञाचक्र में मन का वेध करके करता है । हंसोपनिषत् के उपरोक्त क्रमानुसार स्वाधिष्ठान चक्र की ३ बार प्रदक्षिणा करके ऊपर उठ जाने के साधन में स्वाधिष्ठान चक्र के वेध का निषेध किया गया है । उसकी तीन बार प्रदक्षिणा करनी चाहिये, क्योंकि यहां शक्ति की पीठ है, जैसा कि नाम से प्रकट है ( स्व+अधि+स्थान=स्वाधिष्ठान ) । मूल बंध द्वारा आधार चक्र का वेध होकर पृथिवी और जल दोनों का एक साथ बंध होगा, क्योंकि मूलबन्ध के अभ्यास से योनिस्थान जो दोनों चक्रों के मध्य में है और अग्नि का स्थान है, दबता है । योनिस्थान पर दबाव पडने से अग्नि प्रदीप्त होकर पृथिवी और जल दोनों का वेध एक साथ कर देती है । अग्नि तत्व का वेध मणिपूर अर्थात् नाभि चक्र में होता है और वह

सौन्दर्य लहरी ९९


वहां विद्युत् का रूप धारण कर लेती है। जैसे ग्रीष्म ऋतु में जल का वेध होकर वर्षा ऋतु में मेघों में विद्युत् प्रकट हुआ करती है। योनिस्थान में प्रदीप्त अग्नि नीचे मूलाधार में पृथिवी तत्व को तपाता है और ऊपर स्वाधिष्ठानस्थ जल को। जल बाष्प बन कर मणिपूर (नाभिचक्र) में मेघवत् आच्छादित हो जाता है और वहां अग्नि का वेध होकर वह विद्युत् का रूप धारण कर लेती है। देखें श्लोक ३९, ४०। ग्रीष्म ऋतु में गरमी से पृथिवी तप्त होकर जल सूखने लगता है, यह जल का वेध है। वर्षा में वह ही जल मेघों के रूप में परिणत हो जाता है, और उनके ताप से विद्युत् प्रकट होती है, यह अग्नि का वेध है।

*चक्रों का स्थान मेरुदंड (spinal bone) के भीतर नीचे से मस्तिष्क तक उठने वाली सुषुम्ना नाड़ी (spinal cord) में है। इसके द्वारा शरीर की नाड़ियों का मस्तक से संबंध है। गुदा के पीछे एक मांसपेशी है, जिसे कंद कहते हैं, उसकी नाभि अर्थात् केन्द्र में कुण्डलिनी स्वयंभूलिंग पर साढ़े तीन कुंडल डाले सोती रहती है। जागकर वह स्वाधिष्ठान चक्र में रहने लगती है। उस अवस्था में जीव को बिन्दु रूपी शिव कहते हैं और कुंडलिनी को जीव रूपा शक्ति।

आज्ञा चक्र में चढ़कर वह ही परमात्मा रूपा शक्ति त्रिपुरा कहलाती है जो सहस्रार में शिव के साथ सायुज्यता प्राप्त कर लेती


* चक्रों और नाडियों की सविस्तार जानकारी के लिये लेखक का अंग्रेजी ग्रंथ Divine Power पढ़ें।

१०० सौन्दर्य लहरी

है। षट् चक्र बेध के पूर्व शक्ति का रूप जीवात्मिका और षट् चक्र बेध के पश्चात् शिवात्मिका समझना चाहिये। जीवात्मिका का स्थान स्वाधिष्ठान और शिवात्मिका का स्थान विशुद्ध चक्र हैं।

मूलाधार और स्वाधिष्ठान को अग्नि खंड, मणिपूर और अनाहत को सूर्य खंड और विशुद्ध एवं आज्ञा चक्र को चन्द्र खंड कहते हैं। योनिस्थान अग्नि की, अनाहत सूर्य की और आज्ञा चंद्र की पीठ कहलाती हैं। अग्नि खंड में रुद्र ग्रंथि, सूर्य खंड में विष्णु ग्रंथि, और सोम खंड में ब्रह्म ग्रंथि कहलाती हैं।

अन्तरिक्षगतो वह्निर्वैद्युतः स्वान्तरात्मकः ।
नभःस्थः सूर्यरूपोऽग्नि नीभेमंडलमाश्रिताः ॥
(यो शि ५, ३२)

विषं वर्षती सूर्योऽसौ स्रवत्यमृतमुन्मुखः ।
तालु मूले स्थितश्चन्द्रः सुधां वर्षत्यधो मुखः ॥
(५, ३३)

अर्थः— अन्तरिक्ष में उठकर अग्नि विद्युत् रूप हो जाती है, जो अपना अन्तरात्मा है। आकाश में स्थित अग्नि सूर्य रूप है, यह नाभि मण्डल (मणिपूर और अनाहत्) में आश्रित है, नीचे की ओर मुख रहने पर वह विष की वर्षा करता है और ऊपर की ओर मुख होने पर अमृत का स्रवण करने लगता है। तालू के मूल स्थान (आज्ञा) पर चन्द्रमा का स्थान हैं, उसका मुख नीचे की ओर है और वह अमृत की वर्षा किया करता है। अनाहत् चक्र के १२ दल १२ आदित्य कहलाते हैं। उर्द्धमुख सूर्य और अधो-

सौंदर्य लहरी१०१

मुख चन्द्र के बीच में विशुद्ध चक्र के १६ दल चन्द्रमा की १६ कलाओं के सदृश चमकने लगते हैं। कुण्डलिनी शक्ति जागकर जब सूर्य मण्डल से ऊपर चढती है, तब सूर्य को ऊर्ध्वमुख कर देती है। फिर कुण्डलिनी शक्ति उससे भी ऊपर जाकर चन्द्र मण्डलका बेध करती हुई सहस्रार में उठती है, तब चन्द्रमा भी अमृत की वर्षा करने लगता है और सारे देह की नाड़ियां उस अमृत से भर जाती हैं और योगी का शरीर दिव्य बन जाता है।

अवसरण अर्थात अन्वय भूमिकावेध के समय शक्ति की गति मूलाधार से सहस्रार की ओर होती है जिसका वर्णन ऊपर के श्लोक में दिया गया है। सहस्रार से नीचे उतरते समय वह नाड़ियों को अमृत से सींचती हुई मूलाधार की ओर लौटती है। आरोह को उन्नेय भूमिका और अवरोह को अन्वय भूमिका कहते हैं। प्रत्यावृत्ति भूमिका से कुण्डलिनी का नीचे उतर कर अपने स्थान पर गुहा में लौट आने का अभिप्राय है। गत श्लोक में उन्नेय भूमिका का वर्णन किया गया है और अगले श्लोक में अन्वय और प्रत्यावृत्ति भूमिकाओं का वर्णन है इनको अप्यय और प्रभव क्रम भी कहते हैं। दोनों के सिद्ध होने पर योग की सिद्धि होती है। कहा है 'योगोहि प्रभवाप्ययौ' कठोपनिषत् । यह उभय क्रम कुण्डलिनी सोपान रहस्य के नाम से प्रसिद्ध है।

[ १० ]

सुधाधाराऽऽसारैश्चरण युगलान्तर्विगलितैः
प्रपंचं सिञ्चन्ती पुनरपि रसाम्नाय महसा।

१०२ | सौंदर्य लहरी

अवाप्य स्वां भूमिं भुजगनिभमध्युष्टवलयं
स्वामात्मानं कृत्वा स्वपिषि कुलकुण्डे कुहरिणि ॥

अर्थः— अमृत धाराओं की वर्षा से, जो तेरे दोनों चरणों के बीच से टपकती हैं, प्रपंच को सींचती हुई फिर छओं आम्नायों से होती हुई अथवा छओं चक्रों द्वारा सींचती हुई, अपनी भूमि पर उतरकर अपने आप को सर्पिणी के सदृश साडेतीन कुंडल डालकर, हे कुहरिणि ! तू कुल कुंड में सोती है ।

स० टि० यहां पर कुण्डलिनी का सहस्रार में कुछ समय ठहर कर फिर अपने स्थान में उतर आना दिखाया गया है । रस=छः चक्र, आम्नाय=विधान, महस्=प्रकाश । प्रपंच=देह, पिण्ड । कुल कुण्ड=कुण्डलिनी के रहने का कुंड, कुहरिणी= गुहा में रहने वाली । (कुहर=गुहा ।)

पूर्व श्लोक की संगति से इस श्लोक का भाव स्पष्ट है कि मूलाधार से जागकर सुषुम्ना मार्ग द्वारा जब कुँडलिनी हृदयस्थ सूर्य को उन्मुख करती हुई आज्ञा चक्र के ऊपर चन्द्रमंडल में प्रवेश करती है, तब उसके चरणद्वय के बीच से अमृत की धारायें नीचे बरसने लगती हैं। यहां भगवती के चरणों का ध्यान आज्ञा चक्र में किया जाना बताया गया है ।

शक्ति के अवतरण के साथ सब नाडियों का भिन्न-भिन्न चक्रों के द्वारा अमृत के प्रवाह से सारे शरीर में आनखशिख सिंचाव होता है । जिस मार्ग से शक्ति का आरोहण होता है उसी मार्ग से

सौंदर्य लहरी १०३

अवतरण होकर वह फिर अपने स्थान पर सर्पाकार साढ़ेतीन कुण्डल डालकर सो जाती है । इसके दो अर्थ हो सकते हैं । या तो सारी शक्ति ऊपर उठ जाती है और मूलाधार में शक्ति का कुंडलिनी रूप में उसके उठने से अभाव हो जाता है, और फिर लौटने पर वह फिर सो जाती है । दूसरा विकल्प यह हो सकता है कि मूलाधार में अनन्त शक्ति है, इसलिये वहां पर रहने वाले भंडार में कभी कमी नहीं होती, जागकर शक्ति ऊपर भी जाती आती रहती है और नीचे भी बनी रहती है। हमारी समझ में दूसरा विकल्प सत्य जान पड़ता है क्योंकि यदि सारी शक्ति सहस्रार में उठ जाय तो उत्थान के साथ शरीर का आधार न रहने के कारण वह तुरन्त प्रति प्रसव क्रम से लीन हो जाना चाहिये । प्रपंच का अर्थ शरीर अथवा नाडी जाल किया जाता है, दोनों पक्ष में एक ही परिणाम समझना चाहिये । क्योंकि नाडियों द्वारा सारा शरीर पुष्ट होता है, केवल नाडियां ही नहीं। नाडियों की संख्या प्रश्नोपनिषत् में इस प्रकार दी गई है।

अत्रैत दे कशतं नाडिनां तासां शतशतमेकैकस्यां द्वासप्ततिः २ प्रतिशाखा नाडी सहस्राणि भवन्ति । प्रश्न० ( ३,६ )

रसाम्नाय महसा के स्थान पर रसाग्नाय महसः पाठान्तर भी मिलता है । उसका अर्थ नीचे दिया जाता है । तांत्रिक परिभाषा के अनुसार इस पाठान्तर पद का अर्थ 'अमृत के प्रकाश से चमकने वाला चन्द्रमा' होने के कारण श्लोक का भावार्थ इस प्रकार होगा कि शक्ति चन्द्र मण्डल से नीचे उतर आती है, और अपनी भूमि

१०४ | सौंदर्य लहरी

पर आकर ३।। कुण्डलाकृति सर्पिणीवत् सो जाती है। कुल का अर्थ शक्ति समझना चाहिये और कुण्ड से उसके रहने का कुंड सदृश स्थान समझना चाहिये। कुहरिणी का अर्थ कुहर अर्थात् बिल में रहने वाली है। कुहर बिल, छिद्र अथवा रंध्र को कहते हैं। नाडियों द्वारा प्रपंच का सींचे जाने का संबन्ध छःओं चक्रों के द्वारा होने के कारण रसाम्नायमहसा का अर्थ जैसा हमने किया है उचित प्रतीत होता है। रस पद से छः और आम्नाय पद से 'मार्ग' अर्थ लेने से यह अर्थ किया गया है। आम्नाय का अर्थ मार्ग दिखाने वाले वेद, और गुरु परम्परा गत संप्रदायोपदेश हैं। और महस् का अर्थ उत्सव और तेज दोनों है (महस्तूत्सवतेजसोः, इति अमरः) इसलिये पूरे पद का तृतीयांत अर्थ छः तेजोमय आम्नायों के द्वारा, अथवा रस (अमृत) से पूर्ण तेजोमय आम्नाय द्वारा होगा, पंचमी विभक्ति में 'द्वारा' की जगह 'से' लगाना पड़ेगा। आम्नाय से चाहे चन्द्र अथवा चक्र समझा जा सकता है। महस् का अर्थ उत्सव भी किया जा सकता, उस पर्याय में शक्ति का शिव के योग से अमृत सिंचन रूपी उत्सव समझना चाहिये। तांत्रिक पद्धति के अनुसार उपासना के पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊर्द्ध और वाम छः आम्नाय हैं, उन सबका फल शक्ति का जागरण होकर समाधि प्राप्त करना ही है। उक्त आम्नाय गुरु परम्परागत उपदेश से जानने चाहिये।

सौंदर्य लहरी १०२


श्रीचक्र

अगले श्लोक में श्रीचक्र का निरूपण करके बहिर्याग का संकेत है।

(११)

चतुर्भिः श्रीकण्ठैः शिवयुवतिभिः पंचभिरपि
प्रभिन्नाभिः शंभोर्नवभिरपि मूल प्रकृतिभिः ।
त्रयश्चत्वारिंशद्वसुदल कलाश्र त्रिवलय–
त्रिरेखाभिः सार्ध तव शरण (भवन) कोणाःपरिणताः

**नोटः—**कोष्ठकों में पाठान्तर दिया गया है ।

**अर्थः—**चार श्रीकंठ और पांच शिवयुवतियां, इन ९ मूल प्रकृतियों से तेरे रहने के ४३ त्रिकोण बनते हैं, जो शंभु के विन्दुस्थान से भिन्न हैं । वे तीन वृत्तों (circles) और तीन रेखाओं सहित ८ और १६ दलों से युक्त हैं ।

**सं० टि०—**यहां बहिर्याग का वर्णन है। श्रीचक्र के बनाने के तीन भेद होते हैं, मेरु, कैलाश और भूः । तीन भेदों मे शक्तियों के स्थानों और पूजन विधि में अन्तर है। मेरु श्रीचक्र में उसका १६ नित्या कलाओं से, कैलाश के प्रतीक स्वरुप श्रीचक्र में उसको ८ मातृका शक्तियों से और भूः के प्रतीक स्वरुप श्रीचक्र में उसे ८ वशिनी-देवियों से संबंधित चक्र समझा जाता है। तैत्तिरीयारण्यक में कहा है कि पृश्नि ऋषियों ने श्रीचक्र की पूजा की थी और उसकी सहायता

१०६ | सौंदर्य लहरी


से कुण्डलिनी का जागरण करके सहस्रार में शक्ति को उठाया था। इससे विदित होता है कि यह वैदिक मार्ग है।

श्रीचक्र ब्रह्मांड और पिण्ड दोनों का प्रतीक होता है, इसकी रचना ४ श्रीकंठ अर्थात् शिव त्रिकोण और ५ शिवयुवति अर्थात् शक्ति त्रिकोणों के योग से होती है। शिव और शक्ति त्रिकोणों का मुख एक दूसरे के विपरीत रहता है, जैसे ⧖। सृष्टि क्रम में ५ शक्ति त्रिकोण ऊर्ध्वमुख होते हैं और ४ शिव त्रिकोण अधोमुख और अप्यय क्रम में शक्ति त्रिकोण अधोमुख और शिव त्रिकोण ऊर्ध्वमुख रखे जाते हैं। प्रथम केन्द्रीय त्रिकोण को जिसके केन्द्र में शंभु का स्थान है, छोड़ कर शेष त्रिकोणों की संख्या ४२ हैं। इसलिये त्रयश्चत्वारिंशत् पाठ ठीक है। प्रथम मध्य त्रिकोण के बाहर चारों ओर दूसरे नंबर पर ८ कोण बनते हैं, उसको अष्टकोण कहते हैं, फिर तीसरे और चौथे स्तर पर दस २ कोण बनते हैं उन्हें अन्तर्दशार और बहिर्दशार कहते हैं, उनके ऊपर १४ कोण बनते हैं, उनको चतुर्दशार कहते हैं। सबका योग १+८+१०+१०+१४ = ४३ होता है। मध्य केन्द्रीय बिन्दु शंभु का स्थान है जो प्रकृति स्वरूप ९ त्रिकोणों के योग से रचित पूरे चक्र से पृथक् अर्थात् असंग है। उक्त ४३ कोणों के चक्र के बाहर प्रथम वृत्त (circle) पर अष्ट दल पद्म और उसके बाहर दूसरे वृत्त पर षोडश-दलपद्म हैं, षोडशदलपद्म तीन वृत्तों से घिरा है। सबके बाहर तीन रेखाओं का चतुष्कोण है, जिसे भूगृह कहते हैं। भूगृह की चारों भुजाएं बराबर हैं और चारों दिशाओं में ४ द्वार होते हैं। इस श्लोक में द्वारों का उल्लेख नहीं किया गया है।

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सौंदर्य लहरी | १०७

३६ तत्व जिनका वर्णन हम ऊपर प्रथम श्लोक के नीचे कर आये हैं, सप्त धातुओं सहित ४३ हो जाते हैं। सात धातुओं के नाम ये हैं—रक्त, मांस, मेदा, स्नायु, अस्थि, मज्जा और शुक्र।

५ शिवयुवतियां शान्त्यातीतादि ५ कलायें अथवा शक्ति, शुद्धविद्या, माया, कला और अशुद्धविद्या हैं और ४ श्रीकंठ, सदारव्य, महेश्वर, महत्तत्व और पुरुष (जीव) हैं अथवा पुरुष, अव्यक्त, महत् और अहंकार ४ श्रीकंठ हैं, जिनके साथ शब्दस्पर्शादि ५ तन्मात्रायें शिवयुवतियां माननी पडेंगी।

गीता में भगवान ने नवधा प्रकृति का वर्णन किया है, एक जीव-भूता परा प्रकृति और अष्टधा अपरा प्रकृति। वहां आकाशादि से ५ तन्मात्रा और मन, बुद्धि, अहंकार से समष्टि अहंकार, महत् और अव्यक्त क्रमशः समझना चाहिये। देखें गीता अध्याय ७ के श्लोक ४, ५ पर शंकर भाष्य।

श्रीचक्र के उपरोक्त क्रम से ९ विभाग किये जाते हैं, जिनमें विन्दु प्रथम है और मध्यस्थ त्रिकोण दूसरा इत्यादि और प्रत्येक विभाग को आवरण कहते हैं। श्रीचक्र का विशेष विवरण साथ दिये हुए विवरण पत्र (chart) पर देखें।

श्री चक्र निर्माण की विधियह विधि सौन्दर्य लहरी के भाष्यकार कैवल्य शर्मा के मतानुसार है। श्री चक्र मनुष्य देह का प्रतीक है और मनुष्य देह का माप अपनी अंगुलियों के नाप से ९६ अंगुल प्रमाण होता है। इसलिये श्री चक्र का माप भी ९६ इकाइयों पर रखा जाता है। एक ८ इंच

१०८ सौन्दर्य लहरी


लंबी भुजाओं वाला समचतुष्कोण लो, उसके बीचोंबीच में एक खडी रेखा खेंचो, जो चतुष्कोण को दो सम भागों में विभक्त करती हो। उस रेखा के प्रति इंच के १२ विभाग के अनुपात से ९६ सम विभाग करलो। इस चतुष्कोण के भीतर एक एक विभाग छोडकर दो वैसे ही सम चतुष्कोण और बनाओ, इन तीन चतुष्कोणों का भूगृह नामक त्रैलोक्य मोहन चक्र कहलाता है। चारों दिशाओं में मध्य में एक एक द्वार खोल देना चाहिये। अब उस मध्यवर्ती खडी रेखा के मध्य विन्दु को केन्द्र मानकर ४५, ४४ ३/८, ४४, ३५ और २४ विभागों के बराबर अर्धव्यास मानकर पांच वलयाकार वृत्त ( circles ) खेंचो। सब से अन्दर के वृत्त पर अष्ट दल पद्म और उसके ऊपर वाले वृत्त पर षोडषदल पद्म बनाओ। बीच के शेष वर्तुलाकार क्षेत्र में ५ उर्ध्व त्रिकोण और ४ अधस्त्रिकोण बनाने से पूरा श्री चक्र बन जाता है। इन ९ त्रिकोणों का निर्माण इस प्रकार किया जाता है। मध्य रेखा पर ऊपर से नीचे की ओर ६, ६, ६, ३, ४, ३, ३, ५, और ६ विभागों के अन्तर पर ९ चिन्ह बनालो। जिनको हम यहां पर कै, गै, चै, जै, टै, डै, तै, दै, और पै, से नामांकित करते हैं। इन चिन्हों पर ऊर्ध्व रेखा पर सम कोण बनाने वाली और अन्तर्वृत्त ( innermost circle ) के १० खंड करने वाली कोटि रेखायें ( chordlines ) खैंचो। उन के नाम भी क्रमशः कै, गै, चै, जै, टै, डै, तै, दै, और पै वाली रेखाएं समझना चाहिये। फिर उन रेखाओं के दोनों सिरों पर से नीचेबताए हिसाब से दोनों ओर सम भाग मिटा दो। कै और पै रेखाओं का ५/१६ भाग दोनों सिरों पर अर्थात पूरी रेखा

श्रीचक्रम्

(श्रीचक्र का रेखाचित्र)

सृष्टियोगेन चक्रमिदम्

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सौंदर्य लहरी १०९


का १/८ भाग मिटाना है। गै रेखा के सिरों पर से ५/८८ वां और र्द रेखा के सिरों से ७/३२ भाग, जैं और र्ड रेखाओं के सिरों पर से ३/८ भाग और टें रेखा के सिरों पर से ३/८ भाग मिटा दो, चै और तैं रेखाएं पूरी रहेंगी। खडी रेखा पर कं बिन्दु के ६ विभाग ऊपर वाले अन्तर्वृत्तस्थ बिन्दु को स मानों और पें बिन्दु से ६ विभाग नीचे वाले अन्तर्वृत्तस्थ बिन्दु को ह मानो। ह को चै वाली रेखा के सिरों को मिलाने से चौथा श्रीकंठ (शिव-त्रिकोण) बनता है, पें बिन्दु को गै रेखा के मिटाने के पश्चात् नये सिरों को मिलाने से तीसरा, र्द बिन्दु को जैं रेखा के मिटाने के पश्चात् नये सिरों को मिलाने से दूसरा, और तैं बिन्दु को कें रेखा के नये सिरों को मिलाने से प्रथम श्रीकंठ बनता है। इसी प्रकार जैं बिन्दु को पें रेखा के नये सिरों को मिलाने से प्रथम शक्ति त्रिकोण, चै बिन्दु को टें रेखा के सिरों को मिलाने से दूसरा, गै बिन्दु को र्ड रेखा से मिलाने से तीसरा, कें बिन्दु को र्द रेखा से मिलाने से चौथा और स बिन्दु को तैं रेखा से मिलाने से पांचवां शक्ति त्रिकोण बनता है।

उक्त ९ त्रिकोणों को बनाने का क्रम इस प्रकार होना चाहिये, जिससे मध्य त्रिकोण, अष्टार, अन्तर्दशार, बहिर्दशार, और चतुर्दशार चक्रों का निर्माण क्रमशः सामने आता जाय।

पहिले प्रथम शक्ति त्रिकोण बनाओ, फिर दूसरा शक्ति त्रिकोण बनाने से मध्य त्रिकोण स्पष्ट दिखने लगता है। वैसे तो वह प्रथम शक्ति त्रिकोण के बनने से ही टें रेखा के ऊपर दिखने लगता है दूसरे शक्ति त्रिकोण की उसे अपेक्षा नहीं है। फिर प्रथम शिव