सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
७६ | सौंदर्य लहरी
अनुग्रह करने की इच्छा से दोनों हाथों के अभिनयों द्वारा अपनी इच्छा प्रकट किया करते हैं। परन्तु भगवती की शरण में सब लोक हैं, भक्त में शरणागति का भाव उदय होते ही, उसकी कामना पूर्ण होती है। और भगवती चारों हाथों में इक्षुधनुः, ५ बाण, और अंकुश एवं पाश धारण किये हुए है इसलिये वह हाथों का अभिनय नहीं करती, परन्तु दोनों चरण ही भय से रक्षा करने में और सब कामनाओं के लिये सिद्ध वरदान देने में निपुण हैं। कराभिनय द्वारा वर देने की इच्छा को किसी प्रकार प्रकट करने की क्या आवश्यकता है ? जो मनुष्य अनन्य भाव से शरण में आता है उसकी सब कामनाएं स्वयं पूर्ण हो जाती हैं और सब प्रकार के भयों से उसकी रक्षा हो जाती है।
दारिद्र्य दुःख भय हारिणी का त्वदन्या,
सर्वोपकार करणाय सदार्द्रचित्ता।
शास्त्रों में भगवती को अग्नि के रूप से हवन द्वारा प्रसन्न करने का विधान देखने में आता है। जंगलों में हिंसक पशुओं के भय से रक्षा के लिये प्रज्वलित अग्नि रखी जाती है। अग्नि की समक्षता से मनुष्य में अभय की भावना स्वतः जाग उठती है, यह सबका अनुभव है। अंधकार में भय लगता है, दीपक रहने पर भय नहीं लगता। रक्षार्थ दिग्बंधन के मन्त्र द्वारा भी प्रज्वलित अग्नि के परिकोट की भावना की जाती है। यथा:—
नमो भगवति ज्वाला मालिनी देवदेवि सर्व भूत संहार-कारिके जातवेदसि ज्वलंति उज्वल २ प्रज्वल २ व्ह्रां व्ह्रीं व्ह्रूं र र र र र र र हं फट स्वाहा, इति परितो वह्निः परकारं ध्यायेत।
सौंदर्य लहरी [७७]
सब भयों का एक मात्र कारण यह दुःखालय संसार ही है।
भय का मूल कारण
यद्यपि विश्व में प्रकृति की रचना सौन्दर्य का घर है। ऐसा प्रतीत होता है मानो प्रकृति देवी ने अपने स्वाभाविक सौंदर्य का प्रदर्शन करने के लिये ही इस विश्व की रचना की है। तारागण रूपी हीरे माणिक्यों से जटिल आकाश जिसका मुकुट है, तेजःपुंज सूर्य चन्द्र और अग्नि जिसके तीन नेत्र हैं, अन्तरिक्ष जिसका वक्षःस्थल और विश्व की चित्रविचित्र विविध रचनायें जिसके श्रृंगार हैं, और जिसके रूप-लावण्य की छाया सर्वत्र बसी हुई है, जिसकी अंगप्रभा सर्वत्र चमक रही है, ऐसा यह विश्व उस भगवती के समस्त सौंदर्य राशि का विकास ही तो है। विश्व की एक-एक गौणकृति की चमकदमक पर पतंगवत मनुष्य मोहित हो जाता है। क्यों न हो ? सौंदर्य का भूखा, आनन्द का प्यासा यह जीव एक-एक अणु की प्रभा में इतना आसक्त हो जाता है कि उसकी दृष्टि प्रकृति देवी के समष्टि सौंदर्य तक पहुंच पाती ही नहीं, उसकी एक देशीय मोहासक्ति ही उसके दुःख का कारण बन जाती है। दीपक ही पतंग की मृत्यु का कारण हो जाता है।
बाला मंत्र
अग्नि भगवती का साक्षात् स्थूल स्वरूप है। भगवती के एक प्रणव का रूप ऐं भी है। 'ऐं' अग्नि तत्व का अक्षर है, और सुषुम्ना नाडी से संबंधित है, सुषुम्ना को भी आग्नेय माना जाता है। ऐं बीज को वाक् बीज भी कहते हैं, वाक् शक्ति को भी अग्निमयी कहते हैं। 'तेजोमयी वाक्' ऐसी श्रुति है। ऐं का त्रिकोणाकृति भाग शक्ति का द्योतक
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है । भगवती का तीसरा नेत्र जो भ्रुकुटि के ऊपर स्थित है, वह भी अग्नेय है, जिसके एक कटाक्ष से संसार रूपी भवसागर के भय से मुक्ति मिलती है । इसलिये ब्रम्हाजी ने मधु कैटभ से भयभीत होकर इस ही बीज द्वारा भगवती की आराधना की थी । कामनाओं की सिद्धि के लिए काम बीज का प्रयोग किया जाता है । जिसके गर्भ में आद्योपान्त सारा विश्व है । (देखें श्लोक १९.)
भगवती के दोनों चरण सर्वशक्तिसामर्थ्य युक्त हैं, उनका प्रतीक सौः बीज समझा जाना चाहिये । 'स' अक्षर शक्ति वाचक माना जाता है, दो सकारों के लिये द्विवचनान्त 'सौ' पद दोनों चरणों का संकेत करता है, विसर्ग भी शक्ति का ही द्योतक है । इस प्रकार सौः बीज से भगवती के दोनों चरणों की सर्व शक्तिमत्ता प्रकट होती है । और तीनों बीजों से बाला का सब भयों से मुक्ति और मन वांछित कामनाओं की सिद्धिदे ने वाला मंत्र सिद्ध होता है । ऐसे ही नवार्ण मंत्र को भी जानना चाहिये ।
काम देव सब प्रकार के मोहों का राजा है, जो तपस्वी ज्ञानियों के चित्त पर भी प्रहार किये बिना नहीं रहता । मुमुक्षुओं को उससे अपनी रक्षा करने के लिये, सब भयों से त्राण करने वाले भगवती के चरणों की ही शरण में जाना चाहिये, दूसरा कोई मार्ग बचने का नहीं है । यह बात आगे के तीन श्लोकों द्वारा कही गई है ।
[ ५ ]
हरिस्त्वामाराध्य प्रणतजनसौभाग्यजननीं
पुरा नारी भूत्वा पुररिपुमपि क्षोभमनयत् ।
सौंदर्य लहरी ७९
स्मरोऽपि त्वां नत्वा रतिनयनलेह्येन वपुषा
मुनीनामप्यन्तः प्रभवति हि मोहाय महताम् ॥
अर्थ:— हरि (विष्णु भगवान) ने पूर्व काल में, प्रणत जनों को सौभाग्य प्रदान करने वाली तेरी आराधना कर के नारी का मोहिनी रूप धारण कर, त्रिपुरारि महादेव के भी चित्त में काम का क्षोभ उत्पन्न कर दिया था। और काम देव स्मर भी तुझ को नमन करने के कारण ही अपनी पत्नी रति के नयनों द्वारा चुंबन किये जाने वाले शरीर से बडे बडे मुनियों के भी अन्तःकरण में मोह उत्पन्न कर देता है।
सं० टि० श्री अच्युतानन्दजी प्रणतजनसौभाग्यजननीं को प्रणत-जनसौभाग्यजननि ईं पढकर श्लोक का अर्थ इस प्रकार करते हैं:— हे प्रणत जन सौभाग्य जननि हरि तेरी ईं रूप से आराधना कर के मोहनी का रूप ग्रहण करते हैं। ईं काम कला है और कादि विद्या का तीसरा अक्षर है और अनुस्वार (शिव) सहित माया, लक्ष्मी और काम बीजों में रहता है। इस श्लोक से साध्य सिद्धासन विद्या (ह्रीं क्लीं ब्लैं) का उद्धरण किया जाता है।
पुराणों की गाथा के अनुसार देवता और असुरों ने मिलकर समुद्र का मथन किया था, मथन करने पर समुद्र से अनेक पदार्थ निकले, जिनके साथ अमृत और हलाहल विष भी निकले थें; अमृत के बटवारे के लिये दोनों में विवाद उपस्थित हुआ इस पर विष्णु भगवान ने मोहिनी रूप धारण किया और अमृत का कलश
८० | सौंदर्य लहरी
लेकर उसके बांटने का काम करने लगे। देव और असुरों को अलग-अलग दो पंक्तियों में बिठा दिया गया। मोहिनी के नेत्रों के कटाक्षों और अंगों के हावभावों से सब असुर मोहित हो गये और सारा अमृत देवताओं को बांट दिया गया। वे अमृत पीकर अमर हो गये और असुर मर्त्य रह गये। अमृत के पूर्व जो हला-हल निकला था, उसके प्रभाव से जब सारा विश्व जलने लगा, तब देव और असुर दोनों ही घबरा गये, उस समय करुणा सागर शंकर भगवान ने उसे पान कर के सब की रक्षा की थी, इसके पश्चात् शंकर एकांत में जाकर समाधिस्थ होकर बैठ गये। उठने पर उन्होंने जब मोहिनी रूप द्वारा असुरों के ठगे जाने की बात सुनी, तब विष्णु भगवान से उस मोहिनी रूप को देखने की इच्छा प्रगट की। भगवान ने वह रूप फिर शंकर को भी दिखाया। उसे देखकर शंकर इतने मोहातुर हुए कि काम के क्षोभ से अपने को भूलकर मोहिनी के पीछे दौड़ने लगे।
पुरा काल में कश्यप नाम के एक प्रजापति थे, वे कश्यप सागर के तट पर रहा करते थे। शायद वह कश्यप सागर योरोप और एशिया के मध्यवर्ती मधुर जलयुक्त महान सरोवर आधुनिक कैस्पियन सी ही हो। इसलिये इस पौराणिक गाथा को उस युग का स्मारक कहा जा सकता है, जब आर्य जाति मध्य एशिया में निवास करती थी। कश्यप देव की दो स्त्रियां थीं—दिति और अदिति। दिति की सन्तान दैत्य अर्था असुर हुए और अदिति की देव। पश्चिम में रहने वाली अनार्य जातियां दैत्य कहलाती थीं, और आर्य जाति के लोग देव कहलाते थे। दैत्यों को संस्कृत में दानव भी कहते हैं।
सौंदर्य लहरी
फारसी का दाना ( बुद्धिमान ) शब्द दानव का ही अपभ्रंश दिख पडता है और फारसी में देव शब्द बुरे अर्थों में ग्रहण किया जाता हैं। फारसी में देव शब्द विशाल भयंकर व्यक्ति के लिये प्रयुक्त होता है, जिसे अंग्रेजी में जायंट giant कहते हैं। परन्तु योरोप की भाषाओं में देव शब्द ने अपना स्वरूप तद्रूप ही रखा है, जैसे डिवाइन, डियू ( divine, dieu )। और संस्कृत में दोनों शब्दों का विपरीत और विरोधी अर्थ दोनों की विपरीत और विरोधी मनोवृत्तियों और संस्कृतियों पर प्रकाश डालता है।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से इस गाथा का महत्व समझने योग्य है, इसलिये उसे समझाना हम उचित समझते हैं। यह संसार एक महासागर है, जो अनेक रत्नों की खानि है। प्राकृतिक विज्ञान के विषय ही वे रत्न हैं, जिनको प्राप्त करने के लिये ध्यान रूपी मथनी से उसका मथन किया जाता है। मथनी को घुमाने के लिये उसपर एक रस्सी लपेटी जाती है, वहां वासुकी नाग से यह काम लिया गया था। मन ही वह वासुकी नाग है, जिसने सारे जगत को डस रखा है। उसका मुख बहिर्मुखी और पूंछ अन्तर्मुखी हैं। मुख की ओर असुर बाह्य विषयों की ओर खेंचते हैं, और पूंछ की ओर से देवगण अन्तरात्मा की ओर खेंचते हैं। वृत्तियां भी आसुरी और दैवी विख्यात हैं। तब उस मनरूपी रस्सी को तानकर खेंचने से ध्यानरूपी मथन आरम्भ होता है। आसुरी प्रवृत्ति वाले मनुष्य बहिर्विषयों पर ध्यान जमाकर भौतिक विज्ञान के रहस्यों का उद्घाटन करते हैं और देवता अन्तरात्मा की आध्यात्मिक खोज के लिये चिंतन करते हैं। आत्म ज्ञान अमृत है, ओर भौतिक विज्ञान में
८२ सौन्दर्य लहरी
विष रहता है। आधुनिक वैज्ञानिक रहस्योद्घाटन का फल नश्वर है और उनका प्रयोग जगत के विनाश के लिये ही अधिक किया जाता है। जहां तक उनका संबंध संसारिक वैभव से है, वह भी मानव जाति के यद्यपि सुख की मात्रा बढ़ाने की इच्छा से किया जाता है, परन्तु सुख की वृद्धि के साथ दुःखों की भी वृद्धि करता है। सुख दुःख दोनों बराबरी के साथी हैं, दोनो एक ही सिक्के (मुद्रा) के दो पार्श्व हैं, और दोनों का मूल्य उस सिक्के के बराबर है। अन्तरात्मा में प्रविष्ठ होकर दोनों से मुक्ति पाना ही अध्यात्म मार्ग का ध्येय है। भगवान की मोहिनी माया बहिर्मुखी वृत्ति वालों को सदा अमृत पान से वंचित करती रहती है; यहां तक कि शंकर भगवान की भी समाधि कभी-कभी भंग हो जाती है। शंकर भगवान ने अमृत पान की इच्छा नहीं की, वे तो पूर्व से ही अमर थे, और विष को पीकर भी नहीं मरे, तो भी मोहिनी शक्ति की भ्रांति में कुछ समय के लिये वे भी आ ही तो गये, यह मोहिनी माया इतनी प्रबल है।
इसलिये मुमुक्षुओं को संसार सागर के रत्नों की प्रेयासक्ति छोडकर, तितिक्षा सहित दुःखों को सहन करते रहना चाहिये। आत्मा अमर है, उसे कोई हलाहल मार नहीं सकता।
दुःखों से उद्विग्न न होना और सुखों की स्पृहा का त्याग करना ही स्थितप्रज्ञता का लक्षण है।
भगवान का भगवती की आराधना कर के मोहिनी रूप से भगवती के नारी सौन्दर्य का आश्रय लेना ही उसकी आराधना है।
सौन्दर्य लहरी ८३
हादि विद्या मोक्ष देती है, उसका प्रथम अक्षर ह कार शिव वाचक है। वैष्णवी विद्या में छः कूट होते हैं, प्रथम तीन कूटों में हादि विद्या ज्यों की त्यों है, और अन्य तीन कूटों के प्रथम दो कूटों में ह स के स्थान पर स ह और अन्तिम कूट में स ह पूर्व में जोड़कर षडाक्षरी कूट मंत्र बनाया गया है। इस प्रकार आधा मंत्र शिव प्रधान है और आधा शक्ति प्रधान कर दिया गया है।
भगवान का एक नाम हरि है। ह्+अ+र्+इ इनमें हकार शिव वाचक है, अकार भी ब्रह्मपद वाचक है— अक्षराणामकारोऽस्मि (गीता)। अकार को हटाकर, र में जो ह्रस्व इकार है उसे दीर्घ कर देने से ह्रीं पद बनता है। र कार अग्नि का अक्षर होने से शक्ति वाचक है और दीर्घ ईकार भी, इस प्रकार ह्रीं (लज्जा) पद बनता है। उस पर अनुस्वार रूपी प्राण प्रतिष्ठा करने से मोहिनी माया का रूप बन जाता है। इस प्रक्रिया में पुरुष वाचक अकार को हटाकर और इकार को दीर्घ कर के स्त्रीलिंग बनाया गया है। ह्रीं का अर्थ लज्जा होने के कारण ह्रीं को मोहिनी रूप कहना यथार्थ ही है।
या देवी सर्व भूतेषुविष्णुमायेति शब्दिता नमस्तस्यैः ३ नमो नमः॥
काम देव ने कादि विद्या मूल मंत्र की ही उपासना की थी।
| साध्य सिद्ध विद्या | काम देव प्रजनन शक्ति का देवता है, और ईश्वर की सृष्टि करने की इच्छा से ही उसका उदय होता है। भगवान ने भी कहा है कि |
|---|
धर्म के अविरुद्ध काम मेरा ही रूप है। परन्तु रजोगुण से उत्पन्न होने
८४ सौंदर्य लहरी
के कारण सत्वगुण का वह बाधक भी है । रति उसकी पत्नि है । दोनों का रूप अति सुन्दर है, परन्तु काम देव का शरीर तो इतना सुन्दर है कि रति भी उसके रूप का अपने नेत्रों से सदा चुम्बन किया करती है, अथवा दृष्टि रूपी जिव्हा से उसके रूप का रसास्वाद लिया करती है । कामदेव का सामर्थ्य भी इतना अधिक है कि बड़े-बड़े मुनियों के चित्त को भी क्षुब्ध कर देता है । यह सब भगवती की उपासना का ही फल है, क्योंकि कादि विद्या की उपासना से रूप लावण्य सहित सब ही सिद्धियों की प्राप्ति होती है । ब्लैं रति का मंत्र है व् और ल् उसके नेत्र हैं और ए शक्ति रूप है । उपरोक्त श्लोकोक्त वपुषा पद से व्. 'लेह्येत' पद से ले और 'महतां मुनिनाम्' पद से अनुस्वार लेकर उक्त बीज का उद्धरण किया जाता है, माया बीज और काम बीज के योग से अच्युतानन्द स्वामी ने इस श्लोक से 'ह्रीं क्लीं ब्लैं' इस साध्य-सिद्ध मंत्र का उद्धार किया है । इस मंत्र से हृदय चक्र और महानाद् के ऊपर शक्ति का न्यास किया जाता है । इसका फल सर्व सौभाग्य की प्राप्ति है जैसा कि 'प्रणत जन सौभाग्य जननीं पद से स्पष्ट है ।
अगले श्लोक में कामदेव के सामर्थ्य का वर्णन है ।
( ६ )
धनुः पौष्पं मौर्वी मधुकर मयी पंचविशिखा वसंतः सामन्तो मलयमरुदायोधनरथः ।
## सौंदर्य लहरी
तथाप्येकः सर्वं हिमगिरिसुते ! कामपि कृपा—
मपाङ्गात्ते लब्ध्वा जगदिदमसंगो विजयते ॥
**क्लिष्ट शब्दार्थः—** विशिख = बाण, मौर्वी = रस्सी, अपांग = कटाक्ष ।
**अर्थः—** धनुष्य पुष्पों का बना है, उसकी रस्सी (ज्या) भौरों की बनी है, शब्द स्पर्श रूप रस गंध पांच विषय उसके बाण हैं, वसन्त ऋतु उसका योद्धा सामन्त है, मलयागिरि का शीतल मंद सुगंधित पवन उसका युद्ध में बैठने का रथ है और वह स्वयं अनंग (शरीर रहित) है, ऐसा कामदेव ऐसे शस्त्रों को लेकर सारे जगत को अकेला जीत लेता है । हे हिमगिरि सुते ! यह सामर्थ्य केवल तेरे कटाक्ष से कुछ थोडी सी ही कृपा प्राप्त करने का फल है ।
**सं. टिः—** इस श्लोक से काम बीज क्लीं का उद्धरण किया जाता है, काम से क कार, मलय से ल कार, मौर्वी से ई और पौष्पं से अनुस्वार लेना चाहिये ।
काम देव अनंग है, शंकर ने उसका देह भस्म कर दिया था ।
| काम दहन आख्यान | दक्ष प्रजापति के यज्ञ में अपने पति का अपमान न सहन करने के कारण सती ने अपना देह योगाग्नि से भस्म कर दिया था । ठीक ही तो |
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है, शिव द्रोही,
८६ सौंदर्य लहरी
अपने ईश्वर का निरादर कैसे सहन कर सकती है। प्रजापति से यहां हमारा अभिप्राय राजे महाराजाओं से नहीं है, हमारे विचार से तो प्रत्येक गृहस्थ जो बच्चे पैदा करने में ही कुशल है अपनी प्रजा का छोटा-मोटा प्रजापति ही है। अस्तु। दक्ष प्रजापति के यज्ञ में सती के देह त्याग के पश्चात शंकर दीर्घकालीन समाधि लगाकर बैठ गये, और सती ने पर्वतराज हिमालय के घर जन्म ग्रहण किया। पार्वती ने शिवजी के साथ विवाह करने का हठ किया और उग्रतप करने लगी। तब देवाताओं ने काम देव को शिवजी की समाधि खोलने के लिये भेजा। कामदेव उपरोक्त सेना लेकर सशस्त्र शिवजी के स्थान पर पहुंचा, वहां वसंत ऋतु का प्रादुर्भाव हुआ, मलयागिरि की शीतल मंद सुगंधित वायु चलने लगी, पुष्प खिल गये जिन पर भौंरे गूंजने लगे और काम देव ने अपने पांचों बाणो का शिवजी पर प्रहार किया, बस शिवजी की समाधि खुल गई। उन्होंने सामने कामदेव को एक झाड के पीछे खड़ा देखा। उसको अपनी समाधि में विघ्नरूप देखकर शिवजी ने तीसरा ज्ञान नेत्र खोला और ज्ञानाग्नि से उसे भस्म कर दिया, तब से काम अनंग हो गया है। उसकी पत्नि रति ने पार्वती से अपना शोक सुनाया, भवानी ने कृपा कर के उसे फिर जीवित कर दिया। अब वह अनंग होने पर भी कामियों को अपने प्रभाव से पराजित कर के सारे जगत का विजेता कहलाता है। प्रभव के लिये मैथुनिक सृष्टि की आवश्यकता है, और काम के बिना सृष्टि प्रभव संभव नहीं। भगवान ने भी कहा है।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ।
सौंदर्य लहरी ८७
परन्तु वह समाधि के लिये बहुत बड़ा विघ्न है, बड़े-बड़े योगियों को भी पथ भ्रष्ट कर देता है। जो शंकर की भी समाधि खोल सकता है, उसकी दुर्जेयता प्रत्यक्ष ही है। काम वासना का क्षय ज्ञान के उदय होने पर ही होता है, इससे पूर्व नहीं। यह ही इस आख्यायिका का अभिप्राय है। श्लोक में काम को सारे जगत का विजेता कहने से, साधकों का लक्ष्य काम वासना के प्रभाव की ओर आकर्षित करना है, जो भगीरथ प्रयत्नों से भी शमन किया जान कठिन है। परन्तु कामदेव का सारा सामर्थ्य भगवती के अति स्वल्प कृपा कटाक्ष का ही तो फल है, इसलिये मुमुक्षु साधकों को इस दुर्जय शत्रु से बचने के लिये भगवती की ही शरण में जाना चाहिये। भगवती के ध्यान मात्र से रक्षा हो सकती है।
इसलिये अगले श्लोक में भगवती का ध्यान बताया जाता है:—
[ ७ ]
क्वणत्कांचीदामा करिकलभ कुंभस्तन नता
परिक्षीणा मध्ये परिणतशरच्चन्द्र वदना ।
धनुर्बाणान् पाशं सृणिमपि दधानाकरतलैः
पुरस्तादास्तां नः पुरमथितुराहो पुरुषिका ॥
कठिन शब्दों का अर्थ:— कांची=मेखला जो स्त्रियां कटि पर पहनती हैं। दाम=बंधनी, तगड़ी, कलभ=बच्चा, सृणि=अंकुश
| ६६ | सौंदर्य लहरी |
|---|
अर्थः— कटि पर क्कण क्कण शब्द करने वाले घूंघुरुओं युक्त मेखला बांधे हुए, हाथी के बच्चे के मस्तक पर निकले हुए कुंभ सदृश स्तनों के भार से झुकी हुई, मध्य भाग में पतली, शरद ऋतु की पूर्णिमा के चन्द्रमा जैसे मुख वाली, चारों हाथों में धनुष, ५ बाण, पाश, और अंकुश धारण किये पुरारि की आहो पुरुषिका हमारे सामने (ध्यान में) रहें ।
सं० टि० आहो पुरुषिका= पुरमथितुः शिवस्य अहंकार रूपा । त्रिपुरारि अर्थात् जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तीनों से अतीत ब्रह्म स्वरूप में अहम् विमर्ष का व्युत्थान होना यहां अभिप्रेत है । इस श्लोक से ब्लूँ बीज ग्रहण किया जाता है, बाण से ब्, करतल से लू, मथितुः से उ और आस्तां से अनुस्वार ।
देवताओं का ध्यान खडी हुई स्थिति में किया जाता है, इसलिये सनातन धर्मावलंबियों के मंदिरों में खडी मूर्तियां प्रतिष्ठित की जाती हैं । इसका अर्थ यह है कि खडी स्थिति में उपासक की दृष्टि चरणों पर पडती है और बैठी हुई मूर्ति के मुख पर । ध्यान चरणों का ही अभीष्ट है, पूजन भी चरणों का ही करना चाहिये ।
पुरारि या त्रिपुरारि शंकर को कहते हैं । जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति तीन पुर हैं, शंकर तीनों अवस्थाओं के बैरी है, क्योंकि वे सदा समाधिस्थ रहते हैं। मोक्ष ब्रह्म लीनता का नाम है, ब्राह्मी अवस्था में समस्त तीनों लोकों का एवं जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं का लय हो जाता है । कहा है:—
सौन्दर्य लहरी ८९
न यत्र वाचो न मनो न सत्त्वं तमो रजो नो महदादयोऽमी
न प्राणबुद्धीन्द्रिय देवतावा न सन्निवेशः खलुलोक कल्पः ।
न स्वप्न जागर्र्न हितत्सुषुप्तं नखंजलंभूरनिलोऽग्निरर्कः
संमुप्त वच्छून्य वदप्रतर्क्यं तन्मूलभूतं पदमामनन्ति ॥
— श्रीमद्भागवत ।
अर्थः— जहां न वाक शक्ति है, न मन, न सत्व, तमोगु रजोगु न ये महदादि हैं। न कर्मेन्द्रियों अथवा ज्ञानेन्द्रियों के देवता हैं और निश्चय ही न लोकों की कल्पना रूपी प्रतीति । न वह स्वप्न है न जाग्रत और सुषुप्ति, न वहां आकाश, जल, पृथिवी, वायु, अग्नि या सूर्य है । सुषुप्तिवत् शून्यवत् अप्रतर्क्य ही व मूल-भूतपद है ।
आहोपुरुषिका पद भगवती के लिये प्रयुक्त किया गया है।
| माया का<br>बन्धन | आहो आश्चर्य सूचक पद है, और पुरुषिका पुरुष का स्त्रीलिंग भाव वाचक पद है । अर्थात भगवती का रूप आश्चर्यमय है। आत्मा प्रकृति से असंग |
है, असंगोऽयमात्मा यह सांख्य वेदान्त का मूल सिद्धान्त है। परन्तु उपाधि से उस ही में संसारी जीवात्मशक्ति का भी भाव है। भगवान् ने उसे परा प्रकृति इसी नाते कहा है।
अपरेयमितस्त्वन्यां विद्धि मे प्रकृतिं परां ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ गीता (७,५)
जैसे स्फटिक के ऊपर सन्निधि में आये हुए पदार्थों के रंग की छाया पडकर उसे अपने रंग से रंजित कर देती है, वैसे ही
३० सौंदर्य लहरी
आत्मा भी प्रकृति के संसर्ग से संसारी पुरुष दिखने लगता है । पुरुषिका पद में यह ही भाव निहित है । माया कला के स्तर पर काल, कला, नियति, विद्या और राग इन पांच कंचुकों के आवरणों से स्फटिक सदृश आत्मतत्त्व सोपाधिक होने पर प्रकृति के रंग में रंगा हुआ दिखने लगता है, और भगवती महामाया मनरूपी इक्षु धनुष पर, जिस पर संकल्प रूपी भौरों की प्रत्यंचा चढी है, शब्द-स्पर्श रूपरस गंधात्मक पांच विषय रूपी बाणों को चढाकर पुरुष का आखेट करती है, राग रूपी पाश से बांधती है और क्रोध रूपी अंकुश से ताडन करती है । परन्तु उसका अंकुश भी मां का क्रोध होने के कारण खांड का बना हुआ है । इस प्रकार वह पुरुष को अपरा प्रकृति के स्तर पर बांध देती है । इक्षु मधुर रस से भरा रहता है, इसलिये आनन्द रस के भोगी मन को इक्षु धनुष से उपमित किया गया है, मन में सदा संकल्प विकल्प रूपी भौंरे उडते रहते हैं, उनको धनुष की प्रत्यंचा से उपमा दी गई है । जैसे वे पुष्पों के मकरन्द की कामना से आकाश में गुंजारते रहते हैं, वैसे ही मन की संकल्पात्मिका वृत्तियां विषयों की वासना से चित्ताकाश को प्रतिध्वनित करती हुई उडती रहती हैं । पांचों ज्ञानेन्द्रियों से संबंधित ५ प्रकार के विषय शब्द स्पर्श रूप रस गंधात्मक पांच पुष्प बाण हैं । राग अर्थात् आसक्ति रूपी ही वह पाश है जिससे सारा जगत् बंधा पडा है, क्रोध अथवा द्वेष प्रकृति का अंकुश है, जिससे विद्ध कर मनुष्य कौनसा पाप-कर्म करने को बाध्य नहीं हो जाता । इस प्रकार पुरुष को पशु के सदृश वश में रखकर उससे प्रकृति अपने सृष्टि क्रम का कार्य कराती है । भौरों
सौंदर्य लहरी ९१
की प्रत्यंचा पर चढ़े हुए उपरोक्त पांच पुष्प बाण वाला इक्षु धनुष कामदेव का भी अस्त्र है, और कामिनी स्त्री स्वयं शक्ति का ही रूप है। इसलिये कामी मनुष्यों को भोगासक्ति में फंसाने के लिये मानो महामाया ने अपना ही धनुष कामदेव को दे दिया है, क्योंकि बिना ऐसे अस्त्र के भगवान् का सनातन अंश बंधन में नहीं आ सकता था।
भगवान् की लीला विचित्र है, अपनी ही शक्ति से वह स्वयं ही बंध जाता है। पारमार्थिक दृष्टि से वह स्वयं स्त्री है और स्वयं पुमान्, आत्म तत्त्व में लिंग भेद का भाव नहीं। वह स्वयं माया है और स्वयं मायावी, स्वयं नट है और स्वयं दर्शक, स्वयं ईश्वर है और स्वयं दास। कृष्ण राधा है और राधा कृष्ण, राम सीता है और सीता राम, शिव शक्ति है और शक्ति स्वयं शिव। इसी प्रकार आप ही रति है और आप ही काम।
सब प्राणि मात्र का अन्तरात्मा एक ईश्वर स्वयं ही है, जो एक रूप से अनेक हो रहा है, जैसा कि उसका आदि संकल्प था, एकोऽहम् बहुस्यां प्रजायेयेति ।
इस लिये साधक जनों को महामाया के आखेट से बचने के लिये कामिनी के काम बाणों से बचना चाहिये और भगवती के चरणों का हृदय में ध्यान करना चाहिये। और
पर तिय ककार तजहु गुसाईं। ज्यों चौथ चन्दा की नाईं ॥ तुलसीदास
क्योंकि, विद्या समस्तास्तव देवि भेदाः, स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु।
९२ सौंदर्य लहरी
भगवती के नीचे के वाम हस्त में पाश, और ऊपर के वाम हाथ में धनुष, दक्षिण हाथों में नीचे अंकुश और ऊपर ५ बाण हैं।
अगले श्लोक में भगवती के ध्यान के लिये पीठ का वर्णन किया गया है।
[ ८ ]
सुधासिन्धोर्मध्ये सुरविटपिवाटीपरिवृते
मणिद्वीपे नीपोपवनवति चिन्तामणिगृहे।
शिवाऽऽकारे मंचे परमशिवपर्यङ्कनिलयां
भजन्ति त्वां धन्याः कतिचन चिदानन्दलहरीम् ॥
**कठिन शब्दोंका अर्थ:—**शिवाकारे=त्रिकोणाकृति, निलय=आलय
अर्थ:— सुधा के समुद्र के मध्य, कल्प वृक्षों की वाटिका से घिरे हुए मणि द्वीप में, नीप वृक्षों के उपवन के बीच चिन्ता-मणियाँ के बने घर में, त्रिकोणाकृति मंच पर, परम शिव के पलंग पर विराजमान चिदानन्द लहरी स्वरूप तेरा, कोई बिरले मनुष्य भजन करते हैं, वे धन्य हैं।
सं० टि० शिवाकारे=शिव+आकारे अथवा शिवा+आकारे । यहां हृदय में आनन्दावेष की अनुभूति की ओर लक्ष्य कराया गया है। ॐ कार में अ+उ+म्+नाद+बिन्दु+शान्ति ( कला )+शान्त्यातीता सात मात्रा मानी जाती हैं। अ ब्रह्मा, उ विष्णु, म् रुद्र, नाद ईश्वर,
सौन्दर्य लहरी ९३
बिन्दु सदाशिव, शान्ति शक्ति और शान्त्यातीत शिव हैं । प्रथम चार मंच के चार पाये, बिन्दु चद्दर, और शिवाकार मंच पर विराजने वाली चिदानन्द लहरी, अथवा परम शिव पर्यंकनिलया चिदानन्द लहरी है ।
भगवती के भजन से प्राप्त चिदानन्द के आवेशों का अनुभव करने वाले साधक थोडे ही होते हैं। वे वास्तव में धन्य हैं जिन पर भगवती की ऐसी कृपा होती है भगवती का ध्यान परम शिव के साथ करना चाहिये, यह बात पूर्व श्लोकोक्त पुरमथितुराहो-पुरुषिका पद से भी प्रगट होती है । सत्य बात तो यह ही है कि सच्चिदानन्द के आनन्दावेशों की अनुभूति में स्वयं भगवती की ही कृपा की अनुभूति है, अर्थात् परम ब्रह्म के शून्य अव्यक्त सत्स्वरूप आकाश में शून्य रूपी पलंग पर चिदानन्द की लहरी विराजती है । पलंग एक त्रिकोण मंच पर बिछा हुआ है, मंच चिन्तामणियों के बने हुए घर में स्थित है, घर के चारों ओर नीप वृक्षों का उपवन है, वह उपवन एक मणियों के द्वीप पर लगाया गया है । द्वीप के चारों किनारों पर कल्पवृक्षों का घेरा है, और वह द्वीप अमृत के समुद्र में स्थित है । ऐसा भगवती के रहने का स्थान है ।
निःस्पन्द परम शिव आनन्द ब्रह्म परं पद सुधासिंधु है, और चिदानन्द लहरी स्वयं चिति शक्ति है । जिसका स्थान सहस्रार पद्म में हैं। सहस्रार ही वह मणि जटित द्वीप है, जिसके चारों ओर कल्प वृक्षों का घेरा है और मध्य में नीप वृक्षों का उपवन है, जिसमें चिन्तामणियों से घर बनाया गया है, उसमें ▽ त्रिकोणाकृति
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- सौन्दर्य लहरी
अकथ अथवा गुरु चक्र रूपी मंच पर बिन्दु रूपी पलंग बिछा हुआ है। वहां सच्चिदानन्द की प्रथम स्पन्द स्वरूपा चिदानन्द लहरी शिव के साथ विहार करती है। जिसका उल्लेख अगले श्लोक में आयगा। अकथ त्रिकोण चक्र की तीनों भुजाओं के बाहर क्रमशः १६ स्वर, क से त तक १६ व्यंजन, और थ से स तक १६ अक्षर विराजते हैं, और तीनों कोगों में ह क्ष ळ तीन अक्षर हैं। अ, क, थ से युक्त अन्य १५ अक्षरों के कारण, तीनों भुजाएं इन अक्षरों से नामांकित की जाती हैं और चक्र का नाम अकथ कहा जाता है। अकथ का अर्थ अकथनीय अथवा अनिर्वचनीय होता है। सब वर्ण चिन्तामणियों के सदृश हैं जिनसे यह घर बना है। इसके चारों ओर सहस्र अरे (radii) नीप वृक्ष हैं और उनसे उदय होने वाले संकल्प कल्प वृक्ष हैं। भगवती के पलंग का वर्णन ९२ वें श्लोक में देखें। वहां हरि, रुद्र, ब्रह्मा और महेश्वर को पलंग के चार पाये बताया गया है और सदाशिव को पलंग पर बिछाने की चद्दर से उपमा दी गई है। अथवा ॐ पलंग है और अ, उ, म् और अनुस्वार उसके चार पाये हैं। अथवा मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर और अनाहत् चक्र चार पाये हैं और विशुद्ध चक्र उस पर बिछी चादर है। और देह श्री चक्र है। श्री चक्र भगवती का निवास स्थान माना जाता है, देखें श्लोक ११। श्री चक्र में बिन्दु को पलंग का स्थान, त्रिकोण को अकथ चक्र, ४३ त्रिकोणों को नीप वृक्ष और ४ श्री कंठ और ५ शिवयुवतियों को कल्प वृक्ष समझना चाहिये।
इस श्लोकोक्त 'चिदानन्द लहरी' पद के कारण प्रथम ४१ श्लोकों के पूर्व ग्रंथ को आनंद लहरी कहते हैं। आनन्द से 'क,'
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