भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

सौन्दर्य लहरी ९९


वहां विद्युत् का रूप धारण कर लेती है। जैसे ग्रीष्म ऋतु में जल का वेध होकर वर्षा ऋतु में मेघों में विद्युत् प्रकट हुआ करती है। योनिस्थान में प्रदीप्त अग्नि नीचे मूलाधार में पृथिवी तत्व को तपाता है और ऊपर स्वाधिष्ठानस्थ जल को। जल बाष्प बन कर मणिपूर (नाभिचक्र) में मेघवत् आच्छादित हो जाता है और वहां अग्नि का वेध होकर वह विद्युत् का रूप धारण कर लेती है। देखें श्लोक ३९, ४०। ग्रीष्म ऋतु में गरमी से पृथिवी तप्त होकर जल सूखने लगता है, यह जल का वेध है। वर्षा में वह ही जल मेघों के रूप में परिणत हो जाता है, और उनके ताप से विद्युत् प्रकट होती है, यह अग्नि का वेध है।

*चक्रों का स्थान मेरुदंड (spinal bone) के भीतर नीचे से मस्तिष्क तक उठने वाली सुषुम्ना नाड़ी (spinal cord) में है। इसके द्वारा शरीर की नाड़ियों का मस्तक से संबंध है। गुदा के पीछे एक मांसपेशी है, जिसे कंद कहते हैं, उसकी नाभि अर्थात् केन्द्र में कुण्डलिनी स्वयंभूलिंग पर साढ़े तीन कुंडल डाले सोती रहती है। जागकर वह स्वाधिष्ठान चक्र में रहने लगती है। उस अवस्था में जीव को बिन्दु रूपी शिव कहते हैं और कुंडलिनी को जीव रूपा शक्ति।

आज्ञा चक्र में चढ़कर वह ही परमात्मा रूपा शक्ति त्रिपुरा कहलाती है जो सहस्रार में शिव के साथ सायुज्यता प्राप्त कर लेती


* चक्रों और नाडियों की सविस्तार जानकारी के लिये लेखक का अंग्रेजी ग्रंथ Divine Power पढ़ें।

१०० सौन्दर्य लहरी

है। षट् चक्र बेध के पूर्व शक्ति का रूप जीवात्मिका और षट् चक्र बेध के पश्चात् शिवात्मिका समझना चाहिये। जीवात्मिका का स्थान स्वाधिष्ठान और शिवात्मिका का स्थान विशुद्ध चक्र हैं।

मूलाधार और स्वाधिष्ठान को अग्नि खंड, मणिपूर और अनाहत को सूर्य खंड और विशुद्ध एवं आज्ञा चक्र को चन्द्र खंड कहते हैं। योनिस्थान अग्नि की, अनाहत सूर्य की और आज्ञा चंद्र की पीठ कहलाती हैं। अग्नि खंड में रुद्र ग्रंथि, सूर्य खंड में विष्णु ग्रंथि, और सोम खंड में ब्रह्म ग्रंथि कहलाती हैं।

अन्तरिक्षगतो वह्निर्वैद्युतः स्वान्तरात्मकः ।
नभःस्थः सूर्यरूपोऽग्नि नीभेमंडलमाश्रिताः ॥
(यो शि ५, ३२)

विषं वर्षती सूर्योऽसौ स्रवत्यमृतमुन्मुखः ।
तालु मूले स्थितश्चन्द्रः सुधां वर्षत्यधो मुखः ॥
(५, ३३)

अर्थः— अन्तरिक्ष में उठकर अग्नि विद्युत् रूप हो जाती है, जो अपना अन्तरात्मा है। आकाश में स्थित अग्नि सूर्य रूप है, यह नाभि मण्डल (मणिपूर और अनाहत्) में आश्रित है, नीचे की ओर मुख रहने पर वह विष की वर्षा करता है और ऊपर की ओर मुख होने पर अमृत का स्रवण करने लगता है। तालू के मूल स्थान (आज्ञा) पर चन्द्रमा का स्थान हैं, उसका मुख नीचे की ओर है और वह अमृत की वर्षा किया करता है। अनाहत् चक्र के १२ दल १२ आदित्य कहलाते हैं। उर्द्धमुख सूर्य और अधो-

सौंदर्य लहरी१०१

मुख चन्द्र के बीच में विशुद्ध चक्र के १६ दल चन्द्रमा की १६ कलाओं के सदृश चमकने लगते हैं। कुण्डलिनी शक्ति जागकर जब सूर्य मण्डल से ऊपर चढती है, तब सूर्य को ऊर्ध्वमुख कर देती है। फिर कुण्डलिनी शक्ति उससे भी ऊपर जाकर चन्द्र मण्डलका बेध करती हुई सहस्रार में उठती है, तब चन्द्रमा भी अमृत की वर्षा करने लगता है और सारे देह की नाड़ियां उस अमृत से भर जाती हैं और योगी का शरीर दिव्य बन जाता है।

अवसरण अर्थात अन्वय भूमिकावेध के समय शक्ति की गति मूलाधार से सहस्रार की ओर होती है जिसका वर्णन ऊपर के श्लोक में दिया गया है। सहस्रार से नीचे उतरते समय वह नाड़ियों को अमृत से सींचती हुई मूलाधार की ओर लौटती है। आरोह को उन्नेय भूमिका और अवरोह को अन्वय भूमिका कहते हैं। प्रत्यावृत्ति भूमिका से कुण्डलिनी का नीचे उतर कर अपने स्थान पर गुहा में लौट आने का अभिप्राय है। गत श्लोक में उन्नेय भूमिका का वर्णन किया गया है और अगले श्लोक में अन्वय और प्रत्यावृत्ति भूमिकाओं का वर्णन है इनको अप्यय और प्रभव क्रम भी कहते हैं। दोनों के सिद्ध होने पर योग की सिद्धि होती है। कहा है 'योगोहि प्रभवाप्ययौ' कठोपनिषत् । यह उभय क्रम कुण्डलिनी सोपान रहस्य के नाम से प्रसिद्ध है।

[ १० ]

सुधाधाराऽऽसारैश्चरण युगलान्तर्विगलितैः
प्रपंचं सिञ्चन्ती पुनरपि रसाम्नाय महसा।

१०२ | सौंदर्य लहरी

अवाप्य स्वां भूमिं भुजगनिभमध्युष्टवलयं
स्वामात्मानं कृत्वा स्वपिषि कुलकुण्डे कुहरिणि ॥

अर्थः— अमृत धाराओं की वर्षा से, जो तेरे दोनों चरणों के बीच से टपकती हैं, प्रपंच को सींचती हुई फिर छओं आम्नायों से होती हुई अथवा छओं चक्रों द्वारा सींचती हुई, अपनी भूमि पर उतरकर अपने आप को सर्पिणी के सदृश साडेतीन कुंडल डालकर, हे कुहरिणि ! तू कुल कुंड में सोती है ।

स० टि० यहां पर कुण्डलिनी का सहस्रार में कुछ समय ठहर कर फिर अपने स्थान में उतर आना दिखाया गया है । रस=छः चक्र, आम्नाय=विधान, महस्=प्रकाश । प्रपंच=देह, पिण्ड । कुल कुण्ड=कुण्डलिनी के रहने का कुंड, कुहरिणी= गुहा में रहने वाली । (कुहर=गुहा ।)

पूर्व श्लोक की संगति से इस श्लोक का भाव स्पष्ट है कि मूलाधार से जागकर सुषुम्ना मार्ग द्वारा जब कुँडलिनी हृदयस्थ सूर्य को उन्मुख करती हुई आज्ञा चक्र के ऊपर चन्द्रमंडल में प्रवेश करती है, तब उसके चरणद्वय के बीच से अमृत की धारायें नीचे बरसने लगती हैं। यहां भगवती के चरणों का ध्यान आज्ञा चक्र में किया जाना बताया गया है ।

शक्ति के अवतरण के साथ सब नाडियों का भिन्न-भिन्न चक्रों के द्वारा अमृत के प्रवाह से सारे शरीर में आनखशिख सिंचाव होता है । जिस मार्ग से शक्ति का आरोहण होता है उसी मार्ग से

सौंदर्य लहरी १०३

अवतरण होकर वह फिर अपने स्थान पर सर्पाकार साढ़ेतीन कुण्डल डालकर सो जाती है । इसके दो अर्थ हो सकते हैं । या तो सारी शक्ति ऊपर उठ जाती है और मूलाधार में शक्ति का कुंडलिनी रूप में उसके उठने से अभाव हो जाता है, और फिर लौटने पर वह फिर सो जाती है । दूसरा विकल्प यह हो सकता है कि मूलाधार में अनन्त शक्ति है, इसलिये वहां पर रहने वाले भंडार में कभी कमी नहीं होती, जागकर शक्ति ऊपर भी जाती आती रहती है और नीचे भी बनी रहती है। हमारी समझ में दूसरा विकल्प सत्य जान पड़ता है क्योंकि यदि सारी शक्ति सहस्रार में उठ जाय तो उत्थान के साथ शरीर का आधार न रहने के कारण वह तुरन्त प्रति प्रसव क्रम से लीन हो जाना चाहिये । प्रपंच का अर्थ शरीर अथवा नाडी जाल किया जाता है, दोनों पक्ष में एक ही परिणाम समझना चाहिये । क्योंकि नाडियों द्वारा सारा शरीर पुष्ट होता है, केवल नाडियां ही नहीं। नाडियों की संख्या प्रश्नोपनिषत् में इस प्रकार दी गई है।

अत्रैत दे कशतं नाडिनां तासां शतशतमेकैकस्यां द्वासप्ततिः २ प्रतिशाखा नाडी सहस्राणि भवन्ति । प्रश्न० ( ३,६ )

रसाम्नाय महसा के स्थान पर रसाग्नाय महसः पाठान्तर भी मिलता है । उसका अर्थ नीचे दिया जाता है । तांत्रिक परिभाषा के अनुसार इस पाठान्तर पद का अर्थ 'अमृत के प्रकाश से चमकने वाला चन्द्रमा' होने के कारण श्लोक का भावार्थ इस प्रकार होगा कि शक्ति चन्द्र मण्डल से नीचे उतर आती है, और अपनी भूमि

१०४ | सौंदर्य लहरी

पर आकर ३।। कुण्डलाकृति सर्पिणीवत् सो जाती है। कुल का अर्थ शक्ति समझना चाहिये और कुण्ड से उसके रहने का कुंड सदृश स्थान समझना चाहिये। कुहरिणी का अर्थ कुहर अर्थात् बिल में रहने वाली है। कुहर बिल, छिद्र अथवा रंध्र को कहते हैं। नाडियों द्वारा प्रपंच का सींचे जाने का संबन्ध छःओं चक्रों के द्वारा होने के कारण रसाम्नायमहसा का अर्थ जैसा हमने किया है उचित प्रतीत होता है। रस पद से छः और आम्नाय पद से 'मार्ग' अर्थ लेने से यह अर्थ किया गया है। आम्नाय का अर्थ मार्ग दिखाने वाले वेद, और गुरु परम्परा गत संप्रदायोपदेश हैं। और महस् का अर्थ उत्सव और तेज दोनों है (महस्तूत्सवतेजसोः, इति अमरः) इसलिये पूरे पद का तृतीयांत अर्थ छः तेजोमय आम्नायों के द्वारा, अथवा रस (अमृत) से पूर्ण तेजोमय आम्नाय द्वारा होगा, पंचमी विभक्ति में 'द्वारा' की जगह 'से' लगाना पड़ेगा। आम्नाय से चाहे चन्द्र अथवा चक्र समझा जा सकता है। महस् का अर्थ उत्सव भी किया जा सकता, उस पर्याय में शक्ति का शिव के योग से अमृत सिंचन रूपी उत्सव समझना चाहिये। तांत्रिक पद्धति के अनुसार उपासना के पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, ऊर्द्ध और वाम छः आम्नाय हैं, उन सबका फल शक्ति का जागरण होकर समाधि प्राप्त करना ही है। उक्त आम्नाय गुरु परम्परागत उपदेश से जानने चाहिये।

सौंदर्य लहरी १०२


श्रीचक्र

अगले श्लोक में श्रीचक्र का निरूपण करके बहिर्याग का संकेत है।

(११)

चतुर्भिः श्रीकण्ठैः शिवयुवतिभिः पंचभिरपि
प्रभिन्नाभिः शंभोर्नवभिरपि मूल प्रकृतिभिः ।
त्रयश्चत्वारिंशद्वसुदल कलाश्र त्रिवलय–
त्रिरेखाभिः सार्ध तव शरण (भवन) कोणाःपरिणताः

**नोटः—**कोष्ठकों में पाठान्तर दिया गया है ।

**अर्थः—**चार श्रीकंठ और पांच शिवयुवतियां, इन ९ मूल प्रकृतियों से तेरे रहने के ४३ त्रिकोण बनते हैं, जो शंभु के विन्दुस्थान से भिन्न हैं । वे तीन वृत्तों (circles) और तीन रेखाओं सहित ८ और १६ दलों से युक्त हैं ।

**सं० टि०—**यहां बहिर्याग का वर्णन है। श्रीचक्र के बनाने के तीन भेद होते हैं, मेरु, कैलाश और भूः । तीन भेदों मे शक्तियों के स्थानों और पूजन विधि में अन्तर है। मेरु श्रीचक्र में उसका १६ नित्या कलाओं से, कैलाश के प्रतीक स्वरुप श्रीचक्र में उसको ८ मातृका शक्तियों से और भूः के प्रतीक स्वरुप श्रीचक्र में उसे ८ वशिनी-देवियों से संबंधित चक्र समझा जाता है। तैत्तिरीयारण्यक में कहा है कि पृश्नि ऋषियों ने श्रीचक्र की पूजा की थी और उसकी सहायता

१०६ | सौंदर्य लहरी


से कुण्डलिनी का जागरण करके सहस्रार में शक्ति को उठाया था। इससे विदित होता है कि यह वैदिक मार्ग है।

श्रीचक्र ब्रह्मांड और पिण्ड दोनों का प्रतीक होता है, इसकी रचना ४ श्रीकंठ अर्थात् शिव त्रिकोण और ५ शिवयुवति अर्थात् शक्ति त्रिकोणों के योग से होती है। शिव और शक्ति त्रिकोणों का मुख एक दूसरे के विपरीत रहता है, जैसे ⧖। सृष्टि क्रम में ५ शक्ति त्रिकोण ऊर्ध्वमुख होते हैं और ४ शिव त्रिकोण अधोमुख और अप्यय क्रम में शक्ति त्रिकोण अधोमुख और शिव त्रिकोण ऊर्ध्वमुख रखे जाते हैं। प्रथम केन्द्रीय त्रिकोण को जिसके केन्द्र में शंभु का स्थान है, छोड़ कर शेष त्रिकोणों की संख्या ४२ हैं। इसलिये त्रयश्चत्वारिंशत् पाठ ठीक है। प्रथम मध्य त्रिकोण के बाहर चारों ओर दूसरे नंबर पर ८ कोण बनते हैं, उसको अष्टकोण कहते हैं, फिर तीसरे और चौथे स्तर पर दस २ कोण बनते हैं उन्हें अन्तर्दशार और बहिर्दशार कहते हैं, उनके ऊपर १४ कोण बनते हैं, उनको चतुर्दशार कहते हैं। सबका योग १+८+१०+१०+१४ = ४३ होता है। मध्य केन्द्रीय बिन्दु शंभु का स्थान है जो प्रकृति स्वरूप ९ त्रिकोणों के योग से रचित पूरे चक्र से पृथक् अर्थात् असंग है। उक्त ४३ कोणों के चक्र के बाहर प्रथम वृत्त (circle) पर अष्ट दल पद्म और उसके बाहर दूसरे वृत्त पर षोडश-दलपद्म हैं, षोडशदलपद्म तीन वृत्तों से घिरा है। सबके बाहर तीन रेखाओं का चतुष्कोण है, जिसे भूगृह कहते हैं। भूगृह की चारों भुजाएं बराबर हैं और चारों दिशाओं में ४ द्वार होते हैं। इस श्लोक में द्वारों का उल्लेख नहीं किया गया है।

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सौंदर्य लहरी | १०७

३६ तत्व जिनका वर्णन हम ऊपर प्रथम श्लोक के नीचे कर आये हैं, सप्त धातुओं सहित ४३ हो जाते हैं। सात धातुओं के नाम ये हैं—रक्त, मांस, मेदा, स्नायु, अस्थि, मज्जा और शुक्र।

५ शिवयुवतियां शान्त्यातीतादि ५ कलायें अथवा शक्ति, शुद्धविद्या, माया, कला और अशुद्धविद्या हैं और ४ श्रीकंठ, सदारव्य, महेश्वर, महत्तत्व और पुरुष (जीव) हैं अथवा पुरुष, अव्यक्त, महत् और अहंकार ४ श्रीकंठ हैं, जिनके साथ शब्दस्पर्शादि ५ तन्मात्रायें शिवयुवतियां माननी पडेंगी।

गीता में भगवान ने नवधा प्रकृति का वर्णन किया है, एक जीव-भूता परा प्रकृति और अष्टधा अपरा प्रकृति। वहां आकाशादि से ५ तन्मात्रा और मन, बुद्धि, अहंकार से समष्टि अहंकार, महत् और अव्यक्त क्रमशः समझना चाहिये। देखें गीता अध्याय ७ के श्लोक ४, ५ पर शंकर भाष्य।

श्रीचक्र के उपरोक्त क्रम से ९ विभाग किये जाते हैं, जिनमें विन्दु प्रथम है और मध्यस्थ त्रिकोण दूसरा इत्यादि और प्रत्येक विभाग को आवरण कहते हैं। श्रीचक्र का विशेष विवरण साथ दिये हुए विवरण पत्र (chart) पर देखें।

श्री चक्र निर्माण की विधियह विधि सौन्दर्य लहरी के भाष्यकार कैवल्य शर्मा के मतानुसार है। श्री चक्र मनुष्य देह का प्रतीक है और मनुष्य देह का माप अपनी अंगुलियों के नाप से ९६ अंगुल प्रमाण होता है। इसलिये श्री चक्र का माप भी ९६ इकाइयों पर रखा जाता है। एक ८ इंच

१०८ सौन्दर्य लहरी


लंबी भुजाओं वाला समचतुष्कोण लो, उसके बीचोंबीच में एक खडी रेखा खेंचो, जो चतुष्कोण को दो सम भागों में विभक्त करती हो। उस रेखा के प्रति इंच के १२ विभाग के अनुपात से ९६ सम विभाग करलो। इस चतुष्कोण के भीतर एक एक विभाग छोडकर दो वैसे ही सम चतुष्कोण और बनाओ, इन तीन चतुष्कोणों का भूगृह नामक त्रैलोक्य मोहन चक्र कहलाता है। चारों दिशाओं में मध्य में एक एक द्वार खोल देना चाहिये। अब उस मध्यवर्ती खडी रेखा के मध्य विन्दु को केन्द्र मानकर ४५, ४४ ३/८, ४४, ३५ और २४ विभागों के बराबर अर्धव्यास मानकर पांच वलयाकार वृत्त ( circles ) खेंचो। सब से अन्दर के वृत्त पर अष्ट दल पद्म और उसके ऊपर वाले वृत्त पर षोडषदल पद्म बनाओ। बीच के शेष वर्तुलाकार क्षेत्र में ५ उर्ध्व त्रिकोण और ४ अधस्त्रिकोण बनाने से पूरा श्री चक्र बन जाता है। इन ९ त्रिकोणों का निर्माण इस प्रकार किया जाता है। मध्य रेखा पर ऊपर से नीचे की ओर ६, ६, ६, ३, ४, ३, ३, ५, और ६ विभागों के अन्तर पर ९ चिन्ह बनालो। जिनको हम यहां पर कै, गै, चै, जै, टै, डै, तै, दै, और पै, से नामांकित करते हैं। इन चिन्हों पर ऊर्ध्व रेखा पर सम कोण बनाने वाली और अन्तर्वृत्त ( innermost circle ) के १० खंड करने वाली कोटि रेखायें ( chordlines ) खैंचो। उन के नाम भी क्रमशः कै, गै, चै, जै, टै, डै, तै, दै, और पै वाली रेखाएं समझना चाहिये। फिर उन रेखाओं के दोनों सिरों पर से नीचेबताए हिसाब से दोनों ओर सम भाग मिटा दो। कै और पै रेखाओं का ५/१६ भाग दोनों सिरों पर अर्थात पूरी रेखा

श्रीचक्रम्

(श्रीचक्र का रेखाचित्र)

सृष्टियोगेन चक्रमिदम्

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सौंदर्य लहरी १०९


का १/८ भाग मिटाना है। गै रेखा के सिरों पर से ५/८८ वां और र्द रेखा के सिरों से ७/३२ भाग, जैं और र्ड रेखाओं के सिरों पर से ३/८ भाग और टें रेखा के सिरों पर से ३/८ भाग मिटा दो, चै और तैं रेखाएं पूरी रहेंगी। खडी रेखा पर कं बिन्दु के ६ विभाग ऊपर वाले अन्तर्वृत्तस्थ बिन्दु को स मानों और पें बिन्दु से ६ विभाग नीचे वाले अन्तर्वृत्तस्थ बिन्दु को ह मानो। ह को चै वाली रेखा के सिरों को मिलाने से चौथा श्रीकंठ (शिव-त्रिकोण) बनता है, पें बिन्दु को गै रेखा के मिटाने के पश्चात् नये सिरों को मिलाने से तीसरा, र्द बिन्दु को जैं रेखा के मिटाने के पश्चात् नये सिरों को मिलाने से दूसरा, और तैं बिन्दु को कें रेखा के नये सिरों को मिलाने से प्रथम श्रीकंठ बनता है। इसी प्रकार जैं बिन्दु को पें रेखा के नये सिरों को मिलाने से प्रथम शक्ति त्रिकोण, चै बिन्दु को टें रेखा के सिरों को मिलाने से दूसरा, गै बिन्दु को र्ड रेखा से मिलाने से तीसरा, कें बिन्दु को र्द रेखा से मिलाने से चौथा और स बिन्दु को तैं रेखा से मिलाने से पांचवां शक्ति त्रिकोण बनता है।

उक्त ९ त्रिकोणों को बनाने का क्रम इस प्रकार होना चाहिये, जिससे मध्य त्रिकोण, अष्टार, अन्तर्दशार, बहिर्दशार, और चतुर्दशार चक्रों का निर्माण क्रमशः सामने आता जाय।

पहिले प्रथम शक्ति त्रिकोण बनाओ, फिर दूसरा शक्ति त्रिकोण बनाने से मध्य त्रिकोण स्पष्ट दिखने लगता है। वैसे तो वह प्रथम शक्ति त्रिकोण के बनने से ही टें रेखा के ऊपर दिखने लगता है दूसरे शक्ति त्रिकोण की उसे अपेक्षा नहीं है। फिर प्रथम शिव

११० | सौन्दर्य लहरी

त्रिकोण बनाओ, तीनों के योग से अष्टार स्पष्ट बन जाता है । फिर तीसरा शक्ति और दूसरा शिव त्रिकोण बनाने से अन्तर्दशार बन जाता है, फिर चौथा शक्ति और तीसरा शिव त्रिकोण बनाने से बहिर्दशार और फिर पांचवां शक्ति और चौथा शिव त्रिकोण बनाने से चतुर्दशार बन जाता है । यह सृष्टि क्रम है जिसमें शिव के त्रिकोण नीचे को उतरते हैं और शक्ति त्रिकोण ऊपर को चढते हैं अर्थात् शिव त्रिकोणों का मुख नीचे की ओर और शक्ति त्रिकोणों का मुख ऊपर की ओर होता है । इसके विपरीत जब शिव के त्रिकोण ऊपर चढते हैं और शक्ति त्रिकोण नीचे को उतरते हैं, उसे लय क्रम समझना चाहिये । क्योंकि शिव त्रिकोण उर्ध्वमुख और शक्ति त्रिकोण अधोमुख हो जाते हैं । यह क्रम बाह्य उपासना में ग्रहण किया जाता है, परन्तु अन्तरुपासना में जब शक्ति मूलाधार से सहस्रार में चढती है तो लय क्रम होता है क्योंकि तब शिव भाव की वृद्धि होती है और जब शक्ति नीचे उतरती है तब जीव भाव की वृद्धि होती है, इसलिये यह प्रभव क्रम है ।

भगवती का सौंदर्य कल्पनातीत है

ऊपर के दो श्लोकों में भगवती का अन्तः और बाह्य ध्यान पूजन बताया गया है । आज्ञा चक्र के ऊपर अमृत की वर्षा करती हुई ज्योतिर्मयी भगवती का ध्यान करते समय देवी के सौंदर्य की कल्पना का वर्णन इस श्लोक में है । परन्तु वह वैखरी बाणी का विषय नहीं,

सौन्दर्य लहरी १११


कवियों की कल्पना के बाहर का विषय है; इस भाव को प्रकट करने के लिये भगवत्पाद कहते हैं कि:—

[ १२ ]

त्वदीयं सौन्दर्यं तुहिनगिरिकन्ये तुलयितुं कवीन्द्राः कल्पन्ते कथमपि विरिञ्चि प्रभृतयः । यदालोकौत्सुक्यादमरललना यान्ति मनसा तपोभिर्दुष्प्रापामपि गिरिशसायुज्यपदवीम् ॥

अर्थ:— हे हिमगिरि सुते ! तेरे सौन्दर्य की तुलना करने को ब्रह्मा प्रभृति कवीन्द्र भी कुछ कुछ कल्पना किया करते हैं । तेरे सौन्दर्य को देखकर स्वर्ग की अप्सराएं ध्यानस्थ हो जाती हैं और अनेक तपश्चर्या से भी कठिनता से प्राप्त होने वाली शिवसायुज्य पदवी को सहज प्राप्त कर लेती हैं ।

सं० टि०:— यहां आनन्द लहरी के सौन्दर्य के चिन्तन से शिव-सायुज्य पदवी की प्राप्ति कही गई है ! साधक को अपने अधिकारा-नुसार बहिर्याग और अन्तर्याग द्वारा भगवती को प्रसन्न करना चाहिये । बहिर्याग का फल अन्तर्याग है और अन्तर्याग द्वारा शिव-सायुज्य मुक्ति की प्राप्ति होती है । क्योंकि सहस्रार में शिव शक्ति का ऐक्य होने पर परंपद की उपलब्धि कही गई है ।

११२ | सौंदर्य लहरी


हिमाचल की कन्या का वर्ण भी हिमवत् स्वच्छ होना चाहिये । हिम में शीतलता रहती है और प्रकाश भी । चन्द्रमा में भी शीतल प्रकाश होने के कारण उसे अमृत बरसाने वाला कहा जाता है । इसी प्रकार भगवती का स्वरूप सुधामयी ज्योति के सदृश है । अमृत को प्रकाशमान् समझना चाहिये ।

यथैव बिम्बं मृदयोपलिप्तं तेजोमयं भ्राजते तत्सुधातं ।
तद्वात्मतत्वं प्रसमीक्ष्यदेही एकः कृतार्थो भवते वीत शोकः ॥
(श्वे. २, १४)

अर्थः— मिट्टी से लिपे हुए, तेजोमय अमृत सदृश चमकते हुए शीतल बिंबवत् आत्म तत्व को देखकर देहाभिमानी जीव ब्रह्म से एकता प्राप्त करके कृतार्थ और वीत शोक हो जाता है ।

ब्रह्मा सृष्टि के कर्ता हैं, इसलिये सर्व प्रथम कवि हैं, चारों मुखों से वेदों का गान करते हैं, इसलिये सब कवियों में श्रेष्ठ हैं । वे भी भगवती के सौन्दर्य की उपमा नहीं ढूंढ सके, अन्य कवि इसलिये कुछ-२ कल्पना किया करते हैं। यदि अप्सराओं की उपमा दी जाय तो वे भी तो भगवती के रूप को उत्सुकता से देखकर ध्यान मग्न होकर समाधिस्थ हो जाती हैं । भाव यह भी है कि भगवती के सौन्दर्य की कल्पना करने से समाधि लग सकती है ।

सौंदर्य लहरी ११३


काय सम्पत् सिद्धि

अगले श्लोक में यह दिखाया गया है कि कुंडलिनी के जागरणोपरान्त अमृत सिंचन स्वरूप भगवती की कृपा से शारीरिक कल्प हो जाता है। अर्थात् वृद्ध मनुष्य भी युवा हो जाता है।

[ १३ ]

नरं वर्षीयांसं नयनविरसं नर्मसु जडं
तवापाङ्गालोके पतितमनुधावन्ति शतशः ।
गलद्वेणीबन्धाः कुचकलशविस्रस्तसिचया
हठात्त्रुट्यत्काञ्च्यो विगलितदुकूला युवतयः ॥

कठीन शब्दों का अर्थ:— नर्म=क्रीडा, विस्रस्त=गलित, कांची=मेखला ।

अर्थ:— वयोवृद्ध, देखने में कुरूप, क्रीडा में जड मनुष्य भी तेरी दृष्टि के पडने मात्र से ऐसा रमणीय हो जाता है कि सैकड़ों युवतियां उसके पीछे भागने लगती हैं, जिनके बेणी के बन्ध खुल गये हैं, कुच कलशों पर से चोली फट गई है, जिनकी मेखला हटात् टूट गई हैं और जिनकी साड़ी शरीर से उतरी जा रही हैं।

सं० टि०:— यहां काम कला ईं की ओर संकेत है ।

११४ | सौंदर्य लहरी

शक्ति जागरण से काय संपत् विभूति भी प्राप्त हो सकती है, जो षट चक्र बेध द्वारा पंच महा भूत जय होने पर होती है। रूप, लावण्य, बल, और शरीर का वज्रवत संगठित होना काय संपत् कहलाता है। देखे योग दर्शन (३, ४५-५६)। भूत जय से अणिमादि सिद्धियों की प्राप्ति भी होती है। अणिमादि सिद्धियों का श्री चक्र के सब से बाह्य चतुष्कोण पर स्थान दिखाया जाता है और इन सिद्धियों का फल भी युवावस्था की एक गौण सिद्धि है। प्रत्येक नाडी में अमृत का संचार होने का फलस्वरूप ही यह काय संपत् है। श्लोक १० में प्रपंचं सिञ्चन्ती पद में अमृत से प्रत्येक नाडी का भर जाना दिखाया गया है, जिससे देह दिव्य हो जाता है। वह मनुष्य उर्द्धू रेता हो जाता है, उसके शरीर की glands में रसोत्पादन की शक्ति इतनी बढ़ जाती है कि शरीरस्थ निर्माण शक्ति का ह्रास बन्द हो जाता है। उसके स्नायुओं में जीवन शक्ति संचार करने लगती है, और सातों धातुओं का पुनः निर्माण होने लगता है। ज्ञानेश्वरी के छठे अध्याय में कुण्डलिनी जागरण से शारीरिक कल्प होने की बात इन शब्दों में कही गई है—

“तब अवयवों की कान्ति की शोभा ऐसी दिखाई देती है कि मानों वह स्फटिक का ही हो, अथवा संध्या काल के आकाश के रंग निकालकर उनका ही वह शरीर बनाया गया हो, अथवा आत्म ज्योति का लिंग ही स्वच्छ किया रखा हो इत्यादि। कुण्डलिनी जब चन्द्रामृत पीती है, तब ऐसा शरीर हो जाता है, कृतान्त भी उस देहाकृति से भय खाता है, वार्धक्य पीछे हटता है, यौवन की गांठ खुल जाती है, और लुप्त हुई बालदशा फिर प्रकट होती है। इत्यादि।”