भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

सौंदर्य लहरी १२७

तत्त्वों की किरणें

[ १४ ]

क्षितौ षट्पंचाशद्द्विसमधिकपंचाशदुदके हुताशे द्वाषष्टिश्चतुरधिकपंचाशदनिले दिवि द्विःषट्त्रिंशन्मनसि च चतुःषष्टिरिति ये मयूखास्तेषामप्युपरि तव पादाम्बुजयुगम् ॥

अर्थः— पृथिवी में ५६, जल में ५२, अग्नि में ६२, वायु में ५४, आकाश में ७२, और मन में ६४ मयूखा अर्थात् रश्मियों के ऊपर, हे देवि ! तेरे दोनों चरण कमल हैं ।

सं० टि० मातृका न्यास में छःओं चक्रों का न्यास हंसः सहित उक्त किरणों से संबंधित अक्षरों से किया जाता है ।

उक्त किरणें छः चक्रों से संबंध रखने वाले तत्त्वों की किरणें हैं, और भगवती के चरण युगल सब के ऊपर होने का अभिप्राय यह है कि वे आज्ञा चक्र के ऊपर बिराजते हैं । उक्त किरणों में आधी शिवात्मिका और आधी शक्त्यात्मिका हैं, अर्थात् दो दो के जोडें से पृथिवी में २८, जल में २६, अग्नि में ३१, वायु में २७, आकाश में ३६ और मन में ३२ किरणों के जोडे हैं । सब का योग ३६० है, जो चान्द्र वर्ष के अनुसार एक वर्ष की ३६० तिथियों से उपमित की जाती हैं। प्रत्येक पक्ष की १५ तिथियों को १५ नित्या कहते हैं। श्री चक्रस्थ षोडश दल की गुप्ततर योगिनियां नित्या कहलाती हैं ।

११६ | सौंदर्य लहरी

नवम श्लोक में कहे अनुसार चक्रों के बेध के साथ तत्वों का भी वेध होना कहा गया है। और तत्वों के बेध से उन पर जय प्राप्त की जाती है, जिसको योग दर्शन में भूतजय, मनोजय और प्रकृतिजय कहा गया है।

भूतजय, इन्द्रियजय और मनो जय के साधन विभूति पाद के ४४, ४७, और ४८ सूत्रों में बताए गये हैं। स्थूल, स्वरूप, सूक्ष्म, अन्वय और अर्थवत्त्व पर संयम करने से भूत जय होता है। विशेष धर्मी को प्रथम स्थूल और सामान्य धर्मी को दूसरा स्वरूप तन्मात्राओं को सूक्ष्म, अर्थात तीसरा रूप और तीनों गुणों का अन्वय उनका कारण रूप और उनके भोग और अपवर्ग के लिये उपयोगिता का ज्ञान, इन ५ स्तरों पर संयम अर्थात् धारणा ध्यान समाधि करने से प्रत्येक भूत का जय प्राप्त किया जा सकता है। इसी प्रकार इन्द्रियों की ग्रहण शक्ति, स्वरूप, अस्मिता (अहं की सूक्ष्म कारण वृत्ति,) अन्वय (तीनों गुणों से संबंध) और अर्थवत्त्व पर संयम करने से इन्द्रियों का जय होता है। इन्द्रियों के जय से मनोजय और क्रमशः प्रकृतिजय किया जाता है। यह राजयोग का साधन क्रम है। इस श्लोक में ५ भूतों और मन के स्थूल, सूक्ष्म आदि क्रम से व्यतिरेक स्वरूप पृथक्करण (analysis) को रश्मियों की संख्या द्वारा दिखाया गया है। सब तत्वों के द्विविध भेद ईडा और पिंगला गत भेद हैं। ईडा से संबंध रखने वाली किरणें चन्द्रमा अथवा शक्ति की किरणें और पिंगला से संबंध रखने वाली प्राण की किरणें, सूर्य अथवा शिव की किरणें हैं। इन को स्त्रीलिंग और पुंलिंग वाचक भी कह सकते हैं। सुषुम्ना में दोनों

सौंदर्य लहरी ११७

का योग हो जाता है। सब किरणों को सुषुम्ना पथ में, कार्य को कारण में लीन करते हुए, भगवती के चरणों तक पहुंचा जाता है, अर्थात् आज्ञा चक्र के ऊपर जाया जाता है। जैसा कि श्लोक में कहा है कि भगवती के दोनों चरण सब किरणों का अतिक्रमण कर के सब के ऊपर स्थित हैं।

किरणों का संबंध तत्वों से, वर्ण माला से और उनके अधिष्ठातृ शक्तियों से त्रिविध जानना चाहिये।

किरणों का तत्वों से सम्बन्ध

पृथिवी की ५६ किरणें:— ५ महाभूत, ५ तन्मात्रा, ५ कर्मेन्द्रियां ५ ज्ञानेन्द्रियां, ४ अन्तःकरण चतुष्टय, कला, प्रकृति, महत्, और पुरुष। इनका योग २८ है और शिव शक्ति भेद से ५६।

जल किरणें:— ५ महाभूत, १० इन्द्रियां, १० उनके कार्य और मन। इनका योग २६ है और शिव शक्ति भेद से ५२।

अग्नि की किरणें:— ५ महाभूत, ५ तन्मात्रायें, १० इन्द्रियां, १० उनके कार्य और मन, सब का योग ३१ है, शिव शक्ति भेद से ६२।

वायु की किरणें: — ५ महाभूत, ५ तन्मात्रा, ५ कर्मेन्द्रियां, ५ ज्ञानेन्द्रियां, ४ अन्तःकरण चतुष्टय, कला, प्रकृति और पुरुष। इनका योग २७ है, शिव शक्ति भेद से ५४।

आकाश की किरणें:—सब ३६ तत्व, शिव शक्ति भेद से ७२

११८ सौंदर्य लहरी


मन की किरणें:— प्रथम ४ शुद्ध तत्व अर्थात् शिव, शक्ति, सदाख्य और महेश्वर को छोड़कर शेष ३२ । शिव शक्ति भेद से ६४ ।

किरणों का वर्ण-माला से सम्बन्ध — विश्व के प्रस्तार में नाम और रूप अथवा वाचक और वाच्य अथवा शब्द और अर्थ भेद से, दो स्तर हैं। अर्थ भेद से ५ कलाएं, ३६ तत्व, और १४ भुवन हैं। कलाओं और तत्वों के नाम ऊपर दिये जा चुके हैं, १४ भुवन के उपभेद २२४ किये जाते हैं, इन २२४ भुवनों के नाम स्थानाभाव से यहां नहीं दिये जाते ! शब्द भेद से ५१ वर्ण, ८१ पद और ११ मंत्र से सारे विश्व का प्रस्तार है । ३ लिंग (पुं, स्त्री, नपुंसक,) ३ पुरुष (उत्तम, मध्यम और अन्य,) ३ वचन (एक, द्वि और बहु) और ३ काल (भूत, वर्तमान, और भविष्य ) के परस्पर योग से ३x३x३x३=८१ प्रकार के पद होते हैं, और ५ कर्मेन्द्रियां, ५ ज्ञानेन्द्रियां और अन्तःकरण के एकादशविध व्यापारों की सिद्धियों के लिये ११ प्रकार के मंत्र हैं, उनके ११ देवता ११ रुद्र हैं। इसलिये उक्त ३६० किरणों का मातृका (वर्ण माला) से संबंध है और प्रत्येक किरण का पृथक पृथक देवता है । उनका संबंध नीचे दिया जाता है ।

मातृकाओं का तत्वों से संबंध:—

पृथिवी की ५६ किरणें = ५० मातृका + ऐं ह्रीं श्रीं ऐं क्लीं सौः ।
जल की ५२ किरणें = ५० मातृका + सौं श्रीं ।
अग्नि की ६२ किरणें = ५० मातृका + औ औ औ औ, हं सः हं सः हं सः हं सः ।

सौंदर्य लहरी ११ ९


वायु की ५४ किरणें = ५० मातृका + यं रं लं वं । आकाशकी ७२ किरणें = अ ५ बार,.......औ ५ बार = १४ × ५ = ७० + ऐं ह्रीं ।

मन की ६४ किरणें = अ वर्ग चार बार = १६ × ४ = ६४ ।

एषु स्वराः स्मृताः सौम्याः स्पर्शाः सौराः शुभोदयाः ।
आग्नेया व्यापकाः सर्वे सोम सूर्याग्नि देवताः ॥
( शा. नि. २.२ )

तत्वात्मानः स्मृताः स्पर्शाः मकारः पुरुषो मतः ।
व्यापका दशते कामधनधर्मप्रदायिनः ॥ (२. ४)

विन्दु पुमान्रविः प्रोक्तः सर्गः शक्तिर्निशाकरः ।
स्वराणां मध्यमं यच्च चतुस्रं तच्च नपुंसकम् ॥ २. ६

पिंगलायां स्थिता ह्रस्वा ईडायां संगताः परे ।
सुषुम्नायां मध्यगाज्ञेया श्रत्वारो ये नपुंसकाः ॥ २. ७

वाय्वग्निभूजलाकाशाः पंचाशल्लिपयः क्रमात् ।
पंचह्रस्वाः पंचदीर्घाविन्द्रन्ताः संधिसंभवाः ।
क्रमादयः पंचशः ष क्ष ळ स हान्ताः प्रकीर्तिताः ॥ २. ९

१२० सौंदर्य लहरी

नीचे शारदातिलक के अनुसार वर्ण माला का पाँचों तत्त्वों, छःओं चक्रों, और ईड़ा, पिंगला, और सुषुम्ना तीनों नाड़ियों से संबंध एक नकशे (chart) द्वारा दिखलाया जाता है ।

षट् चक्र
पं० महाभूतविशुद्धअनाहतमणिपूरस्वाधिष्ठानमूलाधारआज्ञागुरु चक्र
ह्रस्वदीर्घ
वायुआ, एक्च्ट्त्प्य्ष्
अग्निई, ऐख्छ्ठ्थ्फ्र्क्ष
पृथिवीऊ, ओग्ज्ड्द्ब्ल्
जलॠ, औघ्झ्ढ्ध्भ्व्
आकाशॡ, अंङ्ञ्ण्न्म्श्ह्
लिंगपुमान्स्त्रीनपुंसक
नाड़ीपिंगलाईडासुषुम्ना
वर्णभेदईडा (चन्द्र)<br>स्वराःपिंगला (सूर्य)<br>स्पर्शाःसुषुम्ना (अग्नि)<br>व्यापिकाः

अनुस्वार = पुमान्, विसर्ग = शक्ति.

सौंदर्य लहरी १२१


किरणों की अधिष्ठातृ शक्तियां

अधिष्ठातृ शक्तियों के नाम शिव शक्ति के जोडे से नीचे दिये जाते हैं।

पृथिवी:— १. उड्डीश्वर, उड्डीश्वरी, २. जलेश्वर, जलेश्वरी, ३. पूर्णेश्वर, पूर्णेश्वरी, ४. कामेश्वर, कामेश्वरी, ५. श्रीकंठ, गगना, ६. अनन्त स्वरसा, ७. शंकर, मति, ८. पिंगल, पाताल देवी, ९. नारदारव्य, नादा, १०. आनन्द, डाकिनी, ११. आलम्य, शाकिनी, १२. महानन्द, लाकिनी, १३. योग्य, काकिनी, १४. अतीत, साकिनी १५. पाद, हाकिनी, १६. आधारेश, रक्ता, १७. चक्रीश, चंडा, १८. करंगीश, कराला, १९. मदधीश, महोच्छुष्मा, २०. अनादि विमल, मातंगी, २१. सर्वज्ञ विमल, पुलिन्दा, २२. योग विमल, शंवरी, २३. सिद्ध विमल, वाचापरा, २४. समय विमल, कुलालिका, २५. मित्रेश, कुब्जा, २६. उड्डीश, लघ्वा, २७. षष्ठीश, कुलेश्वरी, २८. चर्याधीश, अजा ।

जलदेवता— १. सद्योजात, माया, २. वाम देव, श्री ३. अघोर, पद्मा, ४. तत्पुरुष, अंबिका, ५. अनन्त, निवृत्ति, ६. अनाथ, प्रतिष्ठा, ७. अनाश्रित, विद्या, ८. अचिन्त्य, शान्ता, ९. शशिशेखर, उमा, १० तीव्र, गंगा, ११. मणिवाह, सरस्वती, १२. अंबुवाह, कमला, १३ तेजोधीश, पार्वती, १४ विद्यावागीश्वर, चित्रा, १५. चतुर्विधेश्वर सुकमला, १६. उमांगंगेश्वर, मानमथा, १७. कृष्णेश्वर, श्रिया, १८. श्रीकंठ, लया, १९. अनन्त, सती, २०. शंकर, रत्नमेखला, २१. पिंगल, यशोवती, २२. सादारव्य, हंसानन्दा, २३. परि-

१२२ | सौंदर्य लहरी

दिव्यौध, वामा. २४. मारदिव्यौध, ज्येष्ठा, २५. पीठौध, रौद्री, २६. सर्वेश्वर, सर्वमयी।

आग्नेय— १. परापर, चंडेश्वरी, २. परम, चतुष्मती, ३. तत्पर, गुह्य काली, ४. अपर, संवर्ता, ५ चिदानन्द, नीलकुब्जा, ६ अघोर, गंधा, ७. डामराघोर, समरसा, ८ ललित, रूपा, ९. स्वच्छ, स्पर्शा, १० भूतेश्वर, शब्दा, ११. आनन्द, डाकिनी, १२. आलस्य, रत्नडाकिनी, १३. प्रभानन्द, चक्रडाकिनी, १४. योगानन्द, पद्म डाकिनी, १५. अतीत, कुब्ज डाकिनी, १६. स्वाद, प्रचंड डाकिनी, १७. योगेश्वर, चंडा, १८ पीठेश्वर, कोशला, १९. कुल-कौलेश्वर, पावनी, २०. कुक्षेश्वर, समया, २१. श्रीकंठ, कामा, २२. अनन्त, रेवती, २३ शंकर, ज्वाला, २४. पिंगलाख्य, कराला, २५. सदाख्य, कुब्जिका, २६. कालरात्रिगुरू, परा, २७. सिद्ध गुरू, शान्त्यातीता, २८. रत्न गुरू, शान्ता, २९. शिव गुरू, विद्या, ३०. मेल गुरू, प्रतिष्ठा, ३१. समय गुरू, निवृत्ति।

वायव्य— १. खगेश, भद्रा, २. कूर्म, आधारा, ३. मेष, कोषा, ४. मीन, मल्लिका, ५. ज्ञान, विमला, ६. महानन्द, शर्वरी, ७. तीव्र, लीला, ८. प्रिय, कुमुदा, ९. कालिक, मैनकी, १०. डामर डाकिनी, ११. रामर, राकिनी, १२. लामर, लाकिनी, १३. कामर, काकिनी, १४. सामर, साकिनी, १५. हामर, हाकिनी, १६. आधारेश, राका, १७. चक्रीश, बिन्दु, १८. कुकुर, कुला, १९. मदग्रीश, कुब्जिका, २०. हृदीश, काम कला, २१ शीरस, कुल दीपिका, २२. शिखेश, बर्बरी, २३. वर्मन, बहुरूपा, २४. शास्त्रेश,

सौंदर्य लहरी १२३

महत्तरी, २५. परम गुरू, मंगला, २६. पराधिकार गुरू, सौकर्या, २७. पूज्य गुरू, रामा ।

आकाश— १. हृदय, कौलिनी, २. घर, कान्ता, ३. भोग, विशेषी, ४. भय, योगिनी, ५. मह, ब्रम्ह तारा, ६. शव, शवरी, ७. द्रव, कालिका, ८. सरस, जुष्ट चांडाली, ९. मोह, अघोरेशी १०. मनो भव, हेला, ११. केक, महारक्ता, १२. ज्ञान गुह्य, कुब्जिका, १३. खर, डाकिनी, १४. ज्वल शाकिनी, १५. महाकुल, लाकिनी, १६. भ्योज्वल, काकिनी, १७. तेज, साकिनी, १८. भूति, हाकिनी, १९ वामु, पापघ्नी, २०. कुल, सिंही, २१. संहार, कुलांबिका, २२. विश्वंभर, कामा, २३. कौटिल, कूण माता, २४. गालव, काली, २५. व्योम, व्योमा, २६. श्वसन, नादा, २७. खेन्वर, महादेवी, २८. बहुल, महत्तरी, २९. तात, कुण्डलिनी, ३०. कुलातीत, कुलेश्वरी, ३१. अज, ईंधिका, ३२. अनन्त, दीपिका, ३३. ईश, रेचिका, ३४. शिख, मोचिका, ३५. परम, परा, ३६. पर, चिति ।

मन— १. पर, परा, २. भव, भवपरा, ३. चित्, चित्परा, ४. महामाया, महामाया परा, ५. इच्छा, इच्छापरा, ६. सृष्टि, सृष्टि परा, ७. स्थिति, स्थिति परा, ८. निरोध, निरोध परा, ९. मुक्ति, मुक्ति परा, १०. ज्ञान, ज्ञान परा, ११. सत्, सति परा, १२. असत्, असति परा, १३. सदसत्, सदसति परा, १४. क्रिया, क्रिया परा, १५. आत्मा, आत्मपरा, १६. इंद्रियाश्रय, इंद्रियाश्रय परा, १७. गोचर, गोचर परा, १८. लोक मुख्य, लोक मुख्य परा, १९. वेदवत्, वेद-वतिपरा, २०. संवित्, संविति परा, २१ कुण्डलिनी, कुण्डलिनी परा,

१२४ सौंदर्य लहरी


२२. सोषुम्णी, सोषुम्णी परा, २३. प्राण सूत्र, प्राण सूत्र परा, २४. स्यन्द, स्यन्द परा, २५. मातृका, मातृका परा, २६. स्वरोद्भव, स्वरोद्भव परा, २७. वर्णज, वर्णज परा, २८. वर्गज, वर्गजा परा, २९. शब्दज, शब्दज परा, ३०. वर्णज्ञात, वर्णज्ञता परा, ३१. संयोगज, संयोगज परा, ३२. मंत्र विग्रह, मंत्र विग्रह परा ।

पाचों तत्वों का संबंध मूलाधार से विशुद्ध चक्र तक क्रमशः ५ चक्रों से है और मन का सम्बन्ध भ्रूमध्य में आज्ञा चक्र से, इसलिये इन किरणों का भी सम्बन्ध छःओं चक्रों से है। छः चक्रों से वर्ष की छः ऋतुओं की समानता की जाती है। अर्थात बसन्त की मूलाधार से समानता है। क्योंकि इस ऋतु में पृथ्वी का वेध होकर पुष्प खिलते हैं और सुगन्ध का विकास होता है, ग्रीष्म ऋतु की स्वाधीष्ठान चक्र से समानता की जाती है, इस ऋतु में जल का वेध होकर सब जल सूखने लगता है। वर्षा की मणिपूर से समानता है, क्योंकि इस ऋतु में अग्नि का वेध होकर विद्युत और पर्जन्य का विकास होता है। शरद् ऋतु की अनाहत चक्र से समानता की जाती है क्योंकि इसमें वायु का वेध होकर वातावरण शान्त निर्मल हो जाता है। हेमन्त ऋतु की विशुद्ध चक्र से समानता है, क्योंकि इस ऋतु में आकाश के वेध सूचक शीत की प्रधानता होती है, और शिशिर ऋतु की आज्ञा चक्र से समानता की जाती है क्योंकि इसमें चित्त की प्रसन्नता बढती है। इस प्रकार उक्त ३६० किरणों को वर्ष की ३६० तिथियों से समानता यह बात सिद्ध करती है कि पिंड का संवत्सर पुरुष आधार है। कृष्ण और शुक्ल पक्षों को भी शक्ति शिवात्म समझना चाहिये। कृष्णपक्ष में चन्द्रमा

सौंदर्य लहरी — १८५

की अन्वय और शुक्ल पक्ष में उन्नेय भूमिका समझनी चाहिये । इसी प्रकार उत्तरायण और दक्षिणायन को सूर्य ( प्राण ) की उन्नेय और अन्वय भूमिकायें समझनी चाहिये ।

अगले तीन श्लोकों में वाक् सिद्धि का वर्णन है । १५ वें श्लोक में सात्विक, १६ वें राजसिक और १७ वें मिश्रित भावों युक्त कविता शक्ति के विकास का वर्णन है ।

वाक् सिद्धि


[ १५ ]

शरज्ज्योत्स्नाशुभ्रां शशियुतजटाजूटमकुटां
वरत्रासत्राणस्फटिकघुटि (णि) कापुस्तककराम् ।
सकृन्न त्वां नत्वा कथमपि सतां सन्निदधते
मधुक्षीरद्राक्षा मधुरि मधुर्गैणा भणितयः ॥

अर्थ:— शरत् पूर्णिमा की चांदनी के सदृश शुभ्रवर्णा, द्वितीया के चन्द्रमा युक्त जटाजूट रूपी मकुट धारण किये हुए, दो हाथों से भक्तों को त्रास से त्राणार्थ अभयद और वरद अभिनय किये हुए और दो हाथों में स्फटिक मणियों की माला और पुस्तक धारण किये हुए, तुझको एक बार भी नमन न करनेवाला मनुष्य किस प्रकार सत्कवियों की सी मधु, दूध और द्राक्षा की मधुरता से युक्त मधुर कविता कर सकता है, अर्थात् नहीं कर सकता ।

१२६ | सौंदर्य लहरी


सं० टि० यह और अगले दो श्लोक मिल कर सारस्वत प्रयोग कहलाते हैं । अच्युतानन्द के अनुसार यहां वाग्भव रूप क्रिया शक्ति का ध्यान है, अर्थात वाग्भव कूट की देवी क्रिया शक्ति का ध्यान बताया गया है ।

यहां कुण्डलिनी शक्ति के जागृत होने पर सास्वत सिद्धि हो की ओर संकेत है । कहा है ।

सर्वे वाक्यात्मका मंत्रा वेद शास्त्राणि कृत्स्नशः ।
पुराणानि च काव्यानि भाषाश्च विविधा अपि ॥ ३,७
सप्तस्वराश्च गाथाश्च सर्वे नाद समुद्भवाः :
एषा सरस्वती देवी सर्वभूतगुहाश्रया ॥ ३, ८
य इमां वैखरीं शक्तिं योगी स्वात्मनि पश्यति ।
स वाक सिद्धिमाप्नोति सरस्वत्याः प्रसादतः ॥
३,१० (यो. शिखा.)

अर्थः— सब वाक्यात्मक मंत्र वेद शास्त्र, पुराण और काव्य, विविध भाषायें, सातों स्वर और गाथायें सब नाद् से उत्पन्न होती हैं । यह नाद् रूपा सरस्वती देवी सब प्राणियों की बुद्धिरूपी गुहा में रहती है । जो योगी इस वैखरी शक्ति को अपने भीतर देखता है उसे सरस्वती के प्रसाद से वाक् सिद्धि की प्राप्ति हो जाती है ।

कुण्डलिनी शक्ति जागकर चार रूपों में प्रकट होती है, उन रूपों के नाम ये हैं, क्रियावती, कलावती, वर्णमयी और बेधमयी · शारीरिक कंपदि, हठ योग के आसन प्रणायाम मुद्रादि, नृत्यादि

सौंदर्य लहरी १२७

क्रियाओं में क्रियावती का रूप हैं। ३६ तत्वों के व्यतिरेक और शुद्धि की क्रियाओं में कलावती का रूप है। वर्णात्मिका मंत्रमयी है और षट् चक्र वेध वेधमयी करती है। वर्णमयी सरस्वती का रूप है जो समस्त शब्दमय जगत् को परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी इन चारों स्तरों पर धारण किये हुए है।

चत्वारि वाक् परिमिता पदानितानि विदुर्ब्राह्मणांये मनीषिणः ।
गुहात्रीणि निहिता नेंगयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति ॥ ऋक

अर्थात् वाचा चार पाद वाली होती है, उनको जो बुद्धिमान ब्राह्मण हैं वे ही जानते हैं, उनमें से तीन तो गुहा में निहित (छुपी हुई) हैं, वे अपने स्थानों से नीचे नहीं हिलती, चौथी वैखरी को मनुष्य बोलते हैं। इस मंत्र के साथ ऐं बीज की उपासना की जाती है। देखें सरस्वती रहस्योपनिषद। यह वाक् बीज वाग्भव कूट का रूप है। इस श्लोक में सारस्वत प्रयोग का ध्यान बताया गया है। अगले दो श्लोक भी सारस्वत प्रयोग से ही संबंध रखते हैं।


[ १६ ]

कवीन्द्राणां चेतः कमलवनबालातपरुचिं
भजन्ते ये सन्तः कतिचिदरुणामेव भवतीम् ।
विरिञ्चिप्रेयस्यास्तरुणतर शृङ्गार लहरी—
गभीराभिर्वाग्भिर्विदधति सतां (भां) रञ्जनमयी ॥

१२८ | सौन्दर्य लहरी


अर्थः — कवीन्द्रों के चित्त रूपी कमल वन को खिलाने के लिये उदय होते हुए सूर्य के सदृश अरुणा रूपी आपका जो कोई थोडे महान पुरुष भजन करते हैं, वे ब्रह्मा की प्रिया (सरस्वती) के तरुणतर श्रृंगार लहरी से निकली गंभीर कविताओं द्वारा सत्पुरुषों का मनोरंजन किया करते हैं।

सं० टि० यहां कामकूट की देवी इच्छा शक्ति 'का ध्यान बताया गया है।

व्याख्या— १५ वें श्लोक में 'शरदज्योत्सना,' 'शशि युत जटाजूट मकुटां,' पद, वरद् और अभयद् अभिनय, माला और पुस्तक सहित ध्यान भगवती के सात्विक रूप का ध्यान है और 'मधुक्षीर मधुरी मधुरीणा युक्त भणितयः' से भी सात्विक कविता की ओर संकेत है। परन्तु इस श्लोक में 'अरुणा' 'प्रेयस्यास्तरुणतर श्रृंगार लहरी' इत्यादि पदों में भगवती के रजोगुण स्वरूप का ध्यान है और श्रृंगार रस परिपूर्ण कविता की ओर संकेत है। ऐसी कविता का उपयोग भी मनोरंजन मात्र ही होता है; उनसे किसी प्रकार आध्यात्मिकता की उपलब्धि नहीं हो सकती।

'बाला तप रुचि' में 'बाला' पद स्पष्ट रूप से बाला मंत्र की ओर ध्यान दिलाता है, जिसकी उपासना रूपी तप से चित्त रूपी कमल वन का विकसित होना भी प्रध्वनित होता है। क्योंकि बाला तप का अर्थ 'बाला एव आतपः' अर्थात् सूर्य सदृश बाला भगवती इत्यादि अर्थ किया जा सकता है। इस प्रकार अर्थ करने से श्लोक

सौंदर्य लहरी १२९


का भाव यह होगा कि कवीन्द्रों के चित्त रूपी कमल बन को विकसित करने के लिये अरुणा देवी बाला भगवती सूर्य सदृश है ।

[ १७ ]

सावित्रिभिर्वाचां शशिमणिशिलाभङ्गरुचिभि—
र्वशिन्याद्याभिस्त्वां सह जननि संचिन्तयति यः ।
सकर्ता काव्यानां भवति महतां भङ्गि सुभगै ( रुचिभि )
र्वचोभिर्वाग्देवी वदन कमला मोद मधुरैः ॥

वशिन्याद्याभिः = सर्व रोगहर अष्टार चक्र की आठ वाग्देवता वशिनी, कामेश्वरी, मोदिनी, विमला, अरुणा, जयनी, सर्वेश्वरी और कौलिनी । भंगि = व्यंग ।

अर्थः— वशिनी आदि सावित्रियों सहित, जो चन्द्रकान्त मणि की शिला की घडी हुई मूर्तियों की शोभा वाली हैं, हे जननी ! जो मनुष्य तेरा ध्यान करता है, वह उच्च कोटि के काव्यों की रचना करने लगता है । उसकी सुन्दर कविता वाग्देवी के मुख कमल के आमोद पूर्ण माधुर्य से युक्त होती है ।

सं० टि० यहां आठ वशिनी आदि वाग्देवियों सहित भगवती के ध्यान का उपदेश है और वाग्देवियों की शोभा चन्द्रकान्त मणियों की शोभा जैसी बताई गई है ।

यह शक्ति कूट की देवी ज्ञान शक्ति का ध्यान है ।

१३० | सौंदर्य लहरी

जैसे चन्द्रमा की ज्योत्स्ना से चन्द्रकान्त मणि द्रवीभूत होती है, वैसे ही पन्द्रहवें श्लोकोक्त शरद्-ज्योत्स्ना-शुभ्रा भगवती के ध्यान से आठों वाग्देवियां द्रवीभूत होने लगती हैं। और उनके मन्त्र स्वरूप अ क च ट त प य श वर्गवाली सम्पूर्ण मातृका शक्तियां चन्द्रकान्त मणियों के नांई, जो समस्त वैखरी वाणी की वर्णात्म आधार हैं द्रवीभूत होकर उस कवि में वर्णपदमंत्रविग्रहा नवरसयुक्त वैखरी शक्ति का विकास करने लगती हैं।

यह श्लोक सात्विक और राजसिक दोनों भावों को एक स्थानीय कर देता है। 'महतां काव्यानाम्' पद से ऋषि प्रणीत शास्त्रों का अभिप्राय है।

<u>मधुमती भूमिका की सिद्धि।</u>

(१८)

तनुच्छायाभिस्ते तरुण तरणि श्रीध(स)रणिभि
र्दिवं सर्वामुर्वीमरुणिमनिमग्नां स्मरति यः ।
भवन्त्यस्य त्रस्यद्वनहरिणशालीन नयनाः
सहौर्वश्या वश्याः कतिकतिन गीर्वाणगणिकाः ॥

कठिन शब्दः—तरणि=सूर्य; सरणि=किरणें; गीर्वाण गणिका=अप्सराएं, दिवं=आकाश; उर्वी=पृथिवी, छाया=कान्ति।

अर्थः—तरुण सूर्य की श्री अर्थात् कान्ति को धारण करने वाली तेरे शरीर की छाया (कान्ति) से आकाश और

सौंदर्य लहरी १३१

सारी पृथिवी को अपनी अरुणिमा (लाल रंग) में निमग्न करती हुई तेरा जो स्मरण करता है, उसके वश में, घबराई हुई बन की हरिणियों जैसे चंचल नयनों वाली ऊर्वशी सहित कितनी स्वर्ग की अप्सरायें वश में हो जाती हैं।

सं० टि०:—यहां ज्ञानी की दिव्य दृष्टि का जो सब जगत् को ब्रह्ममय देखने लगती है, वर्णन है। यह मधुमती भूमिका कहलाती है, जिसमें देवाङ्गनाएं साधक को पथभ्रष्ट करने का यत्न करती हैं।

अप्सराओं से दिव्यशक्तियों का भी अभिप्राय है। उपरोक्त ध्यान करने वाले योगियों को दिव्यशक्तियों का साक्षात् होता है, जिनका वर्णन योगदर्शन के विभूतिपाद के ५१ वें सूत्र में मिलता है, उनको वहां स्थानीय देवता कहा गया है। यह अनुभव योगियों को ऋतंभरा प्रज्ञा के उदय होने पर मधुमती भूमिका में होता है। यह शुद्धसत्वगुण प्रधान भूमिका है। इसमें शक्ति का प्रकाश सर्वत्र दृष्टिगोचर होने लगता है। अर्थात् ऐसे योगियों को भूमि और आकाश सर्वत्र भगवती की अरुण कान्ति की छाया से बसा हुआ दिखने लगता है। उक्त सूत्र पर व्यासजी अपने भाष्य में लिखते हैं कि उन स्थानीय देवताओं के प्रलोभनों से योगी को सतर्क रहना चाहिये, और संग दोष से बचने के लिये उसको इस प्रकार सोचना चाहिये कि घोर संसार के अंगारों में जलते हुए और जन्म मरण के अन्धकार में पडे हुवे मैंने इस क्लेश तिमिर को दूर करने वाले योग प्रदीप का प्रकाश बडी कठिनता से प्राप्त किया है। तृष्णा की कारणभूत विषयभोगों की आंधी इस योगरूपी दीपक को न कभी बुझा दे।

१३२ सौंदर्य लहरी काम बीज का ध्यान ।

(१९)

मुखं बिन्दुं कृत्वा कुचयुगमधस्तस्य तदधो हरार्धं ध्यायेद्यो हरमहिषि ते मन्मथकलाम् । स सद्यः संक्षोभं नयति वनिता इत्यतिलघु त्रिलोकीमप्याशु भ्रमयति रवीन्दुस्तनयुगाम् ॥

कठिन शब्दः—मन्मथ कला=क्लीं अथवा ईं ।

अर्थः—मुख को बिन्दु बना कर दोनों स्तनों को उसके नीचे दो और बिन्दु बनाना चाहिये उसके नीचे हर के अर्ध-भाग का ध्यान करना चाहिये । हे हर महिषी ! इस प्रकार जो तेरी काम कला का ध्यान करता है, वह तुरन्त स्त्रियों के चित्त में क्षोभ ले आता है यह अति छोटी बात है, (उसका सामर्थ्य तो इतना अधिक होता है कि) अपितु वह सूर्य और चन्द्र रूपी दो स्तन वाली त्रिलोकी को भ्रमा सकता है ।

सं० टि०:—हरमहिषी पद से आदि शक्ति ग्रहण करना चाहिये । 'हरतीति हर' । मन्मथकला, कामकला । कामकला से हमने त्रिपुरोपनिषद् की श्रुति ११ के प्रकाश में काम बीज लिया है । परन्तु ईं को काम कला कहते हैं । ईं में भी तीन बिन्दु माने जा सकते हैं । ईकार का नीचे क भाग हकार का आधा भाग समझा जा सकता है । इस लिये

सौंदर्य लहरी १३३


नीचे व्याख्या में क्लीं के स्थान पर ईं भी पढा जा सकता है। विन्दु तीन हैं ब्रह्मा विष्णु और रुद्र। उनमें एक मुख है और दो स्तन।

इस श्लोक में काम कला का ध्यान बताया गया है। जो क्लींमें ककार के बिन्दु रूपी मुख के नीचे लकार के दो बिन्दुओं को दोनों स्तनों से उपमित कर के ईकार रूपी हरार्धांगिनी के योग से बनती है। इस मंत्र के प्रयोग का फल, इह लोक की स्त्रियों का वश करना तो क्या तीनों लोक वश में किये जा सकते हैं। त्रिलोकी भी एक विराट स्त्रीवत् ही है, जिसके सूर्य और चन्द्रमा दो स्तन सदृश हैं। परिशिष्ट नं. २ में त्रिपुरोपनिषद् की श्रुति ११ भी देखें। इस उपमा से स्त्री मात्र में साधक का पूज्य मातृभाव जागृत किया गया है। क्योंकि सूर्य प्राण रूपी और चन्द्रमा अमृत रूपी दुग्धपान कराकर विश्व का पालन करते हैं। कहा भी है।

विद्याः समस्तास्तवदेविभेदाः स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु ।

यद्यपि योगी के रूप लावण्य और तेजस्वी रूप को देखकर कामिनियों के चित्त में क्षोभ उत्पन्न होना स्वाभाविक है, अपितु योगी की इतनी महानता है कि त्रिलोकी भी उस पर अपना सर्वस्व निछावर करने को तय्यार रहती है। क्या उसके हृदय में सामान्य रमणियां काम का उद्वेग ला सकती हैं ? वह प्रकृति देवी के विराट देह के सूर्य चन्द्ररूपी स्तनों के दूध को पीकर दोनों का योग करता है। स्तन पान करने वाला शिशु कितना सुन्दर होता है, जिसके रूप लावण्य पर सब ही मोहित होकर उसका कितने स्नेह से लालन-पालन किया करते हैं, परन्तु क्या उस शिशु में भी कभी युवतियों

१३४ | सौंदर्य लहरी

को देखने से काम की भावना का उदय होना संभव है। प्रकृति देवी के सूर्य चन्द्र रूपी स्तनों के दूध से पुष्ट होने वाला योगी फिर इन सामान्य स्त्रियों की मायामयी मोहिनी से कैसे प्रभावित हो सकता है ? वह प्रकृति जननी का बालक तो दिव्यामृत पीकर जडोन्मत्त बालवत् क्रीडा करता है। कामी पुरुष के चित्त में स्त्री के मुख और कुच युग पर दृष्टि पडने से विकार उत्पन्न होता है, परन्तु जो पुरुष उनको देखकर स्त्री के रूप में कामकला की भावना कर के, उसमें उपास्य बुद्धि उत्पन्न कर लेते हैं, उनके वश में त्रिलोकी हो जाती है। अर्थात् वे काम को जीतकर मन्मथारि हो जाते हैं।

सूर्य जगत् का प्राण है और चन्द्रमा जगत् का मन। श्रुतियां कहती हैं।

‘प्राणः प्रजाना मुदत्येषः सूर्य्याः’। और ‘चन्द्रमा मनसो जातः’ । दोनों का संबंध सूर्य और चन्द्र मण्डलों से है। अनाहत चक्र के १२ पत्र १२ आदित्यों से और विशुद्ध चक्र के १६ पत्र चन्द्रमां की १६ कलाओं से उपमित किये जाते हैं। इसी प्रकार मणिपूर के १० पत्र अग्नि की १० कलाओं से उपमित किये जाते हैं। ईडा को चन्द्र नाडी, पिंगला को सूर्य नाडी कहते हैं और सुषुम्ना में तीनों का समावेश है। हृदय प्राण का स्थान है और आज्ञा चक्र मन रूपी चन्द्रमा का। जो योगी सूर्य को उन्मुख कर के सोमामृत का पान करते हैं और दिव्यानन्द का आस्वाद लेते हैं, उनको कामाग्नि का संताप नहीं संतप्त करता। ज्ञानी, भक्त, योगी अथवा समयाचार के उपासक किसी को भी काम प्रयोग इष्ट नहीं