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सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)

Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi

श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)

DevanagariHindipublished415 पृष्ठ

ग्रन्थ परिचय

भारतीय तत्वज्ञानियों में जगद्गुरू स्वामी शंकराचार्य्य का नाम सर्वप्रथम है । संस्कृत साहित्य के पंडितों का आज भी अभाव नहीं है किन्तु आध्यात्मिक अनुभूति और उच्च स्तर पर पहुंचने वाले साधन-निष्ठ पुरुषों का अभाव सा ही है । पुस्तकों का साधारण अनुवाद कर देना सरल सी बात है किन्तु ग्रंथ के गर्भ भाग में प्रवेश कर उसका आध्यात्मिक तत्व निकालना और उसे साधन उपयुक्त बनाकर जनता के सामने रखना बडा कठिन है । हम पुरातन शास्त्रज्ञों से यदि आत्मा, मन, और प्राण की परिभाषा पूछे तो वे संतोष जनक उत्तर नहीं दे सकते । इसको कोई अध्यात्मिक पुरुष अस्वीकार नहीं कर सकता कि स्वामी शंकराचार्य्य ने सौंदर्य लहरी के १०३ श्लोकों में उपासना का कितना गूढ रहस्य और योग साधनों की कितनी उपयोगिता बतलायी है । भगवान शंकराचार्य के इस स्तोत्र मे जो भगवती की स्तुति की गई है उसमें उनके उद्गार कितने श्रेष्ठ, स्पष्ट, गंभीर, और उन्नत प्रदर्शित किये गये हैं । ऐसे बृहद्ग्रंथ का अनुवाद करना और उसे आध्यात्मिक साधना से उपयुक्त कर देना सरल बात नहीं है । उस पर तो वही महात्मा प्रकाश डाल सकते हैं जो आध्यात्मिक उच्च स्तर पर पहुंचे हुवे हैं और अधिकारी हैं ।

ब्रह्मनिष्ठ श्री स्वामी विष्णुतीर्थजी महाराज ने इस अनुपम ग्रंथ का अनुवाद करके हिन्दी जगत का बडा उपकार किया है । प्रस्तुत पुस्तक के कुछ पृष्ठों को पढने से ही स्वामीजी के गंभीर अध्ययन का परिचय मिलता है ।

वेद, वेदान्त, उपनिषद, शास्त्र, तंत्रशास्त्र, योग, मंत्रशास्त्र तथा भारतीय तथा पाश्चात्य तत्वज्ञानियों के वैज्ञानिक अनुसंधान के

दृष्टिकोण को लेकर मंत्रोंका महत्व समझाया है । प्रत्येक श्लोक विशेष महत्व रखता है जिसमें स्वामीजी के अध्ययन की झलक स्पष्ट दिखाई देती है ।

मंत्रों के विषय में स्वामीजी ने जो व्याख्या सहित अपने विचार लिखे हैं वह मंत्रशास्त्र के साधकों के लिये गूढतत्व, एवं अतीव उपयोगी है । शिवजी के तांडव नृत्य के सम्बन्ध में जो भाव प्रकट किये हैं उसमें स्वामीजी की मौलिकता स्पष्ट हो रही है । आनन्द-लहरी को पढते पढते पाठक स्वयं आनन्द विभोर हो जाता है । सौन्दर्य लहरी को दो भागों में विभाजित किया गया है । प्रथम भाग में ४१ श्लोक आनन्द लहरी के नाम से प्रसिद्ध हैं, और उत्तरार्द्ध-खंड सौन्दर्य लहरी है । दूसरे खंड को पढ कर अनात्मवादी भी आत्मा के अस्तित्व को स्वीकार कर लेगा । चितिशक्ति का वर्णन और अपरोक्षानुभूति के विषय को इतना स्पष्ट किया है कि पाठक के चेतना स्तर को हिला देता है ।

चक्रों और कुण्डलिनी का विषय बहुत सुन्दर ढंग से स्पष्ट किया गया है । उसका रहस्योद्घाटन बडे सरल शब्दों में किया गया है ।

प्रस्तुत ग्रंथ को साधनायुक्त बनाने में स्वामीजी ने स्तुत्य प्रयत्न किया है और इसका समीकरण भी बहुत स्पष्ट हुआ है ।

विचारी, विवेकी, और ज्ञानी इस ग्रंथका समुचित आदर करेंगे और इस ग्रंथ से लाभ उठावेंगे । आध्यात्मिक जिज्ञासु स्वामीजी के इस महान कार्य के लिये आभारी हैं ।

इस ग्रंथका अधिक से अधिक प्रचार हो यही मंगल कामना है ।

कल्पवृक्ष कार्यालय उज्जैन ।
दिनांक ३ मार्च सन १९४९
(डॉक्टर) दुर्गाशंकर नागर,

ॐ श्री शिवः शरणम्

आमुख ।

परमगुरु श्री गौडपादाचार्य महाराज का सम्मत अजातवाद तथा भगवत्पाद श्री आद्य शंकराचार्य महाराज का सम्मत विवर्तवाद दोनों को पर्यायभूत सिद्धांत समझना, सामान्य जनता की बुद्धि को अगम्य है, इस लिए भगवत् पूज्यपाद महाराज ने उपासनादि द्वारा जनता की बुद्धि को विशद करने के लिए 'हरिमीडे' इत्यादि तत्तद्देवता के स्तोत्र बनाए। इन्हीं उत्तमोत्तम स्तोत्रों की पंक्ति में अग्रणीपद इस सौन्दर्य-लहरी को ही प्राप्त है। दृश्यमान जगत् की सत्यता जिनको प्रतीत होती है ऐसी जनता के सद्बोध के लिए अध्यारोपापवाद न्याय से अध्यारोप—समय में विवर्तवादी भगवत् पूज्यपाद को परिणामवाद मानना क्रमप्राप्त होने से सुसंगत ही है। इसी अध्यारोप दृष्टि से सौन्दर्य लहरी में सर्व जगत पूज्य भगवती की प्रार्थना की गई है जिस से भगवती का प्रसाद मिलेगा, तदनन्तर केनोपनिषद वर्णित प्रकार से उपासक को सत्यज्ञान लाभ होगा; अर्थात यह विवर्तवाद का ही परिणित स्वरूप है। विमर्शशाली विद्वानों को यह भलीभांति विदित है कि जगतगुरु के प्रादुर्भाव के समय में कादि, हादि उपासना तथा योगमार्ग तत्र तत्र प्रचलित थे, उसी को लेकर भगवती की महाराज ने प्रार्थना की है। यह क्रम उपनिषद सम्मत है क्यों कि छांदोग्यादि उपनिषदों में कर्मठों की सम्मत उद्गीथादि उपासना कही गई हैं। स्पष्टार्थ से केवल भगवती के अंगप्रत्यंगों का वर्णन सौन्दर्य लहरी से प्रतीत होता है परन्तु अभियुक्त टीकाकारों ने तंत्रशास्त्र तथा

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वह अतीव सराहनीय है इस शिव ताण्डव ने सचमुच सोने में सुगंध वाली कहावत चरितार्थ की है यह परम समाधान की बात है ।

अन्त में सर्वोपकारक ग्रंथकार का अभिनन्दन करके इस अल्प निवेदन का विराम करते हैं ! इतिशम्

सर्वेषां विधेयः
शंकरानन्द भारती यति
मु. मोरटक्का रेवातीर
पूर्वाश्रमीः—महामहोपाध्याय—वेदान्तवागीश
श्री० श्रीधरशास्त्री पाठक
डेक्कन कॉलेज पूना

नोटः—श्री स्वामीजी के निवास स्थान मुकाम मोरटक्का के निकट नर्मदातट पर खेडीघाटस्थ श्री राजराजेश्वरी मन्दिर में प्रतिष्ठित श्रीमच्छंकर भगवत्पाद की प्रतिमा का फोटो इस ग्रंथ के प्रथम पृष्ठ पर दिया जाता है । लेखक उसके लिये और श्री स्वामीजी के इन भावपूर्ण उद्गारों के लिये श्री भालचंद्र शास्त्रीजी का बहुत आभारी है ।

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“सौन्दर्य लहरी” का “सौन्दर्य-माधुर्य”

“सौन्दर्य लहरी” श्री भगवत्पाद आद्य शङ्कराचार्य द्वारा रचित एक प्रासादिक स्तोत्र है जिसके पाठ से अनेक साधकों का महान कल्याण हुआ है। श्री जगज्जननी आदिशक्ति महात्रिपुर सुन्दरी के प्रकाश से यह सकल चर अचर प्रकाशित है। माँ की इस स्तुति से साधक शिशुओं के हृदय में अपार शान्ति एवं अपूर्व तेज और ओज का दिव्य समावेश होता है—यह अनेकों का अनुभव है। उसी महान मंगलमय स्तोत्र की श्रीमत्स्वामीजी श्री विष्णुतीर्थजी महाराज ने योगपरक अपूर्व व्याख्या की है जो ज्ञान-विज्ञान एवं व्यक्तिगत यौगिक अनुभूतियों से समवेत होने के कारण योगसाधकों के लिए अनमोल बन गयी है। वेद, उपनिषद, गीता, सप्तशति आदि ग्रंथों के प्रचुर उद्धरण एवं प्रमाण से ग्रंथ का एक-एक पृष्ठ परिपुष्ट है। पूर्वानुक्रमणिका के कारण यह अत्यन्त गहन एवं रहस्यपूर्ण विषय बहुत ही सरलता से संग्राह्य हो गया है। क्लिष्ट शब्दों के अर्थ, भावार्थ एवं संक्षिप्त टिप्पणी तथा विषय-विवेचन के विवरण से संपूर्ण ग्रंथ अपने आन्तरिक सौन्दर्य-माधुर्य के साथ आस्वाद्य हो गया है। लेखक ‘अनुभवी’ व्यक्ति मालूम होते हैं, साधना के गुह्य पथ का आपको अनुभव है, वे उसके रहस्य और मर्म को भली भांति जानते-समझते हैं और समझाने की भाषा इतनी प्राञ्जल, मधुर एवं मोहक है

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Author

प्राक्-कथन

सनातन वैदिक धर्म में ब्रह्मोपासना की विधि के निर्गुण सगुण भेद से दो क्रम कहे जा सकते हैं । निर्गुण ब्रह्म सत् असत् से परे अक्षर अबिनाशी अनिर्देश्य अचिन्त्य अव्यक्त स्वरूप है । वह सर्व व्यापक होने पर भी कूटस्थ स्पन्दरहित अचल है, इन्द्रियों का वह विषय नहीं, मन की उस तक गति नहीं और बुद्धि की विवेक शक्ति वहां तक पहुंचते २ थक जाती है । एक मात्र निर्विकल्पावस्था में ही उसकी उपलब्धि होना संभव है । कहा है ‘एकमेव दर्शनं ख्यातिरेव दर्शनम्’ (पञ्चशिखाचार्य) । अव्यक्त स्वरूपा प्रकृति से भी अतीत वह परम अव्यक्त है,

परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः ।
गीता (८, २०)

चेतन आत्मा की भी पराकाष्ठा अर्थात् अन्तिम सीमा होने के कारण उसको परमात्मा कहते हैं । उसी को सर्व व्यापक होने से महा विष्णु, सर्व कल्याणमय होने से पर शिव, सर्वशक्तिमान होने से शक्ति का ईश्वर, निरतिशय सर्वज्ञ होने से प्रज्ञान घन, परं सत्य होने से सत्यनारायण, सुख राशी होने से आनन्दकंद, सत्तात्म होने से सद्ब्रह्म, चेतन होने से चिद्ब्रह्म या चिन्मात्र चिति शक्ति कहते हैं । उसकी परम अव्यक्तता के कारण ही उसे बौद्धों ने शून्य निर्वाण पद कहा है ।

श्री मद्भागवत् में भगवान वासुदेव का परं सूक्ष्मरूप समझने के लिये उसकी शून्यवत् कल्पना करने का निर्देश किया गया है, यथा:—

यत्तद्ब्रह्म परं सूक्ष्ममशून्यं शून्यकल्पितं ।
भगवान् वासुदेवेति यं गृणन्ति हि सात्वताः ॥(९, ९, ३०)

इंद्रियों एवं मन के संचालक, बुद्धि के प्रज्ञात्म प्रकाश, प्राणों के प्राण और प्रकाश को भी प्रकाश देने वाले ऐसे परम तत्त्व का ध्यान कैसे किया जा सकता है ? सामान्य जन की स्थूल चंचल बुद्धि वहां काम नहीं करती, इसलिये उसके व्यक्त होने वाले गुणों का ही ध्यानार्चन करना पडता है । वह ऐसा सूर्य है, जिसको दृष्टि नहीं देख सकती, उसके तेज का ही ध्यान संभव होने के कारण, उस तेज के विभिन्न स्तरों पर चमकने वाली उसकी विभूतियों द्वारा ही उसका चिन्तन किया जाता है, यह ही सगुण उपासना कहलाती है । उससे उद्भूत तेजोमयी भ्राजमान शक्ति की व्यक्तता में ही उस सत्य को देखा जा सकता है । उसकी श्री को कोई प्रकृति, कोई माया, कोई उमा, कोई लक्ष्मी, कोई शक्ति, कोई प्रकृति कहते हैं । वह वैष्णवी माया चेतन प्राणियों की चेतना है, विश्व की कान्तिमयी श्री है, जगत् की धात्री और प्रतिष्ठा है । बुद्धि वह है तो निद्रा भी वह ही है, तृषा है तो तृष्टि भी वह ही है । प्रेम, भक्ति, श्रद्धा, दया के सात्विक भाव उसी की मंद मुस्कान से विभूषित होने के कारण सदा विश्व का कल्याण करने के निमित्त अनुग्रह की वर्षा किया करते हैं ।

इसलिये सगुण उपासना में शक्ति रूप से ब्रह्म की उपासना करने की प्रधानता सनातन धर्म में विशेष रूप से पाई जाती है । नास्तिक

जड भौतिक-वादी जन तो सब शक्ति की ही उपासना करते हैं, परंतु उनकी उपासना अचेतनता के स्तर पर है, उसमें देव भाव न होने के कारण वह प्राणहीन उपासना है । सनातन धर्मावलंबी भक्तगण चिति शक्ति के उपासक होते हैं और उनकी वह उपासना परम ब्रह्मतत्त्व की ही उपासना है । वैष्णवों के वृन्दावन की श्री राधा रानी, राम के मन्दिरों में सीता माता, शैवों की उपासना में उमा और शाक्तों की मां दुर्गा, काली, शक्ति उपासना की प्रथम प्रधानता के द्योतक हैं । शंकर भगवत्पाद ने सौंदर्य लहरी में जगज्जननी उमा पार्वती की प्रार्थना के मिस सनातन धर्म के अतिरहस्यमय गूढ और प्रभाव शाली शक्ति उपासना के एक उस साधन क्रम की विशद व्याख्या की है, जो श्रीविद्या के नाम से प्रसिद्ध है । श्रीविद्या की उपासना पद्धति तंत्रों की आधारभूत पद्धति है, जो योगियों में श्री रूपा कुण्डलिनी शक्ति को जगाने के लिये गुरु परंपरा से गुरु की शक्तिपात दीक्षा द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है । यह उपासना वैदिक काल से चली आ रही है, इस बात का अकाट्य प्रमाण यह है कि तैत्तिरीय अरण्यक की एक आख्यायिका में देखने को मिलता है कि पृश्नी नाम के ऋषियों ने श्रीचक्र के अर्चन द्वारा कुण्डलिनी शक्ति का मूलाधार से सहस्रार में उत्थान करके योग सिद्धि प्राप्त की थी, और भास्करराय भी कादि विद्या की प्रधानता सिद्ध करने के प्रमाण में ‘चत्वार ईं बिभर्ति क्षेमयन्तः’ इस शाङ्खायन श्रुति को उद्धृत करके अपने वरिवस्या रहस्य नामक ग्रंथ में कहते हैं कि इस ऋचा में चार ‘ईं’ से कादि पंचदशी मंत्र की ओर संकेत है । त्रिपुरा तापनी उपनिषद् में कादि पंचदशी का उद्धार गायत्री मंत्र, ‘जातवेदसे सुनवाम’ और

‘त्र्यंबकंयजामहे’ इत्यादि वेदमंत्रों के आधार पर किया गया हैं, अपिच त्रिपुरोपनिषद् में दोनों कादि हादि विद्याओं का स्पष्ट उल्लेख है। श्रीमच्छंकराचार्य को श्रीविद्या की दीक्षा योगीन्द्र श्रीमद्गोविंद पादाचार्य से मिली थी, श्री श्री गोविंदपादाचार्य को इस विद्या की दीक्षा श्री श्री गौडपादाचार्य से मिली थी। श्री श्री गोडपादाचार्य का लिखित सुभगोदय नामक ग्रंथ जो श्रीविद्या का ग्रंथ है, इस बात की पुष्टि करता है। श्रीमच्छंकर भगवत्पाद ने सुभगोदय की छाया पर ही सौंदर्य लहरी के प्रथम ४१ श्लोकों की रचना की है।

प्रत्येक उपासना के बहिर और अन्तरंग दो भेद होते हैं। बहिर्पूजा की उपयोगिता उस समय तक ही रहती है जब तक कुण्डलिनी शक्ति का जागरण नहीं होता, तत्पश्चात् अन्तःसाधना का आरंभ होता है। इस ही नियम के अनुसार श्रीविद्या की बहिरुपासना श्रीचक्र पर की जाती है और अन्तरुपासना के लिये देह में ही श्रीचक्र की भावना करने का विधान है। देखें भावनोपनिषद् परिशिष्ट नं. (३)। देह में सुषुम्ना पथ द्वारा कुण्डलिनी का उसके जागरणोपरान्त आरोह अवरोह होने लगता है। श्री चक्र पर अन्तर्भावना युक्त बहिरुपासना करने से शक्ति के जागरण में सहायता मिलती है। श्रीचक्र का अर्चन पूजन सब उपासना का कर्मकाण्ड रुपी स्थूल अंग है और शक्ति जागरण के पश्चात षट् चक्र वेध की क्रियाओं का योग परक साधन धारणा ध्यान समाधि के अंतरंग साधनों युक्त उसका सूक्ष्म अंग है। स्थूल से सूक्ष्म और सूक्ष्म से कारण तक पहुंचा जाता है।

यद्यपि सौन्दर्य लहरी एक तांत्रिक ग्रंथ है, तो भी वह श्रीमद्-भगवत्पाद शंकराचार्य का विरचित है इस बात पर पराचीन और

अर्वाचीन सब विद्वानों का एक मत होने से, यह विषय अधिक विवादास्पद नहीं है; श्रीमच्छङ्कर भगवत्पाद के लिखित अनेक देवी देवताओं के स्तोत्र प्रसिद्ध हैं, परन्तु विद्वत्समाज का जितना ध्यान सौन्दर्य लहरी ने आकर्षित किया है और अब भी वह जितने मान से देखी जाती है, उतना दूसरा स्तोत्र नहीं है। सौन्दर्य लहरी पर श्री अच्युतानन्द, पंडित अनन्त कृष्ण शास्त्री और लक्ष्मीधर जैसे विद्वानों की टीकाएं संस्कृत साहित्य में बडे आदर से देखी जाती हैं। कलकत्ता हाईकोर्ट के प्रमुख न्यायाधीश सर जोन् वुड्रफ महोदय ने भी, जो तांत्रिक संसार में आर्थर अवैलन के नाम से प्रसिद्ध हैं और तांत्रिक साहित्य का अन्वेषण, अध्ययन और प्रकाशन करके पाश्चात्य जगत् का ध्यान इस ओर खेंचने का श्रेय जिनको प्राप्त है, सौंदर्य लहरी के पूर्व भाग आनन्द लहरी पर एक संक्षिप्त अंग्रेजी टीका लिखी है। उक्त टीका के प्राक् कथन (preface) में जो मत प्रकट किया गया है, वह हम पाठकों की जानकारी के लिये यहां नीचे देते हैं। तदनुसार बंगाल के प्रसन्नकुमार शास्त्री की ई. सन १९०८ में प्रकाशित श्री शङ्कराचार्य ग्रंथावलि में सौन्दर्य लहरी को भी स्थान दिया गया है। और वहां पाठकों का लक्ष्य महामहोपाध्याय सतीशचन्द्र विद्याभूषण के कलकत्ता रिव्यू के १९१५ जूलाई मास के अंक में प्रकाशित एक लेख की ओर भी कराया गया है। आप का कहना है कि सौन्दर्य लहरी की प्राचीनता तो इस बात से काफ़ी निश्चय के साथ प्रमाणित है कि इस पर स्तोत्र साहित्य में सब से अधिक टीकायें मिलती हैं, यद्यपि यह बात उसके भगवत्पाद का लेख होने का तो प्रमाण नहीं कही जा सकती; परन्तु सारे भारतवर्ष में

जो लगभग ३५ टीकायें इस स्तोत्र पर लिखी जा चुकी हैं, इस स्तोत्र के शंकर भगवत्पाद का विरचित होने का बहुत बडा प्रमाण हैं, क्योंकि प्रायः सब ही टीकाकारों का इस बात पर एक मत है, कि यह स्तोत्र भगवत्पाद श्री शंकराचार्य का ही विरचित है । इन टीकाकारों में से जो प्राचीन तम हैं असंदिग्ध रूप से सौन्दर्य लहरी को भगवत्पाद की कृति ही सिद्ध करते हैं । कैवल्य शर्मा, जो उडीसा के नरेश प्रतापरुद्रदेव के राज्यकाल १५०४ से १५३२ तक में हुए कहे जाते हैं अपनी टीका के प्रारम्भ में स्पष्ट लिखते हैं:—भगवान् परमकारुणिकः शंकरावतारः श्री शंकराचार्यः शिवशक्त्योरभेदं ज्ञापयितुं सकलप्रपंचसाक्षिण्याः ब्रह्माविनाभूतं चिच्छक्तेः स्तुतिद्वारा इत्यादि । कैवल्य शर्मा और उनके समकालीन लक्ष्मीधर एक मनोरमा संज्ञक ग्रंथ का उल्लेख करते हैं जो श्री शिवादि गुरुपारम्पर्य्य सत्सम्प्रदायानुसारि मुनीन्द्र श्री सच्चिदानन्दनाथ के शिष्य सहजानन्दनाथ विरचित है और श्री सच्चिदानन्दनाथ स्वामी का नाम शृंगेरीमठ के आचार्यों की नामावलि में मिलता है ( Vide Descriptive catalogue of Madras Mss., vol. XIX P. 7606 ) और एक ऐसे व्यक्ति की टीका जो आदि शंकराचार्य के संप्रदाय से सम्बन्ध रखता है, सौन्दर्य लहरी के भगवत्पाद की कृति होने का अच्छा प्रमाण है । लक्ष्मीधर ने सुभगोदय व्याख्यान नाम के श्री शंकराचार्य विरचित एक ग्रंथ का भी उल्लेख किया है, जो श्री गौडपादाचार्य विरचित सुभगोदय की टीका मालूम होती है । इस से यह स्पष्ट है कि शिवागम का तांत्रिक साहित्य श्री गौडपादाचार्य के काल में भी बहुत प्रचलित था, और श्री शंकराचार्य को गुरुपरम्परागत संप्रदायानुसार शक्तिदीक्षा

मिली थी। सुभगोदय का अर्थ 'सुभगा का उदय' अर्थात् 'कुण्डलिनी शक्ति का जागरण' किया जा सकता है। श्री शंकराचार्य विरचित प्रपंचसार संग्रह तंत्र भी इस बात की पुष्टि करता है, जिस पर भगवत्पाद के शिष्य श्री पद्मपादाचार्य ने टीका लिखी है। शार्दा-तिलक के टीकाकार राघवभट्ट ने अपनी ई. १४९३ में लिखित टीका में उसका उल्लेख किया है। इन प्रमाणों के होते हुए सब शंकाएं निरर्थक हैं। वेदोंके भाष्यकार सायनाचार्य ने भी प्रपंचसार संग्रह पर एक टीका लिखी है, और वेदान्त कल्पतरु अध्याय १ पाद ३ अधिकरण ८ सूत्र ३३ में भी प्रपंचसार संग्रह का उल्लेख मिलता है और वहां वह तंत्र शारीरकभाष्यकार श्री शंकर भगवत्पाद का लिखा हुआ बताया जाता है।

हमारी तो इन ऐतिहासिक समस्याओं से अधिक दिलचस्पी नहीं है; इसलिये इतना ही लिखना पर्याप्त समझते हैं, कि शारीरकमीमांसाभाष्य के पढने से यह बात स्पष्ट है कि शंकर भगवत्पाद ने वेद वेदान्तानुकूल स्मृत्युक्त सब योग और उपासनाओं को अंगीकार किया है और वेदवेदान्त विरुद्ध सिद्धान्तों का परिहार किया है, इसलिये तांत्रिक योग पद्धतियों और उपासनाओं को भी अपनाने में उनको आपत्ति नहीं हो सकती थी, जहां तक कि वे वेदवेदान्त का समर्थन करने वाली हैं, और प्रपंचसार संग्रह एवं सौंदर्य लहरी की सैद्धांतिक भूमिका श्रौत मार्ग के विपरीत नहीं है अपितु श्रौत सिद्धान्तों का समर्थन करती है। और जबकि सब ही पराचीन और अर्वाचीन विद्वानों का बहुमत इस बात के पक्ष में है कि सौंदर्य लहरी भगवत्पाद की ही रचना है तो उसके विरुद्ध शंका उठाकर वादविवाद में पडना वांछनीय नहीं।

इस संबंध में एक शंका बहुदा यह भी उठाई जाती है कि शंकर भगवत्पाद विवर्तवाद के प्रवर्तक थे वे परिणामवाद के कदापि समर्थक नहीं बन सकते थे, परन्तु सौंदर्य लहरी में स्पष्ट रूप से परिणामवाद का समर्थन किया गया है, देखें श्लोक १ और ३५ । इस शंका का उत्तर स्वयं भगवत्पाद ब्रह्मसूत्र (२, १, १४) के भाष्य की अंतिम पंक्ति में इन शब्दों में देते हैं:—'अप्रत्याख्यायैव कार्य-प्रपंचं परिणाम प्रक्रियां चाश्रयति सगुणेषु उपासनेषूपयोक्ष्यते इति ।' अर्थात् कार्य प्रपंच को सिद्ध करने के लिये नही वरन् सगुण उपासना के उपयोग के लिये परिणामवाद का सूत्रकार ने आश्रय लिया है । भगवत्पाद ने ब्रह्म सूत्रों में सर्वत्र सत्कारणवाद को सिद्ध करते समय जगत् को सत्‌शक्ति का परिणाम ही सिद्ध किया है । आगे चलकर ब्रह्म सूत्र (२,१,२४) के भाष्य की अन्तिम पंक्ति में भी वे इन शब्दों में उपसंहार करते हैं:—'तस्मादेकस्यापि ब्रह्मणो विचित्रशक्तियोगात्क्षीरादिवत् विचित्र परिणाम उपपद्यते' ।

श्रीविद्या का प्रचार मद्रास प्रान्त में अधिक है, उत्तर भारत में उसका सर्वथा अभाव-सा प्रतीत होता है, यहां तक कि उत्तर भारत का विद्वत्समाज इस विद्या से अनभिज्ञ दिख पडता है । इसलिये हमने सौंदर्य लहरी पर यह व्याख्या हिंदी जानने वालों के लाभार्थ हिंदी में लिखने का साहस किया है । यद्यपि यह विषय प्रधानतया तान्त्रिक है, परन्तु हमने अपने विचारों की पुष्टि में उपनिषद् गीता जैसे सर्वमान्य शास्त्रों का ही उद्धरण इस दृष्टि से किया है कि तंत्रों का साहित्य वाममार्ग की कुत्सित प्रथाओं के कारण सामान्य जनता में अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता । परन्तु हम साथ ही पाठकों को यह भी बता-

. ९.

देना उचित समझते हैं कि तंत्रोक्त समयाचार शुद्ध सात्विक उपासना का मार्ग है और श्रीमच्छंकर भगवत्पाद की लेखनी से निकला हुआ यह स्तोत्र इस बात का सर्वोपरि प्रमाण है । श्रीभगवत्पाद का लिखित एक प्रपंचसार तंत्र भी मिलता है जिसे सैट् अवैलन महोदय ने अपनी तंत्रागम ग्रंथावलि में प्रकाशित किया है ।

श्रीविद्या पर परशुराम कल्पसूत्र, और उसके आधार पर संग्रहीत नित्योत्सव एवं भास्करराय का समस्त साहित्य पढने योग्य है । कैवल्य शर्मा ने सौंदर्य लहरी पर भाष्य लिखा है । संस्कृत जानने वाले विद्वानों को श्रीविद्या के रहस्यों को जानने के लिये उपरोक्त ग्रंथ अवश्य पढने चाहिये । श्रीविद्या के जिज्ञासुओं को त्रिपुरातापिनी, देवी, त्रिपुरा और भावनोपनिषदें भी देखने योग्य हैं । त्रिपुरा और भावनोपनिषदों को हम परिशिष्ट में दे रहे हैं ।

अंग्रेजी में सौंदर्य लहरी पर कई ग्रंथ लिखे जा चुके हैं, ३ ग्रंथ हमारे देखने में आये हैं । दि थियोसोफिकल पब्लिशिंग हाउस, अडयर का प्रकाशित और पंडित स० सुब्रह्मण्य शास्त्री (F. T. S.) और ट. र. श्रीनिवास अयंगार (B A. L. T.) की लिखित अंग्रेजी प्रति हमारे सामने है, जिसको पढकर हमें यह ग्रंथ हिंदी में लिखने की प्रेरणा मिली । हम उक्त दोनों सज्जनों के अनुगृहीत हैं क्योंकि उनके ग्रंथ से अनेक विषयों पर हमें पर्याप्त सहायता मिली है ।

साथ ही मैं श्री स्वामी शंकरानन्द भारतीजी, जिनको साहित्य-संसार महामहोपाध्याय वेदान्त वागीश श्री श्रीधर शास्त्री पाठक प्रोफेसर डेक्कन कालेज पूना के नाम से परिचित हैं, डॉ. दुर्गाशंकर

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नागरजी (कल्पवृक्ष के संस्थापक उज्जयनी, और श्री विनायकराव बापू वैशंपायनजी देवास का भी अनुग्रह प्रकट करना जरूरी समझता हूं जिनने अपना बहुमूल्य समय प्रदान करके ग्रंथ पर अपनी सहानुभूति एवं संम्मति प्रदान की है, जो ग्रंथ के पूर्व भाग में प्रकाशित की जाती हैं ।

परिशिष्ट मे नासदासीय ऋग्वेदीय सूक्त भी हिंदी अनुवाद सहित दिया जा रहा है ।

देवास-मध्यभारत }
सं० २००५ }

विष्णुतीर्थ