सौन्दर्यलहरी (आदि शङ्कराचार्य - सचित्र हिन्दी अनुवाद सहित)
Soundarya Lahari of Shankaracharya Hindi
श्रीमदादि शङ्कराचार्य द्वारा
स्रोत: Soundarya Lahari with Shlokas, Yantras & Hindi Commentary (उद्गम)
सौंदर्य लहरी २९३
इसलिये बद्धजीव का अन्तरात्मा रूपी शिव सदा असंग होने पर भी भगवती के पद प्रहार से अपने को शोक रहित अनुभव करने की सदा स्पृहा किया करता है ।
( ८६ )
मृषा कृत्वा गोत्रस्खलनमथ वैलक्ष्यनमितं
ललाटे भर्तारं चरणकमले ताडयति ते ।
चिरादन्तःशल्यं दहनकृतमुन्मूलितवता
तुलाकोटिक्वाणैः किलिकिलितमीशानरिपुणा ॥
कठिन शब्द— मृषाकृत्वा=झूठा करके, गोत्र=वंश, पहाड, नाम, अथवा गां इन्द्रियं त्रायते इति गोत्र । स्खलन=गिरावट, फिसलना । वैलक्ष्य=लज्जा, स्वभाव का परिवर्तन, लक्ष्य से हटना । शल्यं=बाण, अन्तर्दाह । उन्मूलितवता=जड़ से उखाड़ता हुआ, सर्वथा नष्ट करता हुआ । तुलाकोटि=मंजीरा, नूपुर, तराजू के पल्ड़ों की आकृति वाला । क्वाणैंकिलिरतं=घंटियां, मंजीरों, अथवा नूपुरों के बजने का शब्द । ईशानरिपु=शिव का शत्रु, काम । भर्ता=पालने वाला, पति ।
**सामान्य अर्थ—**तेरे गोत्र का अपमान करने से लज्जित नीचे नेत्र किये हुए भर्त्तार के ललाट पर तेरे चरण कमलों का ताडन होने पर ईशानरिपु ( कामदेव ) ने जिसको चिरकाल से जलाया जाने के कारण अन्तर्दाह था उसे निकालते हुए अपना बदला देखकर, तेरे नूपुरों के बजने के क्वणत्कार की किल-किलाहट रूपी हर्ष ध्वनि की ।
२९४ सौंदर्य लहरी
पूर्व श्लोक में शिवजी को भगवती के चरणों के ताडन की स्पृहा दिखाकर, इस श्लोक में यह दिखाया गया है कि भगवती ने भर्त्तार के ललाट पर चरण कमलों से लात मारकर उनकी इच्छा पूरी की । इसका सामान्य अर्थ शृंगार रस पूर्ण है और शृंगार रस के प्रेमी जन प्रेयसी के चरणस्पर्श करना, अथवा उसके पदप्रहारों से प्रसन्न होना शृंगार-रस की विशेषता मानते हैं । श्रीकृष्ण भगवान से भी राधिका के भक्त गण उनके चरण पलोटन कराने में अपनी उपासना की उत्कृष्टता समझते हैं । परन्तु आपत्ति जनक विषय तो यह है कि क्या ९७ श्लोकोक्त सतीत्व की चरम सीमा पति के ललाट पर पद प्रहार करने में होती है । ऐसे विरुद्ध भावों का समन्वय कैसे किया जा सकता है ? इसलिये हम इसका कूटार्थ योगपर दिखाने का नीचे यत्न करते हैं । सामान्य भाव तो यह ही है कि शंकर जिन्होंने काम को भस्म कर दिया, वह भी पत्नि की लातें खाकर काम के उपहास्यास्पद बनते हैं ।
इस श्लोक का दूसरा अर्थ इस प्रकार किया जा सकता है । गोत्र का अर्थ इन्द्रिय संयम किया जा सकता है, अर्थात् 'गां त्रायते इति गोत्रम्' इसलिये गोत्रस्खलनं से इन्द्रिय संयम की गिरावट अथवा इन्द्रिय संयम से च्युत होना है, उसको मृषाकृत्वा अर्थात् झूटा करने से इन्द्रिय संयम की कमी को पूरा करने का अभिप्राय है वैलक्ष्यनमितं उस दृष्टि को कहते हैं, जिसमें लक्ष्य रहित दृष्टि नीचे को झुकी होती है । शांभवी मुद्रा में भी नेत्रों की मुद्रा ऐसी ही रहती है । जिसमें अन्तर्लक्ष्य बहिर्दृष्टि होने से दृष्टि लक्ष्य रहित हो जाती है, और नेत्र अर्धोन्मीलित से खुले रहते हैं, जालंधर
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बंध लग जाने से शिर भी आगे को झुक जाता है और चिबुक कंठ कूप पर जा लगती है, उस समय दृष्टि नीचे की ओर झुक जाती है और उसे वैलक्ष्य नमित कह सकते हैं। इन्द्रिय संयम युक्त जालंधर बन्ध लगने पर शांभवी मुद्रा का फल यह होता है कि शक्ति का उत्थान होकर वह झट आज्ञा चक्र के ऊपर चढ जाती है, अर्थात् आज्ञा चक्रस्थ शिव के ललाट पर पदार्पण करती हुई सहस्रार में प्रवेश करने को उतावली हो उठती है। भर्त्तार पद से देहाभिमानी देह का पोषण करने वाला भर्ता ही महेश्वर है।
उपद्रष्टानुमन्ताच भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेस्मिन्पुरुषः परः ॥ गीता
क्योंकि आज्ञा चक्र तक ही देहाभिमान रहता है, उसके ऊपर चित्त की अवस्था उन्मुन्याभिमुखी होने लगती है और देहाभिमान शिथिल होने पर भर्ता शब्द की उपयुक्तता कम होने लगती है।
शंकर भगवत्पाद ने स्थान २ पर भगवती के अंग प्रत्यंग की सुन्दरता का वर्णन करते समय उसके हावभावों में कामदेव का सहयोग दिखाया है, मानो कामदेव सदा भगवती का आश्रय लेकर अपना कार्य करता रहता है, और ऐसा प्रतीत होता है कि मानो भगवती कामदेव की ही प्रति मूर्ति है। कादि विद्या का प्रथम अक्षर ककार है, जिससे ब्रह्म की आदि काम रूपा शक्ति अभिप्रेत है। उसकी त्रिपुरतापिन्युपनिषद में इस प्रकार व्याख्या मिलती है।
स एको देवः शिव रूपी दृश्यत्वेन विकासते, यतिषु, यज्ञेषु, योगिषु कामयते । कामं जायते । स एष निरंजनोऽका-
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मत्वेनोज्जृम्भते, अक्रचटतपयशान् सृजते । तस्मादीश्वरः कामोऽभिधीयते, तत्परिभाषया कामः ककारं व्याप्नोति ।
**अर्थः—**वह एक शिव रूपी देव दृश्य के रूप में विकसित होता है । यतियों में, यज्ञों में, योगियों में कामना करता है । इस प्रकार काम उत्पन्न होता है । वह निरंजन कामना रहित ब्रह्म जंभुहाई लेता है (विकसित होता है ।) अ वर्ग, क वर्ग, च वर्ग, ट वर्ग, त वर्ग, प वर्ग, य वर्ग और श वर्गों की सृष्टि करता है । इसलिये ईश्वर को काम कहते हैं । उसकी परिभाषा करने से काम ककार में व्यापक माना जाता है ।
सृजन शक्ति आद्योपान्त काम शक्ति ही है, सामान्य इच्छा के रूप में उसे कामना कहते हैं और प्रजनन वासना को काम वासना कहते हैं । वह शिव की प्रभवाभिमुखी शक्ति है । परन्तु जब वह प्रति प्रसव रूपा होती है, तब उसे शिवा कहते हैं । प्रभव और लय क्रम दोनों उसके विपरित भाव होने के कारण एक दूसरे के प्रति-बन्ध और शत्रु हैं । समाधि काल में काम शिव का शत्रु हैं, परन्तु सृष्टिकाल में वह ही शक्ति के रूप में शिव की अर्धांगिनी का सहयोगी बन जाता है । समाधि काल में जिस काम को शंकर अपने तीसरे नेत्र को खोलकर भस्म कर देते हैं, वह ही उनके प्रभवाभिमुख होने पर मानो उनका उपहास करता है । भगवती के नूपुरों के श्रृंगार रस परिपूर्ण क्वण २ शब्द की ध्वनि में मानों कामदेव के उक्त उपहास का व्यंग व्यक्त हो रहा है । नृत्य के समय नूपुर ध्वनि अथवा गान वाद्य के साथ मंजीरों का
सौंदर्य लहरी २९७
बजना, जो ध्यान समाधि के प्रतिपक्षी हैं, कामदेव की प्रसन्नता को व्यक्त करने वाले हास्य की खिलखिलाहट सदृश्य हैं।
मन के लय और व्युत्थान का स्थान आज्ञा चक्र के ऊपर है। अनाहत् में ईश्वर, विशुद्ध में सदाशिव और आज्ञा में शिव का स्थान है। शांभवी मुद्रा को समाधि का दृागोद्घाटन कहना चाहिये। व्युत्थान के समय जब शक्ति नीचे उतरती है, तब मानो शिव के ललाट पर पद प्रहार करती हुई नीचे उतरती है, और उसके नूपुरों के शब्द में कामदेव के हास्य की प्रति ध्वनि बताई गई है। शांभवी मुद्रा के अभ्यासी को काम वासना रूपी अन्तर्दाह का उन्मूलन हो जाता है।
(८७)
हिमानीहन्तव्यं हिमगिरिनिवसैकचतुरौ
निश्यायां निद्राणं निशि च पर भागे च विशदौ।
परं लक्ष्मी पात्रं श्रियमनिसृजन्तौ समयिनां
सरोजं त्वत्पादौ जननि जयतश्चित्रमिह किम् ॥
**अर्थ—**हे जननि ! तेरे दोनों चरण कमल पर जय प्राप्त कर रहे हैं, इसमें आश्चर्य क्या है ? क्योंकि कमल बर्फ से मर जाता, तेरे चरण हिमगिरि पर निवास करने में कुशल हैं। कमल रात को सो जाता है, तेरे चरण दिन रात विशद रहते
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हैं; वह दिन में लक्ष्मी का पात्र रहता है और तेरे चरण समयाचार के उपासकों को खूब लक्ष्मी देते हैं ।
अर्थात् तेरे चरणों को कमल की उपमा कैसे दी जा सकती है ? कदापि नहीं दी जा सकती ।
( ८८ )
पदं ते कीर्त्तीनां प्रपदमपदं देवि विपदां
कथं नीतं सद्भिः कठिनकमठीखर्परतुलाम् ।
कथंचिद्वाहुभ्यामुपयमनकाले पुरभिदा
यदादाय न्यस्तं दृषदि दयमानेन मनसा ॥
**अर्थ—**हे देवि ! तेरा पद कीर्त्तियों का प्रपद (स्थान) है और विपदाओं का अपद है । न जाने सत्पुरुषों ने उसकी तुलना कछुवे की कठिन खोपरी से कैसे की है, वह इतना कोमल है कि विवाह के समय पुरारि ने दयार्द्र मन से किसी प्रकार (अर्थात् बडी हिचकिचाहट और बडे संकोच के साथ) दोनों हाथों से उठाकर उसे पत्थर पर रखा था ।
विवाह में फेरों या भांवरों के समय वर वधू के एक चरण को अपने हाथों से उठाकर पत्थर पर रखकर कहता है, कि हे देवि ! तू धर्म पालनार्थ अपना चित्त इतना दृढ रखना जैसा यह पत्थर है ।
सौंदर्य लहरी २९९
कैवल्यशर्मा का मत है कि यह श्लोक मद्रास की भाषाओं की प्रतियों में नहीं मिलता, इसलिये क्षेपक है।
( ८९ )
नखैर्नाकस्त्रीणां करकमलसंकोचशशिभि-
स्तरूणां दिव्यानां हसत इव ते चण्डि चरणौ ।
फलानि स्वःस्थेभ्यः किसलयकराग्रेण ददतां
दरिद्रेभ्यो भद्रां श्रियमनिशमहायददतौ ॥
कठिन शब्द— नाक=स्वर्ग, किसलय=पत्र, पल्लव, अहाय=तुरन्त, स्वःस्थ=स्वावलंबी, स्वर्ग निवासी, अनिशं=निरन्तर ।
**अर्थ—**हे चण्डि ! तेरे दोनों चरण अपने नखों ने कल्पवृक्षों का परिहास सा कर रहे हैं, जो नख देवांगनाओं के कर रूपी कमलों को (हाथ जोडने समय) बंद करने के लिये संख्या में १० चन्द्रमा सदृश हैं। कल्पवृक्ष तो स्वर्ग में रहने वाले स्वावलंबी देवताओ को अपने पल्लव रूपी कराग्रों से फल देते हैं, परन्तु तेरे चरण दरिद्रियों को निरन्तर, तुरन्त और बहुत धन देते रहते हैं।
कल्पवृक्ष से स्वर्ग निवासियों को ही लाभ है, यहां के दरिद्रियों को कुछ नहीं।
३०० | सौन्दर्य लहरी
( ९० )
ददाने दीनेभ्यः श्रियमनिशमाशाऽनुसदृशी-
ममन्दं सौन्दर्यप्रकरमकरन्दं विकिरति ।
तवास्मिन्मन्दारस्तबकसुभगे यातु चरणे
निमज्जन्मज्जीवः करणचरणः षट्चरणताम् ॥
कठिन शब्द— करण चरणः=इन्द्रियां रूपी चरण वाला,
षट्चरण=भौँरा, मधुकर ।
**अर्थ:—**इस तेरे चरण में जो मंदार वृक्ष के पुष्पों के स्तबक जैसा सुन्दर है, मेरा ५ ज्ञानेन्द्रिय और १ अन्तः करण रूपी ६ चरण वाला यह जीव छः चरणों वाला मधुकर बनकर डूबा रहे । तेरा चरण जो दीनों को उनकी आशा के अनुसार निरन्तर लक्ष्मी देता रहता है, और सौन्दर्य राशि के मकरन्द को खूब फैलाता रहता है और मन्दार के पुष्पों के स्तबक सदृश सुभग है ।
अर्थात् मैं भौंर की तरह तेरे चरण कमल पर अपना सर्वस्व मनसा, वाचा कर्मणा सब इन्द्रियों और मनके व्यापारों को समर्पण करदूं ।
सौंदर्य लहरी ३०१
चरणों की गति का ध्यान:-
( ९१ )
पदन्यासक्रीडापरिचयमिवाऽब्धुमनम- श्रन्तस्ते (स्खलन्तस्ते) खेलं भवनकलहंसा न जहति । अतस्तेषां (स्वविक्षेपे) शिक्षां सुभगमणिमञ्जीररणित- च्छलादाचक्षाणं चरणकमलं चारुचरिते ॥
कठिन शब्दः—आचक्षाणः=बातें करता हुआ
अर्थः— हे चारु चरिते ! ऐसा प्रतीत होता है कि तेरे भवन के राजहंस चलते समय तेरे पदन्यास क्रीडा (चाल) का परिचय प्राप्त करने को तेरे खेल का त्याग नहीं करते । (अर्थात तेरे पीछे २ तेरी तरह कदम उठाकर चलते हैं, और वे इस खेल का त्याग नहीं करते, और तेरे चलते समय चरण कमलों में लगी मणियों युक्त नूपुरों की झङ्कार का शब्द मानो उनको चलने की शिक्षा का उपदेश कर रहा है ।
स्त्रियों की चाल की हंसगति से उपमा दी जाया करती है, परन्तु भगवती की चाल से हंस स्वयं चलने की शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं । दूसरा भाव यह भी है कि परमहंस महापुरुषों की उन्मत्त गतिविधि में शक्ति की क्रीडा युक्त मस्तीभरी चाल का आभास रहता है । जीवनमुक्त परम हंस ही भगवती के भवन के राजहंस हैं ।
३०२ सौन्दर्य लहरी
पलंग का ध्यान:—
(९२)
गतास्ते मञ्चत्वं द्रुहिणहरिरुद्रेश्वरभृतः
शिवः स्वच्छच्छायाघटितकपटप्रच्छदपटः ।
त्वदीयानां भासां प्रतिफलनरागारुणतया
शरीरी शृङ्गारो रसइव दृशांदोग्धि कुतुकम् ॥
कठिन शब्द:—प्रच्छदपट=चादर, दृशां=दृष्टि को, दोग्धि=दुहता है, कुतुकं=कौतुहल
**अर्थ:—**ब्रह्मा हरि रुद्र और ईश्वर द्वारा रक्षा किये जाने वाले (क्रमशः मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर और अनाहत् चक्र ) तेरे मंच के चार पाये हैं, अर्थात् चारों तेरा मंच बनाते हैं उसपर बिछी हुई स्वच्छ छाया की बनी हुई कपट रुपी माया की चादर शिव है, जो तेरी प्रभा के झलकने के कारण अरुण दिख पडने से एसी प्रतीत होती हैं कि मानो शृङ्गार रस शरीरी बनकर दृष्टि में कुतूहल उत्पन्न कर रहा है ।
शिव शक्त्यात्मक प्रथम स्पन्द आज्ञा चक्र में, सदारुय अर्थात् अर्धनारीश्वर शिव विशुद्ध में, ईश्वर, रुद्र, विष्णु और ब्रह्मा क्रमशः नीचे के चारों चक्रों के आधिदेव हैं। रुद्र विष्णु और ब्रह्मा शुद्ध विद्या के अन्तर्गत है और जीव (पुरुष) माया के अन्तर्गत है और अन्य २४ तत्त्वों का संघात् रुपी देह अशुद्धविद्या के अन्तर्गत है।
सौंदर्य लहरी ३०३
अशुद्धविद्या के रूप को सुप्त कुण्डलिनी कहा जा सकता है। जागकर वह सब तत्त्वों की शुद्धि करती हुई विशुद्ध चक्र में अपने विशुद्ध रूप में विराजने लगती है। यह हम ऊपर भी एक स्थान पर कह आये हैं कि प्रसुप्त अवस्था में शक्ति का स्थान मूलाधार के पास सुषुम्ना से बाहर है और जागकर सुषुम्ना के भीतर स्वाधिष्ठान चक्र में, परन्तु विशुद्ध स्वरूप में वह विशुद्धिचक्र में रहती है। इस श्लोक में भगवती के इस रूप का ही वर्णन है।
इस श्लोक के साथ ३७ वें श्लोक को एक बार फिर पढ़ लेना चाहिये। व्योमेश्वर और व्योमेश्वरी का यहां चित्र खेंचा गया है। शिव को यदि स्वच्छ छाया घटित आकाशमयी मायावी चादर सदृश समझा जाय तो शक्ति को उसमें स्फटिकवत् झलकने वाली अरुणिमा समझना चाहिये।
श्री चक्र को भी भगवती का मंच कहा जा सकता है। ईशान् कोण में ईश्वर, अग्नि कोण में रुद्र, नैऋत्य कोण में विष्णु और वायव्य कोण में ब्रह्मा समझना चाहिये। अथवा पूर्व में ब्राह्मी (ईश्वरी) मातृ देवता, दक्षिण में रौद्री मातृ देवता पश्चिम में कौमारी मातृ देवता और उत्तर में वैष्णवी अर्थात् प्रत्येक की शक्ति को देव के वाम ओर में देखना चाहिये, जो चारों द्वारों पर स्थित हैं। श्री चक्र को आकाश रूपी स्फटिक का बना हुआ समझना चाहिये। उस पर शिव रूपी चादर है और अरुणिमा रूपी शक्ति है। बैन्दव स्थान पर शक्ति का आसन है। श्री चक्र की रश्मियां दसों दिशाओं में भुक्ति मुक्ति सहित अणिमादि सिद्धियों के रूपों में फैल रही हैं।
३०४ | सौंदर्य लहरी
यहां तक भगवती के अंगों का पृथक २ ध्यान बताया जाकर इस श्लोक में पूरे शरीर का ध्यान कहा गया है ।
( ९३ )
अराला केशेषु प्रकृतिसरला मन्दहसिते
शिरीषाभा ¹गात्रे दृषदिव कठोरा कुचतटे ।
भृशंतन्वी मध्ये ²पृथुरपिवरारोह विषये
जगत् त्रातुं शंभोर्जयति करुणा काचिदरुणा ॥
पाठान्तरः— १ चित्तेदृषदुपलशोभा, २ पृथुरुरसिजारोह
**कठिन शब्द—**अराला=कुटिल, पृथु=भारी, बडा, वरारोह=सुन्दर नितंब, उपल=रत्न, उरसिज=कुच, काचित्=कचते (प्रकाशित इति) काचित्, चमकती हुई अथवा काच के सदृश, अथवा कोई भी जिसको हम नहीं जान सकते । करुणा काचिदरुणा=करुणा का अर्थ काचित् अरुणा किया जाना चाहिये ।
**अर्थः—**शंभु की करुणा (अर्थात दया) की, जगत की रक्षा करने के लिये मानों जो काचित अरुणा है सर्वत्र जय हो रही है । जिसके अर्थात् अरुणा भगवती के केश स्वाभाविक सरलता लिये हुए घूंघराले अर्थात कुटिल हैं, मन्द २ हंसी मुख पर है, गात्र अथवा चित्त सिरस की आभा लिये हुए है, कुच पत्थर सदृश कठोर है (अथवा स्फटिक की शोभा युक्त हैं) मध्य में कटिभाग अति पतला है और नितंब भारी हैं (अथवा
सौंदर्य लहरी ३०५
कुचों का उठाव भारी है ) पाठान्तर को ग्रहण करने मे शरीर के स्थान पर चित्त और नितंब के स्थान पर कुचों का दुबारा वर्णन हो जाता है । चित्त को स्फटिक मे उपमित तो किया जा सकता, परन्तु देह की शोभा का वर्णन किया जाना अधिक उपयुक्त दिखता है, और कुचों को दोबारा न बताकर नितंबों का भी वर्णन आना अत्यावश्यक है, इसलिये हमने पाठान्तरों को पृथक् दिखा दिया है ।
शंभु की करुणा और अरुणा दोनों एक ही हैं । अरुणा भगवती का एक नाम है और उसके अरुण वर्ण के कारण प्रसिद्ध है । करुणा भी ककार पूर्वक अरुणा ही है, इसलिये ककार से काचित् का भाव व्यक्त होता है । काचित् का अर्थ 'कोई' होने से करुणा को अरुणा का एक अंश समझना चाहिये । अर्थात् पराशक्ति अरुणा जिसको कोई नहीं जान सकता वह शंभु की करुणा के रूप में ही जानी जा सकती है । दूसरा भाव यह भी है कि शंभु के स्फटिक अथवा कांच सदृश स्वच्छ शरीर में प्रतिफलित होने वाली अरुणिमा ही भगवती अरुणा की छबी करुणा के स्वरूप में दिख रही है । कुटिलता, हिंसा, और कठोरता करुणा के विरोधी भाव होते हैं । दया का मन्द पड़ना भी एक कमी का लक्षण है, और किसी भाव का तनु होना उसके क्षीण होने का पूर्व रूप है । इसलिये शंभु की करुणा में कुटिलता हिंसा, कठोरता, मन्दपना और तनु का भाव नहीं होना चाहिये, क्योंकि शंभु की करुणा के रूप में जगत की रक्षा के लिये ही अरुणा ने यह रूप धारण किया है । अराल का अर्थ कुटिल होता है परन्तु कुटिलता भगवती के केशों की
३०६ सौन्दर्य लहरी
शोभा बढ़ा रही है। शंभु की करुणा कभी मन्द नहीं पडती, परन्तु मन्दपना हंसी में रहकर करुणा की वृद्धि करता है। शिरीष की व्युत्पत्ति 'शॄ' धातु से है (शॄ हिंसायां शृणाति शीर्य्यते वा इति शिरीषः) अर्थात् जो काटा जाता है, अथवा जो फैलता है वह शिरीष कहलाता है। शिरीष अथवा सिरस एक वृक्ष का नाम है जो कल्याण का सूचक है। अर्थात् भगवती में हिंसा का भाव ऐसा है जैसा कि सिरस में, क्योंकि भगवती का शरीर सिरस की आभायुक्त है जो सारे जगत का कल्याण करने को सदा तत्पर रहता है। जैसे कुटिलता को भगवती ने केशों में धारण कर के उनकी शोभा को बढाया है, और फिर भी पीठ पर पीछे की ओर फेंक दिया है, इसी प्रकार कठोरता भी दया का विरोधी भाव है, उसे भगवती ने अपने पयोधरों में धारण कर लिया है। दूध पिलाकर पोषण करने वाले स्तनों में कठोरता रहने पर भी वे दयार्द्रता से टपकते रहते हैं, क्योंकि भगवती का सारा शरीर शिरीष वृक्षवत् कल्याणवपुः है। शंभु की करुणा में कुटिलता, हिंसा और कठोरता के विरोधी भावों को स्थान कहां, वे इतने दयालु हैं कि उनकी करुणा में कभी कमी नहीं आती, वह सदा सर्वदा पूर्ण है, फिर तनु अथवा क्षीण होने की तो संभावना ही कैसे हो सकती है। इसलिये वह पृथु अर्थात् महती करुणा है। पृथु भाव भगवती ने नितंबों में धारण किया हुआ है। नीचे नितंब भाग का भारीपन स्थिरता का द्योतक है, अर्थात् शंभु की करुणा नित्य है। परन्तु भगवती का कटि प्रदेश अति तनु भी है, यद्यपि यह स्त्रियों की शोभा का एक लक्षण है, तो भी करुणा का मध्य भाग तनु होने से उसके क्षीण होने की संभावना की भ्रांति हो सकती है,
सौन्दर्य लहरी ३०७
परन्तु यह बात नहीं है। कटि प्रदेश में मणिपूर चक्र रुद्र का स्थान होने से, भगवती में रुद्र का रौद्र भाव अर्थात् क्रोध अति तनु हो गया है, अर्थात् क्षीणवत् तनु है। मानो भगवती ने रुद्र के रौद्र भाव को मेखला सदृश कस रखा है।
अभिप्राय यह है कि भगवती का शरीर मानो शंभु की दया का अवतार है, जो जगत की रक्षा करने के लिये अवतीर्ण हुआ है।
इस श्लोक में यह भाव भी प्रतीत होता है कि सद्गुरू स्वरूप शिव के अनुग्रह से जो शक्ति की जागृति होती है, और उपरोक्त करुणा के स्वरूप में साधक गण उसे अपने अन्तर में अनुभव करते हैं, वह शंभु की करुणा है। अर्थात शिव स्वरुप गुरु का अनुग्रह शंभु का ही अनुग्रह है, जिससे शिष्य में शक्ति का उत्थान होता है। इसलिये गुरु कृपा, शक्ति की अभिव्यक्ति और शंभु की करुणा तीनों पर्यायवाची हैं।
भगवती के श्रृङ्गारार्थ दर्पण का ध्यान
[ ९४ ]
समानीतः पद्भ्यां मणिमुकुरतामम्बरमणि-
र्भयादास्यादन्तःस्तिमितकिरणश्रेणिमसृणः ।
दधातित्वद्वक्त्रप्रतिफलनमश्रान्तविकचं
निरातंकं चन्द्राब्जिजहृदयपंकेरुहमिव ॥
कठिन शब्दः—मसृणः=चिकना, स्वच्छः विकचं=प्रफुल्लित. विकसित्, खिला हुआः निरातंक=आतंकरहित, निडर, बिना भय के ।
* नोटः—देखें योग दर्शन सूत्र (२, ४) में ५ क्लेशों की प्रसूत, तनु, विच्छिन्न और उदार चार अवस्थायें।
३०८ सौंदर्य लहरी
अर्थः—अंबर मणि अर्थात् सूर्य तेरे चरणों के समीप होने पर मुकुर (दर्पण) का काम दे रहा है। तेरे मुख के भय से उसने अपनी किरणों के समूह को अन्दर छुपा लिया है, इसलिये वह स्वच्छ है और तेरे मुख का प्रतिबिंब उसके हृदय कमल के सदृश सदा विकसित है (क्योंकि तेरा मुख कमल सदा विकसित रहता है और वह उसका प्रतिबिंब है), और उसको चन्द्रमा का भय नहीं है। (कमल सूर्य को देख कर खिलता है और रात्रि में मुरझा जाता है मानों उसे चन्द्रमा से भय लगता है)।
यहां पर सूर्य को दर्पण से उपमा देकर, उसमें प्रतिबिंबित भगवती के मुख कमल को उसके विकसित हृदय कमल से उपमित किया गया है। अनाहत् चक्र का स्थान हृदय है, और वह सूर्य-मंडल का स्थान है। अनाहत् चक्र की १२ पंखडियां १२ आदित्य मानी जाती हैं। इसलिये हृदयस्थ सूर्य मंडल भगवती के चरणों के समीप मुकुरवत् रखा हुआ है। ९२ श्लोक में भगवती को जिस मंच पर बिठाया गया है, वह विशुद्ध चक्र है और हृदय चक्र उसके नीचे है और आज्ञा चक्रस्थ चंद्रमंडल ऊपर है। दर्पण स्वच्छ होना चाहिये, यदि सूर्य की किरणें उसको ढकलेती हैं तो वे मुकुर को मलीनवत् करके मुख के प्रतिबिंबित होने में बाधक होती हैं। परन्तु भगवती के मुख का तेज सूर्य के तेज से भी अधिक है अथवा उसका तेज भगवती के तेज से ही प्रकाश पाता है, इसलिये सूर्य ने भगवती के मुख के भय से अपनी किरणों को अन्तःस्तिमित् कर
सौंदर्य लहरी ३०२
लिया है। और भगवती का प्रफुल्लित मुख कमल उसमें दिखने लगा है।
यदादित्यगतं तेजो जगद्भासयतेऽखिलम् ।
यच्चन्द्रमसि यच्चाग्नौ तत्तेजो विद्धि मामकम् ॥
(गीता १५, १२)
भगवती का मुख कमल के सदृश है, इसलिये उसका प्रतिबिम्ब सूर्य के हृदय कमलवत् जान पडता है। कमल रात्रि में संकुचित हो जाता है और दिन में ही खिलता है। इसलिये ऊपर आज्ञाचक्र में चन्द्र मंडल दिखने से उसके बंद हो जाने की यदि आशंका की जाय तो वह उचित नहीं है, क्योंकि भगवती के तेज से ही चन्द्र-मण्डल चमकता है और उसके प्रतिबिंब को चन्द्रमा से कोई भय नहीं हो सकता।
कठवल्ली (६,५) की 'यथादर्शे तथात्मनि' इत्यादि श्रुति पर भाष्यकार भगवत्पाद लिखते हैं कि जैसे मल रहित दर्पण में मनुष्य को अपना प्रतिबिंब स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है वैसे ही तमोगुण और रजोगुण से शुद्ध होने पर बुद्धि रूपी निर्मल आदर्श पर आत्मतत्त्व का प्रतिबिंब स्पष्ट दिखा करता है। अर्थात् योगियों को प्रत्यक्ष होने वाला हृदय पुरुष परमतत्त्व का प्रतिबिंब है, जो उर्ध्वोन्मीलित सूर्य और अधोन्मीलित चन्द्र के योग से योगियों के हृदय में सदा क्रीडा किया करता है। अथवा वह शक्ति का ही रूप है जो योगियों के हृदयस्थ सूर्यमण्डल रूपी मुकुर में परमतत्त्व का प्रतिबिंब मात्र है।
३१० सौंदर्य लहरी
लक्ष्मीधर के मतानुसार श्लोक ९४, ९९ और १०२ तीनों क्षेपक हैं। ऊपर कहा जा चुका है कि कैवल्य शर्मा के मत से श्लोक ८८ क्षेपक है। शंकर भगवत्पाद ने पूरी शतश्लोकी लिखी थी इसलिये ३ श्लोक क्षेपक होने चाहिये अर्थात् उक्त चारों में एक श्लोक क्षेपक नहीं है। हमारी समझ में यह ९४ वां श्लोक क्षेपक नहीं माना जाना चाहिये, क्योंकि इसकी पूर्व संगति ९२ श्लोक से और उत्तर संगति ९५ श्लोक से स्पष्ट है। शृङ्गार के लिये यदि ९५ श्लोकोक्त शृङ्गार का डिब्बा पास में दिखाया जाता है तो शृङ्गार के आवश्यक साधन मुकुर को क्यों नहीं स्थान दिया जाना चाहिये। शृङ्गार के लिये शृङ्गार का डिब्बा जितना अनिवार्य है उतना आवश्यक मुकुर भी है।
श्रृङ्गार के डिब्बे का ध्यानः—
( ९६ )
कलङ्कः कस्तूरी रजनिकर बिम्बं जलमयं
कलाभिः कर्पूरैर्मरकतकरण्डं निबिडितम् ।
अतस्त्वद्भोगेन प्रतिदिनमिदं रिक्तकुहरं
विधिर्भूयो भूयो निबडयति नूनं तव कृते ॥
कठिन शब्दः— मरकतं=एक हरे रंग की मणि; करण्ड=डिब्बा, पिटारी; निबिडितं=भरा हुआ; कुहरं=डिब्बे के भीतर का पोलापन।
अर्थः— चन्द्र बिंब एक मरकत मणि के बने हुए डिब्बे के सदृश है, उसका कलङ्क (काला धब्बा) कस्तूरी का काला
सौन्दर्य लहरी ३११
रंग है और चमकती हुई कलायें कपूर सदृश हैं। दोनों को जल में पीसकर तेरे आभोग के लिये डिब्बे में भरकर रखा हुआ है, जो प्रतिरात्रि खर्च होता रहता है और ब्रह्मा उसे फिर दिन में बार २ भरता रहता है।
नीचे चरणों के पास सूर्यमण्डल, और ऊपर विशुद्ध चक्र में १६ कलायुक्त चन्द्रमण्डल दोनों भगवती के श्रृङ्गार के साधन हैं। सूर्यमण्डल यदि मुकुर है तो चन्द्रमण्डल श्रृङ्गार का डिब्बा है। कृष्णपक्ष भगवती की रात्रि है और शुक्लपक्ष दिवस। शुक्ल और कृष्ण पक्षों को देवताओं का दिनरात कहते हैं।
भगवती की सपर्या की असुलभता
( ९६ )
पुरारातेरन्तःपुरमसि ततस्त्वच्चरणयोः
सपर्यामर्यादा तरलकरणानामसुलभा ।
तथाह्येते नीताः शतमखमुखाः सिद्धिमत्तुलां
तव द्वारोपान्तस्थितिभिरणिमाऽऽद्याभिरमराः ॥
कठिन शब्दः— शतमख=इन्द्र
अर्थः— तू त्रिपुरारि के अन्तःपुर की रानी है इसलिये तेरे चरणों की सपर्या पूजा की मर्यादा चंचल इंद्रियों वाले मनुष्यों को सुलभ नहीं, और इन्द्र की प्रमुखता में रहने
३१२ सौंदर्य लहरी
वाले ये देवगण तेरे द्वार के निकट खडी रहने वाली अणिमादि की अतुल सिद्धियों तक ही पहुंच पाते हैं ।
देवताओं के पास जो अणिमादि सिद्धियां होती हैं, उनका स्थान भगवती के अन्तःपुर के द्वारों के बाहर ही है, जैसाकि श्रीचक्र के भूपृह के बहिर्द्वारों पर उनका स्थान बताया जाता है, और असंयतेन्द्रिय चंचल चित्त वाले मनुष्यों की तो वहां तक गति ही दुर्लभ है । उनको तो भगवती की पूजा करने का भी सौभाग्य प्राप्त नहीं होता, कहा है देवो भूत्वा देवं यजेत् । और सिद्धियां भी अन्तःपुर में प्रवेश नहीं कर पातीं ।
इस श्लोक में असंयमी और सिद्धियों की कामना रखने वाले मनुष्यों की निन्दा की गई है और अगले श्लोक में कुरवक तरु (कांटेदार वृक्षों) के सदृश कषायों से युक्त कुत्सित् मनुष्यों में शक्ति के जागरण होने की असंभावना दिखाई गई है ।
(९७)
कलत्रं वैधात्रं कतिकति भजन्ते न कवयः श्रियो देव्याः को वा न भवति पतिः कैरपिधनैः । महादेवं हित्वा तव सति सतीनामचरमे कुचाभ्यामासंगः कुरवकतरोरप्यसुलभः ॥
कुरवक=एक प्रकार का वृक्ष, जिसमें पीत, रक्त और नीले रंग के पुष्प होते हैं । लाल फूलों वाला कुवरक कहलाता है, पीले फूलों