स्पन्दकारिका (भट्ट कल्लट स्पन्दवृत्ति व हिन्दी व्याख्या सहित)
Spanda Karika with Spanda Vritti & Hindi Commentary
महर्षि वसुगुप्त / भट्ट कल्लट द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास · मोतीलाल बनारसीदास · 1950 (उद्गम)
स्पन्दकारिका २१ रखना आवश्यक है कि समूचा विश्व इसी पारमेश्वरी स्पन्दशक्ति का बहिर्मुखीन प्रसार अथवा विकास है। स्पन्दशक्ति के प्रसार के, सामान्य और विशेष दो रूप हैं। इन्हीं दो रूपों के आधार पर शैवशास्त्रियों ने इसके सामान्य-स्पन्द और विशेष-स्पन्द दो नाम रखे हैं। इसका सामान्य रूप अनेकाकारता में एकाकारता और विशेषरूप एकाकारता में अनेकाकारता है। भाव यह कि इसका सामान्यरूप विश्वात्मक सूक्ष्म चेतना या प्राणना है जो कि विश्व के अनेक रूपों में भी एक ही सामान्यरूप में व्याप्त है। दूसरी ओर इसका विशेष रूप विश्व के अनेक एवं विचित्र नामरूपात्मक प्रमेय पदार्थों का रूप है और इस रूप में भेद की ही प्रधानता होने के कारण यह वस्तुतः एक होते हुए भी विशेष रूपों में (अनेकाकारों में) प्रवहमान है। यहाँ पर स्पन्द- शक्ति के इन दो रूपों का संकेतमात्र दिया गया है। आगे यथास्थान इनका विश्लेषण किया जायेगा। अब यहाँ पर सूत्र में उल्लिखित उन्मेष-निमेष पर थोड़ा सा प्रकाश डालना युक्तियुक्त होगा— इस विषय में पहले कहा गया है कि 'उन्मेष-निमेष' मात्र संकल्पात्मक गतिमयता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। इस संकल्पात्मक गतिमयता को शैवशास्त्रों में इच्छा¹ शक्ति का नाम दिया गया है। यह इच्छाशक्ति शङ्कर का नित्यधर्म अथवा स्वभाव है। यह उससे कभी छूटता नहीं क्योंकि जैसा पहले कहा गया है कि शक्ति और शक्तिमान् कभी भी अलग नहीं हो सकते। सूत्र में एक ही इच्छाशक्ति अथवा संकल्पमात्र को व्यक्त करने के लिए उन्मेष और निमेष इन दो शब्दों का प्रयोग मात्र औपचारिक है। सूक्ष्मदृष्टि से देखने पर यह बात अच्छी प्रकार समझ में आती है कि उन्मेष अथवा निमेष दोनों संकल्पमात्र के ही द्योतक हैं। उन्मेष उस अवस्था का द्योतक है जब कि पारमेश्वर संकल्प में, विश्वोत्तीर्ण रूप में अर्थात् विशुद्ध चिन्मात्ररूप में अवस्थित रहने की ओर उन्मुखता होती है। इस अवस्था में सारा 'इदं-भाव' अथवा प्रमेयभाव मात्र 'अहं' रूप अर्थात् विशुद्ध चिन्मात्ररूप प्रमातृभाव में ही लीन हुआ होता है। इसी को शैव शब्दावली में पारमेश्वर अनुग्रह या शक्तिपात कहते हैं। निमेष उस अवस्था का द्योतक है जब पारमेश्वर संकल्प में, स्वरूप को संसार के अनन्त भेद- पूर्ण वैचित्र्यों में प्रसारित करने की ओर उन्मुखता होती है। इस अवस्था में चिन्मात्ररूप प्रमातृभाव में, अभिन्नरूप में वर्तमान प्रमेयता, पूर्वोक्त मायाशक्ति के प्रभाव से अलग होकर विकास में आ जाती है। इसको शैव शब्दों में तिरोधान कहते हैं। स्पष्ट है कि दोनों रूपों में पारमेश्वर संकल्पमात्र की ही गतिमयता अर्थात् इच्छाशक्ति ही कार्यनिरत है। पारमेश्वर संकल्प के इन्हीं दो रूपों को क्रमशः अन्तर्मुखस्पन्द और बहिर्मुखस्पन्द कहते हैं। इस विषय में यह समझना आवश्यक है कि स्पन्द-शक्ति की यह द्विमुखी गतिमयता एक ही समय पर चलती १. उन्मेषनिमेषशब्दाभ्यां तदुपचरितवृत्तिभ्याम् इच्छामात्रमेकं शङ्करसम्बन्धि प्रतिपाद्यते, स च तस्य नित्यो धर्मः स्वभावभूतः, तस्य उन्मेष-निमेषशब्दवाच्यत्वं द्वित्वं च उपचारात्। (स्प० वि०, ४ पृष्ठ)
प्रकाश डाला जायेगा। यहाँ पर पाठकों का ध्यान केवल कई निम्नलिखित बातों की ओर
२२ स्पन्दकारिका रहती है। परमेश्वर किसी अपने ही स्वरूपभूत भक्तजन को अनुग्रह का विषय बना कर, चिन्मात्ररूप पर आरूढ़ करता है जब कि तत्काल ही किसी को तिरोधान का विषय बना कर संसारभाव के मायागर्त में डुबो देता है। दोनों ही रूपों में स्वतन्त्र ज्ञातृत्व और कर्तृत्व में कोई उतार या चढ़ाव उत्पन्न नहीं होता है। प्रलय और उदय जगत् को ही हो सकते हैं, संवित् को नहीं; क्योंकि उन्मेष अवस्था में स्वरूप से अतिरिक्त अन्य किसी भी प्रकार के प्रमेयजाल का अस्तित्व न होने के कारण जगत् का प्रलय अर्थात् पूर्णतया स्वरूप में ही लय और निमेष अवस्था में प्रमेयता का स्वरूप से अलग अस्तित्व होने के कारण जगत् का उदय हो जाता है। दोनों रूपों में जगत् को जो कुछ भी हो, परन्तु संवित् अक्षुण्ण रहती है। शक्तिचक्र और उसकी विभूति के विषय में पहले ही इस बात का उल्लेख किया गया है कि परमात्मा को वास्तविक शक्ति एक ही है जिसका नाम 'स्वातन्त्र्य-शक्ति' है। इसका भी संकेत दिया गया है कि शाश्वत स्पन्दमयी होने के कारण इस शक्ति का अन्तर्मुख एवं बहिर्मुख प्रसार एक ही समय पर चलता है। आगे भी शक्तिचक्र के विषय में यथास्थान प्रकाश डाला जायेगा। यहाँ पर पाठकों का ध्यान केवल कई निम्नलिखित बातों की ओर आकर्षित करना अपेक्षित प्रतीत होता है । परमेश्वर की अभिन्न¹ स्वातन्त्र्य-शक्ति विश्वरूप में प्रसृत होने की ओर उन्मुख होने के समय, सर्वप्रथम इच्छा का रूप धारण करती है। वह इच्छाशक्ति उत्तरोत्तर प्रसृत होती हुई ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति के रूप में प्रकट होती है।² यह शक्तियुगल (ज्ञान और क्रिया) ऐश्वर्यपूर्ण होने के कारण मानो चिन्तामणि है जिससे उत्तरोत्तर विकास में आने वाली, प्रमेयता की उपाधियों के आवश्यकतानुसार, अनन्त शक्तिधारायें फूट पड़ती हैं और फलस्वरूप शिवतत्त्व से लेकर पृथिवीतत्त्व तक का सारा विश्व-वैचित्र्य विकसित हो जाता है। ज्ञानशक्ति वर्ण, पद एवं मन्त्र इन तीन मार्गों के रूप में और क्रियाशक्ति कला, तत्त्व और भुवन इन तीन मार्गों के रूप में प्रसृत होकर बाह्य विश्व का रूप धारण कर लेती है। इस प्रकार पहले तीन रूपों में सारे वाचक-विश्व का और दूसरे तीन रूपों में सारे वाच्य-विश्व का विकास हो जाता है। [ शक्तिचक्र ] इस वाचक और वाच्यमय विश्व का सर्वतोमुखी विकास कार्य सम्पन्न करने के लिए उसी पारमेश्वरी शक्ति की धारायें कहीं मातृका (शब्दराशि) का रूप धारण करके 'अ' से 'क्ष' १. या सा शक्तिर्जगद्धातुः कथिता समवायिनी। इच्छात्वं तस्य सा देवी सिसृक्षोः प्रतिपद्यते ॥ (मा० वि०, ३.५) २. एवं सैषा द्विरूपापि पुनर्भेदैरनेकताम् । अर्थोपाधिवशाद्याति चिन्तामणिरिवेश्वरी ॥ (मा० वि०, ३.८) ३. तत्र तावत्समापन्ना मातृभावं विभिद्यते । द्विधा च नवधा चैव पञ्चाशद्धा च मालिनी ॥ वर्गाष्टकमिह ज्ञेयमघोराद्यमनुक्रमात् । (मा० वि०, ३.२९)
स्पन्द एक गतिहीन गति २३ तक आठ वर्गों की अधिष्ठात्रियां बनी हुई 'माहेश्वरी, ब्राह्मणी, कौमारी, वैष्णवी, ऐन्द्री, याम्या, चामुण्डा और योगीशी शक्तियों के रूप में, कहीं अन्तःकरणों और बहिःकरणों के साथ सम्बन्ध रखने वाली खेचरी, भूचरी, दिक्क्री और गोचरी शक्तियों के रूप में, कहीं प्राण, बुद्धि, अन्तःकरण, ज्ञानेन्द्रियां, कर्मेन्द्रियां अथवा सारे महाभूतों के रूप में प्रसृत होती रहती है। कहने का तात्पर्य यह कि विश्व में ब्रह्मा से लेकर घास के तिनके तक जितने भी असंख्य प्रमेय पदार्थ प्रत्यक्ष या अनुभव का विषय बन जाते हैं वे सारे परमेश्वर की अनन्त शक्तियों के स्रोत हैं। इन्हीं अनन्त शक्तिधाराओं का शास्त्रीय नाम 'शक्तिचक्र' है। यह शक्तिचक्र विभव से परिपूर्ण है। विभव शब्द से ऐश्वर्य का अभिप्राय है और ऐश्वर्य किसी वस्तु के करने, न करने या अन्यथा करने की स्वातन्त्र्यपूर्ण इच्छा का द्योतक है। इसका अभिप्राय यह कि शक्ति, शक्ति होने के कारण नित्य उदीयमान और शाश्वत रूप में पूर्ण अभेद अहंविमर्श की स्फुरणा के स्वभाव वाली है और इसकी स्वतन्त्र स्फुरणा के प्रवाह में कोई भी वस्तु बाधा नहीं डाल सकती है। शक्ति चाहे अपने मौलिक विश्वोत्तीर्ण चिन्मात्र रूप पर अवस्थित हो तो भी सारी विभूतियों को अपने गर्भ में लिए हुए है अथवा विश्वमय शाक्त-प्रसार के रूप पर अवस्थित हो तो भी इतने कल्पनातीत विश्व को साकार बनाने के दुर्घट कार्य को संपन्न कर सकने के वैभव से परिपूर्ण है। ऐसी स्वतन्त्र शक्तियों से परिपूर्ण शक्तिमान् का स्वरूप 'परिपूर्ण शंकर-स्वरूप' अथवा 'स्वभाव' कहा जाता है। श्री विज्ञानभैरव में स्वतन्त्र स्फुरणामयी संवित् शक्ति से परिपूर्ण शक्तिमान् के स्वरूप का बहुत सुन्दर शब्दों में वर्णन किया गया है :- "अपरिमित और कल्पनातीत अनेकाकारता में भी एकाकारता के मधुरतम रस से परिपूर्ण, स्वरूप के आधार पर विश्व के चित्र की रचना करने पर भी स्वयं निर्मलरूप को धारण करने वाली और विश्व का अवभासन करने के लिए अनन्त शक्तिस्रोतों में प्रवहमान होने के कारण परिपूर्ण शक्ति के साथ संघट्टमयी अवस्था ही शक्तिमान् की परिपूर्ण अवस्था है। यह ऐसा दिव्यरूप है जो पूर्ण अहं-स्फुरणामय होने के कारण केवल आनन्दस्वरूप, दिशा², काल एवं आकार के संकोचों से रहित, दूरी या नज़दीकी की प्राचीरों से बाहर, मध्यमा और वैखरी वाणियों के अभिलाप का अविषय होने के कारण वास्तव में अवर्णनीय और केवल १. तदेव शक्तिभेदेन माहेश्वर्यादि चाष्टकम् ॥ माहेशी ब्राह्मणी चैव कौमारी वैष्णवी तथा । ऐन्द्री याम्या च चामुण्डा योगीशी चेति ता मताः ॥ (मा० वि०, ३.१३-१४) २. दिक्कालकलनोन्मुक्ता देशोद्देशाविशेषिणी । व्यपदेष्टुमशक्यासावकथ्या परमार्थतः ॥ अन्तःस्वानुभवानन्दा विकल्पोन्मुक्तगोचरा । यावस्था भरिताकारा भैरवी भैरवात्मनः ॥ तद्वपुस्तत्त्वतो ज्ञेयं विमलं विश्वपूरणम् । (वि० भै०, १४-१६)
उन्मेषनिमेषात्मक स्वरूप और बहुव्रीहि समास के द्वारा ऐसी शाक्तभूमिका की अनुभूति
२४ स्पन्दकारिका आन्तरिक अनुभवमात्र से ही गम्य है। प्रत्येक प्रकार की शङ्काओं के आतङ्क और विकल्प- जालों से रहित होने के कारण इसको 'भैरवी-अवस्था' कहते हैं। यही अवस्था भैरवरूप शंकर का स्वभाव अथवा वास्तविक स्वरूप है क्योंकि इसमें विश्वोत्तीर्ण और विश्वरूपता दोनों एकाकार बनकर अवस्थित हैं।" 'शक्तन'१ अर्थात् कुछ कर सकने को 'शक्ति' कहते हैं। प्रत्येक चेतन प्रमाता अपनी अपनी परिधि में अपने अपने सामर्थ्य के अनुसार कार्य कर सकता है क्योंकि उसमें अंशतः शक्ति विद्यमान होती है। जो जितना बड़ा काम कर सकता है उसको उतना बड़ा शक्तिमान् कहा जाता है। सबसे बड़ा काम, इतने अनन्त एवं कल्पना से भी अचिन्त्य विश्व का निर्माण एवं संहार है। इस दुर्घट कार्य को सबसे महान् शक्तिमान् ही कर सकता है। जो यह कर सकता है उस प्रमाता को सर्वशक्तिमान् भैरवरूप 'शंकर' कहते हैं। अंशतः शक्तिमान् होने के कारण प्रत्येक जीव अंशतः शिव है। अपनी२ ही शक्ति के वास्तविक स्वरूप की अनुभूति प्राप्त करने से जीव शिव बन सकता है। शक्ति के वास्तविक स्वरूप की अनुभूति मानव को क्या नहीं करा सकती है ? शक्तिभूमिका पर आरूढ़ होना ही शिवभाव में प्रविष्ट होने का मुख्यद्वार है। सूत्र में उल्लिखित 'शक्तिचक्रप्रभवम्' शब्द का तत्पुरुष समास के द्वारा परमात्मा के उन्मेषनिमेषात्मक स्वरूप और बहुव्रीहि समास के द्वारा ऐसी शाक्तभूमिका की अनुभूति प्राप्त करने के उपाय का अर्थ लगाया जा सकता है, जो इस प्रकार है— १. शक्तिचक्रविभवस्य प्रभवम् [तत्पुरुष समास] शक्तिचक्र अर्थात् अनन्तरूपी प्रवह- मान स्पन्दधाराओं के, 'विभव' अर्थात् अन्तर्मुखीन या बहिर्मुखीन प्रसार को, 'प्रभवम्' मूल उद्गमस्थान शंकर (को हम प्रणाम करते हैं)। २. शक्तिचक्रविभवात् प्रभवो यस्य तम् [बहुव्रीहि समास] 'शक्तिचक्र' अर्थात् प्राण, बुद्धि, इन्द्रियां इत्यादि विशेष-रूपों में प्रवहमान शक्ति पुन्ज की, 'विभवात्' वास्तविक अनु- भूति प्राप्त करने से ही, 'प्रभव:' जिस शंकररूप की अभिव्यक्ति होती है— (उस शंकर को हम प्रणाम करते हैं)। इस विषय में शास्त्रों में यह बात स्पष्ट की गई है कि वास्तव में भगवान्३ स्वयं ही प्रत्येक प्राणी के शरीर में प्रविष्ट होकर, इन्द्रिय-शक्तियों की उन्मेषनिमेष क्रिया के द्वारा, शब्द, स्पर्श, रूप, रस तथा गन्ध को ग्रहण या अग्रहण करने से, भिन्न-भिन्न प्राणियों की निश्चित देश, काल एवं आकार की परिधि के अनुसार, विश्व की सृष्टि और संहार करता रहता है। फलतः यदि कोई व्यक्ति किसी उपाय द्वारा अपनी विशेष रूपों में प्रवहमान १. 'शक्तनं शक्ति:'-सामर्थ्यं विश्वनिर्माणादिकारि भैरवस्वरूपमेव । (वि० भै० १३ पृष्ठ) २. शक्त्यवस्थाप्रविष्टस्य निर्विभागेन भावना । तदासौ शिवरूपी स्यात् शैवीमुखमिहोच्यते ॥ (वि० भै०, २०) ३. देहाद्याविष्टोऽपि परमेश्वरः करणोन्मीलननिमीलनाभ्यां रूपादिपञ्चकमयस्य जगतः सर्गसंहारौ करोति । (स्पं० नि०, पृष्ठ ८)
सूत्र—जिस (स्पन्दात्मक) विमर्श-भूमिका में अर्थात् शङ्कर में यह सारा कार्यरूप
स्पन्द एक मौलिक कृति २५ शक्तियों के संकोच को हटाकर, उनको मौलिक सामान्य-अवस्था पर पहुँचा सके तो स्वरूप- विकास कहीं दूर नहीं है। यहाँ पर पाठकों को सावधान करने के लिए कई मुख्य शक्तियों के नाममात्र गिनाये गये हैं। आगे बहुत से स्थानों पर इनके स्वरूप-वर्णन पर यथासम्भव प्रकाश डाला जायेगा ॥१॥ पूर्व सूत्र में दर्शाया गया कि सामान्य-स्पन्दभूमिका (संवित्) ही सारे कार्यरूप अर्थात् प्रमेयरूप विश्व के प्रत्येक पदार्थ के रूप में प्रवहमान है। परन्तु इस सम्बन्ध में यह शङ्का उठती है कि संसार में विचित्र प्रकार के शरीर, इन्द्रिय, भुवन, घट, पट इत्यादि रूपों में स्वभावों की अनेकाकारता देखने में आती है। ऐसी अवस्था में संसाररूप अनेकत्व का स्वभाव शिवरूप एकत्व कैसे हो सकता है ? अगले सूत्र में इस शङ्का का समाधान यह कह कर किया जा रहा है कि वास्तव में प्रमेयरूप अनेकाकारता 'अहं विमर्श' की एकाकारता में अनादिकाल से अभिन्नरूप में अन्तर्निहित ही है। केवल जो वस्तु विमर्श में है उसी का बाह्य अवभासन होता है। इस सिद्धान्त के अनुसार उसका (अनेकाकारता का) बाह्य अवभासनमात्र हो जाता है। नई कोई वस्तु उत्पन्न नहीं होती है। दोनों रूपों में एकाकारता स्वरूपतः अक्षुण्ण रहती है— [कर्तृत्व और कार्यत्व] यत्र स्थितमिदं सर्वं कार्यं यस्माच्च निर्गतम् । तस्यानावृतरूपत्वान्न निरोधोऽस्ति कुत्रचित् ॥२॥ कथं पुनः स्वस्वभावस्यैव संसारिणः शिवत्वेन निर्देशः-इति यद्युच्यते, तत् यत्र स्थितम् इदं जगत्, यस्मात् च उत्पन्नं तस्य संसार्थवस्थायामपि अनाच्छादित- स्वभावत्वात् न क्वचित् निरोधः, अतः शिवत्वमुच्यते ॥२॥ अनुवाद सूत्र—जिस (स्पन्दात्मक) विमर्श-भूमिका में अर्थात् शङ्कर में यह सारा कार्यरूप (प्रमेयरूप) जगत्, अभेदरूप में अवस्थित ही है और जिससे इसका (बहिर्मुखीन) प्रसार हो जाता है, उस सत्ता के स्वरूप को कोई भी आवरण ढांप नहीं सकता है। अतः उसके स्वतन्त्र प्रसार में कहीं भी कोई रुकावट नहीं है ॥२॥ वृत्ति—यदि कोई यह पूछे कि जब निजी स्वभाव (शंकर) ही संसारी बनकर आवा- गमन के चक्कर में पड़ जाता है तो उसको उस रूप में शिव कैसे कहा जा सकता है ? इस प्रश्न के उत्तर में यह कहा जाता है कि जिस अभेद-भूमिका में यह सारा विश्व (अनादिकाल से) 'अहं-रूप' में अवस्थित ही है और जिससे इसकी उत्पत्ति अहंरूपता से अलग होकर इदंरूपता में अवभासित हुई है, उस सत्ता के स्वभाव (अहंविमर्शरूप एकाकारता) पर, संसारी अवस्था में भी कोई आवरण पड़ा हुआ नहीं है, अतः उसके स्वतन्त्र प्रसार में कोई रुकावट नहीं पड़ सकती है। यही कारण है कि उसको शिव कहा जाता है ॥२॥
२६ स्पन्दकारिका विवरण आन्तर और बाह्य पदार्थों की विमर्शरूपता शैवशास्त्रों का सिद्धान्त है :—'यदन्तस् तद् बहिः' । इसका अभिप्राय यह है कि स्पन्दात्मक विमर्शभूमिका में सारे प्रमेयपदार्थों की विद्यमानता उसीप्रकार विमर्शरूप में ही विद्यमान है जिस प्रकार छोटे से बीज¹ में बड़े-से-बड़े न्यग्रोध वृक्ष की शाखायें, पत्ते, फूल और फल इत्यादि की कल्पना बीजरूप में ही विद्यमान होती है । चैतन्य में स्वभावतः प्रसार का रस होने के कारण वही आन्तर कल्पना बाह्य स्थूल नानारूपता में विकसित होती है । अतः जो ही अन्दर है वही बाहर है । विषय को सुगम बनाने के लिए पहले इस सिद्धान्त का परीक्षण जीवभाव के स्तर पर करना ही युक्तियुक्त होगा— साधारण जीवभाव के स्तर पर भी यही देखा जाता है कि प्रत्येक प्राणी के आन्तर विमर्श में उसके परिचित प्रमेयभाव विमर्शरूप में ही अवस्थित रहते हैं । अपने-अपने मानसिक विस्तार के अनुपात से जिस प्राणी का जितना विमर्श होता है उतना ही उसके संसार का विस्तार होता है । परन्तु इतना तो निश्चित है कि जो ही बातें विमर्श में विद्यमान होती हैं उन्हीं का बाह्य अवभासन होता रहता है । उदाहरण के तौर पर—'कुम्हार घड़ा बनाता हैं'—इस परामर्श का दार्शनिक विश्लेषण करने से कुछ बातों की ओर ध्यान आकर्षित होता है । पहली यह कि घट एक कार्य है जो किसी चेतन कुम्हार की क्रिया का विषय बना हुआ है । दूसरी यह कि घट स्वयं विमर्शहीन अथवा जड़ होने के कारण न तो स्वरूप को जानता है और न अपने से भिन्न और किसी वस्तु को सत्ता प्रदान कर सकता है । तीसरी यह कि कुम्हार चेतन होने के कारण ही मिट्टी के पिंड को घट का रूप दे सकता है जब कि मिट्टी स्वयं घट का रूप धारण नहीं कर सकती है । इन बातों के साथ-साथ मन में एक शङ्का भी उत्पन्न हो जाती है कि घट की रचना करते-करते शराव अथवा शरावों को बनाते-बनाते प्याले क्यों नहीं बन जाते हैं । इस शङ्का का समाधान ढूँढ़ते-ढूँढ़ते अन्ततोगत्वा हमें यह स्वीकार करना पड़ता है कि कुम्हार के अन्तर्विमर्श में, घट इत्यादि पदार्थों को बाह्य साकारता प्रदान करने से पहले ही उनकी आकृति, मान, रंग इत्यादि की यथावत् कल्पना विद्यमान होती है । रचना करते समय केवल इतना होता है कि कुम्हार के अन्तस्² में विद्यमान कल्पना बाह्य साकार रूप में विकसित हो जाती है और दोनों रूपों में तिल जैसा भी फर्क नहीं पड़ता है । यदि कुम्भकार के विमर्श में ये कल्पनायें पहले से ही विद्यमान न होतीं तो वह उनको बाह्य साकाररूप देने में असफल ही रहता । फलतः घट कुम्हार के आन्तरिक विमर्श के बाह्य अवभास-मात्र के अतिरिक्त स्वतः कुछ भी नहीं है । १. यथा न्यग्रोधबीजस्थः शक्तिरूपो महाद्रुमः । तथा हृदयबीजस्थं जगदेतच्चराचरम् ॥ (प० त्रि०, २४) । २. तदेवं व्यवहारोऽपि प्रवृद्धेरूढिमाविशन् । भान्तमेवान्तरर्थौघमिच्छया भासयेद् बहिः ॥ (ई० प्र०, १, १.६.७)
इस सम्बन्ध में यह बात विचारणीय है कि आन्तर-विमर्श एक थैला जैसा नहीं कि जिसमें अनन्त पदार्थों की कल्पनायें ¹अखरोट, पिस्ते या बादाम इत्यादि की तरह ठसाठस भरी हुई होती हैं और फिर वही अलग-अलग रूप में बाहर निकलती रहती हैं। ऐसी कोई बात समझ में नहीं आती है अपितु कुम्हार जैसे प्रत्येक चेतन प्रमाता के अन्तर्विमर्श में सारे वाच्य पदार्थ विमर्श के ही रूप में अर्थात् 'अहं' से अभिन्न रूप में ही अवस्थित रहते हैं। साथ ही विमर्श में ही यह स्वातन्त्र्य होता है कि अपने में अभिन्नरूप में अवस्थित पदार्थों को भिन्न रूप में साकारता प्रदान कर सकता है। बाह्यरूप में अवभासित होने के अनन्तर वह कल्पनायें समाप्त नहीं होती हैं अपितु फिर भी अन्तःचेतना में निलीन होकर अवस्थित² रहती हैं क्योंकि यदि वे समाप्त ही हो जातीं तो सम्भव था कि कुम्हार एक घट को साकारता प्रदान करने के अनन्तर दूसरे उसी आकार-प्रकार के घट को बना नहीं सकता। ठीक इसीप्रकार सर्वोत्कृष्ट शाङ्कर स्तर पर भी उस विश्वस्पन्द में यह सारा इदंरूप अर्थात् संकुचित प्रमाता, प्रमेय और प्रमाणों से भरा कार्यजगत् अनादिकाल से 'अहं रूप' एकाकारता में अवस्थित ही है। उसी मौलिक अहं परामर्श में, स्वातन्त्र्य से ही, जो इदन्ता का परामर्श उदित हो जाता है वही बाह्य-प्रमेयता का विकास कहलाता है। फलतः आन्तर विमर्शरूप में अवस्थित भाववर्ग को भेदमय प्रमेयता की नानारूपता में अवभासित करना और अवभासित करने के अनन्तर उनको फिर भी विमर्शात्मक एकाकारता में निलीन करना ही स्वभाव अथवा स्वातन्त्र्य अथवा आनन्द शक्ति अथवा उन्मेष-निमेषमय स्पन्द की शाश्वत क्रीडा का चमत्कार है। यदि परमार्थ दृष्टि से देखा जाए तो यह बात स्पष्ट रूप में समझ में आती है कि वे सारे प्रमेय पदार्थ जो स्फुट³ रूप में अर्थात् 'इदं' रूप में भासमान हैं, वास्तव में परमार्थ सत्ता के निजी अवयव ही हैं। अतः स्वरूप में अवस्थित रहते हुए ही, केवल मायाशक्तिरूप स्वातन्त्र्य के द्वारा, उनका उसी प्रकार भिन्न रूप में जैसे अवभासन हो जाता है, जिस प्रकार घटरूप पदार्थ का अवभासन मिट्टीरूप सत्ता के अन्तर्गत ही होता है। यदि मिट्टी की सत्ता न हो तो घट की भी सत्ता नहीं होगी। यदि भाव स्वरूप में अवस्थित न हों तो वे भाव नहीं होंगे। अनुत्तरतत्त्व और जीव का अन्तर इस सम्बंध में यह बात विशेष रूप से ध्यान में रखनी आवश्यक है कि बाह्यरूप में १. एतदुक्तं भवति न प्रसवेकादिवाक्षोटादि तत् तस्मात् निर्गतम्' । (स्प० नि०, १० पृष्ठ) २. स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य भावजातस्य भासनम् ॥ अस्त्येव···· ···· ···· ····॥ (ई० प्र०, १-५ १०) ३. वर्तमानावभासानां भावानांमवभासनम् । अन्तर्विद्यमानामेव प्रसवे बहिरात्मना ॥
२८ स्पन्दनिरूपणम् अवभासमान पदार्थ वर्ग अर्थात् कार्य-जगत् स्वतः कोई भिन्न सत्ता नहीं अपितु¹ आन्तरिक चैतन्यसत्तारूप एकता का बहिर्मुखीन प्रसार ही कार्यता अथवा अनेकाकारता कहलाती है । एक से हो अनेक बन जाता है परन्तु अनेक में एक भी अन्तर्निहित ही है । अतः यह कहना कि घट, पट इत्यादि रूप अनेकाकारता का मूल, शिवरूप एकाकार कैसे हो सकता है, सर्वथा अनुचित है । यही कारण है कि कार्यरूप जगत् को अपने से भिन्नरूप में सत्ता प्रदान करने के अनन्तर भी शिव, शिव ही है ओर उससे पहले भी वह शिव ही है । कुम्भकार² घट को बाह्य साकार- रूप देने से पहले भी ओर अनन्तर भी कुम्हार ही है । दोनों³ अवस्थाओं में वास्तविक सत्ता की एकाकारता ही व्याप्त है । अब इस संबन्ध में यह बात विचारणीय है कि साधारण कुम्हार को घड़ा इत्यादि पदार्थ बनाने के समय विशेष प्रकार के समवायिकारण, असमवायिकारण या उपादानकारण, निश्चित देश, काल, आकार इत्यादि की परिधि ओर भिन्न-भिन्न आकार-प्रकारों के बनाने की सक्रमत्ता इत्यादि की अपेक्षा रहती है । क्या अनुत्तर-सत्ता को भी कार्यजगत् बनाने के लिए ऐसी ही सामग्री की अपेक्षा रहती है ? यदि रहती है तो एक साधारण कुम्हार को ही शिव मानना पड़ेगा । इस विषय में पारदृश्वा सिद्धों का कथन है कि अनुत्तरतत्त्व और जीव के ज्ञातृत्व और कर्तृत्व में केवल स्वातन्त्र्य की मात्रा का भेद है । परमेश्वर पूर्ण चिद्रूप होने के कारण अपने स्पन्दात्मक स्वातन्त्र्य से प्रत्येक कार्य किसी भी प्रकार की कारण-सामग्री और निश्चित क्रम के बिना, अपने संकल्पमात्र से ही सिद्ध कर सकता है जब कि साधारण जीव को, अंशतः चिद्रूप और अस्वतन्त्र होने के कारण, कोई भी कार्य करने के समय परमुखापेक्षी बनना पड़ता है । श्रीमान्⁴ उत्पलदेव जी का कथन है कि भगवान् चिदात्मा होने के कारण एक योगी की तरह किसी प्रकार की लौकिक सामग्री के बिना, इच्छामात्र से ही अन्तर विमर्श-रूप में अवस्थित पदार्थवर्ग को बाह्यरूप में अवभासित करता है । इस अलौकिक क्रियाशक्ति पर कोई लौकिक प्रतिबन्ध कार्यान्वित नहीं हो सकता है । श्री भट्टनारायण⁵ ने इसी लक्ष्य को हृदय में रखकर भगवान् को एक ऐसा सर्वोत्कृष्ट कलाकार स्वीकार किया है जिसको अपनी कला का प्रदर्शन १. एवमात्मन्यसत्कल्पाः प्रकाशस्यैव सन्त्यमी । जडाः.................................................॥ (अ० सि० १३) २. न च कार्यं घटादिकर्तुः कुम्भकारादेः कदाचित् स्वरूपं तिरोदधद् दृष्टम् । (स्प० नि०, १० पृष्ठ) ३. प्रकाश एवास्ति स्वात्मना स्वपरात्मभिः । (अ० सि० १३) ४. चिदात्मैव हि देवो न्तःस्थितमिच्छावशाद् बहिः । योगीव निरूपादानमर्थजातं प्रकाशयेत् ।। (ई० प्र० : १.५.७) ५. निरूपादानसंभारमभित्तावेव तन्वते । जगच्चित्रं नमस्तस्मै कलाश्लाघ्याय शूलिने ।। (स्त० चिं०, १)
अवस्था भेदों में स्वरूप की एकता २९ करने के लिये, अपने स्वरूप से इतर अन्य किसी आधार इत्यादि की आवश्यकता नहीं पड़ती है। पारमेश्वरी१ शक्ति चतुर्दिकू स्वतन्त्र होने के कारण कभी क्रम के अनुसार अथवा कभी क्रमात्मक पराधीनता के बिना ही कार्यनिरत है परन्तु उसका वास्तविक स्वरूप सदा अक्रम ही है। चित्-रसमयी तरलता स्वयं अपने में आश्यानता अर्थात् घनता का रूप धारण करती है और यह आश्यानता ही स्थूल प्रमेयता है। वह जितना जितना उत्तरोत्तर आश्यान होती जाती है उतनी उतनी जड़ता उभर आती है। इस आश्यानीभवन की क्रिया की अन्तिम सीमा पृथिवी-तत्त्व है। हमारे गुरु महाराज कभी-कभी मंद मुस्कान में कह डालते हैं कि “संवित् का स्वातन्त्र्य कितना विस्मयकारी है कि वह, उसी के द्वारा, अपने संविद्भाव से अवरूढ़ होकर मिट्टी बन गई है।” शास्त्रकारों ने मन्दबुद्धिवाले शिष्यों को, बाह्य-अवभास की प्रक्रिया को समझाने के लिये दर्पण-नगर की उपमा दे रखी है। जिसप्रकार२ दर्पण में पड़ा हुआ नगर इत्यादि का प्रतिबिम्ब दर्पण से पृथक् न होते हुए भी अलग जैसा दिखाई देता है उसी प्रकार चिद्दर्पण में पड़ा हुआ विश्वरूप प्रतिबिम्ब उससे भिन्न न होकर भी भिन्न जैसा दिखता है। दर्पण नगर तो एक उपमामात्र है। वास्तव में चिद्दर्पण और साधारण दर्पण में दूर का भी वास्ता नहीं है। जहाँ साधारण दर्पण प्रतिबिम्ब प्रक्रिया में दर्पण, बिम्ब और प्रतिबिम्ब तीनों अलग अलग पदार्थ होते हैं वहाँ चिद्दर्पण की प्रतिबिम्बप्रक्रिया में चैतन्य-सत्ता स्वयं ही बिम्ब प्रतिबिम्ब और दर्पण है। अतः सांसारिक शब्दार्थ-कल्पना की कोई भी अवस्था ऐसी नहीं है जिसको शिव नहीं कहा जा सकता है। फलतः३ 'ज्ञानक्रियात्मक चैतन्य' ही प्रत्येक जड़ अथवा अजड़ पदार्थ का स्वभाव है जो कि प्रत्येक अवस्था में सिद्ध और अनावृतरूप में अवस्थित है। उस विश्वात्मक स्वभाव को किसी प्रकार की भी विरोधी सत्ता की कल्पना के द्वारा झुठलाया नहीं जा सकता है ॥ २ ॥ १. ............निःशेषशक्तिचक्रक्रमाक्रमाक्रामिणी अतिक्रान्तक्रमाक्रमातिरिक्तारिक्ततदुभया- त्मतयापि अभिधीयमानापि अनेतद्रूपा अनुत्तरापरा स्वातन्त्र्यशक्तिः काप्यस्ति (शि० सू० वि०, २० पृष्ठ) २. स एव भगवान् स्वस्वातन्त्र्यादनतिरिक्तामप्यतिरिक्ततामिव जगद्रूपतां स्वभित्तौ दर्पणनगर- वत्प्रकाशयन् स्थितः (स्प० नि०, १० पृष्ठ) दर्पणबिम्बे यद्वन्नगरग्रामादि चित्रमविभागि । भाति विभागेनैव च परस्परं दर्पणदपि च ॥ विमलतमपरमभैरवबोधात् तद्वद् विभागशून्यमपि । अन्योन्यं च ततोऽपि च विभक्तमाभाति जगदेतत् ॥ (प० सा०, श्लोक १२, १३) ३. चैतन्यमात्मनो रूपं सिद्धं ज्ञानक्रियात्मकम् । तस्यानावृतरूपत्वात् शिवत्वं केन वार्यते ।। ( शि० सू० वा०, १.१५ )
सूत्र—जाग्रत् इत्यादि भेदपूर्ण अवस्थाओं में भी, वही भेदरहित तत्त्व, समानरूप से
३० स्पन्दकारिका [ अवस्थाभेदों में स्वरूप की एकता ] यहां तक सिद्ध किया गया कि आन्तर और बाह्य दोनों अवस्थाओं में एक ही स्वभाव ( स्पन्दतत्त्व ) व्याप्त है । इस विषय में यह शङ्का उठती है कि जब जाग्रत्, स्वप्न इत्यादि अवस्थाओं में पारस्परिक भिन्नता प्रत्यक्षरूप में देखने में आती है तो इन सबों में एक ही स्वभाव की व्यापकता का सिद्धान्त किस प्रकार स्वीकारा जा सकता है ? अगले सूत्र में इस शङ्का का समाधान किया जा रहा है । जाग्रदादिविभेदेऽपि तदभिन्ने प्रसर्पति । निवर्तते निजान्नैव स्वभावादुपलब्धृतः ॥ ३ ॥ जाग्रदादिनापि भेदे प्रथमाने न तस्य स्वरूपम् आव्रियते, यस्माद् उपलब्धृरूपत्वं त्रिष्वपि पदेषु साधारणम्, न तस्य स्वरूपान्यथाभावः, यथा विषस्याङ्कुरादिषु च पञ्चसु स्कन्धेषु ॥ ३ ॥ अनुवाद सूत्र—जाग्रत् इत्यादि भेदपूर्ण अवस्थाओं में भी, वही भेदरहित तत्त्व, समानरूप से वेदक के रूप में व्याप्त रहता है । अतः इन अवस्थाओं के प्रसार के समयों पर भी वह तत्त्व अनुभवी स्वभाव से निवृत्त नहीं होता है ॥ ३ वृत्ति—यद्यपि ( दैनिक जीवन में ) जाग्रत् इत्यादि अवस्थाओं में पारस्परिक भिन्नता का अनुभव हो जाता है तथापि उन भेदकल्पनाओं के द्वारा उस अनुभवी के स्वरूप पर कोई आवरण नहीं पड़ सकता है। इसका कारण यह कि उन तीनों अवस्थाओं में अनुभवी प्रमाता का रूप साधारण होता है । उसके स्वरूप में उसी प्रकार कोई भी परिवर्तन नहीं होता है जिस प्रकार विष के बीज से उगे हुए अंकुर इत्यादि के पाँचों स्कन्धों में अर्थात् मूल, शाखा, पत्र, फूल और फल में व्याप्त विष के रूप में कोई अन्तर नहीं होता ॥ ३ ॥ विवरण प्रस्तुत सूत्र में उल्लिखित 'तदभिन्ने' शब्द की व्याख्या दो प्रकार से हो सकती हैं :— १. तदभिन्ने—जाग्रत् इत्यादि भेदपूर्ण अवस्थायें उस मौलिक भेदरहित तत्त्व से भिन्न नहीं हैं क्योंकि वह, अपनी इच्छा से, स्वरूप में ही ऐसे अवस्थाभेद उपजाता है । २. तदभिन्ने—जाग्रत इत्यादि अवस्थाओं में यद्यपि पारस्परिक भेद होता भी है परन्तु उन सबों में वह तत्त्व एक ही भेदरहित वेदक के रूप में व्याप्त रहता है । प्रस्तुत प्रकरण में 'जाग्रदादि' शब्द से मुख्यरूप में जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और गौणरूप में इन तीनों के अतिरिक्त स्मृति, भ्रान्ति, मद, मूर्च्छा इत्यादि सारी, जीवभाव के साथ सम्ब- न्धित, अवस्थाओं का ग्रहण किया जाता है । वास्तव में शैव-सिद्धान्त के अनुसार जाग्रत् १, स्वप्न, सुषुप्ति, तुर्या और तुर्यातीत यही मुख्य पाँच अवस्थाएँ हैं परन्तु उनमें से अन्तिम दो १. जाग्रत् स्वप्नः सुषुप्तं च तुर्यं च तदतीतकम् । इति पञ्च पदान्याहः .......................... ॥ ( तं०, १०.२२८ )
अवस्था भेदों ने स्वरूप की एकता ३१ अवस्थाएं क्रमशः 'शाक्तभूमिका' और 'विशुद्ध-शिवभाव' की अवस्थायें हैं। सिद्ध गुरुचरणों का कथन है कि वास्तव में ये दोनों अवस्थायें एक ही सर्वोत्कृष्ट निर्विकल्प अवस्था की द्योतक हैं। इनमें केवल सूक्ष्मातिसूक्ष्म स्थिरता और अस्थिरता के अतिरिक्त कोई भेद नहीं है। इसका अभिप्राय यह कि असल में तुर्य पद ही वह पूर्ण अहंविमर्शात्मक शाक्तभूमिका है जिसको प्राप्त करने के अनन्तर सारी इतिकर्तव्यतायें समाप्त हो जाती हैं। साधक जब इसी पद पर शाश्वत स्थिरता में अवस्थित अर्थात् आरूढ़ हो जाता है, तो वही उसकी तुर्यातीत अर्थात् पूर्ण शिवभाव की अवस्था कही जाती है। यही कारण है कि हमारे स्पन्दगुरु इसी तुर्यपद (शाक्तभूमिका) को प्राप्त करने पर ही बल देते हैं क्योंकि यही पद शिवभाव को प्राप्त करने का पहला द्वार है। अस्तु, प्रस्तुत सूत्र में इन दोनों अवस्थाओं को ग्रहण करने का कोई अभिप्राय नहीं है क्योंकि ये दोनों निर्विकल्प चिद्धनता की भूमिकायें हैं। इनमें किसी प्रकार की भेदकल्पना का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। चिद्घन अवस्था सतत उदीयमान होने के कारण शाश्वत जागरण की अवस्था है अतः उस पर भेदकल्पना कैसे थोपी जा सकती है? अब रहा प्रश्न अवशिष्ट तीन अवस्थाओं का, उनके विषय में कुछ बातें अवश्य विचारणीय हैं :- इस विषय में सर्वप्रथम इस बात को ध्यान में रखना होगा कि साधनामार्ग पर चलने वाले योगियों अथवा ज्ञानियों के दृष्टिकोण से इन तीन अवस्थाओं का वही स्वरूप नहीं जो कि संसार भाव के सर्वसाधारण और दैनिक व्यवहार में अनुभव में आता है। उदाहरण के तौर पर साधारण लोगों की जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति योगियों के लिए ध्यान, धारणा और समाधि की अवस्थायें होती हैं। परन्तु प्रस्तुत सूत्र में बिल्कुल इन अवस्थाओं के उसी रूप की ओर इंगित किया गया है जो कि साधारण और दैनिक जीवन के साथ सम्बन्धित हैं। अतः यहाँ पर संक्षिप्त शब्दों में इनके इसी रूप पर कुछ प्रकाश डाला जायेगा और आगे सूत्र १८ में इनसे सम्बन्धित विशेष बातों पर प्रकाश डालने का प्रयत्न किया जायेगा। साधारणतया जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति का रूप इस प्रकार होता है- १. जाग्रत्-अवस्था—यह 'वह अवस्था है जिसमें किसी भी मितप्रमाता (किसी भी संसारी जीव) के अन्तःकरण और ज्ञानेन्द्रियां किसी ऐसे विषय को ग्रहण करने की ओर स्पन्दायमान हो जाती हैं जो कि सर्वसाधारण हो और स्थिर हो । इसका भाव यह कि इस अवस्था में इन्द्रियबोध का विषय बने हुए पदार्थ स्वप्नदशा में अनुभूयमान पदार्थों की तरह क्षणपर्यवसायी और एक ही प्रमाता के द्वारा अनुभूयमान नहीं होते हैं। किसी प्रमाता की ज्ञाने- न्द्रियां जिन पदार्थों का ग्रहण करती हैं वे उस प्रमाता के द्वारा ग्रहण न किये जाने पर भी, अलग रूपों में वर्तमान रहती हैं और साथ ही उस प्रमाता के अतिरिक्त अन्य प्रमाता भी एक ही समय पर उनका ग्रहण कर सकते हैं। घट एक पदार्थ है। उसको कोई देखे या न देखे वह तो वर्तमान रहता है और देखे जाने के समय बहुत से प्रमाता उसको एक ही समय पर देख १. 'ज्ञानं जाग्रत्' (शि० सू० १.८) ।
३२ स्पन्दकारिका भी सकते हैं। फलतः तीन अन्तःकरणों और पांच बाह्य ज्ञानेन्द्रियों की वृत्तियों से, १निश्चय, अभिमान, संकल्प, शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध के रूप में उत्पन्न सर्वसाधारण ज्ञान को, 'जाग्रत् अवस्था' कहते हैं। इसमें सत्त्वगुण की प्रधानता रहती है। २. स्वप्न-अवस्था—२इस अवस्था में प्रमाता के इन्द्रियवर्ग का बाह्यप्रसार रुक जाता है और परिणामतः उनकी निश्चयन, अभिमानन, शब्दन, स्पर्शन इत्यादि सारी वृत्तियां केवल मानसिक संकल्पविकल्पात्मकता में ही केन्द्रीभूत हो जाती हैं। फलतः इस अवस्था में प्रमाता जाग्रत्-अवस्था की तरह ही नगर, गिरि, उपवन इत्यादि पदार्थों का अनुभव मानसिक विकल्पों के द्वारा करने लगता है। इस अवस्था का जाग्रत्-अवस्था के साथ केवल इतना भेद है कि इसमें अनुभूयमान पदार्थवर्ग एक ओर क्षणपर्यवसायी होता है और दूसरी ओर स्वप्नावस्था में पड़े हुए प्रमाता के अतिरिक्त दूसरे प्रमाता उसको ग्रहण नहीं कर सकते हैं। फलतः केवल मानसिक संकल्पविकल्पात्मकता के द्वारा विषयों के अनुभव करने की अवस्था को 'स्वप्नावस्था' कहते हैं। इसमें रजोगुण की प्रधानता होती है। ३. सुषुप्ति-अवस्था३—इस अवस्था में प्रमाता के अंतस् में तमोगुण की इतनी मात्रा बढ़ जाती है कि वह सारे तन-मन की सुध खोकर गहरे मोह में पड़ जाता है। इन्द्रियों की शक्ति न ४ज्ञानरूप में और न ज्ञेयरूप में ही कुछ काम कर सकती है। फलतः प्रमाता केवल आन्तरिक चेतना, जिसको मायापदवी पर 'चित्त' कहते हैं, के द्वारा ही विषयों का अनुभव कर सकता है। सुषुप्ति काल में विषयों की अनुभूति रहती तो अवश्य है परन्तु तमोगुण की मात्रा अधिक होने के कारण प्रमाता को इस अवस्था से उठने के अनन्तर इसमें प्राप्त की हुई अनु- भूतियाें का स्मरण स्पष्ट रूप में नहीं होता है। हां केवल उठने के अनन्तर उसको इस काल में अनुभूत विषयों के द्वारा लगे हुए संस्कारों से—'मैं सुख से सोया हुआ था; मुझे कुछ भी ज्ञात १. बौद्धं गावं च सांकल्पं शाब्दं स्पाशं च रूपजम् । रसजं गन्धजं, चान्यदैन्द्रियज्ञानमेव यत् ।। अत्र गृहीतग्रहणग्राह्यरूपता चिदात्मनः। स्फुरत्येव ज्ञानशक्तिर्जाग्रद्वृत्तिरिहैव सा ।। ( शि० सू० वा०, ८ सूत्र ) २. स्वप्नो विकल्पाः ( शि० सू०, १.९ ) । दृष्टिस्वभावस्य विभोरन्तर्नवनवोदयः । विकल्पानां स्मृतः स्वप्नस्तद्वाह्यार्थनिरासतः ।। ( शि० सू० बा०, ९ सूत्र ) ३. अविवेको मायासाैषुप्तम् (शि० सू०, १.१०) । ४. ज्ञानज्ञेयस्वरूपायाः शक्तेरनुदयो यदा । चिद्रूपस्याविवेकः स्यादासावेवाविमर्शतः ।। सैव माया वृत्तिजालपोषकत्वात् प्रकीर्तिता । अर्थस्मृती स्वात्मसंस्थे चिद्रूपे सा सुषुप्तता ।। ( शि० सू०, १० सूत्र )
अवस्था भेदों में स्वरूप की एकता ३३ नहीं है' इसप्रकार का धुंधला जैसा स्मरण होता है । फलतः गहरी नींद में पड़कर केवल चित्त के द्वारा ही विषयों को अनुभव करने की अवस्था को 'सुषुप्ति-अवस्था' कहते हैं। इसमें तमो- गुण की प्रधानता होती है । इन तीन अवस्थाओं के अतिरिक्त स्मृति, मद, मूर्च्छा इत्यादि अनन्त मानसिक अवस्थायें होती हैं। इनके स्वरूपविश्लेषण के विषय में शास्त्रकारों ने एक सिद्धान्त स्थापित किया है कि जिन वृत्तियों में सात्त्विक अंश की अधिकता हो उनको जाग्रत् में, जिनमें राजसिक अंश की अधिकता हो उनको स्वप्न में और जिनमें तमोगुण की प्रधानता हो उनको सुषुप्ति में अंतर्भूत समझना चाहिये । इन्हीं तीन मौलिक अवस्थाओं के पारस्परिक संयोजन और वियोजन की विचित्रता से अनन्त प्रकार की मानसिक अवस्थायें जन्म लेती हैं। उदाहरण के तौर पर इन अवस्थाओं में से प्रत्येक में त्रिरूपता पाई जाती है। जैसे— १. जाग्रत् में जाग्रत्, जाग्रत् में स्वप्न और जाग्रत् में सुषुप्ति; २. स्वप्न में जाग्रत्, स्वप्न में स्वप्न और स्वप्न में सुषुप्ति; ३. सुषुप्ति में जाग्रत्, सुषुप्ति में स्वप्न तथा सुषुप्ति में सुषुप्ति । इन अवस्थाओं के गोरखधन्धे के विश्लेषण की यहाँ पर कोई आवश्यकता नहीं है । जिज्ञासु पाठक इनको तंत्रालोक आदि ग्रंथ पढ़कर स्वयं समझ सकते हैं। यहाँ पर केवल इस बात का परीक्षण करना अभिप्रेत है कि क्या इन अवस्थाओं की भिन्नता से स्वरूप में कोई भेद उत्पन्न हो सकता है ? शास्त्रकारों का कथन है कि इन पाँचों ही अवस्थाओं में १वेदक अर्थात् अनुभव करने वाला प्रमाता एक ही होता है । २यदि इनमें से प्रत्येक का वेदक अलग अलग होता तो एक अवस्था का अनुभव करने वाला प्रमाता दूसरी अवस्था से बिल्कुल अनभिज्ञ रहता । फल यह होता कि एक ही अवस्थाता या अनुभवी के अभाव में ये अवस्थायें ही नहीं बन सकतीं और न इनकी कोई निश्चित संख्या ही कही जा सकती । अवस्था शब्द से एक ही वस्तु की भिन्न भिन्न देश, काल, आकार आदि के साथ सम्बन्धित दशा अथवा स्थिति का अभिप्राय लिया जाता है । स्पष्ट है कि अवस्थाओं की संख्या चाहे जितनी भी हो उन सबों का सम्बन्ध ३एक ही अवस्थाता के साथ होना आवश्यक है। अतः ये पाँचों अवस्थायें एक ही चेतन प्रमाता की स्वयं अङ्गीकृत अवस्थायें हैं और, स्थूलरूप में इनमें पारस्परिक स्वरूप भेद होते हुए भी इनका अनुभव करने वाली चेतन सत्ता की उपलब्द्धता (अनुभव करने का स्वभाव) में, कोई अन्तर नहीं पड़ता है । १. इति पञ्चपदान्याहुरेकस्मिन् वेदके सति (तं०, १०.२२९) । २. एकस्मिन् वेदके सतीति । अनेकस्मिन् वेदके अन्यस्य जाग्रदन्यस्य स्वप्न इत्यवस्थानामव- स्थात्वं पञ्चात्मकत्वं च न स्यात् (तं० वि०, १०.२२८) । ३. एकमेव ह्यवस्थातारमधिकृत्यासां तथाभावो भवेदिति भावः । (तं० वि०, १०.२२८) ३
३४ स्पन्दकारिका इस तथ्य को सिद्ध करने के लिए शास्त्रों के प्रमाणों अथवा सुनी सुनाई बातों पर विश्वास करने की आवश्यकता नहीं क्योंकि आये दिन कम से कम प्रत्येक मनुष्य इस बात का स्वयं ही अनुभव कर लेता है । एक ही मनुष्य किसी दिन नींद से उठते ही ऐसा कह डालता है कि—'अरे मैं कल जाग्रत्-अवस्था में पत्र लिख रहा था; रात को किसी समय स्वप्न-अवस्था में हवाई जहाज में उड़ रहा था और तदनन्तर इतनी गहरी नींद में डूब गया कि मुझे किसी बात की सुध-बुध न रही' । यदि इन तीनों अवस्थाओं में उसके चैतन्यात्मक स्वभाव में कोई भेद होता तो वह प्रातः उठकर तीनों अनुभूतियों को समानरूप से कैसे अभिव्यक्त कर सकता ? इसी से यह बात भी समझ में आ जाती है कि चेतन प्रमाता ही इन अवस्थाओं की अभि- व्यक्ति और इनका अनुभव भी कर सकता है । अतः ये एक ही चैतन्यसत्ता के भिन्न भिन्न अवस्थामात्र हैं ॥३॥ [सुखिता इत्यादि में स्पन्द की अनुस्यूतता] पूर्वसूत्र में यह कहा गया कि जाग्रत् इत्यादि अवस्थाओं में एक ही अवस्थाता व्याप्त रहता है । परन्तु संसार में 'मैं सुखी हूँ'; 'मैं भूखा हूँ;' 'मैं कृश हूँ'; 'मैं कुछ भी नहीं हूँ'; इत्यादि बहुत सी ऐसी विकल्पात्मक अनुभूतियाँ हैं जो कि प्रत्यक्षरूप में शरीर, बुद्धि, प्राण, शून्य इन पर अवसित होने वाली 'अहं प्रतीति' के द्वारा अनुमेय और सुख, दुःख इत्यादि उपाधियों से विशिष्ट अनेक प्रकार के जीवात्माओं के साथ सम्बन्धित होती हैं । ऐसी दशा में प्रत्येक अनुभूति के साथ सम्बन्धित एक ही अनुभवी की वर्तमानता कैसे स्वीकार की जा सकती है ? अगले सूत्र में इस शङ्का का समाधान किया जा रहा है— अहं सुखी च दुःखी च रक्तश्चेत्यादिसंविदः । सुखाद्यवस्थानुस्यूते वर्तन्तेऽन्यत्र ताः स्फुटम् ॥४॥ स चानुस्यूत एव सर्वास्ववस्थासु, यस्मात् 'य एव अहं सुखी स एव अहं दुःखी, रक्तो वा पश्चात् स्थित' इति अनुस्यूतत्वेन; अन्यत्र अवस्थाव्यतिरिक्ते । यदागमः ..............................'स स्वभावः परः स्मृतः ।' इति ॥४॥ अनुवाद सूत्र—यह बात बिल्कुल स्पष्ट है कि 'मैं सुखी हूँ', 'मैं दुःखी हूँ', 'मैं अनुरक्त हूँ' ये और इसी प्रकार के दूसरे विकल्पज्ञान (शरीर इत्यादि से भिन्न) किसी दूसरी ही वेदकसत्ता के साथ सम्बन्धित होते हैं । वह (वेदकसत्ता) स्वतः इन सबों से नितरां भिन्न होने पर भी, इन सबों में अनुस्यूत होती है ॥४॥ वृत्ति—वह स्पन्दात्मक स्वभाव सारी अवस्थाओं में अनुस्यूत अर्थात् धागे की तरह पिरोया हुआ ही है क्योंकि—'जो ही मैं पहले सुखी था वही मैं पीछे दुःखी या अनुरक्त हूँ' इस प्रकार की अनुभूतियों में साधारण 'अहं प्रतीति' के रूप में एक ही वेदक की अनुस्यूतता पाई जाती है । 'अन्यत्र' शब्द उस स्वभाव का द्योतक है जो स्वयं सारी अवस्थाओं से भिन्न है । आगमशास्त्रों में इस प्रकार कहा गया है । 'वह स्वभाव सब वस्तुओं में भिन्न एव उत्कृष्ट कहा गया है' ॥ ४ ॥
सुखित्ता इत्यादि में स्पन्द की अनुस्यूतता ३५ विवरण प्रस्तुत सूत्र में ग्रन्थकार ने, बौद्धों के क्षणिकविज्ञानवाद, मीमांसकों के सुख दुःख इत्यादि उपाधियों से विशिष्ट आत्मवाद और चार्वाकों के देहात्मवाद का, सूत्रात्मक रूप में खण्डन करके अपने स्पन्द-सिद्धान्त का मण्डन किया है। ग्रन्थकार के अभिप्राय को सरलता- पूर्वक और अच्छी प्रकार हृदयङ्गम करने के लिए इन सारे दार्शनिकों के दृष्टिकोणों का संक्षेप में उल्लेख करना आवश्यक है। १. बौद्ध-दार्शनिकों का क्षणिकविज्ञानवाद—इस संसार में 'मैं सुखी हूँ, मैं दुःखी हूँ' इस- प्रकार व्यवहार में लाये जाने वाले परामर्शों के रूप में, भिन्न भिन्न आकार-प्रकार वाले ज्ञान- क्षण ही प्रकाशमान हैं। १इनके अतिरिक्त और किसी आधारभूत स्पन्दात्मक चैतन्य (स्वभाव- भूत विश्वात्मा) की सत्ता को स्वीकारना ठीक नहीं है क्योंकि वैसा करने में कल्पनागौरव के अतिरिक्त और कोई लाभ नहीं होगा। वे ज्ञानक्षण परस्पर विलक्षण होते हुए भी स्वयं ही प्रकाशवान् हैं। उनको किसी दूसरे पदार्थ के द्वारा प्रकाशित होने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। ज्ञान एक ही प्रकार का नहीं है अपितु प्रमाता (प्रमाता जो कि स्वयं भी इन ज्ञान- क्षणों के अतिरिक्त कुछ नहीं है) के हृदय में, अजस्ररूप में, भिन्न २भिन्न समय, भिन्न भिन्न विषय और भिन्न आकार-प्रकारों के साथ सम्बन्धित ज्ञानक्षणों की एक धारा बहती रहती है जिसको 'ज्ञान-सन्तान' कहते हैं। ज्ञानक्षणों की भिन्नता इसलिए कही जाती है कि एक ज्ञान केवल तीन ३क्षणों तक ठहर सकता है अतः प्रति तीन क्षणों के पश्चात् उसका समय, विषय और आकार-प्रकार बदल जाता है। अब जो प्रत्यक्षतः इनमें एकरूपता जैसी अनुभव में आती है वह केवल इसलिए कि पहले ज्ञानक्षणों के संस्कार उत्तर उत्तर काल के ज्ञानक्षणों को जन्म देते हैं। संस्कार का स्वभाव ही स्थितिस्यापकता अर्थात् पहली ही जैसी दशा को जन्म देना होता है। इसी स्वभाव के कारण पहले पहले ज्ञानक्षणों के संस्कार, दूसरे, परन्तु पहले जैसे ही, आकार-प्रकार वाले अपर ज्ञानक्षणों को उत्पन्न करते हैं जिससे कि इनमें एकरूपता पाई जाती है। ये ज्ञानक्षण दो प्रकार के हैं "निर्विकल्प और सविकल्प"। निर्विकल्प ज्ञानक्षणों का शास्त्रीय नाम ४'स्वलक्षणाभास' है अर्थात् किसी वस्तु का पहली बार प्रत्यक्ष हो जाने पर उस वस्तु के साथ सम्बन्धित वह प्राथमिक ज्ञानक्षण, जिसमें उस वस्तु का, किसी भी नामरूपात्मक विकल्प से रहित और मात्र उस वस्तु के विकल्पहीन स्वरूप में परिनिष्ठित, रूप में अनुभव हो १. द्रष्टव्य—भारतीय दर्शन, बलदेव उपाध्याय, पृष्ठ १२४. २. ...... 'ज्ञानान्येव प्रकाशन्ते भिन्नकालानि भिन्नविषयाणि भिन्नाकाराणि च । (ई० प्र० वि०, पृष्ठ ५४) ३. द्रष्टव्य—भारतीय दर्शन, बलदेव उपाध्याय, पृष्ठ १२५. ४. तत्र नीलप्रकाशः 'स्वलक्षणाभास ज्ञानम्' । 'स्वम्' अन्यानुयायि स्वरूपसंकोचभाजि 'लक्षणं' देशकालाकाररूपं यस्य तस्य 'आभासः' प्रकाशनम् अन्तर्मुखं यस्मिन् । (ई० प्र० वि०, पृष्ठ ५४)
३६ स्पन्द कारिका जाता है। यह प्राथमिक १ज्ञानक्षण उस वस्तु या अवस्था के विकल्पहीन स्वरूप में ही संकुचित होने के कारण एक ही प्रकार का है अतः इसके द्वारा सांसारिक आदान-प्रदान सम्भव नहीं हो सकता। यह निर्विकल्प ज्ञानक्षण अपने संस्कार के द्वारा दूसरे सविकल्प ज्ञानक्षण को जन्म देता है। इस क्षण तक पहुँचते पहुँचते उसी पूर्वानुभूत वस्तु या अवस्था के साथ नामरूपात्मक विकल्पों का सम्बन्ध हो जाता है। ये २नामरूपात्मक विकल्प अनन्त प्रकार के हैं। अतः इनसे सम्बन्धित सविकल्प ज्ञानक्षण भी अनन्त प्रकार के हैं और इनके साथ अभिलाप अर्थात् शब्दों में अभिव्यक्ति का भी सम्बन्ध हो जाता है। ३स्थान को घेरने वाली और वजन से युक्त वस्तु का नाम 'रूप' है। वज़न से रहित और स्थान न घेरने वाली वस्तु को 'नाम' कहते हैं। इस लक्षण के अनुसार पहले में पृथिवी, जल, तेज और वायु ये चार महाभूत और इनसे उत्पन्न शरीर और दूसरे में विकल्पात्मक मानसिक प्रवृत्तियाँ अन्तर्भूत हो जाती हैं। नाम के चार भेद हैं—'वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान'। रूप एक ही प्रकार का है। फलतः रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार और विज्ञान इन पांच स्कन्धों का समुदाय ही सन्तान- रूप में बहने वाली ज्ञानधारा है। इनमें से 'विज्ञान' से निर्विकल्प और 'संज्ञा' से सविकल्प ज्ञान- क्षणों का अभिप्राय है। पहले भी कहा गया है कि बौद्धों के मतानुसार यही ज्ञानसन्तान चेतन आत्मा का सारा स्मरण, उपलब्धि इत्यादि कार्य सिद्ध कर लेता है। ४अतः उससे भिन्न किसी दूसरे नित्य एवं उपलब्ध आत्मा की कल्पना करके इन त्रिक्षणवृत्ति ज्ञानों का उसके साथ सम्बन्ध जोड़ना यथार्थ से बहुत दूर है। वास्तव में इन ज्ञानक्षणों के बीच में ऐसी किसी दूसरी चेतन सत्ता की वर्तमानता अनुभव में भी नहीं आती है। अब जो 'मैं सुखी हूँ' इत्यादि परा- मर्शों में 'मैं' की प्रतीति देखने में आती है उसका पर्यवसान केवल या तो 'रूप' अर्थात् शरीर- सन्तान अथवा 'नाम' अर्थात् ज्ञानसन्तान पर ही हो जाता है। इनसे इतर किसी कपोलकल्पित 'आत्मा' नामक चेतन पदार्थ पर नहीं। २. मीमांसकों का उपाधिविशिष्ट आत्मवाद—मीमांसकों से यहाँ पर भाट्टमत के अनु- यायी कुमारिल जैसे उद्भट मीमांसागुरुओं का अभिप्राय है। ५उन्होंने अपने समय में अनात्म- वादी बौद्धों के प्रखर तर्कों को अपने पाण्डित्यपूर्ण एवं अकाट्य तर्कों से विशीर्ण करके धराशायी कर दिया और भारत में पुनः वैदिक धर्म की मर्यादा का त्राण किया। इन लोगों का मत बहुत मात्रा तक न्याय के प्रत्यक्ष, अनुमान इत्यादि प्रमाणों पर आधारित है। १. स्वलक्षणाभासं ज्ञानमेकम्....। ( ई० प्र०, १.२.१ ) २. साभिलापं विकल्पाख्यं बहुधा....। ( ई० प्र०, १.२.१ ) ३. भारतीय दर्शन, बलदेव उपाध्याय, पृष्ठ, १२४. ४. ....नापि तद्द्वयम् । नित्यस्य कस्यचिद्द्रष्टुस्तस्यात्रानवभासतः । अहंप्रतीतिरप्येषा शरीराद्यवसायिनी ॥ ( ई० प्र०, १.२.२ ) ५. द्रष्टव्य—भारतीय दर्शन, बलदेव उपाध्याय, पृष्ठ ३१२.
सुखिता इत्यादि में स्पन्द की अनुस्यूतता ३७ उनके मतानुसार किसी भी १प्रकार के ज्ञान के साथ कोई न कोई विशेषता अवश्यमेव उपाधि बन कर रहती है। यदि रजत का ज्ञान है तो उसमें रजतत्व साथ रहता है। इसका अभिप्राय यह हुआ कि किसी विशेषता अथवा उपाधि के द्वारा ही किसी वस्तु का यथार्थ ज्ञान उत्पन्न हो जाता है। प्रस्तुत प्रकरण में भी इसी नियम के अनुसार 'मैं सुखी हूँ' 'मैं दुःखी हूँ' इत्यादि परामर्शों में सुखिता अथवा दुःखिता रूप विशेषताओं या उपाधियों के द्वारा ऐसे किसी आत्मा नामक वस्तु की, अनुमान के द्वारा, प्रतीति हो जाती है, जो इन उपाधियों से विशिष्ट है। 'मैं सुखी हूँ' इत्यादि परामर्शों में दो प्रकार की प्रतीतियाँ अनुभव में आती हैं— एक, सुखिता इत्यादि रूप विशेषता या उपाधि की और दूसरी 'मैं' की। २सुखिता इत्यादि की प्रतीतियाँ गुण हैं। गुण गुणी के विना स्वतंत्र रूप में ठहर नहीं सकता है। उसको किसी आधारभूत गुणी की आवश्यकता रहती है। फलतः सुखिता इत्यादि का गुणी वही हो सकता है जिसकी प्रतीति 'मैं' से हो जाती हैं। वही आत्मा है। इसके साथ ही यह भी स्मरणीय है कि ३सुखिता, दुःखिता इत्यादि उपाधियों का किसी उपाधि-विशिष्ट आधार के बिना, घट, पट, की तरह अलग दर्शन नहीं होता है अतः 'मैं सुखी हूँ' इत्यादि के द्वारा 'सुखिता' इत्यादि उपाधियों से विशिष्ट 'मैं' अर्थात् आत्मभूत वस्तु की प्रतीति अनुमान के द्वारा हो जाती है। फलतः आत्मा के विषय में इनका निर्णय यह है कि 'आत्मा' के सद्भाव का अनुमान 'मैं' प्रतीति के साथ समवाय सम्बन्ध से रहनेवाली 'सुखिता', 'दुःखिता' इत्यादि विशेषताओं के द्वारा लगाया जा सकता है। इस आत्मा के दो अंश हैं—चिद् और अचिद् । ४चिद् अंश से वह ज्ञान का अनुभव करने वाला और अचिद् अंश से सुखिता इत्यादि उपाधियों की विशि- ष्टता को प्राप्त करने वाला है। भाव यह कि आत्मा स्वयं ही सुखदुःखादिरूप नहीं अपितु तद्विशिष्ट है। अर्थात् सुख, दुःख इत्यादि विशेषताओं के द्वारा परिणाम को प्राप्त करता है। ५कुमारिलभट्ट इतना भी मानते हैं कि आत्मा स्वयं चेतन वस्तु नहीं अपितु शरीर और विषय के साथ संयोग होने की अवस्था में वह 'चैतन्य-विशिष्ट' बन जाती है। यही कारण है कि स्वप्नावस्था में विषयों के साथ सम्बन्ध छूट जाने के कारण आत्मा में तत्काल पर्यन्त चैतन्य नहीं रहता है। फलतः आत्मा जड़ भी है और बोधात्मक भी है। १. भारतीय दर्शन, पृष्ठ ३२४. २. सुखादि चेत्यमानं हि स्वतन्त्रं नानुभूयते । मतुबर्थानुवेधात्तु सिद्धं ग्रहणमात्मनः ।। (ई० प्र० वि०, पृष्ठ ५८, टि० २१) ३. इदं सुखमिदं ज्ञानं दृश्यते न घटादिवत् । अहं सुखीति तु ज्ञप्तिरात्मनोऽपि प्रकाशिका ।। (तत्रैव) ४. चिदंशत्वेन दृष्टृत्वं सोऽयमिति प्रत्यभिज्ञा, विषयत्वं च अचिदंशेन, ज्ञानसुखादिरूपेण परिणामित्वम् । (कश्मीरिक सदानन्द-अद्वैतब्रह्मसिद्धिः) स आत्मा अहंप्रत्ययेनैव वेद्यः । (भा० द०, पृ० ६०२) ५. भारतीय दर्शन, बलदेव उपाध्याय, पृष्ठ ३२८.
३८ स्पन्दकारिका इस सारे कथन का निष्कर्ष इस प्रकार है—'मैं' प्रतीति से अनुमेय और सुख-दुःख इत्यादि उपाधियों से विशिष्ट वस्तु ही आत्मा है। इससे इतर कोई नित्य और स्वप्रकाश आत्मा नहीं है। ३. चार्वाकों का देहात्मवाद—अनात्मवादी दार्शनिकों में चार्वाकों का स्थान प्राचीन भी है और महत्त्वपूर्ण भी। प्राचीन भारत में इनको लोकायतिक भी कहते थे। इनका मन्तव्य है कि शरीर से इतर आत्मा नामक किसी वस्तु का अस्तित्व मानना सच्चाई की आँखों में धूल झोंकने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। 'मैं सुखी हूँ', 'मैं दुःखी हूँ' इत्यादि अनुभवों में सुखिता और दुःखिता इत्यादि का सम्बन्ध चेतन शरीर के साथ ही है क्योंकि प्रत्यक्ष रूप में यही देखने में आता है। जो प्रत्यक्ष हो वही सत्य है। जो प्रत्यक्ष नहीं उसके विषय में अनुमान आदि के बटेर उड़ाना मूर्खों का काम है। १चार्वाक लोग शरीर को ही चेतन आत्मा मानने के पक्ष में तीन प्रमाण प्रस्तुत करते हैं— १. जब तक शरीर रहता है (जीर्ण नहीं हो जाता है) तब तक ही चैतन्य भी रहता है। चैतन्य शरीर के साथ ही आता है और उसी के साथ जाता भी है। अन्नपान से चेतना (शरीररूप) वृद्धि पाती है और उसके अभाव में उसका ह्रास हो जाता है। अतः शरीर ही चेतन है। २. 'मैं सुखी हूँ', 'मैं दुःखी हूँ', 'मैं भूखा हूँ' इत्यादि अनुभवों के ज्ञान, शरीर की ओर ही संकेत करते हैं क्योंकि सुखी, क्षीण इत्यादि शरीर ही हो जाता है और कोई नहीं। ३. चैतन्य और भौतिक पदार्थों का पारस्परिक सम्बन्ध शाश्वत और यथार्थ है क्योंकि जो कुछ जिस रूप में देखने में आता है वही सत्य है। अब प्रश्न केवल इतना ही है कि इन भौतिक पदार्थों में चेतना२ का उदय कहाँ से होता है ? इस विषय में चार्वाकों का कथन है कि प्रत्यक्षरूप में जड़ दिखाई देने वाले पृथिवी, जल, तेज और वायु इन चार महाभूतों के आकस्मिक और किसी निश्चित नियम के अनु- सार सम्मिश्रण से स्वयं ही चैतन्य की उत्पत्ति हो जाती है और उस सम्मिश्रण का लोप हो जाने पर इसका भी लोप देखने में आता है। भूतों के सम्मिश्रण से ही शरीर की भी उत्पत्ति हो जाती है अतः स्वयं ही चैतन्ययुक्त शरीर उत्पन्न हो जाता है और मरने पर उस शरीर के चैतन्य का भी उसी के साथ नाश हो जाता है।३ सृष्टि और संहार, जगत् का अपना ही स्वभाव है। इसमें ईश्वर का कोई हाथ नहीं है। वास्तव में ईश्वर नामक पदार्थ है ही नहीं। अतः जो कुछ है वह शरीर ही है। इसी की आयु बढ़ाने का और इसी को सुखमय बनाने का उपक्रम करना ही जीवन का महत्त्वपूर्ण कार्य है। खाओ, पीओ और मौज उड़ाओ। धर्म कुछ भी नहीं है। धन और काम ही जीवन के परम लक्ष्य हैं। मुक्ति की कल्पना झूठी है। मरना ही मुक्ति है।
१. तत्रैव, ८१ पृष्ठ . २. भारतीय दर्शन, बलदेव उपाध्याय, पृ० ८१. ३. तत्रैव, पृष्ठ ८२.
सुखिता इत्यादि में स्पन्द की अनुस्यूतता ३९ इतना कहने से इनके मत का निष्कर्ष यही निकलता है कि सुखिता दुःखिता इत्यादि अनुभूतियों का और 'मैं' इस प्रतीति का सीधा सम्बन्ध शरीर के साथ है। अतः शरीर से इतर आत्मा या किसी चेतन सत्ता की विद्यमानता स्वीकार नहीं की जा सकती है। इन तीनों वादियों का मुखमुद्रण करने के लिए ग्रन्थकर्ता ने इस सूत्र के एक ही प्रहार से इनके सभी तर्कों को धराशायी कर दिया है। ग्रन्थकार के विचारानुसार 'मैं सुखी हूँ' इत्यादि परामर्शों में, एक ही आधारभूत सत्ता के दो रूपों की स्फुरणा अन्तर्निहित है। सुखिता दुःखिता अथवा मूढता इत्यादि अवस्था-विशेषों से सर्वस्वतन्त्र संवित् के उस रूप का आभास मिलता है जहाँ वह संसार की क्रीडा करने के लिए स्वेच्छा से ग्राह्यभूमिका पर अव- तीर्ण होकर स्वयं सारे प्रमेय पदार्थों का रूप धारण कर लेती है। 'अहम्' शब्द से उस रूप की ओर संकेत है जहाँ वह संसारी ग्राहक-भूमिका पर अवतीर्ण होकर स्वेच्छा से अपने आप को, पांच तन्मात्रा, मनस्, बुद्धि और अहंकार के पुर्यष्टक में फंसे हुए संसारी प्रमाता (जीवात्मा) का रूप धारण कर लेती है। 'अन्यत्र' शब्द से वह विश्वोत्तीर्ण एवं अनुत्तर रूप अभिप्रेत है जहाँ वह प्रमातृभाव पर अवस्थित होकर इन सुखिता दुःखिता इत्यादि अवस्थाओं के द्वन्द्वों से विहीन पूर्ण आनन्दघनता में विलीन रहती है। फलतः संवित्-भट्टारिका ही वह धागा है जिसमें सारी प्रमेयता माला के दानों की तरह पिरोई हुई है। यही वह अन्तिम सोपान है जहाँ पहुँच कर सारी अवस्थाओं की कल्पनायें विश्रान्त और समरस हो जाती हैं। अब रहा प्रश्न यह कि संवित्-भट्टारिका शाक्त-प्रसर के अवसर पर किस प्रकार स्वयं ही संसारी ग्राहक-भूमिका अथवा ग्राह्यभूमिका पर अवतीर्ण होती है? इस प्रक्रिया का यावत्-शक्य पर्यालोचन आगे सूत्र ६ और १६ में किया जायेगा। यहाँ पर इतना ध्यान में रखना पर्याप्त है कि शरीर, प्राण, पुर्यष्टक, शून्य इत्यादि सारे जड़ एवं अजड़ पदार्थों की नानारूपता में एक ही आधारभूत एवं जीवनदायिनी स्पन्दशक्ति, अनुस्यूत रहती है और उसकी पर- मार्थसत्ता को किसी भी प्रकार से नकारा नहीं जा सकता। ग्रन्थकार के आशय को भली भांति स्पष्ट करने के लिए अब उपर्युक्त आशय की पृष्ठभूमि पर पूर्वोक्त मतवादों का थोड़ा सा परीक्षण करना युक्तियुक्त होगा- १. बौद्धवाद का पर्यालोचन-बौद्धों ने जिन भिन्नकालीन ज्ञानों की प्रकाशमानता स्वीकार की है वे तो त्रिगुणात्मक प्रकृति की विकारभूत¹ बुद्धि पर ही पर्यवसित होते हैं। इस विषय में यह बात विचारणीय है, कि क्या ज्ञान के भिन्नकालीन खण्ड हो सकते हैं और क्या ज्ञान स्वयं जड़ है या चेतन ? यदि ज्ञान भिन्नकालीन और भिन्न आकार वाले मान लिए जाएं तो उनसे कोई अखण्ड प्रतीति कैसे सम्भव हो सकती है? साथ ही यदि ज्ञान जड़ है तो जड़ होने के कारण वह किसी प्रकार की प्रतीति को कैसे प्रकाशित कर सकता है? यदि ज्ञान चेतन है तो बौद्धों को जड़ से इतर कोई चेतन सत्ता स्वीकार करनी ही पड़ेगी। वे ज्ञान को स्वप्रकाश मानते हैं। प्रकाशमानता अर्थात् विषय को प्रकाशित करने के साथ साथ अपने को भी प्रकाशित करना केवल चेतन-सत्ता का ही स्वभाव हो सकता है। परन्तु बौद्ध लोग स्वयं ही द्रष्टा या उपलब्धा के रूप में किसी एक ही चेतन-सत्ता को स्वीकार करने के पक्ष में नहीं १. 'ज्ञानसन्तान एव तत्त्वम्' इति सौगता बुद्धिवृत्तिषु एव पर्यवसिताः। (प्र० हृ० सूत्र ८)
.४० स्पन्दकारिका हैं। फलतः उनके द्वारा स्वीकारे गये भिन्नकालीन एवं भिन्नाकार ज्ञान अनेकाकार होने के कारण वेद्य ही बन सकते हैं वेदक नहीं। अनेकाकारता ही वेद्यता होती है। वेद्यता में अर्थ- प्रकाशित का स्वभाव नहीं हो सकता। अतः अर्थप्रकाशित के अभाव में ये ज्ञानक्षण स्वतः जड़ ही हैं। ये कदापि प्रकाशमान नहीं माने जा सकते। इसके साथ ही बौद्ध लोगों का विचार है कि संसार के सारे आदान-प्रदान दूसरे सविकल्प ज्ञानक्षणों से चलते हैं और पहला निर्विकल्प ज्ञानक्षण इनका आधार होता है। वास्तव में बात ऐसी है कि ज्ञान का प्रथम क्षण अनुभवकाल और दूसरा क्षण स्मृतिकाल होता है। संसार के सारे व्यवहार प्राथमिक अनुभव पर नहीं अपितु उसकी स्मृति पर आधारित होते हैं क्योंकि संसार में एक ही पदार्थ को सैकड़ों बार देखने पर हर देखने को पहला अनुभव नहीं कहा जा सकता। स्मृतिकाल में विषय ठीक उसी रूप में प्रकाशित होते हैं जिस रूप में अनुभवकाल में उनका अनुभव हुआ होता है। विचारणीय यह है कि जब अनुभवक्षण में स्मृति नहीं है और स्मृतिक्षण में अनुभव नष्ट हुआ होता है तो ऐसी परिस्थिति में स्मृतिक्षण में घट, पट आदि पदार्थों का अनुभवकालीन रूप किस प्रकार प्रकाशित हो सकता है ? विषयों के, ठीक वैसे ही रूप में प्रकाशित न होने की दशा में उनकी स्मृति कैसी और परिमाणतः संसार के व्यवहारों का चलना भी कैसा ? अब यदि बौद्धों के संस्कारसिद्धान्त को माना जाय कि अनुभव के संस्कारों से स्मृति- क्षण में ठीक अनुभवकाल के ही आकार-प्रकार वाले विषयों का प्रकाशन हो जाता है तो एक बाधा उपस्थित होती है। वह यह कि संस्कार का स्वभाव पहली जैसी स्थिति की स्थापना करना होता है। अनुभवकाल के संस्कार स्मृतिकाल में भी बिल्कुल अनुभवकाल के समान रूपवाले ज्ञानों को जन्म देंगे। अनुभवकाल में विषय का अनुभव निर्विकल्प रूप में होता है। अतः स्मृतिकाल में भी ज्ञानों का रूप निर्विकल्प ही होगा। अर्थात् स्मृति का विषय बने हुए ग्राह्यपदार्थों में किसी प्रकार की नामरूपादि की कल्पना सम्भव नहीं होगी। ऐसी दशा में स्मृति के द्वारा भी संसार के आदान-प्रदान कैसे सम्भव होंगे ? इन बाधाओं को दृष्टि में रखकर शैव दार्शनिक इस निर्णय पर पहुँच गये हैं कि वास्तव में इन दोनों ही ज्ञानक्षणों के बीच में इनसे इतर चेतन और स्वयंप्रकाशमान सत्ता अनुस्यूत है जिसमें सारे अनुभव, स्मृतियां, आकार और प्रकार बीज में वृक्ष के समान अवस्थित हैं। वह चेतनसत्ता स्वप्रकाश होने के कारण अपने आन्तरिक अनुसन्धान के द्वारा अनुभव और स्मृति को एकाकार बनाकर और निर्विकल्प को नामरूपादि की कल्पना के द्वारा सवि- कल्प का रूप देकर, संसार के व्यवहारों को चलाती है। २. मीमांसकवाद का पर्यालोचन—१सुखदुःखादिविशिष्ट 'मैं' प्रतीति को ही आत्मा का नाम देते हुए ये लोग वास्तव में बुद्धितत्त्व पर ही अवस्थित हैं क्योंकि सुख, दुःख और मोह अन्तःकरण की वृत्तियाँ हैं। इस विषय में यह विचारणीय है कि यदि आत्मसत्ता प्रति- १. अहंप्रतीतिप्रत्येयः सुखदुःखाद्युपाधिभिस्तिरस्कृत आत्मा—इति मन्वाना मीमांसका अपि बुद्धावेव निविष्टाः। (प्र० हृ०, सूत्र ८)