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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished519 पृष्ठ

३४ स्पन्दकारिका ज्ञान-अणिमादिकप्रप्ति स्वविषयाभोगसमयपूर्णप्रथावाप्त्याद्यनन्त क्षुद्राक्षुद्रसिद्धि लाभ या ऐश्वर्य प्राप्ति ।'— 'अनन्त क्षुद्राक्षुद्रसिद्धि लाभम् ऐश्वर्यं प्राति पूरयति यः, स शक्तिचक्रविभवप्रः स च असौ ... भवति तेन तेन रूपेण इति कृत्वा, 'तं' = शक्तिचक्रविभव प्रभवं' इति ।' इसी की पुष्टि में विभूतिस्पन्द में कहा गया है— (१) यथेच्छाभ्यर्थितो धाता ... (३।१) (२) कुतः सा स्यादहेतुका । (३।८) आदि । इस श्लोकाष्टक द्वारा इस दृष्टि को ही प्रतिपादित किया गया है । ('स्पन्द- संदोह'—आचार्य क्षेमराज) आचार्य क्षेमराज ने 'स्पन्दसन्दोह' में इस आद्य कारिका के सात अर्थ बताए हैं । इस कारिका का अर्थबोधन कराने हेतु इसकी सप्तविध व्याख्यायें प्रस्तुत की हैं । (ग) 'दिक्चरी'—दिक्ार्यस्तु भ्रान्तचक्रवत् सर्वत्र चरन्त्यः परापरसिद्धिप्रवणाः । (घ) 'भूचरी'—भूचर्यस्तु स्वस्वभावतयैव कुंकुमनारिकेलादिवत् तत्तत्पीतादिभूमि- जाताः पूर्णत्वादिनानाभेदितत्तद्देवतांशकोद्भूताः ॥ (१) 'शक्ति'—ब्राह्म्यादि देवी (कादि क्षान्त मातृका वर्ग) ब्रह्मादिकारणमाला । 'चक्र'—उनसे सम्बद्ध चक्र । 'शक्तयो ब्राह्म्यादि देव्यो (कादि क्षान्त तत्तद्वाचकात्मनः) ब्रह्मादिकारणमाला च' तासां सम्बन्धिचक्रं स्वभावशून्यपशुप्रमातुः अद्वयरूपोर्ध्वभूम्यता- रोहणक्षमो भेदमयाधस्सरणिसंचारचतुरश्च व्यूहः' तस्य यो विभवः तथाकार्यकारित्वं तस्य प्रभावं । तद्वक्ष्यति—'शब्दराशिसमुत्थस्य शक्तिवर्गस्य ... (३।१३) इत्यादि । 'बन्धयित्री ... (३।१६) तन्मात्रोदयः ... (३।१७) प्रचक्ष्महे (३।१८) इत्यन्तं च ।।' ('स्पन्दसन्दोह') आचार्य क्षेमराज ने इस प्रथम कारिका की व्याख्या को 'आदिसूत्र की व्याख्या' का अभिधान दिया है । शाङ्कर अद्वैतवाद का खण्डन—आचार्य क्षेमराज ने 'स्पन्दसंदोह' में कहा है कि इस श्लोक भाग के द्वारा कारिकाकार ने परमात्मा को 'विश्वोत्तीर्ण' एवं 'विश्वमय' दोनों सिद्ध किया है । उन्होंने वेदान्त सम्मत उस निष्क्रिय ब्रह्म का प्रतिपादन नहीं किया है जिसके विषय में कहा गया है कि—'विश्वं यन्न तदेव ब्रह्म' अर्थात् 'जो विश्व नहीं है (जो विश्वातीतर है) वही ब्रह्म है।' 'एवमनेन श्लोकभागेन ... विश्वोत्तीर्णोविश्वमयश्च उत्तमाकुलत्रिकाद्याम्नायोपदेशदिशा स्वस्वभाव एव शङ्करः इति उपपादितम न तु वेदान्तवादितवत—'विश्वं यन्न तदेव ब्रह्म'।१ 'विश्वं यन्न' में जो अभाववाद का आभास मिलता है उसका कारिकाकार ने अपनी निम्न कारिका द्वारा प्रतिषेध भी किया है— १. स्पन्दसन्दोह—क्षेमराज ।

प्रथमः निष्यन्दः ३५ 'नाभावो भाव्यतामेति न च तत्रास्त्यमूढता ।' (१।१२) और आगे इसी की पुष्टि में पुनः कहा है—'न त्वेवं स्मर्यमाणत्वं तत्तत्त्वं प्रतिपद्यते ॥' (१।१३) न तो 'विश्वातीत' ही परम तत्त्व है और न तो 'विश्वमय' ही—(१) 'नापि सिद्धान्तदृष्टिवत् विश्वोत्तीर्णमेव परं तत्त्वम् इत्येवं रूपं— 'तस्योपलब्धिः सततं त्रिपदा व्यभिचारिणी (१।१७)' इस वाक्य के द्वारा, विरुद्धत्वापत्ति के कारण, 'विश्वातीत' को 'परमपद' नहीं कह सकते । (२) 'नापि अप्रकटिताकुलस्वरूपकुलप्रक्रियाशास्त्रवत् विश्वमयमेव पूर्णरूपम् इत्येवं स्वभावम्—'। 'यदा क्षोभः प्रलीयेत् तदा स्यात्परमं पदम् । (१।९) इस कारिका के द्वारा 'विश्वमय' स्वरूप को भी 'परमपद' नहीं कह सकते अतः परमपद वह है जो-विश्वातीत एवं विश्वमय दोनों हैं ।¹ 'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ' वाक्य की अर्थ विशेषता—आचार्य क्षेमराज कहते हैं कि कारिकाकार ने समस्त शास्त्रार्थ को केवल एक वाक्य द्वारा पर्या- लोचति करके सर्वदा एवं सभी दशाओं में कारिकाकार ने 'अख्यातिवाद' का भी (इस कारिका द्वारा) खण्डन किया है क्योंकि—'न तु सा दशास्ति यत्र शिवता न स्फुरति इति उपदिष्टं भवति' अर्थात् ऐसी कोई दशा ही नहीं है जहाँ शिवत्व स्फुरित न होता हो । स्वच्छशास्त्र भी कहता है— यत्र यत्र निलीयेत् मनस्तत्रैव भावयेत् । चलित्वा यास्यति कुत्र सर्वं शिवमयं यतः ॥² कारिकाकार स्वयं कहते हैं—'न साऽवस्था न यः शिवः ।' (२।४) (२९) ॥ शिव-सूत्रकार भी इस सिद्धान्त का संसार का जागरण (Waking of the universe) जो कि शिव में पृथ्वी पर्यन्त ३६ तत्त्वों से निर्मित है, शिव की शक्तियों के कारण होता है । देवियाँ श्रीमन्मन्थानभैरव चक्रेश्वर का आलिंगन करके संसार की सृष्टि आदि क्रीड़ाओं का निष्पादन करती हैं फिर 'परमात्मा से ही सृष्टि-संहार निष्पादित होते हैं'—ऐसा क्यों कहा गया? इसी का उत्तर देने के लिए कारिकाकार ने 'शक्तिचक्रविभव प्रभवं शङ्कर स्तुमः' कहा । परमेश्वर के भीतर परमेश्वर के साथ अभिन्नतया स्थित शक्तियों का चक्र है । इसीलिए परमात्मा को अनन्त शक्तिमान कहा गया है ।³ भाव यह है सृष्टि की विधात्री इन शक्तियों का भी विधाता परमेश्वर है । इसे दिखाने के लिए ही कारिकाकार ने परमात्मा को 'शक्तिविभवप्रभव' कहा ॥ 'शक्तिचक्र'—आभासपरमार्थ विश्व । 'विभव'—परस्परसंयोजनावियोजना-वैचित्य के अनन्त प्रकार 'प्रभव' = कारण । वही भगवान् विज्ञान देहात्मक एवं स्वात्मैकात्म्यपूर्वक स्थित विश्वरूप आभासों को १-२. स्पन्दसन्दोह—क्षेमराज । ३. स्पन्दनिर्णय ।

३६ स्पन्दकारिका अनेकविध वैचित्र्यों के साथ संयुक्त एवं वियुक्त करते हुए विश्व के उदय एवं हेतु का कारण बनता है ।१ श्री भट्टकल्लट ने कहा भी है— 'विज्ञानदेहात्मकस्य शक्ति- चक्रैश्वर्यस्योत्पत्तिहेतुत्वम्' 'शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नम्' ऐसा कहकर एवं— 'न सावस्था न यः शिवः' कहकर अगम ने शिव को जगदात्मा कहा है । 'विभव' = माहात्म्य ।। 'प्रभव' = 'तत्र प्रभवतीति प्रभवं' शक्ति चक्र का विभव क्या है? 'स्वतन्त्र्य' ('पशु' जीव स्वतन्त्र नहीं परतन्त्र हैं) । 'शक्तिचक्र' = रश्मिपुञ्ज । 'विभव' = अन्तर्मुख विकास । 'प्रभवः' = विभव से होने वाला उदय या अभिव्यक्ति । (रश्मिपुञ्ज के अन्तर्मुख विकास से होने वाले उदय या अभिव्यक्ति वाले ।) अन्तर्मुखतत्स्वरूपनिभालन से परमेश्वर के स्वरूप का प्रत्यभिज्ञान अनायास होता है ।२ चिदानन्दघन आत्मा के उन्मेष-निमेषों से अर्थात् स्वरूपोन्मीलन एवं निमीलनों से ('यदन्तस्तद्बहिः' की युक्ति के अनुसार) जगत् रूप शरीर के एवं बाह्य विश्व के भी प्रलय एवं उदय (मज्जनोन्मज्जन) में उत्पन्न होने वाले शक्तिचक्र के मूल कारण । 'शक्तिचक्रविभव' = पर संवित् का स्फार ॥ आचार्य क्षेमराज प्रथम कारिका की व्याख्या करते हुए कहते हैं— 'यस्य स्वात्मनः संबंधिनो बहिर्मुखता प्रसररूपादुन्मेषाज्जगत् उदयोऽन्तर्मुखतारूपाच्च, निमेषात्प्रलयः तं विश्वसर्गादि कार्युन्मेषादिस्वरूप संविद्देवी महात्म्यस्य हेतुं शङ्करं स्तुमः ॥'३ 'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ'— इस श्लोक द्वारा कारिकाकार ने शङ्कर-स्तुति के बहाने 'समावेश' को भी संकेतित किया है— 'अत्र च शङ्करस्तुतिः समावेशरूपा' ।४ 'शक्तिचक्र के विभव से प्रभव है जिसका' (बहुव्रीहि समास) शक्ति चक्र विकास ही उस 'समावेश' का उपाय है । 'शक्तिचक्रविभवस्य'—परसंविद्देवता के स्फार के । ऐसे भक्तों के 'प्रभव' (प्रकाशक) । (तत्पुरुष स०) 'ततश्चक्रेश्वरो भवेत्, (३।१९) सूत्र इसी समावेश का संकेतक है । यहाँ 'उपायोपेयभाव' दोनों का सामरस्य है ।५ बहुव्रीहि समास करने पर 'शक्तिचक्रविभवप्रभव' का अर्थ निम्नानुसार होगा— 'जिस शङ्कर की अभिव्यक्ति शक्ति-समूह के 'विभव' (महात्म्य । यश) द्वारा होती है।' ये इन आन्तरिक शक्तियों का विकास करने से ही शांकर समावेश रूप जीवन्मुक्ति प्राप्त हो पाती है । प्रथम कारिका में शांकर-स्तवन, शांकर समावेश का प्रतीक है और यही स्पन्दशास्त्र का अंतिम लक्ष्य भी है । इस परमलक्ष्य को कारिकाकार ने अपनी प्रथम कारिका में ही प्रस्तुत कर दिया है । 'शक्तिचक्र के वैभव को उत्पन्न करने वाला है'— १-५. स्पन्दनिर्णय ।

प्रथमः निष्यन्दः ३७ यह अर्थ करने पर शङ्कर की स्वातन्त्र्य शक्ति को संकेतित करके यह द्योतित किया गया है कि मात्र शङ्कर ही ऐसे हैं जो कि अपने वैभव में 'स्वतन्त्र' है। अन्य प्राणी स्वतन्त्र नहीं प्रत्युत परतन्त्र हैं। 'स्वातन्त्र्य' परमात्मा की एक शक्ति है जिसका अर्थ है— परमुखापेक्षिता से स्वतन्त्र ॥ जिसका जागरण या जिसकी अभिव्यक्ति महाप्रकाश के आन्तरिक उद्घाटन (Un- foldment) पर आश्रित है वह है—'शक्तिचक्रविभव।' कारिका का यह भी अर्थ किया गया है— जो भक्तों के स्वस्वभाव (वास्तविक प्रकृति) को प्रकट करता है, जो कि परमशक्ति की अभिव्यक्ति का कारण है (या परा चेतना की अभिव्यक्ति का आधार है) जो अपने स्वस्वरूप को अभिव्यक्त करने या तिरोहित रखने पर भी आनन्दरूप है और जो कि विश्व की सृष्टि एवं संहार का कारण है—हम उन शङ्कर का स्तवन करते हैं। इस कारिका का यह भी अर्थ किया गया है— हम उन शङ्कर का स्तवन करते हैं जो कि जागृतादि अवस्थाओं से अभिन्न रूप वाली चेतना की शक्ति की महानता के मूल कारण हैं, जिनके जागरण या बाह्यमुखी क्रियाओं से विश्व की सृष्टि एवं जिनके सोने या अन्तर्मुखी होने से विश्व का प्रलय हो जाता है। सारांश यह कि—बहिर्मुखता प्रसार रूप 'उन्मेष' से जगत् का 'उदय' (सृष्टि) होता है और अन्तर्मुखता रूप 'निमेष' से 'प्रलय' हो जाता है। विश्वसर्गादिकार्यरूप उन्मेष के स्वरूप वाली संविद्देवी के माहात्म्य के कारण भगवान् शिव हैं। हम उनकी स्तुति करते हैं। १ स्वसम्बद्ध ध्वनियों से प्रादुर्भूत होने वाली मान्त्री शक्तियों के समूह को भी 'शक्ति- चक्र' माना जा सकता है। 'शक्तिचक्रस्य' = करणेश्वरी चक्र का। करणशक्ति वर्ग का ॥ 'यो विभवो' = जो विचित्र सृष्टि संहारादिकारित्व । 'तस्य प्रभवं' = उसका क्रमार्थावभासनकारित्व कृत- मक्रम महाप्रकाशमय । कहा भी गया है—'सहान्तरेण चक्रेण प्रवृत्तिस्थितिसंहतीः ॥ लभते ... (१।६) यहाँ 'चक्र' का अर्थ है—आन्तर चक्र। अन्तःकरण त्रय का करण वर्ग में परिगणिन भी किया गया है। करणवर्ग की प्रवृत्ति धर्मा है। करणेश्वरी चक्र सृष्टि आदि कार्यों में प्रवृत्त रहती है। 'शक्तिचक्र' = मन्त्रगण में मुद्रासमूह। तस्य 'विभव' = त्रिविध सिद्धि साधन समर्थत्व । तस्य 'प्रभवम्' = प्रभवोपलक्षित उत्पत्तिविश्रान्तिस्थान । कहा भी गया है— 'तदाक्रम्य बलं मन्त्राः ... । (२।१) ... निरञ्जनाः (२।१) त्रिविध = 'पर'—'अपर'— 'परापर' ॥ त्रिधा सिद्धि ॥२ १. स्पन्दनिर्णय। २. स्पन्दसन्दोह।

३८ स्पन्दकारिका भट्टकल्लट ने ‘स्पन्दकारिकावृत्ति’ (स्पन्दसर्वस्व) में इस संपूर्ण कारिका की व्याख्या इस प्रकार की है— ‘अनेन स्वस्वभावस्यैव शिवात्मकस्य संकल्पमात्रेण जगदुत्पत्तिसंहारयोः कारणत्वं, विज्ञानदेहात्मकस्य शक्तिचक्रैश्वर्यस्योत्पत्तिहेतुत्वं नमस्कारेण प्रतिपाद्यते ।।'¹ भट्टकल्लट स्पन्दशास्त्र में ‘ईश्वरसंकल्पसृष्टिवाद’ का प्रतिपादन करते हैं ।² वे कहते हैं कि इस कारिका में दो बातें प्रमुख रूप से कही गई हैं ।³ (क) स्वस्वभाव शिव के ‘शिवात्मक संकल्प’ से ही जगत् की उत्पत्ति हुई है ।⁴ अतः शिव को जगत् की उत्पत्ति संहार का कारण सिद्ध किया गया है ।⁵ (ख) विज्ञानदेहात्मक (विमर्शात्मक स्फुरणा) शक्ति चक्र के ऐश्वर्य (अनन्तरूपों में प्रवहमान होने एवं एक ही साथ भेदशून्य सामान्य भूमिका में विश्रान्त भी रहने की एक साथ दो) भूमिकायें निभाने के स्वातन्त्र्य चमत्कार के भी वे मूलोद्गम शङ्कर ही हैं ।⁶ ‘तं शङ्करं’—(श्रेयसःकर्तारं) श्रेयसम्पाक । ‘स्तुमः’ (प्रशंसामः)—प्रशंसा करता हूँ । जगतो = (विश्वस्य)—संसार के । ‘यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां’—(शक्तिप्रसरप्रलयाभ्यां) शक्ति के प्रसार एवं शक्ति के संकोच ।। ‘प्रलयोद्भवौ’ = विनाश एवं प्रादुर्भाव ।। ‘शक्तिचक्रविभवप्रभवं’—वक्ष्यमाणस्वरूप वाली शक्तियों के चक्र = समूह ।। ‘विभव’—ऐश्वर्य । ‘प्रभवं’—कारण । प्रश्न—शङ्कर भगवान् तो नित्य, अव्यभिचारी रूप से एकस्वभाव, अद्वैत (‘एक एव’) पदार्थ हैं फिर उनके साथ परस्परविरुद्ध अनित्य, निमेषोन्मेषात्मक अवस्थाओं का संबन्ध कैसे प्रतिपादित किया गया ? ‘शङ्कर उन्मिषित भी होते हैं और निमिषित भी’ यह कैसे संभव है? यदि कर्तृत्वप्रथा के कारण ऐसा कहा गया तो नित्यात्मक भगवान् के साथ अनित्यावस्था- योगित्व कैसा ? कैसे कहा गया ?—‘यस्योन्मेषनिमेषाभ्याम्’ ? यह क्यों कहा गया ? उत्तर—इस संदर्भ में प्रयुक्त ये ‘उन्मेष-निमेष’ शब्द उपचारित वृत्ति द्वारा शङ्कर की इच्छामात्र के बोधक हैं । यह तो उनका नित्यधर्म या स्वभाव है—‘स च तस्य नित्योधर्मः स्वभावभूतः ।।' उन्मेषनिमेषशब्दवाच्यत्व उपचार की दृष्टि से संगत है । यह जगत् परमेश्वर की मायाशक्ति के द्वारा उद्भावित एक कार्य है और इसलिए इसका प्रादुर्भाव एवं प्रलय दोनों होने से यह अनित्य है । ‘उन्मेषोन्मेष’—ये दोनों ईश्वरेच्छामात्रनिमित्तक हैं । जो उदयात्मक उन्मेष है और जो प्रलयात्मक निमेष है ये दोनों ही ईश्वरेच्छामात्र है—‘उदयात्मकोन्मेषहेतुत्वात् ईश्वरेच्छैव उन्मेषशब्देन, प्रलयात्मकनिमेषहेतुत्वात् निमेषशब्देन च उपचर्यते ।।' १-६. स्पन्दकारिकावृत्ति (भट्टकल्लट) ।

प्रथमः निष्यन्दः ३९ वह शङ्कर की अव्यतिरिक्ता शक्ति है—'सा च अव्यतिरिक्ता शङ्करस्य शक्तिः।' इस शक्ति का ज्ञान ही आत्मा के ऐश्वर्य एवं प्रत्यभिज्ञा की सिद्धि का उपाय है। यहाँ पर सांसारिक पुरुषों में आविर्भूत इच्छा के साथ सादृश्य दिखाने हेतु 'इच्छा' शब्द का प्रयोग किया जा रहा है जिस प्रकार पुरुष की अपनी इच्छावस्था में इष्यमाण पदार्थ अपने स्वरूप में पुरुष के साथ अव्यतिरिक्त रूप से स्थित रहता है। इसी प्रकार 'शक्ति' भगवान् की 'इच्छा' के रूप में उसमें अभिन्न रूप से स्थित रहती है। भगवान् के भीतर स्थित जो इच्छारूपकात्मक शक्ति है उसी के भीतर अनन्तावभासात्मक जगत् स्वरूपतः अव्यतिरिक्त रूप से स्थित रहता है 'भगवतः शक्तौ अनन्तावभासविशेषचित्रं जगत् ... स्वरूपात् अव्यतिरेकेणैव अवतिष्ठते।' वह यह शक्ति पारमार्थिकी 'शिवदशा' है। उसी की विद्वानों द्वारा इस प्रकार स्तुति की गई है— 'सदा सृष्टिविनोदाय सदा स्थितिसुखासने। सदा त्रिभुवनाहारतृप्ताय स्वामिने नमः॥' 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' में भी कहा गया है— 'या चैषा प्रतिभा तत्तत्पदार्थक्रमरूपिता। अक्रमानन्तचिद्रूपः प्रमाता स महेश्वरः॥' इस प्रकार एक ही अद्वैत पारमेश्वरी पराशक्ति के इच्छा-ज्ञान एवं क्रिया विभिन्न व्यपदेश हैं और माया शक्ति के द्वारा 'इदन्ता' के रूप में आविर्भूत होते हैं इसी माया शक्ति के द्वारा परमार्थस्वरूप एक ही शिवतत्त्व में सदाशिवादि तत्त्वान्तर का प्रक्रिया-शास्त्र में व्यपदेश किया गया है। इस प्रकार के लक्षणों वाली पारमेश्वरी शक्ति अपनी लीला से उल्लसित जगत् के अवस्थाद्वय के कारण स्वयं भी दो स्वरूपों वाली कही जाती है। अतः इस कारिका के प्रथमार्द्ध का अर्थ निम्नानुसार है— 'जिसकी इच्छा मात्र से जगत् की सृष्टि एवं प्रलय हुआ करते हैं—मैं उसका स्तवन करता हूँ।' ('यस्य इच्छामात्रेण जगतः प्रलयोदयौ तं स्तुमः ।) उन्मेष—उदय। निमेष—प्रलय। उन्मेष-निमेष दो नहीं हैं एक ही है और इस रूप में वह इच्छामात्र है। 'इच्छामात्रौ उन्मेषनिमेषौ'। भट्टकल्लट ने भी 'संकल्पमात्रेण ...' कहकर इसी तथ्य का प्रतिपादन किया है। इस कारिका द्वारा शङ्कर के पारमार्थिक धर्म के रूप में उन्मेष एवं निमेष को प्रतिपादित किया गया है। नित्य, अव्यभिचारी एक स्वभाव भगवान् शङ्कर के समान ही शक्ति को भी उसी स्वरूप का स्वीकार किया गया है क्योंकि दोनों में अभेद है। शिव की ऐश्वर्यमयता का प्रतिपादन— 'चक्रविभवं' द्वारा ईश्वर के निरतिशय ऐश्वर्य को सूचित किया गया है। भले ही जगत् शङ्कर एवं शक्ति से भिन्न प्रतीत हो किन्तु है उससे अभिन्न ही— 'परमेश्वरता जयत्यपूर्वा तव सर्वेश यदीशितव्यशून्या। अपरापि तथैव ते ययेदं जगदाभाति यथा तथा न भाति॥'

४० स्पन्दकारिका अन्यत्र भी कहा गया है— 'लिखते जगतित्रतयचित्रमद्भुत प्रतिभापरिस्फुरितशंंसिते नमः । सुसितैकसूक्ष्मनिजशक्तिवर्तिका, रचितावभासशतशोभि शंभवे ॥' 'शक्तीनां चक्रम्' = वह परमेश्वर से स्वरूप में अभिन्न 'शक्ति'—'इदम्' के परामर्शभेद से उत्पन्न नाना नाम रूप भेदों से अवभासमाना होने पर ही है तो एक, किन्तु बहुत्व में व्यक्त होने के कारण बहुरूपात्मिका होने से 'शक्तीनां चक्रम्' कही गई है । 'शक्ति' शब्द भावाभिव्यक्ति के समय परमेश्वर से भिन्न दिखाई पड़ती हुई भी उनसे अभिन्न है—यही अभेदाभाव प्रतिपादन ग्रन्थकार का प्रयोजन है । यही ईश्वर का विभव है और उसी से ईश्वर वैभवशील कहलाता है । पारमेश्वर में भी कहा गया है— 'शक्तिश्च शक्तिमांश्चैव पदार्थद्वयमुच्यते । शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं शक्तिमांश्च महेश्वरः ॥' 'विभवप्रभव'—इस प्रकार स्वशक्ति भूतविभव का 'प्रभव' (उत्पत्ति का कारण), न कि स्वरूप व्यतिरिक्त एवं अन्य स्थल से प्राप्त वैभव का प्रभव । 'यस्य'—जिस जगत्कारण रूप शङ्कर का । शङ्कर का—स्वशक्तिचक्रात्मक ऐश्वर्यभूत जगत् का प्रभव ॥ उन्मेष एवं निमेष का कार्य क्या है? उद्भव एवं विनाश— 'उन्मेषे क्रियाशक्ति प्रतिसंहारात् स्वरूपविकासे जगतः प्रलयो विनाशः, निमेषे प्रसृतक्रियाशक्तित्वात् स्वरूप संकोचरूपे जगतः उदय उद्भवः ।' शक्तिचक्र का ऐश्वर्य—शक्तियों के समूह की विभूतियाँ— 'विज्ञानदेहात्मकस्य शक्तिचक्रैश्वर्यस्य । उत्पत्तिहेतुत्वम्' 'विज्ञानदेहो' = विशुद्ध संविन्मात्रमूर्ति महेश्वर । 'विज्ञानदेहात्मक' = विशुद्धसंविन्मात्र वह महेश्वर जिसका स्वस्वभाव आत्मा हो वहः ॥ 'आत्मा' = स्वभाव ॥ विज्ञानदेह महेश्वर केवल आत्मा ही है अन्य नहीं है । 'स च आत्मैव नान्यः ।' 'यस्य' = जिसके । किसके ? विज्ञानदेहात्मकस्य शक्तिचक्रैश्वर्यस्य'—के स्वभाव वाले शङ्कर के । ('यस्य' शब्द इसी भाव का द्योतक है) क्योंकि इन पचासों कारिकाओं में प्रपंचित अर्थ की पर्यालोचना से यही शिव- स्वभाव द्योतित होता है । वृत्तिकार ने भी यही कहा है—'अनेन स्वस्वभावस्यैव शिवात्मकस्य' । 'स्वस्य'= आत्मा का । 'स्व' = आत्मीयभाव यथा स्वरूप अर्थात् स्वस्वभाव । प्रथम श्लोक का यही तात्पर्यार्थ है 'परमेश्वरः इच्छामात्रेण जगतः प्रलयोदयौ विदधाति, लब्धस्थितिकमपि जगत् तच्छक्तिविभूतिरेकैव मायावशात् तु नानात्वेन अवभासते ॥'

प्रथमः निष्यन्दः ४१ इस प्रकरण में ये ही दो अर्थ उपबृंहित किए गए हैं—'इदमेव अर्थद्वयम् अत्र प्रकरणे विस्तार्यते ॥' (१) माया के वशीभूत होकर स्वरूपप्रत्यवमर्श के अनुल्लास के कारण, वेद्य पदार्थ (देहादि) के साथ अव्यतिरेक (एकात्मता) के साथ प्रतिभासमान आत्मा का व्यतिरेक प्रदर्शित किया गया है । (२) 'वेद्य' (जगत्) की 'वेदक' के साथ तात्विक स्वभाव के कारण शक्तिभाव की दृष्टि से अपृथकता (अव्यतिरिक्तत्व) सिद्ध होती है । —इन्हीं दोनों अर्थों को प्रथम श्लोक में विस्तारित किया गया है—इसके द्वारा चतुर्निष्यन्द स्पन्दसिद्धान्त इस श्लोक द्वारा आसूत्रित हुआ है । उपाय एवं उपेय—इस दर्शन में उपाय-उपेय क्या है? (१) उपाय 'श्रेयःशास्त्ररूपं' (२) उपेय—'आत्मैश्वर्यप्रत्यभिज्ञारूपं'—इन 'उपाय' एवं 'उपेय' क द्योतक 'शं' (शम्) है और इसी 'श' के कर्ता ही हैं—'शङ्कर' (तस्य कर्ता शङ्करः ... इयं संज्ञा परमेश्वरस्य) 'शङ्कर'—परमेश्वर ॥ अतः इस स्पन्दशास्त्र के श्रेय के साक्षात् कर्ता परमेश्वर ही हैं—। इस प्रकार ईश्वर एवं शास्त्र में कर्ता एवं कार्य का सम्बन्ध है—यही 'स्तुमः' शब्द द्योतित करता है । 'स्तुमः' कहकर जो स्तुति की गई है उसका प्रयोजन या अर्थ क्या है? 'उपादेय-वस्तु स्वरूप प्रतिपादनमेव स्तुत्यर्थः ।'— उपादेय-वस्तुस्वरूप की प्रतिपादन ॥ अतः शास्त्राभिधेय प्रतिपाद्य एवं प्रतिपादक भाव ही सम्बन्ध है । प्रयोजन क्या है ? आत्मैश्वर्य प्रत्यभिज्ञात्मक शङ्कर पदः 'प्रयोजनं च आत्मैश्वर्य प्रत्यभिज्ञात्मकं शङ्करपदादेव अवसीयते ॥' दूसरे के श्रेय के संपादक भी ईश्वर ही हैं—अतः इसमें अभिधेय-प्रयोजन दोनों में उपायोपेयभावलक्षण सम्बन्ध है । इस प्रकार तीन प्रकार के सम्बन्ध हैं । इस शास्त्र का नाम है 'स्पन्द' 'अभिधानमस्य शास्त्रस्य स्पन्द' इति (१ नि० २१ का० २ पा०) ॥ स्पन्दतत्त्व—'स्पन्द' शब्द स्वस्वभाव परमर्शमात्र, नित्य, शून्यताव्यतिरेचनकारण- भूत, उतनी ही मात्रा में संरभात्मा एवं 'शक्ति' नामक अन्य नाम वाले पारमेश्वर धर्म के किंचित् स्पन्दनात्मक होने के कारण उसे 'स्पन्द' कहा गया है (किंचिच्चलनात् स्पन्द इति') । इस प्रतिपाद्य 'स्पन्दतत्त्व' का प्रतिपादन करने के करण इस शास्त्र को भी 'स्पन्द' शब्द से पुकारा गया ('तत्प्रतिपादनहेतुत्वात् शास्त्रमपि इदं स्पन्दशब्देन अभिधीयते ।') इस शास्त्र का 'अधिकारी' कौन है?—'विषय' (अधिकारी) ॥ अन्य शास्त्रों में तो विवक्षित या प्रतिपाद्य तत्त्व को विषय कहते हैं किन्तु यहाँ पर 'विषय' का अर्थ है 'अधिकारी' ॥ (१) विशुद्ध श्रद्धा-भक्ति-प्रकर्ष (२) परमेश्वर पर शक्तिपात प्रोन्मील्यमान- स्वभावालोक वाला (३) तिरस्कृतसकल संदेहांधकार वाला होने के कारण प्रबुद्ध (४)

४२ स्पन्दकारिका सम्यगुपनत दीक्षादिसंस्कारवान् (५) गुरुवचन चोदनमात्रावशेष (६) स्वात्मैश्वर्योपलब्धि के लक्ष्य वाला—व्यक्ति ही इस शास्त्र का अधिकारी ('विषय') है ।१ 'तन्त्रालोक' में कहा गया है कि 'स्पन्द' का विलास ही जगत् है । अनन्त स्पन्दों की तरंगों से ही विश्व निर्मित है । 'काल प्राण में, प्राण स्पन्द में एवं स्पन्द शून्य में एवं शून्य चिति में प्रतिष्ठित है—समस्त षडध्वचक्रचिन्मात्र में प्रतिष्ठित है ।२ 'शून्य' 'स्पन्द' एवं 'प्राण' में निखिल विस्तार स्थित है— 'स स्पन्दे खे स तच्चित्यां तेनास्यां विश्वनिष्ठितः ॥'३ यथा— वातग्निसंपर्कादयः पिण्डोऽग्निवद्भवेत् । दाहपाकप्रकाशादौ शक्तस्तद्वयं गणः ॥'४ भला यह सोचिए कि जो दूसरों को चैतन्य बनाने में समर्थ है वह निःस्वभाव कैसे हो सकता है ? इसका अभिप्राय यह है कि सभी चेष्टायें ज्ञानपूर्वक हैं । ज्ञानहीन शरीर मृत्तिका का खण्ड मात्र रह जाता है । निश्चय ही चैतन्य जड़वर्ग का अधिष्ठाता एवं धारक है । अन्यथा पत्थर का टुकड़ा आकाश में स्थिर क्यों नहीं हो जाता ? अतः उद्योग एवं श्रद्धा दोनों के द्वारा इस तत्त्व का परीक्षण एवं समीक्षण करना आवश्यक है— 'स्वदेहसाक्षिकं चैतत् सर्वस्य ज्ञानचेष्टितम् । ज्ञानानधिष्ठितः कायो लुठत्येव यतो धृतः ॥ अतएव जडानामप्यधिष्ठातृकृता धृतिः । गम्यते गमने ग्रावा न धायेताऽन्यथा कथम् ॥'५ इस सिद्ध पुरुष की वाणी पर भी विचार कीजिए—'ब्रह्म नेत्र के समान ही अदृश्य है और नेत्र के समान ही द्रष्टा है अपने आप में ही इसकी उपलब्धि है यह घटादिक के समान दृश्य नहीं है— 'अदृश्यं नेत्रवद् ब्रह्म द्रष्टृत्वं चास्ति नेत्रवत् । स्वात्मन्येवोपलम्भोऽस्य दर्शनं घटवन्न तु ॥'६ इसकी स्थिति अकृत्रिम एवं स्वतन्त्र है । जैसे यह देहस्थ करणवर्ग को चैतन्य बनाने में स्वतन्त्र है वैसे ही संपूर्ण लोक-लोकोत्तर और दृश्य वर्ग को भी चेतन बनाने में समर्थ है ।७ 'स्पन्दतत्त्व'—क्षेमराज 'स्पन्दनिर्णय' में कहते हैं कि—वह संवित् तत्त्व स्पन्द- शक्तिगर्भिकृत, अनन्त सर्गसंहारैकघन एवं अहन्ताचमत्कारानन्दरूपा है— 'सा चैष स्पन्दशक्तिगर्भकृतानन्तसर्गसंहारैकघनाहन्ताचमत्कारानन्दरूपा ॥' स्पन्दशास्त्र में परमशिव की स्वभावभूत 'स्वातन्त्र्य शक्ति' का अभिधान ही 'स्पन्द' है । १. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकाविवृति' । २. तन्त्रालोक : विवेक । ३. अभिनवसुखपाद—'श्रीतन्त्रालोक' । ४-७. उत्पलदेवाचार्य—'स्पन्दप्रदीपिका' ।

प्रथमः निष्यन्दः ४३ (१) अभिनवगुप्तपादाचार्य ‘परात्रिंशिका विवृति’ में कहते हैं- संवित्सत्तत्त्वं ‘स्पन्द’ इत्युपदिशन्ति । स्पन्दनं च किञ्चिच्चलनं स्वरूपाच्च यदि वस्त्वन्तराक्रमणं तच्चलनमेव न किञ्चित्त्वं, नो चेत् चलनमेव न किञ्चित्, तस्मात् स्वरूप एवं क्रमादिपरिहारेण चमत्कारात्मिका-उच्छलता ऊर्मिरिति मत्स्योदरीति प्रभृतिशब्दै- रागमेषु निदर्शितः ‘स्पन्द’ इत्युच्यते-किञ्चिच्चलनात्मकत्वात् स च शिवशक्तिरूपः सामान्यविशेषात्मा ।। (पृ० २०८ : परात्रिं० वि०)। (२) अभिनवगुप्तपादाचार्य- 'तन्त्रालोक' (द्वि० भाग प्र० आ०) में कहते हैं- जो इदमात्मक विमर्श है यही 'विशेष' नामक 'स्पन्द' है और इसे ही 'औन्मुख्य' भी कहते हैं- ततः स्वातन्त्र्यनिर्मेये विचित्रार्थक्रियाकृति । विमर्शनं विशेषाख्यः स्पन्द औन्मुख्यसंज्ञितः ।। (८१) यह इदमात्मक विशेष विमर्श जिसे 'स्पन्द' और 'औन्मुख्य' संज्ञाओं से विभूषित किया गया है वस्तुतः यह विच्छिन्न विमर्श है । इदमात्मक विश्रान्ति की इस भूमि पर उल्लसित अहमात्मक परामर्श में अन्तर्लक्ष्य योगी ही विश्राम करता है- ‘ततः समनन्तरोक्ताद्वैतोः स्वातन्त्र्योत्थापिते तत्तदर्थक्रियाकारिणि भावजाते यदिद- मिति विमर्शनं स विशेषाख्य स्पन्द... औन्मुख्यसंज्ञितः' । १ इस पुरुष के स्वरूप (स्वभाव) को आच्छादित करने के लिए ये शब्दरूप शक्तियाँ सर्वदा उद्यत रहती हैं अर्थात् क्रियाशक्ति के द्वारा ये पुरुषरूप को सदैव आच्छादित करना चाहती रहती है क्योंकि बिना शब्दानुवेध के (अर्थात् बना वर्णानुगम के) किसी ज्ञान संवेदनरूप प्रत्यय का उदय नहीं हो सकता । वस्तुतः ये शब्द ही एक ही तत्त्व को वाच्य-वाचक विभाग से दो रूपों में बाँटकर प्रकट करते हैं । 'वाक्यपदीय' में ठीक ही कहा गया है-'ऐसा कोई प्रत्यय नहीं होता जिसमें शब्द का अनुगम न हो । सभी ज्ञान शब्दानुविद्ध देखे जाते हैं ।' 'न सोऽस्ति प्रत्ययो लोके यः शब्दानुगमादृते । अनुविद्धमिव ज्ञानं सर्वशब्देन दृश्यते ॥' इस विश्व-व्यवहार का कारण 'वाक्' ही है । अन्यत्र भी कहा गया है—हे देव! चित् की उन्मुखता में सर्वदा बोध ही वाग् रूप होता है । वस्तुतः वही प्रत्यवमर्शिनी शक्ति है उसके बिना प्रकाश भी प्रकाशित नहीं हो सकता । २ विशेष ध्यातव्य-यद्यपि प्राथमिक सूत्रों में 'स्पन्द' शब्द का प्रयोग तो नहीं किया गया है तथापि 'स्पन्दकारिका' 'स्पन्दशास्त्र' एवं 'स्पन्दसूत्र' में 'स्पन्द' शब्द व्यवहृत हुआ है—अतः उस पर भी यत्किंचित विचार कर लेना आवश्यक है । 'रामकण्ठाचार्य' ने १. तन्त्रालोक (अभिनवगुप्त) 'विवेक'। २. उत्पलदेव—स्पन्दप्रदीपिका ।

'स्पन्दकारिकावृत्ति' 'ओं नमः स्वस्पन्दात्मसंविन्मूर्तये शंभवे' तथा— 'परंशाक्तं तत्त्वं जगति जयति स्पन्द इति तत्' इन मांगलिक स्तुतियों के द्वारा, भट्टकल्लट ने 'स्पन्द- कारिकावृत्ति' (स्पन्दसर्वस्व) का 'श्रीस्पन्दवपुषे नमः' द्वारा तथा 'स्पन्दप्रदीपिका' में उत्पलवैष्णव ने— 'यत् परापरभूस्पर्शि यत्संकल्पाल्लयोदयौ । स्पन्दसंज्ञं ज्ञरूपं तच्छक्तीशं स्वफलं नुमः ॥' द्वारा 'स्पन्दतत्त्व' की स्तुति की है । अतः 'स्पन्दतत्त्व' विवेच्य है— स्पन्दतत्त्व— 'पराप्रावेशिका' में 'स्पन्द' को 'चित्' 'चैतन्य' 'स्वरसोदिता परावाक्' 'स्वातन्त्र्य' 'कर्तृत्व' 'स्फुरत्ता' का पर्याय माना है— (१) पराप्रावेशिका— 'एष एव च विमर्शः चैतन्यं, स्वरसोदिता परावाक्, स्वातन्त्र्यं, कर्तृत्वं 'स्फुरत्ता' स्पन्दः इत्यादि शब्दैरागमेशूद्घोष्यते ॥'— इसे 'विमर्श' का भी वाचक कहा गया है । (२) 'स्पन्दनिर्णय'— क्षेमराज श्री भगवान् की 'स्वातन्त्र्यशक्ति' को ही इसलिए 'स्पन्द' कह रहे हैं क्योंकि यह स्वातन्त्र्य शक्ति— 'किञ्चिच्चलतात्मक' है— 'श्री भगवतः स्वातन्त्र्यशक्तिः किञ्चिच्चलतात्मक धात्वर्था- नुगमात्स्पन्द इत्यभिहिता ।' 'स्पन्द' अचल एवं प्रशान्त परमेश्वर के भीतर शाश्वत एवं अभिन्न समरसभाव से रहने वाली एक चंचलता जैसी कोई उमंग है । इसे परमेश्वर के प्रकाशरूप की विमर्श- रूपता भी कहा गया है— 'स्पन्द' कोई 'क्षोभ' नहीं है । परमेश्वर की स्पन्दरूपात्मिका जो उमंग है वह उसकी अपनी ही परमेश्वरता के विलास का बोध (प्रत्यवमर्श) है— 'तन्त्रालोक' में कहा गया है— किञ्चिच्चलनमेतावदनन्य स्फुरणं हि यत् । ऊर्मिरिषा विबोधाब्धेर्न संविदनया विना ॥ (३) तन्त्रालोक (विवेक) में कहा गया है कि— किञ्चित् चलन ही स्पन्द है । अपनी ही परमेश्वरता के विलास का जो प्रत्यवमर्श (बोध) है वह प्रत्यवमर्श (अहन्ता-परामर्श) ही उसका आनन्द भी है । परमशिव स्वात्मानन्द में विभोर रहकर आनन्दातिशय से स्पन्दमान (छलकता हुआ) रहता है और उसका आनन्दस्पन्दन ही 'विश्व' बन जाता है । विवेक में कहा गया है— 'किञ्चिच्चलनं हि नामैतदुच्यते । यदबोधस्यानन्यापेक्षं स्फुरणं प्रकाशनम् । परतो- ऽस्य न प्रकाशः अपितु स्वप्रकाश एवेत्यर्थः ॥ 'उन्मेषनिमेष'— अनुत्तर तत्त्व की सिसृक्षोन्मुख वह गतिमयता है जो कि अहं प्रत्यवमर्श रूप संकल्प से आकारित है । शक्ति तो सदा गतिमय एवं स्पन्दात्मिका है अतः उसका उदय या अस्तमन, संकोच या विकास कभी होता ही नहीं । क्रिया द्विमुखी

प्रथमः निष्यन्दः ४५ है—(१) अन्तरोन्मुखी (२) बाह्योन्मुखी। समस्त क्रिया संकल्पमूलक है। 'शङ्कर' अनु- त्तर तत्त्व है शक्ति उसका सार या हृदय है—'सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ॥'१ 'स्पन्दशक्ति' उछलनात्मक है—'स्वात्मन्युच्छलनात्मकः'२ स्पन्द एक साथ ही स्वरूप का विकास एवं संकोच दोनों कर सकती है। यहाँ 'उन्मेषनिमेष' संकल्पात्मक गतिमयता मात्र का बोधक है। यह संकल्पात्मक गतिमयता ही शैव दर्शन में 'इच्छाशक्ति' है। 'इच्छा शक्ति' शिव (शङ्कर) का स्वभाव है—नित्य धर्म है। संकल्प या इच्छाशक्ति को ही यहाँ 'उन्मेष-निमेष कहा गया है। 'उन्मेष' या 'निमेष' दोनों संकल्प मात्र के ही द्योतक हैं। 'उन्मेष' = यह वह अवस्था है जब कि पारमात्मिक संकल्प में विश्वोत्तीर्ण रूप (विशुद्ध चिन्मात्र स्वरूप) में अवस्थान की ओर उन्मुखता होती है। इस अवस्था में— विशुद्ध चिन्मयी रूप में रहने की ओर उन्मुखता होती है। इस समय समस्त 'इदं मम' (या प्रमेय मात्र) अहं रूप (विशुद्ध चिन्मात्र प्रमाता) में लीन रहता है। यही है पारमेश्वरानुग्रह या 'शक्तिपात' है। 'निमेष' उस अवस्था का द्योतक है जब कि परमात्मा के संकल्प में (स्वरूप को अनन्त भेद संकलित वैचित्र्यों में प्रसारित करने हेतु सिसृक्षा की उन्मुखता होती है। इस अवस्था में चिन्मात्र प्रमाता, अभिन्न प्रमेयता, माया शक्ति के कारण पृथक् विकास पा लेती है यही है 'तिरोधान'। पारमात्मिकी संकल्प इन्हीं दो रूपों में व्यक्त होता है। वे हैं— (१) अन्तर्मुखस्पन्द एवं (२) बहिर्मुखस्पन्द। 'उन्मेषनिमेष शब्दाभ्यां तदुपचरितवृत्तिभ्याम् इच्छामात्रमेकं शङ्करसम्बंधिप्रति- पाद्यते। स च तस्य नित्यो धर्मः स्वभावभूतः तस्य उन्मेषनिमेषशब्दवाच्यत्वं द्वित्वं च उपचारात् ॥'३ पारमेश्वर संकल्प—(१) 'अंतर्मुखस्पन्द' (२) 'बहिर्मुखस्पन्द'। 'स्पंदशक्ति' की यह उभयोन्मुख गति युगपद चलती रहती है शिव एवं शक्ति की स्वतन्त्र इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया या स्वतन्त्र ज्ञातृत्व, स्वतन्त्र कर्तृत्व में (उन्मेष-निमेष दोनों स्थितियों में) कोई अन्तर, परिवर्तन नहीं आता। जगत् का आविर्भाव (सृष्टि) एवं प्रलय केवल जगत् का होता है न कि संवित् का। उन्मेषावस्था में स्वरूपातिरिक्त अन्य किसी भी प्रकार के प्रमेयजाल का अस्तित्व नहीं रहता। यह जगत् की प्रलयावस्था है यह स्वस्वरूप में लय की अवस्था है। निमेषावस्था में प्रमेयता का स्वरूप से पृथक् अस्तित्व न होने के कारण जगत् का आविर्भाव होता है। दोनों रूपों में परिवर्तन, परिणमन केवल जगत् का होता है। 'संवित्' का नहीं। संवित् सदा अक्षुण्ण रहती है। १. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (१.५.१४) २. तन्त्रालोक। ३. स्पन्द वि०, पृ० ४।

४६ स्पन्दकारिका परमात्मा की वास्तविक शक्ति एक ही है और उसका नाम है—'स्वातन्त्र्य शक्ति'। स्वातन्त्र्यशक्ति शाश्वत रूप में स्पन्दशीला है अतः उसका अन्तर्मुखी विकास (क्रिया) एवं बाह्यमुखी विकास (क्रिया) एक साथ चलता है । स्प० वि० (पृष्ठ ४) में कहा गया है— (१) 'उन्मेषनिमेषशब्दाभ्यां तदुपचरितवृत्तिभ्याम् इच्छामात्रमेकशङ्करसम्बन्धि प्रति- पाद्यते ॥ ('उन्मेष निमेष' = 'शांकरी इच्छा') ॥ (२) 'स च तस्य नित्यो धर्मः स्वभावभूतः' (३) तस्य उन्मेष-निमेषशब्दवाच्यत्वं द्वित्वं च उपचारात् ॥' 'शक्तिचक्रविभवप्रभवं'—शक्तिसमूह के ऐश्वर्यों को जन्म देने वाला ॥ इस पदावली की व्याख्या दो प्रकार से की जा सकती है— (क) (तत्पुरुष समासगत व्याख्या) = 'शक्तिचक्रविभवस्य प्रभवम्' । (त० समास) ॥ 'शक्तिचक्र' = अनन्त शक्ति धाराओं की समष्टि । अनन्त प्रवहमान स्पन्द धाराओं का समूह । 'विभव' = अन्तर्मुखी एवं बहिर्मुखी शक्ति-प्रवाह । 'प्रभव' = मूलोद्गम । अर्थात् शङ्कर । (ख) (बहुव्रीहिसमासगत व्याख्या)—(बहुव्रीहि समास) 'शक्तिचक्र' = प्राण, बुद्धि, इन्द्रियाँ आदि विशेष रूपों में प्रवाहित शक्तिपुञ्ज । 'विभवात्' = यथार्थ अनुभूति प्राप्त करने के परिणामस्वरूप । 'प्रभवः' = जिस शङ्कर की अभिव्यक्ति होती है । 'माहेश्वरी', 'ब्राह्मणी', 'कौमारी', 'ऐन्द्री', 'याम्या', 'चामुण्डा', 'योगेशी' 'खेचरी', 'भूचरी', 'दिक्धरी', 'गोचरी' आदि शक्तियों का समूह ही 'शक्तिचक्र' है । 'शक्ति' क्या है? 'शक्तनं शक्तिः'—'सामर्थ्यं विश्वनिर्माणादिकारि भैरवस्वरूप- मेव' ॥१ अपनी ही शक्ति के यथार्थस्वरूप की अनुभूति व्यक्ति को जीव से शिव बना देता है । शक्तिभूमिका पर आरोहण शिवभाव में प्रवेश का पर्याय है । 'शक्ति' शिवमुख है— 'शक्त्यवस्थाप्रविष्टस्य निर्भागेन भावना । तदासौ शिवरूपी स्यात् शैवीमुखमिहोच्यते ॥'२ एकत्व एवं अनेकत्व में सामञ्जस्य कैसे संभव है?—परमात्मा शिव प्रत्येक प्राणी के कलेवर में प्रवेश करके, ऐन्द्रिय शक्तियों के उन्मेष-निमेष द्वारा, पंचमहाविषयों को ग्रहण करने या ग्रहण न करने के द्वारा, प्राणियों के अदृष्टानुसार निश्चित देश, काल एवं रूप की परिधि में सृष्टि-संहार का निष्पादन करता है । १-२. विज्ञानभैरव ।

प्रथमः निष्यन्दः ४७ जो संविद्रूपा सामान्य स्पन्द है वह समस्त प्रमेयों की समष्टि रूप विश्व के पदार्थ में प्रवहमान है । संसार अनेकत्व एवं शिव के एकत्व परस्पर विरोधी तत्त्व हैं फिर अनेकत्व (विश्व) का एकत्व (शिव) के साथ सामञ्जस्य या अद्वैत अभेद कैसा? (१) शिव का स्वभाव = एकत्व । = ‘प्रमाता’ (२) प्रमेय रूप जगत् का स्वभाव—अनेकत्व = ‘प्रमेय’ यह प्रमेयगत अनेकाकारता, अहं विमर्श की एकाकारता में अनादिकाल से अभि- न्नतया अन्तर्निहित है । चूँकि विमर्शगत वस्तु का ही बाह्यावभासन संभव हो पाता है— अतः अनेकाकारता का बाह्यावभासन तो हो जाता है किन्तु किसी नव्य वस्तु का प्रादुर्भाव नहीं होता ॥ भासमान अनेकता में भी एकत्व रूप परमात्मा तो एक ही है— ‘स्वात्मैव सर्वजन्तूनामेक एव महेश्वरः ॥’१ वह आत्मा एवं महेश्वर विश्व को अनेकात्मक नहीं अपने अहं से अभिन्न मानकर एक मानता है अतः अनेकता कहाँ है?— ‘विश्वरूपोऽहमदमित्यखण्डामर्शबृंहितः ॥’ (स्वात्मैव सर्वजन्तूनामेक एव महेश्वरः ॥)२ अनेकता तो स्वस्वरूप के अपरिज्ञान के कारण है— ‘स्वस्वरूपापरिज्ञानमयोनिकः पुमान्मतः ॥’३ प्रकाशविमर्शमय, उन्मेष-निमेषमयी स्पन्द शक्ति से समवेत शिव ही परम चैतन्य है—चैतन्य का समुद्र है । चेतन वह है जो अपने को एवं पराये दोनों को जानता हो, और विभिन्न संवेदनाओं से युक्त हो । ‘शङ्कर’ प्रकाशविमर्शमय होने के कारण अपने स्वस्वरूप को और ‘विश्वोऽहं' 'विश्वरूपोऽहं' ‘इदमहं’ ‘अहमिदं’ के रूप में अपनी शक्ति के स्फार को (अर्थात् विश्व को अपनी अभिव्यक्ति के रूप में) विश्वात्मक रूप में देखता हो—वही शङ्कर है । (शिव का स्वस्वरूप = शक्ति का प्रसार = विश्व ।) ‘चैतन्य’, ‘आत्मा’ और ‘शङ्कर’—शिव अपनी शक्ति विराट् प्रसार रूप विश्व को अहं के रूप में विमर्शित करता है । यह विश्व का अहमात्मक विमर्शन—विश्व की अहं-रूप में अनुभूति—(विमर्श की क्रिया) शिव की स्वातन्त्र्य शक्ति ही है । शिव की यह ‘स्वातन्त्र्यशक्ति’ ही ‘चैतन्य’, ‘विमर्श’, ‘हृदय’, ‘संवित्’ ‘ऊर्मि’, ‘चितिशक्ति’ आदि कहलाती है । यह स्वतन्त्र चैतन्य सत्ता ही विश्व की आत्मा है, विश्व का हृदय है, अस्तित्वों का प्राण है । शङ्कर का स्वभाव यह है कि वह स्वतन्त्र ज्ञाता एवं स्वतन्त्र कर्ता है । स्वातन्त्र्य ही उसकी मुख्य शक्ति है । जो चेतन है वह आत्मा है, जो आत्मा है वह चेतन १-३. प्रत्यभिज्ञाकारिका—उत्पलदेव ।

४८ स्पन्दकारिका है—यह कथन अनुपयुक्त है। उपयुक्त कथन यह है कि—'चैतन्य ही आत्मा है।' चेतन-अचेतन—घट को स्वविषयक एवं परविषयक चेतना नहीं है—न वह अपने को जानता है और न तो दूसरों को। इसीलिए वह अचेतन कहा जाता है— 'घटेन स्वात्मनि न चमत्क्रियते, स्वात्मा न परामृश्यते, न स्वात्मनि तेन प्रकाश्यते, न अपरिच्छिन्नतया भास्यते ततो न चेत्यत् इत्युच्यते ॥'१ चैत्र (नामक चेतन व्यक्ति) चेतन होने के कारण चैतन्य-विभूति से समवेत होने के कारण 'अहं' रूप वाली चेतना द्वारा स्वात्मरूप में एवं अपने से पृथक् नील, पीत, सुख, दुःख (या इनके अभावात्मक शून्य) को भी अवभासित (अनुभूत) करने में स्वतन्त्र है अतः चेतने वाला होने के कारण 'चेतन' रूप में अभिहित किया जाता है— 'चैत्रेण तु स्वात्मनि अहमिति संरम्भोद्योगोल्लासविभूतियोगात् चमत्क्रियते... नील- पीतसुखदुःखतच्छून्यताद्यसंख्यावभासयोगेन अवभास्यते, ततः चैत्रेण चेत्यत इत्युच्यते ॥'२ 'चैतन्य', शक्ति के प्रसाररूपात्मक विश्व का अहमात्मक विमर्शन है—'चितिः प्रत्यवमर्शात्मा'३ चैतन्य की विशेषता यह है कि उसमें स्वप्रकाशयता होती है किन्तु जड़ पदार्थों में नहीं— 'चैतन्यमजडा सैवं, जाड्ये नार्थप्रकाशता ॥'४ 'अथापि जडमेतस्य कथमर्थ प्रका- शता।'५ आत्मा चैतन्य प्रधान होने के कारण ही 'चिदात्मा' कहलाती है—'चिदात्मैव हि देवोऽन्तः'६ । उत्पलदेवाचार्य कहते हैं—'चितिः प्रत्यवमर्शात्मा, परावाक् स्वरसोदिता । स्वातन्त्र्यमेतन्मुख्यं तदैश्वर्यं परमात्मनः ॥' (प्र० कारिका १।४४) 'स्वातन्त्र्य' ही इसका (आत्मा का = चैतन्य का) मुख्य लक्षण है—'स्वातन्त्र्यमेतन्मुख्यम्' (ई० प्र० १.५.१३) आत्मा का चैतन्य-प्राधान्य ही स्पन्द में आत्मा का विशेष लक्षण है। आत्मा का चैतन्य प्राधान्य— आत्मात् एव चैतन्यं, चित्क्रियाचितिकर्तृता । तात्पर्येणोदितस्तेन, जडात्सहि विलक्षणः ॥ (प्र०का०) एकात्मिका शक्ति एवं शक्तित्रय—परमात्मा से अभिन्न उसकी जो 'स्वातन्त्र्य शक्ति है वह जब विश्व के रूप में प्रकट होने की ओर उन्मुख होती है तो वह सर्वप्रथम जिस शक्ति का रूप धारण करती है उसका नाम है 'इच्छाशक्ति'। यही इच्छा शक्ति अपने विकास के अग्रिम चरणों में 'ज्ञानशक्ति' एवं 'क्रियाशक्ति' के रूप में प्रकट होती है। ज्ञान एवं क्रिया का युग्म विभूति सागर है क्योंकि प्रमेयों की आवश्यकता के अनुसार उनमें अनन्त शक्ति-प्रवाहों के अनन्त निर्झर फूट पड़ते हैं और शिवतत्त्व से पृथ्वी तत्त्व तक समस्त विश्व-वैचित्य आकार ग्रहण कर लेता है । (१) 'ज्ञानशक्ति'— (१) वर्ण (२) पद (३) मन्त्र के रूपों में एवं (२) 'क्रियाशक्ति'—(१) कला (२) तत्त्व एवं (३) भुवन के रूपों में—प्रसृत होकर विश्वाकारित हो उठती है । इस प्रकार समस्त १-३. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (१.५.१३) । ४-६. प्रत्यभिज्ञाकारिका—उत्पलदेव ।

प्रथमः निष्यन्दः ४९ वाचक विश्व (वर्ण, पद, मन्त्र) एवं वाच्य विश्व (कला, तत्त्व, भुवन) विश्वाकार में प्रसृत हो जाता है । (१) या सा शक्तिर्जगद्धातुः कथिता समवायिनी । इच्छात्वं तस्य सा देवी सिसृक्षोः प्रतिपद्यते ॥१ (२) एवं सैषा द्विरूपापि पुनर्भेदैरनेकताम् । अर्थोपाधिवशाद्याति चिन्तामणिरिवेश्वरी ॥२ (३) तत्र तावत्समापन्ना मातृभावं विभिद्यते । द्विधा च नवधा चैव पञ्चाशद्धा च मालिनी । वर्गाष्टकमिह ज्ञेयमघोरायमनुक्रमात् ॥३ 'स्पन्द' और उसकी अनन्तता— 'स्पन्द' उच्छलनात्मक है, पूर्ण अहं विमर्श- स्वरूप है; (एकोऽहं बहुस्याम' की इच्छा को रूपायित करने वाली मौलिक स्फुरण रूप अहं विमर्श है)—शाश्वत स्फुरणशील है, शक्तिप्रसारोन्मुख संकल्प है, विश्वात्मक प्रसरण की इच्छा है, सिसृक्षा के प्रति क्रियात्मक संकल्प है या अहं प्रत्यवमर्श है जो कि— 'उन्मेष-निमेष' के मार्ग पर यात्रा करता है और किंचिच्चलनात्मक है । 'यदयमनुत्तरमूर्तिर्निजेच्छया जगदिदं स्रष्टुम् । पस्पन्दे स स्पन्दः ..........(ष०त०सं०१) ॥ (क्षेमराजाचार्य) यही 'स्पन्द' 'सार' है, एवं परमेष्ठी का 'हृदय' है—'सैषा सारतया प्रोक्ता हृदयं परमेष्ठिनः ॥' (ई०प्र० १.५.१४) यह 'किंचिच्चलन'—अर्थात् स्वतन्त्र रूप में स्फुरित होने की क्षमता—से युक्त है । जो चिद्रूप है वह स्फुरणशील है अतः संवित् तत्त्व बिना स्फुरणा के रह ही नहीं सकता क्योंकि अन्यथा वह चिद्रूप रह ही नहीं सकता । 'शङ्कर' नामक अनुत्तर तत्त्व की सारभूता शक्ति, या उसका हृदय ही विमर्शरूपा पराशक्ति 'स्पन्दशक्ति' है । इस स्पन्द शक्ति में (अनन्त शक्तिमयता होने के कारण) विश्वमयता एवं विश्वोत्तीर्णता दोनों निहित है । (१) विशुद्ध ज्ञान स्वरूप प्रकाशमयता एव = 'विश्वातीत' । (२) क्रिया प्रधानविमर्शरूपता = 'विश्वमय'—दोनों उसके स्वरूप है । 'अभेद' अहं ही 'भेदात्मक' विश्व बन जाता है । प्रकाशपक्ष एवं विमर्श पक्ष में से क्रियाप्रधान विमर्श पक्ष ही 'सामान्यस्पन्द' है— 'हृदये स्वविमर्शोऽसौ द्राविताशेषविश्वकः । भावग्रहादिपर्यन्तभावी सामान्यसंज्ञकः ॥ स्पन्दः स कथ्यते शास्त्रे ...... (तं० ४.१८२-८३) इस क्रिया प्रधान विमर्श पक्ष ('सामान्य स्पन्द') के द्वारा अन्तर्मुखी समस्त अवभासों में एक स्पन्द शक्ति ही उद्भासित होती है?— १. मालिनीविजय (३.५)। २. मालिनीविजय (३.८) । ३. मालिनीविजय (३.२९) । स्पं० ४

५० स्पन्दकारिका अतएव स्थिता संविदन्तर्बाह्योभयात्मना। स्वयं निर्भास्य तत्रान्य आस्यन्तीव भासते ॥ (तं०४।१४४) 'शक्ति' ही जगत् है—'शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं शक्तिमांस्तु महेश्वरः ॥ (१) 'पशुपति भूमिका' (सामान्यभूमिका) में वह शक्ति 'चित्' 'आनन्द' 'इच्छा' 'ज्ञान' एवं 'क्रिया' के रूप में स्थित है। (२) पशुभूमिका (विशेष भूमिका)—(जीवभाव में) वही एकात्मिका शक्ति प्राण, अन्तःकरण, बाह्य इन्द्रियाँ आदि अनन्त प्रमेय के रूप में स्थित हैं। (३) उसकी आनन्दशक्ति = 'स्वातन्त्र्य' है। ┐ (४) आनन्द का चमत्कार = इच्छाशक्ति है। │ (५) प्रकाशरूपता ही = चित् शक्ति है। │ (६) विमर्शमयता ही = ज्ञानशक्ति है। ┘ (७) प्रत्येक आकार को अवभासित करने की सामर्थ्य = क्रियाशक्ति है। तस्य च (१) स्वातन्त्र्यम् आनन्दशक्तिः (२) तच्चमत्कार इच्छाशक्तिः (३) प्रकाश- रूपता चिच्छक्तिः (४) आमर्शात्मकता ज्ञानशक्तिः (५) सर्वाकारयोगित्वं क्रियाशक्तिः ॥' (तं०सा० ६५)। अविरत रूप में प्रवहमान स्वातन्त्र्यशक्ति या 'स्पन्द' के अन्तर्मुख एवं बहिर्मुख दोनों प्रसार एक साथ प्रवृत्त रहते हैं। शिव की शक्तियाँ—'स्वातन्त्र्यशक्ति' परमात्मा से अभिन्न है और वह विश्व के रूप में प्रसृत होने के लिए उन्मुख है। यह शक्ति विश्वोन्मुखता की स्थिति में सर्वप्रथम 'इच्छा' के रूप में प्रकट होती है—'इच्छाशक्ति' का रूप धारण करती है। यही इच्छा शक्ति उत्तरोत्तर अपना प्रसार करती हुई 'ज्ञानशक्ति' एवं 'क्रियाशक्ति' का रूप धारण करती है। 'शक्तिचक्र'— [चित्र: शक्तिचक्र — (परमशिव [स्वातन्त्र्य शक्ति]) — (इच्छा शक्ति) — (ज्ञान शक्ति → वर्ण, पद, मन्त्र) — (क्रिया शक्ति → कला, तत्त्व, भुवन)] (१) या सा शक्तिर्जगद्धातुः कथिता समवायिनी। इच्छात्वं तस्य सा देवी सिसृक्षो प्रतिपद्यते ॥१ (२) एवं सैषा द्विरूपापि पुनर्भेदैरनेकताम्। अर्थोपाधिवशाद्याति चिन्तामणिरिवेश्वरी ॥२ (शक्तिधाराओं का विस्फोट)

१. मालिनीविजय (३.५)। २. मालिनीविजय (३.८)।

प्रथमः निष्यन्दः ५१ शक्ति से अभिन्न एवं शक्ति के कुक्षि में स्थित विश्व शिव शक्ति (शक्तिधाराओं का विस्फोट) पारमेश्वरी शक्ति की सिसृक्षा अन्तर्गर्भित विश्व (अव्यक्त जगत्) मातृका (शब्दराशि) की अधिष्ठात्री शक्तियाँ विश्व का बाह्यावभासन (अष्टवर्ग की अधिष्ठात्री शक्तियाँ) (व्यक्त जगत्) माहेश्वरी ब्राह्मणी कौमारी वैष्णवी ऐन्द्री याम्या चामुण्डा योगिशी (अन्तःकरण एवं बहिष्करणों से सम्बद्ध शक्तियाँ) खेचरी, भूचरी, दिक्धरी, गोचरी, प्राण, बुद्धि, ज्ञानेन्द्रियाँ कर्मेन्द्रियाँ पञ्चतन्मात्रायें महाभूत विश्व (ब्रह्मा से लेकर पृथ्वी एवं पृथ्वी के पदार्थों से लेकर तृणपर्यन्त समस्त प्रमेय समूह) शिव की शक्तियाँ चित् आनन्द इच्छा ज्ञान क्रिया शक्ति शक्ति शक्ति शक्ति शक्ति क्रिया प्रधान जो 'विमर्श' 'सामान्य स्पन्द' है उसके द्वारा अंतर्मुखी 'अहं' में— 'इदं' के रूप में अवभासित विश्व की अंतर्मुख अहंवरूपता में—अभिन्नतयावस्थित, विश्व कल्पना का बहिर्मुख 'इदं', रूप में अवभासन—विश्रान्ति की अवस्था में पड़ा रहता है। 'विमर्श' में जिस भाव (सत्ता) का प्रकाश हो उसी का बाह्यावभासनबहिर्मुखी प्रकाशन—संभव है अन्य का नहीं। विमर्शात्मक स्पन्दशक्ति की 'स्वातन्त्र्यशक्ति'

५२ स्पन्दकारिका अवभासित पदार्थ का अपने में लय भी कर सकती है और अपने एकत्व को अनेकत्व में अवभासित भी कर सकती है। दोनों को धारण भी कर सकती है और दोनों से पृथक् भी रह सकती है। ‘स्पन्दशक्ति’ रूपिणी विमर्शात्मक स्फुरण। के बिना ‘प्रकाश’ की कल्पना व्यर्थ है। विमर्शहीन प्रकाश बिम्ब को ग्रहण करने की क्षमता रखने पर भी जड़ है। ‘विमर्श’ क्या है—इसका स्वभाव क्या है। ‘विमर्शो हि सर्वसहः परमपि आत्मीकरोति' आत्मानं परोकरोति उभयं एकीकरोति, एकीकृतं द्वयमपि न्याभावयति इत्येवं स्वभावः ॥’१ विमर्शात्मक स्फुरण से रहित ‘प्रकाश’ (शिव) की कल्पना व्यर्थ है क्योंकि विमर्शशून्य प्रकाश जड़ होता है— ‘स्वभावमवभासस्य विमर्शं विदुरन्यथा। प्रकाशोऽर्थो परक्तोऽपि स्फटिकादि जडोपमः ॥२ ‘स्पन्द’ के ‘किंचिच्चलन’ का अर्थ—‘किंचिच्चलन’ ही स्पन्द का स्वभाव बताया गया है किन्तु यह किंचिच्चलन है क्या? स्वतन्त्र रूप में स्फुरित होने की सामर्थ्य ही किंचिच्चलन का स्वभाव है। निरपेक्ष स्वातन्त्र्य ही स्पन्द की विशेषता है। ‘किंचिच्चलनमेतावदनन्यस्फुरणं हि यत्। उमिरिषा विबोधाब्धेर्न संविदनया विना ॥’ (तं० ४.१८४) संवित् समस्त कालों में प्रमेय एवं प्रमाता दोनों रूपों में सतत स्फुरण युक्त है। स्पन्द या स्फुरण संवित् पयोधि की तरंग है। स्पन्द एवं संवित् एक ही अभिन्न ज्ञान- क्रियामयी सत्ता है। यही है संवित् तत्व का संवित्, जो कि विमर्शमय एवं सतत् स्पन्दमय है, इसी कारण संवित् प्रत्येक पदार्थ का (विश्वोत्तीर्ण एवं विश्वमय भावों में) स्वतन्त्र ‘अहं’ रूप में विमर्श कर सकता है। रत्नाकर की विशेषता यही है कि वह कभी तरंगों से तरंगित है एवं कभी अतरंगित है : ‘निस्तरंगतरंगादिवृत्तिरेव ही सिन्धुता ॥’३ संवित् का संवित्त्व यही है कि वह विश्व का अहंवरूप में विमर्श करे ‘इदमेवं संविदः संवित्त्वं यत्—‘सर्वम् आमृशतीति’ (लं० वि०४।२१४)। आनन्दात्मक स्वातन्त्र्य शक्ति की चमत्क्रिया यही है कि—संविद्रूप विश्वात्मा अपनी स्पन्दात्मिका स्वतन्त्रता की सामर्थ्य द्वारा अपना स्वरूपाच्छादन करके अक्रम में क्रम एवं क्रम में अक्रम का अवभासन नामक क्रीड़ा करता है। ‘स्पन्दशक्ति’ प्रत्येक क्रिया के निष्पादन में स्वतन्त्र है— (१) ‘सत्ता च भवनकर्तृत्ता सर्वक्रियासु स्वातन्त्र्यम् ॥’४ (२) एष प्रकाशरूप आत्मा स्वच्छन्दो ढौकयति निजरूपम्। पुनः प्रकटयति झटिति अथ क्रमवशादेष परमार्थेन शिव रसम् ।५ १. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (१.५.१३)। २. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (१.५.११)। ३. तं० ४.१८४। ४. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (१.५.१४)। ५. तं०सा० पृ० ७।

प्रथमः निष्यन्दः ५३ यह शक्ति ही स्फुरत्ता एवं महासत्ता है—'सा स्फुरत्ता महासत्ता' १ यह समस्त सत्ताओं को सत्ता प्रदान करती है। यह आकाश कुसुम को भी व्याप्त करती है 'सा च खपुष्पादिकमपि व्याप्नोति।' २ यही देशकाल और आकार को रूप प्रदान करती है। प्रमाता, प्रमेय प्रमाण, प्रमा सभी कल्पनायें मात्र हैं। यह प्रत्येक-प्रत्येक पदार्थ में अपने को अवभासित करती है और उनसे पृथक् रूप में भी सत्तासीन है। 'स्पन्द' अनन्त रूपात्मिका है। यह अद्वैत, एकात्म, अभेद एवं एक स्पन्दशक्ति प्रसार की भूमिका पर अनन्त रूप धारण करती है विश्व के प्रत्येक पदार्थ शक्ति के ही रूप हैं। चैतन्य या आत्मा विश्व की आत्मा है। चैतन्य ही आत्मा है। जिस प्रकार राहु का सिर कहना मात्र एक औपचारिकता है वस्तुत राहु एवं सिर दोनों एक ही वस्तु हैं उसी प्रकार चैतन्य एवं आत्मा दोनों अभिन्नतया एक ही है— 'चैतन्यं चितिः, चेतन आत्मा इति राहोः शिर इतिवत् काल्पनिकम्, वस्तुत एकमेव सर्वम् । चितिक्रिया प्रकाशविमर्शः तस्य भावः चैतन्यम् स्वातन्त्र्यम् ॥' ३ शिव की एक निजी अभिन्न शक्ति है उसी का नाम है—'स्वातन्त्र्य शक्ति'। शिव एवं शक्ति की अभिन्नता—चैतन्यरूप शक्ति चिद्घन शिव की चिति शक्ति है और शिव से अभिन्न है। दोनों परस्पर उसी प्रकार अभिन्न हैं यथा वह्नि एवं उसकी दाहकता— 'न शिवः शक्तिरहितो न शक्तिः शिववर्जिता । उभयोरस्ति तादात्म्यं वह्निदाहकयोरिव ॥' शिव भी एक है और उसकी महाशक्ति भी एक ही है किन्तु यह शक्ति अनन्त रूपों में विभक्त होकर नाना वैचित्र्यमय एवं अनन्तरूपात्मक विश्व बन जाती है— शिवस्यैका महाशक्तिः शिवश्चैको ह्यनादिमान् । सा शक्तिर्भिद्यते देवि! भेदैरानन्त्यसंभवैः ॥' ४ 'चैतन्य', 'विमर्श' एवं 'स्पन्द'—विश्व की शाश्वत, अखण्ड एवं सर्वव्यापी मूल चेतना (चैतन्य) तो आत्मा है—'चैतन्यमात्मा' ५ किन्तु शक्ति एवं शक्तिमान अभिन्न होने के कारण चैतन्य की यह महासत्ता शिव भी है और जीव भी। 'विमर्श' प्रकाश (शिव) की अहमात्मक विमर्शन वाली शक्ति है जो कि 'अहमिदं' 'इदमहं' का विमर्शन करता है। पति भूमिका में सगुण शिव का विमर्शन विश्व के संबन्ध में यही होता है कि— 'अहमिदं' (मैं ही विश्व हूँ) बाद का विमर्श होता है 'इदमहं' ॥ 'स्पन्द' शक्ति—स्पन्द का स्वरूप है—पूर्णतम अहंविमर्श, 'पूर्णतम' इसलिए कि अहमाकार अनुभूति तो प्रत्येक जीव की होती है किन्तु यह अनुभूति भेदोन्मुख, १. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (१.५.१४)। २. ईश्वरप्रत्यभिज्ञाविमर्शिनी (१.५.१४)। ३. शिवसूत्रविमर्शिनी (१.१.२१)। ४. स्व०तं० (११.२७१)। ५. शिवसूत्र ।