स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)
Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज द्वारा
प्रथमः निष्यन्दः १८१ अभाव (Non-existence) की सत्ता की कल्पना ही नहीं की जा सकती यहाँ तक कि मूढ़ता (जड़ता) का भी वहाँ अस्तित्व नहीं है क्योंकि अभियोग के कारण 'वह था' का निश्चय होता है । अतः वह अकृत्रिम (सहज) है । ज्ञान एक गंभीर सुषुप्ति के समान है । वह सत्य स्मर्यमाण होने की दशा कभी प्राप्त नहीं कर पाता ॥१ 'असदेवमदमग्र आसीत्' (छा०३।१९।१) भी कहा गया है किन्तु यहाँ उसका अर्थ दूसरा है । वेदान्तियों ने जिस अभाव (Non-existence) की बात का उल्लेख किया है उसकी कल्पना नहीं की जा सकती क्योंकि—'असदेवदमग्र आसीत्' (सृष्टि के प्रारंभ में सब कुछ असत् था) सत् की धारणा तो विद्यमान वस्तुओं के कारण है और अभाव तो यथार्थतः कुछ है ही नहीं । यदि सत्ता की धारण का इसके साथ संबन्ध स्थापित किया जाय तो इसकी भी कुछ सत्ता दृष्टिगत होती है और तब यह अभाव स्वयं ही नष्ट हो जाएगा । इसके अतिरिक्त यह भी कि उस सार्वभौम विध्वंस की कल्पना ही कैसे की जा सकती है जहाँ कि स्वयं यह धारणा रखने वाला या विचार करने वाला ही लुप्त हो जाता है? यदि आप विचारक के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं तब तो सार्वभौम महाध्वंस ही असंभाव्य है क्योंकि उस स्थिति में तो विचारक की सत्ता बनी रहेगी—वह विश्व में स्थित ही माना जाएगा । अतः सार्वभौम महाध्वंस सत् का निर्माण नहीं कर सकता ॥ आक्षेपक का आक्षेप और उसके तर्क—यह विचारक कृत्रिम है और वह अभाव से अभिन्न है । वह अपनी कल्पना के द्वारा विश्व के ध्वंस (विनाश) की धारणा व्यक्त करता है और इस धारणा की परिपक्वता के समय वह अभाव के साथ नहीं भाव के साथ अभिन्न हो जाता है । विश्व के रूप में नहीं प्रत्युत शून्य के रूप में अवस्थित ज्ञाता इसलिए अस्तित्व में है क्योंकि वह ऐसा आत्मानुभव से अनुभव करता है और अपने को ज्ञाता समझता है और संकुचित (सीमित) व्यक्ति के रूप में याद किया जाता है । अतः यहाँ असंगतता नहीं है ।२ अतः शून्यता (Vacuum) की दशा कृत्रिम है और यह अस्तित्व में इस रूप में है कि यह कभी अस्तित्व में नहीं था । परमात्मा 'शून्य' के विषय में उपदेश तो देता है जिससे कि वह वास्तविक ज्ञान को अनधिकारियों से मुक्त रख सके । ज्ञेय गंभीर सुषुप्ति के समान हैं । जड़ता के रूप में विद्यमान स्वप्नहीन सुषुप्ति को सभी समझ सकते हैं । अतः ध्यान करके अन्य 'शून्य' को प्राप्त करने की आवश्यकता ही क्या है? क्योंकि अयथा- र्थता (सत्यहीनता) की दृष्टि से तो दोनों समतुल्य या अभिन्न हैं ।३ बहुत से दार्शनिक यथा वेदान्ती, नैयायिक, सांख्य एवं सौगत आदि जड़ता के समुद्र में अधःपतित हो चुके हैं । मोह, अज्ञान या जड़त्व अभिन्न है । यही शून्य भी है । स्पंद तत्त्व में प्रवेशार्थियों के लिये शून्य एक व्यवधान है । ग्रन्थकार ने शून्यवाद का पूर्ण उन्मूलन करने का प्रयास किया है । वेदान्तियों एवं सौगतों का खण्डन इस लिए किया गया है क्योंकि इन दोनों की दृष्टि समान है ।४ १-४. क्षेमराज—स्पन्दनिर्णय ।
१८२ स्पन्दकारिका स्पंद तत्त्व के नाम की सत्यता एवं सार्थकता 'शून्य' की भाँति स्मर्यमाण नहीं है क्योंकि उसे 'अज्ञेय' नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह ज्ञाता से अभिन्न है। इसीलिए बृहदारण्यकोपनिषद् में कहा गया है कि 'किस साधन से ज्ञाता को जाना जाय?' यद्यपि योगी व्युत्थानावस्था में 'समाधि' का स्मरण रखता है किन्तु यही 'स्पंद तत्त्व' नहीं है। यह वैसा नहीं है क्योंकि वह परम ज्ञाता (Omniscient) नित्य (Ever-present) असीम तथा पूर्ण प्रकाश एवं पूर्णानन्द है। 'न सावस्था न यः शिवः' (विचारों की दिशा में शब्द एवं अर्थ की ऐसी कोई दशा (अवस्था) है ही नहीं जो शिव न हो) अतः 'स्पंद तत्त्व' अनन्तानन्दस्वरूप होने के कारण स्मरण का विषय नहीं बन सकता और न तो जड़ (Insentient) ही कहा जा सकता है। उसे 'तत्' (That) कहना भी संगत नहीं है। क्योंकि ऐसा कहने से यह बोध होता है कि वह ज्ञान का विषय बन चुका है और स्मर्यमाण है। शब्द सत्य स्मर्यमाण एवं ज्ञेय नहीं है।१ आचार्य उत्पलदेव 'स्पन्दप्रदीपिका' में कहते हैं—अभाव शशशृंग के समान होता है। अतः अवस्तु होने के कारण वह कभी अनुभव का विषय नहीं बन सकता। अभाव एक मूढ़ावस्था है अतः चेतन नहीं है। अभियोग (अभिलाषा) के संस्पर्श से अभाव की भावना प्रादुर्भूत होती है। वह मेरी शून्यावस्था थी—ऐसा स्मरण होता है। कहा भी गया है कि—जिस भाव के द्वारा अभाव बाधित होता है; वह 'है' या 'नहीं'। उसके अभाव के बाधक भाव का सद्भाव कौन काट सकता है? अतः वह है और चिन्मय है। उसी से सभी का अनुभव होता है, अभाव का भी'— 'अभावो येन भावेन बाध्यतेऽस्ति न नास्ति सः। तस्य भावस्य सद्भावो वद केन निवार्यते। सोऽस्त्यतश्चिन्मयो भावो येन सर्वं विभाव्यते ॥' यही कारण है कि अभाव की भावना कृत्रिम और अनित्य ही होती है। वह सुषुप्तावस्था के समान है। यदि ऐसा न होता तो बाद में मूढ़ावस्था के समान उसका स्मरण न होता। उस अवस्था के कारण ही सदा प्रकाशमान आत्मा स्मृति का विषय बन जाती है। आत्मा देखकर ही तो स्मरण करती है। अतः वह चिद्रूप एवं नित्योदित है। यही कारण है—'कि गुरु से उपदेश प्राप्त करके आदरपूर्वक उसका सम्मान करना चाहिए। अभी तक ऐसा लगता है मानों दो अवस्थायें हों—१) स्मर्ता २) स्मर्तव्य। इनमें कौन नित्य है और कौन अनित्य?—इसका विचार अगली कारिका में किया गया है। 'अवस्थाद्वयमात्राऽस्ति स्मर्तृस्मर्तव्यभेदतः। यत्तस्य नित्यनित्यत्वविचारायेदमुच्यते ॥'२ नाभावो = न + अभावो। अभावो = वस्तुशून्यता। भाव्यतां = भवनीयत्वं। 'समाधावालम्बनभावं।' समाधि में स्थित आत्मालम्बन। नैति = नहीं जाता है। (क्योंकि अभाव एवं भाव की भावना में परस्पर विरोध है) १. स्पन्दनिर्णय। २. उत्पलदेवाचार्य—'स्पन्दप्रदीपिका'।
प्रथमः निष्यन्दः १८३ भाव = संविद्विषयतायोग्यपदार्थ। यह ध्येय के रूप में आलम्बन का विषय बन सकता है। एक स्थान पर कहा गया है— 'अभावं भावयेत्तावद्यावत्तन्मयतां व्रजेत्॥' ध्यान, ध्यातृ एवं ध्येय रूप विकल्पों के उच्छेदस्वरूप जो समाधि की अवस्था है उसे ही आत्मतत्त्व का विस्मरण करने वाले (अज्ञ) लोग 'अभाव' मानते हैं। तत्र = वहाँ। उस अवस्था विशेष में। अमूढ़ता = मूढ़ता का अभाव॥ 'यतोऽभियोगसंस्पर्शात्' = व्युत्थानावस्था में उसी प्रकार की दशा अन्तरा- नुसंधान का विषय के रूप में गृहीत अभियोग के द्वारा तत्समय प्रत्युदित अभिलाप से होने वाले संस्पर्श या संपर्क से। तदासीत्—तद् + आसीत्। 'तद्' = दशान्तर। वह दशान्तर। 'आसीत्' = था। (अभूत्)॥ इति निश्चयः = अध्यवसाय। (अध्यवसायः स्यात्)॥ अभाव समाधिलब्धप्रतिष्ठ योगी व्युत्थानावस्था में अवस्थित होने पर यदि उस अवस्था का अनुसंधान न कर पाये तब भला हम उसे लब्ध प्रतिष्ठ कैसे कह सकते हैं ? और वह भी अपने को उस प्रकार का कैसे समझ सकता है ? उसके ऐसा न होने पर समाधि और व्युत्थान इन दोनों में कोई व्यतिरेक (पृथक्ता) रह ही नहीं जाएगी। अर्थात् उसकी व्युत्थानावस्था एवं समाधि दोनों में कोई अन्तर रह ही नहीं जाएगा। भाव यह है कि उसे समाधि का अनुभव हो ही नहीं पायेगा। हाँ, उस अभाव की अवस्था की प्राप्ति के कारण इतना स्मरण अवश्य बना रहेगा कि मैंने उसका अनुभव अवश्य किया था।१ बारहवीं कारिका के भाव को स्फुटीकृत करने के लिए ग्रन्थकार ने तेरहवीं कारिका कही। अतः = इसलिए। 'वह अनुभव मुझे कभी भूतकाल में हुआ था'—ऐसा अभियुज्यमान होने के कारण। तत् = वह। 'अभावसमाधि' नामक वस्तु। कृत्रिमं ज्ञेयं—बनावटी समझना चाहिए अर्थात् भावाभावदशा के योग के कारण उसे काल्पनिक एवं अनित्य समझना चाहिए। सदा—सदैव। अर्थात् ऐसी कोई कालकला संभव नहीं हो पाती जिसमें कि उस प्रकार की समाधि की अवस्था नित्य रूप में स्थित रह सकें। इसे किस प्रकार की कृत्रिमता समझा जाय? इसे सुषुप्तावस्था के समान अर्थात् सुखपूर्ण निद्रा ('सुखस्वापावस्था') के समान वाले पद (संविदधिकरण) के तुल्य समझना चाहिए॥ १. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकाविवृति'।
१८४ स्पन्दकारिका ऐसा क्यों कहा जाय? जिस प्रकार लौकिकी सुषुप्तावस्था अत्यधिक मोहात्मक होने के कारण सत् होते हुए भी उसमें वेद्य एवं वेदक की भिन्नता नहीं रहती। वेद्य एवं वेदक की भिन्नता को तत्काल ग्रहण न कर, परन्तु उसके अभावरूपात्मक होने के कारण जागने पर उसे खोजने पर यही प्रतीत होता है कि उसकी अनुभूति केवल भूतकाल में हुई थी किन्तु अब वर्तमान में उसकी सत्ता नहीं है—अतः वह अनित्य है—इसी प्रकार अभाव समाधि की अवस्था भी व्युत्थान के समय अनित्य ही है। कारण यह है कि स्वप्न एवं अभाव समाधि दोनों में ही अनुभव की सत्ता वर्तमान में नहीं रहती केवल उनकी स्मृतियाँ मात्र शेष रहती है अतः दोनों के लक्षणों में समानता है। अतः ये सभी इस प्रकार की समाधियों के प्रकार सुषुप्तावस्था में ही अन्तर्भूत हैं उनसे पृथक् नहीं हैं।—इसी तथ्य को ग्रन्थकार ने—'अतस्तत्कृतं ..... सदा' कारिका में प्रतिपादित किया है। न तु—न तो। (पुनः) तत् तत्त्वम् = वह तत्त्व। इस प्रकरण में उपादेयतम रूप में पूर्वोपदिष्ट स्वस्वभावलक्षण सद्वस्तु ॥ एवम्—इस प्रकार। उपर्युक्त प्रकार से। 'स्मर्यमाणत्वं प्रतिपद्यते' = अतीत के स्मरण मात्र का विषय बन कर नहीं रह जाती। संस्मरण का विषय नहीं बनती प्रत्युत् वह वर्तमान में भी सद्वस्तु के रूप में विद्यमान रहती है क्योंकि समाधि और उसके अनुभव तथा परतत्त्व नित्योदित तथा सदा वर्तमान रहा करते हैं। कहा भी गया है— 'अतोऽभावभावनया समाधिलब्धभूमिकस्यापि' १ अभाव की धारणा कल्पित करने पर अभाव रहता ही नहीं। जड़ता (मूढ़ता) भी विद्यमान नहीं है प्रत्युत इसके विपरीत चेतना विद्यमान है। इस तर्क के द्वारा समस्त भाव (Existence) केवल विचार या धारणा की परिपक्वता की स्थिति में कल्पना की सृष्टि के रूप में प्रस्तुत होता है। जीवन का परम लक्ष्य शून्य की धारणा या विश्व के अभाव (शून्य) की कल्पना से तो कभी अधिगत नहीं किया जा सकता। पूर्व पक्ष का तर्क—प्रतिवादी तर्क करता है कि विश्व का ध्वंस या शून्य नागार्जुन के द्वारा कल्पित शून्य (Vacuum) से अभिन्न है जिन्होंने कहा था कि शून्यता (Vacu- ity) वह तत्त्व है जिसमें गुणों का अभाव है, समस्त श्रेणियों का अभाव है, सभी सुखों एवं दुःखों का अभाव है—समस्त इच्छाओं का अभाव है किन्तु जो वस्तुतः अभाव या शून्य नहीं है— 'सर्वालम्बनधर्मैश्च सर्वतत्त्वैरशेषतः। सर्वक्लेशाशयैः शून्यं न शून्यं परमार्थतः ॥' उत्तर पक्ष का तर्क—ग्रन्थकार का कथन है कि—हाँ यह तो ऐसा ही है किन्तु १. रामकण्ठाचार्य—'स्पन्दकारिकाविवृति'।
प्रथमः निष्यन्दः १८५ यदि शुद्ध बुद्धि एवं आनन्द के स्वतन्त्र एवं परम स्वभाव को मूलाधार (Subtratum) मान लिया जाय तो । 'विज्ञानभैरव' भी इस सत्य को स्वीकार करता है कि परमात्मा देश और काल की सीमा से ऊपर है और वह शून्यवत् है जिसमें कि चेतना की दशा परमाधार रूप में स्थित है। यदि इस दृष्टि से शून्य पर विचार किया जाय तो यह मान्य है अन्यथा 'न शून्यं परमार्थतः' का कोई अर्थ ही नहीं है। 'आलोकमाला' नामक ग्रन्थ में इन सब पर प्रकाश डाला जा चुका है जिसमें कहा गया है कि 'वह परिभाषा से परे (अनिर्वचनीय) दशा ही शून्यता है जो कि विद्वज्जनों के लिए भी अगम्य एवं अज्ञेय है। इसका वह सामान्य अर्थ जो कि नास्तिक प्रस्तुत करते हैं—वस्तुतः वह सत्य नहीं है।' प्रतिवादी का यह कथन सत्य है कि परम सत्य अवर्णनीय है—अज्ञेय है—अतः अभिव्यक्ति से परे है—किन्तु उसे 'शून्य' या 'अभाव' (Naught, vacuum, non- existence) कैसे कहा जा सकता है? यहाँ तक कि शून्य या अभाव को भी कल्पना के द्वारा समझा जा सकता है—वह भी ज्ञेय है। यदि प्रतिवादी पक्ष इस परम सत्ता को नहीं समझ पाते तो उसे चाहिए कि वह इसके साक्षात्कार कर्ता या अनुभावक परमर्षियों से शिक्षा ग्रहण करें। किन्तु यह उचित नहीं है कि वे स्वयं अपने को एवं अपने अनुयायियों को निरालम्ब पाताल या खोह में फेंक दें। उन्हें यह कैसे ज्ञात हुआ कि जड़ता है?— इसी के उत्तर में कहा गया है कि—'यतोऽभियोगसंस्पर्शात् तदासीदिति निश्चयः ॥' यह 'अभियोग' या घोषणा (Declaration) कि 'मैं था'—यह भी सूचित करता है कि—'वह है'—'मैं पूर्णतः जड़ था।' जड़ता की यह अवस्था कृत्रिम है क्योंकि वह स्मर्यमाण है। वह अवस्था अनुभव में आने पर सत्ता (भाव) को सूचित करती है न कि शून्य या अभाव को। वह वर्तमान में विद्यमान उस विचारक के अस्तित्व को प्रमाणित करती है न कि उसके अभाव को। चेतना का स्वरूप प्रलय के समय भी पूर्ण रहता है अतः सत्य तो यह है कि अभाव की सत्ता है ही नहीं। पूर्वपक्ष—नील, पीत आदि का स्मरण तो तब रहता है जब कि ये पहले कभी देखे जा चुके हों और पूर्वकाल में सुनिर्णीत हों। लेकिन जो शून्य में लय हो चुका हो और जिसकी निर्णयात्मिका शक्ति भी लय के कारण समाप्त हो चुकी हो उसके लिए तो निर्णय करना ही असंभव है। फिर यह कैसे कहा गया कि परवर्ती निर्णय के समक्ष जड़ता का अस्तित्व है अर्थात्—'वह था'। उत्तर पक्ष—यह ज्ञेय का धर्म या गुण है कि उसे विचारक के द्वारा तब तक याद नहीं किया जा सकता जब तक कि आत्मा में उसका संस्कार नहीं पड़ जाता। ज्ञेय 'यह' के रूप में कभी सुनिश्चित नहीं किया जा सकता। अपने शून्य की काल्पनिक दशा में सीमित ज्ञाता परम ज्ञातृत्व बन कर ही रहता है। वह अपने से पृथक् नहीं रह सकता अतः निर्णय तो उसी का है—यह सिद्ध हुआ।
१८६ स्पन्दकारिका अभाववाद, सर्वशून्यवाद का खण्डन—माध्यमिक सम्प्रदाय के शून्यवादी बौद्ध एवं अभावब्रह्मवादी दार्शनिक कहते हैं कि सर्वोच्च सत्य 'शून्य' एवं 'अभाव' है। स्पन्द तत्त्व पूर्ण ज्ञान मय एवं पूर्णकर्तृत्वशाली है। अभाववादी कहते हैं कि शरीर, मन, बुद्धि चित्त, अहङ्कार, इन्द्रियाँ एवं उनके विषय आदि सभी अनात्म पदार्थों का निषेध करते करते केवल सर्वत्र अभाव ही अभाव दृष्टिगोचर होता है और आत्मा इसी अभाव में लय हो जाती है। वृत्तिकार भट्टकल्लट स्पन्दसर्वस्व में कहते हैं—(१) यह कथन संगत नहीं है कि—'तब तक अभाव की कल्पना एवं उसका अभ्यास करना चाहिए जब तक कि आत्मा अभाव में लीन न हो जाय ।।'—तर्क यह है कि 'अभाव' भावना का विषय बन ही नहीं सकता। अभाव एक अस्तित्त्व-शून्यता या जड़ता की अवस्था है अतः उसको भावना का विषय नहीं बनाया जा सकता। (२) अभाव-भावना मूढ़ता की अवस्था है क्योंकि समाधि काल के पश्चात् जब ऐसे योगी को अभियोग (भाषण के साथ संबन्ध) हो जाता है तब वह उस समाधि की अवस्था को—'वह मेरी शून्यावस्था थी'—इस प्रकार स्मृति के रूप में अनुभव करता है। (३) आत्मा का स्वभाव इसके विपरीत है। सतत उदित होने के कारण आत्मा की चित् स्वरूपता का इस प्रकार अनुभव नहीं किया जाता जिस प्रकार मूढ़ता का। (४) चित्त्व तो शाश्वत रूप में उदित रहने वाली सत्ता है। उसका अनुभव सार्वकालिक एवं अनुभवित्ता के रूप में—स्वतन्त्र चैतन्य प्रमाता के रूप में—होता है। (५) अभाववादी प्राचीन वेदान्तियों की एक शाखा है। छान्दोग्योपनिषद (३.१९.१) में कहा गया है—'असदेवेदमग्र आसीत्' अर्थात् सृष्टि के आरंभ में कुछ भी नहीं था मात्र था तो केवल 'असत्'। यह असत् ही सृष्टि का प्रथम तत्त्व था। यह सिद्धान्त मानता है कि—'असतः सज्जायत्'। अभाव ब्रह्मवाद—अर्थात् असत् रूप कारण से भाव रूप (सद्रूप) कार्य की उत्पत्ति हुई। इस भावरूप में दृष्टिगत जगत् की सृष्टि के पूर्व किसी भी पदार्थ की सत्ता भाव रूप में नहीं थी। अतः चतुर्दिक अभाव का ही साम्राज्य था। इस अभाव से ही भावरूप जगत् की संरचना हुई। श्रुति (छा. ३.१९.१) भी कहती है—सृष्टि से पूर्व असत् मात्र था अर्थात् सृष्टि में मात्र अभाव ही अभाव था। प्रलय की दशा में भी सभी विश्व अभाव—असत् में लीन हो जाएगा। अतः ब्रह्म का यथार्थ स्वरूप भी अभाव ही है। अभाव का निरन्तराभ्यास एवं संतत ध्यान करने से समस्त सांसारिक द्वैत का मूलोच्छेद हो जाता है। वेदक एवं दोनों सत्ताएँ भी अन्ततः प्रलय काल में अभाव में लय हो जाएगी। इस दृष्टि के अनुसार अभाव में लय हो जाना ही जीवात्मा की मुक्ति है। 'अभाव समाधि' ही सिद्धि प्राप्त होने पर अभावरूप परब्रह्म में आत्मा का लय ही उसका मोक्ष है। शून्यवाद—माध्यमिक सम्प्रदाय के शून्यवादी आचार्यों की मान्यता यह है कि
प्रथमः निष्यन्दः १८७ ‘शून्य’ ही परमतत्त्व है । नागार्जुन प्रभृति दार्शनिकों ने ‘सर्वशून्यवाद’ की स्थापना की ओर समस्त सत्ताओं का निषेध किया गया । अभिनवगुप्तपादाचार्य ने अपने ‘तन्त्रालोक’ नामक ग्रन्थ में इसे ‘सर्वापह्नवहेवाक धर्मा’ कहा । ये दार्शनिक सत्ता के प्रत्येक प्रमाता, प्रमेय, प्रज्ञा आदि के अनस्तित्त्व को स्वीकार करते हैं । समस्त विश्व शून्य का विवर्त होता है । १) मुख्यो माध्यमिको विवर्तमखिलं शून्यस्य मेने जगत् ॥ २) न सत् नासन् न सदसन्न चाप्यनुभवात्मकम् । चतुष्कोटि विनिर्मुक्तत्वं माध्यमिको गुरुः ॥ ‘शून्य’ न सत् है, न असत् है, न सदसत् है, प्रत्युत् यह चतुष्कोटिविनिर्मुक्त तत्त्व है: ‘चतुष्कोटि विनिर्मुक्तं तत्त्वं माध्यमिका विदुः ।’¹ १) शून्यवाद के अनुसार विश्व शून्य का विवर्त है । शून्य ही पारमार्थिक सत्य है । २) विज्ञानवाद के अनुसार विश्व विज्ञान का विवर्त है । ३) शान्त ब्रह्मवाद के अनुसार विश्व ब्रह्म का विवर्त है । ४) व्याकरण-दर्शन के अनुसार विश्व शब्द का विवर्त है । ‘विवर्ततेऽर्थभावेन जगत्प्रक्रिया यथा ॥’ ५) आभासवाद के अनुसार विश्व केवल आभास है । ६) प्रतिबिम्बवाद के अनुसार विश्व केवल सत्य का प्रतिबिम्ब है । ७) स्वातन्त्र्यवाद के अनुसार विश्व स्पन्द की सिसृक्षा—इच्छा है । ‘इच्छामात्रं प्रभोः सृष्टिः’ (माण्डूक्यकारिका) ‘मुख्यो माध्यमिको विवर्तमखिलं शून्यस्य मेने जगत्’ (शून्यवाद) ८) भास्कराचार्य ने जगत् को ‘अविकृतपरिणाम’ कहा । ९) रामानुजाचार्य ने जगत् को ‘परिणाम’ कहा । १०) गौड़पादाचार्य (अजातिवाद) यदि जगत् हो तब उसके स्वरूप के विषय में कहा जाय कि वह सत् है कि असत्, विवर्त है कि परिणाम, आभास है कि प्रतिबिम्ब । यथार्थ तो यह है कि जगत् है ही नहीं । ११) शङ्कराचार्य = जगत् न सत् है न असत् न सत्य है न मिथ्या है प्रत्युत् यह है ‘अनिर्वचनीय’ ‘अनिर्वचनीयतावाद’ ॥ बौद्धों का शून्यवाद भी यही मानता है कि जगत, सत, असत्, सदसत् एवं सद- सत से भिन्न-इन समस्त कोटियों से परे है— ‘न सत् नासन् सदसन्न चाप्यनुभवात्मकम् । चतुष्कोटिविनिर्मुक्तं तत्त्वं माध्यमिका विदुः ॥’ १. माध्यमिककारिका ।
१८८ स्पन्दकारिका बौद्धों की शून्यवादी दृष्टि में शून्य ही पारमार्थिक सत्य है। शङ्कराचार्य की दृष्टि में—ब्रह्म ही पारमार्थिक सत्य है जगत् मिथ्या है— ‘ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या जीवब्रह्मैव नापरः ॥’ शङ्कराचार्य ने भी जगत् को व्यावहारिक सत्य कहा और शून्यवादियों ने भी जगत् को सांवृत्तिक सत्य कहा। शङ्कराचार्य ने भी जगत् को अनिर्वाच्य कहा। शून्यवादियों ने भी ‘शून्य’ को अनिर्वाच्य कहा। शून्यवादियों की दृष्टि में इस अनिर्वाच्य शून्यदशा को प्राप्त कर लेना ही परम उपलब्धि एवं चरम सिद्धि है। यही उनकी निर्वाण दशा है। सर्वशून्यता की अनुभूति ही निर्वाण है जिसमें सारी संवेदनायें शान्त हो जाती हैं—दीपक की लौ के शान्त हो जाने पर उदित प्रगढ़ प्रशान्त अवस्था की अनुभूति होना ही—‘निर्वाण’ है— दीपो यथा निर्वृतिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम् दिशं न काञ्चिद् विदिशं न काञ्चिद स्नेहक्षयात्केवलमेति शान्तिम्। योगी तथा निर्वृतिमभ्युपेतो नैवावनिं गच्छति नान्तरिक्षम् १ दिशं न काञ्चिद् विदिशं न काञ्चित्क्लेशक्षयात्केवलमेति शान्तिम् ॥ सर्वशून्यता (सर्वशून्यभाव) की अनुभूति ही शून्यवादी बौद्धों का ‘निर्वाण’ है। बुद्धघोष इसी सर्वशून्यता की अनुभूति (साक्षात्कार=) को ही निर्वाण एवं शान्ति दोनों कहते हैं। वे कहते हैं कि दीपक की आग्नेय शिखा के बुझ जाने पर वह बुझी हुई लौ न तो भूमि में जाती है। न आकाश में, न दिशा में जाती है और न तो विदिशा में प्रत्यूत् तेल के समाप्त हो जाने पर लौ केवल शान्त हो जाती है उसी प्रकार योगी की चेतना निर्वृत्ति में पहुँचने पर न भूमि में जाती है और न तो आकाश में, न तो किसी दिशा में जाती है और न विदिशा में प्रत्यूत् क्लेशों का क्षय हो जाने पर शान्ति में लयीभूत हो जाती है। अभावब्रह्मवाद को स्वीकार करने में सबसे बड़ी समस्या यह है कि यदि आत्मा स्वयं ‘अभाव’ है तो अभाव की दशा में किसी भी वेदक सत्ता (जानने एवं अनुभव करने वाली सत्ता) का भी अभाव रहने के कारण अभाव की दशा का अनुभव कौन करेगा? ‘अभाव’ यदि अनस्तित्त्व का पर्याय है तो अनस्तित्व से अस्तित्व, सत्ताशून्यता से सत्ता का उदय कैसे होगा? आत्मा स्वयं ही अभाव (अनस्तित्व) है तो अनस्तित्व (अभाव) की वह अनुभूति कैसे करेगी? जो है ही नहीं वह किसी के होने या न होने का अनुभव कैसे कर सकती है? अभाव से भाव रूप जगत् का आविर्भाव कैसे हो सकता है? क्या असत् से सत् का प्रादुर्भाव संभव है? इसीलिए कारिकाकार कहते हैं— ‘नाभावो भाव्यतामेति न च तत्रास्त्यमूढ़ता ॥’ (का० १२) १. सौन्दरनन्द (१६:२८-२९)।
प्रथमः निष्यन्दः १८९ 'नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ।' (गीता) अभावसमाधि—के उपदेष्टा कहते हैं कि 'मैं नहीं हूँ, मैं नहीं हूँ'—इस प्रकार की भावना का अभ्यास तब तक करणीय है जब तक कि आत्मा अभावस्वरूप न बन जाय । भावना का विषय तो वही संभाव्य है जिसकी सत्ता हो । यदि 'अभाव' (प्रत्येक भावात्मक सत्ता का अनस्तित्व = भाव का अभाव = अस्तित्व का अत्यन्ताभाव) अनस्तित्व का ही पर्याय है तो उसे भावना का विषय बनाया भी कैसे जा सकता है ? स्पन्दनिर्णयकार कहते हैं कि यदि 'अभाव' कोई भावात्मक सत्ता (जागतिक अस्तित्व व्यावहारिक सत्य) है तब तो वह अभाव का अभाव होने के कारण स्वयं भाव- सत्ता (अस्तित्व) बन जाएगा— 'भावनाया भाव्यवस्तु विषयत्वादभावस्य न किंचित्त्वाद् भाव्यमानतायां वा किंचित्त्वे सत्यभावत्वा भावात् ॥' ('स्पंदनिर्णयः' १/१२) अभावभावना के उपदेष्टा शास्ता एवं उपदिष्ट शिष्य दोनों को 'अभावब्रह्मवाद' में आस्था रखने पर—इस आत्मछल को स्वीकार करना पड़ता है कि 'मैं विद्यमान तो होने का अनुभव तो कर रहा हूँ किन्तु मैं हूँ नहीं'—हमारी सत्ता तो है किन्तु वह सत्ता- हीनता है । अभाववादी यह प्रतिपादित करते हैं कि 'अभावसमाधि' में सर्वाभावरूप विश्वाभाव ही भावना का विषय बनता है किन्तु यदि 'विश्वोच्छेद' (विश्वाभाव) का अर्थ प्रत्येक सत्ता का निषेध है तब तो अनुभविता का भी उच्छेद हो जाएगा और फिर इस 'विश्वोच्छेद' का अनुभव कौन करेगा ? यदि यह मान लिया जाय कि विश्वोच्छेद होने की दशा में भी अनुभविता का उच्छेद नहीं होगा तो विश्वोच्छेद की कल्पना वन्ध्यापुत्र के समान निरर्थक होगी— 'किञ्च भावकस्यापि यत्राभावः स विश्वोच्छेदः कथं भावनीयः भावकाभ्युपगमे तु न विश्वोच्छेदो भावकस्यावशिष्यमाणत्वात् ॥' 'मूढ़ता' एक विशेष प्रकार की जड़ता है जिसमें किसी प्रकार की संवेदना नहीं रहती । अभाव समाधि का योगी समाधिगत अनुभव को अपनी व्युत्थानावस्था में इस प्रकार अनुभव करता है—'मैं प्रगाढ़ मूढ़त्व की अवस्था में लीन था और मेरी वह अवस्था व्यतीत हो चुकी है ।' वह 'समाधि' समाधि कहने योग्य भी नहीं है जिसमें अपने ज्ञान क्रिया संवलित चैतन्य की अनुभूति भी न हो सके । उसे मद्यजन्य तामसिक अचेतना के सदृश एक मोहात्मक अवस्था माना जा सकता है । फिर प्रगाढ़ सुषुप्ति एवं समाधि में भेद क्या रह जाएगा ? बौद्धों के 'निर्वाण' की जिस अवस्था को 'शान्ति' कहा जाता है वह भी अन्ततः 'शून्य' ही तो है । 'निर्वाण' में यदि ज्ञान-क्रिया संवेदना (ज्ञातृत्व एवं कर्तृत्व का संवेदन) का अभाव है तो उसे शैव स्पन्दशास्त्र स्वीकार नहीं करता क्योंकि शैव दार्शनिक
१९० स्पन्दकारिका इस ज्ञातृत्व-कृतित्व की संवेदना से शून्य अवस्था को मात्र जड़ता ही मानते हैं। शैव दर्शन में निर्वाण या मोक्ष स्वरूप प्रथन मात्र है अन्य कुछ नहीं—'मोक्षो हि नाम नैवान्यः स्वरूपप्रथनं हि सः । स्वरूपं चात्मनः संवित्नान्यत्' आत्मा अख्याति की संकुचित सीमाओं को लाँघकर अनन्त ज्ञातृत्व एवं असीम कर्तृत्व की अनुभूति करने लगता है और यही है उसका मोक्ष। मुक्तजीव जड़ नहीं होता प्रत्युत् पूर्णचेतन होता है। वह 'अभाव' 'शून्यता' एवं 'जड़ता' का अनुभव नहीं करता। शून्यवाद के अनुसार प्रत्येक ज्ञान, ज्ञाता एवं ज्ञेय (त्रिपुटी) निःस्वभाव एवं शून्य है। वे ज्ञाता-कर्ता संवित् को भी निःस्वभाव मानते हैं। इनके मत में संवित् की शून्यता ही निर्वाण है। स्पन्द, प्रत्यभिज्ञा एवं क्रम दर्शन मानता है कि संवित् पूर्णज्ञान एवं पूर्ण कर्तृत्वस्वरूप 'स्पन्द' है। 'स्पन्द' से ही समस्त भावों का अवभासन और स्थिति हुआ करती है। इस विश्वात्मक स्पंद को ही अस्वीकार कर दिया जाय तो समस्त विश्व संज्ञाहीन हो जाएगा। शून्यवादियों के शून्य का कोई सुस्पष्ट स्वरूप भी नहीं है। प्रश्न उठता है कि आत्मा का कोई अस्तित्व नहीं है तो 'निर्वाण' किसका है? जड़ पदार्थों का निर्वाण तो संभव नहीं है। यदि वेदक आत्मा का ही अस्तित्व नहीं है तो क्लेश किसको होगा? और उसके विनाश का प्रयास किसके लिए किया जाएगा? शून्यवादियों का स्वपक्ष में तर्क—शून्यवादी माध्यमिक आचार्यों का कथन है कि आचार्य नागार्जुन ने जिस शून्य का प्रतिपादन किया है वह मात्र निषेधपरक ही नहीं है— 'सर्वालम्बनधर्मैश्च सर्वतत्त्वैरशेषतः । सर्वक्लेशाशयैः शून्यं न शून्यं परमार्थतः ॥' —इस श्लोक के अनुसार (१) 'शून्य' सर्वाभावस्वरूप नहीं है। (२) 'शून्य' ऐसा निरपेक्ष परतत्त्व है जिसमें सम्पूर्णतत्त्वों एवं समस्त क्लेशात्मक वासनाओं की शून्यता स्थित है। यह सर्वाभाव स्वरूप नहीं है। 'शून्य' अवाङ्मनस- गोचर, चतुष्कोटिविनिर्मुक्त एवं मन-वाणी से अतीत है। 'शून्य' ग्राह्य-ग्राहक भावों से शून्य है। विज्ञानवादी कहते हैं समस्त प्रपंच विज्ञप्ति का विकास मात्र है। यह ज्ञान चेतन क्रिया के साथ सम्बद्ध होने के कारण 'चित्त' कहा जाता है। यही 'पारमार्थिक सत्य' है। 'शून्य' एवं 'विज्ञान' मूलतः अभिन्न हैं। शैव ज्ञान मात्र चित्त नहीं है। अन्तःकरण स्वयं जड़ है। ज्ञान तो चैतन्य है फिर वह जड़ चित्त का स्वरूप कैसे हो सकता है? शैवशास्त्र में शून्य की कल्पना—शैव दार्शनिक 'शून्य' के प्रति अपनी पृथक् दृष्टि रखते हैं। उनके मतानुसार 'शून्य' चिदानन्द घन (स्पन्दात्मक) परमशिव है। वह 'शून्य' क्यों है क्योंकि वह विश्वातीत है—मायोपरि है—परिणामादिक से अप्रभावित है—सर्वाभाव का प्रतीक नहीं है—ज्ञान-क्रिया का अभिव्यञ्जक है। शैवदार्शनिक मानते हैं कि शून्य, अभाव, समाधि एवं व्युत्थान आदि सभी में वेदक आत्मा की ज्ञान क्रिया संवलित स्पंदता सभी स्थितियों में अपरिवर्तित है।
प्रथमः निष्यन्दः १९१ सारांश यह है कि स्पन्दमान आत्मसत्ता की प्रत्यभिज्ञा की समस्त अवस्थायें भावात्मक हैं—सर्वाभाव, सर्व शून्य एवं मूढ़ता की अवस्था नहीं है । शैव शास्त्रों में 'शून्य' का अर्थ कुछ अन्य है— १) शून्यता शून्यभूतोऽसौ शून्याकारः पुमान् भवेत् ॥१ (४०) २) अर्धेन्दुबिन्दुनादान्त शून्योच्चाराद भवेच्छिवः ॥२ (४२) ३) विश्वमेतन्महादेवि! शून्यभूतं विचिन्तयेत् ॥ (५७) ४) ज्ञानायत्ता बहिर्भावा अतः शून्यमिदं जगत् ।३ ५) प्रणवादिसमुच्चारात् प्लुतान्ते शून्यभावनात् । शून्यया पराया शक्त्या शून्यतामेति भैरवि ॥४ (३९) अभावसमाधि = (१) साधारण पशुवर्ग में प्राप्त । (२) मोहात्मक सुषुप्ति, प्रगाढ़ निद्रा जैसी कृत्रिम एवं जड़ता की अवस्था । (३) यह अभाव समाधि पशुवर्ग की सुषुप्ति के समान कृत्रिम है और स्मर्यमाण नहीं बन पाता । मैं नहीं हूँ—मैं नहीं हूँ—इस प्रकार अभावात्मक भावना की निरन्तर कल्पना, ध्यान एवं अभ्यास करने पर यदि साधक को ऐसी भूमिका का साक्षात्कार भी हो जाय तो भी वह भूमिका कृत्रिम एवं अनित्य होगी । आत्मा का यथार्थ स्वरूप तो चिद्रूप है और उसकी सत्ता तो त्रिकालाबाधित एवं नित्य है । भट्टकल्लट 'स्पन्दसर्वस्व' में कहते हैं—'अभावभावलब्ध भूमिकस्यापि कृत्रिमा अनित्या सा अवस्था, यथा, सौषुप्ते पदे, यस्मात् चिद्रूपत्वं तु आत्मनः स्वरूपं नित्य सन्निहितं तदेव गुरूपदेशेन नित्यमेवानुशीलनीयम् ॥'५ (अ) पशुवर्ग की सुषुप्ति अवस्था—'शिवसूत्र' में इसकी व्याख्या इस प्रकार की गई है—'शिवसूत्र' (१) 'अविवेको माया सौषुप्तम् । (शिवसूत्र १.१०)' (२) 'यत्रार्थस्मरणे न स्तस्तत्सौषुप्तमुदाहृतम्' (शिवसूत्रः १.१०) (३) 'ज्ञानज्ञेयस्वरूपायाः शक्तेरनुदयो यदा । चिद्रूपस्याविवेकः स्यादसावेवाविमर्शतः । सैव मायावृत्तिजालपोषकत्वात्प्रकीर्तिता ॥ सुषुप्तता ॥ —शिवसूत्रवार्तिक (४) 'यस्तु अविवेकोविवेचनाभावोऽख्यातिः एतदेव मायारूपं मोहमयं सौषुप्तम् ॥ (शिवसूत्रविमर्शिनी १.१०) ।' पशुप्रमाता में सुषुप्ति एवं प्रगाढ़ निद्रा (ज्ञानाभाव) की अवस्था है । इसमें जागृति, स्वप्न, तुरीय, तुरीयातीत आदि किसी भी प्रकार का ज्ञान नहीं रहता किन्तु चेतना रहती है तभी वह सोने के बाद कहता है कि 'मैं खूब गहरी नींद सोया ।' 'मैं सुखपूर्वक सोया' आदि । इसमें तमोगुण के आवरण के कारण उत्पन्न मोह की सान्द्रता के कारण वेद्य प्रमेयों का ज्ञान या स्मृति नहीं रहती— १-४. विज्ञानभैरव (१७) । ५. भट्टकल्लट : 'स्पन्दसर्वस्व' ।
१९२ स्पन्दकारिका 'यथार्थस्वरूपायाः स्तस्तत्सौषुप्तमुदाहृतम् ॥' (१.१०) अविवेक (ज्ञान एवं ज्ञेय रूप चित् शक्ति पर चढ़ा हुआ अविद्यावरण) के कारण प्रमाता की अपनी चिद्रूपता एवं बाह्य रूप में अनन्तावभासन की क्षमता सुषुप्ति में रुक जाती है । सुषुप्ति काल में (ज्ञान-ज्ञेय पर मायीय आवरण पड़ा रहने के कारण) प्राणी की बाह्यार्थों की ओर उन्मुखता, ऐन्द्रिय बोध एवं उनकी स्मृति कुछ भी संभव नहीं रहती । सुषुप्तिगत व्यक्ति की समस्त चेतनाशक्ति, शरीर, प्राण, बुद्धि, इन्द्रिय आदि से सिमट कर पुर्यष्टक में लीन हो जाती है । पुर्यष्टक में सुषुप्तिकालीन संस्कारों के कारण व्यक्ति जागृति की अवस्था में आने पर सुषुप्ति के अनुभव 'मैं सुख से सोया' 'मुझे कुछ भी ज्ञान नहीं है' आदि आदि होते हैं । (आ) योगियों की दृष्टि में सुषुप्ति की अवस्था—योगियों की सुषुप्ति पशुप्रमाताओं की सुषुप्ति के समतुल्य नहीं है । गीताकार कहते हैं— 'या निशा सर्वभूतानां तस्यां जागर्तिसंयमी । यस्यां जागर्ति भूतानि सा निशा पश्यतो मुनेः ॥' शङ्कराचार्य के लिए निद्रा और समाधि दोनों में भेद नहीं है—वे कहते हैं—'निद्रा समाधिस्थितिः' योगियों के लिए निद्रा समाधि की स्थिति होती है । समाधि की अवस्था में बाह्य पदार्थों की ओर उन्मुखता न रहने के कारण सारे प्रमेय एवं सब कुछ स्वस्वरूप में विश्रान्त रहता है अतः आत्मा तब तक विशुद्ध चिन्मात्र रूप में अवस्थित रहती है । समाधि निष्ठ योगी में ग्राहकता एवं ग्राह्यता का भेद नहीं रहता । उसके समस्त भाव आत्मस्वरूप में विश्रान्त या अवभासित रहते हैं । योगी समाधि की दशा में ज्ञान-क्रिया- पूर्ण स्पन्दन की पूर्ण चेतना रखता है । योगी की सुषुप्ति पशुओं की सुषुप्ति के समान मूढ़ता की दशा नहीं है । यहाँ वेदक योगी किसी भी अभाव या शून्यता को अनुभव नहीं करता । समाधि में अनुभूत आत्मस्वरूप की सत्ता कोई प्रातिभासिक एवं व्यावहारिक नहीं प्रत्युत् शाश्वतिक एवं पारमार्थिक होती है । 'अभाव समाधि' एवं 'शून्य समाधि' दोनों जड़ हैं । आत्मानुभूति सतत स्फुरण- समन्विता होने के कारण नित्यात्मिका होती है । किन्तु पशुभाव में होने वाली अनुभूति अनित्य होती है । 'मैं नहीं हूँ' यह अभावात्मक अनुभूति भी किसी भावसत्ता (वेदक) पर ही आधृत है । यदि भाव (वेदक) की ही सत्ता न रहे तो अभाव ('मैं नहीं हूँ') की स्मृति किसे होगी? 'शिवसूत्र' (१.१०) में इन्हीं दृष्टियों से योगियों की सुषुप्ति एवं उनकी समाधि को समतुल्य कहा गया है— ग्राह्य-ग्राहकभेदासञ्चेतनरूपश्च समाधिः सौषुप्तं, इत्यप्यनया वचोयुक्त्या दर्शितम् ॥'१ १. शिवसूत्रविमर्शिनी (१.१०) ।
प्रथमः निष्यन्दः १९३ स्पन्दतत्त्व की दो अवस्थायें— अवस्थायुगलं चाऽत्र कार्यकर्तृत्वशब्दितम् । कार्यता क्षयिणी तत्र कर्तृत्वं पुनरक्षयम् ॥ १४ ॥ (यहाँ पर) अवस्थाद्वय को ‘कार्य’ एवं ‘कर्ता’ कहा गया है (इसमें) कार्यता तो नश्वर है किन्तु वहीं ‘कर्तृत्व’ अविनश्वर है ॥ १४ ॥ १
- सरोजिनी * ‘स्पंद’ की दो अवस्थायें हैं—(१) कर्तृत्व (Subjectivity) (२) कार्यत्व (Objectivity) । कार्यता = किसी कार्य का किया जाना । कार्य-निष्पादन ।। क्रिया करने का भावः (Objectivity) । ‘कर्तृत्व’ = कर्ता की क्रिया शक्ति, सिसृक्षा-बल, कर्ता की सृजन- शक्ति (Subjectivity) । ‘स्पंद’ की दो अवस्थायें हैं । ‘स्पंद’ क्या है? स्वयं परमतत्त्व ही ‘स्पन्द’ है । वह अपने को ‘शब्द’ के द्वारा अभिव्यक्त करता है । ‘स्पन्द’ वाच्य है और ‘शब्द’ वाचक है । ‘स्पन्द’ का अर्थ है किंचित् हिलना ।। निस्तरंग परमात्मा में जो एक साथ सर्वरूप से उन्मुख होने की क्षमता है—वहीं ‘स्पन्द’ है—किंचित् चलन है । यह किंचित् चलन भी परमात्मा ही है । इस स्पन्द तत्त्व में दो अवस्थायें विद्यमान है—(१) कार्य-कर्ता (२) भोग्य-भोक्ता (३) दृश्य-द्रष्टा । इन्हें ‘वेद्य’ एवं ‘वेदक’ भी कहते हैं । इनके अध्यास से जो कार्यता है वह क्षयिष्णु है और उत्पत्ति-विनाश युक्त है । जो शुद्धकर्ता, भोक्ता एवं द्रष्टा (आवेदक) है वह अक्षय है । वह निर्बाध, निरवधि एवं चित्स्वरूप है ।२ स्पन्द तत्त्व की अवस्थायें—कार्य, भोग्य, दृश्य, वेद्य, स्मर्तव्य, ज्ञेय, कर्ता, भोक्ता, द्रष्टा, वेदक, स्मर्ता एवं ज्ञाता हैं । अत्र—इस प्रतिपादित आत्माख्य पर तत्त्व में । अवस्थायुगलं = दो अवस्थायें—(१) हेय (२) उपादेय । वैसे तो ये अवस्थायें अनन्त है फिर भी विश्ववैचित्र्य के कारण द्विविध हैं । उनमें से एक परमार्थस्वरूप परमेश्वर या आत्मा है जो कि निरुपम, निष्प्रतीघात, निरूपादान निजैश्वर्य शक्ति बल से दो रूपों में अपने को अवभासित करके क्रीड़ा करता है—इसी रहस्य को अभिव्यंजित करने हेतु कारिकाकार ने अवस्थाद्वय का उल्लेख किया है । ये अवस्थायें हैं—(१) कार्य (२) कर्ता । कर्तृत्व, भोक्तृत्व एवं वेदकत्व द्वारा तो जिस चेतनभाव को सूचित किया गया है १. ‘The pair of states is here styled—objectivity and subjectivity. The objectivity is perishable and the subjectivity is indestructi- ble’—स्पन्दनिर्णय । २. स्पन्दप्रदीपिका । स्पं० १३
१९४ स्पन्दकारिका वह एक ऐसी अवस्था है जो स्वतन्त्र है तथा द्वितीय अवस्था इसके विपरीत कार्यरूपा, भोग्या, वेद्या, जड़ात्मिका एवं परतन्त्रात्मिका है । 'शब्दितं' = 'शब्दितं' कहकर यह सूचित किया गया है कि इन दोनों अवस्थाओं को भिन्न-भिन्न रूप में समझने के लिए शब्द तो दे दिया गया है किन्तु उनमें वास्तविक भेद नहीं है । यह कार्यरूपा अवस्था प्रकाशमानता से अपनी सत्ता प्राप्त करता है और प्रकाशमान है परमात्मा । चूँकि 'कार्य' किसी कर्ता पर निर्भर है अतः कार्य एवं कर्ता तत्त्वतः भिन्न नहीं है । प्रकाशमान कार्य, प्रकाशैकस्वभाव से अभिन्न हैं । कर्तृरूपावस्था नित्या है, नित्योदित है, सर्वावस्थाव्यापक और अविनाशी है । 'कार्य' उदय-व्यय के सम्बन्ध के कारण नश्वर है ।¹ नित्योदित होने के कारण सदा प्रकाशमान होने पर भी वह तत्त्व अप्रत्यभिज्ञायमान होने के कारण बन्धन का कारण है । अतएव लब्धोपदेश द्वारा सभी अवस्थाओं में वेद्य एवं वेदक रूप दो तत्त्वों से संगृहीत विश्व प्रपञ्च के भेदात्मक होने के कारण वेदकांश को 'मैं हूँ' अर्थात् मैं समस्त वेद्यों के स्वरूप से परे हूँ इस प्रकार परामर्श करना चाहिए । इसी तथ्य का उपदेश देने हेतु अपनी माया से उद्भासित द्वैतात्मक रूप का प्रतिपादन करने हेतु ग्रन्थकार चौदहवीं कारिका कह रहा है । भट्टकल्लट (स्पन्दकारिकावृत्ति) में इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं—(१) स्पन्दात्मक आत्मतत्त्व की जो दो अवस्थायें होती हैं उनके नाम हैं— 'कार्यता' और 'कर्तृत्व' । इसमें एक भोग्य है दूसरा भोक्ता है । (२) 'भोग्य' उत्पन्न एवं नष्ट दोनों होता है । (३) 'भोक्ता' चिद्रूप होने के कारण न तो उत्पन्न होता है और न तो नष्ट होता है प्रत्युत वह नित्य है । अभिनवगुप्त कहते हैं कि परतत्त्व का स्वातन्त्र्य सदैव निरावरण होता है । परतत्त्व 'वेदक' एवं 'वेद्य' दोनों स्वरूपों में अवभासमान रहता है । यह तत्त्व एक साथ ही 'कर्ता' एवं 'कार्य' दोनों की भूमिकायें निभाता है । कर्तृता की अवस्था— अपरिणामी, अक्षर, अविचल, नित्य कार्यता की अवस्था—परिणमनशील, क्षर, चल, अनित्य एवं नश्वर ।। 'स्पन्द' के जो दो रूप हैं—उनके पक्ष भी दो हैं— १) कर्तृत्व पक्ष २) कार्यत्व पक्ष (वेदक पक्ष) (वेद्य पक्ष) (शक्ति का वास्तविक अनश्वर रूप) (देश, काल के प्रभाव से प्रभावित होने के कारण उदयास्तमय, नश्वर) अन्ततः कार्यता उपसंहृत होकर कर्तृत्व अंश में विश्रान्ति लेती है और निर्मल ज्ञानक्रियात्मक चिद्रूप में अवभासमान रहती है । समाधि की अवस्था में इस कार्यतापक्ष का लोप हो जाता है । १. स्पन्दकारिकाविवृति (रामकण्ठाचार्य) ।
प्रथमः निष्यन्दः १९५ स्पन्द की अवस्थायें— स्पन्द विज्ञान की दृष्टि में स्पन्द की दो अवस्थायें— इस स्पन्द दर्शन में 'स्पन्द तत्त्व' की दो अवस्थाएं मानी गई हैं । स्पन्द की अवस्थायें—(१) 'कार्यता' (२) 'कर्तृता' । कार्यता क्षणभंगुर है, नश्वर है । कर्तृता अविनश्वर है, स्थायी है और नित्य है। आचार्य भट्टकल्लट 'स्पन्दसर्वस्व' में कहते हैं कि— (क) स्पन्दात्मक आत्मतत्त्व की निम्न अवस्थायें हैं— (१) 'कार्यता' (२) 'कर्तृता' (१) भोग्यता (२) 'भोक्ता' (नश्वर) (अनश्वर) (अचिद्रूप) (चिद्रूप) (वेद्य) (वेदक) 'अवस्था युगलम्' अवस्था द्वयमेव कार्यकर्तृत्वसंज्ञं भोग्यभोक्तृभेदभिन्नम्' तत्र यो भोग्यरूपो भेदः स उत्पद्यते नश्यति च, भोक्तृभेदस्तु चिद्रूपः पुनर्न जायते न कदाचिद् विनश्यति तेन नित्यः ॥१ स्पन्दात्मक आत्मसत्ता के जो दो रूप हैं उनमें—(क) वेदक रूप (ख) वेद्य रूप; (क) कर्ता (ख) कार्य; (क) भोक्ता (ख) भोग्य । इन दो रूपों में आत्मा का 'क' रूप—वेदक, कर्ता, भोक्ता ही नित्य है—'ख' रूप नश्वर है । अहंविमर्शात्मक स्पन्द तत्त्व पूर्ण स्वतन्त्र है। इसमें दो अवस्थायें अखण्ड रूप में निरन्तर स्पन्दायमान हैं जो निम्न हैं— (क) 'सामान्य अवस्था' । (ख) 'विशेष अवस्था' । सामान्यावस्था—समस्त उपरागों से शून्य, विशुद्ध, चिद्रूप । यही है कर्तृत्व की अवस्था । इसमें समस्त बाह्य प्रमेय समूह, विभाग शून्य, 'अहं विमर्श' के रूप में स्थित हैं । विशेष अवस्था उस दशा का नाम है जिसमें मूल चिद्रूपता, स्वोत्पन्न अज्ञान के द्वारा, स्वस्वरूप को आच्छादित करके देह, प्राण, बुद्धि, ज्ञानेन्द्रियाँ, कर्मेन्द्रियाँ या घट पट आदि अनन्त जड़ वेद्य वस्तुओं के रूप में अवभासित होती है। यही है कार्यता, भोग्यता, वेद्यता एवं प्रमेयता की अवस्था ॥ आचार्य अनिभवगुप्तपाद कहते हैं कि—मूल तत्त्व अपनी 'स्वातन्त्र्य शक्ति' की सामर्थ्य से वेदक एवं वेद्य दोनों रूपों में अवभासित होता है तत्त्व एक साथ ही कर्ता- कार्य, अपरिणामी-परिणामी, अचल-चल, अनश्वर-नश्वर, भोक्ता-भोग्य आदि सभी है— १. भट्टकल्लटः 'स्पन्दसर्वस्व' ।
१९६ स्पन्दकारिका 'निरावरणमाभाति भात्यावृतनिजात्मकः ॥' (तं० १.९३) समाधि की अवस्था—इसमें कार्यता विलीन हो जाती है। कार्यता ज्ञानक्रियात्मक चिद्रूप में अवभासमान रहती है। कर्तृत्वांश कभी परिवर्तित नहीं होता। स्पन्दात्मक आत्मतत्त्व की अवस्थायें— स्पन्दतत्त्व की दो अवस्थायें हैं—(१) 'वेदक' (२) 'वेद्य' (या 'कर्ता' एवं 'कार्य')। इन्हें ही 'भोक्ता' एवं 'भोग्य' भी कहते हैं। इनके विविध अभिधान हैं— (१) वेदक, कर्ता, भोक्ता, अक्षय (२) वेद्य, कार्य, भोग्य, क्षयिष्णु। 'अवस्थायुगलं चात्र कार्यकार्तृत्वशब्दितम्। कार्यता क्षयिणी तत्र कर्तृत्वं पुनरक्षयम् ॥' 'स्पन्दतत्त्व' की युगल अवस्थायें—कर्ता एवं कार्य—भट्टकल्लट के शब्दों में—'अवस्थायुगलम्' अवस्थाद्वयमेव कार्यकार्तृत्वसंज्ञं भोग्यभोक्तृभेदभिन्नम्, तत्र यो भोग्यरूपो भेदः स उत्पद्यते नश्यति च, भोक्तृभेदस्तु चिद्रूपः पुनर्न जायते न कदाचित् विनश्यति तेन नित्यः ॥१ १. स्पन्दतत्त्व की कर्तृतावस्था या कर्ताभाव (कर्तास्वरूप) अखण्ड एवं अक्षर है। २. स्पन्दतत्त्व की कार्यावस्था या कार्य भाव (कार्यस्वरूप) क्षयिष्णु है। कारिकाकार ने इन अवस्थाओं को (१) 'कर्ता' एवं (२) 'कार्य' तथा भट्टकल्लट ने (१) भोक्ता (२) 'भोग्य' शब्दों से अभिहित किया है। भोग्य—उत्पन्न, परिवर्तनशील, कार्य एवं नश्वर है। भोक्ता = अनुत्पन्न, अपरिवर्तनशील, कारण, अनश्वर, चिद्रूप। इस अहं विमर्शात्मकस्पन्दतत्त्व की अन्य अवस्थाओं का विवेचन किया गया है जो कि निम्नांकित हैं— (१) 'सामान्यावस्था' (२) 'विशेषावस्था'। (क) स्पन्दतत्त्व की सामान्यावस्था—वह अवस्था जो समष्टिगत, निर्विकल्प, विशिष्ट लक्षणों, व्यावर्तक लक्ष्मणरेखाओं एवं भेदक रेखाओं से शून्य तथा विशिष्ट धर्मों से विमुक्त। यह प्रत्येक अराग से शून्य एवं विशुद्ध चिद्रूपता की सामान्यावस्था है। इसमें प्रमेयवर्ग के विभाजन नहीं हैं और यह विभागहीन अहंविमर्शात्मक सूक्ष्मावस्था है। इसे ही अवस्थायुगलं चात्रकार्यकर्तृत्वशब्दितम्' कारिका में 'कर्तृत्व' या कर्ता कहा गया है। कर्तृत्वांश में किसी भी अवस्था में कोई भी परिवर्तन संभव नहीं है। वेदकावस्था शाश्वत, अक्षुण्ण एवं नित्य तथा शक्ति का यथार्थ स्वरूप है। (ख) स्पन्दतत्त्व की विशेषावस्था—यह कार्यता की अवस्था है। इसे ही सूत्रकार ने 'कार्य' एवं वृत्तिकार भट्टकल्लट ने 'भोग्य' शब्द से अभिहित किया है। प्रगाढ़ १. स्पन्दसर्वस्व।
प्रथमः निष्यन्दः १९७ ध्यान या समाधि की अवस्था में इस कार्यता वाले पक्ष का उपसंहार हो जाता है । यह संहृत होकर कर्तृता में विश्रान्तभाव में अवस्थित हो जाती है । यह समाधि की दशा में अपने निर्मल, ज्ञान क्रियात्मक, चिद्रूप में अवभासित होती है । इस प्रकार समाधि की अवस्था में स्पन्दात्मिका कर्तृता (वेदकता) (बाह्य प्रमेय समूह की ओर उन्मुखता छोड़कर) अपने कार्यांश को अपने में संलीन करके निर्मल चिद्रूप (चिन्मात्र) स्वरूप में अवस्थित हो जाती है । कार्यता अंश के संलीन, विश्रान्त या लयीभूत हो जाने की स्थिति में एक प्रशान्त समाधि की अवस्था की अनुभूति होती है । इसी तथ्य को अगली कारिका में इस तरह कहा गया है— 'कार्योन्मुखः प्रयत्नो यः केवलं सोऽत्र लुप्यते । तस्मिंल्लुप्ते विलुप्तोऽस्मीत्यबुधः प्रतिपद्यते ।।' (१५) स्पन्दतत्त्व की यह विशेषावस्था वह स्थिति है जिसमें कि नित्य चिद्रूप स्पन्दतत्त्व स्वस्वरूप को आच्छादित करके, अपनी अविद्या या माया के द्वारा अस्वतन्त्र होकर (मित होकर) घट, पट, प्राण, चित्त, देह, इन्द्रियाँ, अन्तःकरण, एवं जड़ वेद्य पदार्थों के रूप में अवभासित होने लगता है । यही कार्यता की अवस्था है । जड़ समाधि में अवस्थित अबुध योगी की अभावात्मक मिथ्यानुभूति— कार्योन्मुखः प्रयत्नः यः केवलं सोऽत्र लुप्यते । तस्मिँल्लुप्ते विलुप्तोऽस्मीत्यबुधः प्रतिबुध्यते ॥ १५ ॥ केवल वह अध्यवसाय जो कि कार्य को निष्पादित करने की ओर प्रवृत्त है यहाँ वही (मात्र) लुप्त हो जाता है । उसके लोप हो जाने पर एक मूर्ख व्यक्ति ऐसा समझता है कि 'मैं' (ही) विलुप्त हो गया हूँ ॥ १५ ॥
- सरोजिनी * कार्योन्मुखः = कार्य की ओर उन्मुख । कार्य-प्रवृत्त । कार्याभिप्रेरित । कार्य = बाह्यार्थ कार्यवर्ग । लुप्यते = (न लक्ष्यते): दिखाई नहीं पड़ता । प्रयत्न = अध्यवसाय । व्यापार । प्रयास । बाह्य करण व्यापार रूप कार्य । यः = जो । केवलं = मात्र । सोऽत्र = वह यहाँ । लुप्यते = लुप्त हो जाता है । तस्मिंल्लुप्ते = उसके लुप्त हो जाने पर विलुप्तोस्मि = मैं ही लुप्त हो गया हूँ । मैं नष्ट हो गया हूँ । अबुधः = अज्ञानी । कार्योन्मुख = कार्यसम्पदनाभिमुख ।१ प्रतिबुध्यते = समझता है । लुप्यते—इन्द्रियों के स्थगित हो जाने से व्यापार सामर्थ्य रुक जाने से लुप्त हो जाता है । यह बाह्यार्थ कार्यवर्ग जब क्षीण होने लगता है तब कार्य-सम्पादनानुकूल बाह्येन्द्रियों का व्यापार रूप प्रयत्न लुप्त हो जाता है । वह सिकुड़कर आत्मा में लीन हो १. स्पन्दप्रदीपिका ।
१९८ स्पन्दकारिका जाता है अतः दृष्टिगोचर नहीं होता । इन्द्रियाँ यदि स्थगित हो गईं तो प्रयत्न की शक्ति कहाँ रही? लुप्त तो प्रयत्न होता है । किन्तु अज्ञानी यह मानता है कि मैं ही लुप्त हो गया—मैं ही नष्ट हो गया ।१ वस्तुतः चिद्रूप का विनाश कभी होता ही नहीं । कहा भी गया है—'शरीर का विनाश हो जाने पर भी विज्ञप्ति का नाश कभी नहीं होता । सूर्यकान्त मणि का अभाव हो जाने पर भी सूर्य की कोई हाँनि नहीं होती । प्रतिबुध्यते 'स्पन्दप्रदीपिका' में इसका पाठ 'प्रतिपद्यते' है । प्रतिपद्यते = जानता है । चिद्रूप का विनाश तो कभी होता नहीं किन्तु ऐसा समझता अवश्य है— 'विज्ञप्तेर्न विनाशोऽस्ति विनष्टेऽपि शरीरके । अभावे सूर्यकान्तस्य नैवास्ति सवितुः क्षतिः ।।'२ लुप्यते = लुप्त हो जाता है । क्यों लुप्त हो जाता है? स्वात्मन्यास्ते—वह आत्मा में स्थित हो जाता है अतः बाह्येन्द्रियाँ उसे देख नहीं पातीं अतः लगता है कि वे सदैव के लिए नष्ट हो गई हैं । पूर्वपक्ष—(Objection) अभाव (Non-existence) या शून्य पर ध्यान देने के समय एवं प्रगाढ़ निद्रा के समय हम आत्मा को 'कर्ता' के रूप में अनुभव नहीं करते क्योंकि उस स्थिति में उसका कर्तृत्व रहता ही नहीं ।३ उत्तर पक्ष—हाँ यह सत्य है कि इन्द्रियाभिप्रेरित कार्योन्मुख प्रयास उपर्युक्त स्थिति में समाप्त हो जाते हैं क्योंकि उस समय ज्ञेय के नाश (Objective-destruction) के कारण कर्तृत्व संभव ही नहीं रहता । इस समय विषय और विषयी में (प्रमेय-प्रमाता, कर्ता-कार्य, ज्ञाता-ज्ञेय) में भिन्नता नहीं रह जाती । किन्तु इस समय (कार्योन्मुखी प्रवाह बन्द होने के समय) अज्ञानी व्यक्ति यह सोचता है कि 'मैं नष्ट हो गया' क्योंकि उसका स्वस्वभाव आच्छादित रहता है । विनाश कभी आन्तर स्वस्वभाव का हो ही नहीं सकता क्योंकि वह तो प्रकाशस्वरूप है, चेतना का निलय है और सर्वज्ञता का धाम है । सर्वज्ञातृत्व (Omniscience) ही पूर्ण कर्तृत्व है । क्योंकि अन्य कोई तो आन्तर प्रकृति के नाश का ज्ञाता हो ही नहीं सकता । किन्तु यदि अन्य ज्ञाता की कल्पना भी कर ली जाय तो वह भी अपनी आन्तर चेतना का प्रतिनिधि होगा । यदि वह ज्ञाता अस्तित्व में है ही नहीं फिर तुम कैसे कह सकते हो कि विनाश की अवस्था होती है ?४ प्रतिपक्ष—चलिये मैंने मान लिया कि कोई भी व्यक्ति आन्तर स्वभाव के नाश को नहीं देख पाता-उसका कोई ज्ञाता नहीं है—लेकिन उसकी जो प्रकाशमयी प्रकृति है वह तो देखती है ।५ ग्रन्थकार—फिर तुम अभाव या शून्य (Non existence on vacuum) को उसके आन्तर भाव से अभिन्न कैसे कह सकते हो? यह सत्य है कि जिस प्रकार किसी घड़े का न होना इस बात से प्रमाणित एवं निर्णीत किया जाता है कि जिस स्थान पर घड़ा था वहाँ है भी या नहीं । उसी प्रकार आत्मा के अभाव को भी इसी तरह निर्णीत १-३. स्पन्दप्रदीपिका । ४-५. स्पन्दनिर्णय ।
प्रथमः निष्यन्दः १९९ किया जा सकता है कि कोई भी ज्ञान या अनुभव क्या आत्मा (या अपनेपन) के अभाव में संभव है यदि संभव है तो आत्मा का अभाव माना जा सकता है अन्यथा नहीं । लेकिन इस उदाहरण में भी 'ज्ञाता' का अस्तित्व आवश्यक है। अतः आत्मा के अभाव के होते हुए भी उसके अभाव का ज्ञान किसे होगा ?१ यदि पदार्थमयं जगत् (Objective world) के प्रति कार्योन्मुख प्रयत्न का लोप होने पर आभ्यन्तरिक स्वस्वभाव (Inward nature) का भी लोप मान लिया जाए तो आगामी समय में अन्य प्रयत्न का अवबोध या ज्ञान (Perception) संभव नहीं होगा और परिणामस्वरूप अन्य प्रयत्न का भी ज्ञानाभाव हो जाएगा। इसके अतिरिक्त यह भी कि, कोई भी मूर्ख व्यक्ति भला स्वप्न-शून्य प्रगाढ़ निद्रा में (सुषुप्ति के समय) बहिर्गामिनी शक्ति के अबोध (Non perception) द्वारा अन्तर्मुखी अनुभूति के लुप्त होने की शङ्का, यह जानते हुए भी कि एक चीज को लुप्त होना किसी दूसरी वस्तु को प्रभावित नहीं कर सकता, कैसे कर सकता है?२ ज्ञाता की लुप्तता (Disappearance) संभव नहीं है। इस पादार्थिक जगत् के प्रति उन्मुख कार्यों की अनुपस्थिति या अनुपस्थिति की अभिव्यक्ति के द्वारा, प्रकाश से अभिन्न एवं अन्तरोन्मुखी ज्ञाता की लुप्तता संभव नहीं है । अन्तर्मुखी स्वभाव (Inward faced nature), जो कि सर्वज्ञता के गुण के मूल स्थान का निर्धारण करता है,—अभाव (अनुपस्थिति) की दशा को भी जानता है क्योंकि अन्यथा वह दशा अस्तित्व में रह ही नहीं सकती। 'अन्तर्मुखी' शब्द बाह्यपदार्थता (Objectivity) को आत्म चैतन्य (Subjectivity) से पृथक् करता है। दोनों परस्पर विरोधी भाव है। 'अन्तर्मुखी' का अर्थ है—वह जिसमें पराहंता (Supreme egaity) अधिपत्य रखती हे। ज्ञाता ही सत्य है, ज्ञेय तो उसका विषय है।३ इसीलिए कहा गया है— न तु योऽन्तर्मुखोभावः सर्वज्ञत्व गुणास्पदम् । तस्य लोपः कदाचित्स्यादन्यस्यानुपलंभनात् ॥ कार्ये = निर्मेय वेद्य या वस्तु में । उन्मुखः = संमुखीभूत । उसके संपदनार्थ प्रवण । यः प्रयत्नः = जो प्रयास । कर्तृत्व, सहज उत्साह । स केवलं = वह मात्र । यही परमकारण या व्यापार का हेतु है । क्योंकि उस दशा में स्थूलरूप कार्य के अभाव से । लुप्यते = लुप्त हो जाता है । अनभिव्यक्त रूप में आत्मा में ही अमुख्य विलुप्तोस्मि = मैं लुप्त हो चुका हूँ। प्रतिपद्यते = समझता है । बनकर अवस्थित रहता है। **तस्मिन्—**उसमें । उस प्रयत्न में । (उस प्रयत्न में तत्काल ही) । १-३. स्पन्दनिर्णय ।
२०० स्पन्दकारिका लुप्ते = लुप्त हो जाने पर । अबुधः = तत्त्वावबोधशून्य । विलुप्तोऽस्मि इति प्रतिपद्यते—'मैं नहीं हूँ' इस प्रकार भाव-वैलक्षण्य के कारण तो वस्तु का परिच्छेद (विभाजन) ही हो जाएगा । (मैं लुप्त हो गया हूँ—ऐसा समझना चाहिए ।) यह स्वयंसिद्ध आत्मा तो स्वसिद्ध है अतः उसका अभाव कैसे संभव है? 'सिद्धः कथं निषेधस्य विषयः स्यात् ?' जिस प्रकार घर में स्थित किसी व्यक्ति को 'ऐ देवदत्त'—ऐसा कहकर बुलाया जाय तो वह आत्मा का अपह्नव (अनात्मभाव) करने वाले व्यक्ति से कह सकता है कि 'मैं देवदत्त नहीं हूँ' क्योंकि आत्मा देवदत्त नहीं है और न तो किसी आत्मा का नाम ही देवदत्त हो सकता है । वह यह अवश्य कह सकता है कि 'मैं हूँ' किन्तु वह आत्मा की दृष्टि से यह अवश्य कह सकता है कि 'मैं देवदत्त नहीं हूँ' । अभाव समाधि आदि अवस्थाओं में कार्य के अभाव के कारण तथा इन्द्रियों के व्यापार के रुक जाने से 'आत्मभाव प्राप्त हो गया' इस प्रकार का प्रत्यय मात्र भ्रान्ति है सत्य नहीं है तथा इन्द्रियों के न रहने से यह मानना कि—'आत्मा का अभाव हो गया है'—भ्रान्ति है—'अभावसमाध्यवस्थासु कार्याभावात् करणव्यापारविरतिमात्रेणात्माभाव- प्रत्ययो भ्रान्तिरेवेति ॥'१ कारिकाकार ने (१) 'कार्योन्मुख प्रयत्न' एवं (२) अन्तर्मुख भाव' दोनों की तुलनात्मक व्याख्या की है— (१) कार्योन्मुखः प्रयत्नो यः केवलं सोऽत्र लुप्यते ॥ १५ ॥ (२) म तु योऽन्तर्मुखो भावः सर्वज्ञत्वगुणास्पदम् ॥ १६ ॥ (अन्तर्मुख = अहं प्रत्यवमर्श के रूप में स्पन्दायमान) 'कार्योन्मुख प्रयत्न' : 'तस्मिंल्लुप्ते विलुप्तोस्मीत्यबुधः प्रतिपद्यते ॥ 'अन्तर्मुख भाव' : 'तस्य लोपः कदाचित् स्यादन्यस्यानुपलंभनात् ॥' (यहाँ किसी अन्य का अस्तित्त्व भी संभव नहीं होता—'अन्यस्य अनुपलंभनात्') अन्तर्मुखीन स्थिति में कार्यों का अभाव होता है अतः वहाँ कार्योन्मुख प्रयत्न संभव ही नहीं है । अन्तर्मुखता की स्थिति में कार्य तो नहीं किन्तु 'भाव' तो रहता ही है । इसीलिए कारिकाकार ने 'कार्य' के साथ 'प्रयत्न' एवं कर्तृता (अन्तर्मुखता) के साथ 'भाव' शब्दों का प्रयोग किया है । 'प्रयत्न' स्वाभाविक नहीं कृत्रिम होता है किन्तु आत्मा की क्रियात्मकता प्रयत्न नहीं स्वाभाविक होती है । समाधिगत अनुभूतियाँ भट्टकल्लट स्पन्दसर्वस्व में कहते हैं कि—समाधिकाल में केवल इतना हो जाता है कि कार्य सिद्ध करने की जो क्षमता इन्द्रियों में होती है और उसके माध्यम से वे शब्द- १. 'स्पन्दकारिकाविवृति' (रामकण्ठाचार्य) ।