श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
( १२८ ) परिप्रच्छ-- "सोऽहमिच्छामि धर्मज्ञ श्रोतुंतत्त्वोयथा जगत् बभूवभू- यश्चयश्च यथा महाभाग भविष्यति । यन्मयं च जगद् ब्रह्मन् यतश्चैतच्चराचरम् लीनमासीद् यथा, लयमेष्यति यत्र च।" इत्यादिना । पुलस्त्य और वशिष्ठ के प्रदत्त वर के प्रभाव से परमात्मा के पारमा र्थिक तत्व के ज्ञाता भगवान पराशर से, अपने ज्ञात पदार्थ के उपबृंहण की इच्छा से मैत्रेय ने प्रश्न किया--"हे धर्मज्ञ ! यह जगत जैसे उत्पन्न होता है, भविष्य में जैसा रहता है, चराचरात्मक इस जगत का वह स्व- रूप क्या है ? जिससे यह उत्पन्न होता है, जिसमें यह लीन होता है, वह रूप कौन सा है ? इस तत्व को आप से जानना चाहता हूँ ।" अत्र ब्रह्मस्वरूपविशेषतद्विभूतिभेद प्रकारतदाराधन स्वरूप फलविशेषाश्च पृष्टाः । ब्रह्मस्वरूपविशेष प्रश्नेषु यतश्चैत- च्चराचरमिति निमित्तोपादानयोः पृष्टत्वात् यन्मयमित्य नेन सृष्टिस्थितिलयकर्मभूतं जगत् किमात्मकमिति पृष्टम् । तस्य चोत्तरं जगच्च स इति । इदं च तादात्म्य अन्तर्यामिरूपेणा- त्मतया व्याप्तिकृतम् । नतुव्याप्यव्यापकयोर्वस्तुऐक्यकृतम् । यन्म- यमिति प्रश्नस्योत्तरत्वाज्जगच्च स इति सामानाधिकरण्यस्य यन्म- यमिति मयडत्र न विकारार्थः, पृथक् प्रश्नवैयर्थ्यात् । नापि प्राणम- यादिवत् स्वार्थिकः, जगच्च स इत्युत्तरानुपपत्तेः तदाहि विष्णुरेवेति इत्युत्तरमभविष्यत् । अतः प्राचुर्यार्थ एव । "तत्प्रकृतवचने मयट्" इति मयट् । कृत्स्नं च जगत्तच्छरीरतया तत्प्रचुरमेव । तस्मात् यन्मयं इत्यस्य प्रतिवचनं जगच्च स इति सामानाधिकरण्यं जगद्- ब्रह्मणोः शरीरात्मभावनिबन्धनमिति निश्चीयते । अन्यथा निर्विशेष वस्तु प्रतिपादन परे शास्त्रेऽभ्युपगम्यमाने सर्वाण्येतानि प्रश्न प्रति वचनानि च न संगच्छन्ते । तद् विवरणरूपं कृत्स्नं च शास्त्रं न ankurnagpal108@gmail.com
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संगच्छन्ते । तथाहि सति प्रपंचभ्रमस्य किमधिष्ठानमित्येवं रूपस्ये- कस्यप्रश्नस्य निर्विशेषज्ञानमात्रमित्येवंरूपमेकमेवोत्तरं स्यात् । जगद्ब्रह्मणोरेकद्रव्यत्वपरे च सामानाधिकरण्ये सत्यसंकल्पत्वादि कल्याणगुणैकतानता निखिलहेयप्रत्यनीकता च बाध्यते । सर्वाशु- भास्पदं च ब्रह्म भवेत् । यहाँ ब्रह्म का विशिष्ट स्वरूप, उनकी विभूति प्रकार भेद, तथा उनके आराधन स्वरूप, और उसके फल-विशेष को पूछा गया है । ब्रह्म के स्वरूप विषयक प्रश्न में "जिससे यह चराचर उत्पन्न होता है" ऐसी निमित्त और उपादान कारण विषयक जिज्ञासा की गई है, तथा "तन्मयः" पद से सृष्टि, स्थिति और लय के कर्मभूत इस जगत् के स्वरूप की जिज्ञासा की गई है । 'जगच्च सः' पद से उक्त जगत् संबंधी प्रश्न का उत्तर दिया गया है । जगत् की जो ब्रह्म से तादात्म्य उक्ति है, वह अन्तर्यामी रूप से आत्मा में ब्रह्म की व्याप्ति-परक है । व्याप्य व्यापक वस्तु की एकता- परक नहीं है । "यन्मयं" प्रश्न का उत्तर "जगच्च सः" सामानाधिकरण्य (विशेषण विशेष्य) भाव संबंधी है । "यन्मयं" पद में प्रयुक्त मयट् प्रत्यय विकारात्मक नहीं है । यदि ऐसा होता तो पृथक प्रश्न करना ही व्यर्थ होता । और न "प्राणमय" आदि की तरह, मयट् स्वार्थिक ही है । स्वा- र्थिक होता तो "जगच्च सः" उत्तर व्यर्थ हो जाता । स्वार्थिक मयट् में तो "यह जगत् विष्णु ही है" ऐसा उत्तर होता । इसलिए "तत्प्रकृतवचने- मयट्" सूत्र के अनुसार प्राचुर्यार्थक मयट् ही समीचीन प्रतीत होता है । सारा जगत् उसका शरीर है, इसलिए प्राचुर्य अर्थ ही संगत है । इस प्रकार "यन्मयं" इस प्रश्न का उत्तर "जगच्च सः" सामानाधिकरण्य- परक है जो कि जगत् और ब्रह्म के शरीरात्मभाव का द्योतक है, ऐसा निश्चित होता है । ऐसा अर्थ न मानकर, शास्त्र को निर्विशेष वस्तु-प्रति- पादन-परक मानेंगे तो, उक्त सारे ही प्रश्नोत्तर असंगत हो जायेंगे तथा उक्त विवरण प्रस्तुत करने वाला सारा शास्त्र असंगत हो जायगा । ऐसा मानने से यह प्रश्न भी उठ खड़ा होगा कि इस जगत् को जिसे भ्रांत- परिकल्पित मिथ्या कहते हो, उसका अधिष्ठान कौन है ? यदि उसके उत्तर में कहों कि निर्विशेष ज्ञान की वस्तु ही अधिष्ठान है, तो फिर सामाना-
( १३० ) धिकरण्य द्वारा जगत् और ब्रह्म की एकद्रव्यता, सत्य संकल्प आदि गुणैकतानता, समस्त हेयप्रत्यनीकता आदि का बाध हो जायगा, तथा ब्रह्म, समस्त अशुभों का आस्पद हो जायगा । आत्मशरीरभाव एवेदं सामानाधिकरण्यं मुख्यवृत्तमिति स्थाप्यते, अतो—"विष्णोःसकाशादुद्भूतं जगत्तत्रैव च स्थितम्, स्थितिसंयमकत्र्ताऽसौ जगतोऽस्य जगच्चसः ।" इति संग्रहेणोक्तमर्थम् "परः पराणाम्" इत्यारम्यविस्तरेणवक्तुं परब्रह्मभूतं भगवन्तं विष्णुं स्वेनैव स्वरूपेणावस्थितम् "अवकाराय" इति श्लोकेन प्रथमं प्रणम्य तमेव हिरण्यगर्भस्वावतारशंकररूपत्रिमूर्तिप्रधानकाल- क्षेत्रज्ञसमष्टिव्यष्टिरूपेणावस्थितं च नमस्करोति । तत्र "ज्ञानस्वरूपं" इत्ययं श्लोकः क्षेत्रज्ञव्यष्ट्यात्मनाऽवस्थितस्य परमात्मनः स्वभावमाह । तस्मान्नात्र निर्विशेष वस्तु प्रतीतिः । इस जगत् का और परमात्मा का आत्मशरीरभाव है, ऐसा ही, सामानाधिकरण्य से मुख्य तात्पर्य निकलता है, जैसा कि—"यह जगत् विष्णु से ही उत्पन्न होता है, वे ही स्थिति और संयम के कर्त्ता हैं, इस- लिए वे ही जगत् स्वरूप हैं।" इस श्लोक में संक्षेपरूप से जो अर्थ है, उसे ही "परंपराणाम्" आदिश्लोक में विस्तृत रूप से कहने के अभिप्राय से, स्वरूपावस्थित परब्रह्मस्वरूप भगवान को "अधिकाराय" इत्यादि श्लोक में प्रणाम करके पुनः हिरण्यगर्भ शंकर, विष्णु, आदि त्रिमूर्तियों, प्रधान (प्रकृति) काल, क्षेत्रज्ञ (जीव) आदि समष्टि-रूप से अवस्थित उन्हीं को प्रणाम करते हैं। फिर "ज्ञानस्वरूपम्" इस श्लोक में व्यष्टि जीवात्मा के रूप से अवस्थित परमात्मा के स्वभाव का निरूपण किया गया है। इससे यहाँ निर्विशेष वस्तु की प्रतीति नही होती। यदि निर्विशेष ज्ञानस्वरूपब्रह्माधिष्ठानभ्रमप्रतिपादनपरं शास्त्रं, तर्हि—"निर्गुणस्याप्रमेयस्य शुद्धस्याप्यमलात्मनः, कथंसर्गा- दिकर्त्तृत्वं ब्रह्मणोऽप्युपगम्यते "इति चोद्यम" शक्तयः सर्वभावाना ankurnagpal108@gmail.com
( १३१ ) अचिन्त्यज्ञानगोचराः, यतोऽतो ब्रह्मणस्तास्तु सर्गाद्याभाव-शक्तयः, भवंति तपतां श्रेष्ठ पावकस्य यथोष्णता” इति परिहारश्च न घटते । यदि शास्त्र को निर्विशेष ज्ञानस्वरूप ब्रह्माधिष्ठान प्रतिपादन परक मानते हैं तो--“निर्गुण, निरवच्छिन्न (असीम) विशुद्ध और विमल ब्रह्म को सृष्टि संहार कर्त्ता कैसे स्वीकारा जा सकता है”--ऐसी आपत्ति तथा—जैसे तेजीय वस्तुओं में श्रेष्ठ अग्नि की उष्णता स्वाभाविक होती है, वैसे ही ब्रह्म की सृष्टि संहार आदि अचिन्त्य शक्तियाँ भी बुद्धि अगोचर हैं ।' ऐसा परिहार संगत न होगा । तथाहि सति—“निर्गुणस्य ब्रह्मणः कथं सर्गादिकर्त्तृत्वं न ब्रह्मणः पारमार्थिकः सर्गः, अपितु भ्रांतिपरिकल्पितः इतिचोद्यपरि हरौ स्याताम् । उत्पत्यादिकार्यं सत्वादिगुणयुक्तापरिपूर्णकर्मवश्येषु दृष्टमिति, सत्वादिगुणरहितस्य परिपूर्णस्याकर्मवश्यकर्मसंबंधानर्हस्य कथंसर्गादिकर्त्तृत्वमभ्युपगम्यते इति चोद्यम् । दृष्टसकलविस- जातीयस्य ब्रह्मणो यथोदितस्वभावस्यैव जलादिविसजातीयस्य अग्न्यादेरौष्ण्यादिशक्तियोगवत् सर्वशक्तियोगो न विरुध्यत इति परिहारः । ऐसी विषम आपत्ति और परिहार की स्थिति में स्वाभाविक प्रश्न होता है कि फिर-निर्गुण ब्रह्म की सर्गादिकर्त्तृता कैसी है ? ब्रह्म की वास्तविक सृष्टि नहीं है अपितु भ्रांति परिकल्पित है। ऐसी आपत्ति और ऐसा परिहार संगत हो जाता है । उत्पत्ति आदि कार्य, सत्व रज, तम आदि गुण-युक्त अपूर्ण कर्मवश्य ( कर्मलब्ध सुख दुःख अधीन ) वस्तु का ही देखा जाता है, फिर सत्वादिगुणरहित, कर्मबंधन-रहित, परिपूर्ण ब्रह्म सर्गादि का कर्त्ता कैसे हो सकता है ? इस शंका का परिहार किया जाता है कि जल आदि पदार्थों से भिन्न अग्नि की जैसे स्वाभाविक उष्णता होती है वैसे ही समस्त जगत् से विलक्षण, निर्गुण आदि स्वभाव संपन्न ब्रह्म का भी सर्वशक्ति संबंध विरुद्ध नहीं है । ankurnagpal108@gmail.com
( १३२ ) “परमार्थस्त्वयमेवैकः” इत्याद्यपि न कृत्स्नस्यापारमार्थ्यं- वदति। अपितु कृत्स्नस्य तदात्मकतया तद्व्यतिरेकेणावस्थितस्य अपारमार्थ्यम्। तदेवोपपादयति-“तवैव महिमा येन व्याप्तमेतच्च- राचरम्” इति। येन त्वयेदम् चराचरं व्याप्तं, अतस्त्वदात्मकमेवेदं सर्वमिति त्वदन्यः कोऽपि नास्ति। अतः सर्वात्मकतया त्वमेवैकः परमार्थः। अत इदमुच्यते--तवैष महिमा, या सर्वव्याप्तिः इति। अन्यथा तवैषा भ्रांतिरिति वक्तव्यम्। जगतः पते त्वमित्यादीनां पदानां लक्षणा न स्यात्। लीलया महीमुद्धरतो भगवतो महावराह- स्य स्तुतिप्रकरणविरोधश्च। यतःकृत्स्नं जगत् ज्ञानात्मना त्वया- ऽत्मतया व्याप्तत्वेन तव मूर्त्तम्। तस्मात्त्वदात्मकत्वानुभवसाधन- योगविरहिण एतत् केवलदेवमनुष्यादिरूपमितिभ्रान्तिज्ञानेन पश्यन्ती- त्याह “यदेतद्दृश्यते” इति। “एक मात्र आप ही परमार्थ हैं” इत्यादि श्लोक भी समस्त जगत् को असत्य नहीं बतलाता। अपितु समस्त जगत् ब्रह्मात्मक है, इस तादात्म्य भाव को छोड़ने से ही मिथ्या प्रतीति होती है इसी बात का उपपादन करता है। “हे प्रभु ! आप की ही महिमा समस्त चराचर में व्याप्त है”- अर्थात् आप से यह चराचर व्याप्त है। इसीलिए यह सब कुछ त्वदात्मक है। आपसे अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। सर्वात्मक होने से एक आप ही सत्य हैं। इसी लिए यह कहा गया कि-तुम्हारी ही यह महिमा है जिससे सब जगत् व्याप्त है। यदि श्लोक का उक्त तात्पर्य न होता तो; उक्त बात (तवैष सर्वव्याप्ति) के बजाय “तवैषा भ्रांति” (यह तुम्हारी भ्रांति) ही कहा जाता। ‘जगत्पते त्वम्’ इत्यादि पदों का लाक्षणिक अर्थ नहीं किया जा सकता, वैसा करने से, लीला ही लीला में पृथिवी को उठाने वाले भगवान महावाराह की स्तुति का सारा प्रकरण ही विरुद्ध सिद्ध होगा। “यदेतद् दृश्यते” का तात्पर्य है कि-सारा जगत् ज्ञानात्मक आप से, आत्मभाव रूप से व्याप्त है, अतएव आपका ही मूर्त्त रूप है, आपके त्वदात्मकभाव की अनुभूति का साधन एकमात्र भक्ति योग है। भक्ति
( १३३ ) भाव हीन व्यक्ति ही इस जगत् को केवल देवमनुष्यादि रूप वाला देखते हैं। उनका ऐसा ज्ञान भ्रांति मात्र है। न केवलं वस्तुतस्त्वदात्मकं जगदेव देवमनुष्याद्यात्मकमिति दर्शनमेव भ्रमः; ज्ञानाकाराणामात्मनां देवमनुष्याद्यर्थाकारत्व दर्शनमपि भ्रम इत्याह “ज्ञानस्वरूपमखिलम्” इति। केवल ब्रह्मात्मक जगत् को देव मनुष्य आदि वाला जानना ही भ्रम नहीं है, अपितु देव मनुष्य आदि के ज्ञानात्मक आत्माओं को देव मनुष्य ही के आत्मा के रूप में देखना भी भ्रम है; इस भाव को “यह सब कुछ ज्ञान स्वरूप है” इस श्लोक में दिखलाया गया है। ये पुनर्बुद्धिमन्तो ज्ञानस्वरूपात्मविदः सर्वस्य भगवदात्मकत्वा- नुभवसाधनयोग्यपरिशुद्धमनश्च, ते देव मनुष्यादिप्रकृति- परिणामविशेषशरीररूपमिदम् अखिलं जगत् शरीरातिरिक्त ज्ञानस्वरूपात्मकं त्वच्छरीरं च पश्यन्ति इत्याह “ये तु ज्ञानविदः” इति। अन्यथा श्लोकानां पौनरुक्त्यं, पदानां लक्षणा, अर्थविरोधः, प्रकरणविरोधः, शास्त्रतात्पर्यविरोधश्च। और जो लोग सद्बुद्धि, ज्ञानमय आत्मतत्त्व के ज्ञाता तथा जगत् को भगवद्भाव में देखने के लिए भक्ति योग की साधना में संलग्न और शुद्धचित्त हैं, वे प्राकृत परिणाम देव मनुष्य आदि शरीर रूप समस्त जगत् को ज्ञानस्वरूप परमात्मा के शरीर के रूप में ही दर्शन करते हैं— ऐसा “जो ज्ञानविद् हैं” इत्यादि श्लोक का तात्पर्य है। श्लोकों का अर्थ उक्त क्रम से न करने से, पुनरुक्त दोष, अर्थ-विरोध, प्रकरण-विरोध, तथा शास्त्रतात्पर्य-विरोध होगा, साथ ही पदों का लाक्षणिक अर्थ करना पड़ेगा। “तस्यात्मपरदेहेषु सतोऽप्येकमयम्” इत्यत्र सर्वेष्वात्मसु ज्ञानैकाकारतया समानेषु सत्सु देवमनुष्यादि प्रकृतिपरिणाम विशेष
रूपपिण्डसंसर्गकृतमात्मसु देवाद्याकारेण द्वैतदर्शनमतथ्यं इत्युच्यते पिण्डगतमात्मगतमपि द्वैतं न प्रतिषिध्यते । देवमनुष्यादिविविध- विचित्रपिण्डेषु वर्त्तमानं सर्वमात्मवस्तु सममित्यर्थः । यच्चोक्तं भगवता "शुनिचैवश्वपाके च पंडिताः समदर्शिनः"—"निर्दोषं हि समम् ब्रह्म" इत्यादिषु; "तस्यात्मपरदेहेषु सतोऽपि" इति देहातिरिक्ते वस्तुनि स्वपरविभागस्योक्तत्वात् । "वह दूसरे शरीरो मे आत्मरूप से व्याप्त होते हुए भी एक है" इस वाक्य का तात्पर्य है कि—सभी आत्माओं में ज्ञानैकाकार रूप से वह ब्रह्म समान भाव से व्याप्त है, फिर भी, प्राकृत परिणाम देव मनुष्य आदि विविध विचित्र देहो को जो लोग ब्रह्म से पृथक देखते हैं, वह उनका मिथ्या ज्ञान है। यहाँ पिण्डगत और आत्मगत भेद का प्रतिषेध नही किया गया है। देव मनुष्य आदि विविध विचित्र शरीरों में वर्त्तमान सभी आत्माए समान है, जैसा कि-भगवान् कृष्ण ने गीता मे कहा भी है "आत्म तत्त्वज्ञ, कुत्ता और चाण्डाल में समदृष्टि रखते है" ब्रह्म निर्दोष और सर्वत्र समान है " इत्यादि । "तस्यात्मपरदेहेषुसतोऽपि" इस वाक्य मे देह से अतिरिक्त आत्म वस्तु मे स्व पर विभाग दिखलाया गया है । "यद्यन्योऽस्तिपरः कोऽपि" इत्यत्रापि नात्मैक्यं प्रतीयते, यदि- मत्तः परः कोऽपि अन्यः इति एकस्मिन्नर्थे पर शब्दान्यशब्दयोः प्रयो- गायोगात् तत्र परशब्दः स्वव्यतिरिक्तात्मवचनः । अन्यशब्दः तस्यापि ज्ञानैकाकारत्वादन्यकारत्व प्रतिषेधार्थः । एतदुक्तंभवति—यदिमद्- व्यतिरिक्तः कोऽप्यात्मा मदाकारभूतज्ञानाकारादन्याकारोऽस्ति, तदा- ऽहमेवमाकारः, अन्यंच अन्यादृशाकारः, इति शक्यते व्यपदेष्टुम्, न चैवमस्ति; सर्वेषाम् ज्ञानैकाकारत्वेन समानत्वादेवेति । "यदि कोई दूसरी अन्य वस्तु भी है" इस वाक्य से भी आत्मैक्य प्रतीति नहीं होती 'यदि मुझसे अतिरिक्त कोई अन्य है," इसकथन में
( १३५ ) “अतिरिक्त” और ‘अन्य’ शब्द का एक ही अर्थ में प्रयोग किया गया है, जिससे ज्ञात होता है कि “अतिरिक्त शब्द, अपने से भिन्न आत्मवाची है। “अन्य शब्द उस आत्मा का ज्ञानाकार रूप होने से, अन्याकारता (असमानता) का प्रतिषेधक है। कहने का तात्पर्य यह है कि—यदि मुझसे भिन्न कोई भी आत्मा मेरे आकार रूप ज्ञानाकार से भिन्न आकार का है तो, वहाँ कहा जायगा कि—“मैं इस आकार का” तथा “यह अन्य प्रकार के आकार का है।” सभी आत्माएं परमात्मा से अनुस्यूत ज्ञानाकार होने से समान आकार वाली हों, ऐसा भी नहीं है [ज्ञानैका- कार होते हुए भी भिन्न-भिन्न वासनाओं से अभिभूत होने के कारण आत्माओं में पार्थक्य का व्यवहार होता है ] “वेणुरंध्रविभेदेन” इत्यत्राप्याकारवैषम्यमात्मनां न स्वरूपकृतं अपितु देवादिपिण्डप्रवेशकृतमित्युपदिश्यते, नात्मैक्यम्। दृष्टान्ते चानेकरन्ध्र वर्त्तिनां वाय्वंशानां न स्वरूपैक्यम्, अपित्वाकार साम्यमेव। तेषांवायुत्वेनैकाकाराणां रन्ध्रभेदनिष्क्रमणकृतो हि षड्जादिसंज्ञाभेदः। एवमात्मना देवादि संज्ञाभेदः। यथा तैजसाप्यपार्थिवद्रव्यांश भूतानां पदार्थानां तत्तद्द्रव्यत्वे नैक्यमेव न स्वरूपैक्यम्, तथा वायवीयानामंशा- नामपि स्वरूपभेदोऽवर्जनीयः। “वेणुरंध्र के भेद से” इस श्लोक में भी आत्माओं का आकार वैषम्य बतलाया गया है, स्वरूप वैषम्य नहीं। देव आदि पिंड विशेष में प्रवेश करने से भिन्नता बतलाई गई है, आत्मैक्य का उल्लेख नहीं है। दृष्टान्त रूप से प्रस्तुत वेणु के अनेक रन्ध्रवर्ती वायु के, अंशो की ध्वनि विषमता बतलाई गई है वायु के स्वरूप की विषमता का कोई प्रश्न ही नहीं है। एक ही वायु विभिन्न छिद्रों से विभिन्न ध्वनियों में प्रतिध्वनित होकर षड्ज आदि नामों से व्यवहार की जाती है। ऐसे ही देव मनुष्य आदि में प्रविष्ट आत्मा का नामपरक भेद है। जैसे, तैजस, जलीय, पार्थिव द्रव्यों के अंश (कण) भिन्न-भिन्न आकार के हैं एक से नहीं हैं, वैसे ही वायवीय अंश भी स्वरूपतः भिन्न हैं। “सोऽहं सचत्वम्” इति सर्वात्मनां पूर्वोक्तं ज्ञानाकारत्वं तत् शब्देन परामृश्य तत्समानाधिकरण्येनाहं त्वमित्यादीनामर्थानां ज्ञान-
मेवाकार इत्युपसंहरन् देवाद्याकार भेदेनाऽत्मसु भेदमोहं परित्यजे- ताह । अन्यथा देहातिरिक्त आत्मोपदेश्य-स्वरूपे अहं त्वं सर्वमेतदा- त्म स्वरूपमिति भेदनिर्देशो न घटते । अहं त्वमादिशब्दानां उपलक्ष्येण सर्वमेतदात्मस्वरूपमित्यनेन सामानाधिकरण्यादुपलक्षणत्वमपि न संगच्छते । सोऽपि यथोपदेशमकरोदित्याह "तत्याजभेदं परमार्थं दृष्टिः" इति । कुतश्चैष निर्णय इति चेत् देहात्मविवेकविषयत्वादुप- देशस्य । तच्च "पिण्डः पृथग्यतः पुंसश्शिरः पाण्यादिलक्षणः" इतिप्रक्रमात् । "वही मै वही तुम हो" इत्यादि वाक्य में भी तत (सः) शब्द द्वारा समस्त आत्माओं की ज्ञानाकारता का निर्देश करके पुनः ज्ञानाकार उस आत्मा के साथ अहं और त्वं पद का अभेद निर्देश करते हुए उप- संहार किया गया है, इसमें देवादि आकार भेद से आत्माओ में हुई भेद भ्रान्ति को छोड़ने का उपदेश दिया गया है।
अभिचाकशीति”—“ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्यलोके गुहांप्रविष्टौ परमे परार्ध्ये, छाया तपौ ब्रह्मविदो वदंति पंचाग्नयो येच त्रिणाचिकेताः” —“अन्तः प्रविष्टः शास्ता जनानां सर्वात्मा” इत्याद्याः । अस्मि- न्नपि शास्त्रे “ससर्वभूतं प्रकृतिं विकारान् गुणादि दोषश्च मुने व्यतीतः, अतीतसर्वावरणोऽखिलात्मा तेनाऽस्तृतं यद्भुवनान्तराले” —“समस्त कल्याण गुणात्मकोऽसौ”—“परः पराणां सकला न यत्र क्लेशादयस्संति परावरेशे”—“अविद्या कर्म संज्ञाऽन्या तृतीया शक्ति- रिष्यते, ययाक्षेत्रज्ञ शक्तिस्सा वेष्टिता नृप सर्वगा” इति भेदव्यपदे- शात् । “उभयेऽपि हि भेदेनैनमधीयते”—“भेदव्यपदेशाच्चान्यः” —“अधिकंतुभेद निर्देशात्” इत्यादि सूत्रेषु च । “य आत्मनि तिष्ठन् नात्मनोऽन्तरो यमात्मा नवेद, यस्यात्मा शरीरं य आत्मानमन्तरो यमयति “प्राज्ञेनात्मना संपरिष्वक्तः”—“प्राज्ञेनात्मनाऽन्वारूढः” इत्यादिभिः उभयोरन्योन्यप्रत्यनीकाकारेण स्वरूप निर्णयात् ।
“विभेदजनके ज्ञाने” इत्यादि वाक्य भी जीवात्मा-परमात्मा की स्वरूपगत एकता का प्रतिपादक नहीं है । और न जीवात्मा-परमात्मा की स्वरूपगत एकता का उक्त कथनानुसार निषेध ही होता है । जीवात्मा परमात्मा की स्वरूपगत एकता देह और आत्मा की तरह नहीं हो सकती । श्रुति का भी उक्त मत है—“दो पक्षी एक वृक्ष पर बैठे हैं, जो कि सहचर सखा हैं, उनमें से एक (जीव) परिपक्व (भोग के उपयुक्त) पिप्पल (कर्म) फल का भोग करता है, और दूसरा (परमात्मा) भोग नहीं करता केवल देखता (साक्षी) मात्र है ।” ब्रह्मविद और पंचाग्नि साधक लोग तथा तीन बार नाचिकेताग्नि का चयन करने वालों ने कहा है कि-इस लोक (देह) में पुण्य फल भोक्ता छाया और आतप के समान दो स्वरूप (जीवात्मा और परमात्मा) बुद्धि रूप उत्तम गुहा में स्थित हैं । “वह सर्वात्मक सभी के अन्तःकरण में स्थित होकर शासन करता है ।” इत्यादि । और शास्त्र (विष्णुपुराण) में भी इसी प्रकार का उपदेश है—“वह (परमात्मा) समस्त भूतों के उपादान प्रकृति और उसके
( १३८ ) विकारों एवं हर प्रकार के गुण दोषों से रहित, सभी प्रकार के ज्ञानां- वरणों से रहित, समस्त भूतों के आत्मा हैं, भुवन के अन्तराल में जो कुछ भी है वह उन्हीं से व्याप्त है। वे सब प्रकार के मंगलमय गुणों से पूर्ण, श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठतर हैं। वे सर्वेश्वर क्लेश आदि दोषों से रहित हैं। भगवान की कर्म नामक एक तीसरी अविद्या शक्ति है, जिससे सर्वगत क्षेत्रज्ञ (तटस्थ जीव) शक्ति वेष्टित है। "इत्यादि श्लोकों में परस्पर भेद का निर्देश किया गया है। "उमयेऽपि हि भेदे नैनमधीयते" "भेदव्यपदेशाच्चान्यः" "अधिकन्तु भेदनिर्देशात्" आदि सूत्रों में सूत्रकार भी उक्त कथन की पुष्टि करते हैं। "जो आत्मा में स्थित होकर संयम करते हैं, जीवात्मा जिन्हे नहीं जानता, आत्मा ही जिनका शरीर है"- "प्राज्ञ परमात्मा से संसक्त होकर"- "प्राज्ञ परमात्मा से अधिष्ठित होकर" इत्यादि श्रुतियाँ, जीवात्मा और परमात्मा के परस्पर विलक्षण रूप का निरूपण करती हैं। नापि साधनानुष्ठानेन निर्मुक्ताविद्यस्यपरेण स्वरूपैक्य संभवः अविद्याश्रयत्वयोग्यस्य तदनर्हत्वासंभवात् । यथोक्तम्-"परमात्मा त्मनोर्योगः परमार्थ इतीष्यते, मिथ्यैतदन्यद्द्रव्यं हि नैति तद्द्रव्यतां यतः" इति । मुक्तस्य तु तद्धर्मतापत्तिरेवेति भगवद्गीतासूक्तम्- "इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम् साधर्म्यमागताः, सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च।" इति इहापि-"आत्मभावं नयंत्येनं तद्ब्रह्म- ध्यायिनं मुने, विकार्यमात्मनः शक्त्या लोहमाकर्षको यथा।" इति । साधन विशेष के अनुष्ठान द्वारा, अविद्या के क्षय हो जाने के बाद भी जीवात्मा की परमात्मा के साथ एकता संभव नहीं है, क्यों कि- अविद्याश्रित जीव की अविद्या से बचे रहने की क्षमता नहीं हैं। जैसा कि कहते हैं-"परमात्मा और जीवात्मा की एकता को सत्य कहना, मिथ्या भ्रम है, क्यों कि-एक द्रव्य कभी दूसरा द्रव्य नही हो सकता।" मुक्तात्मा को भगवान के समान गुण ही प्राप्त होते हैं, ऐसा भगवद्गीता में कहा गया है-"ज्ञान का आश्रय लेकर जो मेरे समान गुणों को प्राप्त करते हैं, वे सृष्ठि में जन्म नहीं पाते और प्रलय में दुःखी नहीं होते।" ankurnagpal108@gmail.com
( १३६ ) विष्णुपुराण में भी जैसे—"जैसे अग्नि लोहे के विकारों को समाप्त कर देती है, उसी प्रकार, परमात्मा भी अपने ध्यान करने वालों को आकृष्ट कर आत्मभाव प्रदान करते हैं।" आत्मभावम् आत्मनस्स्वभावम् । नहि आकर्षकस्वरूपापत्तिः आकृष्यमाणस्य । वक्ष्यति च "जगद्व्यापारवर्जं प्रकरणादसन्निहि- तत्त्वाच्च"—"भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च"— "मुक्तोपसृप्यव्यपदेशाच्च" इति । वृत्तिरपि—"जगद्व्यापारवर्जं समानो ज्योतिषा" इति । द्रवि- डभाष्यकारश्च— "देवता सायुज्यादशरीरस्यापि देवतावत्सर्वार्थसिद्ध- स्स्यात्" । इत्याह-श्रुतयश्च—"यःइहात्मानमनुविद्य व्रजन्त्येतांश्च सत्यान् कामांस्तेषां सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति"—"ब्रह्मवि- दाप्नोतिपरम्"—"सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सहब्रह्मणा विपश्चिता"- — "एतमानन्दमयमात्मानमुपसंक्रम्य, इमान् लोकान् कामान्नीकामरू- प्यनुसंचरन्"—"सतत्रपर्य्येति"—"रसो वै सः, रसह्येवायं लब्ध्वाऽ- नंदीभवति "यथा नद्यः स्यन्दमानाः समुद्रे अस्तंगच्छन्ति नामरूपे विहाय, तथा विद्वान् नामरूपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम्"—"तदा विद्वान् पुण्यपापे विहाय निरंजनः परमं साम्यमु- पैति" इत्याद्याः । 'आत्मभावम्' का तात्पर्य है, आत्मा का स्वभाव । आकृष्ट होने वाली वस्तु आकर्षक के स्वरूप को प्राप्ति नहीं कर पाती । जैसा कि—सूत्रकार— "जगद्व्यापारवर्जं, भोगमात्र साम्य मुक्तोपसृप्य०" इत्यादि सूत्रों में उक्त तथ्य का ही प्रतिपादन करते हैं । "जगत् रचना की क्षमता न होने से जीवात्मा की ज्योति ही परमात्मा के समान होती है" ऐसी वृत्ति भी है । द्रविडभाष्यकार भी कहते हैं—"भगवत् सायुज्य प्राप्त मुक्तात्मा भी भगवान् के समान सर्वार्थ सिद्धि प्राप्त करते हैं।" श्रुतियां भी उक्त वस्तु की पुष्टि करती हैं जैसे—"जो परमात्मा के ऐसे स्वरूप तथा सत्य कामनाओं को जानकर, इस लोक से प्रयाण करते हैं, उनकी समस्त ankurnagpal108@gmail.com
( १४० ) लोकों में अप्रतिहत गति होती है।” ब्रह्मवेत्ता परमात्मा को प्राप्त करते हैं—“वह परमात्मा के साथ समस्त कामनाओं को भोगता है।” इस आनन्दमय परमात्मा को प्राप्त कर सभी प्रकार के काम्यफलों का भोग करता है। “परमात्मा रस स्वरूप है, उस रस का आस्वाद कर जीवात्मा आनन्दित होता है।” मुक्तपुरुष वहाँ जाता है। “नदियाँ जैसे समुद्र में मिलने पर अपने नाम रूप का परित्याग कर देती है, वैसे ही जीवात्मा भी अपने नाम रूप से छूटकर उस परात्पर दिव्य पुरुष को प्राप्त करता है।” ब्रह्मज्ञ पुरुष पुण्य पाप से छूट कर निरंजन परमात्मा की समता प्राप्त करता है।” इत्यादि । पराविद्यासु सर्वासु सगुणमेव ब्रह्मोपास्यम् । फलं चैकरूपमेव । अतो विद्याविकल्प इति सूत्रकारेणैव—“आनन्दादयः प्रधानस्य” “विकल्पोऽविशिष्ट फलत्वात्” इत्यादिषूक्तम्। वाक्यकारेण च सगु- णस्यैवोपास्यत्वं विद्याविकल्पश्चोक्तः “युक्तं तद् गुणकोपासनात्” इति । भाष्यकृता व्याख्यातं च “यद्यपि सच्चितः” इत्यादिना । “ब्रह्मवेद ब्रह्मैवभवति” इत्यत्रापि-“नामरूपादविमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैतिदिव्यम्”—“निरंजनः परमं साम्यमुपैति”—“परंज्योति- रूपसंपद्य स्वेनरूपेणाभिनिष्पद्यते” इत्यादिभिरैकार्थ्यात् प्राकृत- नाम रूपाभ्यां विनिर्मुक्तस्य निरस्ततत्कृतभेदस्य ज्ञानैकाकारतया ब्रह्मप्रकारतोच्यते । प्रकारैक्ये च तत्वव्यवहारो मुख्यएव, यथा सेयं गौरिति । सभी ब्रह्मविद्याओं में सगुणब्रह्म को ही उपास्य तथा ब्रह्मसारूप्यता को मोक्ष बतलाया गया है। विद्याओं की समान प्रणाली का “आनन्द- दयः प्रधानस्य” विकल्पोऽविशिष्ट फलत्वात् “सूत्रों में सूत्रकार प्रतिपादन करते हैं। वाक्यकार भी सगुण की उपास्यता तथा विद्याओं की समानता का प्रतिपादन” युक्तं तद्गुणकोपासनात्” कह कर करते हैं। “यद्यपि सच्चितः” इत्यादि में भाष्यकार भी उक्त तथ्य की ही पुष्टि करते हैं। “ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही होता है”, नामरूप से विमुक्त परात्पर दिव्य पुरुष ankurnagpal108@gmail.com
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को प्राप्त करता है, "निरंजन की समता प्राप्त करता है", परमात्मा की ज्योति से संपन्न अपने वास्तविक स्वरूप से निष्पन्न होता है, "इत्यादि श्रुतियाँ भी प्राकृत लौकिक, नामरूप के लोप तथा नामरूप जन्य भेद दृष्टि के लुप्त हो जाने पर जो एकाकार ज्ञान होता है, इतने अंशमात्र में ही, जीवात्मा परमात्मा की एकता का प्रतिपादन करती हैं । एक ही प्रकार की वस्तु में जो एकता का व्यवहार होता है, वह मुख्यता परक ही होता है, जैसे कि—"यह वही गौ है ।" अत्रापि—"विज्ञानं प्रापकं प्राप्ये परे ब्रह्मणि पार्थिव, प्रापणी- यस्तथैवात्मा प्रक्षीणशेषभावनः" इति । परब्रह्मध्यानादात्मा परब्रह्म- वत् प्रक्षीणशेषभावनः कर्मभावना, ब्रह्मभावना,उभयभावना, इति भावनात्रय रहितः । प्रापणीय इत्यभिधाय—"क्षेत्रज्ञः करणी ज्ञानं करणं तस्य वै द्विज, निष्पाद्य मुक्तिकार्यं हि कृतकृत्यं निवर्त्तयेत्" इति करणस्य परब्रह्मध्यानरूपस्य प्रक्षीणाशेषभावनात्मस्वरूप प्राप्त्या कृतकृत्यत्वेन निवृत्ति वचनात् सिद्धि अनुष्ठेयम् इत्युक्त्वा--"तद्- भावभावमापन्नः तदासौ परमात्मना भवत्यभेदोभेदश्च तस्याज्ञान- कृतोभवेत् ।" इति मुक्तस्य स्वरूपमाह । तद्भावः ब्रह्मणोभावः स्वभावः । नतु स्वरूपैक्यम्, तद्भावभावमापन्न इति द्वितीयभाव- शब्दानन्वयात् पूर्वोक्तार्थ विरोधाच्च । यद् ब्रह्मणः प्रक्षीणाशेषभावनत्वं तदापत्तिस्तद् भावभावापत्तिः । यदैवमापन्नस्तदासौ परमात्मा अभेदी भवति, भेदरहितो भवति । ज्ञानैकाकारतया परमात्मनैक प्रकारस्यास्य तस्माद् भेदो देवादिरूपः। तदन्वयोऽस्य कर्मरूपाज्ञानमूलः। न स्वरूपकृतः, सतु देवादिभेदः परब्रह्मध्यानेन मूलभूताज्ञानरूपे कर्मणि विनष्टे हेत्वभावात् निवर्त्तते इति अभेदी भवति । यथोक्तम्— "एक स्वरूपभेदस्तु बाह्य कर्म प्रवृत्तिजः देवादिभेदेऽपध्वस्ते नास्त्येवावरणोहि सः । इति । विष्णुपुराण में भी जैसे—"परब्रह्म ही जीव के लिए एकमात्र प्राप्य है, विज्ञान ही एकमात्र प्रापक ( प्राप्ति का उपाय ) है तथा समस्त ankurnagpal108@gmail.com
( १४२ ) भावनाओं से रहित आत्मा भी उसी प्रकार प्रापणीय है।' परब्रह्म के ध्यान से जीवात्मा परब्रह्म के समान समस्त भावनाओं से शून्य हो जाता है। भावनाये तीन प्रकार की है, कर्मभावना (शुभाशुभ संस्कार) ब्रह्म भावना तथा कमब्रह्म उभयभावना। इन तीनो प्रकार की भावनाओं से रहित होना ही अभिधेय है। ऐसी स्थिति की प्राप्ति को बतलाकर “क्षेत्रज्ञ जीवात्मा करणी (उपासक) तथा उपासना करण (उपास) है, इसके द्वारा मुक्ति कार्य का संपादन कर कृतकृत्य होना चाहिए।” इस वाक्य मे परब्रह्म ध्यान रूप करण से पूर्वोक्त भावनात्रय रहित आत्म- स्वरूप प्राप्ति की कृतार्थता बतलाई गई है। सिद्ध किया गया है कि- जब तक फल सिद्धि न हो जाय तब तक अनुष्ठान अवश्य करना चाहिए। इसके बाद-“तद्भाव को प्राप्त यह उपासक, परमात्मा के साथ अभिन्न हो जाता है, उस स्थिति मे अज्ञान कृत भेद भी रहता है।” इस वाक्य मे मुक्तात्मा का स्वरूप बतलाया गया है तद्भाव का तात्पर्य है, ब्रह्म का भाव अर्थात् स्वभाव। तद्भाव का तात्पर्य स्वरूपैक्य नहीं है। “तद्भावभावभापन्नः” इस वाक्य में द्वितीय भाव शब्द का उक्त प्रकार का अन्वय नहीं करेंगे तो पूर्वोक्त अर्थ से विरुद्ध होगा। ब्रह्म की जैसी समस्त भावना रहित स्थिति रहती है वैसे ही मोक्षावस्था में जीवात्मा की भी हो जाती है, यही तद्भावभावापत्ति का तात्पर्य है। जीवात्मा उस स्थिति को प्राप्त कर ही परमात्मा के साथ अभिन्न हो पाता है, अर्थात् भेद भाव रहित हो जाता है। मुक्तपुरुष एक मात्र ज्ञानमय आकार प्राप्त कर ही परमात्मा के आकार का होता है, फिर भी देव मनुष्यादि रूप से उसका भेद रहता है उसकी यह भेदावस्था कर्ममय अज्ञान जन्य होती है, स्वरूपतः नहीं होती। जिस समय परब्रह्म के ध्यान से, भेद- कारक अज्ञानरूपी कर्म विनष्ट हो जाता है, उस समय कारण के अभाव से, कार्यरूप देव आदि भेद भी लुप्त हो जाते हैं। वही अभेदरूपता की स्थिति होती है। जैसा कि कहते हैं-“आत्मा स्वरूपतः एक है, केवल वाह्य देहादिकृत कर्ममय आवरण से आवृत्त होने से उसका भेद होता है, देवादि भेदों के नष्ट हो जाने पर आभ्यन्तर आवरण भी नष्ट हो जाता है।” एतदेव विवृणोति-“विभेदजनकेऽज्ञाने नाशमात्यन्तिकं गते, आत्मनो ब्रह्मणोभेदमसन्तं कः करिष्यति “इति। विभेदः विविधो ankurnagpal108@gmail.com
भेदः, देवतिर्यङ्मनुष्यस्थावरात्मकः । यथोक्तः शौनकेनापि-- “चतुर्विधोऽपिभेदोऽयं मिथ्याज्ञाननिबन्धनः “इति । आत्मनि ज्ञान रूपे देवादिरूपविविधभेदहेतुभूतकर्माख्याऽज्ञाने परब्रह्म ध्यानेनात्यं- तिक नाशं गते सति हेत्वभावात् असन्तं परस्मात् ब्रह्मण आत्मनो देवादिरूपभेदं कः करिष्यति इत्यर्थः । “अविद्या कर्मसंज्ञाऽन्या “इति हि अत्रैवोक्तम् । उक्त तथ्य का ही विवेचन करते हुए कहते है— “विभेद जनक अज्ञान के एक दम नष्ट हो जाने पर, आत्मा ब्रह्म के असत् भेद को कौन कर सकेगा । “विभेद का तात्पर्य है ,देव पशु मनुष्य स्थावरादि विविध भेद । जैसा कि शौनक ने भी कहा है- “स्थावर आदि चार प्रकार के भेद , मिथ्या ज्ञान से होते है। “अर्थात् ज्ञान रूप आत्मा में देवादि रूप विविध भेदों के कारणरूपी कर्म नामक अज्ञान के, परब्रह्म की ध्यान रूपी उपासना से एकदम नष्ट होने पर, कारण के अभाव में परमात्मा और जीवात्मा के देवादि रूप भेद को करने वाला कौन शेष रह जाता है । यहीं पर कहा भी गया है—“कर्म नामक अविद्या भेद रूपा है”। “क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि” इत्यादिना अन्तर्यामिरूपेण सर्वे- ष्यात्मतयैक्याभिधानमन्यथा “क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते, उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः “इत्यादिनिर्विरोधः । अन्तर्यामिरूपेण सर्वेषामात्मत्वं तत्रैव भगवताऽभिहितम्-“ईश्वरस्सर्वभूतानां हृद्दे- शेऽर्जुन तिष्ठति” सर्वस्य चाहं हृदिसंनिविष्ट. “इति च । “अहमा- त्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः “इति च तदेवोच्यते । भूतशब्दो- हि आत्मपर्यन्तदेहवचनः । यतः सर्वेषामयमात्मा तत एव सर्वेषा तच्छरीरतया पृथगवस्थानं प्रतिषिध्यते– ‘ न तदस्ति विनायत्स्यात् “इति, भगवद्विभूत्युपसंहारश्चायमिति तथैवाभ्युपगन्तव्यम् । तत इदमुच्यते –“यद्यद्विभूतिमत्सत्वं श्रीमदूर्जितमेव वा तत्तदेवाव- गच्छत्वं मम तेजोंऽशसंभवम् “विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो
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जगत्” इति। अतः शास्त्रेषु न निर्विशेष वस्तुप्रतिपादनमस्ति। नाप्यर्थजातस्य भ्रांतत्वप्रतिपादनम्। नापि चिदचिदीश्वराणां स्वरू- पभेद निषेधः। “क्षेत्रज्ञ भी मुझे ही जानो” इस भगवद् वाक्य में अन्तर्यामी रूप से परमात्मा के सर्वात्म भाव ऐक्य को बतलाया गया है; यदि ऐसा नहीं मानेगे तो, “सभी भूतों को क्षर, कूटस्थ आत्मा को अक्षर तथा इनसे भिन्न श्रेष्ठ उत्तम पुरुषोत्तम है “इत्यादि वाक्य से विरुद्ध होगा। अन्तर्यामी रूप से सभी की आत्मता को गीता मे स्वयं भगवान् ने स्वीकारा है- “अर्जुन ! समस्त प्राणियो के अन्तः करण में ईश्वर विराजमान है “सभी के अन्तः करणों में, मै प्रविष्ट हूँ “इत्यादि ।” गुडाकेश! समस्त प्राणियो के अन्तःकरण में स्थित मैं आत्मा हूँ” इत्यादि में भी वही बात कही गई है। भूत शब्द आत्मा के देह तक सभी का द्योतक है। जैसे परमात्मा सभी के अन्तर्यामी आत्मा है, उसी प्रकार सारा ही भूतवर्ग उनका शरीर स्थानीय है ,इसलिए समस्त भूतों से उनकी पृथक्ता का निषेध किया गया है। “जगत में ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जिसे परमात्मा से भिन्न कहा जा सके” यह भगवद् विभूति के उपसंहार का वाक्य है, अतः इसे ही प्रकरण का तात्पर्य मानना चाहिए। इस पर ही कहा गया कि-“जो जो विभूतिमान तथा अलौकिक प्रभा संपन्न हैं ,उन्हें मेरे तेजांश से ही प्रकट समझो, एक अंश से मै ही सारे जगत मे व्याप्त हूँ ।” इत्यादि से ज्ञात होता है कि- शास्त्रों में निर्विशेष वस्तु का प्रतिपादन नही है और न समस्त जागतिक विषयों के मिथ्यात्व का प्रतिपादन है ' जड चेतन ईश्वरीय विभूतियों के स्वरूप भेद का भी निषेध नही है। यदप्युच्यते-निर्विशेषे स्वयंप्रकाशे वस्तुनि दोषपरिकल्पित- मीशेशितव्याद्यनन्तविकल्पं सर्वं जगत्। दोषश्च स्वरूपतिरोधान विविधविचित्र विक्षेपकारी सदसदनिर्वचनीयाऽनाद्यविद्या। सा च अवश्याभ्युपगमनीया; “अनृतेन हि प्रत्यूढाः “इत्यादिभिः श्रुतिभिः, ब्रह्मादस्तत्त्वमस्यादिवाक्यसामानाधिकरण्यावगतजीवैक्यानुपपत्त्या च सातु न सती, भ्रांतिबाधयोरयोगात्। नाप्यसती, ख्यातिबाधयोश्चा- ankurnagpal108@gmail.com
( १४५ ) योगात् । श्रतः कोटिद्वयविनिर्मुक्ते'यमविद्येति तत्त्वविदः इति तद- युक्तम् । (वाद) इसपर भी यह कहते हैं कि—“निर्विशेष स्वयं प्रकाश ईश्वर ही एक मात्र शासन कर्त्ता है तथा समस्त जगत उनका शास्य है ‘ऐसा’ मानना दोष परिकल्पित है । स्वरूप को ढकने वाली—विविध विचित्र विक्षेपों को करने वाली, सद् असद् कुछ भी न कह सकने योग्य, अनादि अविद्या ही दोष है । “अनृतेन ही प्रत्यूढाः “इत्यादि श्रुति के अनुसार उक्त प्रकार की अविद्या का अस्तित्व स्वीकारना पड़ेगा, अस्वीकार करने से तत्वमसि “इत्यादि वाक्य से जो जीव ब्रह्म की एकता की प्रतीति होती है, वह संगत न हो सकेगी । वह अविद्या सत् पदार्थ भी नहीं है, उसे सत् मानने से उसकी भ्रांतिजनकता और ज्ञानाबाध्यता संभव नहीं होगी। अविद्या असत् भी नहीं है, असत् मानने से उसकी सामयिकी प्रतीति और बाध नहीं हो सकेगी । इसलिए तत्त्वविदों ने इसे सद् असद् कोटियों से विल- क्षण अविद्या कहा है । इसलिए तुम्हारा उपर्युक्त शास्य शासन वाला कथन असंगत है । (प्रतिवाद) सा हि किमाश्रित्य भ्रमं जनयति ? न तावज्जीव- माश्रित्यश्रविद्या परिकल्पितत्वात् जीवभावस्य । नापि ब्रह्माश्नित्य तस्य स्वयंप्रकाश ज्ञानस्वरूपत्वेनाविद्याविरोधित्वात् । सा हि ज्ञानबाध्याऽभिमता । “ज्ञानरूपं परंब्रह्म तन्निवर्त्यं मृषात्मकम् , अज्ञानंचेत् तिरस्कुर्यात् कः प्रभुः तन्निवर्त्तने”—ज्ञानं ब्रह्मेति चेत् ज्ञानमज्ञानस्य निवर्त्तकम् , ब्रह्मवत् तत्प्रकाशकत्वात् अपि हि अनिव- र्त्तकम्”—“ज्ञानं ब्रह्मेति विज्ञानमस्ति चेत्स्यात्प्रमेयता ,ब्रह्मणोऽननु- भूतित्वं त्वदुक्त्यैव प्रसज्यते”। ज्ञानस्वरूपं ब्रह्मेति ज्ञानंतस्या अविद्यायाः बाधकम्,। न स्व- रूपभूतं ज्ञानमिति चेत् ,न, उभयोरपि ब्रह्मस्वरूप प्रकाशत्वे सत्यन्यत- रस्यानविद्याविरोधित्वं अन्यतरस्यनेति विशेषानवगमात् । ankurnagpal108@gmail.com
(प्रतिवाद) वह अविद्या किसके आश्रय से भ्रमोत्पादन करती है ? जीव के आश्रय से तो कर नहीं सकती, क्यों कि जीव भाव स्वयं ही अवि- द्या परिकल्पित है। ब्रह्म के आश्रय से भी नहीं कर सकती, क्यों कि वह स्वयंप्रकाश और ज्ञानस्वरूप है, जो कि अविद्या विरोधी रूप है। वह तो ज्ञान बाध्या ही मानी गई है। “परब्रह्म ज्ञानस्वरूप हैं, मिथ्यात्मक ज्ञान उनसे निवर्त्य है, अज्ञान यदि ज्ञानमय ब्रह्म को ही आवृत कर लेगा तो उसका निवारण करने में कौन समर्थ है ? यदि ज्ञान ही ब्रह्म है, और वही अज्ञान का नि- वर्त्तक है, सो ऐसा ज्ञान भी अज्ञान का निवारक नहीं हो सकता क्यों कि, वह भी ब्रह्म की तरह, उसके प्रकाश से प्रकाशित है। यदि कहो कि-ब्रह्म ज्ञान स्वरूप है, ऐसा विशेष ज्ञान होने मात्र से अज्ञान नष्ट हो जायगा, सो ऐसा मानने से ब्रह्म प्रमेय हो जायगा तथा तुम्हारे ही कथन से तुम्हारी अभिमत ब्रह्म की अनुभूतिता बाधित हो जायगी।” यदि कहो कि--ब्रह्म ज्ञान स्वरूप है, ऐसा ज्ञान ही उस अविद्या का बाधक है, ब्रह्म का स्वरूपगत ज्ञान अविद्या निवर्त्तक नहीं है, सो ऐसा कहना भी उपयुक्त न होगा क्यों कि-दोनों ही प्रकार के ज्ञान ब्रह्म के स्वरूप से प्रकाशित होने के कारण प्रकाश स्वरूप हैं, इसलिए उनमें एक अविद्या का विरोधी हो और दूसरा अविरोधी, यह कैसे संभव है। एतदुक्तं भवति--ज्ञानस्वरूपं ब्रह्मेत्यनेनज्ञानेनब्रह्मणि यस्स्वभा- वोऽवगम्यते, स ब्रह्मणः स्वयं प्रकाशत्वेन स्वयमेव प्रकाशते, इति अविद्या विरोधित्वेन कश्चिद् विशेषस्वरूपस्तद्विषयज्ञानयोः इति किंच अनुभवस्वरूपस्यब्रह्मणोऽनुभवान्तरानुभाव्यत्वेन भवतो न तद्विषयं ज्ञानमस्ति। अतो ज्ञानमज्ञान विरोधि चेत् स्वयमेव विरोधि भवतीति, नास्या ब्रह्माश्रयत्व संभवः। शुक्त्यादयस्तु स्वयाथात्म्यप्रकाशे स्वयमसमर्थास्तु अज्ञानाविरोधिनः तन्निवर्त्तने च ज्ञानान्तरमपेक्षन्ते। ब्रह्म तु स्वानुभवसिद्धस्वयाथात्म्यमिति स्वाज्ञानविरोध्येव। तत एव निवर्त्तकान्तरं च नापेक्षते। अथोच्येत ankurnagpal108@gmail.com
( १४७ ) ब्रह्मव्यतिरिक्तस्य मिथ्यात्वज्ञानमज्ञान विरोधि इति। न इदं ब्रह्मव्यतिरिक्तमिथ्यात्वज्ञानं किं ब्रह्म याथात्म्य ज्ञान विरोधि ? उत् प्रपंच सत्यत्वरूपाज्ञानविरोधीति विवेचनीयम् न तावद्ब्रह्म- याथात्म्यज्ञानविरोधि अतद्विषयत्वात् , ज्ञानाज्ञानयोरेकविषयत्वेन हि विरोधः। प्रपंच मिथ्यात्वज्ञानं तत् सत्यस्वरूपा ज्ञानेन विरुध्यते । तेन प्रपंचसत्यत्वरूपाज्ञानमेव बाधितमिति ब्रह्मस्वरूपाज्ञानं तिष्ठत्येव । ब्रह्मस्वरूपाज्ञानं नाम तस्य सद्वितीयत्वमेव । तत्तु तद् व्यतिरिक्तस्य मिथ्यात्वज्ञानेन निवृत्तम् । स्वरूपंतु स्वानुभवसिद्धमिति चेन्न, ब्रह्मणोऽद्वितीयत्वं स्वरूपं स्वानुभवसिद्धमिति तद्विरोधि सद्वितीय- त्वरूपाज्ञानं न बाधश्च न स्याताम् । अद्वितीयत्वंधर्मं इति चेन्न, अनुभवस्वरूपस्य ब्रह्मणोऽनुभाव्यधर्मं विरहस्य भवतैव प्रतिपा- दित्वात् अतोज्ञानस्वरूपस्य ब्रह्मणो विरोधादेव ना ज्ञानाश्रयत्वं । कथन यह है कि—"ज्ञान स्वरूप ब्रह्म" ऐसे ज्ञान से ब्रह्म स्वभाव की जो प्रतीति होती है, वह ब्रह्म के स्वयं प्रकाश होने से स्वतः ही प्रकाशित होता है, उसका माहात्म्यज्ञान ही अविद्या का निवारक हो, यह कोई आवश्यक बात नहीं है । बात दोनों ही एक हैं, स्वरूप ज्ञान और माहात्म्य ज्ञान दोनों ही समान वस्तु हैं । और तुम्हारे मतानुसार ब्रह्म स्वयं ही अनुभव स्वरूप है, उसके लिए किसी दूसरे अनुभव की अपेक्षा नहीं है, इसलिए तद्विषयक कोई ज्ञान नाम की वस्तु भी नहीं है ज्ञान को यदि स्वभावतः अज्ञान का विरोधी कहा जाय तो, वह स्वयं ही विरोधी हो जायगा, फिर भी उस अविद्या की ब्रह्माश्रयता संभव नहीं है । शुक्ति आदि अपनी वास्तविकता की प्रतीति कराने में स्वयं असमर्थ हैं, अज्ञान स्वरूप शुक्ति आदि को उस अज्ञान की निवृत्ति के लिए किसी अन्य ज्ञान की अपेक्षा होती है । ब्रह्म तो स्वानुभव सिद्ध है, उसे अपने वास्तविक स्वरूप का स्वयमेव ज्ञान है, इसलिए वह स्वयं ही अज्ञान का विरोधी है । तभी उसे किसी अन्य निवर्त्तक ज्ञान की अपेक्षा नहीं है । इस पर यदि यह कहो कि—ब्रह्म के अतिरिक्त पदार्थ के मिथ्यात्व का ज्ञान ही अज्ञान का विरोधी है, सो बात भी ठीक नहीं है—जिसे तुम ankurnagpal108@gmail.com