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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

( १०६ )

तदा अस्त्येव शास्त्रम् अस्तीति बुद्धेः । नैवम्, असति शास्त्रे, अस्ति शास्त्रमिति बुद्धेर्मिथ्यात्वात् । ततः किम् ? इदं ततः मिथ्या भूत शास्त्रजन्यज्ञानस्य मिथ्यात्वेन तद्विषयस्यापि ब्रह्मणो मिथ्या त्वम्, यथा धूमबुद्धयागृहीत वाष्पजन्याग्निज्ञानस्य मिथ्यात्वेन तद् विषयस्याग्नेरपि मिथ्यात्वम् । पश्चात्तनबाधादर्शनं चासिद्धम्, शून्यमेव तत्त्वमिति वाक्येन तस्यापि बाधदर्शनात् । तत्तु भ्रांतिमूलमिति- चेत् एतदपि भ्रांतिमूलम् इति त्वयैवोक्तम् । पाश्चात्यबाधा दर्शनं तु तस्यैवेत्यलमप्रतिष्ठित कुतर्कपरिहसनेन । अद्वैत ज्ञान के पूर्व शास्त्र यदि सद्बुद्धि बोधक हैं; तो उन शास्त्रों को गगनकुसुम की तरह मिथ्या तो कह नहीं सकते ? तत्व ज्ञान के उत्पन्न हो जाने पर ही शास्त्र की असत्यता होती है । उस स्थिति में शास्त्र, चिन्मय अद्वैत ब्रह्म, विषयक ज्ञानोत्पादन में सहायक भी नहीं होते । जिस समय वे ब्रह्म प्राप्ति के साधन रहते हैं उस समय तो शास्त्र सत्य ही हैं, तब तक तो उनकी सत्ता व्याहत होती नहीं । (वादी) उक्त बात ठीक नहीं है शास्त्र को असत्य मानने से शास्त्र में जो सत्यता की बुद्धि है, वह भी मिथ्या हो जायगी (प्रतिवादी) तो उससे क्या होगा ? (वादी) फिर इस मिथ्या शास्त्र- जन्य ज्ञान का मिथ्यात्व सिद्ध होने से, ज्ञान का विषय ब्रह्म भी मिथ्या हो जायगा । जैसे कि कोई जलीयवाष्प को देखकर धुआँ समझ कर अग्नि का अनुमान करे, वह तो उसका मिथ्या ज्ञान ही होगा तथा उस धुआँ का विषय अनुमित अग्नि भी मिथ्या होगी । तथा परवर्त्ती किसी ज्ञान के द्वारा बाधित न होने से शास्त्र प्रतिपादित ब्रह्म सत्य है; यह कथन भी प्रमाण सिद्ध नहीं है, क्योंकि "शून्य ही एक मात्र सत्य है" यह वाक्य ही उसका बाधक है। यदि कहो कि यह वाक्य भ्रांति मूलक है, तो शास्त्र को भो तो भ्रांतिमूलक तुम्हीं ने कहा है । उक्त शून्यवादी वाक्य का परवर्ती कोई बाधक प्रमाण नहीं है । अस्तु अब अधिक, अव्यवस्थित कुतर्क रूपी परिहांस से क्या होगा ? सही मार्ग पर आना चाहिए । यदुक्तं - वेदांतवाक्यानि निर्विशेषज्ञानैकरसवस्तुमात्र प्रतिपादनपराणि "सदेव सौम्येदमग्र आसीत्" इत्येवमादीनि ।

( १०७ ) तदयुक्तम् - एक विज्ञानसर्वविज्ञानप्रतिज्ञोपपादनमुखेन सत्‌ शब्दवाच्यस्य परस्य ब्रह्मणो जगदुपादानत्वं जगन्निमित्तत्वं, सर्वज्ञता, सर्वशक्तियोग, सत्यसंकल्पत्वं, सर्वान्तरत्वम्, सर्वाधारत्वं, सर्वनिय- मनम् इत्यादि अनेक कल्याणगुण विशिष्टतां कृत्स्नस्य जगतस्तदा- त्मकतां प्रतिपाद्य, एवंभूत ब्रह्मात्मकस्त्वमसीतिश्वेतकेतुं प्रत्युपंद- शाय प्रवृत्तत्वात्प्रकरणस्य । प्रपंचितश्चायमर्थो वेदार्थ संग्रहे, अत्रप्यारम्भणाधिकरणो निपुणतरमुपपादयिष्यते । “सदेव सौम्यमिदमग्र आसीत” इत्यादि वेदांत वाक्य निर्विशेष ज्ञानैकरस वस्तु के ही प्रतिपादक हैं। यह कथन भी भ्रामक है— एक के ज्ञान से सभी का ज्ञान हो जाता है इस प्रतिज्ञा के आधार पर सत्‌ पदवाच्य परब्रह्म की जगत् उपादानता, जगत् निमित्तता, सर्वज्ञता, सर्वशक्ति योग- ता, सत्य संकल्पता, सर्वान्तर्यामिता, सर्वनियामकता सर्वाधारता आदि अनेक कल्याणमय विशिष्ट गुणों और उनकी सर्व जगदात्मकता का प्रति पादन करके, ऐसा परब्रह्म "तू है" इस प्रकार श्वेतकेतु को तत्वोपदेश देने के लिए उक्त प्रकरण प्रस्तुत है। अपने वेदार्थ संग्रह में इसका विस्तृत विवेचन किया है। इस वेदांत सूत्र के आरम्भाधिकरण में भी दृढ़ता के साथ प्रतिपादन करूँगा । “अथ परा यथा तदक्षरम्” इत्यत्रापि प्राकृतान् हेयगुणान् प्रतिषिध्य नित्यत्व विभुत्व सूक्ष्मत्व सर्वगतत्वाव्ययत्वभूतयोनित्वसा- र्वज्ञादि कल्याणगुणयोग. परस्यब्रह्मणः प्रतिपादितः । “अब पराविद्या का वर्णन करेंगे जिससे अक्षर ब्रह्म की प्राप्ति होती है” इस श्रुति में प्रकृति संभूत हेयगुणों का निराकरण करके, परब्रह्म की नित्यता, व्यापकता, सूक्ष्मता,सार्वजनीनता,निर्विकारता, सर्वभूतकारणता, और सर्वज्ञता आदि कल्याण गुणों का प्रतिपादन किया गया है। “सत्यंज्ञानमनन्तंब्रह्म” इत्यत्रापि सामानाधिकरण्यस्यानेक विशेषणविशिष्टैकार्थाभिधानव्युत्पत्त्या न निर्विशेषवस्तु सिद्धिः ankurnagpal108@gmail.com

( १०८ ) प्रवृत्ति निवृत्तिभेदनैकार्थ वृत्तित्वं सामानाधिकरण्यम् । तत्र सत्यं ज्ञानादिपदमुख्यार्थैर्गुणैस्तत्तद्गुणविरोधाकार प्रत्यनीकाकारैर्वैक- स्मिन्नेवार्थे पदानां प्रवृत्तौ निमित्तभेदोऽवश्याश्रणीयः । इयांस्तु विशेषः एकस्मिन्, पक्षे पदानां मुख्यार्थता, अपरस्मिंश्च तेषां लक्षणा । न च अज्ञानादीनां प्रत्यनीकता वस्तुस्वरूपमेव, एकेनैव पदेन स्वरूपं प्रतिपन्नमिति पदान्तरप्रयोगवैयर्थ्यात् । तथा सति सामानाधिकरण्यासिद्धेश्च, एकस्मिन् वस्तुनि वर्त्तमानानां पदानां निमित्तभेदाना श्रयणात् । न च एकस्यैवार्थस्य विशेषणभेदेन विशिष्टताभेदानेकार्थत्वं पदानां सामानाधिकरयविरोधि, एक स्यैववस्तुनो अनेकविशेषणविशिष्टता प्रतिपादन परत्वात्सामाना- धिकरण्यस्य “भिन्न प्रवृत्तिनिमित्तानां शब्दानामेकस्मिन्नर्थे वृत्तिः सामानाधिकरण्यम्” इतिहिशाब्दिकाः । “ब्रह्म सत्य ज्ञान अनन्त स्वरूप है” इस श्रुति में भी ब्रह्म के साथ सत्य आदि पदों का सामानाधिकरण्य (विशेषण विशेष्यभाव का अभेद) होने से ब्रह्म की निर्विशेषता सिद्ध नहीं होती । अनेक गुण युक्त एक वस्तु का प्रतिपादन करना ही, सामानाधिकरण्य का कार्य है । विभिन्न अर्थों में प्रयोज्य शब्दों की एकार्थपरता को ही सामानाधिकरण्य कहते हैं । इसलिए सत्य ज्ञान आदि शब्दों का मुख्यार्थ, सत्यता आदि गुण रूप हो, अथवा उसके विरोधी गुण के आकारवाला हो, इन दोनों में से किसी भी एक अर्थ के ज्ञापक होने से, पदों की प्रवृत्ति, भिन्न निमित्त स्वीकारनी होगी । यही एक विशेषता होगी कि, पदों का पहिला अर्थ मुख्य तथा दूसरा अर्थ लाक्षणिक होगा। यह भी नहीं कहा जा सकता कि सत्य आदि पदों का, अज्ञान आदिविपरीत अर्थ ही वस्तु (ब्रह्म) का स्वरूप है । क्योंकि एक ही पद से जब स्वरूप सिद्ध हो जाता है तो अन्य पदों का प्रयोग करना व्यर्थ है । उक्त बात मानने से तो सामानाधिकरण्य असिद्ध हो जायगा, क्योंकि एक वस्तु में वर्त्तमान पदों का निमित्त भेद न होगा (सामानाधिकरण्य में निमित्त भेद आवश्यक है) यदि कहो कि-विशेषण के भेदानुसार एक ही वस्तु का गुणगत भेद तो रहेगा ही; इससे तो ankurnagpal108@gmail.com

( १०६ ) विशिष्ट पदों की एकार्थता स्वीकारने वाले सामानाधिकरण्य से विरोध होगा, एक ही वस्तु के अनेक विशेषणों वाली विशिष्टता का प्रतिपादन करने वाला सामानाधिकरण्य होता है, ऐसा-वैयाकरणों का भी मत है कि “भिन्न प्रवृत्ति निमित्तक शब्दों की एक अर्थ में योजना करना सामानाधिकरण्य का कार्य है ।” यदुक्तम्- “एकमेवाद्वितीयम्” इत्यत्र अद्वितीयपदं गुणतोऽपि सद्वितीयतां न सहते, अतः सर्वशाखाप्रत्ययन्यायेन कारणवाक्यानां अद्वितीय वस्तु प्रतिपादनपरत्वमभ्युपगमनीयम् कारणतयोप- लक्षितस्याद्वितीयस्य ब्रह्मणोलक्षणमिदमुच्यते “सत्यं ज्ञानमन्तं ब्रह्म” इति । अतो लिलक्षयिषितंब्रह्म निर्गु णमेव, अन्यथा निर्गुणं निरंजनं इत्यादिभिर्विरोधश्च इति। तदनुपपन्नं-जगदुपादानस्यब्रह्मणः स्वव्यतिरिक्ताधिष्ठात्रन्तरनिवारणेन विचित्र शक्तियोग प्रतिपादन परत्वात् अद्वितीय पदस्य तथैव विचित्रशक्तियोगमेवावगमयति “तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत” इत्यादि । जो यह कहा कि- “एकमेवाद्वितीयं” इस वाक्य में प्रयुक्त अद्वितीय पद, किसी भी गुण से ब्रह्म की द्वैतता नहीं स्वीकारता, इसलिए” सर्व- शाखा प्रत्यय न्याय” से अद्वितीय ब्रह्म के प्रतिपादन में ही समस्त वेदांत वाक्यों का तात्पर्य स्वीकारना चाहिए । कारण रूप से उल्लेख्य उस अद्वैत ब्रह्म को “सत्यंज्ञानमनन्तंब्रह्म” कहा गया है । उक्त लक्षण वाला ब्रह्म स्वरूप से निर्गुण ही हो सकता है, सगुण नहीं, यदि सगुण स्वी- कारेंगे तो, “निर्गुण निरंजन” इत्यादि निर्गुणता बोधक श्रुति के साथ विरुद्धता होगी । यह कथन भी असंगत है-अद्वितीय पद से ज्ञात होता है कि जगत के उपादान कारण ब्रह्म में ऐसी विचित्र अद्वितीय शक्ति है कि, उसे जगत के संचालन में किसी अन्य की सहायता अपेक्षित नहीं होती । ऐसी ही विचित्र शक्ति योग की बात इस श्रुति से पुष्ट होती है-“उसने विचार किया एक से अनेक हो जाऊँ” उसने फिर तेज की सृष्टि की” इत्यादि । ankurnagpal108@gmail.com

( ११० ) अविशेषेणाद्वितीयमित्युक्ते निमित्तान्तरमात्रनिषेधः कथं ज्ञायत इति चेत्, सिसृक्षोर्ब्रह्मण उपादानकरणत्वं “सदेव सोम्येदमग्र आसीदेकमेव” इति प्रतिपादितम्। कार्योत्पत्तिस्वाभावेन बुद्धिस्थं निमित्तान्तरमिति तदेवाद्वितीयपदेन निषिध्यते इत्यवगम्यते। सर्वं निषेधे हि स्वाभ्युपगताः सिषाधयिषिता नित्यत्वादयश्च निषिद्धाः स्युः। सर्वशाखा प्रत्ययन्यायश्चात्र भवतो विपरीतफलः सर्वशाखासु कारणान्वयिनां सर्वज्ञत्वादीनां गुणानामत्रोपसंहार हेतुत्वात्। अतः कारणवाक्य स्वभावादपि “सत्यंज्ञानमनन्तं ब्रह्म” इत्यनेन सविशेषमेव प्रतिपाद्यते, इति विज्ञायते यदि कहो कि—सामान्य अद्वितीय पद से, निमित्तान्तर मात्र के निषेध का अर्थ कहाँ से ज्ञात कर लिया ? सो वह तो, सृष्टि करने के इच्छुक ब्रह्म की उपादान कारणता के बोधक—“हे सौम्य ! यह जगत सृष्टि के पूर्व एक मात्र सद् ही था” इस वाक्य में प्रतिपादित तत्त्व से निश्चित हो जाता है। इस जगत् के निर्माण कार्य में ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कारण की सम्भावना का “अद्वितीय” पद से निषेध प्रतीत होता है। यदि “अद्वितीय” पद से सभी का निषेध स्वीकारेंगे तो नित्यता आदि जिन धर्मों का प्रतिपादन आवश्यक है, उनका भी निषेध हो जायगा। इस प्रसंग में, सर्वशाखाप्रत्ययन्याय की चर्चा तो आपके विपरीत प्रतिफलित होगी क्यों कि आपको वेदों की समस्त शाखाओं में वर्णित जगत कारण के प्रतिपादक सर्वज्ञता आदि गुणों का यही उपसंहार करना पड़ेगा। इसलिए, कारणता का प्रतिपादक वाक्य स्वाभाविक रूप से “ब्रह्म सत्य ज्ञान अनंत स्वरूप है” ऐसा सविशेष का ही प्रतिपादन करता प्रतीत होता है। न च निर्गुणवाक्य विरोधः, प्राकृतहेयगुणविषयत्वात् तेषां “निर्गुणं, निरंजनं, निष्कलं, निष्क्रियं, शान्तम्” इत्यादीनाम्। ज्ञान- मात्रस्वरूपवादिन्योऽपि श्रुतयो ब्रह्मणो ज्ञानस्वरूपतामभिदधति न तावता निर्विशेषज्ञानमात्रमेवतत्त्वम्, ज्ञातुरेव ज्ञान स्वरूपत्वात् ।

( १११ ) ज्ञानस्वरूपस्यैव तस्य ज्ञानाश्रयत्वं मणिद्युमणिदीपादिवत् उक्तमेव इत्युक्तम् । ऐसा मानने से, ब्रह्म की निर्गुणता मानने वाले वाक्यों से किसी प्रकार की विरुद्धता भी नही होती । “निर्गुण, संपर्क रहित अखंड, क्रिया- हीन, शान्त” आदि वाक्य, प्राकृत हेय गुणो से राहित्य के सूचक है । ज्ञानमात्र स्वरूप की प्रतिपादक श्रुतियाँ भी ब्रह्म की ज्ञानस्वरूपता को बतलाती है । वह जो ज्ञान स्वरूपता है, वह केवल निर्विशेष ज्ञान सूचक नहीं है, अपितु ज्ञाता की ही ज्ञानस्वरूपता की सूचक है। ज्ञान स्वरूप उस ब्रह्म की ज्ञान स्वरूपता, मणि, सूर्य प्रदीप आदि की तरह (प्रकाश गुण विशिष्ट) मानना ही सुसगत है, ऐसा पहले कह भी चुके है । ज्ञातृत्वमेव हि सर्वश्रुतयोवदंति- यः सर्वज्ञः सर्ववित्- तदैक्षत-' सेयंदेवतैक्षत--एईक्षतलोकान्नु सृज इति नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानां एको बहूनाथो विदधाति कामान् ज्ञाज्ञौद्वावजावी- शनीशौ- तमीश्वराणां परमंमहेश्वरं तं देवतानां परमं च दैवतम् पतिपतीनां परमं परस्तात् विदामदेवं भुवनेश मीड्यम् नतस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते, परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च-एष आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसंकल्पः ।" इत्याद्याः श्रुतयः ज्ञातृत्व प्रमुखान् कल्याणगुणान् ज्ञानस्वरूपस्यैव ब्रह्मणः स्वाभाविकान्वदंति, समस्त हेय रहितांच । निर्गुणवाक्यानां सगुण वाक्याना च, विषयमपहत- पाप्मेत्याद्यपिपास इत्यन्तेन हेयगुणान् प्रतिषिध्य ' सत्यकामः सत्य संकल्प" इति ब्रह्मणः कल्याणगुणान् विधतीयं श्रुतिरेव विविनक्तीति सगुणनिर्गुणवाक्ययोर्विरोधाभावादन्यतरस्य मिथ्याविषयताश्रयण- मपि नाशंकनीयम् । ankurn

( ११२ ) ब्रह्म की ज्ञातृता तो सभी श्रुतियाँ बतलाती हैं।" जो सर्वज्ञ और सर्वविद है—उसने विचारा—उस देवता ने विचारा—उसने विचार किया कि लोकों की सृष्टि करूँ--जो नित्यों का नित्य चेतनों का चेतन है वह अकेला अनेकों की कामना पूर्ण करता है--ज्ञाता और अज्ञाता दो अजन्मा, ईश और अनीश हैं—ईश्वरों के ईश्वर देवताओं के परम देवता, पतियों के परम पति, उक्त भुवनेश्वर स्तवनीय देव की आराधना करते हैं—उसका कोई कार्य कारण नहीं हैं, न उससे कोई अधिक है, और न समान है, उसकी पराशक्ति स्वाभाविकी, ज्ञान, बल, क्रिया आदि अनेक प्रकार की सुनी जाती है--वह आत्मा निष्पाप अजर, अमर, अशोक, भूख-प्यास रहित, सत्यकाम, सत्य संकल्प है।" इत्यादि श्रुतियाँ ज्ञान स्वरूप ब्रह्म के स्वाभाविक ज्ञातृता आदि गुणों का प्रतिपादन करती है तथा उसे समस्त हेय गुणों से रहित बतलाती है। निर्गुण वाक्य और सगुण वाक्य के विषय की प्रतिपादिका “अपहतपाप्मत्ता से अपिपासः” तक हीन गुणों का प्रतिषेध करके "सत्यकामः सत्यसंकल्पः” से कल्याणमय गुणों का एक साथ विवेचन करती हुई श्रुति, सगुण निर्गुण वाक्यों के विरोध का अभाव बतलाती है। इससे अन्य श्रुतियाँ मिथ्या प्रतिपादिका है, ऐसी शंका नही करनी चाहिए। “भीषाऽस्माद्वातः पवते” इत्यादिना ब्रह्मगुणानारभ्य ‘ते ये शतम्’ इत्यनुक्रमेण क्षेत्रज्ञानन्दातिशयमुक्त्वा “यतोवाचो निवर्त्तन्ते अप्राप्यमनसा सह आनन्दंब्रह्मणो विद्वान् "इति ब्रह्मणः कल्याणगुणानन्त्यमत्यादरेण वदतीयं श्रुतिः। इसी प्रकार--"इसके भय से वायु चलती है" इत्यादि से ब्रह्म के गुणों को प्रारम्भ करके "उससे शतगुण” इस क्रम से क्षेत्रज्ञ की आनन्दातिशयिता को बतलाकर "जिसे न पाकर वाणी मन सहित लौट कर आ जाती है, उस आनन्द ब्रह्म को जानकर” इत्यादि से ब्रह्म के कल्याणमय अनन्तगुणों का बड़े आदर के साथ उक्त श्रुति उल्लेख करती है [यह आनन्द बल्ली श्रुति की चर्चा है] "सोऽश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणाविपश्चिता" इति ब्रह्म वेदन फलमगमयद्वाक्यं परस्य विपश्चितो ब्रह्मणो गुणानन्त्यं ब्रवीति

( ११३ ) विपश्चिता ब्रह्मणा सह सर्वान् कामान् समश्नुते । काम्यन्त इति कामाः कल्याणगुणाः । ब्रह्मणा सह तद्गुणान् सर्वाश्नुते । दहरविद्यायां “तस्मिन्यदन्तस्त्वन्वेष्टव्यम्” इतिवद् गुणप्राधान्यं वक्तुं सह शब्दः । फलोपासनयोः प्रकारैक्यम्– “यथा, क्रतुरस्मिन् लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति” इति श्रुत्यैव सिद्धम् । “ब्रह्मज्ञ पुरुष विशेषज्ञ ब्रह्म के साथ, समस्त काम्यफलों का भोग करता है” ब्रह्मज्ञानफल को बतलाने वाला यह वाक्य, परब्रह्म के अनन्त गुणों का प्रकाश करता है । ब्रह्मज्ञ, ब्रह्म के साथ सभी कामनाओं को भोगता है अर्थात् जिनकी कामना की जाय ऐसे कल्याणमय गुण ही काम्य हैं, ब्रह्म के साथ उन कल्याणमय गुणों को ही प्राप्त करता है। दहरविद्या में “उसमें जो अन्तर है, वह अन्वेषणीय है” कहे गये इस वाक्य की तरह, गुण प्राधान्य को बतलाने वाला सह शब्द है । फल और उपासना के प्रकार की एकता “इस लोक में पुरुष, जैसा प्रयास करता है, मरने पर भी वैसा ही होता है” इस श्रुति से ही सिद्ध है । “यस्यामतं तस्यमतम्, अविज्ञातं विजानताम्” इति ब्रह्मणो ज्ञाना- विषयत्वं उक्तं चेत्; “ब्रह्मविदाप्नोतिपरम्” –ब्रह्मवेद·ब्रह्मैव भवति, इति ज्ञानान् मोक्षोपदेशो न स्यात् । असन्नेव स भवति, असद् ब्रह्मेति वेदचेत् अस्ति ब्रह्मेति चेत्वेद, सन्तमेनं ततो विदुः” इति ब्रह्मविषय ज्ञानासद्भावसद्भावाभ्यामात्मनाशमात्मसत्तां च वदति । अतो ब्रह्म- विषय वेदन मेवापवर्गोपायं सर्वाः श्रुतयोविदधति । ज्ञानं चोपासना- त्मकम् । उपास्यं च ब्रह्म सगुणमित्युक्तम्। “यतोवाचो निवर्त्तन्ते, अप्राप्य मनसा सह” इति ब्रह्मणोऽनन्तस्यापरिच्छिन्न गुणस्य वाङ्मनसयो- रेतावदिति परिच्छेदायोग्यत्वश्रवणेन ब्रह्मैतावदिति ब्रह्मपरिच्छेदज्ञा- नवतां ब्रह्माविज्ञातममतम् इत्यु क्तम्, अपरिच्छिन्नत्वाद् ब्रह्मणः । अन्यथा “यस्यामतं तस्य मतम्” “विज्ञातमविजानताम्” इति मतत्वविज्ञातत्व वचनं तत्रैव विरुद्ध्यते । ankurnagpal108@gmail.com

( ११४ ) “जो यह विचार करते हैं कि-विचार से अतीत है, वेही उसे जानते हैं, विशेष रूप से जानने का दावा करने वाला कुछ भी नही जानता” इस वाक्य में ब्रह्मज्ञान की अविषयता कही गई है, यदि ऐसा मान लोगे तो “ब्रह्मवेत्ता परब्रह्म को प्राप्त करता है “ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म ही होता है” इत्यादि ज्ञानपरक उपदेश वाक्य व्यर्थ हो जायेंगे । “जो ब्रह्म को अस्तित्वहीन मानता है, मानों वह स्वयं ही अपने अस्ति- त्व पर शंका करता है, तथा जो उसका अस्तित्व स्वीकारता है, उसे ही वास्तविक ज्ञाता जानों” इस श्रुति में ब्रह्मविषयक ज्ञान के सद्भाव और अभाव से आत्मनाश और आत्मसत्ता की बात कही गई है । इससे स्पष्ट है कि ब्रह्मविषयक ज्ञान को ही मोक्ष के लिए सारी श्रुतियाँ स्वीकारती हैं । ज्ञान को उपासनात्मक तथा उपास्य को सगुण कहा जा चुका है । “जिसको न पाकर मन सहित वाणी लौट आती है” इस श्रुति में ब्रह्म के अपरिमित अनन्त गुणों की निस्सीमता की अकथ्यता और अमननीयता बतलाकर, गुण और परिणाम से सीमित परिच्छिन्न मानने वाले लोगों को ब्रह्म तत्व से अज्ञात बतलाया गया है । ब्रह्म तो स्वभाव से ही अपरि- च्छिन्न और अनन्त हैं । उक्त श्रुति का यदि ऐसा अर्थ नहीं मानेंगे तो, उसी जगह “यस्यामतं तस्यमतं विज्ञातमविजानताम्” इस वाक्यांश में जो मतता और विज्ञातता बतलाई गई है, वह प्रकरण विरुद्ध सिद्ध होगी । यत्तु “न दृष्टेर्दृष्टारं न मतेर्मन्तारम्” इति श्रुतिर्दृष्टेर्मते व्य- तिरिक्तं द्रष्टारं मन्तारंच प्रतिषेधति इति तदागन्तुक चैतन्यगुणयो- गितया ज्ञातुर्ज्ञान स्वरूपतां कुतर्क सिद्धां मत्वा न तथात्मानं पश्येः न मन्वीथाः, अपितु द्रष्टारं मंतारमप्यात्मानं दृष्टिमति रूपमेव पश्ये- रित्यमिदधाति इति परिहृतम् । अथवा दृष्टेर्दृष्टारं, मतेर्मन्तार जीवात्मानं प्रतिषिध्य सर्वभूतान्तरात्मानं परमात्मानमेवोपास्येति वाक्यार्थः । अन्यथा “विज्ञातारमरे केन विजानीयात्” इत्यादि ज्ञातृत्व श्रुतिविरोधश्च । और जो—“दृष्टि (अनुभूति) के साक्षी और मति (चिन्तन) के प्रकाशक को नहीं जानता”—इति श्रुति में अनुभूति और मननं के द्रष्टा

: Wait, could it be: नाऽनन्दमात्रंब्रह्म? Let's look really closely at: निर्देशाच्च (space) ना Wait, look above the 'ऽ' and to its right: there is a horizontal top bar! Wait, does the 'ऽ' have a top bar? Wait, no! The top bar starts AFTER the 'ऽ' and covers the next letter! Wait, an avagraha NEVER has a top bar! And indeed, the top bar is absent over the 'ऽ'! Wait, what about the next letter? The next letter has a top bar, and underneath is: a vertical stem, with a loop to the left (), and below is ! That is न्द! Wait, but if it is just न्द, then it is ना + + न्द = नाऽन्द! Wait, could it be नाऽऽनन्द? No. Could it be नाऽनन्द? Wait, why would anyone write नाऽन्द? Because the compositor thought आनन्द is अन्द? No, because they accidentally dropped the second ! The compositor was composing: ना (from न + आ), then put for the elided , and then instead of नन्द they set न्द! That is a classic typographical error: haplography

( ११६ ) यदिदमुक्तम्--“यत्र हि द्वैतमिव भवति”--“नेह नानाऽस्ति किंचन, मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इहनानेव पश्यति--“यत्रत्वस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत् केन कं पश्येत्” इतिभेदनिषेधो बहुधा दृश्यत इति; तत्कृत्स्नस्यजगतो ब्रह्मकार्यतया तदन्तर्यामिकतया च सदात्मक- त्वेनैक्यात्, तत्प्रत्यनीक नानात्वं प्रतिषिध्यते । न पुनः “बहुस्यां प्रजा- येय” इति बहुभवन संकल्पपूर्वकं ब्रह्मणो नानात्वं श्रुति सिद्धं प्रति- षिध्यत इति परिहृतम् । नानात्वनिषेधादियमपरमार्थ विषयेति चेत्; न प्रत्यक्षादि सकल प्रमाणानवगतं नानात्वं दुरारोहं ब्रह्मणः प्रति- पाद्य तदेव बाध्यत इत्युपहासास्पदमिदम् । जो यह कहा कि--“जब द्वैतमत होता है”--“जगत में नानात्व कुछ भी नहीं है, विभिन्नता देखने वाला बारंबार मरता है”--“दृश्यमान सब कुछ ही जब आत्म स्वरूप है, तब किससे किसे देखोगे ?” इत्यादि भेद निषेधक वाक्य देखे जाते हैं; सो सारा जगत ब्रह्म का कार्य है, ब्रह्म उन सब में अन्तर्यामी और तदात्मक है, इसलिए वह इस भाव से उससे अभिन्न है उक्तभाव से विपरीत जो भिन्नता का भाव है उसका प्रतिषेध उक्त श्रुतियाँ करती हैं । (समाधान) “बहुत होकर जन्म लूंगा” ऐसे ब्रह्म के संकल्प की बाहुल्यता परक भिन्नता का निषेध नहीं किया गया है । इस संकल्प श्रुति से ही उक्त प्रतिषेध की बात का निराकरण हो जाता है । यदि कहो कि अन्यान्य श्रुतियों में जहाँ कहीं भी ब्रह्म के नानात्व का प्रति- षेध किया गया है वह अपरमार्थ विषयक ही है, सो ऐसा नहीं हो सकता, क्योंकि श्रुतियाँ प्रत्यक्ष आदि सभी प्रमाणों से अज्ञात दुरूह भिन्नता वाले ब्रह्मण का प्रतिपादन करके, उसी का निषेध कर दें यह तो उपहासास्पद बात है । “यदा ह्येवैष एतस्मिन्नुदरमन्तरं कुरुते अथतस्य भयं भवति” इति ब्रह्मणिनानात्वं पश्यतो भयप्राप्तिरिति यदुक्तम्, तदसत् “सर्वं- खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत” इति तन्नानात्वानुसंधा- नस्य शांति हेतुत्वोपदेशात् । तथा हि सर्वस्य जगतदुत्पत्तिस्थिति- ankurnagpal108@gmail.com

( ११७ ) लयकर्मतया यदात्मकत्वानुसंधानेनात्र शान्तिर्विधीयते । अतो यथा- वस्थित देवतिर्यङ्मनुष्यस्थावरादिभेदभिन्नं जगद् ब्रह्मात्मकमिति अनुसंधानस्य शांति हेतुतया अभय प्राप्ति हेतुत्वेन न भय हेतुत्व प्रसंगः । एवं तर्हि “अथ तस्य भयंभवति” इति किमुच्यते ? इदं उच्यते-“यदाह्येष एतस्मिन्नदृश्येऽनात्म्येऽनिरुक्तेऽनिलयनेऽभयं प्रतिष्ठां विन्दते । अथ सो भयं गतो भवति” इत्यभय प्राप्ति हेतुत्वेन ब्रह्मणि या प्रतिष्ठा अभिहिता, तस्या विच्छेदेभयं भवतीति । यथो- क्तं महर्षिभिः-“यन्मुहूर्त्तंक्षणं वापिवाःसुदेवो न चिन्त्यते, साहा- निस्तन्महच्छिद्र साभ्रान्तिस्सा च विक्रिया ।” इति । ब्रह्मणि प्रतिष्ठाया अन्तरमवकाशो विच्छेद एव । “साधक जब इस ब्रह्म में थोड़ा भेद करता है, तभी उसे भय होता है” इस श्रुति में, ब्रह्म में भेद देखने वाले व्यक्ति की जो भय प्राप्ति बत- लाई गई है वह वास्तविक नहीं । है “यह सब कुछ ब्रह्म ही है, सब कुछ उसी से उत्पन्न होकर उसी में लीन हो जाता है । इसलिए उसकी शान्त भाव से उपासना करो” इस श्रुति में, उस ब्रह्म में जो विभिन्नता ढूंढते हैं, उसकी शान्ति के लिए उपदेश दिया गया है । तथा, समस्त जगत् की उत्पत्ति स्थिति और संहार कर्म उसी पर ब्रह्म के ही स्वरूप हैं, ऐसा अनु संधान करने से ही शान्ति मिलेगी ऐसा उक्त वाक्य का तात्पर्य है । इस- लिए देव, पशु, मनुष्य स्थावरादि भेदों वाला समस्त जगत् ब्रह्मात्मक ही है, ऐसा अनुसंधान ही शांति का कारण बतलाया गया है, उसी से अभयता प्राप्ति होती है, भय प्राप्ति का तो प्रसंग ही नहीं है । यदि ऐसी ही बात है तो “अथ तस्य भयं भवति” ऐसा क्यों कहा ? ऐसी जिज्ञासा होती है—ऐसा कहने का तात्पर्य ये है कि--“यह साधक जब अदृश्य अनि र्वाच्य, स्वप्रतिष्ठ ब्रह्म में सर्वभय निवारक निष्ठा करता है, तब वह निर्भय हो जाता है” इस श्रुति में ब्रह्म निष्ठा का, भय शांति के उपाय के रूप से जो उपदेश दिया गया है, उसके विच्छेद से भय बतलाया गया है । जैसा कि महर्षि वेदव्यास ने कहा भी है--“जिस मुहूर्त्त या क्षण में वासुदेव का चिन्तन नहीं किया जाता, वही सबसे बड़ी क्षति अनिष्ट ankurnagpal108@gmail.com

( ११८ ) प्राप्ति का मार्ग, भ्रांति और चित्त का विकार है”। वस्तुतः ब्रह्म प्रतिष्ठा से विलग होना ही विच्छेद है। यदुक्तम्-“न स्थानतोऽपि” इति सर्वविशेषरहितं ब्रह्मोति च वक्ष्यतीति; तन्न सविशेषं ब्रह्मेत्येव हि तत्र वक्ष्यति । “मायामात्रं तु” इति च स्वप्नामप्यर्थानां जागरितावस्थानुभूत पदार्थवैधर्म्येण माया- मात्रत्वमेवमुच्यत इति जागरितावस्थाऽनुभूतानामिव पारमार्थिक- त्वमेव वक्ष्यति । जो यह कहा कि—सूत्रकार “न स्थानतोऽपि” सूत्र में ब्रह्म को निर्वि- शेष ही सिद्ध करते हैं; सो बात नहीं है, वहाँ तो सविशेष ब्रह्म का ही प्रतिपादन किया गया है। तथा “मायामात्रं हि” इस सूत्र में स्वप्नदृष्ट विषयों को, जागरित अवस्थानुभूत पदार्थों से विपरीत होने के कारण मायामात्र बतलाते हैं, एवं जागरित अवस्थानुभूत विषयों की तरह होने से उनकी पारमार्थिकता बतलाते हैं। स्मृतिपुराणयोरपि निर्विशेषज्ञानमात्रमेव परम

भूतसर्गः इच्छगृहीताभि मतोरुदेहस्संसाधिताशेष जगद्धितोऽसौ”- तेजोबलैश्वर्यं महाबबोध सुवीर्यशक्त्यादिगुणैकराशिः परः पराणां सकलानयत्र क्लेशादयस्संति परावरेशे”-“स ईश्वरो व्यक्तिसमष्टि- रूपोऽव्यक्तरूपः प्रकट स्वरूपः सर्वेश्वरस्सर्वदृक्सर्ववेत्ता समस्त शक्तिः परमेश्वराख्यः”-“संज्ञायते येन तदस्तदोषं शुद्धं परं निर्मल मेकरूपम्, संदृश्यते वाप्यधिगम्यते वा तज्ज्ञानमज्ञानमतोऽन्यदुक्तम्”-शुद्धे महा- विभूत्याख्ये परे ब्रह्मणि शब्द्यते मैत्रेय भगवच्छन्द सर्वकारण कारणे”-“संभर्तेति तथा भर्त्ता भकारोऽर्थ द्वयान्वितः नेतागमयिता स्रष्टा गकारार्थः तथासुने”-“ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्ययशसश्रियः ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षष्णां भग इतीरणा”--“वसंति तत्र भूतानि भूतात्मन्यखिलात्मनि, सच भूतेष्वशेषेषु वकारार्थस्ततोऽव्ययः”- “ज्ञानशक्तिबलैश्वर्यवीर्यतेजांस्यशेषतः, भगवच्छब्दवाच्यानिविना हे यैर्गुणादिभिः”--“एवमेव महाशब्दो मैत्रेय भगवानिति, परंब्रह्म भूतस्य वासुदेवस्य नान्यगः”-“तत्रपूज्यपदार्थोक्ति परिभाषा समन्वितः, शब्दोऽयंनोपचारेणअन्यत्र ह्युपचारतः”--समस्तशक्तयश्चैतानृप यत्र प्रतिष्ठिताः तद्विश्वरूपवैरूप्यंरूपमन्यद्धरेर्महत्” समस्त शक्ति रूपाणि तत्करोतिजनेश्वर देवतिर्यङ् मनुष्याख्याचेष्टावंतिस्वलीलया जगतामुपकाराय न सा कर्मनिमित्तजा चेष्टातास्याप्रमेयस्य व्यापिन्य व्याहतात्मिका”--एवं प्रकारममलं नित्यं व्यापकमक्षयं समस्त हेयरहितं विष्ण्वाख्यं परमं पदम्” परः पराणां परमः परमाऽत्मात्म- संस्थितः रूपवर्णादिनिर्देश विशेषेण विवर्जितः”-- अपक्षय विनाशा- भ्यां परिणामद्विजन्मभिः । वर्जितश्शक्यतेवक्तुं यस्सदाऽस्तीतिकेवलम् — सर्वत्राऽसौ समस्तं च वसत्यत्रेति वैयतः ततस्सवासुदेवेति वि- द्वद्भिः परिपठ्यते”-- तद् ब्रह्म परमं नित्यमजमक्षरमव्ययम् एक स्वरूपं च सदा हेयाभावाच्च निर्मलं”--तदेव सर्वमेवैतद्व्यक्ता-

व्यक्त स्वरूपवत् तथा पुरुषरूपेण च स्थितम्”—प्रकृतिर्या मयाऽख्याता व्यक्ताव्यक्त स्वरूपिणी पुरुषश्चाप्युभावेतौ लीयेते परमात्मनि”— परमात्मा च सर्वेषामाधारः परमेश्वरः विष्णुनामा स वेदेषु वेदांतेषु च गीयते”— द्वे रूपे ब्रह्मणस्तस्य मूर्त्तंचामूत्तं मेव च, क्षराक्षरस्व रूपेते सर्वभूतेषु च स्थिते”—अक्षरं तत् परं ब्रह्म क्षरं सर्वमिदं- जगत् एकदेशस्थितस्याग्नेर्ज्योत्सना विस्तारिणी यथा परस्य ब्रह्म णश्शक्तिस्तयेदमखिलं जगत्”—'विष्णुशक्तिः पराप्रोक्ताक्षेत्रज्ञाख्या तथाऽपरा अविद्या कर्म संज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते”—यथा क्षेत्र ज्ञशक्तिस्सा वेष्टितानृप सर्वगा संसारतापानखिलान् अवाप्नोति अतिसंततान्”—तया तिरोहितत्वाच्च शक्तिः क्षेत्रज्ञसंज्ञिता सर्वभूतेषु भूपाल तारतम्येन वर्तते”—प्रधानं चपुमांश्चैव सर्वभूतात्मभूतया विष्णुशक्त्या महाबुद्धे वृतौ संश्रयधर्मिणौ”—तयोस्सैव पृथग्भाव- कारणं संश्रस्य च यथासक्तं जलेवातो विभर्ति वाणिकाशतम्”— शक्तिस्साऽपि तथा विष्णोः प्रधानपुरुषात्मनः”—तदेतदक्षयं नित्यं जगन्मुनिवराखिलम् आविर्भावतिरोभावजन्मनाश विकल्पवत्”। इत्यादिना परंब्रह्म स्वभावतएव निरस्तनिखिलदोषगंध समस्त कल्याण गुणात्मकं जगदुत्पत्तिस्थितिसंहारान्तः प्रवेशनियमनादि- लीलं प्रतिपाद्य कृत्स्नस्य चिदचिद्वस्तुनः सर्वावस्थावस्थितस्य परमार्थिकस्यैव परस्य ब्रह्मणः शरीरतया रूपत्वम् शरीररूपतन्वः शक्तिविभूत्यादिशब्दैः तत्तच्छब्द सामानाधिकरण्येन चाभिधाय तद्विभूतिभूतस्य चिद्वस्तुनः स्वरूपेणवस्थितिमन्मिश्रतया क्षेत्र ज्ञरूपेण स्थितिं चोक्त्वा क्षेत्रज्ञावस्थायां पुण्यपापात्मककर्मरूपा अविद्यावेष्टित्वेन स्वाभाविकज्ञानरूपत्वाननुसंधानमचिद्रूपार्था कारतयाऽनुसंधानं च प्रतिपादितमिति परंब्रह्म सविशेषम् तद्विभू तिभूतं जगदपि पारमार्थिकमेवेति ज्ञायते।

( १२१ ) स्मृति और पुराणों में भी निर्विशेष ज्ञान मात्र को ही परमार्थ तथा अन्य को अपारमार्थिक बतलाया गया है, यह कथन भी असत् है (निम्नां- कित उदाहरणों से उक्त कथन का निराकरण हो जायेगा) “जो लोग मुझे अजन्मा और अनादि जानते हैं—समस्त प्राणी मुझमें अवस्थित हैं ,मैं उनमें अवस्थित हूँ—ऐश्वर्य योग से मुझमें स्थिति प्राणियों को देखो, जो कि मुझ भूतभावन, भूतरक्षक में विद्यमान है— मैं ही समस्त जगत की उत्पत्ति और प्रलय का कारण हूँ—मुझसे अधिक कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है—जैसे मणियाँ सूत्र में ग्रथित रहती हैं वैसे सारा जगत मुझमें ग्रथित है—मैं एकांश से सारे जगत में व्याप्त हूँ—मैं श्रेष्ठ पुरुष परमात्मा नाम से प्रसिद्ध हूँ—मैं तीनों लोकों में प्रविष्ट होकर रक्षा करने वाला ईश्वर हूँ—क्षर और अक्षर से अतीत और उत्तम मैं लोक वेद में पुरुषोत्तम नाम वाला हूँ” “सर्वभूत, अव्यक्त प्रकृति, प्राकृतविकारों तथा गुण दोषों से रहित ,हर प्रकार के आवरणों से रहित, समस्त जगत के आत्मा वे ही ,भुवनगत समस्त वस्तुओं के आवरण के रूप में स्थित हैं—वे समस्त उत्कृष्ट गुणों से परिपूर्ण, अपने अंश से समस्त जगत की सृष्टि करने वाले स्वेच्छा से विराट रूप धारण करके समस्त जगत का कल्याण साधन करते हैं मानस तेज ,शारीरिक बल अणिमादि ऐश्वर्य ,समुन्नत ज्ञान ,वीर्य एवं शक्ति आदि गुणों के वे ही एक मात्र आश्रय हैं—बुद्धि मन जीव आदि से परात्पर उन परमेश्वर में क्लेश आदि कोई दोष नहीं हैं--वे व्यष्टि और समष्टि व्यक्त और अव्यक्त से अवस्थित, सर्वेश्वर, सर्वदर्शी, सर्वज्ञ ,सर्वशक्ति और परमेश्वर नाम से प्रसिद्ध हैं'—जिनके आश्रय से लोक ज्ञान पाता है, वह् स्वभावतः निर्दोष, विशुद्ध, महत्, निर्मल और एक रूप हैं—वे दीखते हैं या प्रतीतिगम्य हैं (भक्त को दीखते हैं, ज्ञानी को उनकी प्रतीति होती है) ऐसा ज्ञान ही यथार्थ, बाकी सब कुछ अज्ञान है । “सब कारणों के कारण, शुद्ध महाविभूति परब्रह्म के लिए भगवान शब्द का प्रयोग किया जाता है; इसमें भ के दो अर्थ हैं, संभर्त्ता (शासक) और भर्त्ता (धारक) ग के अर्थ है, नेता और प्रापक । संम्पूर्ण ऐश्वर्य (अणिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशिता, वशिता और कामावसायिता) वीर्य (शक्ति)यश श्री (भाग्यसंपत ज्ञान, और वैराग्य इन ankurnagpal108@gmail.com

( १३२ ) छः को भग कहते हैं। व का अर्थ है अव्यय और निर्विकार, ऐसे भगवत शब्द वाले वे सर्वभूतों के आत्मा, सर्वात्मक है, उन्हीं में सारे भूत स्थित है। हीन गुणों से रहित, समस्त ज्ञान-शक्ति-वल-ऐश्वर्य-वीर्य और तेज ये छः भगवत शब्द वाच्य है। ऐसे अत्युत्तम भगवान वासुदेव से भिन्न और कोई नहीं है। पूज्यार्थ बोधन में परिभाषित यह भगवत् शब्द उसी (वासुदेव) मे मुख्यभाव से प्रयुक्त होता है, अन्य जगत गौण रूप से होता हैं। पूर्वोक्त छः शक्तियाँ जिनमें प्रतिष्ठित है, वही हरि का, जगत् विल- क्षण, अप्राकृत महत् रूप है। वे ही अपनी लीला के प्रभाव से देव, मनुष्य पशु पक्षी आदि की सृष्टि के लिए चेष्टावान होते हैं। जगत के उपकार के लिए उन अप्रमेय भगवान की जो सृष्टि लीला होती है, वह कर्म निमित्तक नहीं होती अपितु अयत्नभूत, व्यापक और अव्याहत होती है। विष्णु नामक परंपद ही निर्मल, नित्य, व्यापक अक्षर और हीनगुणों से रहित है। उत्तम ब्रह्मा आदि से अति उत्तम, स्व प्रतिष्ठ, रूप, वर्ण आदि गुणों से रहित परमात्मा, क्षय-नाश-परिणाम-वृद्धि और जन्म से रहित है। वे एकमात्र "अस्ति" शब्द से ही ज्ञेय है। सर्वव्यापक उनमें, समस्त वस्तुएं वास करती हैं, इसीलिए विद्वान उन्हें वासुदेव कहते हैं। उस परब्रह्म का स्वरूप, नित्य-अज-अक्षर-अव्यय-,सदाएक, हीन गुण रहित निर्मल है। वे स्थूल-सूक्ष्म स्वरूप, पुरुष रूप और काल में अवस्थान करते हैं। “व्यक्त और अव्यक्त रूप जिन पुरुष प्रकृति की बात कही गई, वे दोनों ही परमात्मा में लीन हो जाते हैं। उन ब्रह्म के दो रूप, मूर्त्त और अमूर्त्त, क्षर और अक्षर नामसे प्रसिद्ध, प्राणिमात्र में अवस्थित है। वह पर ब्रह्म अक्षर और सारा जगत क्षर है। एक स्थान में स्थित अग्नि की ज्वाला जैसे विस्तृत हो जाती है वैसे ही परब्रह्म की शक्ति भी समस्त जगत के रूप में विस्तृत होती है। विष्णु पराशक्ति हैं तथा क्षेत्रज्ञ अपराशक्ति है, कर्म का प्रवर्त्तन करने वाली अविद्या शक्ति तृतीय है। क्षेत्रज्ञ शक्ति स्वभाव से सर्वगामिनी होने से अविद्यामय कर्म से वेष्टित होकर निरन्तर संसार के संतापों का भोग करती है। क्षेत्रज्ञ (जीव) शक्ति, अविद्या से आवृत होकर ज्ञान के तारतम्यानुसार सब भूतों में निवास करती है। प्रधान और पुरुष दोनो ही समस्त भूतों की आत्मा के रूप से स्थित, विष्णु शक्ति-द्वारा समावृत है। विष्णु

' (तदुच्यते). The 'द' has a rounded back, then a tail. In line 28, the letter has... wait, it's 'र' or 'द'? Actually, looking closely at line 28: Is it: "मूर्त्तरव्यविभागं"? Or "मूर्त्तद्रव्यविभागं"? Wait, look at: 'द्र' in Devanagari: it has the head of 'द', and a slash at the bottom left: 'द्र'. Here, the head is round like 'द', or hook like 'र'? It has a horizontal top bar, a vertical stem, then an arch, but it doesn't go right. It's 'र'! Wait, what about 'र' with 'व्य'? Could it be a typo for 'द्रव्य'? Yes, in lead typesetting, the compositor often picked 'र' instead of 'द', or 'द्र' broke, resulting in 'रव्य'! So it is printed as 'मूर्त्तरव्यविभागं' or 'मूर्त्तद्रव्यविभागं'. Wait, let's look at: "मूर्त्तरूपविभागं" vs "मूर्त्तरव्यविभागं". If we look at the image: The first character after 'त्त' is: It has a top bar, a vertical stroke, then a hook to the left and curves down... wait, that's 'र'. Then the second character has: a loop on the left, a

( १२६ ) हो सकते, क्योंकि—उनकी बोध शक्ति स्वतः सिद्ध नहीं होती, अन्य से लब्ध होती है। इसलिए स्वभावसिद्ध ज्ञानसंपन्न निर्मल ब्रह्म ही एक मात्र ध्येय है।” इत्यादि परब्रह्म विष्णु के स्वरूप को अपने से श्रेष्ठ ध्येय शुभाश्रय बतलाया गया है। इस वाक्य का प्रतिपाद्य भेद अप लाप (बकवास) नहीं प्रतीत होता। “ज्ञानस्वरूपम्” इत्यत्रापि ज्ञानव्यतिरिक्तस्यार्थजातस्य कृत्स्नस्य न मिथ्यात्वं प्रतिपाद्यते, ज्ञानस्वरूपस्यात्मनो देवमनुष्यादि अर्था- कारेणावभासो भ्रांतिरित्येतावन्मात्र वचनात्। नहि शुक्तिकाया रजततयाऽवभासो भ्रांतिरित्युक्ते जगति कृत्स्नं रजतजातम् मिथ्या भवति। जगद्ब्रह्मणोः सामानाधिकरण्येनैक्य प्रतीते., ब्रह्मणो. ज्ञान स्वरूपस्यार्थकारता भ्रांतिरित्युक्ते सति अर्थजातस्य कृत्स्नस्य मिथ्या त्वमुक्तं स्यादिति चेत्; तदसत् अस्मिन् शास्त्रे परम्यब्रह्मणोः विष्णो निरस्ताज्ञानादिनिखिलदोषगंधस्य समस्तकल्याणगुणात्मकस्य महा विभूतेः प्रतिपन्नतया तस्य भ्रांतिदर्शनासम्भवात्। सामानाधिकर- ण्येनैक्य प्रतिपादनं च बाधासहम्, अविरुद्धं चेत्यनन्तरमेवोपपादा यिष्यते। अतोऽयमपि श्लोको नार्थस्वरूपस्य बाधकः। “ज्ञानस्वरूपं” इस वाक्य में भी, ज्ञान से भिन्न सभी पदार्थों के मिथ्यात्व का प्रतिपादन नहीं किया गया है। ज्ञानमय आत्मा देव,मनुष्य आदि आकारो से अवभासित मात्र ही, है ऐसा समझना भ्रांति है। और न शुक्ति में होने वाली रजत भ्रांति के कारण जगत की सारी रजत राशि ही मिथ्या है। “रजत और ब्रह्म की सामानाधिकरण्य (विशेषण विशेष्य) भाव परक ऐक्य प्रतीति होने से ब्रह्म के ज्ञानस्वरूप की जडजगदाकारता रूप प्रतीति भी भ्रांति ही है, इसीलिए सारे ही जागतिक पदार्थों का मिथ्यात्व है।” तुम्हारा यह कथन भी मिथ्या है, क्योंकि—इस वेदान्त शास्त्र में अज्ञान आदि समस्त दोषों से रहित, कल्याणमय गुणोंवाले पर ब्रह्म विष्णु की महाभूति से प्रतिपन्न सारे जगत को बतलाया गया है, इसलिए उसमें मिथ्यात्व देखना सम्भव नहीं है (अर्थात् यह जगत महामा- ankurnagpal108@gmail.com

( १२७ ) (हम विष्णु की शक्ति का विलासमात्र है ऐसे जगत को मिथ्या कैसे कह सकते हो ? ) सामानाधिकरण्य परक ऐक्य प्रतीति की बात भी असंगत है, यदि तुम कहो कि, नहीं अविरुद्ध है; तो हम इसका अभी सयुक्तिक उत्तर देंगे । पर "ज्ञानस्वरूपं" आदि श्लोक प्रभु के जागतिक रूप का बाधक नहीं सिद्ध होता । तथाहि—"यतो वा इमानि भूतानि जायंते, येन जातानि जीवंति यत्प्रयंत्यभिसंविशंति, तद्विजिज्ञासस्व, तद्ब्रह्म" इति जगज्जन्मादिकारणं ब्रह्म'त्यवसिते सति; "इतिहास पुराणाभ्यां वेदं समुपबृंहयेत् विभेत्यल्पश्रु तात् वेदो मामयं प्रतरिष्यति” इति शास्त्रे- ऽस्यार्थस्य इतिहास पुराणाभ्यामुपबृंहणं कार्यमिति विज्ञायते । उपबृंहण नाम विदितसकलवेदतदर्थानां स्वयोगमहिमसाक्षात्कृतवेदतत्वा- र्थानांवाक्यैः स्वावगतभेदवाक्यार्थ व्यक्तीकरणम् । सकल शाखागत- स्य वाक्यार्थस्याल्पभागश्रवणात् दुखगमत्वेन तेन विना निश्चयायो- गादुपबृंहणं हि कार्यमेव । तथा—"जिससे ये सारे भूत उत्पन्न होते हैं, जिससे जीवित रहते हैं, तथा मृत्यु के समय जिसमें प्रविष्ट होते हैं, उन्हीं को जानो, वही ब्रह्म है" इस श्रुति से जगत के जन्मादि के कारण, परब्रह्म हैं, ऐसा निश्चित हो जाने पर—"इतिहास और पुराणों से वेद का उपबृंहण करना चाहिए अल्पज्ञपुरुष मेरे तत्व को छत विक्षत कर देगा, इससे वेद सदा भयभीत रहता है" इस वाक्य से ज्ञात होता है कि—वेद के अर्थ का इतिहास और पुराण से उपवृंहण करना चाहिए । वेद और वेदार्थ से अवगत, योग महिमा से, वेद तत्व को साक्षात्कार करने वाले महापुरुषों के वाक्यों से अपने ज्ञात वेदार्थ को सुस्पष्ट कर लेना ही उपवृंहण है । वेद के एकांश मात्र के अध्ययन से, अनेकानेक वेद शाखाओं से संबद्ध वेद वाक्यों का अर्थ निर्णय करना संभव नहीं है, इसलिए उक्त प्रकार का वेदोपवृंहण आवश्यक है । तत्र पुलस्त्य वशिष्ठ वरप्रदानलब्ध परदेवतापारमार्थ्य ज्ञानवतो भगवतः पराशरात् स्वावगत वेदार्थोपबृंहणमिच्छुन्मैत्रेयः ankurnagpal108@gmail.com