श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
( ३१५ ) “कृत्यल्युटो बहुलम्” इति वा कर्त्तरिल्युडाश्रीयते । नंद्यादित्वं वाऽश्रित्य “नंदिग्रहि” इत्यादिना कर्त्तरि ल्युः । अतएव च “विज्ञानं यज्ञं तनुते” कर्माणि तनुतेऽपि च ‘ इति यज्ञादि कर्त्तृत्वं विज्ञानस्य श्रूयते । बुद्धिमात्रस्य हि न कर्त्तृत्वं संभवति । अचेतनेषु हि चेतनोप- करणभूतेषु विज्ञानमयात् प्राचीनेष्वन्नमयादिषु न चेतनधर्मभूतं कर्त्तृत्वं श्रूयते । अतएव च चेतनमचेतनंच स्वासाधारणैः निलयनत्वा- निलयत्वादिभिर्धर्मविशेषैर्विभज्य निर्दिशद्वाक्यं “विज्ञानं चाविज्ञानं च” इति विज्ञान शब्देन तद्गुणं चेतनं वदति । व्याकरणीय “कृत्यल्युटोबहुलम्” इस नियम से कर्त्तृवाच्य में ल्युट प्रत्यय के आश्रय से, तथा नंद्यादि धातुओं के पाठ में ज्ञा धातु के पाठ होने से “नंदिग्रहि” इत्यादि व्याकरणीय नियम से कर्त्तृवाच्य में “ल्यु” प्रत्यय करके तथा व्याकरणीय नियम से ल्यु को अन् प्रत्यय करने से ज्ञान शब्द निष्पन्न होता है । इसीलिए “विज्ञानं यज्ञं तनुते कर्माणि तनुतेऽपि च” इस वाक्य में यज्ञादिकर्म का कर्त्तृत्व विज्ञान का बतलाया गया । केवल बुद्धि में तो कर्त्तृत्व संभव है नहीं । उक्त प्रसंग में विज्ञानमय के पूर्ववर्त्ती अन्नमय आदि में तो चेतन धर्म की कोई चर्चा ही नहीं है। जो कि, चेतन के उपकरण स्वरूप हैं। विज्ञान शब्द का चेतन अर्थ करने के लिए ही, निलयता (विश्वाधारत) अनिलयता आदि असाधारण स्वीय धर्म विशेष द्वारा विभक्त, चेतन और अचेतन, के निर्देशक “विज्ञानं चाविज्ञानं” वाक्य में, विज्ञान शब्द से, विज्ञान गुणसंपन्न चेतन को बतलाया गया है । तथाऽन्तर्यामि ब्राह्मणे ‘यो विज्ञाने तिष्ठन्” इत्यस्य काण्व- पाठगतस्य पर्यायस्य स्थाने ‘य आत्मनि तिष्ठन्” इति पर्यायम धीयाना माध्यन्दिनः काण्वपाठगतं विज्ञानशब्द निर्दिष्टं जीवात्मेति स्फुटीकुर्वन्ति । विज्ञानं इति च नपुंसकलिंगं वस्तुत्वा- भिप्रायं, तदेवं विज्ञानमयात् जीवात् अन्यस्तदन्तरः परमात्मा आनंदमयः ।
३. द्वितीयाध्याय: अविरोधाध्याय (प्रधान, परमाणु, शून्यवाद खण्डन व जीव-ब्रह्म सम्बन्ध)
( ३१६ ) तथा इसी प्रकार काण्वशाखोक्त अन्तर्यामी ब्राह्मण के “जो विज्ञान में अवस्थान करता है” इस वाक्य में जिसे “विज्ञान” शब्द से निर्देश किया गया है, उसे ही माध्यन्दिन शाखीय “जो आत्मा में अवस्थान करता है” इस वाक्य में “आत्मा” शब्द से बतलाया गया, इस प्रकार विज्ञान का पर्यायवाची शब्द आत्मा सिद्ध होता है जिससे विज्ञान का अर्थ जीवात्मा सुस्पष्ट है । विज्ञान शब्द का जो नपुंसक लिंग में प्रयोग किया गया है, वह वस्तुत्व का बोधक है । इससे निर्णय होता है कि— विज्ञानमय जीव से अतिरिक्त कोई विज्ञानमय का अन्तरात्मा परमात्मा आनंदमय है । यद्यपि “विज्ञानं यज्ञं तनुते” इति श्लोके ज्ञानमात्रमेवोपादी- यते, न ज्ञाता, तथाऽपि “अन्योन्तरात्मा विज्ञानमयः” इतितद्वान् ज्ञातैवोपदिश्यते, यथा— “अन्नाद् वैः प्रजाः प्रजायंते” इत्यत्र श्लोके केवलान्तोपादानेऽपि “स वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः” इत्यत्र नान्नमात्रं निर्दिष्टम्, अपि तु तन्मयः तद्विकारः । एतत् सर्वं हृदि निधाय सूत्र- कारः स्वयमेव “भेदव्यपदेशात्” इत्यनन्तरमेव वदति । यद्यपि-- विज्ञान यज्ञ का विस्तार करता है” इस वाक्य में ज्ञान मात्र का ही उपादान किया गया है, ज्ञाता का नहीं, फिर भी “भिन्न ही कोई अन्तरात्मा है, जो कि विज्ञानमय है” इस वाक्य में विज्ञानमय ज्ञाता (जीव) का ही निर्देश किया गया है । जैसे कि--“अन्न से ही प्रजा का जन्म होता है’ इस श्लोक में केवल अन्न को उपादान बतलाया गया है तथा “वही यह पुरुष अन्नरसमय है” इस वाक्य में अन्नमय के विकृतदेह का उल्लेख किया गया है । इन सभी बातों को हृदयंगम करके सूत्रकार ने स्वयं ही “भेदव्यपदेशात्” सूत्र में जीवात्मा-परमात्मा की भिन्नता स्पष्ट बतला दी है । यदुक्तं जगत्कारणतया निर्दिष्टस्य “अनेनेजीवेनात्मनाऽनु-
- प्रविश्य “तत्वमसि” इति च जीवसामानाधिकरण्यनिर्देशाज्जगत् कारणमपि जीवस्वरूपान्नातिरिच्यत इति कृत्वा जीवस्यैव स्वरूपं “ब्रह्मविदाप्नोति परम्” इति प्रक्रान्तमसुखाद्व्यावृत्तत्वेनानंदमय ankurnagpal108@gmail.com
( ३१७ ) इत्युपदिश्यत इति तदयुक्तम्, जीवस्य चेतनत्वे सत्यपि "तदैक्षत बहु- स्यां प्रजायेयेति तत्तेजोऽसृजत्" इतिस्वसंकल्पपूर्वकानन्तविचित्र सृष्टियोगानुपपत्तेः । शुद्धावस्थस्यापि हि तस्य सर्गादिजगद्व्यापार- संभवो-"जगद्व्यापारवर्जम्" भोगमात्रसाम्यलिंगात्" इत्यत्रोपपा- दयिष्यते । जो यह कहते हैं कि—जगत कारण रूप से निर्दिष्ट "मैं ही जीव रूप से इसमें प्रवेशकर" तथा "तू वही है" इत्यादि वाक्यों में जीवात्मा और परमात्मा का जो सामानाधिकरण्य अभेद संबंध बतलाया गया है, वह-जीव के अतिरिक्त परमात्मा कोई अन्य वस्तु नहीं है, ऐसा बतलाता है तथा जीव के ही स्वरूप को 'ब्रह्मवेत्ता परतत्त्व को पा जाता है" इस वाक्य में, परतत्त्वता को प्राप्त, दुःख से अनावृत आनंदमय कहा गया है । सो आपका यह कथन भी असंगत है--क्योंकि—"उसने विचार किया कि बहुत होकर प्रकट होऊँ" उसने तेज की सृष्टि की "इत्यादि वाक्यों में जिस स्वसंकल्पात्मिका विविधरूपा सृष्टि का वर्णन किया गया है, वह चेतनता होते हुए भी, जीव के सामर्थ्य के बाहर की बात है ।' विशुद्धावस्थापन्न जीव से भी ऐसी जागतिक सृष्टि संभव नहीं है । ऐसा ही—सूत्रकार—"जगद्व्यापारवर्जम् "तथा" भोगमात्र साम्यलिंगाच्च" सूत्रों में बतलाते हैं । कारणभूतस्य ब्रह्मणो जीवस्वरूपत्वानभ्युपगमे "अनेन जीवेना- त्मना" तत्त्वमसीति सामानाधिकरण्यनिर्देशः कथमुपपद्यत इति चेत्—कथं वा निरस्तनिखिलदोषगंधस्य सत्य- संकल्पस्य सर्वज्ञस्य सर्वशक्ते रनवधिकातिशया संख्येयकल्याणगुणगणस्य सकलकारणभूतस्यब्रह्मणः नानाविधानन्तदुःखाकरकर्माधीन चिन्तितनिमिषितादिसकलप्रवृत्तिजीवस्वरूपत्वम् ? अन्यतरस्य मिथ्यात्वेनोपपद्यत इति चेत्, कस्य भोः ? किं हेयसंबन्धस्य ? किं वा हेयप्रत्यनीककल्याणैकतानस्वभावस्य हेयप्रत्यनीक कल्याणैकतानस्य ब्रह्मणोऽनाद्यविद्याश्रयत्वेन हेयसंबंध मिथ्याप्रति- ankurnagpal108@gmail.com
( ३१८ )
भासो मिथ्या रूप इति चेत्, विप्रतिषिद्धमिदमभिधीयते, ब्रह्मणो हेयप्रत्यनीककल्याणैकतानत्वमनाद्यविद्याश्रयत्वेनानंतदुःखविषय मिथ्या- प्रतिभासाश्रयत्वं चेति । अविद्याश्रयत्वं तत्कार्यदुःखप्रति- भासाश्रयत्वं चैव हि हेय संबंधः । तत्संबन्धित्वं प्रत्यनीकत्वं च विरुद्धमेव । तथाऽपि तस्य मिथ्यात्वान्न विरोध इति मा वोचः । मिथ्याभूतमप्यपुरुषार्थ एव तन्निरसनाय सर्वेवेदांता आरभ्यंत इति ब्रूषे । निरसनीयापुरुषार्थयोगश्च हेयप्रत्यनीककल्याणैकतानतया विरुध्यते । यदि आप पूछें कि—कारणभूत ब्रह्म की जीवस्वरूपता न मानने से "अनेन जीवेन" तथा "तत्त्वमसि" आदि वाक्यों से सम्मत सामाना- धिकरण रूप अद्वैत की बात कैसे बनेगी ? मैं पूछता हूं कि—समस्त दोषों से रहित, सत्य संकल्प, सर्वज्ञ, सर्वशक्ति, अनंत अपार असंख्य कल्याण गुणैकराशि, सभी के एकमात्र कारण ब्रह्म की, अनेक दुःखों की खान, कर्माधीन, चिन्तित, क्षणभंगुर प्रवृत्तिवाली जीव स्वरूपता कैसे संभव होगी ? आप कहें कि—जीवात्मा-परमात्मा की भिन्नता, मिथ्यात्व आभास मात्र है । तो वह मिथ्यात्व आप किसका मानते हैं ? जीवात्मा के हेयगुण संबंधों का, अथवा हेयगुणों के प्रतिपक्षी कल्याणगुण समन्वित परमात्मा के स्वभाव का ? यदि, हेयता रहित कल्याणैकतान ब्रह्म का, अनादि अविद्या के आश्रय से, हेय संबंध मिथ्या प्रतिभास है, तो एक ही ब्रह्म में, हीनता रहित कल्याणगुणैकतानता और अनादि अविद्याश्रित अनंत दुःखों का विषयता संबंधी मिथ्या प्रतिभासाश्रय, ये दोनों परस्पर विरोधी बातें कैसे संभव हैं ? अविद्या की आश्रयता, तथा उससे संभूत दुःख प्रतिभासाश्रयी हेयगुण संबंध, और ब्रह्म संबंधी हेयगुण प्रतिपक्षता, ये दोनों बातें विरुद्ध ही तो हैं । इस पर भी मिथ्याभास का आश्रय लेकर यह मत कहो कि—विरुद्धता नहीं होगी । मिथ्या होते हुए भी वह त्याज्य है, उसको हटाने के लिए सारे ही वेदांत वाक्य उपदेश देते हैं, ऐसा भी तुम्हीं स्वीकारते हो [अर्थात् मिथ्यात्व को, हेय और त्याज्य मानते हो तो उसे मिथ्याभास कैसे कह सकते हो ?] जिस वस्तु को त्याज्य मानते
( ३१६ ) हैं, वह हेय प्रतिपक्षी कल्याणैकतान गुणों से विरुद्ध ही है, तभी तो त्याज्य है। किं कुर्मः ? “येनाश्रुतं श्रुतं भवति” इत्येकविज्ञानेन सर्व- विज्ञानं प्रतिज्ञाय “सदेव सोम्येदमग्र आसीत्” इत्यादिना निखिल- जगदेककारणतां, “तदैक्षत बहुस्याम्” इति सत्यसंकल्पतां च ब्रह्मणः “तत्त्वमसि” इति सामानाधिकरण्ये नानंतदुःखाश्रयजीवैक्यं प्रतिपादितम्, तदन्यथानुपपत्त्या ब्रह्मण एवाविद्याश्रयत्वादि परि- कल्पनीयमिति चेत् । विवश होकर यदि कहो कि क्या करे ? “जिसके द्वारा अश्रुत भी श्रुत होता है” इस वाक्य से एक विज्ञान से समस्त विज्ञान की बात को बतलाकर “हे सौम्य यह सारा जगत् सन् ही था” इत्यादि वाक्य से ब्रह्म की सर्व जगत्कारणता मानकर “उसने विचार किया कि बहुत हो जाऊँ” इस वाक्य से ब्रह्म की सत्य संकल्पता का भी प्रतिपादन करके, उसी ब्रह्म की “तू वही है” इस वाक्य द्वारा अनंत दुःखाश्रयी जीव की सामानाधिकरण्य रूप एकता प्रतिपादित की गई है, इसलिए अगत्या हमें, ब्रह्म की परस्पर विरोधी असंगत ( बद्धता और मुक्तता ) बातों के परिहार के लिए, ब्रह्म मे ही अविद्याश्रयत्व आदि की परिकल्पना करनी पडती है । श्रुतोपपत्तयेऽप्यनुपपन्नं विरुद्धं च न कल्पनीयम् अथ हेय संबंध एव पारमार्थिकः, कल्याणैकस्वभावता तु मिथ्याभूता, हन्तैवं, तापत्रयाभिहतचेतनोज्जिजीविषया प्रवृत्तं शास्त्रं, तापत्रया- भिहतिरेव तस्य पारमार्थिकी, कल्याणैकस्वभावस्तु भ्रांतिपरि- कल्पित इति बोधयत् सम्यगुज्जीवयति । अथैतद्दोषपरिजिहीर्षया ब्रह्मणो निर्विशेषचिन्मात्रस्वरूपातिरिक्तजीवत्व दुःखित्वादिकं सत्यसंकल्पत्वकल्याणगुणाकरत्वाद्यपि मिथ्याभूतं कल्पनीयमिति चेत्; अहो भवतां वाक्यार्थपर्यालोचनकुशलता । एक विज्ञानेन सर्व- विज्ञानप्रतिज्ञान सवस्य मिथ्यात्वे सर्वस्य ज्ञातव्यस्याभावान्न ankurnagpal108@gmail.com
( ३२० ) सेत्स्यति। यद्येकविज्ञानं परमार्थविषयम्, तच्चैव सर्वविज्ञानमपि यदि परमार्थविषयम् तदन्तर्गतं च तदा तत् ज्ञानेन सर्वविज्ञानमिति- शक्यते वक्तुम् न हि परमार्थशुक्तिका ज्ञानेन तदाश्रयमपरमार्थं रजतं ज्ञातं भवति । ( विवाद ) ऐसी शास्त्र विरुद्ध और युक्ति विरुद्ध कल्पना करना ठीक नहीं है। यदि हेयगुण संबंध को परमार्थिक तथा कल्याणैकतान स्वभावता को अपारमार्थिक मान लेंगे तो, त्रितापतापित चेतन जीवों की शांति के लिए जो उपाय शास्त्रों में बतलाए गए हैं, उनका क्या समाधान होगा ? क्या तापत्रयाभिहति को ही पारमार्थिक तथा कल्याण स्वभाव वस्तु को भ्रांति कल्पित मानना उचित होगा ? यदि उक्त दोष के परिहार के लिए, ब्रह्म के निर्विशेष चैतन्य स्वरूप के विरोधी जीवत्व, दुःखित्व आदि धर्म तथा सत्यसंकल्पत्व, कल्याणगुणाकरत्व, जगत्कारणत्व आदि सभी मिथ्या हैं, ऐसी परिकल्पना करते हैं, तो आपकी वाक्यपर्या- लोचना के कौशल की बलिहारी है। वाह, समस्त वस्तु के मिथ्या हो जाने पर कोई ज्ञातव्य विषय ही न रह जायगा, तथा एक के ज्ञान से समस्त का ज्ञान होता है, यह नियम भी व्यर्थ हो जायगा । जब एक वस्तु संबंधी ज्ञान परमार्थ विषयक होगा तभी, समस्त विषयक ज्ञान पारमार्थिक हो सकता है तभी यह नियम लागू हो सकेगा कि—एक की जानकारी से समस्त की जानकारी होती है। अन्यथा, सीप का सही ज्ञान और चांदी संबंधी ज्ञान जो कि सीप नहीं है तथा सीप के समान सही भी नहीं है, उन दोनों को एक मानना पड़ेगा। पारमार्थिक सीप संबंधी ज्ञान से, सीप के आश्रित अपारमार्थिक रजत, की प्रतीति नहीं हो सकती । अथोच्येत — एक विज्ञानेन सर्वविज्ञानप्रतिज्ञायाः, अयमर्थः “निर्विशेषवस्तु मात्रमेव सत्यम्” इति । न तर्हि “येन अश्रुतं श्रुतं भवति, अमतं मतम्, अविज्ञातं विज्ञातं” इति श्रूयेत् । येन श्रुतेन अश्रुतमपि श्रुतं भवतीत हि अस्य वाक्यस्यार्थः । कारणतयोपल- क्षितनिर्विशेषवस्तुमात्रस्यैव सद्भावश्चेत्प्रतिज्ञातः “यथा सौम्येकेन ankurnagpal108@gmail.com
( ३२१ ) मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातम्” इति दृष्टान्तोऽपि न घटते । मृत्पिण्ड विज्ञानेन हि तद्विकारस्य ज्ञातता निदर्शिता । तत्रापि विकारस्यासत्यताऽभिप्रेतेति चेत्, मृद्विकारस्य रज्जुसर्पादिवद- सत्यत्वं शुश्रूषोरसिद्धमिति प्रतिज्ञातार्थ संभावना प्रदर्शनाय “यथा सोम्य” इति प्रसिद्धवदुपन्यासो न युज्यते । न च तत्त्वमस्यादि वाक्यजन्यज्ञानोत्पत्तेः प्राग्विकारजातस्य असत्यतामापादयत् तर्कानु- गृहीतं वा प्रमाणमुपलभामह इति । अयमर्थः “तदन्यत्वमारम्भण शब्दादिभ्य” इत्यत्र वक्ष्यते । जो यह कहो कि—एक विज्ञान से सर्व विज्ञान की प्रतिज्ञा का तात्पर्य है कि “निर्विशेष वस्तु मात्र ही सत्य है ।” सो यह कथन भी ठीक न होगा ।” जिससे अश्रुत श्रुत-अमत, मत तथा अज्ञात, ज्ञात होता है” इस वाक्य का सही अर्थ यह है कि—जिससे अश्रुत पदार्थ भी परिश्रुत होता है । यदि, एकमात्र कारणताविशिष्ट को ही शास्त्र में सत्य माना गया होता तो, “सोम्य ! एक मृत्पिण्ड से सारे मृण्मय पदार्थों का ज्ञान हो जाता है” यह दृष्टान्त संगत नहीं हो सकता । इस उदाहरण में मृत्पिण्ड से विकारता दिखलाई गई है । इस पर भी कहें कि—यहाँ भी, विकार की असत्यता ही कही गई है, तो भी मिट्टी के निर्मित घड़े आदि, रस्सी में सर्प की भ्रान्ति की तरह, असत्य तो प्रतीत होते नहीं । अनुभूत पदार्थ की सत्यता के प्रतिपादन की संभावना मात्र के लिए ही केवल, “हे सौम्य !” इत्यादि वाक्य में प्रसिद्ध नियम का व्याख्यान किया गया हो, ऐसा समझ में नहीं आता । न “तत्त्वमसि” आदि वाक्यजन्य ज्ञानोत्पत्ति के पूर्व का कोई ऐसा तर्कानुमोदित प्रामाणिक वाक्य ही मिलता है, जिससे विकृत पदार्थों की असत्यता सिद्ध हो सके । इस सारे तात्पर्य को सूत्रकार—तदन्यत्वमारम्भणशब्दादिभ्यः’ सूत्र में बतलाते हैं । तथा—“सदेवसोम्येदमग्र आसीत् एकमेवाद्वितीयं”तदैक्षत बहु- स्यां प्रजायेयेति, तत्तेजोऽसृजत्”—“हन्त इमास्तिस्रो देवता, अनेन जीवेनात्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि”—“सन्मूलाः सौम्येमाः ankurnagpal108@gmail.com
( ३२२ ) सर्वाः प्रजाः सदायतनाः सत्प्रतिष्ठाः...—ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्" इत्यादिना अस्य जगतः सदात्मकता, सृष्टे पूर्वकाले नामरूप विभागप्रहाणम्, जगदुत्पत्तौ सच्छब्दवाच्यस्यब्रह्मणः, स्वव्यतिरिक्त- निमित्तान्तरा म पे क्ष त्वं सृष्टिकाले अहमेव अनंतस्थिरत्रसरूपेण “बहुस्याम्” इति अनन्यसाधारणसंकल्पविशेषः, यथा संकल्पमनंत विचित्र तत्त्वानां विलक्षणक्रमविशेषविशिष्टासृष्टि. समस्तेषु अचेतनेषुवस्तुषु स्वात्मकजीवानुप्रवेशेनैवानंतनामरूपव्याकरणं, स्व- व्यतिरिक्तस्य समस्तस्य स्वमूलत्वम्, स्वायत्ततत्वं, स्वप्रवर्त्त्यत्वं, स्वेनैव जीवनम्, स्वप्रतिष्ठत्वमित्याद्यनंतविशेषाः शास्त्रैकसमधिगम्याः प्रतिपादिताः । तत्संबंधितया प्रकरणान्तरेष्वप्यपहतपाप्मत्वा- दिनिरस्तनिखिलदोषतासर्वज्ञतासर्वेश्वरत्वसत्यकामत्वसत्य
( ३२३ ) विलीन हो जाती है"—यह सारा ही जगत ब्रह्मात्मक है।" इत्यादि शास्त्र वाक्यों में, जगत की सदात्मकता, सृष्टि के पूर्व नाम रूप विभाग का निराकरण, तथा सृष्टि कालिक अनंत स्थावर जंगम रूपों में व्यक्त होने का ब्रह्म का अनन्य असाधारण संकल्प विशेष, संकल्पानुरूप विलक्षण क्रम विशेष, विचित्र विशिष्ट सृष्टि रचना, एवं समस्त अचेतन वस्तुओं में जीवरूप से प्रवेश कर नाम रूप व्याकृति, अपने में ही समस्त जीवों की लीनता, इत्यादि ब्रह्म की अनंत विशेषताओं का प्रतिपादन किया गया है। उन्हीं विशेषताओं से संबंधित अन्य प्रकरणों में भी, निष्पापता, निर्दोषता, सर्वज्ञता, सर्वेश्वरता, सत्यकामता, सत्यसंकल्पना, सर्वानंद- कारिता, अत्यानंदमयता, इत्यादि अनेक प्रामाणिक सहस्रों विशेषताओं का भी प्रतिपादन किया गया है। इस प्रकार असाधारण अगोचर, अनंत विशेषण विशिष्ट ज्ञेय ब्रह्म के बोधक "तत्" शब्द की निर्विशेष (सामान्य) वस्तुओं से समता नितान्त असंगत प्रतीत होनी है, यह तो प्रमत्तों का सा प्रलाप है। "त्वं" पद संसारी विशिष्ट जीवात्मा का बोधक है उसकी भी यदि निर्विशेष ( सामान्य ) रूप से कल्पना की जाय तो, "त्वं" पद के वास्तविक अर्थ का गला घोटना मात्र है। वह निर्विशेष प्रकाशस्वरूप वस्तु अविद्या से आवृत हो जाती है इसलिए उसके वास्तविक स्वरूप का नाश हो जाता है; यह संभावना भी असंभव है, ऐसा पहिले ही कह चुका हूँ। यदि ऐसा मान लेंगे तो, सामानाधिकरण्य बोध्य तत् त्वं दोनों ही पदों के मुख्यार्थ का त्याग करके लक्षणा का आश्रय लेना पड़ेगा। अथोच्येत—सामानाधिकरण्यवृत्तानामेकार्थप्रतिपादनपरतया विशेषणांशे तात्पर्या संभवादेव विशेषणनिवृत्तेर्वस्तुमात्रैकत्वप्रति- पादनान्नलक्षणा प्रसंगः । यथा “नीलमुत्पलम्” इति पदद्वयस्य विशेष्यैकत्वप्रतिपादनपरत्वेन नीलत्वोत्पलत्वस्वरूपविशेषणद्वयं न विवक्ष्यते । तद्विवक्षायां हि नीलत्वविशिष्टाकारेणोत्पलत्व- विशिष्टाकारस्यैकत्वप्रतिपादनं प्रसज्यते । तत्तु न संभवति न हि नैल्यविशिष्टाकारेण तद्वस्तूतपलपदेन विशेष्यते, जातिगुणयोरन्योन्य समवायप्रसंगात् । अतो नीलत्वोत्पलक्षितवस्त्वेकत्वमात्रं सामाना-
( ३२४ ) धिकरण्येन प्रतिपाद्यते । तथा-“सोऽयं देवदत्तः” इत्यतीतकाल विप्र- कृष्टदेशविशेषस्य तेनैव रूपेण सन्निहितदेशवर्त्तमानकालविशिष्टतया प्रतिपादनानुपपत्ते रुभयदेशकालोपलक्षितस्वरूपमात्रैक्यं सामाना- धिकरण्येन प्रतिपाद्यते । यद्यपि नीलमित्याद्येकपदश्रवणे प्रतीयमानं विशेषणं सामानाधिकरण्यवेलायां विरोधान्न प्रतिपाद्यते । तथाऽपि वाच्येऽर्थे प्रधानांशस्य प्रतिपादनान्न लक्षणा । अपितु विशेषणांशस्या विवक्षामात्रम् सर्वत्र सामानाधिकरण्यस्यैष एव स्वभाव इति न कश्चिद्दोष इति । यदि कहो कि-समानता बतलाने वाले शब्दों का तात्पर्य अभेद प्रतिपादन ही है, इसलिए यहाँ-जीव, ब्रह्म का विशिष्ट अंश है-ऐसा अर्थ नहीं हो सकता । समानता के प्रसंग में विशेषता का प्रश्न स्वतः ही निवृत्त हो जाता है तथा वस्तुगत एकत्व मात्र की प्रतीति होती है इसलिए लक्षणा द्वारा अर्थ करने की बात ही उपस्थित नहीं होती [अर्थात् परमात्मा और जीवात्मा की विशेषताओं को हटाकर उनकी वास्तविक एकता को समझ लिया जावे तो-वह और तू का भेद, जो कि औपचारिक अर्थ है-समाप्त हो जायगा । लक्ष्यार्थ करने की क्या आवश्यकता है ?] जैसे कि-“नीलोत्पल” वाक्य मे दो पदों द्वारा विशेष्य और विशेषण का प्रतिपादन किया गया है, न कि नीलत्व और उत्पलत्व दो विशेषणों की योजना है। यदि इन दोनों को अलग-अलग विशेषण रूप से कहा गया होता तो नीलत्व विशिष्टाकार से, उत्पलत्व विशिष्टाकार की एकता का प्रतिपादन हो जाता । सो तो संभव हो नही सकता, क्यों उत्पलत्व, नीलत्व का विशेषण होगा नही। ऐसा होने से तो जाति और गुण का अन्योन्य समवाय संबंध हो जायगा । इसलिए समझना चाहिए कि-नीलत्व और उत्पलत्व धर्मद्वयविशिष्ट वस्तुओं की, सामानाधिकरण्य द्वारा ही, एकता बतलाई गई है । तथा “यह वही देवदत्त है” इस वाक्य में भी, अतीत काल और स्थान विशेष में देखे गए, देवदत्त को देखकर वर्त्तमान काल में जो उपलब्धि होती है, उसमें, रूप सामानाधिकरण्य ही, कारण है । इसी से एकता की प्रतीत होती है ।
( ३२५ ) यद्यपि केवल एक पद "नील" को सुनकर यही ज्ञात होता है कि, यह किसी वस्तु की विशेषता का बोधक है, पर जब उसकी समानता की जाती है तब विरोधी तत्त्व होने के कारण उसकी वैसी प्रतीति नही होती, किन्तु वाच्यार्थ में प्रधान अंश का प्रतिपादन ज्ञात होता है । इसलिए उक्त प्रसंग में लक्षणा करने की आवश्यकता नहीं होती अपितु विशेषणांश के जानने मात्र की आवश्यकता होती है । सभी जगह सामानाधिकरण्य का ऐसा ही विधान है इसलिए कोई दोष नहीं है । तदिदमसारं—सर्वेष्वेववाक्येषु पदानां व्युत्पत्तिसिद्धार्थ संसर्ग विशेषमात्रं प्रत्याय्यम् । तत्र समानाधिकरणवृत्तानामपि नीलादि- पदानां नैल्यादिविशिष्टएवार्थो व्युत्पत्ति सिद्धः, पदान्तरार्थं संसृष्टो- ऽभिधीयते । यथा "नीलमुत्पलमानय" इत्युक्ते नीलिमादिविशिष्ट- मेवानीयते । यथा च "विन्ध्याटव्यां मदमुदितो मातंगगणः तिष्ठति" इति पदद्वयावगतविशेषणविशिष्ट एवार्थः प्रतीयते । एवं वेदांत वाक्येष्वपि समानाधिकरणनिर्देशेषु तत्तद्विशेषणविशिष्टमेव ब्रह्म प्रतिपत्तव्यम् । न च विशेषण विवक्षायामितरविशिष्टाकारं वस्त्व- न्येन विशेष्टव्यम् । अपितु सर्वै विशेषणैः स्वरूपमेव विशेष्यम् । (वाद) ऊपर कही गई सारी युक्तियाँ असंगत हैं । प्रायः सभी वाक्यों में पद समूहों का केवल व्युत्पत्ति लभ्य अर्थ का विशेष संबंध ही, प्रतीति-गम्य होता है । सामानाधिकरण्य में प्रवृत्त, "नील" पद का विशिष्ट अर्थ "नीलिमा" ही व्युत्पत्ति सिद्ध अर्थ है । जो कि अन्य पदार्थ से संबंधित हो सकता है जैसे कि—नीलकमल लाओ" कहने पर नीलिमा गुण विशिष्ट कमल ही लाया जाता है । तथा "इस विन्ध्याटवी में मदोन्मत्त हाथियों के झुंड रहते हैं" इस वाक्य में भी, मदोन्मत्त और हस्ति समूह इन दो पदों में विशेषण और विशिष्ट अर्थ की प्रतीति होती है । इसी प्रकार समानाधिकरण्य बोधक वेदांत वाक्यों में भी, विशेषण और विशिष्ट भाव से ब्रह्म का प्रतिपादन किया गया है । जहाँ कहीं भी,
( ३२६ ) विशेषण द्वारा विशेषता बतलाने की चेष्टा की गई है, वहां विशिष्टाकार- वाली किसी अन्य वस्तु की विशेषता नहीं बतलाई गई है । अपितु सभी विशेषणों से स्वरूप की ही विशेषता बतलाई गई है । तथा हि “भिन्नप्रवृत्तिनिवृत्तानां शब्दानामेकस्मिन्नर्थे वृत्तिः सामानाधिकरण्यम्” इति अन्वयेन निवृत्त्या वा पदान्तर प्रतिपाद्या- दाकारादाकारान्तर युक्ततया तस्यैव वस्तुनः पदान्तर प्रतिपाद्यत्वं सामानाधिकरण्यकार्यम् । यथा-“देवदत्तः श्यामो युवा लोहिताक्षोऽ दीनोऽकृपणोऽनवद्यः” इति यत्र त्वेकस्मिन्वस्तुनि समन्वयायोग्यं विशेषणद्वयं समानाधिकरणपदनिर्दिष्टम् तत्राप्यन्यतरत्पदममुख्य- वृत्तमाश्रीयते, न द्वयम् । यथा “गौर्वाहीकः' इति । नीलोत्पलादिषु तु विशेषणद्वयान्वयाविरोधादेकमेवोभयविशिष्टं प्रतिपाद्यते । तथा--“विभिन्नार्थ बोधक शब्द समूहों की जो एक मात्र अर्थ- बोधकता है उसे ही सामानाधिकरण्य कहते है इस नियम के अनुसार, अन्वय द्वारा हो या अन्यार्थ बोध द्वारा हो, दोनों ही स्थिति में, पदान्तर प्रतिपाद्य विषय में अर्थगत पार्थक्य नहीं होता । एक ही वस्तु को विभिन्न पदों से प्रतिपादन करना ही समानाधिकरण्य का कार्य है । जैसे कि- “देवदत्त श्यामवर्णवाला युवक रक्तनेत्र, अदीन अकृपण और अनवद्य है”—इस वाक्य में सामानाधिकरण्य के नियम से अनेक गुणों वाला एक ही देवदत्त है। जहाँ एक ही वस्तु में समन्वय के अयोग्य, दो विशेषण, सामानाधिकरण्य भाव से प्रयुक्त होते हैं, वहाँ पर भी एक पद का गौण अर्थ स्वीकारना होगा, दोनों का मुख्य अर्थ नहीं होगा। जैसे कि 'भार वाही बैल” इसमें एक का मुख्य और दूसरे का गौण अर्थ है। 'नीलोत्पल" में तो दो विशेषणों के समन्वय में विरोध होने से एकता है इसलिए दोनों में विशिष्टता का प्रतिपादन हो जाता है । अथ मनुषे—एकविशेषणप्रतिसंबन्धित्वेन निरूप्यमाणं विशेष- णान्तरप्रतिसंबन्धित्वात् विलक्षणम्-इति-घटपटयोरिवैकविभक्ति निर्देशेऽप्यैक्यप्रतिपादनासंभवात् सामानाधिकरणशब्दस्य न ankurnagpal108@gmail.com
( ३२७ )
विशिष्ट प्रतिपादनपरत्वं, अपितु विशेषणमुखेन स्वरूपमुपस्थाप्य तदैक्यप्रतिपादनपरत्वमेव इति । यदि यह मानें कि--कोई वस्तु एक विशेषण से विशेषित होने पर, दूसरी विशेषण विशिष्ट वस्तु से निश्चित ही विलक्षण या भिन्न होगी । जैसे, घट पट आदि में समान विभक्ति के होते हुए भी, एकता संभव नहीं हैं । वैसे ही अन्यत्र भी समान विभक्ति का निर्देश होने पर विभिन्न विशेषण विशिष्ट पदार्थों का ऐक्य नहीं होगा इसलिए समाना- धिकरण शब्द का विशिष्टार्थ प्रतिपादन में तात्पर्य नहीं होता, अपितु विशेषण के रूप से वस्तु के स्वरूप का उपस्थापन या बोध संपादन कराकर उन सबका ऐक्य प्रतिपादन करना ही उसका कार्य होता है । स्यादेतदेवम्—यदि विशेषणद्वयप्रतिसंबन्धित्वमात्रमेवैक्यं निरु- न्ध्यात् । न चैतदस्ति, एकस्मिन् धर्मिण्युपसंहर्तुमयोग्यधर्मद्वय- विशिष्टत्वमेव हि एकत्वं निरुणद्धि । अयोग्यता च प्रमाणान्तर- सिद्धाघटत्वपटत्वयोः । “नीलमुत्पलम्” इत्यादिषु तु दण्डित्व- कुण्डलित्वावद्रूपवत्त्वरसवत्त्वगन्धवत्त्वादिष्वच्च विरोधो नोप- लभ्यते । न केवलमविरोध एव, प्रवृत्तिनिमित्तभेदेनैकार्थनिष्ठत्व- रूपं सामानाधिकरण्यमुपपादयत्येव धर्मद्वयविशिष्टताम् । अन्यथा स्वरूपमात्रैक्ये अनेकपदप्रवृत्तौ निमित्ताभावात् सामानाधिकरण्य- मेव न स्यात् । विशेषणानां स्वसंबंधानादरेण वस्तुस्वरूपोपलक्षण परत्वे सत्येकेनैवस्तूपलक्षितमित्युपलक्षणान्तरमनर्थकमेव, उपलक्ष- णान्तरोपलक्ष्याकारभेदाभ्युपगमे तेनाकारेण सविशेषत्वप्रसंगः । हो सकता है, ऐसा हो, पर केवल दो विशेषणों का संबंध ही अभेद का निरोधक हो, ऐसा नहीं है, अपितु एक धर्मी (विशेष पदार्थ) से दो विभिन्न धर्मों वाले विशेषणों का संबंध सर्वथा अयोग्य है वही एकता का विरोधी है । घटत्व और पटत्व में जो इस प्रकार की अयोग्यता है, वह प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से सिद्ध होती है । “नील उत्पल” इस उदाहरण में
( ३२८ ) “दण्डित्व, कुण्डलित्व” की तरह रूपत्व, रसत्व और गंधवत्व आदि होते हुए भी एकता के विरुद्ध नही है । इस प्रकार केवल विरोध का अभाव ही नही है, अपितु प्रवृत्ति निवृत्ति के भेदानुसार जो सामानाधिकरण्य का नियम है, उसके अनुसार भी दो धर्मों वाली विशेषताओं का उपपादन हो जाता है । केवल वस्तु स्वरूप की एकता के बतलाने, या अनेक पदों के प्रयुक्त होने पर भी उपयुक्त कारण न होने से सामानाधिकरण्य का नियम लागू नहीं हो सकता । विशेष्य के साथ विशेषणों का संबंध स्वीकार न करके, केवल वस्तुमात्र बोधकता ही स्वीकारी जाय, तब भी, एक विशेषण से ही जब वस्तु की विशेषता उपलक्षित हो जाती है, तब अन्यान्य विशेषण स्वतः ही व्यर्थ हो जाते हैं । अन्यान्य विशेषणों द्वारा यदि उपलक्ष्य वस्तु का, आकार भेद ही माना जावे, तब भी उन विशे- षणों से वस्तु की सविशेषता सिद्ध हो जाती है । “सोऽयं देवदत्तः” इत्यत्रापि लक्षणा गन्धो न विद्यते, विरोधा- भावात् । देशान्तरसंबंधतयाऽतीतस्य सन्निहितदेशसंबंधतया वर्त्तमानत्वाविरोधात् । अतएव हि “सोऽयम्” इति प्रत्यभिज्ञा कालद्वयसंबंधिनोवस्तुन ऐक्यमुपपाद्यते वस्तुनः स्थिरत्ववादिभिः । अन्यथा प्रतीतिविरोघे सति सर्वेषां क्षणिकत्वमेव स्यात् । देश- द्वयसंबंधविरोधस्तु कालभेदेन परिह्रियते । “यह वही देवदत्त है” इस उदाहरण में भी किसी प्रकार की लक्षणा की संभावना नही है । क्योंकि—लक्षणा का कारणीभूत किसी भी प्रकार का विरोध नहीं है । अतीत और स्थानान्तर में दृष्ट व्यक्ति के वर्त्तमान में देखे जाने पर उस व्यक्ति में कोई अन्तर तो आ नहीं जाता; ‘यह वही है’ ऐसा जो स्मृति परक ज्ञान है, वह काल द्वय ( भूत और वर्त्तमान ) में दृष्ट एक ही व्यक्ति के अभेद का ही द्योतक है—ऐसा वस्तुस्थिरत्व वादियों का मत है । अन्यथा, प्रतीति के अनुसार भेद मान लेने से तो, सारी ही वस्तुएं क्षणिक माननी पड़ेंगी दो स्थानों की जो विभिन्नता है, वह कालभेद से निवृत्त हो जाती है । यतः समानाधिकरणपदानामेकविशेषणविशिष्टैकार्थवाचि-
( ३२६ ) त्वम्, अतः एव “अरुणयैकहायन्या पिंगाक्ष्या सोमं क्रीणाति” इत्या- रुण्यादिविशिष्टैकहायन्या क्रयः साध्यतया विधीयते । इससे सिद्ध होता है कि समानाधिकरण पदों की अनेक विशेषण विशिष्ट एकार्थ बोधकता है । जैसे कि-“रक्तवर्णा पिंगाक्षी एक वर्ष वाली गो के बदले वह सोम खरीदता है” इसमें अरुणत्वादिविशिष्ट गौ से सोमक्रय की साध्यता बतलाई गई है । तदुक्तम् ”अर्थैकत्वे द्रव्यगुणयोरैककर्म्यान् नियमः स्यात्” इति । तत्रैवं पूर्वपक्षी मन्यते-यदप्यरुणयेति पदमाकृतेरिव गुणस्यापि द्रव्य- प्रकारतैकस्वभावत्वाद् द्रव्यपर्यन्तमेवारुणिमानमभिदधाति, तथाऽ- प्येकहायनि अन्वयनियमोऽरुणिम्नो न संभवति, एकहायन्या क्रीणाति तच्चारुण्येत्यर्थद्वयविधानासम्भवात् । ततश्चारुण्येति वाक्यं भित्वा प्रकरणविहितसर्वद्रव्यपर्यन्तमेवारुणिमानमविशेषेणाभिदधाति । अरुण्येति स्त्रीलिंगनिर्देशः प्रकरणविहित सर्वलिंगद्रव्याणां प्रदर्शनार्थः । तस्मादेकहायनि अन्वयनियमोऽरुणिम्नो न स्यात् इति । पूर्वमीमांसादर्शन में कहा गया है कि--“अर्थ ( प्रयोजन ) यदि एक हो तो गुण और द्रव्य ( अर्थात् विशेष्य और विशेषण ) का एक कर्म से ही प्रयोजन सिद्ध होगा, ऐसा नियम है ।” इस नियम के अनुसार पूर्व पक्षी ऐसा मानते हैं कि- आकृति के समान गुण भी जब द्रव्य का प्रकार ( विशेषण ) होता है तब आकृति और गुण एक स्वभाव के होते हैं “अरुणा” पद अरुणिमा युक्त द्रव्य का सही अर्थ “लाल गौ” ठीक ही करता है, फिर भी “अरुणिमा” की एकहायनीयता के साथ अन्वय की आवश्यकता सिद्ध नहीं हो पाती । “एकवर्षीया से खरीदत। है” और वह भी “लाल रंग वाली से” ये दो भिन्न विशेषताओं को बतलाने वाले, समानता के विपरीत विशेषण हैं । इन दोनों को मानने से ‘अरुणा’ इत्यादि वाक्य से, प्रकरणस्थ सभी द्रव्यों का अरुणिमा से संबंध हो जाता है । अरुणया” पद में जो स्त्रीलिंग का निर्देश किया गया है, वह प्रकरणस्थ
संपूर्ण लिंगक द्रव्यों का बोधक है, यह भी मानना पड़ेगा । “अरुणिमा” के साथ “एक वर्षीया” का संबंध हो ही ऐसा कोई नियम नहीं है । अत्राभिधीयते “अर्थैकत्वे द्रव्यगुणयोरेककर्म्यान्नियमः स्यात्” –“अरुणयैकहायन्या” इत्यारुणयविशिष्टद्रव्यैकहायनीद्रव्यवाचिप- दयोः सामानाधिकरण्येनाऽर्थैकत्वे सिद्धे सत्येकहायनीद्रव्यारुण्य- गुणयोररुणयेति पदेनैव विशेषणविशेष्यभावेन संबंधिताऽभिहितयोः क्रयाख्यैक कर्मान्वयाविरोधादरुणिम्नः क्रयसाधनभूतैकहायन्यन्वय नियमः स्यात् । इस पर यजुर्वेद ६।१।६ में निर्णय किया गया है कि—“अर्थ ( प्रयोजन ) यदि एक हो तो गुण और द्रव्य ( विशेषण-विशेष्य ) दोनों का एक कर्म से प्रयोजन सिद्ध होगा” “अरुण्यैकहायन्या” इस उदाहरण में अरुण्यत्व विशिष्ट द्रव्यवाची अरुण शब्द और एकहायनी द्रव्यवाची एकहायनी शब्द की सामानाधिकरण्य के नियम से एकार्थ प्रतिपादनता जब
( ३३१ ) 'एकहायनी' पद की सामानाधिकरण्य के नियम से एकहायनीयता मात्र ही प्रतीत होती है, गुण संबंध तो प्रतीत होता नहीं। विशिष्ट द्रव्यों की एकता करना ही सामानाधिकरण्य का कार्य है। जैसा कि—कैय्यट ने वृद्ध्याह्निक पर लक्षण बतलाया कि—"विभिन्नार्थ बोधक शब्द समूहों की एक मात्र अर्थ बोधकता ही सामानाधिकरण्य है।" [अर्थात्--एक- हायनी शब्द गाय का विशेषण नहीं है अपितु उसकी उम्र का बोधकमात्र है, जब कि अरुणिम शब्द उसकी वर्ण विशेषता का परिचायक है; एक हायनी के बदले सोमक्रय करना कोई विशेषता नहीं रखता अपितु अरुणिम होने से गाय की विशिष्टतापरक बहुमूल्यता सिद्ध होती है। इसलिए एकहायनी और अरुणिमा का कोई साथ नहीं है, अतः उनका अभेद संबंध भी नही हो सकता ] अतएव हि 'रक्तः पटो भवति' इत्यादिष्वैकार्थ्यादेकवाक्य- त्वम् । पटस्यभवनक्रियासंबंधे हि वाक्यव्यापारः रागसंबंधस्तु रक्तपदेनैवाभिहितः, रागसंबंधिद्रव्यं पट इत्येतावन्मात्रं सामाना- धिकरण्यावसेयम् । एकमेकेनगुणेन द्वाभ्यां बहुभिर्वा तेन तेन पदेन समस्तेन व्यस्तेन वा विशिष्टमुपस्थाप्य सामानाधिकरण्येन सर्वं विशेषणविशिष्टोऽर्थ एक इति ज्ञापयित्वा तस्य क्रिया संबंधाभि- धानमविरुद्धम् । "देवदत्तः श्यामो युवा लोहिताक्षो दंडी कुंडली तिष्ठति," शुक्लेन वाससा यवनिकां संपादयेत् "नीलमुत्पलमानय" “नीलोत्पलमानय,” गामानय शुक्लां शोभनाक्षीम् “अग्नये पथिकृते पुरोडाशमष्टकपालं निर्वपेत्” इति। एवम्--"अरुण्यैकहायन्या पिंगाक्ष्या सोमं क्रीणाति” इति। 'कपड़ा लाल होता है' इस उदाहरण में अर्थगत ऐक्य होने से, एक वाक्यता है वस्त्र का होना क्रिया से संबंध दिखलाना ही वाक्य का प्रयोजन है। उसके रंग का संबंध तो रक्तवर्ण से ही प्रतीत होता है "राग संबंधी द्रव्य पट है" केवल इतना अर्थ ही सामानाधिकरण्य से ज्ञात होता है। इसी प्रकार अन्यान्य सामानाधिकरण्य के प्रसंगों में प्रयुक्त ankurnagpal108@gmail.com
( ३३२ ) पदसमूह समष्टि रूप हों अथवा पृथक्-पृथक् हों, दोनों ही स्थिति में, एक दो या अनेक गुण विशेषित वस्तु का बोध कराकर, सामानाधिकरण्य से समस्त विशेषणों से विशिष्ट वस्तु एक है, यही प्रतिपादन किया जाता है। इसलिए समस्त विशेषण विशिष्ट वस्तु का जो क्रिया विशेष के साथ संबंध दिखलाया जाता है उसमें कोई विरोध नहीं है। "श्यामवर्ण- वाला युवा रतनारे नैन का कुण्डलधारी देवदत्त लाठी लेकर खड़ा है", "धवल वस्त्र से परदा बनावेगा" "नीले रंग का कमल लाओ", श्वेत आँखों वाली गाय लाओ", "पथिकृत अग्नि के लिए अष्टकपाल ( आठपात्रों मे क्षोधित ) पुरोडाश ( पिष्टक के प्रकरण का एक खाद्य विशेष ) दूँगा" इत्यादि उदारहणों की तरह "रक्तवर्णा, एकहायनी, कपिलनेत्री गाय से सोम खरीदता है" इस उदाहरण मे भी सामानाधिकरण्य विशिष्ट का एकत्व प्रतिपादन करना चाहिये। एतदुक्तं भवति-यथा-"काष्ठैःस्थाल्यामोदनंपचेत्" इत्यनेक- कारकविशिष्टैकाक्रिया युगपत् प्रतीयते, तथा समानाधिकरण- पदसंघाताभिहितमेकैकंकारकं तत्तत्कारकप्रतिपत्तिवेलायामेवानेक- विशेषणविशिष्टं युगपत् प्रतिपन्नं क्रियायामन्वेतीति न कश्चिद् विरोधः "खादिरैः शुष्कैः काष्ठैः समपरिमाणे भाण्डे पायसं शाल्यो- दनं समर्थः पाचकः पचेत्, इत्यादिषु" इति। कथन यह है कि- "सूखी लकड़ियों से बटुये में चावल पकाता है" इस उदाहरण में जैसे एक साथ ही काष्ठादि अनेक कारक विशिष्ट एक क्रिया का ज्ञान होता है, सामानाधिकरण्य के प्रसंग में भी वैसे ही, पद समूह में प्रयुक्त एक-एक कारक की जब प्रतिपत्ति की जाती है, तब उन सबका एक साथ अनेक विशेषण विशिष्ट क्रिया में, निर्विरोध समन्वय हो जाता है। जैसे कि-"सूखी लकड़ियों मे उचित परिमाण वाले पात्र में शाली के चावल की खीर चतुर रसोइया पकाता है" इत्यादि में एक क्रिया से संबंद्ध कारकों में कोई विरोध नहीं है। यत्तूपात्तद्रव्यकवाक्यस्थगुणशब्दः केवल गुणाभिधायीत्यरुण- येति पदेन केवलगुणस्यैवाभिधानमिति तन्नोपपद्यते, लोकवेदयो-
( ३३३ ) द्रव्यवाचिपद समानाधिकरणस्य गुणवाचिनः क्वचिदपि केवल- गुणाभिधानादर्शनात् । उपस्थितद्रव्यवाक्यस्थं गुणपदं केवलगुणाभि- धायोत्यप्यसंगतम् । "पटः शुक्लः" इत्यादिषूपात्तद्रव्यकेऽपि गुण- विशिष्टस्यैवाभिधानात् । "पटस्य शुक्लः" इत्यत्र शौक्ल्यविशिष्ट पटाप्रतिपत्तिरसमानविभक्ति निर्देशकृता, न पुनरुपात्तद्रव्यकत्व कृता तत्रैव "पटस्य शुक्लो भागः" इत्यादिषु समानविभक्तिनिर्देशे शोक्ल्यविशिष्ट द्रव्यं प्रतीयते । यत्पुनः क्रयस्यैक हायन्यवरुद्धतयाऽ- रुणिम्नः क्रयान्वयो न संभवतीति, तदपि विरोधिगुणरहित द्रव्य- वाचिपद समानाधिकरणगुणपदस्य तदाश्रयगुणाभिधानेन क्रिया- पदान्वयाविरोधादसङ्गतम् । राद्धान्ते चोक्तन्यायेनारुणिम्नः शब्दे द्रव्यान्वये सिद्धे द्रव्यगुणयोः क्रमसाधनत्वानुपपत्त्या अर्थात् परस्परा- न्वयः सिद्ध्यतीत्यप्यसंगतम् । अतोयथोक्त एवार्थः । और जो यह कहते हैं कि-जिस वाक्य में द्रव्यवाचक पद का उल्लेख होता है, उस वाक्य का गुणवाचक शब्द, उस गुण का ही बोधक होता है, इसलिए 'अरुणया' पद से केवल गुण का ही अनुमान करेंगे ( उसको द्रव्य की विशेषता नहीं मानेंगे ) ( मेरी दृष्टि में ) ऐसा मानना संगत् न होगा, क्योंकि लौकिक व्यवहार या वैदिक भाषा में कहीं भी, द्रव्य वाचक शब्द के साथ, सामानाधिकरण्य रूप से प्रयुक्त गुणवाचक पद को, केवल गुणमात्र ही माना गया हो, ऐसा उदाहरण नहीं मिलता । द्रव्यवाचक पद वाले वाक्य में आए हुये गुणवाचक पद की, एकमात्र गुणबोधकता असंगत भी है। द्रव्यवाचक पद घटित "सफेद वस्त्र" इस वाक्य में भी गुणविशिष्टार्थ का प्रतिपादन किया गया है ।" कपड़े की सफेदी" इस वाक्य में, शुक्ल गुण विशिष्ट पद की प्रतीत नहीं होती, क्योंकि—इसमें असमान विभक्ति दीखती है। द्रव्य संबंध से यहाँ गुण विशिष्टता की प्रतीति न हो रही हो, सो बात नहीं है । कपड़े का सफेद हिस्सा इस वाक्य में समान विभक्ति है, इसमें शुक्ल गुण विशिष्ट द्रव्य की प्रतीति होती है । ankurnagpal108@gmail.com
( ३३४ )
और फिर जो यह कहा कि—समीपवर्त्ती "एकहायनी" पद के साथ "क्रय ' का संबंध हो सकता है "अरुणिम" पद के साथ नहीं हो सकता, सो यह भी असंगत बात है, क्योंकि—यह नियम है कि—गुण- वाची पद के साथ यदि द्रव्यवाची पद का सामानाधिकरण्य होता है और उस द्रव्य का किसी अन्य विरुद्ध गुण का संबंध नहीं होता तो सामाना- धिकरण विशिष्ट गुणवाची पद की आश्रित जो गुण बोधकता है, उसका क्रियापद से निर्विरोध समन्वय हो जाता है । उपर्युक्त नियमानुसार सिद्धान्त "अरुणिमा" शब्द का अन्वय सिद्ध हो जाने पर भी, द्रव्य और गुण दोनों का क्रय साधनता में समन्वय न मानें, अर्थात् परस्पर समन्वय की बात सिद्ध हो जाने पर भी, यह असंभावना बनी रहे, यह भी असंगत बात है [ निर्णयपूर्वक सिद्ध हो जाने पर भी यह कहते रहें कि— द्रव्य और गुण का क्रय साधन में समन्वय नहीं हो सकता, यह हठवाद मात्र है ] उपर्युक्त बात ही यथार्थ है ।
तस्मात् तत्त्वमस्यादि सामानाधिकरण्ये पदद्वयाभिहित [L15