सुगम चिकित्सा
Sugam Chikitsa
आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा
स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)
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बच्चों की बीमारियाँ
वहाँ वह बारबार लुयेगा। वहाँ अगर दूसरा आदमी लुयेगा तो वह ज्यादा रोवेगा। जब बालक के मिर में दर्द होता है तो वह अपनी आँखें मुँद लेता है।
गुदा में दर्द होने से बालक को प्यास ज्यादा लगती है और वह बेहोश हो जाता है। दस्त बढ़वृद्धार आने लगे और उसका रक्त बदल जाय तो समझना चाहिए कि उसके पेट में कब्ज़ या बढ़हज्मी है। तब उसे रेवनचीनी का छिलका कूटकर सात रत्ती माँ के दूध या पानी में देना चाहिए। दस्त का रक्त भी बदल जायगा और पेट भी शाफ हो जायगा।
अगर दस्त का रक्त सफेद हो तो छोटी इलायची, पोदीता, पीपल, कालीमिर्च, कालानमक, सब चीजें बराबर ले कूटकर छान प्रतिदिन दोनों समय तीन-चार रत्ती देना चाहिए।
अगर बालक को मामूली दस्त आवे और जरा-जरा सा आवे खुलकर न हो तो गर्मपानी में थोड़ा अरएडी का तेल मिलाकर पिलाओ।
अगर पेंचिश हो तो साँफ को जरा-से पानी में पीसकर गुन-गुना पिला दो।
जब बालक के पेट में कीड़े पड़ जाते हैं तो वह बार-बार मूत्रेन्द्रिय को हाथ लगाता है, मलता है, सोतीवार गुदा और नाक को खुजाता है, दाँत किसकिसाता है। मेसी हालत में पहले एरएड का तेल गर्मपानी में पिलाओ। इससे आराम न हो तो यह काढ़ा पिलाओ—मोथा, नूहाकानी, त्रिफला, देवदारू, सैंजने के बीज इसके
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काढ़े में पीपल का चूर्ण और वायविडङ्ग का चूर्ण एक-एक रत्ती मिलाकर पिलावे। सब दवाइयों एक मारो, सबसे आठ गुना पानी लेना चाहिए। जब बालक रात को सोकर उठे और पेशाब करे तो उसके पिशाब का रङ्ग देखना चाहिए। अगर सफेद हो और जम जाय तो अजीर्ण समझना, लाल है तो ज्वर। ऐसी हालत में आठ माशा पानी में एक रत्ती क्लमीशोरा पोसकर देना चाहिए। या सोंफ का अर्क एक तोला, भुनी फिटकरी एक रत्ती, संतगिलोय एक रत्ती मिलाकर पिलाना। या गोखरू के काढ़े में आधा रत्ती शिलाजीत दें।
२ टूंडी पकना—नाल खींचने से बालक की टूंडी पक जाती है। उसमें यह मरहम महीन कपड़े पर लगावे। मोम एक तोला, अलसी का तेल ढाई तोला, जांगर एक माशा, पीसकर आग पर हल कर लो। जो सूजन हो तो पीली मिट्टी का एक ढेला आग में लालकर उसपर दूध डालो और टूंडी को बकारा दो।
३ खाल लग जाना—काँख, कोहनी, घोंट्ट, रान वा जांघ में ऐसे, कहींकी खाल विपक जाती है तो इसमें सरसों का तेल नित्य चुपड़ना चाहिए।
४ दूध डालना—पान का चूना एक तोला आध सेर गर्म पानी में घोल दो। जब नीचे बैठ जाय, पानी निथार लो। यह पानी कई बार दिन में पिलाना चाहिए।
५ दूध न पीना—बच्चा यदि दुखी न दावे तो या तो उसके पेट में दर्द है या मन्दगति है। कारण देखकर उसका इलाज करो।
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६ हंसली जाना—यह हंसली एक हड्डी है, जो हंसली की भाँति गले में दोनों कन्धों से लगी है। बच्चे को गोद में लेती बार उसकी गर्दन में हाथ न लगाने से या झटका लग जाने से यह उतर जाती है। ऐसे बच्चों के गले में चाँदी की हंसली पहनाना चाहिए जो वोम को सम रखे। और किसी होशियार दाई से सुतवा दो।
७ काग गिरजाना—यह गर्मी से होता है। बालक दूध पीना छोड़ देता है या पीकर तुरन्त डाल देता है। बहुत रोता है पर रोया नहीं जाता।
चूल्हे की राख और कालीमिर्च उंगली पर लगाकर उंगली से चतुराई से ऊपर उठा दो।
गर्म चीज़ खाने को न दो, मुलातानी मिट्टी सिरके में पीसकर तालुए पर लगा दो।
८ श्राव दुखना—पहले तीन दिन कुछ न करो। छोटा बच्चा हो तो कड़ुआ तेल कान में डाल दो और तालू पर भी मल दो, पाँच रस्ती फटकी घारीक पीसकर एक तोला गुलाब जल में घोल दो, उसकी कई घूँटें दिनभर टपकाओ, या धीगुवार का गूदा, हल्दी, रसौत, सब मिलाकर पैर के तलुओं से बांध दो।
९ खाँसी—यह बहुत घुरी बीमारी है। अगर तर हो तो आक की मुँहवन्द डोंडी गिनकर जितनी हों उतनी ही कालीमिर्च गिनकर, पाँचों नोन डाल, कुल्हिया में रख, कपरीटीकर आग में फूंक लो; इसे बच्चे को चटाओ।
कूकर खाँसी बच्चे को बहुत कष्ट देती है। बालक खाँसते-खाँसते
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उल्टी कर देता है। यठ खाँसी दूसरे बच्चों को लग जाती है। इसकी अच्छी दवा यह है, कि कालीमिर्च एक तोला, पीपल छः भाशा, अनारदाना आठ तोला, पुराना गुड़ सोलह तोला, जवाखार एक तोला सबको इकट्ठा कर भसल-छान गोली बनाओ, इससे भयानक-से-भयानक खाँसी भी आराम होजाती है।
बच्चों को खाँसी, दस्त और बुखार साथ-साथ हो तो यह करे-काकड़ासींगी, पीपल, अतीस, मोथा पीसकर चटावे। अगर सिर्फ खाँसी और बुखार हो तो सुहागा अधभुना बराबर कालीमिर्च पीस, धीगुआर के रस में चने बराबर गोली बनाओ। बहुत फायदा होगा।
१०. पेट चलना—अगर दाँतों के कारण हो तो कुछ उपाय न करे। और कारण से हो तो सोंठ, अतीस, नागरमोथा, नेत्रवाला इन्द्र जो इनका काढ़ा पिलावे।
अगर दस्त के साथ ज्वर भी हो तो यह काढ़ा दे। अतीस, काकड़ासींगी, पीपल इनका चूर्ण शहद में चटाओ। अगर प्यास ज्यादा हो तो मोथा, सोंठ, अतीस, इन्द्रजो, खस इनका काढ़ा दो। अगर आँब हो तो वायविडङ्ग, अजमोद, पीपल, बारीक पीस ठण्डे पानी से दो। अथवा सोंठ, अतीस, मुनी हींग, मोथा, बुड़े की छाल, चीता इनका चूर्ण गर्म पानी के साथ दो। अगर खून भी आवे तो पाखान भेद सोंठ पानी में घिसकर दो। अफाए हो तो सेन्धानमक, सोंठ, इलायची बड़ी मुनी हींग, और अरुणडी महीन पीसकर गर्म पानी के साथ पिलाओ।
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११. कान बहना—बालक के माँ के दूध की धार बच्चे के कान में डालो। या पठानी लोघ बारीक पीस कान में फूँक दो। सुदर्शन के पत्ते का रस टपकाओ।
१२. गला आजाना—शहतूत का शर्बत चटाओ।
१३. कोहे आजाना—उसे कहते हैं जिससे आँख की वाहरी कोर लाल पड़ जाती है। दुर्द होता है, खाज चलती है, घाव बढ़ता जाता है। इसका उपाय यह है कि कपड़े की पोटलों-सी बनाकर हाथ पर रगड़ो। अथवा मुँह की फूँक से गर्म करो, फिर आँख को सेको या काजल में सफैदा रगड़कर और डंगलियों में भरकर दिए की लौ पर डंगलियों को तनिक सेको तथा गर्म-गर्म ही आँख पर आँजलो।
१४. रोह—रोहों से आँख यदि बहुत सूज गई हो तो चाकसू उबाल कर छीलकर घिसकर आँख में आँजे। दिनमें दो-तीन बार।
१५. तालू पक जाना—या बैठ जाना। मुलतानी मिट्टी कई बार घिसकर दिन में कई बार तालुए पर रखलो।
१६. डुकास—इस रोग में बच्चा बार-बार पानी माँगता है। छुहारे की गुठली घिसकर पिलाओ।
१७. मुँह के छाले—सफेद हों और मुँह लाल होगा या हो तो पहले घुट्टी दे, फिर वंशलोचन पपरिया कल्या और छोटी इलाके बीज की बारीक बुरकी बनाकर बुरक दो।
१८—ज्वर बच्चों की सबसे भयानक बीमारी है, इसका इलाज किसी अच्छे डाक्टर-वैद्य से कराना चाहिए। क्योंकि ज्वर के
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स्वरूप
कारण को समझना कठिन है। ठीक-ठीक नहीं समझने से न जाने क्या विकार पैदा हो। फिर भी रुग्ण हो तो एरपड का तेल दो। नीम की हरी-हरी सींक छिलका छीलकर पचीस लो उसमें सात काली मिर्च डाल पानी में पीसलो। तीन दिन दोनों समय पिलाओ बच्चों के मुखार की बहुत गुणकारी दवा है। यह मात्रा बड़े आदमी के लिए है। बच्चे की उम्र के लिहाज से पिलाओ।
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चोट और अकस्मात्
बहुधा ऐसा होता है, कि सफ़र और जङ्गल में, समय-कुसमय कभी ऊँची जगह से गिर जाने, कुचल जाने आदि से या अन्य किसी अकस्मात् से चोटें लग जाती हैं। प्रायः ऐसे स्थानों में डाक्टर का मिलना संभव नहीं होता। ऐसी दशा में यह उचित है कि प्रत्येक मनुष्य को ऐसे अवसर पर कुछ कर्तव्य का ज्ञान होना चाहिए, जिससे यदि कभी ऐसी दुर्घटना हो जाय तो, जबतक डाक्टर की सहायता न मिले तबतक रोगी की उपयुक्त व्यवस्था होसके। सबसे प्रथम नीचे लिखी बातों पर ध्यान देना चाहिए।
१—घाव से निकलते लोह को सबसे पहले बन्द करो।
२—घाव में किसी तरह की मैल काँटा, शीशे का टुकड़ा आदि न रहने देना चाहिए।
३—घाव में मक्खी आदि न बैठने देना चाहिए।
४—बेहोश घायल के चारों तरफ भीड़ न होने देना चाहिए।
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५—जिसकी हड्डी आदि टूट गई हो, उसे आराम से किसी तरह उपयुक्त स्थान पर पहुँचाना ।
घाव के प्रकार—घाव कई प्रकार के होते हैं ।
१—जिनमें से खून निकले ।
२—जिनमें से खून न निकले ।
३—धारवाले औजार; जैसे छुरी, चाकू, आदि के घाव ।
४—कुचले हुए घाव, जैसे गाड़ी आदि के नीचे आ जाने से हो जाते हैं । जिनमें थोड़ा खून निकलता हो ।
५—नील पड़ना—कुचले घाव में से खून न निकलने से नीला हो जाता है । इसमें नीली दर्दनाक सूजन हो जाती है ।
६—नोकदार शस्त्र के घाव; जैसे तीर, सूरई, काँटा आदि के इन घावों का रूप छोटा होता है, पर बहुत गहरे होते हैं । यदि ये घाव नाड़ी या धमनी तक पहुँचते हैं तो मृत्यु कर देते हैं ।
७—वन्दूक की गोली आदि के घाव । इनमें कभी-कभी हड्डी भी टूट जाती है । आज-कल डाक्टर एक यन्त्र की सहायता से गोली निकाल सकते हैं ।
८—जहरी जानवरों के काटने के घाव; जैसे पागल कुत्ते साँप आदि के ।
अधिक चोट लगने से सूजन बड़ी, लाल और पीड़ावाली होती है और चोट के जगह पर चमड़ी के नीचे खून के इकट्ठे होने
कुचलना
से एक नीले रक्त की दर्दनाक सूजन हो जाती है । मौच आजाने से भी यही बात होती है ।
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चोट और अकस्मात
१—चोट की जगह को शरीर से ऊँचा करलो; यदि पाँव पर चोट हो तो लेट जाना चाहिए और कुछ देर तक चलना बन्द रखना चाहिए। यदि हाथ में हो तो हाथ को उपचार रूमाल से गले में लटका देना चाहिए। सिर के नीचे तकिया न लगाना चाहिए, बल्कि एक आदमी उसकी टाँगें उठाए रहे। अगर जरूरत हो तो नकली ढङ्ग से साँस चलानी चाहिए। अगर वह पानी पी सके तो पानी पीने को दो। पर बेहोशी की हालत में पानी मुँह में मत डालो। बेहोशी की हालत में पानी फेफड़े में चला जाता है, इससे नुकसान पहुँचने का डर है।
मामूली घाव, जिससे खून निकल रहा हो, दो हालतों में प्राण-नाश करते हैं। या तो उनका खून बन्द न हो या घाव में मैल-मिट्टी या कोई जहरीली चीज़ रह जाय। इसलिए उचित है कि उसी वक्त खून बन्द करने और घाव को होशियारी से धोकर साफ़ करने का बन्दोबस्त करना चाहिए। हाथों को घाव में लगाने से पहले राख, मिट्टी या साबुन से धो लेना चाहिए और घावों के आस-पास से कपड़ों को दूर रखना चाहिए।
सबसे अच्छा तो यह है कि घाव को गर्म किये पानी को ठण्डा करके धोना चाहिए। पर ऐसा न बन पड़े तो साफ़ ठण्डे पानी से ही काम लेना चाहिए। पट्टी लगाने के लिए साफ़ रुई और कपड़ा काम में लाना चाहिए। यह पट्टी और रुई छेड़ घण्टे तक पानी में उबाल लिये जायें।
खून बन्द करने का उपाय—पहले यह देखना चाहिए कि खून
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नाड़ी, धमनी या-वारीक नाड़ियों-में से किसमें से निकल रहा है। यदि वारीक नाड़ी में से खून निकलता हो तो घबड़ाने की कोई बात नहीं है, वह खुद ही बन्द हो जायगा।
सूजन के लिए चोट के स्थान पर बरफ रखना या ठण्डे पानी में कपड़ा भिगोकर लपेट देना चाहिए। दर्द ज्यादा हो या चोट पुरानी पड़ गई हो तो गर्म पानी में कपड़ा भिगोकर और तिचोड़-कर उस जगह को सेकना चाहिए। लेकिन चोट अगर जोड़ पर हो तो जरूर डाक्टर को दिखाने की जल्दी करनी चाहिए।
अगर चोट बड़ी हो, जैसे सिर के बल ऊपर से गिर गया हो, जिससे दिमाग में कुछ नुकसान हो गया हो या पैरों के बल गिर गया हो जिससे कमर में धमक लग गई हो। ऐसा रोगी अगर बेहोश हो गया हो, सांस और नाड़ी की गति धीमी हो गई-हो तो उसकी दशा चिन्ता-जनक समझनी चाहिए। खासकर चोट यदि सिर में हो तो मरने का ज्यादा खतरा है। ऐसे आदमी को जल्दी ही पीठ के बल लिटा देना चाहिए और उसके चारों ओर हरगिज भीड़ न होने देना चाहिए। यदि जङ्गल या सफर में ऐसा मौका हो तो जहाँतक बन पड़े बिना हिलाये किसी डाक्टर के पास पहुँचा देना चाहिए। कपड़े ढीले कर देने चाहिए। पानी पास में हो तो उससे मुँह पर छींटे मारना चाहिए।
नाड़ी से जब खून निकलता है तब उसकी धार बड़े जोर से लेकिन रुक-रुक के निकलती है, जैसे पिचकारी का पानी निकलता है। इस खून का रङ्ग विलकुल लाल होता है। यदि धमनी से खून
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चोट और अकस्मात
निकलता होगा तो वह कुछ गाढ़ा और काला होगा। उसकी धार ऊँची नहीं उछलेगी; जैसे सोते में जल बहता है, उस तरह निकलेगा। ये धमनियाँ चमड़ी के नीचे तमाम शरीर में हैं, किन्तु हाथ-पाँव में ऊपरी भाग में उनके जाल बिछे हैं। वारीक नाड़ियों से बहुत धीरे-धीरे पानी की बूँदों के समान खून घाव के मुँह पर इकट्ठा हो जाता है। ये शरीर के रग-रग में फैली हैं।
वारीक नाड़ियों का खून सिर्फ ठण्डे पानी के धोने से, बरफ लगाने से, या अपने-आप हवा लगाने से, बंद हो जायगा। धमनी से निकलते खून को बंद करने की कोशिश करती बार यह याद रहे कि धमनियाँ में खून हृदय की ओर जाता है। इसलिए हाथ या पाँव को थड् और हृदय से ऊँचा करके घाव के उस तरफ दबाव पहुँचाओ जियर से खून घाव के मुँह पर आ रहा हो। (देखो चित्र नं० ६)
जवतक खून बन्द न हो, हाथ या पाँव उठाये रहना चाहिए। अगर बरफ पास हो तो उसे कपड़े में लपेट कर घाव पर रखना चाहिए। हाथ-पाँव पर कोई गहना बगैरा कोई चीज़ हो तो उसे हटा देना चाहिए। खून बन्द होजने पर उस पर पट्टी लगा देना चाहिए। हाथ के घाव में हाथ को रुमाल से बांध कर लटका देना चाहिए।
नाड़ी से खून निकलना भयंकर है। भटपट खून बन्द करने का उपाय करना चाहिए।
घाववाले अङ्ग को थड् से ऊँचा उठाना ही जरूरी है। फिर
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खास नाड़ी को दवाइयों या घाव में साफ़ उंगली को डालकर कटी हुई नाड़ी के मुँह को दबाना चाहिए। यदि उँगली से भी खून बहना न रुके तो—साफ़ महीन कपड़े का टुकड़ा या रुमाल घाव में भरकर उसे खून दबाना चाहिए। यदि हो सके तो किसी डाक्टर को फौरेन बुलवा लो। पर यदि घायल को किसी सेवारी में डालकर अस्पताल लेजाया जाय तो यह बात अवश्य ध्यान में रखनी चाहिए कि थंड या हृदय से घाववाली जगह ऊँची रहे (देखो चित्र नं० ७)
पर अगर निकट अस्पताल बगैरा न हो तो यही ठीक है कि कपड़े या रूई की एक गेंद-सी बनाकर उसे घाव पर खून दबा कर बांध देनी चाहिए।
यदि रूई या बरछ न हो तो धोती या तौलिया में एक गॉठ देकर वही बाँध पर बाध देना चाहिए। या रुपया, ठीकरा, या साफ पत्थर का टुकड़ा ही रुमाल बगैरा में लपेटकर उसी तरह बांध देना चाहिए।
परन्तु यदि घाव गर्दन में है, तो घाव में उंगली देकर दबाने के अलावा दूसरा उपाय नहीं है। क्योंकि ऊपर बताई हुई रीति से कपड़ा लपेटने से तो मृत्यु ही होने का भय है।
गले और कन्धे के घाव के लिए यथासम्भव शीघ्र चिकित्सक बुला लेना ही ठीक है।
हाथ या पाँवों में से यदि खून किसी तरह बन्द न हो तो हाथ या पाँव के ऊपर रबर का मोटा चौड़ा फीता या नली खून कसकर बाँध देना चाहिए। यह न मिले तो एक रुमाल को ही ऐंट कर
चित्र नं० ७ घाववाला अङ्ग 'धड़' हृदय से ऊपर रहना चाहिए, इससे खून कम बहेगा।
चित्र नं० ८ घाव का खून बन्द करने विधि
A blank white page with a small black speck near the top center.
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चोट और अकस्मात
बांध देना चाहिए। फिर एक लकड़ी लेकर उसे खून मरोड़िये जब तक कि खून निकलना बन्द न हो। (देखो चित्र नं० ८) पर यह जान लेना चाहिए कि हाथ पैर को इस तरह कसना खतरनाक है। यदि दो-दोई घण्टे इस तरह हाथ-पांव कसे रहे तो नीचे का भाग मुर्दा हो जाता है। इसलिए यह उपाय तभी काम में लाना चाहिए कि जब और उपाय काम न दें।
जब घाव का खून बन्द होजाय तब उसे सावधानी से धोना चाहिए, जिससे घाव में मैल-मिट्टी न रहे। आइडोफार्म ( पीले रङ्ग की मीठी गन्धवाली अंग्रेजी दवा ) मिल जाय तो थोड़ी घाव पर छिड़क कर और साफ रूई लगाकर पट्टी बांध देनी चाहिए।
यदि घायल बेहोश हो तो खून बन्द कर चुकने पर पट्टी बाँधने के बाद उसे होश में लाने के उपाय करने चाहिए। यदि वह पानी पी सकता हो तो माशा-भर नमक पानी में घोलकर उसे पिलाना चाहिए, फिर नीचा सिर और ऊँचा पैर करके लिटा दीजिए। यानी तकिया सिर की जगह पांवों के नीचे लगा दीजिए। ऐसा करने से मस्तक में रक्त पहुँचने से जल्दी होश आयागा।
कभी-कभी रेल बगैरा से हाथ-पाँव विलकुल कट जाने पर विलकुल खून नहीं निकलता। ऐसी हालत में ठण्डे पानी से घाव को धीरे-धीरे धोकर साफ रूई कपड़े में कटे हाथ-पाँव को लपेट देना चाहिए। परन्तु जल्दी-से-जल्दी उसे अस्पताल पहुँचा दो क्योंकि ऐसे घाव जल्दी सड़ने लगते हैं, जिससे रोगी को बहुत तकलीफ होती है।
सुगम वाक्य
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कभी-कभी आदमी पेट के बल पत्थर बगैरा पर गिर पड़े, तो अमाशय से खून की उल्टी होती है। यह खून काले रक्त का आता है। पर यदि लाल रक्त का आवे तो समझना खून की कय कि खून मुँह फेफड़े या गले से आया है। ऐसे आदमी को ठण्डा पानी या बरफ देना चाहिए।
पट्टी डेढ़ या ढाई इञ्च चौड़ी, पतली गजी की हो, जो धोबी की धुली हो पर जिनमें कलफ न हो। उन्हें आध घण्टे तक पानी में पकाकर सुखा लेना चाहिए, रुई भी बहुत साफ धुनी हुई हो। परन्तु कुसमय में रुमाल, धोती, तौलिया बगैरा से भी काम चल सकता है। पर हर हालत में पट्टी रंगीन न होनी चाहिए। पट्टी बाँधने की सब से सरल विधि-कपड़े को तिकोना करके सरलता से बाँध देना है। आवश्यकता होने पर इसके कई पत करके, लम्बी पट्टी के समान भी बाँधा जा सकता है।
सिर के धावों के लिए भी पट्टी, बड़े रुमाल व अंगोष्ठि से, दोनों किनारों के बीच थोड़ा फाड़ने से बना लेना चाहिए।
परन्तु गले में हाथ बाँधने के लिए या कुहनों में कूले, हाथ पैर आदि धावों के लिए इस तरह बाँधने की जरूरत नहीं, सिर्फ हाथ को एक रुमाल या अंगोष्ठि में लटकाना लेना चाहिए।
कम चौड़े स्थानों पर जैसे उँगलियों, हाथ-पाँव, जाँघ, धड़ आदि के लिए इन पट्टियों की जरूरत पड़ती है।
इन पट्टियों का बाँधना और लपेटना जरा मुश्किल है। पट्टियों
पट्टियां बांधने के जुदे-जुदे तरीके
सिर पर पट्टी बांधना
चित्र नं० ६
चित्र नं० १०
चित्र नं० ११
चित्र नं० १२ कोहनी और घुटने पर पट्टी बांधने की विधि
चित्र नं० १३ कलाई पर पट्टी बांधने की विधि
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चोट और अकस्मात
पहले से लपेटकर तैयार रखनी चाहिए, फिर उन्हें पिन या गॉठ बाँधकर रहने दो। पट्टी बाँधने से घाव के किनारे मिले रहते हैं, दवाव पड़ने से खून कम निकलता है, और मक्खी, थूल आदि से घाव सुरक्षित रहता है। (पट्टी बाँधने के अलग-अलग तरीकों के लिए सामने के पृष्ठ पर चित्र नं० ६ से १७ तक देखिए)।
छत से गिर जाने या पेड़ पर से गिर जाने पर हड्डी टूट जाय या जोड़ उखड़ जाय तो सावधान रहो जोड़ और हड्डियों में चोट और जोड़ बैठाने का काम अनाड़ी आदमी से न कराओ। बरना रोगी हमेशा के लिए अयोग्य हो जायगा।
मोच प्रायः टखने या कलाई में आती है। सन्धि के एकदम मुड़ जाने से उसको बाँधने वाली नसें थोड़ी खिंचकर फट जाती हैं।
मोच कभी-कभी वारीक नालियां और कभी जोड़ की थैली के फट जाने से मोच की जगह सूज जाती है। खून और सन्धि का पानी जमा हो जाने से ऐसा होता है। गॉठ पर दर्द होता है, पर जोड़ हिल सकता है। मोच आते ही जल्द-से-जल्द हृदय की ओर दवाकर मालिश शुरू कर दो। इस-पन्द्रह मिनट तक ऐसा करने से दर्द, संजुन कम हो जाती है। अगर दर्द बहुत ही ज्यादा हो तो ठण्डे पानी में कपड़ा भिगोकर जोड़ पर दवाकर लपेट दो।
जोड़ पर बहुत जोर पड़ने से जोड़ उखड़ जाता है। सबसे अधिक कन्धे के कूले के जोड़ हट जाया करते जोड़ हट जाना है। कभी-कभी जबड़े और कुहनी तथा घुटने के जोड़ भी उखड़ जाते हैं।
सुगम चिकित्सा
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इतका उपाय यह है कि उसड़े जोड़ों को खून अच्छी तरह मिलाओ। हाथ का जोड़ उसड़ गया हो तो अंगोढ़्या बाँधकर हाथ गले में लटकाओ। और चौबीस घंटे के भीतर-भीतर जोड़ डाक्टर को दिखा दो।
जोड़ उसड़े हुए मरीज को उठने न दो और न उसे हाथ-पाँव फैलाने या सीधा करने दो, उसड़ी जगह पर गीला कपड़ा लपेट दो। और भटपट अस्पताल पहुँचा दो। अगर बढ़त पर चुस्त कपड़ा हो तो उसे उतारो मत, फाड़ डालो। अगर दर्द ज्यादा हो और आदमी मजबूत हो तो उसे कुछ नशा खिला दो।
हड्डी टूटने के दो प्रकार होते हैं; एक वह जिसमें हड्डी टूटकर भी घाव नहीं होता; दूसरे घाव होकर हड्डी बाहर आ जाती है।
पिछले प्रकार में प्राण का भय है। अगर जरा भी गड़-बड़ हुई तो जखम के सड़ जाने का अन्देशा है। अगर विघ्न न हुआ तो बालक और जवान की हड्डी डेढ़ मास में जुड़ जायगी। बूढ़ों को कुछ ज्यादा कष्ट होगा। दूटी हड्डी की पहचान यह है कि वह अङ्ग हिल नहीं सकता, दर्द बहुत होता है और नीचे का हिस्सा फूल जाता है।
अगर सिर्फ एक ही हड्डी टूटी हो तो उस हिस्से को चारों ओर से किसी चीज़ से लपेट दो। बाँस की खपच्चियाँ या पंखे इस काम के लिए अच्छी हैं। अगर घाव हो तो पहले घाव को बाँध दो और बीमार को भटपट अस्पताल पहुँचा दो।