भारतकोश
संग्रह पर लौटें

सुगम चिकित्सा

Sugam Chikitsa

आचार्य चतुरसेन शास्त्री द्वारा

स्रोत: June 1939 First Edition · सस्ता साहित्य मण्डल, दिल्ली (Sasta Sahitya Mandal, Delhi) · 1939 (उद्गम)

DevanagariHindipublished222 पृष्ठ

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छोटे बच्चों की परवरिश के सम्बन्ध में

दूध पिलाती वार माना को इन बातों का ध्यान रखना चाहिए—

(१) क्रोध में दूध न पिलावे—यदि ऐसा अवसर हो भी तो थोड़ा जल पीकर जब क्रोध ठण्डा होजाय तब पिलावे ।

(२) पसीने या रहे हों, या मल-मूत्र, वमन आदि का वेग हो तो दूध नहीं पिलाना चाहिए ।

(३) एक स्तन से दूध कभी न पिलावे; क्योंकि दूसरे में दूध इकट्ठा होकर सूजन पड़ जावेगी ।

(४) बच्चे का दूध पीने का समय नियत कर लेना चाहिए । नीचे की सारणी में हम उपयुक्त समय लिखते हैं । इसीके अनुसार बालक को दूध पिलाना चाहिए ।

१ महीने के बालक को एक-घण्टे पीछे

३ महीने " " दो " "

६ महीने " " तीन " "

९ महीने " " चार " "

नौ महीने की अवस्था तक बालक को निरा दूध पिलावे । अन्य कोई वस्तु खाने को न दे । कहा भी है—चौ महीने भरे, और नौ महीने धरे । परन्तु बालक सबल हो और उसकी पाचन शक्ति ठीक तो छोटे महीने में भी अन्न दे सकते हैं । आवश्‍यलायन सूत्र में लिखा है—

पट्टे मास्यन्नप्राशनम् । १ । घृर्तौदनं तेजस्क्राम । २ ।

दधिभयघृत्त मिश्रितमन्नं प्राशयेत् ॥

अर्थात्—छोटे महीने बालक को अन्नप्राशन संस्कार करावे

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जो अपने बालक को तेजस्वी कराना चाहे वह प्रथम-प्रथम उसे घृत और भात दे। अथवा दही-शहद-घृत मिला अन्न दे।

दूध पिलाने की विधि—माता सीधी पलोथी मारकर बैठे, प्रथम स्तन थोकर एकाध बूँद धरती पर गिरादे, पीछे बालक के मुँह में स्तन दे। प्रथम दाहिना स्तन पिलावे पीछे बाँया। लेटकर दूध कभी नहीं पिलाना चाहिए, इससे बालक का कान बहने लगता है। बालक को गोद में लेकर और एक हाथ उसके मस्तक के नीचे लगाकर मस्तक को ऊँचा रखले, तब पिलावे। नींद में न पिलावे। यदि कोई विशेष बात न हो तो माता ही को बालक को दूध पिलाना चाहिए। जिस माता का बालक दूध नहीं पीते उससे बच्चे को कुछ भी स्नेह नहीं होता। स्त्री बालक को दूध पिलाने से निरोग भी रहती है, बरन ऐसी स्त्री के गर्भश्राव और गर्भपात का रोग भी नहीं होता।

यूरोप में स्त्रियाँ अपना जीवन बनाये रखने के लिए—बच्चों को दूध नहीं पिलातीं—धाय रखती हैं। इसपर हम अधिक टीका-टिप्पणी करना नहीं चाहते। असल में यह बात उन्हीं को शोभा देती है। बालक का दूध एकदम न लुड़ावे—बरन दूध पीने के साथ ही कभी-कभी खीर, खिचड़ी, साबूदाना, भात आदि दे। मिठाई सर्वथा बन्द रखो। मिठाई विप है, यह जान रखो। इससे मेदे में कीड़े पड़ जाते हैं और मेदा सड़ने लगता है। हाँ, फलों का अभ्यास गुणकारी हो सकता है और फल अवश्य बच्चे को समय-समय पर देने चाहिए।

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दूध छुड़ाने का सुगम उपाय यह है कि माता बालक से कुछ दिन के लिए अलग हो जावे, वा रात को अपने पास न सुलावे । दूसरी स्त्री के पास सुला दे ।

और यदि मातामें शक्ति होतो जबतक गर्भ न रहे, बच्चेको दूध पिलाये जाय । इससे अधिक पौष्टिक और गुणदायक वस्तु संसार में बच्चे के लिए नहीं है । कहावत भी तो है—“देखें तैने अपनी माता का कितना दूध पिया है !”

दूध पिलाकर बालक का मुँह धो डालना चाहिए, जिससे मक्खी आदि काट न खाय । या मुख के रोग न उत्पन्न हों ।

जब ये चिन्ह माता के शरीर में दीखें तो दूध तुरन्त बन्द कर देना चाहिए ।

(१) जब माता के स्तनों में दूध न रहे ।

(२) जब माता के कानों में सनसनाहट मालूम हो ।

(३) आँखों में आँधेरा-सा जान पड़े ।

(४) आँखों में पीड़ा हो ।

(५) मस्तिष्क में धमक और चित्त व्याकुल हो ।

(६) मूर्छा और थकावट जान पड़े, देह कपड़े, भूख न लगे, अजीर्ण हों, पेट में दर्द हो, ज्वर हो, पेट में सनसनाहट हो, मानों पेट बैठा जाता है, चलते-फिरते देह में दर्द हो, सुखपर पीलापन छा रहा हो, टकने सूक्ष्म आये हों ।

छः महीने तक बच्चे की गर्दन नहीं ठहरती । इसलिए गर्दन के पीछे हाथ लगाये रहना चाहिए । असावधानी करने से बालक की गर्दन

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में भटका चला जाता है और बालक मर जाता है। बालक को इन दिनों न सीधा बैठावे, न सीधा गोदी में ले; क्योंकि ऐसा करने से पीठ में कुन्च निकल आता है; क्योंकि उसकी रीढ़ की हड्डी बहुत नरम होती है। एक वर्ष से पूर्व बालक को अपने पेरों कभी न खड़ा न करे, इससे पाँव चिथड़ा जाते हैं। जब बालक स्वयं खड़ा होसके तभी खड़ा करे, वा होने दे। उसे अपनी नींद सोने और उठने दे।

परन्तु दूध पी कर ही तुरन्त बालक को न सोने दे, इससे उसका भोजन पचता नहीं है और स्वप्न भी घुरे दीखते हैं। तीन वर्ष की आयु तक तो बालक को दिन में सोने दे; पीछे केवल रात्रि के ही सोने की आदत डाले, दिन में नहीं।

बहुधा स्त्रियाँ काम करने के लालच से बच्चे को अफीम आदि देकर सुलाती हैं। सभी जानते हैं अफीम विष है, सो नन्हें-से बच्चे को विष देना डायन माता ही का काम है, जो बहुत घुरा है। ऐसे नशों से बालकों के मस्तिष्क वचपन से ही निर्बल और खुरक होजाते हैं।

सोती बार माता बालक को अपनी देह से चिपटाकर न सुलावे और यदि ऐसा ही हो तो उसे सदा कर्वट लेकर अर्थात् उसकी पीठ माता की ओर रख कर सुलावे।

विछौना नरम और सूखा रहना चाहिए। कोई वस्तु चुमती न हो। पोतड़े भीगने पर तुरन्त बदल देना चाहिए।

बच्चों को धूल-भिट्टी में न होने देना चाहिए। रात्रि को नीम वा सरसों के तेल का काजल आँखों में लगा दिया करे और प्रभात को

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काजल मुख धोकर फिर लगा देना चाहिए ।

बहुतेरी माताएँ भूत-प्रेत, डाकनी-मसान के भूषणों से बच्चे को बचाने के लिए वीसियों कठले, गन्ड़े-तावीज से बच्चों का शरीर भर देती हैं; पर इन सबमें मैल भर जाने से छोटे-छोटे कीड़े अरुड़े—दे देते हैं और रोग का जमघट जम जाता है । रोग से बचना तो एक और रहा—ऐसे ही बच्चे सदा रोगी रहते हैं ।

मुख से लार टपककर भी कपड़े अधिक मैले रहते हैं, इससे उचित तो यह है कि एक रूमाल उसके गले में बँधा रहे । उसे रोज धोना और साफ करना चाहिए । यदि अधिक लार बहे तो यह दवा बनाकर रख ले और एक माशा नित्य कई बार चटावे ।

एक पाव मिश्री को एक छटाक गुलाब-जलमें चाशनी करो । जब चाशनी एक तार की आजाय तो उसमें २।। तोला रूमीमस्तगी असली बारीक पीसकर अच्छी तरह मिलादे और किसी इमर्तान में भरकर रखले ।

बच्चों की आँत लटककर अण्डकोप में लटक जाती हैं । इस लिए उचित तो यह है कि कटिबन्धन ( कौंधनी ) पहनाये रखे—जिससे वह नस दबी रहती है । यदि थसक गई हो तो बालक को जाँघिया पहनाये रखे, इससे ठीक रहती है ।

बालक को रोज अमरण कराना चाहिए । जाड़ों में दोपहर और धूप के समय । गर्मी में साँझ-सवेरे; वर्षा में जब बादल न हों वा बूँद न पड़ती हों । हर दशा में बालक को गर्मी-सर्दी दोनों से बचाये रखे ।

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जब बालक तीन वर्ष का होजाय तो उसे नित्य प्रातःकाल नहलाने की वान डालनी चाहिए। यदि वह दुर्बल हो तो उसके नहाने के पानी में संधा नमक डाल दे। इससे थोड़े ही दिन में निर्बल बालक सबल और पुष्ट होजाता है। पानी में मेथी या मेहदी डाल कर गरम करले, उससे स्नान भी गुणकारी होता है।

उनके कान और बालों में चौथे वा पाँचवे दिन कड़वा तेल डालना चाहिए और जिन दिनों में दाँत निकलते हों उन दिनों अवश्य डाले। इससे आँख नहीं दुखती और कनपटी जो इस दशा में भड़का करती है, नहीं भड़कती और चैन पड़ता है।

बालकों के सिर पर मैल जम जाता है उसको भी धोकर निकाल देना चाहिए। पीछे तेल डालदे, इससे मस्तक में तरी रहती है, नींद अच्छी आती है, खुशकी नहीं बढ़ती। ऐसा न करने से प्यास बढ़ जाती है जिससे न तो बाल बढ़ते हैं और न हृद होते हैं, न मस्तक चलवान रहता है जिससे बालक बहुधा मूर्ख और निर्बुद्धि रह जाते हैं।

सँभाले न रखने से बहुधा बच्चों को मिट्टी खाने की आदत पड़ जाती है। जिससे पेट बढ़ जाता है। मूत्र सफेद आने लगता है और अजीण हो जाता है तथा सारे शरीर का रंग सफेद पड़ जाता है। दूसरे-तीसरे दिन बच्चे को थोड़ा गुड़ खिला देना चाहिए।

उन्हें कभी नहीं डराना चाहिए। डरने से बच्चे कभी-कभी ऐसे डर जाते हैं कि वे सदा के लिए डरपोक बन जाते हैं। वह भय कभी उनके हृदय से नहीं निकलता। स्वप्न में वही बात देखकर वे डर उठते

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हैं, यहाँतक कि मल-मूत्र तक त्याग कर देते हैं इसका प्रभाव आगे बच्चों पर बहुत घुरा पड़ता है।

डरे बालक का उपाय—यदि बालक किसी प्रकार डर गया हो तो उसका उपाय यह है कि उसे डरा-धमकाकर और घुड़की से न बोले, न चिल्लाकर बोले; बरन् बहुत ही स्नेह से धीमी-धीमी तसल्ली दे। उसे अकेला न छोड़े, न अँधेरे में छोड़े; रात्रि-भर दिया जलावे। जिससे आँख खुलने पर वह उजाला ही देखे। अक्सर बालक सोते-सोते चौँक उठते हैं, तब उचित है कि उसकी छाती पर हाथ धरे रहे; कुछ दिन में ऐसा करने से बच्चे का डर जाता रहेगा।

एक काम अवश्य करना चाहिए। प्रति मास बालक को तौलते रहना चाहिए। यह नियम है कि बच्चा जब बीमार होने को होता है उससे बहुत प्रथम से ही उसका वजन घटने लगता है। या बहुत पहले से ही वजन बढ़ना रुक जाता है। वैसी अवस्था में तुरन्त वैद्य को दिखाना और उसकी सम्मति से भोजन या धाय को तुरन्त बदल देना चाहिए। ऐसा करने से बच्चे को बीमार होने की नींव ही नहीं आयगी।

जन्म के सातह में तो बच्चा तौल में कुछ घटता है फिर बढ़ने लगता है। पहले ५ महीने तक तन्दुरुस्त बच्चे को १ तोले से २। तोले तक रोज बढ़ना चाहिए। और इसके बाद में छः-सात महीने तक दस मासों से दो तोला तक बराबर बढ़ना चाहिए, पाँच-छः मास के बच्चे का वजन जन्म से दूना होना चाहिए। और एक साल के बच्चे का जन्म से तिगुना हो जाना चाहिए। इसके बाद वजन

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बढ़ना कुछ कम होजाता है। दूसरे साल पौने तीन सेर तीसरे साल तीन सेर, इसीतरह सातवें साल तक प्रायः दो सेर ही बढ़ता है। आठवें से ग्यारहवें तक तीन सेर सालाना बढ़ता है, ग्यारहवें साल तक लड़के लड़कियों से अधिक बढ़ते हैं। पन्द्रहवें साल तक लड़कियाँ ज्यादा बढ़ती हैं। फिर उसके बाद लड़कों की बारी आती है।

जन्म के समय बच्चा आठ-नौ गिरह लम्बा होता है दो-तीन महीने तक लम्बाई जल्दी-जल्दी बढ़ती है। एक वर्ष पूरा होनेपर बच्चा साढ़े तीन गिरह बढ़ चुकता है और छठे साल जन्म से दूनी ऊँचाई हो जाती है। सात से तेरह वर्ष तक लड़के की ऊँचाई थोड़ी-थोड़ी बढ़ती जाती है। तेरह से सत्रह तक कद जल्दी-जल्दी बढ़ता है। इसके बाद फिर बढ़ना कम होजाता है। लड़कियाँ बारह-से-चौदह तक जल्दी-जल्दी बढ़ती हैं। बच्चों के क्रद में बढ़ने का खयाल अधिक नहीं रखना चाहिए। लम्बाई का खयाल रखना चाहिए; क्योंकि तौल में ही घटने-बढ़ने पर तन्दुरुस्ती की जाँच होती है। पुत्र १६७ पर दिये गये नकशे से इसका ठीक-ठीक ज्ञान होगा।

एक और बात ध्यान में रखनी चाहिए। अगर दूध छूटने पर बच्चा अन्न खाकर रहने लगे तो उसे चिकना-चुपड़ा मसालेदार खाना कभी न खिलावे; न मिठाई की बान लगावे।

दाँत निकलना—जिन दिनों बालकों को दाँत निकलते हैं उन दिनों उनकी लार बहुत निकलती है। इसलिए उसके गले में एक रुमाल वा अँगोछा बँधा रहना चाहिए। भीगने पर सूखा बदलना चाहिए और उसे धोकर सुखादे। इसी प्रकार हर घड़ी गले में सूखा कपड़ा

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बच्चों की ऊँचाई और वजन का नाप बताने वाला नकशा । (प्रुष्ट १६६ देखिए )

किस उमर तक | औसत लम्बाई | औसत वजन | ---|---|---|--- १ सप्ताह | ६ गिरह | ३ सेर | लड़की की तौल लड़कों की तौल से जाव सेर कम समझना चाहिए । यह औसत तौल है । कम ज्यादा भी हो सकता है । १ मास | ६ गिरह | ४ सेर ३ मास | ६।। गिरह | ५।। सेर ६ मास | ११। गिरह | ७।। सेर ६ मास | ११। गिरह | ६ सेर १ वर्ष | १३ गिरह | १० सेर १।। वर्ष | १३।। गिरह | ११ सेर २ वर्ष | १४।। गिरह | १३ सेर २।। वर्ष | १६ गिरह | १६।। सेर ५ वर्ष | १८ गिरह | २० सेर ६ वर्ष | १६।। गिरह | २२ सेर ८ वर्ष | २१।। गिरह | २७ सेर १० वष | २३ गिरह | ३३ सेर १२ वर्ष | २५ गिरह | ३६ सेर १५ वर्ष | २८ गिरह | ४५ सेर

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बँधा रक्खे । ऐसा करने से बालक की छातीपर ठण्ड नहाँ पहुँचने पाती । छाती में ठण्ड पहुँचने से छाती के अनेक रोग खाँसी इत्यादि उत्पन्न होकर महादुःख देते हैं ।

इन दिनों फेफड़े, मस्तक-पकाशय का काम ठीक नहाँ रहता है । इसी से खाँसी, अपच, अफारा, दस्त, उलटी, फोड़े-फुंसी इत्यादि रोग हो जाते हैं ।

इन दिनों शुद्ध वायु सेवन कराना परमावश्यक है । यह बच्चोंको अमृत की तरह हितकारी है । इसी सिद्धान्त के लिये शास्त्र में चतुर्थ मास में निष्क्रमण संस्कार का विधान किया है ।

अगर माता का दूध सूख गया हो और पूरा दूध न उतरता हो । अथवा दूध को पानी में डालने से वह पानी में घुल न जाय; बल्कि नीचे बैठ जाय तो यह दवा माता को दे:—

(१) वन कपास की जड़, ईख की जड़ बराबर काँजी में पीस कर ६ माशे पिलाना ।

(२) हल्दी, दारुहल्दी, पँबाड़ के बीज (चक्रमर्द) इन्द्रजौ, सुलाहटी, प्रत्येक को छै माशे लेकर एक पाव पानी में काढ़ा करना और दोनों समय पिलाना ।

(३) वच, मोथा, अतीस, देवदारु, सोंठ, सताबर, अनन्तमूल, सब का काढ़ा पूर्ववत बनाकर पिलाना । इससे दूध की वृद्धि होती है ।

खीर, मखाने, किशमिश, दाख, जीरा, आदि पौष्टिक पथ्य खाने को देना चाहिए ।

यदि माता का दूध बहुत ही दूषित हो गया है तो उसका न

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पिलाता ही अच्छा है। वैसी अवस्था में दो ही उपाय हैं—या तो कोई धाय लगाई जाय, और नहीं तो गाय का दूध दिया जाय।

धाय ऐसी हो कि जितने दिन के बालक के लिए धाय चाहिए उतने ही दिन का बालक उसकी गोद का हो। दस-पाँच दिन की न्यूनता की कोई बात नहीं; क्योंकि ऐसा न होने से उसका दूध बच्चे की प्रकृति के अनुकूल न होगा। धाय में इतनी बातें देखनी चाहिए:—

(१) युवा और सुन्दर हो, बहुत मोटी या कूरा नहीं।

(२) उसकी सन्तान भर तो नहीं जाती।

(३) उसे कोई रोग—कोढ़ खाज, दमा, चूय, आदि तो नहीं हैं।

(४) गर्भवती तथा ऋतुमती न हो।

(५) क्रोधी, झूठी, लवार, गन्दी, और वात्सल्यहीना न हो।

(६) सुखीला, हँसमुख, संतोषी हो।

(७) पहलौटी न हो। दूसरे-तीसरे की जती हो। स्तन ऊँचे, कठोर और लम्बे हों।

यदि ऐसी धाय न मिले तो उसे गाय का दूध देना ही ठीक होगा; किन्तु इस दूध को नीचे की विधि से ठीक करना होगा; क्योंकि गाय का दूध भारी और गाढ़ा होता है। सो वह यदि चिना पतला किये बालक को दिया जावेगा तो बच्चे का पेट बिगड़ जावेगा और रोगी हो जायगा।

साधारणतः बराबर गरम पानी मिलाकर दूध को पहले दे। और यदि वह न पचे तो यह विधि करे—

पान में खाने का चूना दो पैसा-भर लेकर एक बड़ी चोतल में

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ताजा पानी भरकर उसमें डाल दे। और कसकर डाट लगा दे। और लूझ हिलावे; फिर पानी को ठहरने दे। पाँच-छैं घण्टे पीछे उसका पानी निथार कर दूसरी बोटल में डाल दे। यह चूर्णादिक हुआ। यही चूर्णादिक एक तोला, गरम पानी एक तोला, दूध कच्चा आठ तोला मिलाकर थोड़ी चीनी मिलाकर पिलाओ—पाचन होगा।

दूध पिलाने की काँच की दुब्बी आती हैं; पर वे अच्छी तरह साफ नहीं होती—काँचमें बहुत शीघ्र ही कीड़े पड़ जाते हैं। सो उस का प्रयोग हानिकारक है। इससे यदि उसे प्रयोग करना है, तो दिन में दो बार गर्मजल से अच्छी तरह धोना चाहिए। इसका काम तुतई (टूटीदार छोटी घण्टी) में रबर की चूसनी, जो बाजार में मिलती है, लेकर काम चल सकता है; पर इसे भी धोने में सावधानी रखनी चाहिए; क्योंकि दूध बहुत शीघ्र विगड़ जाता है। परन्तु सबसे अच्छा और सरल उपाय एक यही है कि रुई के फोहे के द्वारा दूध पिलाया जाय।

बाजार में बिलायती दूध भी बना-बनाया (Condensed Milk के नाम से) मिलता है, उसे पिलाना ठीक नहीं; क्योंकि वह बहुत दिनों का रक्खा हुआ विगड़ा हुआ और दूषित होजाता है। अधिकोश में मेढी और गद्दी का दूध होता है।

ऐसा न करके यदि केवल पानी मिलाकर ही दूध पिलाया जायगा इससे भी उसके पेट में दर्द रहेगा। और बालक रोएगा। बहुधा बालक दूध पीते-पीते स्तनमें सिर मार देते हैं जिससे नाड़ी का मुख बन्द होकर स्तन सूज जाता है और बालक की माता को ज्वर

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होजाता है। इसकी यह चिकित्सा करे कि रोटी बनाने के बाद गरम-गरम तवा नीचे उतारकर रखदे और पानी (ताजे) से स्तन को इस प्रकार धोना शुरू करे कि सारा पानी टपक-टपककर नीचे तवे पर पड़े और उसकी भाप उठकर स्तन को लगे। दो-तीन दिन में स्वर उतर जायगा। सूजन भी कम हो जायगी। यदि सूजन अधिक हो तो यह क्रिया करे—

पोस्त के डोड़े एक तोले, मकोय सूखी एक छटॉक लेकर एक सेर पानी में पकावे। जब आधा पानी रह जाय उसे एक टूटी दार लोटे में मुँहबन्द करके टूटी दार भाप लगावे। शीघ्र आराम होगा। इस स्वर से भय की कोई बात नहीं है।

सस्ता साहित्य मण्डल की,

‘सर्वोदय साहित्य माला’ में प्रकाशित पुस्तकें ।

[ नोट— × निशान वाली पुस्तकें अप्राप्य हैं । ]

१-दिव्य-जीवन(I=)२३-स्वामीजी का बलिदान × (I=)
२-जीवन-साहित्य(१)२४-हमारे जमाने की गुलामी × (I)
३-तामिल वेद(II)२५-छी और पुरुष (II)
४-व्यसन और न्यभिचार (II=)२६-घरों की सफाई (I=)
५-सामाजिक कुशीतियाँ × (II)२७-क्या करें ? (१)
६-भारत के छी-रत्न (३ भाग) (३)२८-हाथ की कताई बुनाई × (II=)
७-अनोखा × (१=)२९-आत्मोपदेश × (I)
८-ब्रह्मचर्य-विज्ञान (II=)३०-न्यार्थ आदर्श जीवन × (II=)
९-यूरोप का इतिहास (२)३१-जब अंग्रेज नहीं आये थे— (I)
१०-समाज-विज्ञान (१II)३२-गङ्गा गोविन्दसिंह × (II=)
११-खहरका संपत्तिशास्त्र × (II=)३३-श्रीरामचरित्र (१I)
१२-गोरों का प्रभुत्व × (II=)३४-आश्रम-हरिणी (I)
१३-चीन की आवाज × (I=)३५-हिन्दी मराठी कोप × (२)
१४-द० अम्मीका का सत्याग्रह (१I)३६-स्वाधीनता के सिद्धान्त × (II)
१५-विजयी बारडोली × (२)३७-महान् मातृत्व की ओर (II=)
१६-अनीति की राह पर (II=)३८-शिवाजी की योग्यता (I=)
१७-सीता की अग्नि-परीक्षा (I=)३९-तरंगित हृदय (II)
१८-कन्या-शिवा (I)४०-नरसिंह (१II)
१९-कर्मयोग (I=)४१-ढुली दुनिया (I=)
२०-कलवार की करतूत (I=)४२-जिन्दा लाश (II)
२१-न्यायहारिक सभ्यता (II)४३-आत्म-कथा (गाँधीजी) (१) (१I)
२२-अंधेरे में उजाला (II)४४-जब अंग्रेज आये × (१=)

[ २ ]

४५-जीवन-विकास १।), १।।)६८-स्वतंत्रता की ओर— १।।)
४६-किमानों का विगुल × १=)६९-आगे बढ़ो ! ॥।)
४७-फॉसी ! ॥=)७०-बुद्ध-वाणी ॥=)
४८-अनासक्तियोग—गीताबोध७१-कामेस का इतिहास २।।), १=)
दे० (नवजीवनमाला)७२-हमारे राष्ट्रपति १)
४९-स्वर्ण विहान × ॥=)७३-मेरी कहानी(ज० नेहरू)२।।)
५०-मराठों का उत्थान-पतन २।।)७४-विश्व-इतिहास की मलक
५१-भाई के पत्र १)(ज० नेहरू) ८), १=)
५२-स्वगत × ॥=)७५-(दे० नवजीवनमाला)
५३-युगधर्म × १=)७६-नया शासन विधान-१ ॥।।)
५४-खी-समस्या १।।।।)७७-[१] गाँवों की कहानी ॥।)
५५-वि० कपडेका मुकाबिला × ॥=)७८-[२] महाभारत के पात्र ॥।)
५६-चित्रपट ॥=)७९-सुधार और संगठन १)
५७-राष्ट्रवाणी × ॥=)८०-[३] संतवाणी ॥।)
५८-इङ्लैंड में महात्माजी ॥।।)८१-विनाश या इलाज ? ॥।।)
५९-रोटी का सवाल १)८२-[४] अंग्रेजी राज्य में
६०-दैवी सम्पद् ॥=)हमारी आर्थिक दशा ॥।)
६१-जीवन-सूत्र ॥।।)८३-[५] लोक-जीवन ॥।)
६२-हमारा कलंक ॥=)८४-गीता मंथन १।।)
६३-बुद्धबुद्ध ॥।)८५-[६] राजनीति प्रवेशिका ॥।)
६४-संधर्प या सहयोग ? १।।)८६-[७] अधिकार और कर्तव्य ॥।)
६५-गांधी-विचार-दोहन ॥।।)८७-गांधीवाद : समाजवाद ॥।।)
६६-एशिया की क्रांति × १।।।।)८८-स्वदेशी : ग्रामोद्योग ॥।)
६७-हमारे राष्ट्र-निर्माता १।।।)८९-[८] सुगम-चिकित्सा ॥।)

आगे होनेवाले प्रकाशन

१-जीवन शोधन—(किशोरलाल मशरूवाला)

२-हमारी आजादी की लड़ाई [२ भाग]—(हरिभाऊ उपाध्याय)

३-फेसिस्टवाद

४-नया शासन विधान—(फेडरेशन)

५-ब्रह्मचर्य—(गाँधीजी)

६-समाजवाद : पूँजीवाद—(शोभालाल गुप्त)

७-सरल विज्ञान—१ (चन्द्रगुप्त वाष्ण्येय)

८-दुनिया की शासन पद्धतियाँ ( रामचन्द्र वर्मा )

९-हिन्दुस्तान की गरीबी ( दादाभाई नौरोजी )

१०-हमारे गाँव ( चौ० मुख्तार सिंह )

११-विद्यार्थियों से ( म० गाँधी )

१२-लोक साहित्य माला—(इसमें भिन्न-भिन्न वपयोंपर २०० पृष्ठों की पुस्तकें निकलेंगी । मूल्य प्रत्येक का ॥) होगा ।

१३-गाँधी साहित्य माला—(इसमें गाँधीजी के चुने हुए लेखों का संग्रह होगा—प्रत्येक का दाम ॥) होगा ।

१४-टालस्टाय ग्रंथावली—(टालस्टाय के चुने हुए निबंधों, लेखों और कहानियों का संग्रह । प्रत्येक का मूल्य ॥),

१५-बाल साहित्य माला—(बालोपयोगी पुस्तकें)

१६-नवराष्ट्र माला—इसमें संसार के प्रत्येक स्वतंत्र राष्ट्र-निर्माताओं और राष्ट्रों का परिचय होगा और पुस्तकें सचित्र होंगी । मूल्य ॥॥)

१७-नवजीवनमाला—छोटी-छोटी नवजीवन दायी पुस्तकें ।

१८-सामयिक साहित्य माला—सामयिक विषयों और घटनाओं पर देश के नेताओं के विचार ।

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