सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)
Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary
भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा
४५६ सूर्य-सिद्धान्त
परन्तु भ चा और भ च पृथ्वी से स्पष्ट और मध्यम चन्द्रमा की दूरियां हैं
और यह बताया गया है कि कोणीय वेग कर्ण के वर्ग के प्रतिलोम के अनुसार बदलता
है (देखो स्पष्टाधिकार पृष्ठ ८८) इसलिए स्थूल रूप से यह माना जा सकता है
कि कोणीय वेग कर्ण के भी प्रतिलोम के अनुसार बदलता है जैसा कि सूर्य-सिद्धान्त
के नियम से प्रकट होता है ।
इसलिए
भ चा / भ च = चंद्रमा की मध्यम गति / चंद्रमा की स्पष्ट गति = म / स
∵ म / स = का घा / क घ = प फ / क घ
∴ क घ = प फ × स / म = भू व्यास × स्पष्टगति / मध्यम गति
इसी क घ का नाम श्लोक ४ में सूची रखा गया है ।
समजातीय त्रिभुज भ का खा और भ क ख इत्यादि से सिद्ध हो सकता है कि
भ चा / भ च = का खा / क ख = गा घा / ग घ = का खा + गा घा / क ख + ग घ ...(२)
समीकरण (१) और (२) में प का और भ चा समान हैं इसलिए
प ध × का खा + गा घा / त ध - प फ = भ च × का खा + गा घ / क ख + ग घ
या प थ / भ च = त ध - प फ / क ख + ग घ
परन्तु प थ या भ र पृथ्वी से सूर्य की मध्यम दूरी और भ च पृथ्वी से चन्द्रमा
की मध्यम दूरी है जिनका अनुपात = ४३३१५०० / ३२४००० = १३·३७ क्योंकि सूर्य-सिद्धान्त के
अनुसार ४३३१५०० योजन सूर्य की कक्षा और ३२४००० योजन चन्द्रमा की कक्षा के
विस्तार हैं, तथा ६५०० / ४८० = १३·५४, सूर्य और चन्द्रमा के मध्यम व्यासों का अनुपात है
जो १३·३७ के प्रायः समान है। इसलिए यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं कि
प थ / भ च = ६५०० / ४८० = सूर्य का मध्यम व्यास / चन्द्रमा का मध्यम व्यास
∴ ६५०० / ४८० = तध - प फ / क ख + ग घ
चन्द्रग्रहणाधिकार ४५७
क ख + ग घ = (त ध - प फ) × ४८०/६५००
परन्तु क ख + ग घ = क घ - छ ग
= सूची - चंद्रकक्षा में भूछाया
और त ध - प फ = सूर्य का स्पष्ट ब्यास - पृथ्वी का व्यास
सूची - चंद्रकक्षा में भूछाया
= (सूर्य का स्पष्ट व्यास - पृथ्वी का व्यास) × ४८०/६५००
∴ चन्द्रकक्षा में भूछाया
= सूची - (सूर्य का स्पष्ट व्यास - पृथ्वी का व्यास) × ४८०/६५००
यही ४, ५ श्लोकों का तात्पर्य है ।
ग्रहण कब सम्भव होता है—
भानोर्भार्धे महोच्छाया तत्तुल्येऽर्कसमेऽथवा ।
शशाङ्कपाते ग्रहणं कियद्भागाधिकोनके ॥६॥
तुल्यौ राश्यादिभिः स्याता ममावास्यान्तकालिकौ ।
सूर्येन्दु पौर्णमास्यन्ते भार्धे भागादिभिस्समौ ॥७॥
अनुवाद—(६) सूर्य से ६ राशि के अंतर पर पृथ्वी की छाया होती है ।
यदि सूर्य से इतनी ही दूरी पर अथवा सूर्य के ही समान राशि अंश पर अथवा इनसे
कुछ ही कम या अधिक दूरी पर चन्द्रमा का पात हो तो सूर्य और चन्द्रमा में ग्रहण
लगता है । (७) सूर्य और चन्द्रमा के राशि अंश कला विकला इत्यादि अमावस्या के
अन्त में समान होते हैं और पूर्णमासी के अंत में ठीक ६ राशि के अंतर पर होते हैं ।
विज्ञान भाष्य—चित्र ६३ से प्रकट है कि पृथ्वी की छाया का केन्द्र छ या
न सूर्य और पृथ्वी के केन्द्रों को मिलाने वाली रेखा र प न पर सदैव रहता है इसलिए
पृथ्वी की छाया सूर्य से सदैव १८०° या ६ राशि आगे रहती है । इसलिए जब
चन्द्रमा सूर्य से १८०° के लगभग आगे रहता है तभी यह पृथ्वी के छाया में प्रवेश
कर सकता है अन्यथा नहीं । परन्तु जब चन्द्रमा सूर्य से १८०° आगे रहता है तब
पूर्णिमा का अंत होता है इसलिए पूर्णिमा के अंत काल के लगभग चंद्रग्रहण लग
सकता है । इसी प्रकार जब चन्द्रमा सूर्य के सामने आकर उसको ढक लेता है तभी
सूर्य ग्रहण लगता है परन्तु यह बात तभी संभव है जब सूर्य और चन्द्रमा के भोगांश
प्रायः समान होते हैं अर्थात् जब अमावस्या होती है । इसलिए यह प्रकट है कि चन्द्र-
२
४५८ सूर्य-सिद्धान्त
ग्रहण पूर्णिमा के अंत में और सूर्यग्रहण अमावस्या के अंत में लगते हैं। (देखो
चित्र ६७)
अब यह प्रश्न हो सकता है कि प्रत्येक पूर्णिमा और अमावस्या के अंत में
चन्द्रग्रहण या सूर्यग्रहण क्यों नहीं लगता ? इसका कारण यह है कि चन्द्रमा का कक्षातल
क्रान्तिवृत्त के कक्षातल से
भिन्न है। इन दोनों का परम
अंतर ५° के लगभग है जिसे
चन्द्रमा का परमविक्षेप या
परम शर कहते हैं (देखो
मध्यमाधिकार पृ० ७४-
७५) । परंतु सूर्य और
चन्द्रमा के बिम्बार्ध १६' के
लगभग तथा पृथ्वी की छाया
का व्यासार्ध अथवा भूभार्ध
४२' के लगभग होता है (देखो
पहले का उदाहरण) इसलिए
जब चन्द्रमा अपनी कक्षा में
ऐसी जगह रहता है जो
क्रान्तिवृत्त के पास हो और
क्रान्तिवृत्त से जिसका अन्तर
१६' + ४२' = ५८' के
लगभग या इससे भी कम हो
तभी ग्रहण हो सकता है । यह
स्थिति उसी समय सम्भव है
जब अमावस्या या पूर्णमासी के
लगभग चन्द्रमा अपनी कक्षा
और क्रान्तिवृत्ति के मिलन
बिन्दुओं अर्थात् पातों के पास
हो । परन्तु चन्द्रमा के पात
एक दूसरे से सदैव १८०° के
अंतर पर होते हैं इसलिए यह
चन्द्रग्रहणाधिकार ४५६
प्रकट है कि जब अमावस्या या पूर्णमासी के समय सूर्य के भोगांश के समान ही
या इसके लगभग राहु या केतु किसी का भोगांश हो तभी ग्रहण लग सकता है अन्यथा
नहीं । यह बात चित्र ६८ से अच्छी तरह स्पष्ट हो जायगी :-
चित्र ६८
पूर्णिमान्त काल में :- छा = पृथ्वी की छाया का केन्द्र च = चन्द्रमा का केन्द्र
च छा या श = चन्द्रमा का शर (विक्षेप)
म = भूछाया और चन्द्रमा के व्यासार्धों का योग प = चंद्रमा का पात
च क या चा = चन्द्रमा की प्रति घड़ी भोगांश गति
क ख या शा = " " " शर की गति
छ छा या रा = भूछाया अथवा सूर्य की प्रतिघड़ी भोगांश गति
४६० सूर्य-सिद्धान्त
क च रेखा पर क का, छ छा के समान काट लो और का से क ख के समान
और समानान्तर का खा खींचो, च खा को मिलाकर खा की ओर क्रान्तिवृत्त के व
बिन्दु तक खींचो । यही च खा व चन्द्रमा का आपेक्षिक मार्ग होगा, यदि यह मान
लिया जाय कि भूछाया छ बिन्दु पर स्थिर है ।
यदि छ से च ब पर छ फ लम्ब डाला जाय तो यही चन्द्रमा और भूछाया के
केन्द्रों की निकटतम दूरी होगी । यदि छ को केन्द्र मानकर म के समान त्रिज्या से वृत्त
खींचा जाय जो च ब को दो बिन्दुओं स, सा पर काटे तो यही दो बिन्दु आपेक्षिक
मार्ग पर चन्द्रमा के स्पर्श और मोक्षकाल के स्थान होंगे । यदि इन पर बिन्दुओं से च क
के समानान्तर रेखाएँ खींची जायँ तो ये चन्द्रमा के यथार्थ मार्ग के जिन बिन्दुओं पर
पहुँचेंगी वही स्पर्श और मोक्षकाल के यथार्थ स्थान होंगे ।
यदि क च ख कोण को इ और का च खा कोण को ई मान लिया जाय तो
स्परे इ = $\frac{क ख}{क च} = \frac{शा}{चा}$
स्परे ई = $\frac{का खा}{का च} = \frac{क ख}{का च} = \frac{शा}{क च - क का} = \frac{शा}{चा - रा}$
कोण च छ फ और छ च फ का योग समकोण के समान है क्योंकि च ब पर
छ फलम्ब खींचा गया है परन्तु छ च फ और फ च क कोणों का योग भी समकोण के
समान है क्योंकि चछ छप पर लम्ब है और च क, छ प के समानान्तर है ।
इसलिए कोण च छ फ = कोण फ च क = ई,
$\because$ छ फ = च छ कोज्या ई = श कोज्या ई
यदि श कोज्या ई का मान भूछाया और चंद्रमा के व्यासार्धों के योग से अधिक
होगा तो ग्रहण नहीं लगेगा ।
परन्तु यदि श कोज्या ई, म से छोटा होगा तो ग्रहण अवश्य लगेगा । यदि
यह जानना हो कि खंड ग्रहण लगेगा या सर्वग्रास तो दोनों का अंतर निकालना
चाहिये । यदि म — श कोज्या ई का मान चन्द्रमा के व्यास से छोटा. हो तो समझना
चाहिये कि खंड ग्रहण लगेगा और यदि इसका मान चन्द्रमा के व्यास से बड़ा हो तो
सर्वग्रास ग्रहण लगेगा क्योंकि चित्र ६६ से प्रकट है कि म — श कोज्या ई = चन्द्रमा का
ग्रसित भाग । इसलिए यदि ग्रसित भाग चन्द्रमा के व्यास से कम होगा तो स्पष्ट है
कि सर्वग्रास ग्रहण नहीं लग सकता । परन्तु यदि ग्रसित भाग चन्द्रमा के व्यास के
अधिक है जो सर्वग्रास ग्रहण अवश्य लगेगा ।
चन्द्रग्रहणाधिकार ४६१
चित्र ६६
चित्र ६६ चन्द्रमा और भूछाया का उस समय का चित्र है जब कि चन्द्रमा
भूछाया से निकटतम अन्तर पर रहता है अर्थात् जब चन्द्रमा चित्र ६८ के फ बिन्दु
पर रहता है और भूछाया छ पर । यह स्पष्ट है कि छ झ भूछाया का व्यासार्धं और
च ज चन्द्रमा का व्यासार्धं है । चन्द्रमा का ग्रसित भाग ज झ के समान है । अब
देखना है कि ज झ का परिमाण क्या है ?
ज झ = छ झ - छ ज
= छ झ - (च छ - च ज)
= छ झ + च ज - च छ
= म - श कोज्या ई
यदि म - श कोज्या ई शून्य के समान हो अर्थात् यदि म = श कोज्या ई तो
ग्रहण नहीं लगेगा क्योंकि चन्द्रमा भूछाया को स्पर्श करता हुआ निकल जायगा ।
ऐसी दशा में भूछाया के केन्द्र से पात का अन्तर छ प का परिमाण यों निकलेगा -
यह प्रकट है कि कोण च प छ = इ,
∵ स्परे इ = च छ / छ प
∴ छ प = च छ / स्परे इ = श / स्परे इ
परन्तु ऊपर मान लिया गया है कि
म = श कोज्या ई
४६२ सूर्य-सिद्धान्त
$\because$ श = $\frac{म}{कोज्या ई}$
$\therefore$ छ प = $\frac{म}{कोज्या ई \times स्परे इ}$
= म छेरे ई कोस्परे इ
इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि जब पात से भूछाया का अंतर म छेरे ई
कोस्परे इ के समान या अधिक होगा तब ग्रहण नहीं लगेगा और कम होगा तो ग्रहण
अवश्य लगेगा। परन्तु ऊपर माना गया है कि
स्परे इ = $\frac{शा}{चा} =$ $\frac{चन्द्रमा के शर की गति}{चन्द्रमा के भोगांश की गति}$
स्परे ई = $\frac{शा}{चा-रा} =$ $\frac{चन्द्रमा के शर की गति}{सूर्य और चन्द्रमा की गतियों का अंतर}$
और म = भूछाया और चन्द्रमा के व्यासार्धों का योग
इसलिए यह तीनों गुणक चन्द्रमा और सूर्य की गतियों पर निर्भर हैं जो
अस्थिर हैं इसलिए छ प का मान भी अस्थिर है। यहाँ इ क्रान्तिवृत्त और चन्द्रकक्षा
के बीच का कोण है इसलिए वह ज्ञात है परन्तु ई अज्ञात है इसलिए पहले ई को
ही जानना चाहिए। ऊपर के सम्बन्ध से स्पष्ट है कि
$\frac{स्परे ई}{स्परे इ} = \frac{शा}{चा-रा} \div \frac{शा}{चा} = \frac{चा}{चा-रा}$
$\because$ स्परे ई = $\frac{चा}{चा-रा} \times स्परे इ$
$\because$ इ, चा और रा के मध्यम मान क्रमशः ५°६′, ७६०′३५″ और ५९′८″
है। इसलिए
$\frac{चा}{चा-रा} = \frac{७६०′३५″}{७६०′२५″-५९′८″} = \frac{७६०′३५″}{७०१′२७″} = १\cdot०८०८४$
$\therefore$ स्परे ई = $१\cdot ०८०८४ \times स्परे ५^\circ ६^\prime$
= $१\cdot ०८०८४ \times \cdot ०६०१$
= $\cdot ०६७४$
$\therefore$ ई = $५^\circ ३४^\prime$
$\therefore$ छ प = म छेरे ई को स्परे इ
= $\frac{म}{कोज्या ई स्परे इ}$
चन्द्रग्रहणाधिकार ४६३
म
= ————————————————
कोज्या ५° ३४' स्परे ५° ६'
परन्तु म == भूछाया और चन्द्रमा के व्यासार्धों का योग
∵ म का मध्यम मान
= भूछाया का मध्यम व्यासार्ध + चन्द्रमा का मध्यम व्यासार्ध
भूछाया का मध्यम व्यासार्ध = चन्द्रमा का मध्यम लंबन + सूर्य का मध्यम लंबन
- सूर्य का मध्यम व्यासार्ध
= ५७' ११" + ८"·५ - १६' ४"
= ४१' १८"·५
इसका १/६० और बढ़ाने पर भूछाया का मध्यम व्यासार्ध
= ४१' १८"·५ + ४१"·६
= ४२' ८" = ४२'·१३५
और चन्द्रमा का मध्यम व्यासार्ध = १५' ३५" = १५'·५८३
∴ म = ४२'·१३५ + १५'·५८३ = ५७'·७२
५७'·७२
∴ छ प = —————————————
कोज्या ५° ३४' स्परे ५° ६'
∴ लरि (छ प) = लरि ५७'·७२ - लरि कोज्या ५° ३४' - लरि स्परे ५° ६'
= १·७६१४ - ६·६६७६ - ८·६५४६
= २·८०८६
∴ छ प = ६४४' = १०° ४४'
यह चन्द्रग्रहण की मध्यम सीमा है। इसी प्रकार यह जाना जा सकता है कि
छ प का महत्तम मान १२° ३६' और लघुतम मान ६° है। इसका अर्थ यह हुआ
कि यदि छ प १२° ३६' से अधिक हो तो चन्द्र ग्रहण असम्भव है और ६° से कम
हो तो ग्रहण अवश्य पड़ेगा परन्तु यदि छ प ६° से अधिक और १२° ३६' से कम
हो तो ग्रहण सम्भव हो सकता है, जिसका निश्चय पूर्णिमान्तकालिक सूर्य और चन्द्रमा
के लंबन तथा इनके स्पष्ट बिम्बार्ध से करना चाहिए ।
यह पहले ही बतला दिया गया है कि छ प भूछाया के केन्द्र से पात की दूरी
है परन्तु भूछाया का केन्द्र सूर्य के केन्द्र से १८०° आगे रहता है और चन्द्रमा के दोनों
पातों का अन्तर भी १८०° होता है इसलिए यदि पूर्णिमान्तकालिक सूर्य से चन्द्रमा
के किसी पात का अन्तर १२° ३६' से अधिक हो तो ग्रहण असम्भव है, ६° से कम
४६४ सूर्य-सिद्धान्त
हो तो ग्रहण अवश्य पड़ेगा और इन दोनों के बीच में हो तो सम्भव है ग्रहण लगे ।
इसलिए चन्द्रग्रहण की महत्तम सीमा १२°३६′ और लघुत्तम सीमा ६° होती है ।
सूर्यग्रहण की महत्तम और लघुत्तम सीमा — जिस तरह चित्र ६३ से सिद्ध
होता है कि जब चन्द्रमा पृथ्वी की छाया स ह में आ जाता है तब चन्द्र-ग्रहण पड़ता
है उसी तरह उसी चित्र से यह भी सिद्ध होता है कि जब चन्द्रमा अमावस्या के अंत
में पृथ्वी की छाया बनानेवाली स्पर्श-रेखाओं के सा, हा बिन्दुओं के बीच में आ जाता
है तब पृथ्वी पर कहीं न कहीं सूर्य-ग्रहण अवश्य देख पड़ेगा क्योंकि ऐसी स्थिति में
चन्द्रमा की छाया पृथ्वी के किसी न किसी स्थान पर अवश्य पड़ेगी । जिस प्रकार
स ह के व्यासार्ध के परिमाण से चन्द्र-ग्रहण की सीमा जानी जा सकती है उसी
प्रकार सा हा के व्यासार्ध के परिमाण से सूर्य-ग्रहण की सीमा जानी जा सकती है ।
∠ सा प छा = ∠ प न पा + < प सा पा
= < रि प र + < प सा पा
= सूर्य की त्रिज्या - सूर्य का लंबन + चन्द्रमा का लंबन
∵ < सा प छा का मध्यम मान
= १६′ १″ - ८″.५ + ५७′ ११″
= ७३′ ३″.५
= ७३′.०५८
सूर्य-ग्रहण के संबंध में भी सूत्र छ प = म छरे ई कोस्परे ५, काम दे सकता है ।
यहां म = ∠ सा प छा + चन्द्रमा का व्यासार्ध
= ७३′.०५८ + १५′.५८३ = ८८′.६४
∵ छ प = ८८′.६४ / (कोज्या ५° ३४′ स्परे ५° ६′)
∵ लरि छ प = लरि ८८′.६४ - लरि कोज्या ५° ३४′ - लरि स्परे ५° ६′
= १.६४७६ - ६.६६७६ - ८.६५४६
= २.६६५१
∵ छ प = ६८८′.६
= १६° २८′.६
यह सूर्य-ग्रहण की मध्यम सीमा है । इसी प्रकार यह जाना जा सकता है कि सूर्य-
ग्रहण के संबंध में छ प का महत्तम मान १८°.५ और लघुत्तम मान १५°.३ है ।
अर्थात् यदि अमावस्या के अंत में सूर्य से चंद्रमा के किसी पात का अंतर १५°.३ से
कम हो तो समझना चाहिए कि सूर्य-ग्रहण अवश्य पड़ेगा और यदि यह अंतर १८°.५
से अधिक है तो सूर्य-ग्रहण सम्भव नहीं है । परन्तु यदि यह अंतर इन दोनों के बीच
चन्द्रग्रहणाधिकार ४६५
में हो अर्थात् १५°.३ से अधिक और १८°.५ से कम हो तो सम्भव है कि ग्रहण
लगे जिसका निश्चय अमावस्या के अंतकाल के सूर्य, चंद्रमा के लंबन और उनकी
स्पष्ट गतियों के द्वारा करना चाहिये ।
चन्द्र-ग्रहण उन सब स्थानों में देख पड़ता है जहां ग्रसित चंद्रमा का उदय हो
चुकता है । परन्तु सूर्य-ग्रहण का देखना उन सब स्थानों से सम्भव नहीं जहाँ सूर्य
का उदय हुआ रहता है क्योंकि चन्द्रमा के लंबन तथा इसकी छाया के बहुत पतली
होने के कारण यह थोड़े ही स्थानों से देखा जा सकता है जिसका निश्चय करना
सहज नहीं है ।
पर्वान्त काल में सूर्य, चन्द्रमा और पात को स्पष्ट करने की रीति—
गतैष्यपर्वनाडीनां स्वफलेनोन् संयुतौ ।
समलिप्तौ भवेतां तौ पातस्तात्कालिकोऽन्यथा ॥८॥
अनुवाद--(८) जिस समय के सूर्य और चन्द्रमा स्पष्ट किये गये हों उस
समय से पर्वान्त काल अर्थात् पूर्णमासी या अमावस्या के अंत काल का जो
अंतर हो उतने समय की सूर्य और चन्द्रमा की स्पष्ट गतियां जानकर उनको
सूर्य और चंद्रमा के स्पष्ट भोगांशों से क्रमशः घटाने या जोड़ने से जो आवें
उन्हीं को पर्वान्तकालिक स्पष्ट सूर्य और स्पष्ट चन्द्रमा समझना चाहिये । यदि
उपर्युक्त समय पर्वान्त काल से पीछे हो तो घटाना चाहिये और पहले हो तो
जोड़ना चाहिये । परन्तु पात का स्पष्ट स्थान जानने के लिए इसकी विलोम क्रिया
करनी चाहिये अर्थात् यदि उपर्युक्त समय पर्वान्त काल से पीछे हो तो उतने समय की
पात की गति बढ़ानी चाहिये और पहले हो तो घटानी चाहिये क्योंकि पात की गति
उलटी होती है ।
विज्ञान भाष्य—जैसे मध्यमाधिकार ६७वें श्लोक में यह बतलाया गया है कि
किसी समय का मध्यम ग्रह दिया हुआ हो तो किसी अन्य समय का मध्यम ग्रह कैसे
जानना चाहिये उसी प्रकार यहाँ बतलाया जाता है कि किसी समय के सूर्य चन्द्रमा
और राहु के स्पष्ट भोगांश ज्ञात हों तो पर्वान्त काल के सूर्य और चन्द्रमा और राहु
के स्पष्ट भोगांश कैसे जानने चाहिए। इसकी आवश्यकता इसलिए पड़ती है कि ग्रहण
की गणना करने के लिए पूर्णमासी और अमावस्या के अन्तकालों के सूर्य, चन्द्रमा
और राहु के स्पष्ट स्थानों तथा उनकी गतियों से ही काम लिया जाता है जैसा कि
ऊपर की बतलायी गयी रीतियों से स्वयम् प्रकट होता है ।
ग्रहण का कारण—
छादको भास्करस्येन्दुरधस्ताद् घनवद् भवेत् ।
भूच्छायां प्राङ्मुखश्चन्द्रो विशत्यस्य भवेदसौ ॥६॥
४६६ सूर्य-सिद्धान्त
अनुवाद—(६) सूर्य से नीचे रहने के कारण चन्द्रमा उसको बादल की तरह
ढक लेता है । पूर्व की ओर भ्रमण करता हुआ चन्द्रमा भू-छाया में प्रवेश कर जाता है
इसलिए चन्द्रमा को भू-छाया ढक लेती है। इसलिये सूर्य-ग्रहण में चंद्रमा का छादक
होती है।
विज्ञान भाष्य—यह बात पहले ही बतलायी जा चुकी है इसलिए यहाँ
दुहराने की आवश्यकता नहीं है ।
ग्रास का परिमाण—
तात्कालिकेन्दुविक्षेपं छाद्यच्छादकमानयोः ।
योगाधार्त्तिरोज्झ्य यच्छेषं तमश्छन्नं तदुच्यते ॥१०॥
अनुवाद—(१०) पर्वान्तकालिक चन्द्रमा के विक्षेप अथवा शर को छाद्य ओर
छादक के व्यासाधों के योग से घटा दो, जितना शेष रहे वही ग्रास का परिमाण होगा।
विज्ञान भाष्य—यह चित्र ६६ की व्याख्या से स्पष्ट है। यह चित्र सूर्य और
चन्द्रमा दोनों के लिए समान लागू है। चंद्र-ग्रहण में छ छादक ओर च छाद्य है और
सूर्य-ग्रहण में यदि छ सूर्य बिम्ब मान लिया जाय तो छ छाद्य ओर च छादक
हो जायगा ।
सर्वग्रास ग्रहण और खंड ग्रहण की अवस्था--
ग्राह्यमानाधिके तस्मिन्सकलं न्यूनमन्यथा ।
योगाधार्दधिके न स्याद्विक्षेपे ग्रास संभवः ॥११॥
अनुवाद—(११) यदि छाद्य के बिम्बमान से ग्रास का परिमाण अधिक हो
तो सम्पूर्ण ग्रहण अर्थात् सर्वग्रास ग्रहण ओर कम हो तो खंड ग्रहण लगता है। परन्तु
यदि चन्द्रमा का विक्षेप छाद्य ओर छादक के व्यासाधों के योग से अधिक हो तो
ग्रहण नहीं हो सकता ।
विज्ञान भाष्य—यह भी चित्र ६६ की व्याख्या में समझा दिया गया है।
वहाँ जो कुछ चन्द्रमा के विषय में कहा गया है वही सूर्य के सम्बन्ध में भी लागू हो
सकता है ।
स्थित्यर्थ और विमर्दार्ध जानने की रीति
ग्राह्यग्राहकसंयोगवियोगौ दलितौ पृथक् ।
विक्षेपवर्गहीनाभ्यां तद्वर्गाभ्यामुभे पदे ॥१२॥
षष्ठ्या संगुण्य सूर्येन्द्वोः भुक्त्यन्तरविभाजिते ।
स्यातां स्थितिविमर्दार्धे नाडिकादिफले तयोः ॥१३॥
चन्द्रग्रहणाधिकार ४६७
चित्र १००
४६८ सूर्य-सिद्धान्त
अनुवाद-(१२) छाद्य और छादक के बिम्बों को जोड़कर और घटाकर
प्रत्येक का आधा करके अलग-अलग रखो ; प्रत्येक के वर्ग से चंद्रमा के विक्षेप के वर्ग
को घटाकर शेष का वर्गमूल निकालो । (१३) प्रत्येक के वर्गमूल को ६० से गुणा
करके गुणनफल को सूर्य और चन्द्रमा की स्पष्ट गतियों के अन्तर से भाग दे दो ।
भाग देने से जो लब्धि आवेगी वह स्थित्यर्ध और विमर्दार्ध होंगे ।
विज्ञान भाष्य - ग्रहण जितने समय तक रहता है उसके आधे समय को
स्थित्यर्ध और सर्वग्रास ग्रहण जितने समय तक रहता है उसके आधे को विमर्दार्ध
कहते हैं । अथवा स्पर्श काल से ग्रहण के मध्यकाल तक के समय को स्थित्यर्ध और
सम्मीलन काल से मध्यकाल तक के समय को विमर्दार्ध कहते हैं । स्थित्यर्ध का दूना
करने से जो आता है वह कुल ग्रहण काल है और विमर्दार्ध का दूना कर देने से जो
आता है वह सर्वग्रास ग्रहण का समय है ।
चित्र १०० में छ प क्रान्तिवृत्त, च प चंद्र कक्षा, प चन्द्रमा का पात, छ भूछाया
का केन्द्र, च स्पर्श काल के समय चन्द्रमा का केन्द्र, चा सम्मीलन-काल के समय
चन्द्रमा का केन्द्र, चि उन्मीलन के समय चन्द्रमा का केन्द्र, ची मोक्षकाल के समय
चन्द्रमा का केन्द्र और फ ग्रहण के मध्यकाल के समय चन्द्रमा का केन्द्र है। यहाँ
सुविधा के लिए भूछाया को स्थिर मान लिया गया है इसलिए चन्द्रमा की गति
अपनी कक्षा में सापेक्ष है जैसा कि चित्र ६८ में च ब रेखा से दिखलाया गया है ।
इसलिए यह सिद्ध है कि चन्द्रमा जिस गति से च रेखा पर जाता हुआ दिखलाया गया
है वह चन्द्रमा और सूर्य की स्पष्ट गतियों का अन्तर है। यदि यह मान लिया जाय
कि छ प च एक समतल त्रिभुज (plane triangle) है तो कोई हर्ज न होगा। ऐसी
दशा में जब कि च फ छ कोण समकोण हो और छ फ पर्वान्तकालिक चन्द्रमा का
शर हो तब
च फ=√च छ² - छ फ २
= √ (चंद्रबिम्ब + भूभाबिम्ब)² - (चंद्रशर)²
२
यदि चन्द्रमा और सूर्य की स्पष्ट दैनिक गतियों का अंतर चा---रा हो तो
जितनी देर में चन्द्रमा इसी गति से च फ मार्ग चलेगा वह इस प्रकार ज्ञात होगा-
जब चन्द्रमा चा-रा भाग ६० घड़ियों में चलता है तब च फ भाग
६० × च फ
⎯⎯⎯⎯⎯⎯ घड़ियों में चलेगा ।
चा-रा
यदि च फ की जगह इसका ऊपर बतलायी गयी रीति से जाना हुआ मान
रखा जाय तो स्थित्यर्ध काल यह होगा-
चन्द्रग्रहणाधिकार ४६६
६० / (चा - रा) × √[ ( (चन्द्रबिम्ब + भूभाबिम्ब) / २ )² - (चन्द्रशर)² ]
यदि (चन्द्रबिम्ब + भूभाबिम्ब) / २ को मानैक्यखंड लिखा जाय और
इस सूत्र को सरल किया जाय तो यह रूप होगा—
स्थित्यर्ध = (६० घड़ी × √( (मानैक्यखंड + शर) (मानैक्यखंड - शर) )) / (चन्द्र और सूर्य की स्पष्ट दैनिक गतियों का अन्तर)
इसी प्रकार
चा फ = √( चा छ² - छ फ² )
= √[ ( (भूभाबिम्ब - चन्द्रबिम्ब) / २ )² - (चन्द्रशर)² ]
इसलिए विमर्दार्ध काल
= ६० / (चा - रा) × √[ ( (भूभाबिम्ब - चन्द्रबिम्ब) / २ )² - (चन्द्रशर)² ]
यदि (भूभाबिम्ब - चन्द्रबिम्ब) / २ को मानान्तरखंड लिखा जाय और इस सूत्र को
सरल किया जाय तो
विमर्दार्ध = (६० घड़ी × √( (मानान्तर खंड + शर) (मानान्तर खंड - शर) )) / (चंद्र और सूर्य की स्पष्ट दैनिक गतियों का अन्तर)
इनके सरल करने पर जो समय आवेगा वह घड़ियों में होगा। परन्तु यह
स्थूल होगा क्योंकि इसकी गणना में सूर्य और चन्द्रमा की स्पष्ट दैनिक गतियों का
अन्तर तथा पर्वान्तकालीन चन्द्रशर लिये गये हैं जो स्पर्श या सम्मीलनकाल की स्पष्ट
गतियों और शर से बहुत भिन्न होंगे। इसलिए आवश्यक यह है कि पर्वान्तकाल के
कुछ पहले और पीछे की प्रत्येक घड़ी या घंटे की स्पष्ट गतियों का अन्तर और चन्द्र-
शर निकाल कर गणना की जाय। यदि ऊपर के नियम से ही स्थित्यर्ध और विमर्दार्ध
काल जाना जावें तो चाहिए कि पर्वान्त काल से इतना पहले के सूर्य, चन्द्रमा, राहु
और चन्द्र शर के स्पष्ट स्थान निकाल कर इनसे फिर स्थित्यर्ध काल और निमर्दार्ध
काल जाना जावे। ये पहले की अपेक्षा अधिक शुद्ध होंगे। इसी प्रकार कई बार
स्थित्यर्ध काल और विमर्दार्ध काल निकाले जायें तो अंत में ऐसा फल मिलेगा जो
फिर भिन्न न हो सकेगा। यही शुद्ध स्थित्यर्धकाल और विमर्दार्ध काल होंगे ऐसी
क्रिया को असकृत्कर्म कहते हैं। इसी की रीति अगले दो श्लोकों में बतलायी गयी है।
४७० सूर्य-सिद्धान्त
असकृत्कर्म से स्थित्यर्थ और विमर्दार्ध काल जानना—
स्थित्यर्थनाडिकाभ्यस्ता गतयष्षष्टिभाजिताः ।
लिप्तादि प्रग्रहे शोध्यं मोक्षे देयं पुनः पुनः ॥१४॥
तद्विक्षेपैः स्थितिदलं विमर्दार्धं तथाऽसकृत् ।
संसाध्यमन्यथा पाते तल्लिप्तादिफलं स्वकम् ॥१५॥
अनुवाद—(१४) सूर्य, चन्द्रमा और पात की दैनिक गतियों को स्थित्यर्थ काल
से (जो घड़ियों में होता है) गुणा करके साठ से भाग देने पर यह ज्ञात होता है कि
सूर्य-चन्द्रमा और पात स्थित्यर्थ काल में कितना चलते हैं। इन परिमाणों को क्रमशः
पर्वान्तकालीन सूर्य और चन्द्रमा के भोगांशों से घटा देने पर सूर्य और चन्द्रमा के
स्पर्शकालीन भोगांश आ जाते हैं और जोड़ देने पर इनके मोक्षकालीन भोगांश आ
जाते हैं। (१५) परन्तु स्पर्शकालीन पात का भोगांश जानने के लिए स्थित्यर्थ काल
में पात जितना चलता है उसको पर्वान्तकालीन पात के भोगांश में जोड़ना चाहिए
और मोक्षकालीन पात का भोगांश जानने के लिए उसको पर्वान्तकालीन पात के
भोगांश से घटाना चाहिए क्योंकि पात की गति उलटी होती है। इस प्रकार स्पर्श-
कालीन सूर्य चन्द्रमा और पात के भोगांश से चन्द्रमा का शर और सूर्य चन्द्रमा की
स्पष्ट गतियों को जान कर स्थित्यर्थ और विमर्दार्ध काल फिर निकाले । इसी प्रकार
कई बार के असकृत् कर्म से स्पर्श और मोक्ष काल का ज्ञान सूक्ष्मतापूर्वक हो सकता
है। इसी प्रकार सम्मीलन और उन्मीलन काल की शुद्धता भी जाननी चाहिए ।
विज्ञान भाष्य—इसकी उपपत्ति पिछले पृष्ठ में बतलायी जा चुकी है
इसलिए अधिक लिखने की आवश्यकता नहीं है ।
स्पर्श और मोक्षकाल तथा सम्मीलन और उन्मीलन जानने की रीति—
स्फुटतिथ्यवसाने तु मध्यग्रहणमादिशेत् ।
स्थित्यर्थनाडिकाहीने ग्रासो मोक्षस्तुसंयुते ॥१६॥
तद्वदेव विमर्दार्थं नाडिकाहोन संयुते ।
निमीलनोन्मीलनाख्ये भवेतां सकल ग्रहे ॥१७॥
अनुवाद—(१६) स्पष्ट तिथि के अंत में अर्थात् पूर्णिमा और अमावस्या के
अन्त में ग्रहण का मध्यकाल होता है। इस समय से स्थित्यर्थकाल घटा देने पर
स्पर्शकाल का समय आता है और जोड़ देने पर मोक्षकाल का समय आता है।
(१७) इसी प्रकार ग्रहण के मध्यकाल में विमर्दार्थ काल घटा देने पर सर्वग्रास ग्रहण
के आरम्भ काल अर्थात् सम्मीलन काल का पता लग जाता है और जोड़ देने पर
उन्मीलन काल अर्थात् सर्वग्रास ग्रहण के अंतकाल का पता लग जाता है ।
चन्द्रग्रहणाधिकार ४७१
विज्ञान भाष्य—यह स्वयम् इतना स्पष्ट है कि अधिक लिखने की आवश्य-
कता नहीं है ।
अब यह भी बतला देना आवश्यक है कि अन्य प्रथा के अनुसार ग्रहण का
मध्यकाल, स्पर्शकाल, मोक्षकाल, सम्मीलनकाल और उन्मीलनकाल कैसे जाने
जाते हैं ?
चित्र ६८ में दिखलाया गया है कि पूर्णमासी के अन्त में चन्द्रमा और भूछाया
के भोगांश समान होते हैं। इसलिए घ घड़ी उपरान्त चन्द्रमा और भूछाया के
भोगांशों का अन्तर घ x (चा - रा) के समान होगा जब कि चा और रा चन्द्रमा
और सूर्य अथवा भूछाया की प्रतिघड़ी की भोगांश गति हो । यदि चन्द्रमा के शर की
गति प्रतिघड़ी शा हो तो घ घड़ी के उपरान्त इसके शर में घ x शा के समान परि-
वर्तन हो जायगा । यदि पूर्णिमान्तकाल में चन्द्रमा का शर श हो तो घ घड़ी के
उपरान्त इसका शर श - घ x शा होगा । इसलिए घ घड़ी के उपरान्त चन्द्रमा और
भूछाया के केन्द्रों का अन्तर मा यह होगा :-
मा = √[ घ (चा - रा) ]² +(श - घ x शा)²
क्योंकि चन्द्रमा और भूछाया के भोगांशों का अन्तर भुज, चन्द्रमा का शर
कोटि और दोनों के केन्द्रों का अन्तर कर्ण के समान होगा जैसा कि स्पर्शकाल और
सम्मीलनकाल के समय की दशा चित्र १०० में दिखलायी गयी है। इस समीकरण
के दोनों पक्षों का वर्ग कर देने से
मा² = [ घ (चा - रा) ]² + (श - घ. शा)²
= (चा - रा)² घ² + श² - २ श. शा. घ + घ² शा²
= [ (चा - रा)² + शा² ] घ² - २ श. शा. घ + श²
या [ (चा - रा)² + शा² ] घ² - २ श. शा. घ + श² - मा² = ०
यह घ का वर्ग समीकरण है जिससे घ के दो मान ज्ञात होते हैं । इससे सिद्ध
होता है कि पूर्णिमान्त के पहले और पीछे २ बार चन्द्रमा भूछाया से समान अन्तर
पर आता है। यदि मा के स्थान में मानैक्य खंड का मान रखकर घ के दो मान
निकाले जायँ तो यह स्पर्शकाल और मोक्षकाल के समय होंगे। यदि यह दो मान
काल्पनिक हों तो समझना चाहिए कि ग्रहण नहीं लगेगा, यदि समान हों तो समझना
चाहिए कि ग्रहण का आरम्भ और अन्त एकसाथ होगा अर्थात् चन्द्रमा भू भा को
केवल स्पर्श करता हुआ निकल जायगा परन्तु ग्रहण नहीं लगेगा ।
यदि मा के स्थान में मानान्तर खंड का मान रखकर घ के दो मान निकाले
जायँ तो सर्वग्रास ग्रहण के आरम्भ काल और अन्त काल अथवा सम्मीलन और
४७२ सूर्य-सिद्धान्त
उन्मीलन काल के समय ज्ञात होंगे । यदि यह दो मान काल्पनिक हों तो समझना
चाहिए कि सर्वग्रास ग्रहण नहीं लगेगा और यदि दोनों मान समान हों तो समझना
चाहिए कि सर्वग्रास ग्रहण का आरम्भ और अन्त एकसाथ ही होगा अर्थात् जैसे ही
चन्द्रमा का पूरा बिम्ब छाया में आवेगा वैसे ही छाया के बाहर भी होने लगेगा ।
इस समीकरण से घ के दोनों मान नीचे लिखे सूत्र के अनुसार होंगे :—
२ श. शा. ± √४श². शा² - ४ [ (चा - रा)² + शा² ] [श² - मा²]
घ = -------------------------------------------------------------
२ [ (चा - रा)² + शा² ]
श. शा. ± √श². शा² - [ (चा - रा)² + शा² ] [श² - मा²]
= ---------------------------------------------------
(चा - रा)² + शा²
घ के इन दोनों मानों के योग का आधा
श. शा
= ---------------------
(चा - रा)² + शा²
यही ग्रहण का मध्यकाल है, अर्थात् पूर्णिमान्त के इतने ही समय उपरान्त
ग्रहण का मध्य होता है ।
सूर्य, चन्द्रमा के विषुवांश और क्रान्ति से भी ग्रहण का स्पर्श काल, सम्मीलन-
काल इत्यादि जानने की रीति है जो उपर्युक्त रीति से बहुत कुछ मिलती-जुलती है
परन्तु वह विस्तार भय से यहां नहीं लिखी जायगी ।
यहां यह बतला देना आवश्यक समझ पड़ता है कि सूर्य-सिद्धान्त में स्पर्श काल
और मोक्ष काल इत्यादि के जानने का जो नियम दिया गया है उससे सिद्ध होता है
कि ग्रहण का मध्य काल पूर्णिमा के अन्त में होता है परन्तु ऊपर बतलायी गयी दूसरी
रीति में ग्रहण का मध्य काल पूर्णिमान्त के कुछ उपरान्त आता है । दूसरी रीति
बिलकुल शुद्ध है और पहली कुछ स्थूल । इसका कारण चित्र ६८ से स्पष्ट हो जाता
है । ग्रहण का मध्यकाल उस समय होता है जिस समय चन्द्रमा भूभा से निकटतम
अन्तर अर्थात् फ पर होता है जब कि छ फ चन्द्रमा की कक्षा पर लम्ब होता है ।
ऐसी दशा में चन्द्रमा का शर पूर्णिमान्त काल के शर से कुछ छोटा होता है और
चन्द्रमा भी पूर्णिमान्त काल के स्थान च से कुछ आगे बढ़ा रहता है ।
यह जानना कि ग्रास का परिमाण स्पर्शकाल से किस समय पर कितना
होता है—
इष्टनाडीविहीनेन स्थित्यर्धेनार्कचन्द्रयोः ।
भुक्त्यन्तरं समाहन्यात् षष्ठ्याप्ताः कोटिलिप्तिकाः ॥१८॥
भानोग्रहं कोटिलिप्ता मध्यात्स्थित्यर्ध सङ्गुणाः ।
स्फुटस्थित्यर्धसम्भक्ताः स्फुटाः कोटिकलाः स्मृताः ॥१९॥
चन्द्रग्रहणाधिकार ४७३
क्षेपो भुजस्तयोर्वर्गयुतेर्मूलं श्रवः स्मृतः ।
मानक्योर्गाधतः प्रोज्झ्य ग्रासस्तात्कालिको भवेत् ॥२०॥
अनुवाद—(१८) ग्रहण के आरम्भ काल से कुछ घड़ी पीछे परन्तु मध्य
ग्रहण के पहले ग्रास का परिमाण कितना होता है यह जानने के लिए इष्ट घड़ी को
स्थित्यर्धकाल से घटाकर शेष को चन्द्रमा और सूर्य की दैनिक स्पष्ट गतियों के अन्तर
से गुणा करके गुणनफल को ६० से भाग दे दो। इस भागफल को कोटिकला कहते
हैं जब कि दैनिक गतियां कलाओं में प्रकट की गयी हों । (१६) सूर्य ग्रहण का ग्रास-
मान जानने के लिए ऊपर की रीति से निकाली गयी कोटिकला को मध्य स्थित्यर्ध
से गुणा करके गुणनफल को स्पष्ट स्थित्यर्ध से भाग देने पर जो आता है उसे स्पष्ट
कोटिकला कहते हैं । (२०) उस समय के चन्द्रमा के शर को भुज मानकर इसके
वर्ग को कोटिकला के वर्ग में जोड़कर योगफल का वर्गमूल निकालने से जो कर्ण आये
उसे मानैक्य खंड से घटाने पर जो आवे वही तात्कालिक ग्रास होता है।
विज्ञान भाष्य—इस नियम की उपपत्ति चित्र ६८, ६६ और १०० के
संबंध में अच्छी तरह समझायी गयी है । १६-१७ श्लोकों के विज्ञान भाष्य में जो सूत्र
मा = √[ घ (चा - रा) ]²+(श - घ × शा)² स्थापित किया गया है वह इसी
नियम का दूसरा रूप है । इस सूत्र में घ पर्वान्तकाल से पहले या पीछे का समय है
परन्तु नियम में स्पर्शकाल के उपरान्त का इष्टकाल माना गया है इसलिए स्थित्यर्ध से
इष्टकाल घटाने का आदेश है । ऐसा करने से जो आवे उसको घ की जगह रखकर
सूत्र को सरल करने पर मा का जो परिमाण आवेगा उसी को मानैक्य खंड से घटाने
पर तात्कालिक ग्रास का परिमाण जाना जा सकता है। यहां घ (चा - रा) ही
कोटिलिप्ता है क्योंकि चा - रा सूर्य और चन्द्रमा की प्रति घड़ी की गतियों का अन्तर
है । यदि दैनिक स्पष्ट गतियों का अन्तर दिया हुआ हो तो इसको ६० से भाग देना
पड़ता है जैसा कि नियम में बतलाया गया है। श-घ × शा तात्कालिक शर है
और मा भूभा तथा चन्द्रमा के केन्द्रों का तात्कालिक अन्तर है। यह अन्तर मानैक्यखंड
से जितना कम होता है वही ग्रास का परिमाण है जिसकी व्याख्या चित्र ६६ के
सम्बन्ध में अच्छी तरह की गयी है । उस चित्र से भिन्नता केवल इतनी है कि उसमें
चन्द्रमा और भूभा के केन्द्रों की निकटतम दूरी ली गयी है जो श × कोज्या ई के
समान होती है और वहाँ वह दूरी ली गई है जो स्पर्शकाल से इष्ट घड़ी उपरान्त
होती है ।
यदि मानैक्य खंड अर्थात् भूभा और चन्द्रमा के व्यासार्धों के योग को पहले
की तरह म अक्षर से सूचित किया जाय तो स्पर्शकाल से घ घड़ी उपरान्त ग्रास का
परिमाण यह होगा :—
३०
४७४ सूर्य-सिद्धान्त
ग्रास = म - √ [ { (स्थि — घ) × चा — रा / ६० }² + श² }
जहाँ स्थ स्थित्यर्थ के लिए, श चन्द्रमा के तात्कालिक शर के लिए और
चा - रा सूर्य चन्द्रमा के दैनिक गतियों के अन्तर लिए लिखा गया है। यदि चा - रा
प्रति घटी का अन्तर हो तो ६० से भाग देने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
सूर्य ग्रहण के सम्बन्ध की बात आगे आनेवाले सूर्य ग्रहणाधिकार में बतलाई
जायगी।
मध्य ग्रहण के उपरान्त परन्तु मोक्षकाल से कुछ घड़ी पहले ग्रास का
परिमाण—
मध्यग्रहणतश्चोर्ध्वम् इष्टनाडीर्विशोधयेत् ।
स्थित्यर्धान्मौक्षिकात्तच्छेषात् प्राग्वच्छेषस्तु मौक्षिके ॥२१॥
अनुवाद—(२१) जब यह जानना हो कि मध्य ग्रहण के उपरान्त मोक्षकाल
से कुछ घड़ी पहले ग्रास का परिमाण क्या है तब मोक्षकाल सम्बन्धी स्थित्यर्ध से इष्ट
घड़ी घटाकर जो शेष बचे उससे ऊपर के १८-२० श्लोकों में बतलायी गयी रीति के
अनुसार ग्रासमान निकाले। इससे यह जाना जायगा कि मोक्षकाल से इष्ट घड़ी
पहले चन्द्रमा का कितना ग्रस्त भाग शेष है।
विज्ञान भाष्य—यह नियम १८-२० श्लोकों में बतलाये गये नियम के
समान है। उससे यह जाना जाता है कि इष्टकाल में कितना भाग ग्रस्त हो जाता है
और इससे यह जाना जाता है कि इष्टकाल में कितना ग्रस्त भाग शेष रहता है
क्योंकि मध्य ग्रहण के पहले जिस क्रम से ग्रस्त भाग की वृद्धि होती है, मध्यग्रहण
के उपरान्त ठीक उसके विलोम क्रम से ग्रस्त भाग की क्षीणता होती है।
ग्रास का परिमाण ज्ञात हो तो इष्टकाल जानना—
ग्राह्यग्राहक्योगार्थात् प्रोज्झ्य संछन्नलिप्तिकाः ।
तद्वर्गात्प्रोज्झ्य तत्कालविक्षेपस्य कृतिं पदम् ॥२२॥
कोटिलिप्ता रवेः स्पष्टस्थित्यर्थेनाहता हृताः ।
मध्येन कोटिलिप्ताभिस्स्थितिवद्द्ग्रासनाडिकाः ॥२३॥
अनुवाद—(२२) मानैक्य खंड से ग्रस्त भाग की कला को घटाकर शेष का
वर्ग करो और इसके वर्ग से चन्द्रमा के तात्कालिक शर के वर्ग को घटा दो और शेष
का वर्गमूल निकालो तो (२३) कोटिलिप्ता का मान ज्ञात होगा। सूर्यग्रहण में इस
कोटिलिप्ता को स्पष्ट स्थित्यर्ध से गुणा करके गुणनफल को मध्यम स्थित्यर्ध से भाग देने
पर जो आता है वह कोटिकला है। इसी कोटिकला से स्थित्यर्धकाल जानने की रीति
चन्द्रग्रहणाधिकार ४७५
से घड़ी बनावे अर्थात् कोटिकला को ६० से गुणा करके सूर्य और चन्द्रमा की दैनिक
गतियों के अन्तर से भाग दे । जो भागफल आवे उसको स्थित्यर्धकाल से घटा दे तो
यह ज्ञात होगा कि स्पर्शकाल के उपरान्त कितनी घड़ी बीती है । इसी का नाम
ग्रासनाड़िका है ।
विज्ञान भाष्य—यह नियम १८-२० श्लोकों में बतलाये गये नियम का
विलोम है । वहां यह बतलाया गया है कि आरम्भ काल से इष्ट घड़ी उपरान्त ग्रास
का परिमाण क्या होता है और यहां यह बतलाया गया है कि यदि ग्रास का परिमाण
ज्ञात हो तो इष्टकाल कैसे जाना जाता है । इसलिए इसकी उपपत्ति भी वही है ।
इसका रूप यह है :—
कोटिकला = √(म—ग्रास)² — श²
ग्रासनाडिका = घ = स्थि — ६० / (चा - रा) √(म — ग्रास)² — श²
वलन जानना—
नतज्याऽक्षजयोगर्घातः त्रिज्याप्तस्तस्य कार्मुकम् ।
तदंशास्सौम्ययाम्यास्ते पूर्वापरकलापयोः ॥२४॥
राशित्रययुताद्ग्राह्यात्क्रान्त्यंशे दिक्समे युतात् ।
भेदेऽन्तराज्ज्यावलनसप्तत्यंशोऽङ्गुलात्मिका ॥२५॥
अनुवाद—(२४) छाद्य ग्रह के समप्रोतवृत्त के नतांश की ज्या को इष्ट स्थान
के अक्षांश की ज्या से गुणा करके गुणनफल को ग्रह के अहोरात्रवृत्त की त्रिज्या से भाग
दे दे, और भागफल का धनु बनावे । यही धनुग्रह का आक्षवलन कहलाता है। यदि ग्रह
पूर्वक पाल में हो अर्थात् यामोत्तरवृत्त से पूर्व हो तो आक्षवलन उत्तर की ओर होता है
और यदि ग्रह पश्चिम कपाल में हो अर्थात् यामोत्तरवृत्त से पश्चिम हो तो आक्षवलन
दक्षिण की ओर होता है । (२५) ग्रह के सायन भोगांश में ६० अंश जोड़ने से जो
भोगांश आवे उसकी क्रान्ति (स्पष्टाधिकार श्लोक २८ के अनुसार) निकाले अर्थात्
उसको परमक्रान्ति ज्या से गुणा करके (अहोरात्रवृत्त की) त्रिज्या से भाग दे दे । भाग-
फल आयनवलन कहलाता है। यह (क्रान्ति) उत्तर या दक्षिण की ओर होगी । यदि
आक्षवलन और आयनवलन दोनों की दिशा एक ही हो तो जोड़ दे और भिन्न हो तो
घटा दे । ऐसा करने से जो कुछ आवे वह स्फुटवलन कहलाता है । इसकी ज्या को
७० से भाग देने पर वलन का अंगुलादि मान ज्ञात होता है ।
विज्ञान भाष्य—यह जानने के लिये कि ग्रहण का स्पर्श, मोक्ष इत्यादि छाद्य
ग्रह के किस बिन्दु से आरम्भ या अन्त होता है, स्फुटवलन की आवश्यकता पड़ती है ।