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सूर्यसिद्धान्त (प्राचीन भारतीय खगोल गणित - सानुवाद सटीक)

Surya Siddhanta with Hindi Mathematical Commentary

भगवान् सूर्य / मय दानव / प्रो. रामचन्द्र पाण्डेय द्वारा

DevanagariHindipublished838 पृष्ठ

मानाध्याय ७६७ ११ कुम्भ विष्णुपदी " १२ मीन षडशीतिमुख बसंत उत्तरायण दक्षिणायन और ऋतु— तयोर्मकरसङ्क्रान्तेः षण्मासेषूत्तरायणम् । कर्क्यादिस्तु तथैवं स्यात् षण्मासा दक्षिणायनम् ॥६॥ द्विराशिमानादृतवः षडुक्ताश्शिशिरादयः । मेषादयो द्वादशैते मासास्तैरेव वत्सरः ॥१०॥ अनुवाद—(६) सूर्य जिस समय मकर राशि में प्रवेश करता है उस समय से ६ महीने तक उत्तरायण और जिस समय कर्क राशि में प्रवेश करता है उस समय से ६ महीने तक दक्षिणायन होता है । (१०) ऋतु दो दो राशियों को भोग करता है; मकर संक्रान्ति से शिशिर आदि ऋतु-चक्र का आरम्भ होता है; मेष संक्रान्ति से १२ सौर मासों का आरम्भ होता है जिनका एक वर्ष होता है । विज्ञान भाष्य—इन श्लोकों में राशियों, संक्रान्तियों और ऋतुओं का परस्पर सम्बन्ध दिखलाया गया है । राशियाँ स्थिर मानी गयी हैं और इनका आरम्भ सूर्य-सिद्धान्त के अनुसार अश्विनी के आदि विन्दु से होता है जिसके अनुसार चित्रा तारे का भोगांश १८० है । परन्तु ऋतुओं का क्रम विषुवत्-सम्पात के अनुसार चलता है जो चल है इसलिये राशि, अयन और ऋतुओं का सम्बन्ध धीरे धीरे छूट रहा है। एक समय था जब उत्तरायण का आरम्भ मकर राशि में उसी समय होता था जब सूर्य की गति भी उत्तर दिशा में आरम्भ होती थी और ६ महीने तक बराबर उत्तर की ओर बढ़ती जाती थी । इसी प्रकार दक्षिणायन का आरम्भ कर्क राशि में उस समय होता था जब सूर्य की गति दक्षिण की ओर हो जाती थी । परन्तु अब यह दोनों घटनाएँ एकसाथ नहीं होतीं, सूर्य की उत्तर की गति मकर संक्रान्ति से २३ दिन पहले ही आरम्भ हो जाती है। पाँच सौ वर्ष में यह अन्तर एक महीने के लगभग हो जायगा । इस विषय पर त्रिप्रश्नाधिकार में विशेष चर्चा की गयी है । सूर्य-सिद्धान्त का यह मत अवश्य है कि विषुव सम्पात अश्विनी के २७ अंश इधर उधर ही रहता है, इससे अधिक अन्तर नहीं होता परन्तु यह न तो आजकल के विज्ञान से सिद्ध होता है और न भास्कराचार्य आदि ने ही इसे माना था । इसके विरुद्ध ब्राह्मण ग्रन्थों में बतलाये गये कृत्तिका आदि नक्षत्रों की स्थितियों से सिद्ध होता है कि सूर्य सिद्धान्त का मत ठीक नहीं है (त्रिप्रश्नाधिकार पृष्ठ २४०) । कुछ विद्वानों का यह भी मत है जिसका समर्थन ब्राह्मण ग्रन्थों के ही आधार पर अच्छी तरह होता है कि उत्तरायण का आरम्भ पहले उस समय से नहीं माना

७६८ सूर्य-सिद्धान्त जाता था जब सूर्य की प्रवृत्ति उत्तर की ओर होती है वरन् उस समय से माना जाता था जब सूर्य विषुवत रेखा से उत्तर होकर उत्तर गोल में आ जाता है। इससे देवताओं के दिन और रात का भी समाधान अच्छी तरह हो जाता है क्योंकि देवता उत्तर ध्रुव के निवासी समझे जाते हैं और उत्तर ध्रुव पर दिन का आरम्भ अथवा सूर्योदय उसी समय होता है जब सूर्य विषुवत रेखा से उत्तर होने लगता है इसीलिये उत्तरायण देवताओं का दिन और दक्षिणायन उनकी रात समझी जाती है। यह युक्तियुक्त भी है। यदि भास्कराचार्य जी इस बात पर विचार करते तो उनको उत्तरायण के सम्बन्ध में यह कल्पना न करनी पड़ती ।१ संक्रांति का पुण्यकाल अर्कमानकलाषष्ट्या गुणिता भुक्तिभाजिताः । तदर्धनाड्यस्सङ्क्रास्तेर्वाक् पुण्यास्तथापराः ॥२१॥ अनुवाद - सूर्य के बिम्ब मान की कलाओं को साठ से गुणा करके उसकी दैनिक गति से भाग देने पर जो आवे उसकी आधी घड़ियाँ पहले और पीछे संक्रान्ति का पुण्यकाल होता है। विज्ञान भाष्य — संक्रान्ति उस समय होता है जिस समय सूर्य बिम्ब का केन्द्र राशि में प्रवेश करता है परन्तु सूर्य बिम्ब का मान ३२ कला के लगभग है इसलिये संक्रान्ति का पुण्यकाल उस समय आरंभ होता है जब सूर्य के बिम्ब का पूर्वी किनारा राशि को प्रवेश करते समय स्पर्श करता है और उस समय तक रहता है जब तक बिम्ब का पछिमी किनारा राशि के आदि बिन्दु को पार नहीं कर जाता। यह समय मोटे हिसाब से ३२ घड़ी के लगभग होता है जिसका आधा १६ घड़ी है। इस लिये संक्रांति से लगभग १६ घड़ी पहले पुण्यकाल का आरंभ होता है और १६ घड़ी बाद तक रहता है। सूक्ष्म गणना के लिये श्लोकों में बतलाये हुये अनुपात से काम लेना चाहिये। संक्रान्ति काल में सूर्य की जो दैनिक गति हो उतनी गति ६० घड़ी में होती है तो सूर्य बिम्ब के समान गति कितनी घड़ियों में होगी । अर्थात् सूर्य बिम्ब का मान X ६० घड़ी पुण्यकाल = ---------------------------------------- सूर्य की दैनिक गति


१. दिनं सुराणामयनं यदुत्तरं निशेतरत् सांहितिकैः प्रकीर्तितम् । दिनोन्मुखेऽर्के दिनमेव तन्मतं निशा तथा तत् फल कीर्तनाय तत् ॥११॥ (गोलाध्याय त्रिप्रश्नावासना)

मानाध्याय ७६६ इससे जो फल आवे उसका आधा संक्रान्तिकाल से घटाने पर पुण्यकाल का आरम्भ जाना जाता है और जोड़ने पर उसकी समाप्ति का समय निकल आता है । चान्द्र और पितृमान अर्काद्विनिस्सृतः प्राचीं यद्यात्यहरहश्शशी । तच्चान्द्रमानमंशैस्तु ज्ञेया द्वादशभिस्तिथिः ॥१२॥ तिथिः करणमुद्वाहक्षौरकर्मादिसत्क्रियाः । व्रतोपवासयात्राणां क्रिया चान्द्रेण गृह्यते ॥१३॥ त्रिंशता तिथिभिर्मासश्चान्द्रः पित्र्यमहस्स्मृतम् । निशा च मासपक्षान्ते तयोर्मध्ये विभागतः ॥१४॥ अनुवाद—(१२) चन्द्रमा सूर्य से अलग होकर जो दिन प्रति दिन पूरब की ओर बढ़ता है वही चन्द्रमान है । इस अंतर के १२ अंशों की एक तिथि होती है । (१३) तिथि, करण, विवाह, क्षौर कर्म, मुंडन आदि सब क्रियाएं तथा व्रत, उपवास, यात्रा आदि चान्द्रमान से निश्चय किये जाते हैं । (१४) तीस तिथियों का एक चान्द्रमास होता है जो पितरों का एक अहोरात्र समझा जाता है । चान्द्रमास के अंत में अर्थात् अमावस्या के अन्त में पितरों का मध्याह्न और पक्ष के अन्त अर्थात् पूर्णिमा के अन्त में पितरों की मध्यरात्रि होती है । इस प्रकार शुक्ल पक्ष की अष्टमी के आधे भाग से पितरों की रात्रि का आरम्भ और कृष्ण पक्ष की अष्टमी के आधे भाग से उनके दिन का आरम्भ होता है । विज्ञान भाष्य—तिथि के सम्बन्ध में मध्यमाधिकार पृष्ठ ८ और स्पष्टा- धिकार पृष्ठ २१७ में विशेष चर्चा की गयी है । वहीं पृष्ठ २१८ में करण के सम्बन्ध में भी बहुत कुछ लिखा गया है। पितरों के मध्याह्न और मध्यरात्रि के बारे में भूगोलाध्याय पृष्ठ ७६७-६८ देखिये । नाक्षत्रमान तथा नक्षत्रानुसार मासों के नाम— भचक्रभ्रमणं नित्यं नाक्षत्रं दिनमुच्यते । नाक्षत्रनाम्ना मासास्तु ज्ञेयाः पर्वान्तयोगतः ॥१५॥ कार्तिकादिषु संयोगे कृत्तिकादि द्वयं द्वयम् । अन्त्योपान्त्यौ पञ्चमश्च त्रिधा मामास्त्रयस्स्मृताः ॥१६॥ अनुवाद—(१५) जितने समय में नक्षत्र चक्र का एक भ्रमण पूरा होता है उसे नाक्षत्र दिन कहते हैं । पूर्णिमा के अन्त में चन्द्रमा जिस नक्षत्र में होता है उसी के नाम पर मासों के नाम पड़े हैं । (१६) कार्तिक आदि मासों का संयोग कृत्तिकादि

८०० सूर्य-सिद्धान्त

| पूर्णिमान्तकाल में नक्षत्रों की वास्तविक स्थिति मास | पूर्णिमा के नक्षत्र क्रम- |----------------------------------------------------------------------------------- | संख्या सहित | १६६१ | १६६२ | १६६३ | १६६४ | १६६५ विक्रमी

चैत | १४—चित्रा | हस्त + | चित्रा | चित्रा | स्वाती | चित्रा | १५—स्वाती | | | | | | १६—विशाखा | | | | | --------| |------------|--------------|--------------|--------------|------------------------- वैशाख | | ⎧ विशाखा | विशाखा | विशाखा | अनुराधा | विशाखा | | ⎩ अनुराधा | | | | --------|--------------------------|------------|--------------|--------------|--------------|------------------------- ज्येष्ठ | १७—अनुराधा | मूल | मूल | ज्येष्ठा | मूल | ज्येष्ठा | १८—ज्येष्ठा | | | | | | १६—मूल | | | | | --------|--------------------------|------------|--------------|--------------|--------------|------------------------- आषाढ़ | २०— पूर्वाषाढा | उत्तराषाढा | उत्तराषाढा | पूर्वाषाढा | उत्तराषाढा | पूर्वाषाढा | २१—उत्तराषाढा | | | | | --------|--------------------------|------------|--------------|--------------|--------------|------------------------- श्रावण | २२—श्रवण | शतभिषा | धनिष्ठा | श्रवण | धनिष्ठा | धनिष्ठा | २३—धनिष्ठा | | | | | --------|--------------------------|------------|--------------|--------------|--------------|------------------------- भाद्रपद | २४—शतभिषा | उत्तराभाद्रपद| पू०भाद्रपद | ⎧ शतभिषा | उ० भाद्रपद | पूर्वाभाद्रपद | २५—पूर्वाभाद्रपद | | | ⎩ उ० भाद्रपद | |

मानाध्याय ८०१ पूर्णिमान्तकाल में नक्षत्रों की वास्तविक स्थिति

मास | पूर्णिमा के नक्षत्र क्रम- | १६६१ | १६६२ | १६६३ | १६६४ | १६६५ विक्रमी | संख्या सहित | | | | |

आश्विन | २६—उत्तराभाद्रपद | अश्विनी | रेवती | भरणी | अश्विनी | रेवती | २७—रेवती | | | | | | १—अश्विनी | | | | |

कार्त्तिक | २—भरणी | कृत्तिका | भरणी + | रोहिणी | कृत्तिका | भरणी + | ३—कृत्तिका | | | | | | ४—रोहिणी | | | | |

मार्गशीर्ष| ५—मृगशिरा | मृगशिरा | मृगशिरा | आर्द्रा | मृगशिरा | रोहिणी + | ६—आर्द्रा *, | | | | |

पौष | ७—पुनर्वसु | पुष्य | पुनर्वसु | पुष्य | पुनर्वसु | पुनर्वसु | ८—पुष्य | | | | |

माघ | ९—आश्लेषा | मघा | आश्लेषा | पू० फाल्गुनी + | मघा | आश्लेषा | १०—मघा | | | | |

फाल्गुन | ११—पूर्वाफाल्गुनी | उत्तरा फाल्गुनी | पू० फाल्गुनी | हस्त | उ० फाल्गुनी | पूर्वाफाल्गुनी | १२—उत्तराफाल्गुनी | | | | | | १३—हस्त | | | | |

८०२ सूर्य-सिद्धान्त नक्षत्रों से दो दो के साथ होता है, केवल अन्तिम मास और उससे ठीक पहले का मास तथा पांचवे मासों का संयोग तीन तीन नक्षत्रों से होता है । विज्ञान भाष्य—नाक्षत्र दिन की व्याख्या पृष्ठ ७, ३००-३०१, और ३३६ में की गयी है । चान्द्र मासों के नाम उन नक्षत्रों के नाम पर रखे गये हैं जिन पर चंद्रमा पूर्णमा के दिन रहता है । इस युक्ति से तिथि, मास और नक्षत्रों का जो गठबंधन कर दिया गया है वह संसार के ज्योतिष के इतिहास में अनुपम है । इससे यह अच्छी तरह सिद्ध हो जाता है कि प्राचीन काल में हिन्दू ज्योतिषी कितने प्रतिभा- वान थे और उनपर दूसरे देशों के ज्योतिष शास्त्र के नकल करने का जो अभियोग लगाया जाता है वह कितना निस्सार और पक्षपात पूर्ण है । अब सूक्ष्म गणना से यह अवश्य सिद्ध होता है कि नक्षत्रों और मासों का यह परस्पर सम्बन्ध कभी-कभी छूट जाता है परन्तु यहाँ यह भी विचार करना होगा कि जो नियम तीन हजार वर्ष से अधिक समय से चला आ रहा है उसका कहीं कहीं ढीला पड़ जाना अचंभे की बात नहीं है और न नियम बनानेवालों की ही अनभिज्ञता का प्रमाण हैं । पृष्ठ ५५७-५८ में दी हुई सारणी से यह सहज ही जाना जा सकता है कि इस समय कितना अंतर पड़ गया है । इस सारिणी में १६६४-६५ वि० के नीचे के नक्षत्र बंगला के विशुद्ध सिद्धान्त-पञ्जिका से लिखे गये हैं जो आधुनिक ज्योतिषशास्त्र के आधार पर बनायी जाती है, जिसमें वर्षमान् ३६५ दिन ६ घंटा ६ मिनट ६-५०४ सेकंड का होता है और चित्रा तारे का भोग ठीक १८० अंश माना गया है। शेष तीन वर्षों के नक्षत्र लखनऊ और काशी के साधारण पंचांगों से लिये गये हैं। जिन नक्षत्रों पर धन के चिह्न बने हुए हैं वही उपर्युक्त नियम से कुछ भिन्न हो गये हैं। जहाँ दो नक्षत्र एक साथ दिये हैं वे अधिमासों के सूचक हैं। इससे प्रकट है कि अब भी यह नियम अच्छी तरह काम दे रहा है । वार्हस्पत्य वर्ष के नाम— वैशाखादिषु कृष्णेः च योगः पञ्चदशे तिथौ । कार्तिकादीनि वर्षेषु गुरोर्युक्तोदयास्तमात् ॥१७॥ अनुवाद—(जिस प्रकार चन्द्रमा के पूर्णमान्त काल के नक्षत्रों के नाम से चान्द्रमासों के नाम पड़े हैं इसी प्रकार) वैशाखादि मासों के कृष्णपक्ष की पन्द्रहवीं तिथि के योग में वृहस्पति के अस्त और उदय होने से इसके कार्तिकादि वर्षों के नाम रखे गये हैं।

मानाध्याय ८०३ विज्ञान भाष्य — जिस समय वृहस्पति सूर्य के बहुत पास आ जाता है उस समय सूर्य के प्रकाश के कारण यह देखा नहीं जा सकता इसलिये अस्त समझा जाता है । फिर जब सूर्य से इतनी दूर हो जाता है कि देख पड़ने लगता है तब उदय समझा जाता है । (देखो उदयास्ताधिकार पृ० ६५६-५७) । यह घटना उस समय के लगभग होती है जब सूर्य और वृहस्पति की युति होती है जो लगभग ३६६ दिन या १३ मास के अंतर पर हुआ करती है। इस काल को 'बार्हस्पत्य वर्ष' कहते हैं । ऐसे वर्षों का नाम उन नक्षत्रों के अनुसार रखा जाता है जिन पर वृहस्पति के उदय या अस्त होने के समय सूर्य और चन्द्रमा दोनों रहते हैं । १६ वें श्लोक में बतलाया गया है कि चान्द्र मासों के नाम उन नक्षत्रों के नाम पर पड़े हैं जिन पर चन्द्रमा पूर्णमान्त काल में रहता है इसलिये यह सिद्ध है कि सूर्य इन मासों के पूर्ण- मान्त नक्षत्रों से १४ वें नक्षत्र पर होता है। जैसे वैशाख मास में पूर्णिमा विशाखा या अनुराधा नक्षत्रों पर होती है तो इस मास में सूर्य विशाखा या अनुराधा के १४ वें नक्षत्र कृत्तिका या रोहिणी में रहेगा। यदि इसी समय वृहस्पति का उदय या अस्त हो तो निश्चय है कि यह भी इन्हीं नक्षत्रों पर या इसके एकाध नक्षत्र आगे पीछे रहेगा और अमावस्या भी इन्हीं नक्षत्रों पर होगी, इसलिये वृहस्पति का 'कार्तिक वर्ष' इसी समय से आरम्भ होगा। अर्थात् वैशाख मास में यदि वृहस्पति का उदय या अस्त हो तो वृहस्पति का 'कार्तिक वर्ष' लगेगा, ज्येष्ठ मास में उदय हो तो 'बार्हस्पत्य मार्ग शीर्ष' वर्ष लगेगा इत्यादि । चान्द्र मासों और बार्हस्पत्य वर्षों की दुविधा मिटाने के लिये दोनों में यह अंतर भी कर दिया जाता है कि बार्हस्पत्य वर्षों के नाम के पहले 'महा' लगा देते हैं । परन्तु आजकल इन कार्तिक आदि वर्षों का प्रचार नहीं है । ध्यान से देखने पर मालूम होगा कि सूर्य-सिद्धान्त का यह नियम बहुत ढीला होता है । वृहस्पति के अस्तकाल से उदय काल का अंतर एक मास के लगभग होता है जिसमें सूर्य दो नक्षत्र से अधिक हट जाता है। यह संभव है कि अस्तकाल के समय सूर्य स्वाती नक्षत्र में हो और उदय काल के समय अनुराधा में । ऐसी दशा में कौन सा बार्हस्पत्य वर्ष मानना चाहिये 'महा चैत्र' या 'महा वैशाख' ? शायद इसी दुविधा को दूर करने के लिये आचार्य वराहमिहिर ने बृहत्संहिता में यह नियम दिया है कि उदय काल में वृहस्पति जिस नक्षत्र पर हो उसी के नाम से वृहस्पति के वर्ष का नाम रखना चाहिये १ । वराहमिहिर ने इन वर्षों के भिन्न-भिन्न फलों की चर्चा की है। १. नक्षत्रेण सहोदयमुपगच्छति येन देवपति मन्त्री । तत्संज्ञं वक्तव्यं वर्षं मास क्रमेणैव ॥१॥ वर्षाणि कार्तिकादीन्याग्नेयाद्द्वद्वयानुयोगीनि । क्रमशस्त्रिभंतु पञ्चममुपांत्यमंत्यं च यद्वर्षम ॥२॥ (गुरुचाराध्याय)

८०४ सूर्य-सिद्धान्त बृहस्पति का वर्ष दूसरे प्रकार का भी होता है जिसे सम्वत्सर कहते हैं (मध्यमाधिकार श्लोक ५५ और उसका भाष्य) । पंचांगों में इन्हीं संवत्सरों की चर्चा रहती है । संकल्प के मंत्रों में तो यह प्रतिदिन काम में आते हैं । ऐसे ६० संवत्सरों का एक चक्र होता है । इनके सिवा ५ संवत्सरों का एक चक्र और होता है जिनके नाम क्रमानुसार यह हैं-(१) संवत्सर, (२) परिवत्सर, (३) इदावत्सर, (४) अनुवत्सर, (५) इद्वत्सर । इनकी चर्चा वेदाङ्ग ज्योतिष तथा वृहत्संहिता में है जहाँ इनके फल भी बतलाये गये हैं । सावनमान- उदयादुदयं भानोः सावनं तत्प्रकीर्त्यते । सावनानि स्युरेतानि यज्ञकालविधिस्तु तैः ॥१८॥ सूतकादि परिच्छेदो दिनमासाब्दपास्तथा । मध्यमाग्रह भुक्तिश्च सावनेन प्रकीर्त्यते ॥१९॥ अनुवाद - (१८) सूर्य के एक उदय से दूसरे उदय के बीच के समय को सावन दिन कहते हैं । सावन दिनों से यज्ञ करने के समय का विधान किया जाता है । (१९) जन्म का सूतक और चान्द्रायण आदि व्रत की सीमा, दिन, मास और वर्ष के स्वामियों का निश्चिय, ग्रहों की मध्यम गति की गणना सावन दिनों से ही की जाती है । विज्ञान भाष्य - इस विषय पर मध्यमाधिकार में अच्छी तरह विचार किया गया है । सावन दिनों में जिन जिन कार्यों के करने की अवधि निश्चित की जाती है वे यहाँ गिनाये गये हैं । जिस घर में सन्तान उत्पन्न होती है, अथवा जिस घर में किसी की मृत्यु होती है वह घर दस, बारह या पन्द्रह दिनों के लिये अपवित्र समझा जाता है । यही सूतक है जिसकी अवधि सावन दिनों के अनुसार निश्चय की जाती है । दिव्यमान सुरासुराणामन्योन्यमहोरात्रं विपर्ययात् । यत्प्रोक्तं तद्द्भवेद्दिव्यं भानोर्भगणपूरणात् ॥२०॥ अनुवाद - देवताओं और असुरों का जो परस्पर विरोधी अहोरात्र बतलाया गया है वही दिव्यमान है । और सूर्य के एक भगण पूरा होने का समय है । विज्ञान भाष्य -- इसकी चर्चा विस्तार के साथ भूगोलाध्याय श्लोक ४७-५० के भाष्य में की गयी है ।

मानाध्याय ८०५ प्राजापत्य तथा ब्राह्ममान मन्वन्तरव्यवस्था च प्राजापत्यमुदाहृतम् । न तत्र द्यु निशोश्छेदः ब्राह्मं कल्पं प्रकीर्तितम् ॥२१॥ अनुवाद- मन्वन्तर की व्यवस्था प्राजापत्य मान का उदाहरण है जहाँ दिन और रात का कोई भेद नहीं है। कल्प ब्राह्ममान कहलाता है । विज्ञान भाष्य - कल्प, मन्वन्तर आदि की व्याख्या मध्यमाधिकार के श्लोक १८-२० और उसके विज्ञान-भाष्य में की गयी है । माहात्म्य एतत् ते सर्वमाख्यातं रहस्यं परमाद्भुतम् । ब्रह्मतत्परमं पुण्यं सर्वपापप्रणाशनम् ॥२२॥ दिव्यं चाक्षं ग्रहाणाञ्च दर्शित ज्ञानमुत्तमम् । विज्ञायार्कादि लोकस्य स्थानं प्राप्नोति तादृशम् ॥२३॥ अनुवाद - (२२) तुझसे यह दूसरा खंड बतलाया गया जो रहस्यमय और बड़ा ही अद्भुत है, यह ब्रह्म रूप है, उत्कृष्ट है, पवित्र है और सब पाप का नाश करने वाला है । (२३) आकाशीय, नाक्षत्र और ग्रहों का उत्तम ज्ञान दिखलाया गया जिसको अच्छी तरह जान कर मनुष्य सूर्यादि लोकों में वैसा ही स्थान प्राप्त कर लेता है । विज्ञान भाष्य - सूर्य-सिद्धान्त का पूर्वार्ध पाताधिकार के साथ समाप्त हो गया था जिसका उपसंहार उसके अन्तिम श्लोक में कर दिया गया था । उसके उपरान्त भूगोलाध्याय के आरम्भ में मयासुर के प्रश्न करने पर उत्तरार्ध का आरम्भ किया गया था जो यहाँ आकर समाप्त होता है इसलिये यहाँ इस खंड का भी उपसंहार कर दिया गया । उपसंहार इत्युक्त्वा मयमामन्त्र्य सम्यक्तेनापि पूजितः । दिवमुद्गत्य सूर्य्यंशांः प्रविवेश स्वमण्डलम् ॥२४॥ मयोऽथ दिव्यं तज्ज्ञानं ज्ञात्वा साक्षाद्विवस्वतः । कृतकृत्यमिवात्मानं मेने निर्धूतकल्मषम् ॥२५॥ ज्ञात्वा तमृषयश्चाथ सूर्यलब्धवरं मयम् । परिवव्रु रुपेत्याथो ज्ञानं पप्रच्छुरादरात् ॥२६॥

८०६ सूर्य-सिद्धान्त स तेभ्यः प्रददौ प्रीतो ग्रहाणां चरितं महत् । अत्यद्भुततमं लोके रहस्यं ब्रह्मसम्मितम् ॥२७॥ अनुवाद—(२४) यह कह कर सूर्यांश पुरुष मय से विदा होकर और उससे अच्छी तरह पूजित होकर स्वर्ग को जाकर अपने मण्डल में घुस गये । (२५) तब मयासुर सूर्य ने साक्षात् भगवान् से इस दिव्य ज्ञान को प्राप्त करके अपने को पाप रहित और कृतकृत्य माना । (२६) तब ऋषियों ने यह जान कर कि मय को सूर्य भगवान से यह वरदान मिला उसके पास आये और घेर कर आदर के साथ पूछा । (२७) इस पर उसने प्रेम के साथ ग्रहों के इस महान् चरित्र को जो इस लोक में अत्यन्त आश्चर्य उत्पन्न करने-वाला, रहस्य और ब्रह्मज्ञान के समान है उनको बतलाया । विज्ञान भाष्य—इससे स्पष्ट होता है कि यह सूर्य-सिद्धान्त नामक ज्योतिष ग्रन्थ ऋषियों को मयासुर से मिला जिसने तपस्या करके यह ज्ञान सूर्य भगवान् अथवा सूर्यांश पुरुष से प्राप्त किया था । इससे कुछ विद्वान यह परिणाम निकालते हैं कि यह ग्रन्थ यवन ज्योतिषियों से प्राप्त किया गया था । इस सम्बन्ध में यहाँ कुछ विचार न करके भूमिका में विस्तारपूर्वक लिखा जायगा । इति सूर्य-सिद्धान्ते मानाध्यायः किसी-किसी ग्रन्थ में बीजोपनयनाध्याय नामक २१ श्लोकों का एक छोटा अध्याय और लिखा मिलता है जिस पर टीकाकारों ने यह समझ कर टीका नहीं की है कि ग्रन्थ निर्माण-काल में बीज-संस्कार की आवश्यकता नहीं पड़ सकती इसलिये यह अध्याय पीछे से जोड़ा गया है । मेरी लघु सम्मति में यह सम्भव है कि अब तक जो कुछ लिखा गया है वह इसी रूप में सूर्यांश पुरुष से मयासुर को मिला हो परन्तु उसके बाद मयासुर ने कई वर्ष तक जीवित रह कर अपने अनुभव से कुछ अन्तर पाया होगा जिसके अनुसार उसने बीजोपनयनाध्याय अन्त में जोड़ दिया । अथवा मयासुर के बाद किसी अन्य ज्योतिषी ने ही इसे बढ़ाया होगा । भूमिका में इस पर भी प्रकाश डालने का यत्न किया जायगा । इस समय मैं भी यह अध्याय जोड़ देने की धृष्टता करता हूँ । यथा शिखा मयूराणां नागानां मणयो यथा तद्वद्वेदाङ्ग शास्त्राणां गणितं मूर्धनि स्थितम् ॥१॥ न देयं तत् कृतघ्नाय वेदविप्लवकाय च । अर्थलुब्धाय मूर्खाय साहङ्काराय पापिने ॥२॥ एवं विधाय पुत्रायाप्यदेयं सहजाय च । दत्तेन वेद मार्गस्य समुच्छेदः कृतो भवेत् ॥३॥

मानाध्याय ८०७

व्रजेतामन्धतामिस्रं गुरु शिष्यौ सुदारुणम् । ततः शान्ताय शुचये ब्राह्मणायैव दापयेत् ॥४॥ चक्रानुपातजो मध्यो मध्यवृत्तांशजः स्फुटः । कालेन दृक्समो न स्यात् ततो बीजक्रियोच्यते ॥५॥ राश्यादिरिन्दुरङ्कघ्नो भक्तो नक्षत्रकक्षया । शेषं नक्षत्रकक्षायास्त्यजेच्छेषकयोस्तयोः ॥६॥ यदल्पं तद्भूजेद्धानां कक्षया तिथिनिघ्नया । बीजं भागादिकं तत् स्यात् कारयेत् तद्धनं रवौ ॥७॥ त्रिगुणं शोधयेदिन्दौ जिनघ्नं भूमिजे क्षिपेत् । दृग्यमघ्नन्नृणं ज्ञोच्चे खरा मघ्नं गुरावृणम् ॥८॥ ऋणं व्योमनवघ्नं स्याद्दानवेज्यचलोच्चके । धनं सप्ताहतं मन्दे परिधीनामथोच्यते ॥६॥ युग्मान्तोक्ताः परिधयो ये ते नित्यं परिस्फुटाः । ओजान्तोक्तास्तु ते ज्ञेयाः परबीजेन संस्कृताः ॥१०॥ वच्मि निर्बीजकानोजपदान्ते वृत्त भागकान् । सूर्येन्द्रोर्मनवॊ दन्ता धृतितत्वकलोनिताः ॥११॥ बाणतर्का महीजस्य सौम्यस्याचल बाहवः । वाक्पतेरष्टनेत्राणि व्योमशीतांशवो भृगोः ॥१२॥ शून्यर्त्तवोऽर्कं पुत्रस्य बीजमेतेषु कारयेत् । बीजं खान्युद्धृतं शोध्यं परिध्यंशेषु भास्वतः ॥१३॥ इनाप्तं योजयेदिन्दोः कुजस्याश्वहृतं क्षिपेत् । विदश्चन्द्रहृतं योज्यं सूरेरिन्द्रहृतं धनम् ॥१४॥ धनं भृगोर्भुवा निघ्नं रविघ्नं शोधयेच्छने । एवं मान्दाः परिध्यंशाः स्फुटाः स्युर्वच्मि शीघ्रकान् ॥१५॥ भौमस्याभ्रगुणाक्षीणि बुधस्याब्धि गुणेन्दवः । बाणाक्षा देव पूज्यस्य भार्गवस्येन्दु षड्यमाः ॥१६॥ शनिश्चन्द्राब्धयः शीघ्रा ओजान्ते वीजवर्जिताः । द्विघ्नं स्वं कुज भागेषु बीजं द्विघ्नमृणं विदः ॥१७॥ अत्यष्टिघ्नं धनं सूरेरिन्दुघ्नं शोधयेत्कवेः । चन्द्रघ्नंमृणमार्कस्य स्यूरेभिर्दृक्समा ग्रहाः ॥१८॥ ‘एतद्द्रोजं मया ख्यातं प्रीत्या परमया तव । गोपनीयमिदं नित्यं नोपदेश्यं यतस्ततः ॥१९॥

८०८ सूर्य-सिद्धान्त परीक्षिताय शिष्याय गुरुभक्ताय साधवे । देयं विप्राय नान्यस्मै प्रतिकञ्चुककारिणे ॥२०॥ बीजं निःशेष सिद्धान्त रहस्यं परमं स्फुटम् । यात्रापाणिग्रहादीनां कार्याणां शुभसिद्धिदम् ॥२१॥ विज्ञान भाष्य—यह २१ श्लोक मानाध्याय के २३वें श्लोक के उपरान्त और अन्तिम ४ श्लोकों के पहले मिलते हैं और कम से कम ४०० वर्ष पुराने हैं क्योंकि रंगनाथ जी ने अपनी गूढ़ार्थ प्रकाशिका टीका में जो शक १५२५ की लिखी है इसका उल्लेख किया है। इससे यह सिद्ध होता है कि सूर्य-सिद्धान्त में भी बीज संस्कार करने की आवश्यकता पड़ी थी और हमारे पुराने आचार्य भी ज्योतिष शास्त्र को दोषरहित और सर्वाङ्गपूर्ण बनाने के पक्ष में थे, आजकल के कुछ पंडितों की तरह लकीर के फकीर नहीं थे । इन श्लोकों की टीका इधर के किसी टीकाकार ने नहीं की है इसलिए मैं भी इसका अनुवाद करना व्यर्थ समझता हूँ क्योंकि इन पुराने बीजों से भी अब काम नहीं चल सकता । अब तो सारी गणना नवीन वेधों से स्थिर करने की आवश्य- कता है । इस प्रकार सूर्य-सिद्धान्त के मानाध्याय नामक १४वें और अन्तिम अध्याय का विज्ञान भाष्य समाप्त हुआ ।

परिशिष्ट सूर्य-सिद्धान्त में प्रयुक्त संख्या सूचक शब्द ०—अम्बर, ख, वियत, व्योम, शून्य वसु, सर्प १—इन्दु, कु, निशाकर, रूप ९—अङ्क, गो, छिद्र, नव, रन्ध्र २—अक्षि, अश्वि, अश्विन, दस्त्र, १०—दिक्, दिङ् दस्त्रक, द्वि, नेत्र, यम, यमल, लोचन ११—ईश, ईश्वर, रुद्र, शंकर ३—अग्नि, गुण, ज्वलनः, त्रि, त्रिक, १२—अर्क, मास, सूर्य पावक, वह्नि, शिखि, हुताश १३—विश्व ४—अब्धि, अर्णव, कृत, चतुः, चतुष्क, १४—मनु युग, वेद, समुद्र, सागर १५—तिथि ५—अर्थ, इषु, पंच, बाण, मार्गण, १८—धृति विषय, शर १९—अतिधृति ६—अङ्ग, ऋतु, रस, षट्, षड् २०—कृति, नख ७—अग, अद्रि, नग, पर्वत, भूधर, २५—तत्व भूमिधर, मुनि ३२—रद ८—अष्ट, कुञ्जर, गज, नाग, भुजङ्ग, ३३—सुर

ग्रन्थ सूची (संस्कृत, हिन्दी या उर्दू के उन ग्रन्थों, पंचांगों या पत्नों की सूची जिनकी सहायता विज्ञान भाष्य में ली गयी है ।) आर्यभटीय परमेश्वराचार्य कृत संस्कृत टीका तथा उदय नारायण सिंह की हिन्दी टीका के साथ, ब्रह्म प्रेस इटावा का सं० १६६३ वि० का छपा । खंडखाद्यक मराठी के भारतीय ज्योतिः शास्त्र के आधार पर । गणक तरंगिणी म० म० सुधाकर द्विवेदी की लिखी और मेडिकल हाल प्रेस बनारस की सं० १६४६ वि० की छपी । गीता रहस्य लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के मराठी पुस्तक का माधवराव सप्रे का हिन्दी अनुवाद जो पूना के चित्रशाला स्टीम प्रेस में सं० १६७३ वि० में छपा था । ग्रहलाघव मल्लारि, विश्वनाथ और सुधाकर द्विवेदी की संस्कृत टीका सहित और म० म० सुधाकर द्विवेदी द्वारा सम्पादित । चलनकलन म० म० सुधाकर द्विवेदी कृत । ज्योतिर्गणित बैंकटेश बापूजी केतकर कृत शक १८१२ का छपा । तैत्तिरीय संहिता भारतीय ज्योतिःशास्त्र के आधार पर दामोदरीय भटतुल्य ,, ,, धर्म-सिन्धु निर्णय सागर प्रेस का शक १८२६ का छपा नक्षत्र कल्प भारतीय ज्योतिःशास्त्र के आधार पर । नारद संहिता ,, ,, निर्णय सिन्धु निर्णय सागर प्रेस का छपा । पंचसिद्धान्तिका वराहमिहिर कृत और डाक्टर थीवो तथा म० म० सुधाकर द्विवेदी के अंग्रेजी, संस्कृत अनुवाद के साथ मेडिकल, हाल प्रेस बनारस की १८८६ ई० की छपी । पंचांग (१६८५ वि० के केतकी, चित्रशाला प्रेस का, गुजराती का चैत्री, नवल किशोर प्रेस का, पंचांग प्रवर्तक कमेटी का, बालकृष्ण शास्त्री का, बालकृष्ण तुकाराम का, हिन्दू विश्व-विद्यालय का विश्व पंचांग, शास्त्र शुद्ध ऐक्य वर्द्धक तथा

पुस्तकों की सूची ८११ १६८३ वि० का गणेशदत्त शर्मा का, नवल किशोर प्रेस का, भारत भूषण, विजय और विश्व पंचांग; नाविक पंचांग १६२२ तथा १६२८ ई० के) बाराही संहिता (बृहत्संहिता) म० म० दुर्गाप्रसाद द्विवेदी की हिन्दी टीका सहित नवल किशोर प्रेस में छपी । ब्राह्मस्फुटसिद्धान्त म० म० सुधाकर द्विवेदी की संस्कृत टीका सहित और उन्हीं की सम्पादित, मेडिकल हाल प्रेस बनारस में १६०२ ई० का छपा । भगवद्गीता भगवद्गीता रहस्य (देखो गीता रहस्य) भारतीय ज्योतिःशास्त्र शंकर बालकृष्ण दीक्षित का मराठी में लिखा और पूना के आर्य भूषण प्रेस का शक १८१८ में छपा । भारत भ्रमण मकरंदसारिणी वेंकटेश्वर प्रेस बम्बई की संवत् १६६० वि० की छपी । मनुस्मृति पं० जनार्दन झा का भाषा टीका सहित कलकत्ता की हिन्दी पुस्तक एजेंसी से सं० १६८१ में प्रकाशित । महासिद्धान्त द्वितीय आर्यभट का लिखा, म० म० सुधाकर द्विवेदी की टीका सहित चन्द्रप्रभा प्रेस, बनारस की १६१० ई० का छपा । माधुरी खंड २ संख्या ४ नवल किशोर प्रेस से प्रकाशित मासिक पत्रिका । मर्यादा १६७८ और १६७६ वि० की, काशी के ज्ञान मण्डल से प्रकाशित मासिक पत्रिका । मुहूर्त चिन्तामणि पं० रामेश्वर भट्ट की टीका सहित सं० १६७४ वि० का निर्णय सागर प्रेस का छपा । मुहूर्त तत्व भारतीय ज्योतिः शास्त्र के आधार पर । रत्नमाल श्रीपति कृत ,, ,, रत्नकोश लल्ल कृत ,, ,, रोशनी उर्दू का वैज्ञानिक मासिक पर अप्रैल १६१६ ई० की । लघु मानस भारतीय ज्योतिः शास्त्र के आधार पर । लल्ल तंत्र भारतीय ज्योतिः शास्त्र के आधार पर । लीलावती विज्ञान मासिक पत्र विशुद्ध सिद्धान्त पंजिका बंगला ।

८१२ सूर्य-सिद्धान्त वेदाङ्ग ज्योतिष सोमाकर की टीका तथा म० म० सुधाकर द्विवेदी की टीका सहित और इन्हीं के द्वारा सम्पादित । वृद्ध गार्गीय संहिता भा० ज्यो शा० के आधार पर । वृहत्तिथि चिंतामणि गणक तरंगिणी के आधार पर । शतपथ ब्राह्मण भा० ज्यो० शा० के आधार पर । शाकल्य ब्रह्मसिद्धान्त ,, ,, सिद्धान्ततत्वविवेक म० म० सुधाकर द्विवेदी तथा म० म० मुरलीधर शर्मा की टिप्पणियों सहित ब्रजभूषण दास कम्पनी द्वारा बनारस से १६२४ ई० में प्रकाशित । सिद्धान्त दर्पण चन्द्रशेखर सिंह सामन्त का लिखा और प्रो० योगेशचन्द्र राय द्वारा सम्पादित और १८६६ ई० में प्रकाशित । सिद्धान्त शिरोमणि (१) गणिताध्याय कलकत्ते के वाचस्पत्य यंत्र का १८१५ ई० का छपा और गोलाध्याय नारायण यंत्र का १८६६ का छपा, (२) म० म० बापूदेव शास्त्री की टिप्पणी सहित बनारस के मेडिकल हाल प्रेस का १८६६ ई० का छपा, (३) गोलाध्याय पं० गिरिजा प्रसाद द्विवेदी द्वारा प्रभा भाषा भाष्य सहित सम्पादित तथा नवल किशोर प्रेस में १८११ ई० का छपा । सिद्धान्त शेखर सुधा वर्षिणी टीका के आधार पर । सुन्दरी सिद्धान्त भा० ज्यो० शा० के आधार पर । सूर्य-सिद्धान्त (१) पं० इन्द्र नारायण द्विवेदी द्वारा अनुवादित और संपादित तथा हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा सं० १६७५ वि० में प्रकाशित । (२) गूढार्थ प्रकाशित टीका के साथ पं० बलदेव प्रसाद मिश्र द्वारा हिन्दी में अनुवादित और सम्पादित तथा बेंकटेश्वर प्रेस में १८६६ ई० में मुद्रित । (३) पं० माधव पुरोहित की टीका सहित पं० गिरिजा प्रसाद द्विवेदी द्वारा सम्पादित और नवल किशोर प्रेस में १६०४ ई० में मुद्रित । (४) विज्ञानानन्द स्वामी द्वारा बंगला भाषा में अनुवादित और सम्पादित तथा भारत मिहिर यन्त्रालय द्वारा १६०६ ई० में मुद्रित । (५) म० म० सुधाकर द्विवेदी की सुधावर्षिणी टीका सहित बंगाल की एशियाटिक सोसाइटी द्वारा १६२५ ई० में दूसरी बार मुद्रित परन्तु लेखक को १६३४ ई० में प्राप्त । (६) पंच सिद्धान्तिका का डाक्टर थीवो और सुधाकर द्विवेदी द्वारा सम्पादित ।

विज्ञान-भाष्य में उपयोग किये गये अंग्रेजी ग्रन्थों की सूची Askwith's pure Geometry. Asutosh Mukhopadhyaya's Geometry of Conics. Ball's Spherical Astronomy. Berry's Short History of Astronomy. Brennand's History of Hindu Astronomy. Burgess Suryasiddhanta published by Calcutta University in 1935 Encyclopaedia Brittanica. Godfray's Treatise of Astronomy. Hall and knight's Trigonometry. Heath's Popular Astronomy. Heroes of Science (Astronomer). Herschel's Outlines of Astronomy. Imperial Gazetteer. Kaye's Hindu Astronomy. L.D. Swami kannu Pillai's Indian Chronology. Leader 25th Oct. 1939. Lockyer's Elementary Lessons on Astronomy. Loney's Elements of Coordinate Geometry. Loomi's Practical Astronomy. Nautical Almanac of 1922 and 1928. Parkers Elements of Astronomy. Popular Hindu Astronomy Part I (by Kalidas Mukherji). Scientific American July 1928. Todhunter and Leathern Spherical Trigonometry. Williamson Differential Calculus.