तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)
Tattvartha Sutra / Mokshashastra with Hindi Commentary
आचार्य उमास्वामी (उमास्वाति) / आचार्य पूज्यपाद द्वारा
अध्याय - २ औपपादिकचरमोत्तमदेहासंख्येयवर्षायुषोऽनपवर्त्यायुषः ॥५३॥ [ औपपादिक ] उपपाद जन्मवाले देव और नारकी, [ चरम उत्तम देहाः ] चरम उत्तम देह वाले अर्थात् उसी भव में मोक्ष जाने वाले तथा [ असंख्येयवर्ष आयुषः ] असंख्यात वर्ष आयु वाले भोगभूमि के जीवों की [ आयुषः अनपवर्ति ] आयु अपवर्तन रहित होती है। The lifetime of beings born in special beds, those with final, superior bodies and those of innumerable years, cannot be cut short. ॥ इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे द्वितीयोऽध्यायः॥ 35
अध्याय - ३ अथ तृतीयोऽध्यायः The Lower World and the Middle World रत्नशर्करावालुकापंकधूमतममोमहातमःप्रभाभूमयो घनाम्बुवाताकाशप्रतिष्ठाः सप्ताधोऽधः ॥१॥ अधोलोक में रत्नप्रभा, शर्कराप्रभा, वालुकाप्रभा, पंकप्रभा, धूमप्रभा, तमप्रभा और महातमप्रभा - ये सात भूमियाँ हैं और क्रम से नीचे-नीचे घनोदधिवातवलय, घनवातवलय, तनुवातवलय तथा आकाश का आधार है। The lower world consists of seven earths* one below the other, surrounded by three kinds of air and space. तासु त्रिंशत्पञ्चविंशतिपञ्चदशदशत्रिपञ्चोनैकनरक- शतसहस्राणि पञ्च चैव यथाक्रमम् ॥२॥ उन पृथ्वियों में क्रम से पहली पृथ्वी में 30 लाख, दूसरी में 25 लाख, तीसरी में 15 लाख, चौथी में 10 लाख, पाँचवीं में 3 लाख, छठवीं में पाँच कम एक लाख (99,995) और सातवीं में 5 ही नरक बिल हैं। कुल 84 लाख नरकवास बिल हैं।
- Ratna, Şarkarā, Vālukā, Pańka, Dhūma, Tamaḥ and Mahātamaḥ – the word prabhā is taken with each of these. 36
अध्याय - ३ In these (earths) there are thirty hundred thousand, twenty-five hundred thousand, fifteen hundred thousand, ten hundred thousand, three hundred thousand, one hundred thousand less five and only five infernal abodes, respectively. नारका नित्याशुभतरलेश्यापरिणामदेहवेदना- विक्रियाः ॥३॥ नारकी जीव सदैव ही अत्यन्त अशुभ लेश्या, परिणाम, शरीर, वेदना और विक्रिया को धारण करते हैं। The thought-colouration, environment, body, suffering, and shape of body (or deeds) are incessantly more inauspicious in succession among the infernal beings. परस्परोदीरितदुःखाः ॥४॥ नारकी जीव परस्पर एक-दूसरे को दुःख उत्पन्न करते हैं (- वे कुत्ते की भांति परस्पर लड़ते हैं)। They cause pain and suffering to one another. 37
अध्याय - ३ संक्लिष्टासुरोदीरितदुःखाश्च प्राक्चतुर्थ्याः ॥५॥ और उन नारकियों के चौथी पृथ्वी से पहिले-पहिले (अर्थात् तीसरी पृथ्वी पर्यन्त) अत्यन्त संक्लिष्ट परिणाम के धारक अम्ब-अम्बरिष आदि जाति के असुरकुमार देवों के द्वारा दुःख पाते हैं अर्थात् अम्ब-अम्बरिष असुरकुमार देव तीसरे नरक तक जाकर नारकी जीवों को दुःख देते हैं तथा उनके पूर्व के वैर का स्मरण करा-करा के परस्पर लड़ाते हैं और दुःखी देख राजी होते हैं। Pain is also caused by the incitement of malevolent asurkumāras prior to the fourth earth. तेष्वेकत्रिसप्तदशसप्तदशद्वाविंशतित्रयस्त्रिंशत्सागरोपमा सत्त्वानां परा स्थितिः ॥६॥ उन नरकों के नारकी जीवों की उत्कृष्ट आयुस्थिति क्रम से पहिले में एक सागर, दूसरे में तीन सागर, तीसरे में सात सागर, चौथे में दस सागर, पाँचवें में सत्रह सागर, छठे में बाईस सागर और सातवें में तेंतीस सागर है। In these infernal regions the maximum duration of life of the infernal beings is one, three, seven, ten, seventeen, twenty-two, and thirty-three sāgaropamas. 38
अध्याय - ३ जम्बूद्वीपलवणोदादयः शुभनामानो द्वीपसमुद्राः ॥७॥ इस मध्यलोक में अच्छे-अच्छे नाम वाले जम्बूद्वीप इत्यादि द्वीप, और लवणसमुद्र इत्यादि समुद्र हैं। Jambūdvīpa, Lavaṇoda, and the rest are the continents and the oceans with auspicious names. द्विर्द्विविष्कम्भाः पूर्वपूर्वपरिक्षेपिनो वलयाकृतयः ॥८॥ प्रत्येक द्वीप-समुद्र दूने-दूने विस्तार वाले और पहिले-पहिले के द्वीप-समुद्रों को घेरे हुए चूड़ी के आकार वाले हैं। (These) are of double the diameter of the preceding ones and circular in shape, each encircling the immediately preceding one. तन्मध्ये मेरुनाभिर्वृत्तो योजनशतसहस्रविष्कम्भो जम्बूद्वीपः ॥९॥ उन सब द्वीप-समुद्रों के बीच में जम्बूद्वीप है, उसकी नाभि के समान सुदर्शन मेरु है, तथा जम्बूद्वीप थाली के समान गोल है और एक लाख योजन उसका विस्तार है। 39
अध्याय ३: अधोलोक व मध्यलोक की रचना / भूगोल
अध्याय - ३ In the middle of these oceans and continents is Jambūdvīpa, which is round and which is one hundred thousands yojanas in diameter. Mount Meru is at the centre of this continent like the navel in the body. भरतहैमवतहरिविदेहरम्यकहैरण्यवतैरावतवर्षाः क्षेत्राणि ॥१०॥ इस जम्बूद्वीप में भरत, हैमवत, हरि, विदेह, रम्यक, हैरण्यवत और ऐरावत - ये सात क्षेत्र हैं। Bharata, Haimavata, Hari, Videha, Ramyaka, Hairaṇyavata, and Airāvata are the seven regions. तद्विभाजिनः पूर्वापरायता हिमवन्महाहिमवन्निषधनील- रुक्मिशिखरिणो वर्षधरपर्वताः ॥११॥ उन सात क्षेत्रों का विभाग करने वाले पूर्व से पश्चिम तक लम्बे 1- हिमवत्, 2- महामहिमवत्, 3- निषध, 4- नील, 5- रुक्मि और 6- शिखरिन् - ये छह वर्षधर-कुलाचल पर्वत हैं। (वर्ष=क्षेत्र) The mountain chains Himavan, Mahāhimavan, Niṣadha, Nīla, Rukmi, and Ṣikhari, running east to west, divide these regions. 40
अध्याय - ३ हेमार्जुनतपनीयवैडूर्यरजतहेममयाः ॥१२॥ ऊपर कहे गये पर्वत क्रम से 1- स्वर्ण, 2- चाँदी, 3- तपाया सोना, 4- वैडूर्य (नील) मणि, 5- चाँदी और 6- स्वर्ण जैसे रंग के हैं। They are of golden, white, like purified gold, blue, silvery, and golden in colour. मणिविचित्रपार्श्वा उपरि मूले च तुल्यविस्ताराः ॥१३॥ इन पर्वतों का तट चित्र-विचित्र मणियों का है और ऊपर-नीचे तथा मध्य में एक समान विस्तार वाला है। The sides (of these mountains) are studded with various jewels, and the mountains are of equal width at the foot, in the middle and at the top. पद्ममहापद्मतिगिञ्छकेशरिमहापुण्डरीकपुण्डरीका ह्रदास्तेषामुपरि ॥१४॥ इन पर्वतों के ऊपर क्रम से 1- पद्म, 2- महापद्म, 3- तिगिञ्छ, 4- केशरि, 5- महापुण्डरीक और 6- पुण्डरीक नाम के ह्रद-सरोवर हैं। 41
अध्याय - ३ Padma, Mahāpadma, Tigiñcha, Keṣari, Mahāpundarīka, and Pundarīka are the lakes on the tops of these (mountains). प्रथमो योजनसहस्रायामस्तदर्द्धविष्कम्भो ह्रदः ॥१५॥ पहिला पद्म सरोवर एक हजार योजन लम्बा और लम्बाई से आधा अर्थात् पाँच सौ योजन चौड़ा है। The first lake is 1,000 yojanas in length and half of it in breadth. दशयोजनावगाहः ॥१६॥ पहिला सरोवर दश योजन अवगाह (गहराई) वाला है। The depth is ten yojanas. तन्मध्ये योजनं पुष्करम् ॥१७॥ उसके बीच में एक योजन विस्तार वाला कमल है। In the middle of this first lake, there is a lotus of the size of one yojana. 42
अध्याय - ३ तद्द्विगुणद्विगुणा ह्रदाः पुष्कराणि च ॥१८॥ आगे के सरोवर तथा कमल पहिले के सरोवरों तथा कमलों से क्रम से दूने-दूने विस्तार वाले हैं। The lakes as well as the lotuses are of double the magnitude. तन्निवासिन्यो देव्यः श्रीह्रीधृतिकीर्तिबुद्धिलक्ष्म्यः पल्योपमस्थितयः ससामानिकपारिषत्काः ॥१९॥ एक पल्योपम आयु वाली और सामानिक तथा पारिषद् जाति के देवों सहित श्री, ह्री, धृति, कीर्ति, बुद्धि और लक्ष्मी नाम की देवियाँ क्रम से उन सरोवरों के कमलों पर निवास करती हैं। In these lotuses live the nymphs called Śrī, Hrī, Dhṛti, Kīrti, Buddhi and Lakṣmī, whose lifetime is one palya and who live with Sāmānikas and Pāriṣatkas. गंगासिन्धुरोहिद्रोहितास्याहरिद्धरिकान्तासीतासीतोदा- नारीनरकान्तासुवर्णरूप्यकूलारक्तारक्तोदाः सरितस्तन्मध्यगाः ॥२०॥ 43
अध्याय - ३ ( भरत में) गंगा, सिंधु, (हैमवत में) रोहित, रोहितास्या, (हरिक्षेत्र में) हरित्, हरिकान्ता, (विदेह में) सीता, सीतोदा, (रम्यक् में) नारी, नरकान्ता, (हैरण्यवत् में) स्वर्णकूला, रूप्यकूला और (ऐरावत में) रक्ता, रक्तोदा, इस प्रकार ऊपर कहे हुए सात क्षेत्रों में चौदह नदियाँ बीच में बहती हैं। द्वयोर्द्वयोः पूर्वाः पूर्वगाः ॥२१॥ (ये चौदह नदियाँ दो के समूह में लेना चाहिये) हर एक दो के समूह में से पहली नदी पूर्व की ओर बहती है (और उस दिशा के समुद्र में मिलती है)। शेषास्त्वपरगाः ॥२२॥ बाकी रही सात नदियाँ पश्चिम की ओर जाती हैं (और उस तरफ के समुद्र में मिलती हैं)। 44
अध्याय - ३ The rest are the western rivers. चतुर्दशनदीसहस्रपरिवृता गंगासिन्ध्वादयो नद्यः ॥२३॥ गंगा-सिन्धु आदि नदियों के युगल चौदह हजार सहायक नदियों से घिरे हुए हैं। The Gangā, the Sindhu, etc. are rivers having 14,000 tributaries. भरतः षड्विंशतिपञ्चयोजनशतविस्तारः षट्चैकोनविंशतिभागा योजनस्य ॥२४॥ भरत क्षेत्र का विस्तार, पाँच सौ छब्बीस योजन और एक योजन के उन्नीस भागों में से 6 भाग अधिक है। Bharata is 526 6/19 yojanas in width. तद्द्विगुणद्विगुणविस्तारा वर्षधरवर्षा विदेहान्ताः ॥२५॥ विदेहक्षेत्र तक के पर्वत और क्षेत्र भरतक्षेत्र से दूने-दूने विस्तार वाले हैं। The mountains and the regions are double in width up to Videha. 45
अध्याय - ३ उत्तरा दक्षिणतुल्याः ॥२६॥ विदेह क्षेत्र से उत्तर के तीन पर्वत और तीन क्षेत्र, दक्षिण के पर्वत और क्षेत्रों के समान विस्तार वाले हैं। Those in the north are equal to those in the south. भरतैरावतयोर्वृद्धिह्रासौ षट्समयाभ्यामुत्सर्पिण्यवसर्पिणीभ्याम् ॥२७॥ छह कालों से युक्त उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी के द्वारा भरत और ऐरावत क्षेत्र में जीवों के अनुभवादि की वृद्धि-हानि होती रहती है। In Bharata and Airāvata there is rise and fall (regeneration and degeneration) during the six periods of the two aeons of regeneration and degeneration. ताभ्यामपरा भूमयोऽवस्थिताः ॥२८॥ भरत और ऐरावत क्षेत्र को छोड़कर दूसरे क्षेत्रों में एक ही अवस्था रहती है - उनमें काल का परिवर्तन नहीं होता। The regions other than these are stable. 46
अध्याय - ३ एकद्वित्रिपल्योपमस्थितयो हैमवतकहारिवर्षकदैवकुरवकाः ॥२९॥ हैमवतक, हारिवर्षक और देवकुरु (विदेहक्षेत्र के अन्तर्गत एक विशेष स्थान) के मनुष्य, तिर्यंच क्रम से एक पल्य, दो पल्य और तीन पल्य की आयु वाले होते हैं। The human beings in Haimvata, Hari and Devakuru are of one, two and three palyas respectively. —————— तथोत्तराः ॥३०॥ उत्तर के क्षेत्रों में रहने वाले मनुष्य भी हैमवतकादिक के मनुष्यों के समान आयु वाले होते हैं। The condition is the same in the north. —————— विदेहेषु सङ्ख्येयकालाः ॥३१॥ विदेह क्षेत्रों में मनुष्य और तिर्यंचों की आयु संख्यात वर्ष की होती है। In Videhas the lifetime is numerable years. —————— 47
अध्याय - ३ भरतस्य विष्कम्भो जम्बूद्वीपस्य नवतिशतभागः ॥३२॥ भरत क्षेत्र का विस्तार जम्बूद्वीप के एक सौ नव्वेवाँ (190) भाग के बराबर है। The width of Bharata is one hundred and ninetieth (1/190) part of that of Jambūdvīpa. द्विर्धातकीखण्डे ॥३३॥ धातकीखण्ड नाम के दूसरे द्वीप में क्षेत्र, कुलाचल, मेरु, नदी इत्यादि सब पदार्थों की रचना जम्बूद्वीप से दूनी-दूनी है। In Dhātakīkhaṇḍa it is double. पुष्करार्द्धे च ॥३४॥ पुष्करार्द्ध द्वीप में भी सब रचना जम्बूद्वीप की रचना से दूनी-दूनी है। In the (nearest) half of Puṣkaradvīpa also. 48
अध्याय - ३ प्राङ्मानुषोत्तरान्मनुष्याः ॥३५॥ मानुषोत्तर पर्वत तक अर्थात् अढ़ाई द्वीप में ही मनुष्य होते हैं
- मानुषोत्तर पर्वत से परे ऋद्धिधारी मुनि या विद्याधर भी नहीं जा सकते। (There are) human beings up to Mānusottara. आर्या म्लेच्छाश्च ॥३६॥ आर्य और म्लेच्छ के भेद से मनुष्य दो प्रकार के हैं। The civilized people and the barbarians. भरतैरावतविदेहाः कर्मभूमयोऽन्यत्रदेवकुरूत्तरकुरुभ्यः ॥३७॥ पाँच मेरु सम्बन्धी पाँच भरत, पाँच ऐरावत, देवकुरु तथा उत्तरकुरु ये दोनों छोड़कर पाँच विदेह, इस प्रकार अढ़ाई द्वीप में कुल पन्द्रह कर्मभूमियाँ हैं। Bharata, Airāvata, and Videha excluding Devakuru and Uttarakuru, are the regions of labour. 49
अध्याय - ३ नृस्थिती परापरे त्रिपल्योपमान्तर्मुहूर्ते ॥३८॥ मनुष्यों की उत्कृष्ट स्थिति तीन पल्य और जघन्य स्थिति अन्तर्मुहूर्त की है। The maximum and the minimum periods of lifetime of human beings are three palyas and antarmuhūrta. तिर्यग्योनिजानां च ॥३९॥ तिर्यंचों की आयु की उत्कृष्ट तथा जघन्य स्थिति उतनी ही (मनुष्यों जितनी) है। These are the same for the animals. ॥ इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे तृतीयोऽध्यायः ॥ 50
अध्याय - ४ अथ चतुर्थोऽध्यायः The Celestial Beings देवाश्चतुर्णिकायाः ॥१॥ देव चार समूह वाले हैं, अर्थात् देवों के चार भेद हैं -
- भवनवासी, 2. व्यन्तर, 3. ज्योतिषी, 4 वैमानिक। The celestial beings are of four orders (classes). आदितस्त्रिषु पीतान्तलेश्याः ॥२॥ पहिले के तीन निकायों में पीत तक, अर्थात् कृष्ण, नील, कापोत और पीत - ये चार लेश्याएँ होती हैं। The colouration of thought of the first three classes is up to yellow. दशाष्टपञ्चद्वादशविकल्पाः कल्पोपपन्नपर्यन्ताः ॥३॥ कल्पोपपन्न (सोलहवें स्वर्ग तक के देव) पर्यन्त इन चार प्रकार के देवों के क्रम से दश, आठ, पाँच और बारह भेद हैं। They are of ten, eight, five and twelve classes up to the Heavenly beings (kalpavāsis). 51
अध्याय - ४ इन्द्रसामानिकत्रायस्त्रिंशपारिषदात्मरक्षलोकपालानीक- प्रकीर्णकाभियोग्यकिल्विषिकाश्चैकशः ॥४॥ ऊपर कहे हुए चार प्रकार के देवों में हर एक के दश भेद हैं:- 1. इन्द्र, 2. सामानिक, 3. त्रायस्त्रिंश, 4. पारिषद्, 5. आत्मरक्ष, 6. लोकपाल, 7. अनीक, 8. प्रकीर्णक, 9. आभियोग्य और 10. किल्विषिक। त्रायस्त्रिंशलोकपालवर्ज्या व्यन्तरज्योतिष्काः ॥५॥ ऊपर जो दश भेद कहे हैं उनमें से त्रायस्त्रिंश और लोकपाल
- ये भेद व्यन्तर और ज्योतिषी देवों में नहीं होते अर्थात् उनमें दो भेदों को छोड़कर बाकी के आठ भेद होते हैं। 52
अध्याय - ४ पूर्वयोर्द्विन्द्राः ॥६॥ भवनवासी और व्यन्तरों में प्रत्येक भेद में दो-दो इन्द्र होते हैं। In the first two orders there are two lords. कायप्रवीचारा आ ऐशानात् ॥७॥ ईशान स्वर्ग तक के देव (अर्थात् भवनवासी, व्यन्तर, ज्योतिषी और पहिले तथा दूसरे स्वर्ग के देव) मनुष्यों की भाँति शरीर से काम-सेवन करते हैं। Up to Aiṣāna Kalpa they enjoy copulation. शेषाः स्पर्शरूपशब्दमनःप्रवीचाराः ॥८॥ शेष स्वर्ग के देव, देवियों के स्पर्श से, रूप देखने से, शब्द सुनने से और मन के विचारों से काम-सेवन करते हैं। The others derive pleasure by touch, sight, sound and thought. 53
अध्याय - ४ परेऽप्रवीचाराः ॥९॥ सोलहवें स्वर्ग से आगे के देव काम-सेवन रहित हैं। (उनके कामेच्छा उत्पन्न ही नहीं होती तो फिर उसके प्रतिकार से क्या प्रयोजन?) The rest are without sexual desire. भवनवासिनोऽसुरनागविद्युत्सुपर्णाग्नवातस्तनितोदधि- द्वीपदिक्कुमाराः ॥१०॥ भवनवासी देवों के दश भेद हैं:- 1. असुरकुमार, 2. नागकुमार, 3. विद्युत्कुमार, 4. सुपर्णकुमार, 5. अग्निकुमार, 6. वातकुमार, 7. स्तनितकुमार, 8. उदधिकुमार, 9. द्वीपकुमार और 10. दिक्कुमार। The Residential devas comprise Asura, Nāga, Vidyut, Suparṇa, Agni, Vāta, Stanita, Udadhi, Dvīpa and Dikkumāras. व्यन्तराः किन्नरकिम्पुरुषमहोरगगन्धर्वयक्षराक्षसभूत- पिशाचाः ॥११॥ 54