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तत्त्वार्थ सूत्र (मोक्षशास्त्र - संस्कृत सूत्र एवं हिन्दी व्याख्या)

Tattvartha Sutra / Mokshashastra with Hindi Commentary

आचार्य उमास्वामी (उमास्वाति) / आचार्य पूज्यपाद द्वारा

DevanagariHindipublished177 पृष्ठ

अध्याय - ५ धर्माधर्मयोः कृत्स्ने ॥१३॥ [ धर्माधर्मयोः ] धर्म और अधर्म द्रव्य का अवगाह [ कृत्स्ने ] तिल में तेल की तरह समस्त लोकाकाश में है। The media of motion and rest pervade the entire universe-space. एकप्रदेशादिषु भाज्यः पुद्गलानाम् ॥१४॥ [ पुद्गलानाम् ] पुद्गल द्रव्य का अवगाह [ एक प्रदेशादिषु ] लोकाकाश के एक प्रदेश से लेकर संख्यात और असंख्यात प्रदेश पर्यन्त [ भाज्यः ] विभाग करने योग्य है - जानने योग्य है। The forms of matter occupy (inhabit) from one unit of space onwards. असंख्येयभागादिषु जीवानाम् ॥१५॥ [ जीवानाम् ] जीवों का अवगाह [ असंख्येयभागादिषु ] लोकाकाश के असंख्यात भाग से लेकर संपूर्ण लोक क्षेत्र में है। The souls inhabit from one of innumerable parts of the universe-space. 70

अध्याय - ५ प्रदेशसंहारविसर्पाभ्यां प्रदीपवत् ॥१६॥ [ प्रदीपवत् ] दीप के प्रकाश की भांति [ प्रदेशसंहारविसर्पाभ्यां ] प्रदेशों के संकोच और विस्तार के द्वारा जीव लोकाकाश के असंख्यातादिक भागों में रहता है। (It is possible) by the contraction and expansion of the space-points (of a soul) as in the case of the light of a lamp. गतिस्थित्युपग्रहौ धर्माधर्मयोरुपकारः ॥१७॥ [ गतिस्थित्युपग्रहौ ] स्वयमेव गमन तथा स्थिति को प्राप्त हुए जीव और पुद्गलों के गमन तथा ठहरने में जो सहायक है सो [ धर्माधर्मयोः उपकारः ] क्रम से धर्म और अधर्म द्रव्य का उपकार है। The functions of the media of motion and rest are to assist motion and rest respectively. आकाशस्यावगाहः ॥१८॥ [ अवगाहः ] समस्त द्रव्यों को अवकाश-स्थान देना यह [ आकाशस्य ] आकाश का उपकार है। (The function) of space (is to) provide accommodation. 71

अध्याय - ५ शरीरवाङ्मनःप्राणापानाः पुद्गलानाम् ॥१९॥ [ शरीरवाङ्मनः प्राणापानाः ] शरीर, वचन, मन तथा श्वासोच्छ्वास ये [ पुद्गलानाम् ] पुद्गल द्रव्य के उपकार हैं अर्थात् शरीरादि की रचना पुद्गल से ही होती है। (The function) of matter (is to form the basis) of the body and the organs of speech and mind and respiration. सुखदुःखजीवितमरणोपग्रहाश्च ॥२०॥ [ सुखदुःखजीवितमरणोपग्रहाश्च ] इन्द्रियजन्य सुख-दुःख, जीवन-मरण ये भी पुद्गल के उपकार हैं। (The function of matter is) also to contribute to pleasure, suffering, life and death of living beings. परस्परोपग्रहो जीवानाम् ॥२१॥ [ जीवानाम् ] जीवों के [ परस्परोपग्रहः ] परस्पर में उपकार हैं। (The function) of souls is to help one another. 72

अध्याय - ५ वर्तनापरिणामक्रियाः परत्वापरत्वे च कालस्य ॥२२॥ [ वर्तनापरिणामक्रियाः परत्वापरत्वे च ] वर्तना, परिणाम, क्रिया, परत्व और अपरत्व [ कालस्य ] काल द्रव्य के उपकार हैं। Assisting substances in their continuity of being (through gradual changes), in their modifications, in their movements and in their priority and non- priority in time, are the functions of time. स्पर्शरसगन्धवर्णवन्तः पुद्गलाः ॥२३॥ [ स्पर्श रस गन्ध वर्णवन्तः ] स्पर्श, रस, गन्ध और वर्ण वाले [ पुद्गलाः ] पुद्गल द्रव्य हैं। The forms of matter are characterized by touch, taste, smell and colour. शब्दबन्धसौक्ष्म्यस्थौल्यसंस्थानभेदतमश्छायाऽऽतपोद्योत- वन्तश्च ॥२४॥ उक्त लक्षणवाले पुद्गल [ शब्द बन्ध सौक्ष्म्य स्थौल्य संस्थान भेद तमश्छायाऽऽतपोद्योतवन्तः च ] शब्द, बन्ध, सूक्ष्मता, स्थूलता, संस्थान (आकार), भेद, अन्धकार, छाया, आतप और उद्योतादि वाले होते हैं, अर्थात् ये भी पुद्गल की पर्यायें हैं। 73

अध्याय - ५ Sound, union, fineness, grossness, shape, division, darkness, image, warm light (sunshine), and cool light (moonlight) also (are forms of matter). अणवः स्कन्धाश्च ॥२५॥ पुद्गल द्रव्य [ अणवः स्कन्धाः च ] अणु और स्कन्ध के भेद से दो प्रकार के हैं। Atoms and molecules (are the two main divisions of matter). भेदसङ्घातेभ्य उत्पद्यन्ते ॥२६॥ परमाणुओं के [ भेदसङ्घातेभ्य ] भेद (अलग होने से) सङ्घात (मिलने से) अथवा भेद सङ्घात दोनों से [ उत्पद्यन्ते ] पुद्गल स्कन्धों की उत्पत्ति होती है। (Moleules) are formed by division (fission), union (fusion), and division-cum-union. भेदादणुः ॥२७॥ [ अणुः ] अणु की उत्पत्ति [ भेदात् ] भेद से होती है। The atom (is produced only) by division (fission). 74

अध्याय - ५ भेदसङ्घाताभ्यां चाक्षुषः ॥२८॥ [ चाक्षुषः ] चक्षु इन्द्रिय से देखने योग्य स्कन्ध [ भेदसङ्घाताभ्याम् ] भेद और सङ्घात दोनों के एकत्र रूप होने से उत्पन्न होता है, अकेले भेद से नहीं। (Molecules produced) by the combined action of division (fission) and union (fusion) can be perceived by the eyes. सत् द्रव्यलक्षणम् ॥२९॥ [ द्रव्यलक्षणम् ] द्रव्य का लक्षण [ सत् ] सत् (अस्तित्व) है। Existence (being or sat) is the differentia of a substance. उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत् ॥३०॥ [ उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं ] जो उत्पाद-व्यय-ध्रौव्य सहित हो [ सत् ] सो सत् है। Existence is characterized by origination, disappearance (destruction) and permanence. ............................ 75

अध्याय ५: अजीव काया व षड्द्रव्य लक्षण

अध्याय - ५ तद्भावाव्ययं नित्यम् ॥३१॥ [ तद्भावाव्ययं ] तद्भाव से जो अव्यय है – नाश नहीं होता सो [ नित्यम् ] नित्य है। Permanence is indestructibility of the essential nature (quality) of the substance¹. अर्पितानर्पितसिद्धेः ॥३२॥ [ अर्पितानर्पितसिद्धेः ] प्रधानता और गौणता से पदार्थों की सिद्धि होती है। (The contradictory characteristics are established) from different points of view. स्निग्धरूक्षत्वाद्वन्धः ॥३३॥ [ स्निग्धरूक्षत्वात् ] चिकने और रूखे के कारण [ बन्धः ] दो, तीन इत्यादि परमाणुओं का बन्ध होता है। Combination of atoms takes place by virtue of greasy (sticky) and dry (rough) properties associated with them. ¹ Permanence is the existence of the past nature in the present. 76

अध्याय - ५ न जघन्यगुणानाम् ॥३४॥ [ जघन्यगुणानाम् ] जघन्य गुण सहित परमाणुओं का [ न ] बन्ध नहीं होता। (There is) no combination between the lowest degrees of the two properties. गुणसाम्ये सदृशानाम् ॥३५॥ [ गुणसाम्ये ] गुणों की समानता हो तब [ सदृशानाम् ] समान जाति वाले परमाणु के साथ बन्ध नहीं होता। जैसे कि - दो गुण वाले स्निग्ध परमाणु का दूसरे दो गुण वाले स्निग्ध परमाणु के साथ बन्ध नहीं होता अथवा जैसे स्निग्ध परमाणु का उतने ही गुण वाले रूक्ष परमाणु के साथ बन्ध नहीं होता। न - (बन्ध नहीं होता) यह शब्द इस सूत्र में नहीं कहा परन्तु ऊपर के सूत्र में कहा गया ‘न’ शब्द इस सूत्र में भी लागू होता है। (There is no combination) between equal degrees of the same property. द्व्यधिकादिगुणानां तु ॥३६॥ [ द्व्यधिकादिगुणानां तु ] दो अधिक गुण हों इस तरह के गुण वाले के साथ ही बन्ध होता है। 77

अध्याय - ५ बन्धेऽधिकौ पारिणामिकौ च ॥३७॥ [ च ] और [ बन्धे ] बन्धरूप अवस्था में [ अधिकौ ] अधिक गुण वाले के परमाणुओं जितने गुण रूप में [ पारिणामिकौ ] (कम गुण वाले परमाणुओं का) परिणमन होता है। (यह कथन निमित्त का है।) गुणपर्ययवत् द्रव्यम् ॥३८॥ [ गुणपर्ययवत् ] गुण-पर्याय वाला [ द्रव्यम् ] द्रव्य है। कालश्च ॥३९॥ [ कालः ] काल [ च ] भी द्रव्य है।

अध्याय - ५ सोऽनन्तसमयः ॥४०॥ [ सः ] वह काल द्रव्य [ अनन्त समयः ] अनन्त समय वाला है। काल की पर्याय यह समय है। यद्यपि वर्तमानकाल एक समयमात्र ही है तथापि भूत-भविष्य की अपेक्षा से उसके अनन्त समय हैं। It (conventional time) consists of infinite instants. द्रव्याश्रया निर्गुणा गुणाः ॥४१॥ [ द्रव्याश्रया ] जो द्रव्य के आश्रय से हों और [ निर्गुणा ] स्वयं दूसरे गुणों से रहित हों [ गुणाः ] वे गुण हैं। Those, which have substance as their substratum and which are not themselves the substratum of other attributes, are qualities. तद्भावः परिणामः ॥४२॥ [ तद्भावः ] जो द्रव्य का स्वभाव (निजभाव, निजतत्त्व) है [ परिणामः ] सो परिणाम है। The condition (change) of a substance is a mode. ॥ इति तत्त्वार्थाधिगमे मोक्षशास्त्रे पञ्चमोऽध्यायः ॥ ✱ ✱ ✱ 79

अध्याय - ६ अथ षष्ठोऽध्यायः Influx of Karma कायवाङ्मनःकर्म योगः ॥१॥ [ कायवाङ्मनः कर्म ] शरीर, वचन और मन के अवलम्बन से आत्मा के प्रदेशों का संकल्प होना सो [ योगः ] योग है। The action of the body, the organ of speech and the mind is called yoga (activity). स आस्रवः ॥२॥ [ सः ] वह योग [ आस्रवः ] आस्रव है। It (this threefold activity) is influx (āsrava). शुभः पुण्यस्याशुभः पापस्य ॥३॥ [ शुभः ] शुभ योग [ पुण्यस्य ] पुण्य कर्म के आस्रव में कारण है और [ अशुभः ] अशुभ योग [ पापस्य ] पाप कर्म के आस्रव में कारण है। Virtuous activity is the cause of merit (puṇya) and wicked activity is the cause of demerit (pāpa). 80

अध्याय - ६ सकषायाकषाययोः साम्परायिकेर्यापथयोः ॥४॥ [ सकषायस्य साम्परायिकस्य ] कषायसहित जीव के संसार के कारणरूप कर्म का आस्रव होता है और [ अकषायस्य ईर्यापथस्य ] कषायरहित जीव के स्थितिरहित कर्म का आस्रव होता है। (There are two kinds of influx, namely) that of persons with passions, which extends transmigration, and that of persons free from passions, which prevents or shortens it. इन्द्रियकषायाव्रतक्रियाः पञ्चचतुःपञ्चपञ्चविंशतिसंख्याः पूर्वस्य भेदाः ॥५॥ [ इन्द्रियाणि पञ्च ] स्पर्शन आदि पाँच इन्द्रियाँ, [ कषायाः चतुः ] क्रोधादि चार कषाय, [ अव्रतानि पञ्च ] हिंसा इत्यादि पाँच अव्रत और [ क्रियाः पञ्चविंशति ] सम्यक्त्व आदि पच्चीस प्रकार की क्रियायें [ संख्याः भेदाः ] इस प्रकार कुल 39 भेद [ पूर्वस्य ] पहले (साम्परायिक) आस्रव के हैं, अर्थात् इन सर्व भेदों के द्वारा साम्परायिक आस्रव होता है। 81

अध्याय - ६ The subdivisions of the former are the five senses, the four passions, non-observance of the five vows and twenty-five activities.¹ तीव्रमन्दज्ञाताज्ञातभावाधिकरणवीर्यविशेषेभ्यस्तद्विशेषः ॥६॥ [ तीव्रमन्दज्ञाताज्ञातभावाधिकरण-वीर्य-विशेषेभ्यः ] तीव्रभाव, मन्दभाव, ज्ञातभाव, अज्ञातभाव, अधिकरणविशेष और वीर्यविशेष से [ तद्विशेषः ] आस्रव में विशेषता- हीनाधिकता होती है। Influx is differentiated on the basis of intensity or feebleness of thought-activity, intentional or unintentional nature of action, the substratum and its peculiar potency. अधिकरणं जीवाजीवाः ॥७॥ [ अधिकरणं ] अधिकरण [ जीवाजीवाः ] जीवद्रव्य और अजीवद्रव्य ऐसे दो भेदरूप है; इसका स्पष्ट अर्थ यह है कि आत्मा में जो कर्मास्रव होता है उसमें दो प्रकार का निमित्त होता है; एक जीव निमित्त और दूसरा अजीव निमित्त। ¹ A literal meaning of the text would read as follows: ‘The subdivisions of the former are senses, the passions, the non- observance of the vows and the activities, which are of five, four, five and twenty-five kinds respectively.’ 82

अध्याय - ६ The living and the non-living constitute the substrata. आद्यं संरम्भसमारम्भारम्भयोगकृतकारितानुमतकषाय- विशेषैस्त्रिस्त्रिस्त्रिश्चतुश्चैकशः ॥८॥ [ आद्यं ] पहला अर्थात् जीव अधिकरण-आस्रव [ संरम्भसमारम्भारम्भयोग, कृतकारितानुमतकषायविशेषैः च ] संरम्भ-समारम्भ-आरम्भ, मन-वचन-कायरूप तीन योग, कृत-कारित-अनुमोदना तथा क्रोधादि चार कषायों की विशेषता से [ त्रिः त्रिः त्रिः चतुः ] 3 × 3 × 3 × 4 [ एकशः ] 108 भेदरूप है। The substratum of the living is of 108 kinds.² निर्वर्तनानिक्षेपसंयोगनिसर्गा द्विचतुर्द्वित्रिभेदाः परम् ॥९॥ [ परम् ] दूसरा अजीवाधिकरण आस्रव [ निर्वर्तना द्वि ] दो प्रकार की निर्वर्तना, [ निक्षेप चतुः ] चार प्रकार के निक्षेप [ संयोग द्वि ] दो प्रकार के संयोग और [ निसर्गा त्रिभेदाः ] तीन प्रकार के निसर्ग ऐसे कुल 11 भेदरूप है। ² Literal version. The substratum of the living is planning to commit violence, preparation for it, and commencement of it, by activity, doing, causing it done, and approval of it, and issuing from the passions, which are three, three, three, and four respectively. 83

अध्याय - ६ Production, placing, combining and urging are the substratum of the non-living. तत्प्रदोषनिह्नवमात्सर्यान्तरायासादनोपघाता ज्ञानदर्शनावरणयोः ॥१०॥ [ तत्प्रदोष निह्नव मात्सर्यान्तरायासादनोपघाताः ] ज्ञान और दर्शन के सम्बन्ध में करने में आये हुये प्रदोष, निह्नव, मात्सर्य, अन्तराय, आसादन और उपघात ये [ ज्ञानदर्शनावरणयोः ] ज्ञानावरण तथा दर्शनावरण कर्मास्रव के कारण हैं। Spite against knowledge, concealment of knowledge, non-imparting of knowledge out of envy, causing impediment to acquisition of knowledge, disregard of knowledge, and disparagement of true knowledge, lead to the influx of karmas which obscure knowledge and perception. दुःखशोकतापाक्रन्दनवधपरिवेदनान्यात्मपरोभय- स्थानान्यसद्वेद्यस्य ॥११॥ 84

अध्याय - ६ [ आत्मपरोभयस्थानानि ] अपने में, पर में और दोनों के विषय में स्थित [ दुःखशोकतापाक्रन्दनवधपरिदेवनानि ] दुःख, शोक, ताप, आक्रन्दन, वध और परिदेवन ये [ असद्वेद्यस्य ] असातावेदनीय कर्म के आस्रव के कारण हैं। Suffering, sorrow, agony, moaning, injury, and lamentation, in oneself, in others, or in both, lead to the influx of karmas which cause unpleasant feeling. भूतव्रत्यनुकम्पादानसरागसंयमादियोगः क्षान्तिः शौचमिति सद्वेद्यस्य ॥१२॥ [ भूतव्रत्यनुकम्पा ] प्राणियों के प्रति और व्रतधारियों के प्रति अनुकम्पा-दया, [ दानसरागसंयमादियोगः ] दान, सराग संयमादि के योग, [ क्षान्तिः शौचमिति ] क्षमा और शौच, अर्हन्त भक्ति इत्यादि [ सद्वेद्यस्य ] सातावेदनीय कर्म के आस्रव के कारण हैं। Compassion towards living beings in general and the devout in particular, charity, asceticism with attachment etc. (i.e. restraint-cum-non-restraint, involuntary dissociation of karmas without effort, austerities not based on right knowledge), contemplation, equanimity, freedom from greed – these lead to the influx of karmas that cause pleasant feeling. 85

अध्याय - ६ केवलिश्रुतसंघधर्मदेवावर्णवादो दर्शनमोहस्य ॥१३॥ [ केवलिश्रुतसंघधर्मदेवावर्णवादः ] केवली, श्रुत, संघ, धर्म और देव का अवर्णवाद करना सो [ दर्शनमोहस्य ] दर्शनमोहनीय कर्म के आस्रव का कारण है। Attributing faults to the omniscient, the scriptures, the congregation of ascetics, the true religion, and the celestial beings, leads to the influx of faith- deluding karmas. कषायोदयात्तीव्रपरिणामश्चारित्रमोहस्य ॥१४॥ [ कषायोदयात् ] कषाय के उदय से [ तीव्रपरिणामः ] तीव्र परिणाम होना सो [ चारित्रमोहस्य ] चारित्र मोहनीय के आस्रव का कारण है। Intense feelings induced by the rise of the passions cause the influx of the conduct-deluding karmas. बह्वारम्भपरिग्रहत्वं नारकस्यायुषः ॥१५॥ [ बह्वारम्भपरिग्रहत्वं ] बहुत आरम्भ और बहुत परिग्रह होना सो [ नारकस्यायुषः ] नरकायु के आस्रव का कारण है। 86

अध्याय - ६ Excessive infliction of pain, and attachment cause the influx of karma which leads to life in the infernal regions. माया तैर्यग्योनस्य ॥१६॥ [ माया ] माया-छलकपट [ तैर्यग्योनस्य ] तिर्यंचायु के आस्रव का कारण है। Deceitfulness causes the influx of life-karma leading to the animal and vegetable world. अल्पारम्भपरिग्रहत्वं मानुषस्य ॥१७॥ [ अल्पारम्भपरिग्रहत्वं ] थोड़ा आरम्भ और थोड़ा परिग्रहपन [ मानुषस्य ] मनुष्य-आयु के आस्रव का कारण हैं। Slight injury and slight attachment cause the influx of life-karma that leads to human life. स्वभावमार्दवं च ॥१८॥ [ स्वभावमार्दवं ] स्वभाव से ही सरल परिणाम होना [ च ] भी मनुष्यायु के आस्रव का कारण है। Natural mildness also (leads to the same influx). 87

अध्याय - ६ निःशीलव्रतत्वं च सर्वेषाम् ॥१९॥ [ निःशीलव्रतत्वं च ] शील और व्रत का जो अभाव है वह भी [ सर्वेषाम् ] सभी प्रकार की आयु के आस्रव का कारण है। Non-observance of the supplementary vows, vows, etc. causes the influx of life-karmas leading to birth among all the four kinds of beings (conditions of existence). सरागसंयमसंयमासंयमाकामनिर्जराबालतपांसि दैवस्य ॥२०॥ [ सरागसंयमसंयमासंयमाकामनिर्जराबालतपांसि ] सरागसंयम, संयमासंयम, अकामनिर्जरा और बालतप [ दैवस्य ] ये देवायु के आस्रव के कारण हैं। Restraint with attachment, restraint-cum-non- restraint, involuntary dissociation of karmas, and austerities accompanied by perverted faith, cause the influx of life-karma leading to celestial birth. सम्यक्त्वं च ॥२१॥ 88

अध्याय - ६ [ सम्यक्त्वं च ] सम्यग्दर्शन भी देवायु के आस्रव का कारण है अर्थात् सम्यग्दर्शन के साथ रहा हुआ जो राग है वह भी देवायु के आस्रव का कारण है। Right belief also (is the cause of influx of life-karma leading to celestial birth). योगवक्रता विसंवादनं चाशुभस्य नाम्नः ॥२२॥ [ योगवक्रता ] योग में कुटिलता [ विसंवादनं च ] और विसंवादन अर्थात् अन्यथा प्रवर्तन [ अशुभस्य नाम्नः ] अशुभ नामकर्म के आस्रव का कारण हैं। Crooked activities and deception cause the influx of inauspicious physique-making karmas. तद्विपरीतं शुभस्य ॥२३॥ [ तद्विपरीतं ] उससे अर्थात् अशुभ नामकर्म के आस्रव के जो कारण कहे उनसे विपरीत भाव [ शुभस्य ] शुभ नामकर्म के आस्रव का कारण हैं। The opposites of these (namely straightforward activity, and honesty or candour) cause the influx of auspicious physique-making karmas. 89