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वैदिक शिक्षा पद्धति एवं गुरुकुल व्यवस्था (डॉ. भास्कर मिश्र - राष्ट्रीय वेद विद्या प्रतिष्ठान)

Vaidik Shiksha Paddhati and Gurukul System

डॉ. भास्कर मिश्र द्वारा

DevanagariHindipublished353 पृष्ठ

Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri दशम अध्याय उपसंहार हमारे देश में राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता का जितना अधिक महत्वपूर्ण स्थान है उतना ही देश के भीतरी एवं बाहरी शत्रुओं की दृष्टि में देश की एकता और अखण्डता पर आघात करने का प्रयास निरन्तर चल रहा है। मनुष्य भय से निष्क्रिय एवं पलायनवादी बन जाता है। इसीलिए लोगों में भय उत्पन्न करने के लिए कुछ असामाजिक तत्त्व अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए प्रयास करते हैं। इस कार्य के लिए वे हिंसापूर्ण साधनों का प्रयोग करते हैं। ऐसी स्थिति ही आतंकवाद का आधार है। आतंकवाद शब्द का निर्माण आतंक + वाद से हुआ है और इस शब्द का सामान्य अर्थ है— आतंक का सिद्धान्त। 'आतंक' का अर्थ होता है— पीड़ा, डर, आशंका, नीति-त्रास। इस प्रकार आतंकवाद एक ऐसी विचारधारा है जो अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए बल प्रयोग में विश्वास रखती है। ऐसा बल प्रयोग विरोधी वर्ग, समुदाय या सम्प्रदाय को भयभीत करने के लिए किया जाता है। आतंकवादी अपने रातनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिये हिंसा से या अवैध रूप से सरकार को गिराने और शासन तंत्र पर अपना अधिकार जमाने का प्रयास भी करते हैं। राष्ट्रीयएकता एवं अखण्डता के लिए आतंकवाद सदैव से एक अभिशाप रहा है। इसका अस्तित्व मात्र हमारे देश में ही व्यास नहीं है, बल्कि इसका अस्तित्व सम्पूर्ण विश्व में विद्यमान है। यह सम्पूर्ण विश्व में भय, तनाव, असुरक्षा की भावना भर देना चाहता है। इससे इसकी नींव में छिपे इरादों को कोई नहीं जानता है। ये आतंकवादी समस्त विश्व में राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति के लिए सार्वजनिक हिंसा और हत्याओं का सहारा ले रहे हैं। भौतिक दृष्टि से विकसित देशों में तो आतंकवाद की इस प्रवृत्ति ने विकराल रूप धारण कर लिया है। कुछ आतंकवादियों ने तो मिलकर अन्तर्राष्ट्रीय संगठन बना लिया है। जे०सी० स्मिथ अपनी बहुचर्चित पुस्तक 'लीगल कंट्रोल ऑफ इण्टरनेशनल टेरेरिज्म' में लिखते हैं कि इस समय संसार में जैसा तनावपूर्ण वातावरण बना हुआ है, उसको देखते हुए यह कहा जा सकता है कि भविष्य में अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद में और तेजी आयेगी। किसी देश द्वारा अन्य देश में आतंकवादी गुटों को समर्थन देने की घटनायें बढ़ेगी। राजनयिकों की हत्यायें, विमान अपहरण, CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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312 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता बम विस्फोट, सामूहिक हत्याएँ, रासायनिक हथियारों का प्रयोग अधिक तेज होगा। श्रीलंका में तमिलों, जापान में रेड आर्मी, भारत में सिख होमलैण्ड चाहने वालों आदि के हिंसात्मक संघर्ष आतंकवाद की श्रेणी में आते हैं। भारत में आतंकवाद :- स्वाधीनता के पश्चात् भारत के विभिन्न भागों में अनेक आतंकवादी संगठनों द्वारा आतंकवादी उग्र हिंसा फैलाई गई। उन्होंने बड़े-बड़े सरकारी अधिकारियों को मौत के घाट उतार दिया और इतना आतंक फैलाया कि जनसामान्य ने पलायन करना आरम्भ कर दिया। सर्वप्रथम स्वतंत्रता के बाद तेलंगाना के साम्यवादियों ने हिंसक विद्रोह किया, उसकी असफलता के बाद भारत के उत्तरी पूर्वी क्षेत्र में आतंकवाद उभरने लगा। संगठित रूप से आतंकवाद नागालैण्ड में सामने आया जब फिजी में नागा राष्ट्रीय परिषद का गठन किया गया और अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रशिक्षित गुरिल्ला दस्तों का गठन हुआ। इसके बाद मिजोरम में लाल डेंगा ने 'मिजोरम-नेशनल फ्रंट' और मणिपुर में विश्वेश्वर सिंह ने 'पीपुल्स लिबरेशन आर्मी' के रूप में आतंकवादी संगठनों की स्थापना की। भारत में आतंकवाद का सबसे भयावह रूप पंजाब में खालिस्तान के समर्थकों ने प्रस्तुत किया। इस आतंकवाद का जन्मदाता जरनैल सिंह भिंडरवाले को दिया जा सकता है। इसी के अन्तर्गत अमृतसर के पवित्र स्वर्ण मन्दिर को आतंकवादी गतिविधियों का गढ़ बना दिया गया। वहाँ से हिंसात्मक गतिविधियों का संचालन होने लगा। जून १९८४ में भारत सरकार को बाध्य होकर सेना का उपयोग करना पड़ा और आपरेशन ब्लू स्टार नामक कार्यवाही ने उग्रवादियों की संगठन शक्ति को समाप्त कर दिया। इसके प्रतिक्रिया स्वरूप ही ३१ अक्टूबर १९८४ को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की हत्या की गई। इसके बाद हुए दंगों से हिन्दू और सिखों के मध्य विद्वेष की भावना परिलक्षित हो गई। इस आतंकवादी संगठन को लगातार विदेशी सहायता प्राप्त होती रही। इसके बाद आतंक फैलाने की दृष्टि से जगह-जगह 'ट्रांजिस्टर बम विस्फोट' किये गये जिससे कि सैकड़ों लोगों की जानें चली गयीं। भारतीय लोकतंत्र और स्वयं भारत राष्ट्र के लिए 'आतंकवाद' एक गम्भीरतम चुनौती बना हुआ है। देश की राष्ट्रीय एकता और अखण्डता के लिए एक बारुद का गोला बना हुआ है। कश्मीर प्रदेश तो सिर्फ पाकिस्तान की अनाधिकार चेष्टा के कारण ही इसका शिकार बना हुआ है। आतंकवाद सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक और आर्थिक— विविध आयामों वाली एक समस्या है। अतः इसके निवारण हेतु सभी स्तर पर प्रयास करना आवश्यक है। उसके लिए सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर कठोर प्रयास होना अत्यन्त आवश्यक है।

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दशम अध्याय 313 आतंकवाद के नियंत्रण हेतु सुझाव :- समस्या कितनी भी जटिल क्यों न हो, यदि उसको जड़मूल से समास नहीं किया जा सकता है, फिर भी उसे नियंत्रित तो अवश्य ही किया जा सकता है। इसके लिए सभी स्तरों पर प्रयास आवश्यक है— (क) राष्ट्रीय समस्याओं पर आम सहमति :- आतंकवाद केवल कानून और प्रशासनिक व्यवस्था का प्रश्न नहीं है वरन् इसका एक राजनैतिक पक्ष भी है। इसके लिए आवश्यकता इस बात की है कि चाहे 'पंजाब समस्या', 'जम्मू-कश्मीर समस्या' या 'असम समस्या' हों, उनके समाधान के लिए 'राजनैतिक स्वार्थों' को त्याग कर कठोर प्रयास करने चाहियें। वे राजनैतिक दल जो सत्ता में नहीं हैं, सत्ता पक्ष पर प्रहार करने के लिए उनको एक विषय बना लेते हैं और मात्र 'विरोध के लिए विरोध' की ही दृष्टि से सरकार के क्रियमाण प्रयासों का विरोध ही करते रहते हैं। वस्तुतः राष्ट्रीय समस्याओं पर आम सहमति कायम करके दलीय राजनीति से ऊपर उठकर विचार किया जाना चाहिये और इनका समाधान खोजना चाहिये। (ख) विधि एवं न्याय व्यवस्था में सुधार :- अपनी विधि एवं न्याय व्यवस्था में १०० वर्ष पूर्व ब्रिटेन को आदर्श मानकर अपनाई गई विधि प्रक्रिया और न्याय व्यवस्था इतनी जटिल एवं दीर्घकालीन और व्ययी है कि साधन सम्पन्न अपराधी के लिए विधि और न्याय का पालन कोई आवश्यक नहीं है। वे मुक्त और जनसामान्य को आतंकित करते हुये घूमते रहते हैं। आतंकवाद को नियंत्रित करने के लिए 'अपराधी के लिए लगभग तत्काल दण्ड की व्यवस्था' को अपनाते हुए साधारण जनता के मन मस्तिष्क में विधि और न्याय के प्रति विश्वास और अपराधी तत्त्वों में आवश्यक रूप से भय उत्पन्न करना होगा। (ग) पुलिस और सुरक्षाबलों का आधुनिकीकरण :- पुलिस और सुरक्षा बलों का आधुनिकीकरण किया जाना अत्यन्त आवश्यक है। आज की स्थिति यह है कि 'केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल' के जवान जिन सुरक्षा साधनों से युक्त होते हैं— वहीं आतंकवाली उनसे अधिक अति आधुनिक साधनों से सम्पन्न होते हैं। एक दूसरे का सामना करने में भारतीय जवान अपने को कहीं भी सक्षम नहीं पाते। इनकी पुलिस एवं सुरक्षा बल की सेवा-शर्तों में भी सुधार अपेक्षित है क्योंकि अपनी जान की बाजी लगाने वाले इन सुरक्षा प्रहरियों को अपने परिवार की सुरक्षा का भय भी बना रहता हैं। उनकी निष्ठाथें कहाँ तक समर्पित हो सकती हैं? अपने प्रशासनिक पद्धति में सुधार करना होगा तभी निपटा जा सकेगा आतंकवाद से। (घ) आतंकवाद के विरुद्ध शासन और जनता के बीच सहयोग :- राष्ट्र की समस्याओं का समाधान सिर्फ शासन नहीं खोज सकता है, हर चरण पर उन्हें जन

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri 314 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता सामान्य के सहयोग की आवश्यकता होती है। आतंकवाद से भी निपटने के लिए जन सहयोग बहुत सहयोगी प्रयास सिद्ध होगा। इसके लिए जन जागृति पैदा करनी होगी, उन्हें आतंकवादी घटनाओं के प्रति सिर्फ सहानुभूति प्रकट करना ही नहीं अपितु उनसे निपटने के लिए संघर्षशक्ति एवं इच्छा प्रकट करनी होगी। इसके लिए 'अखिल भारतीय शान्ति सेना' के गठन का सुझाव दिया जा रहा है, इस पर सही तरीके से ध्यान देने की आवश्यकता है। (ङ) सामाजिक स्तर पर कार्य :- इस प्रसंग में महत्त्वपूर्ण सुझाव यह हो सकता है कि आतंकवाद का जवाब आतंकवाद से देने पर इसका हल नहीं हो सकता है, अपितु इसमें कई गुना वृद्धि हो सकती है। 'आतंकवाद' समाज और देश की ही सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारणों से उत्पन्न 'मानसिक रोग' के रूप में होता है। केवल बल के प्रयोग के आधार पर इसको सुलझाया नहीं जा सकता है। इनके मूल कारणों को समझने के लिए सामाजिक संस्थाओं को अध्ययन करना होगा। विभिन्न समुदायों के बीच के भेदभाव को मिटाने के लिए प्रयत्न करना होगा। उनके अन्दर कमजोर पड़ गई भाई-चारे की भावना को पुनः जगाकर इसे मिटाने का प्रयास करना होगा। (च) संवैधानिक प्रावधानों के दुरुपयोग पर प्रभावी रोक :- पंजाब और जम्मू कश्मीर राज्य में जो स्थिति है उसका सबसे बड़ा कारण है कि कुछ परिस्थितियों में स्वयं केन्द्रीय सरकार ने संवैधानिक प्रावधानों, विशेषतया राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करने की व्यवस्था का दलगत हितों की दृष्टि से प्रयोग किया। 'सरकारिया आयोग' ने अपनी रिपोर्ट (नवम्बर १९३७) में अनुच्छेद ३५६ के आधार पर राष्ट्रपति शासन लागू करने की व्यवस्था का दुरुपयोग रोकने की आवश्यकता पर बल दिया है और इस सम्बन्ध में कुछ सुझाव दिये हैं; प्रथम राज्य में राष्ट्रपति शासन अन्तिम विकल्प के रूप में ही लागू होना चाहिए, जबकि राज्य का कामकाज संविधान में दी गई व्यवस्था के अनुसार चलना असम्भव हो जाये। राष्ट्रपति शासन लागू करने से पहले केन्द्र सरकार द्वारा सम्बन्धित राज्य को इस बारे में चेतावनी देकर स्पष्टीकरण माँगा जाना चाहिए और निर्णय लेते समय इस स्पष्टीकरण पर विचार करना चाहिए। द्वितीय, राष्ट्रपति शासन लागू करने के पीछे जो कारण हैं उन्हें स्पष्ट रूप से बतलाया जाना चाहिए। तथ्य यह है कि यदि अनुच्छेद ३५६ के दुरुपयोग को रोकने की प्रभावी व्यवस्था नहीं की गई तो आतंकवादी-तत्त्वों को शक्तिशाली होने के अवसर प्राप्त होते रहेंगे। (छ) आर्थिक-सामाजिक न्याय की प्राप्ति :- हमारे देश में अन्य देशों की भाँति बेरोजगारी और विशेषतया शिक्षित वर्ग में बेरोजगारी का व्याप्त होना ही आतंकवादी CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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दशम अध्याय 315

भावना को पनपने की पृष्ठभूमि तैयार करता है। बेरोजगारों को रुपये के लालच में आसानी से बरगलाया जा सकता हैं, उन्हें भटकते हुए देर नहीं लगती हैं। अतः शिक्षा को रोजगार से जोड़ा जाय और प्रतिवर्ष करोड़ों व्यक्तियों के लिए रोजगार जुटाये जायें। आर्थिक असमानता को समाप्त तो नहीं किया जा सकता, लेकिन उसे नियंत्रित करना होगा और आर्थिक-सामाजिक न्याय की दिशा में कदम बढ़ाने होंगे। (ज) शासन की प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करना :- पिछले लगभग २५ वर्षों में शासन, चाहे वह केन्द्रीय शासन हो या राज्य शासन, की प्रतिष्ठा का बहुत अधिक क्षय हुआ है। अतः शासन की प्रतिष्ठा को पुनर्स्थापित करना होगा और इस सम्बन्ध में कुछ सुझाव हैं :- प्रथम, भारतीय संविधान के निर्माताओं ने भारत में 'सहयोगी- संघवाद' की कल्पना की थी और आज इस 'सहयोगी-संघवाद' की नितान्त आवश्यकता अनुभव की जा रही है। इसमें राज्य व केन्द्र की सरकारें एक दूसरे की कठिनाइयों को समझें और एक दूसरे के साथ सहयोग करें। द्वितीय आज स्थिति यह है कि आतंकवादी तत्त्व केन्द्र सरकार पर भी दबाव डालने की कोशिश करते हैं और इसमें कई बार वे सफल भी हो जाते हैं। अधिक स्पष्ट रूप से यह स्थिति 'रूबैया प्रकरण' (१९८९) से सामने आई है। ऐसी घटनाएँ आतंकवादी तत्त्वों को बढ़ावा देने वाली होती हैं। किसी भी स्थिति में शासन को इन ताकतों के समक्ष आत्मसमर्पण नहीं करना चाहिए। राष्ट्रहित व्यक्तिगत हित से कहीं ऊँचा होता है। आवश्यकता अनुभव होने पर आतंकवाद के विरुद्ध भारी बल प्रयोग करना भी उचित है। इससे शासन की दृढ़बद्धता का प्रमाण मिलता है। दृढ़-प्रतिज्ञ शासन ही सभी प्रकार के आतंकवाद से निपट सकता है। (झ) पाकिस्तान के अनुचित हस्तक्षेप पर प्रतिबन्ध :- आतंकवाद का एक अति प्रमुख कारण पड़ोसी राज्य पाकिस्तान द्वारा भारत में आतंकवादियों को दिया जाने वाला भारी प्रोत्साहन है। सीमाओं के रास्ते से देश में प्रशिक्षित आतंकवादियों को अनाधिकार प्रविष्ट कराने की घटनायें, हमारे ही देश के कितने युवाओं का अपहरण कर उन्हें आतंकवाद के लिए बाध्य करना, यह सब आम बात हो गई है। इसके लिए सर्वप्रथम, तो पाकिस्तान से जुड़ी हुई सभी सीमाओं को सील कर देना चाहिए, तभी यह प्रवेश रोका जा सकता है। द्वितीय, हमें अपने इस पड़ोसी देश को समझाना होगा कि भारतीय मामलों में दखलंदाजी उसके लिए भयानक परिणामों को जन्म देगी। मैत्री के स्वर में कही गई बात को यदि पड़ोसी देश उचित महत्त्व नहीं देता है तो चेतावनी देनी होगी और नितान्त आवश्यक हो जाने पर उसे 'शक्ति की भाषा' में भी समझना होगा। इस प्रसंग में हमें अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आतंकवाद को प्रोत्साहित करने

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316 | वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता वाले इस देश के विरुद्ध जनमत जागृत करना होगा। यदि इस प्रसंग में भारत ने दृढ़ता का परिचय दिया तो वह इसको रोकने में सफल हो सकेगा। प्रथम : इसके अतिरिक्त भी कुछ सुझाव हैं कि जो वास्तविकता में बहुत ही पास है। आतंकवादियों में एक वर्ग ऐसा भी है जो कि परिस्थितिवश या केवल क्षणिक आवेश में या नासमझी के दौर में आतंकवाद से जुड़ गया है और सत्यता से परिचित होने पर भी उससे बाहर आने में अपने आपको असमर्थ पा रहा है। शासन और समाज की स्वयंसेवी संस्थाओं और कार्यकताओं का यह कर्तव्य है कि इनके साथ पूरी सद्भावना और सहानुभूति का परिचय देते हुए इन युवकों के शस्त्रों सहित आत्मसमर्पण की व्यवस्था की जाये और उनके पुनर्वास की पूरी व्यवस्था की जाये। द्वितीय : वनांचल, तैलंगाना और बोडोलैण्ड आदि भी भारतीय संघ में ही अलग राज्य के रूप में स्थापना की जो माँग और आन्दोलन कर रहे हैं, इनसे समय- समय पर आतंकवाद को जन्म मिला है। इसीलिए यह सुझाव प्रस्तावित है कि एक नवीन राज्य पुनर्गठन आयोग की स्थापना करके इन मामलों को विचारार्थ सौंप दिया जाना चाहिए। यह सुझाव गम्भीरता से विचारणीय है और सभी दलों की सहमति से ही किया जाना चाहिए। तृतीय : आतंकवाद केवल कानून और व्यवस्था का प्रश्न ही नहीं है, आतंकवाद एक राजनैतिक परिप्रेक्ष्य है, एक मनोवैज्ञानिक पक्ष है। केवल बल प्रयोग से कोई भी राजनैतिक या जटिल राष्ट्रीय समस्या का समाधान नहीं खोजा जा सकता है। बल प्रयोग भी विवेक और सद्भावना के साथ, साहस के समन्वय के साथ करना चाहिए। शासन द्वारा आतंकवादियों से बातचीत अवश्य ही की जानी चाहिए, शर्त केवल यह है कि बातचीत संविधान के दायरे में हो, बातचीत के लिए आगे आने वाले आतंकवादी तत्त्व आज की घड़ी और भविष्य में अपने आपको देश की एकता और अखण्डता के लिए प्रतिबद्ध घोषित करें और आतंकवाद का रास्ता छोड़ने की घोषणा करें।

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri सहायक ग्रन्थसूची १. ऋग्वेद चौखम्बा संस्कृत भवन, वाराणसी २. यजुर्वेद चौखम्बा संस्कृत भवन, वाराणसी ३. सामवेद चौखम्बा संस्कृत भवन, वाराणसी ४. अथर्ववेद चौखम्बा संस्कृत भवन, वाराणसी ५. शतपथ ब्राह्मण चौखम्बा संस्कृत भवन, वाराणसी ६. ईशादि नौ उपनिषद् गीताप्रेस, गोरखपुर ७. छान्दोग्योपनिषद् गीताप्रेस, गोरखपुर ८. बृहदारण्यकोपनिषद् गीताप्रेस, गोरखपुर ९. पातञ्जल योगदर्शन स्वामी श्री ब्रह्मलीन मुनि १०. कौटिलीय अर्थशास्त्र टीका वाचस्पति गैरोला १२. श्रीमद्भागवतम् गीताप्रेस, गोरखपुर १३. वाल्मीकिरामायणम् गीताप्रेस, गोरखपुर १४. ऋग्वेदभाष्यभूमिका वाराणसी १५. निरुक्तम् वाराणसी १६. कौषीतकिब्राह्मणआचारविचाराः डॉ० मंगल देव शास्त्री १७. वेदान्त परिभाषा डॉ० गजाननन शास्त्री मुसलगाँवकर १८. सर्वदर्शन संग्रह डॉ० उमाशङ्कर शर्मा १९. ब्रह्मसूत्र शाङ्करभाष्य, स्वामी श्री हनुमानदास षटशास्त्री २०. महाभारत गीताप्रेस, गोरखपुर २१. अष्टादशपुराणदर्पण ज्वालाप्रसाद मिश्र २२. पुराणातत्त्वमीमांसा श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी २३. आर्यसंस्कृति के आधार ग्रन्थ पं० बलदेव उपाध्याय २४. वैदिक साहित्य और संस्कृति पं० बलदेव उपाध्याय २५. धर्म औव समाज डॉ० एस० राधाकृष्णन २६. धर्मशास्त्र का इतिहास पी०वी० काणे CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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318 वैदिक वाङ्मय में राष्ट्रीय एकता एवं अखण्डता २७. सनातन धर्मालोक श्रीदीनानाथ शास्त्री २८. प्राचीन भारतीय साहित्य की सांस्कृतिक भूमिका डॉ० राम जी उपाध्याय २९. भारतस्य सांस्कृतिक निधिः डॉ० राम जी उपाध्याय ३०. प्राचीन भारत की विभूतियाँ राधा कुमुद मुकर्जी ३१. प्राचीन भारतीय संस्कृति कला राजनीति और धर्मदर्शन डॉ० ईश्वरी प्रसाद ३२. भारतीय संस्कृति और समाज पं० शम्भू रत्न त्रिपाठी ३३. भारतीय साहित्य और संस्कृति डॉ० हरिदत्त शास्त्री ३४. मानविकी परिभाषिक कोश डॉ० बी०एस० नर्वणे ३५. वैदिक विश्वदर्शन पं० हरिशंकर जोशी ३६. वैदिक राज व्यवस्था डॉ० शमामलाल पाण्डेय ३७. वर्ण व्यवस्था महात्मा गाँधी ३८. हिन्दू धर्मकोश डॉ० राजबली पाण्डेय ३९. हिन्दू संस्कार डॉ० राजबली पाण्डेय ४०. हिन्दू परिवार मीमांसा हरिदत्त विद्यालङ्कार ४१. ऐतरेय ब्राह्मण आसे द्वारा सम्पादित ४२. धर्म और दर्शन देवेन्द्र मुनि ४३. संस्कृति के चार अध्याय श्रीरामधारी सिंह दिनकर ४४. भारतीय संस्कृति शिवदत्त ज्ञानी ४५. भारतीय दर्शन श्री उमेश मिश्र ४६. वैदिक साहित्य की रूपरेखा. श्री हंसराज अग्रवाल ४७. भारतीय प्रज्ञा मोनियर विलियम्स अनुवादक ४८. पुरुषार्थ डॉ० भगवान दास ४९. वेदार्थ चन्द्रिका डॉ० मुशीराम शर्मा ५०. वैदिक वाङ्मय का इतिहास श्री रमाकान्त शास्त्री ५१. वैदिक योगसूत्र श्री हरिशंकर जोशी ५२. वैदिक एवं वेदोत्तर भारतीय

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri सहायक ग्रन्थसूची 319 संस्कृति श्री गंगाधर मिश्र ५३. वैदिक साहित्य का इतिहास डॉ० पारसनाथ द्विवेदी ५४. ऋग्वेद प्रातिशाख्य डॉ० वीरेन्द्र कुमार वर्मा ५५. वैदिक साहित्य और संस्कृति श्री वाचस्पति गैरोला ५६. भारतीय चिन्तन की परम्परा में नवीन संभावनाएं श्री राधेश्याम धर द्विवेदी ५७. भारतीय विचार दर्शन श्री हरिनाथ त्रिपाठी ५८. साम विधान ब्राह्मण सायण ५९. वेदान्त कल्पलता महर्षि देवराज ६०. भारतीय संस्कृति और साधना म०म० गोपीनाथ कविराज ६१. आत्मबोध स्वामी अखण्डानन्द ६२. साधना और ब्रह्मानुभूति स्वामी अखण्डानन्द ६३. ऐतरेय ब्राह्मण वाराणसी ६४. मानवता की ओर महेशानन्द गिरि ६५. प्राचीन भारतीय लोकधर्म डॉ० वासुदेव शरण अग्रवाल ६६. उपनिषत्कालीन समाज एवं संस्कृति राजेन्द्र कुमार त्रिवेदी ६७. ऋग्वेद में सांस्कृतिक तत्त्व राजक्षत्र मिश्र ६८. वेदमीमांसा आचार्य लक्ष्मीदत्त दीक्षित ६९. वैदिक ऋषि एक परिशीलन कपिल देव शास्त्री ७०. संस्कृत साहित्य का इतिहास पं० बलदेव उपाध्याय ७१. संस्कृत साहित्य का इतिहास डॉ० कपिलदेव द्विवेदी ७२. संस्कृत साहित्य का इतिहास वाचस्पति गैरोला ७३. भारतीय दर्शन पं० बलदेव उपाध्याय ७४. वैदिक साहित्य और संस्कृति आचार्य बलदेव उपाध्याय, शारदा संस्थान, दुर्गाकुण्ड, वाराणसी। R14,MIS-V 181321 [गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय 181321] CC-0. Gurukul Kangri Collection. Haridwar

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Digitized by Arya Samaj Foundation Chennai and eGangotri पुस्तकालय गुरुकुल काँगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार वर्ग संख्या 14 मिश्रा-वै आगत संख्या 181321 पुस्तक विवरण की तिथि नीचे अंकित है। इस तिथि सहित 30वें दिन यह पुस्तक पुस्तकालय में वापस आ जानी चाहिए अन्यथा 50पैसे प्रतिदिन के हिसाब से विलम्ब शुल्क लगेगा । CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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लेखक-परिचय डा. भास्कर मिश्र का जन्म राजस्थान की राजधानी जयपुर में हुआ। आप देश के प्रतिष्ठित, मूर्धन्य विद्वान् डा. मण्डन मिश्र के ज्येष्ठ पुत्र हैं। आपने साहित्याचार्य, एम. ए. (संस्कृत), एम.एड्., विद्यावारिधि, डी. लिट्. उपाधियाँ प्राप्त कीं। डा. मिश्र ने हरियाणा संस्कृत विद्यापीठ, बघोला (हरियाणा) में प्राध्यापक के रूप में अध्यापन कार्य प्रारम्भ किया तथा श्री रणवीर केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ, जम्मू में प्रशिक्षण विभागाध्यक्ष का दायित्व निर्वहण करते हुए वर्तमान में आप श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रिय संस्कृत विद्यापीठ, नई दिल्ली में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान संकाय में प्रोफेसर के पद पर प्रतिष्ठित हैं। अध्यापन के साथ अनुसंधान के क्षेत्र में आपका सराहनीय योगदान है। आपने विश्व संस्कृत सम्मेलन, नई दिल्ली, वर्ष 2001 में आयोजित शिक्षा-सत्र का संयोजन किया। आपने अनेक उच्च कोटि के ग्रन्थों का प्रणयन किया है। आप द्वारा विरचित ग्रन्थ एक नवीन एवं आधुनिक विश्लेष्णात्मक दृष्टि का सूत्रपात करते हैं। ग्रन्थ सूची : चतुर्भुजमिश्रविरचितरसकल्पद्रुम का समीक्षात्मक सम्पादन और भाषानुवाद, वैदिक शिक्षा मीमांसा, विद्यालय प्रशासन, शिक्षा एवं संस्कृति - नए संदर्भ, शिक्षक और समाज। CC-0. Gurukul Kangri Collection, Haridwar

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