वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| २२४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५१ |
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| पुलस्त्य उवाच<br>एवं वादिनि विप्रेन्द्र पार्वती भिक्षुमब्रवीत्।<br>मा मैवं वद भिक्षो त्वं हरः सर्वगुणाधिकः॥ ६५<br><br>शिवो वाप्यथवा भीमः सधनो निर्धनोऽपि वा।<br>अलङ्कृतो वा देवेशस्तथा वाप्यनलङ्कृतः॥ ६६<br><br>यादृशस्तादृशो वापि स मे नाथो भविष्यति।<br>निवार्यतामयं भिक्षुर्विवक्षुः स्फुरिताधरः।<br>न तथा निन्दकः पापी यथा शृण्वञ्शशिप्रभे॥ ६७ | पुलस्त्यजी बोले— विप्रेन्द्र! भिक्षुकके इस प्रकार कहनेपर पार्वती ने उससे कहा—भिक्षुक! तुम ऐसी बात मत बोलो। शङ्कर सब गुणोंमें श्रेष्ठ हैं। वे देवेश चाहे मङ्गलमूर्ति हों या भयङ्कर रूप, धनी हों या निर्धन तथा अलङ्कार-सम्पन्न हों अथवा अलङ्कार-विहीन—वे जैसे-तैसे ही क्यों न हों—पर वे ही मेरे स्वामी होंगे। (सहचरीको निर्देश कर) शशिप्रभे! इसे (भिक्षुकको) मना करो। यह पुनः कुछ कहना चाहता है; क्योंकि इसके ओठ फड़क रहे हैं। देखो, निन्दा करनेवाला व्यक्ति वैसा पापी नहीं होता जैसा कि निन्दाकी बात सुननेवाला होता है॥ ६५—६७॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्त्वा वरदा समुत्थातुमथैच्छत।<br>ततोऽत्यजद् भिक्षुरूपं स्वरूपस्थोऽभवच्छिवः॥ ६८<br><br>भूत्वोवाच प्रिये गच्छ स्वमेव भवनं पितुः।<br>तवार्थाय प्रहेष्यामि महर्षीन् हिमवद्गृहे॥ ६९<br><br>यच्चेह रुद्रमीहन्त्या मृण्मयश्चेश्वरः कृतः।<br>असौ भद्रेश्वरैत्येवं ख्यातो लोके भविष्यति॥ ७०<br><br>देवदानवगन्धर्वा यक्षाः किंपुरुषोरगाः।<br>पूजयिष्यन्ति सततं मानवाश्च शुभेप्सवः॥ ७१ | पुलस्त्यजी (पुनः) बोले— इस प्रकार कहकर वरदायिनी पार्वती ने (ज्यों ही) वहाँ से उठकर जाना चाहा त्यों ही शङ्कर (बनावटी) भिक्षुरूपको छोड़कर अपने वास्तविक रूपमें हो गये। वे अपने वास्तविक रूपमें आनेपर बोले—प्रिये! अपने गृह जाओ। मैं हिमवान् के घर तुम्हारे लिये महर्षियोंको भेजूँगा। रुद्रकी कामना करनेवाली तुमने यहाँ जिन पार्थिव रूपको ईश्वर माना है, वे संसारमें भद्रेश्वर नामसे प्रसिद्ध होंगे। देव, दानव, गन्धर्व, यक्ष, किन्नर, उरग एवं मनुष्य जो भी कल्याणकी कामना करनेवाले होंगे, वे सदा उनकी पूजा करेंगे॥ ६८—७१॥ | | इत्येवमुक्ता देवेन गिरिराजसुता मुने।<br>जगामाम्बरमाविश्य स्वमेव भवनं पितुः॥ ७२<br>शङ्करोऽपि महातेजा विसृज्य गिरिकन्यकाम्।<br>पृथूदकं जगामाथ स्नानं चक्रे विधानतः॥ ७३<br>ततस्तु देवप्रवरो महेश्वरः<br>पृथूदके स्नानमपास्तकल्मषः।<br>कृत्वा सनन्दिः सगणः सवाहनो<br>महागिरिं मन्दरमाजगाम्॥ ७४<br>आयाति त्रिपुरान्तके सह गणैर्ब्रह्मर्षिभिः सप्तभि-<br>रारोहत्पुलको बभौ गिरिवरः संहृष्टचित्तः क्षणात्।<br>चक्रे दिव्यफलैर्जलैन शुचिना मूलैश्च कन्दादिभिः<br>पूजां सर्वगणेश्वरैः सह विभोरद्रिस्त्रिनेत्रस्य तु॥ ७५ | मुने! शङ्करके इस प्रकार कहनेपर हिमालय-पुत्री पार्वतीजी आकाशमार्गसे अपने पिताके घर चली गयीं। महातेजस्वी शङ्कर भी पर्वतराजकी कन्याको विदाकर पृथूदक नामके तीर्थमें चले गये और वहाँ जाकर उन्होंने यथाविधि स्नान किया। उसके बाद देवोंमें प्रधान महेश्वर पृथूदकतीर्थमें स्नान करके पापसे विमुक्त होकर नन्दी, गणों एवं वाहनके सहित महान् मन्दर गिरिपर आ गये। सात ब्रह्मर्षियों (सप्तर्षियों) तथा अपने गणोंके साथ त्रिपुरासुरको मारनेवाले शङ्करके आ जानेपर पर्वतश्रेष्ठ मन्दर क्षणभरमें ही प्रसन्नचित्त हो गया। पर्वतराजने दिव्य फलों, मूलों, कन्दों एवं पवित्र जलसे समस्त गणेश्वरोंके साथ भगवान् शङ्करकी पूजा की॥ ७२–७५॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें इक्यावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५१॥
५४- भगवान् शिवके लिये मन्दरपर विश्वकर्माद्वारा गृहनिर्माण, शिवका यज्ञकर्म करना, पार्वतीकी तपस्यासे ब्रह्माका वर देना, कौशिकीकी स्थापना, शिवके प्राङ्गणमें अग्नि-प्रवेश, देवोंकी प्रार्थना आदि और गजाननकी उत्पत्ति
अध्याय ५२ ] शिवजीका महर्षियोंको स्मृतकर उन्हें हिमवान्के यहाँ भेजना [ २२५
बावनवाँ अध्याय
शिवजीका महर्षियोंको स्मृतकर उन्हें हिमवान्के यहाँ भेजना, महर्षियोंका हिमवान्से शिवके लिये उमाकी याचना, हिमालयकी स्वीकृति और सप्तर्षियोंद्वारा शिवको स्वीकृति-सूचना
| पुलस्त्य उवाच<br>ततः सम्पूजितो रुद्रः शैलेन प्रीतिमानभूत्।<br>सस्मार च महर्षींस्तु अरुन्धत्या समं ततः॥ १<br>ते संस्मृतास्तु ऋषयः शङ्करेण महात्मना।<br>समाजग्मुर्महाशैलं मन्दरं चारुकन्दरम्॥ २<br>तानागतान् समीक्ष्यैव देवस्त्रिपुरनाशनः।<br>अभ्युत्थायाभिपूज्यैतानिदं वचनमब्रवीत्॥ ३<br>धन्योऽयं पर्वतश्रेष्ठः श्लाघ्यः पूज्यश्च दैवतैः।<br>धूतपापस्तथा जातो भवतां पादपङ्कजैः॥ ४<br>स्थीयतां विस्तृते रम्ये गिरिप्रस्थे समे शुभे।<br>शिलासु पद्मवर्णासु श्लक्ष्णासु च मृदुष्वपि॥ ५ | पुलस्त्यजी बोले— उसके बाद पर्वतद्वारा सम्यक् रूपसे पूजित होकर भगवान् रुद्र बहुत प्रसन्न हुए। उसके बाद शङ्करने अरुन्धतीसहित सप्त महर्षियोंका स्मरण किया। महात्मा शङ्करके द्वारा स्मृत किये गये वे ऋषिगण सुन्दर कन्दराओंवाले महान् शैल मन्दरपर आ गये। उन (ऋषियों)-को आये हुए देखकर त्रिपुरासुरका नाश करनेवाले महादेवने अभ्युत्थानकर उनका पूजन किया; फिर यह वचन कहा—प्रभो! यह पर्वतश्रेष्ठ देवताओंद्वारा प्रशंसनीय एवं पूजनीय होनेसे धन्य है, (और आज यह) आपके चरण-कमलोंकी अनुकम्पासे निष्पाप हो गया। अब आप-लोग इस विस्तृत, सम, रम्य तथा शुभ पर्वतशिखरपर बैठें। इसकी शिला कमल-वर्णकी तथा चिकनी एवं कोमल है॥ १–५॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्ता देवेन शङ्करेण महर्षयः।<br>सममेव त्वरुन्धत्या विविशुः शैलसानुनि॥ ६<br>उपविष्टेषु ऋषिषु नन्दी देवगणाग्रणीः।<br>अर्घ्यादिना समभ्यर्च्य स्थितः प्रयतमानसः॥ ७<br>ततोऽब्रवीत् सुरपतिर्धर्म्यं वाक्यं हितं सुरान्।<br>आत्मनो यशसो वृद्ध्यै सप्तर्षीन् विनयान्वितान्॥ ८ | पुलस्त्यजी (फिर) बोले— भगवान् शङ्करके द्वारा इस प्रकार कहे जानेपर महर्षिगण अरुन्धतीके साथ शैलशिखरपर बैठ गये। ऋषियोंके बैठ जानेपर देवताओंमें अग्रणी तथा संयत-चित्तवाले नन्दी अर्घ्य आदिसे उनकी पूजा कर खड़े हो गये। उसके बाद सुरपालक शिवने विनयसे युक्त सप्तर्षियोंसे अपने यशकी वृद्धि तथा देवताओंके कल्याणके लिये धर्मसे युक्त वचन कहा—॥ ६–८॥ | | हर उवाच<br>कश्यपात्रे वारुणेय गाधेय शृणु गौतम।<br>भरद्वाज शृणुष्व त्वमङ्गिरस्त्वं शृणुष्व च॥ ९<br>ममासीद् दक्षतनुजा प्रिया सा दक्षकोपततः।<br>उत्ससर्ज सती प्राणान् योगदृष्ट्या पुरा किल॥ १०<br>साऽद्य भूयः समुद्भूता शैलराजसुता उमा।<br>सा मदर्थाय शैलेन्द्रो याच्यतां द्विजसत्तमाः॥ ११ | शङ्करजीने कहा— कश्यप! अत्रि! वसिष्ठ! विश्वामित्र! गौतम! भरद्वाज! अङ्गिरा! आप सभी लोग सुनें—प्राचीन कालमें दक्षकी आत्मजा सती मेरी प्रिया थीं। उसने दक्षके ऊपर कुपित होकर योगदृष्टिसे अपने प्राणोंका त्याग कर दिया। वही आज फिर उमा नामसे गिरिराज हिमालयकी कन्या हुई है। द्विजसत्तमो! आपलोग मेरे लिये पर्वतराजसे उसकी याचना करें॥ ९–११॥ |
| श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५२ ] |
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| २२६ |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| पुलस्त्य उवाच<br>सप्तर्षयस्त्वेवमुक्ता बाढमित्यब्रुवन् वचः।<br>ॐ नमः शङ्करायेति प्रोक्त्वा जग्मुर्हिमालयम्॥ १२<br>ततोऽप्यरुन्धतीं शर्वः प्राह गच्छस्व सुन्दरि।<br>पुरन्ध्रयो हि पुरन्ध्रीणां गतिं धर्मस्य वै विदुः॥ १३<br>इत्येवमुक्ता दुर्लङ्घ्यं लोकाचारं त्वरुन्धती।<br>नमस्ते रुद्र इत्युक्त्वा जगाम पतिना सह॥ १४<br>गत्वा हिमाद्रिशिखरमोषधिप्रस्थमेव च।<br>ददृशुः शैलराजस्य पुरीं सुरपुरीमिव॥ १५ | पुलस्त्यजी बोले— शङ्करजीके ऐसा कहनेपर सप्तर्षियोंने 'बहुत अच्छा'—यह वचन कहा एवं 'ॐ नमः शङ्कराय' कहकर वे हिमालयके यहाँ गये। उसके पश्चात् शङ्करने अरुन्धतीसे कहा—'सुन्दरि! तुम भी जाओ। स्त्रियोंके धर्मकी गति स्त्रियाँ ही जानती हैं।' शङ्करके इस प्रकार कहनेपर लोकाचारको दुर्लङ्घ्य प्रतिपादित करनेवाली अरुन्धती अपने पतिके साथ 'नमस्ते रुद्र' ऐसा कहकर हिमालयपर गयीं। उन लोगोंने ओषधियोंसे भरे हिमालयकी चोटीपर जाकर सुरपुरीके समान हिमालयकी पुरीको देखा॥ १२—१५॥ |
| ततः सम्पूज्यमानास्ते शैलयोषिद्भििरादरात्।<br>सुनाभादिभिरव्यग्रैः पूज्यमानास्तु पर्वतैः॥ १६<br>गन्धर्वैः किन्नरैर्यक्षैस्तथान्यैस्तत्पुरस्सरैः।<br>विविशुर्भवनं रम्यं हिमाद्रेर्हाटकोज्ज्वलम्॥ १७<br>ततः सर्वे महात्मानस्तपसा धौतकल्मषाः।<br>समासाद्य महाद्वारं संतस्थुर्द्वाःस्थकारणात्॥ १८<br>ततस्तु त्वरितोऽभ्यागाद् द्वाःस्थोऽद्रिर्गन्धमादनः।<br>धारयन् वै करे दण्डं पद्मरागमयं महत्॥ १९ | उसके बाद वे पर्वतोंकी पत्नियों, शान्तचित्त-वाले सुनाभादि पर्वतों, गन्धर्वों, किंनरों, यक्षों एवं अन्य दूसरोंसे भी पूजित (सम्मानित) होकर स्वर्णकी भाँति प्रकाशमान हिमालयके सुन्दर भवनमें प्रविष्ट हुए। फिर तपस्या करनेसे निष्पाप हुए वे सभी महात्मा महाद्वारपर जाकर द्वारपालके निकट रुक गये। उसके बाद द्वारपर स्थित गन्धमादन पर्वत पद्मरागके बने विशाल दण्डको हाथमें धारण किये हुए शीघ्र उनके पास गया॥ १६—१९॥ |
| ततस्तमूचुर्मुनयो गत्वा शैलपतिं शुभम्।<br>निवेदयास्मान् सम्प्राप्तान् महत्कार्यार्थिनो वयम्॥ २० | उसके बाद मुनियोंने उससे कहा—द्वारपाल! तुम श्रीमान् शैलपतिसे जाकर यह शुभ समाचार निवेदित करो कि हम सब विशेष कार्यके लिये यहाँ आये हैं। |
| इत्येवमुक्तः शैलेन्द्रो ऋषिभिर्गन्धमादनः।<br>जगाम तत्र यत्रास्ते शैलराजो द्रिभिर्वृतः॥ २१<br>निषण्णो भुवि जानुभ्यां दत्त्वा हस्तौ मुखे गिरिः।<br>दण्डं निक्षिप्य कक्षायामिदं वचनमब्रवीत्॥ २२ | ऋषियोंके ऐसा कहनेपर शैलेन्द्र गन्धमादन पर्वतोंसे घिरे हुए शैलराजके पास गया और पृथ्वीपर घुटनोंके बल बैठ गया। फिर दण्डको काँखमें दबाकर एवं दोनों हाथ मुखके निकट ले जाकर उसने यह वचन कहा—॥ २०—२२॥ |
| गन्धमादन उवाच<br>इमे हि ऋषयः प्राप्ताः शैलराज तवार्थिनः।<br>द्वारे स्थिताः कार्यिणस्ते तव दर्शनलालसाः॥ २३ | गन्धमादनने कहा— शैलराज ! ये ऋषिगण किसी कार्यकी याचनाके हेतु आपसे भेंट करनेकी इच्छावाले होकर आये हैं और द्वारपर स्थित हैं॥ २३॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>द्वाःस्थवाक्यं समाकर्ण्य समुत्थायाचलेश्वरः।<br>स्वयमभ्यागमद् द्वारि समादायार्घ्यमुत्तमम्॥ २४ | पुलस्त्यजी बोले— द्वारपालकी बात सुननेके बाद पर्वतराज उठकर स्वयं उत्तम अर्घ्य लेकर द्वारपर आये। |
| तानर्च्यार्घ्यादिना शैलः समानीय सभातलम्।<br>उवाच वाक्यं वाक्यज्ञः कृतासनपरिग्रहान्॥ २५ | अर्घ्य आदिसे उन ऋषियोंका अर्चन करनेके बाद उन्हें सभा-स्थानमें लिवा लाये। फिर उनके यथायोग्य आसन ग्रहण कर लेनेपर वक्ताके अभिप्रायको स्पष्टतः समझनेवाले शैलराजने उन ऋषियोंसे यह वाक्य कहा—॥ २४-२५॥ |
| अध्याय ५२ ] | शिवजीका महर्षियोंको स्मृतकर उन्हें हिमवान्के यहाँ भेजना | २२७ |
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| हिमवानुवाच<br>अनभ्रवृष्टिः किमियमुताहो कुसुमं फलम्।<br>अप्रतर्क्यमचिन्त्यं च भवदागमनं त्विदम्॥ २६<br><br>अद्यप्रभृति धन्योऽस्मि शैलरादद्य सत्तमाः।<br>संशुद्धदेहोऽस्म्यद्यैव यद् भवन्तो ममाजिरम्॥ २७<br><br>आत्मसंसर्गसंशुद्धं कृतवन्तो द्विजोत्तमाः।<br>दृष्टिपूतं पदाक्रान्तं तीर्थे सारस्वतं यथा॥ २८<br><br>दासोऽहं भवतां विप्राः कृतपुण्यश्च साम्प्रतम्।<br>येनार्थिनो हि ते यूयं तन्ममाज्ञातुमर्हथ॥ २९<br><br>सदारोऽहं समं पुत्रैर्भृत्यैर्नप्तृभिरव्ययाः।<br>किंकरोऽस्मि स्थितो युष्मदाज्ञाकारी तदुच्यताम्॥ ३० | हिमवान्ने कहा— [ऋषियो! मेरे लिये] आपलोगोंका यहाँ पधारना ऐसा ही है जैसे बिना बादलकी वृष्टि तथा बिना फूलके फलका उद्गम; यह अतर्क्य एवं अचिन्त्य है। परमपूज्यो! आजसे मैं धन्य हो गया। आज ही मैं (अन्वर्थक) शैलराज हुआ। आज ही मेरा शरीर शुद्ध हुआ; क्योंकि आपलोगोंने आज मेरे आँगनको पवित्र किया है। द्विजोत्तमो! जिस प्रकार सारस्वततीर्थका जल पवित्र कर देता है, उसी प्रकार आपलोगोंने चरण रखकर तथा अपनी पवित्र दृष्टिसे देखकर हमें पवित्र कर दिया है। ब्राह्मणो! मैं आपलोगोंका दास हूँ। इस समय मैं पुण्यवान् हुआ हूँ। जिस उद्देश्यसे आपलोग अर्थी—याचना करनेवाले—हुए हैं, उसके लिये मुझे आज्ञा दें। महर्षियो! मैं स्त्री, पुत्र, नाती और भृत्योंके साथ आपका आज्ञाकारी सेवक हूँ; अतः आदेश दीजिये॥ २६—३०॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>शैलराजवचः श्रुत्वा ऋषयः संशितव्रताः।<br>ऊचुरङ्गिरसं वृद्धं कार्यमद्रौ निवेदय॥ ३१<br><br>इत्येवं चोदितः सर्वैर्ऋषिभिः कश्यपादिभिः।<br>प्रत्युवाच परं वाक्यं गिरिराजं तमङ्गिराः॥ ३२ | पुलस्त्यजी बोले— गिरिराजकी बात सुनकर प्रशस्तव्रती ऋषियोंने वृद्ध अङ्गिरामुनिसे कहा—(मुने!) आप हिमवान्को कार्यका निवेदन करें। इस प्रकार कश्यप आदि ऋषियोंसे प्रेरणा प्राप्तकर अङ्गिरामुनि उन गिरिराज हिमालयसे (उनके अनुरोधके उत्तरमें) यह श्रेष्ठ वचन बोले—॥ ३१-३२॥ | | अङ्गिरा उवाच<br>श्रूयतां पर्वतश्रेष्ठ येन कार्येण वै वयम्।<br>समागतास्त्वत्सदनमरुन्धत्या समं गिरे॥ ३३<br>योऽसौ महात्मा सर्वात्मा दक्षयज्ञक्षयङ्करः।<br>शङ्करः शूलधृक् शर्वस्त्रिनेत्रो वृषवाहनः॥ ३४<br>जीमूतकेतुः शत्रुघ्नो यज्ञभोक्ता स्वयं प्रभुः।<br>यमीश्वरं वदन्त्येके शिवं स्थाणुं भवं हरम्॥ ३५<br>भीममुग्रं महेशानं महादेवं पशोः पतिम्।<br>वयं तेन प्रेषिताः स्मस्त्वत्सकाशं गिरीश्वर॥ ३६ | अङ्गिराने कहा— पर्वतराज! हमलोग अरुन्धतीके साथ आपके घर जिस कार्यके लिये आये हैं, उसे (आप) सुनें। गिरीश्वर! जिन महात्मा सर्वात्मा, दक्षयज्ञके विनाशक, शूलधारी, शर्व, त्रिनेत्र, वृषवाहन, जीमूतकेतु, शत्रुघ्न, यज्ञभोक्ता, स्वयंप्रभु शङ्कर ईश्वरको कुछ लोग शिव, स्थाणु, भव, हर, भीम, उग्र, महेशान, महादेव एवं पशुपति कहते हैं, उन्होंने ही हमलोगोंको आपके पास भेजा है॥ ३३—३६॥ | | इयं या त्वत्सुता काली सर्वलोकेषु सुन्दरी।<br>तां प्रार्थयति देवेशस्तां भवान् दातुमर्हति॥ ३७<br><br>स एव धन्यो हि पिता यस्य पुत्री शुभं पतिम्।<br>रूपाभिजनसम्पत्त्या प्राप्नोति गिरिसत्तम॥ ३८<br><br>यावन्तो जङ्गमागम्या भूताः शैल चतुर्विधाः।<br>तेषां माता त्वियं देवी यतः प्रोक्तः पिता हरः॥ ३९ | (बात यह है कि) आपकी यह ‘काली’ कन्या समस्त लोकोंमें सुन्दर है। इसके लिये देवेश (भगवान्शङ्कर) प्रार्थना कर रहे हैं। आपको उन्हें उसका दान दे देना चाहिये। गिरिसत्तम! वही पिता धन्य है जिसकी पुत्री रूपवान्, निष्कलङ्क, कुलीन और श्रीमान् शुभ पतिको प्राप्त करती है। शैल! ये देवी चार प्रकारके जितने जड-जङ्गम प्राणी हैं उनकी माता (हो जाती) हैं; क्योंकि |
| २२८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५२ | | :--- | :--- |
| प्रणम्य शङ्करं देवाः प्रणमन्तु सुतां तव।<br>कुरुष्व पादं शत्रूणां मूर्ध्नि भस्मपरिप्लुतम्॥ ४०<br><br>याचितारो वयं शर्वो वरो दाता त्वमप्युमा।<br>वधूः सर्वजगन्माता कुरु यच्छ्रेयसे तव॥ ४१ | शङ्करजी सबके पिता कहे गये हैं। (हम सबका निवेदन है कि) समस्त देवता शङ्करको प्रणामकर तुम्हारी पुत्रीको भी प्रणाम करें; इसलिये इसे समर्पित कर दें। (और इस प्रकार आप) अपने शत्रुओंके सिरपर अपना भस्मयुक्त चरण रखें (शत्रुओंको विजित करें)। हमलोग याचना करनेवाले हैं, शङ्कर वर हैं, आप दाता हैं और समस्त संसारकी जननी उमा वधू हैं। आपको जो कल्याणकारी जँचे, उसे करें॥ ३७—४१॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>तद्वचोऽङ्गिरसः श्रुत्वा काली तस्थावधोमुखी।<br>हर्षमागत्य सहसा पुनर्दैन्यमुपागता॥ ४२<br>ततः शैलपतिः प्राह पर्वतं गन्धमादनम्।<br>गच्छ शैलानुपामन्त्र्य सर्वानागन्तुमर्हसि॥ ४३<br>ततः शीघ्रतरः शैलो गृहाद् गृहमगाज्जवी।<br>मेर्वादीन् पर्वतश्रेष्ठ्रानाजुहाव समन्ततः॥ ४४<br>तेऽप्यावजग्मुस्त्वरावन्तः कार्यं मत्वा महत्तदा।<br>विविशुर्विस्मयाविष्टाः सौवर्णेष्वासनेषु ते॥ ४५ | पुलस्त्यजी बोले— अङ्गिराकी वह वाणी सुनकर कालीने (लज्जासे) अपना मुख नीचे झुका लिया। सहसा वे प्रसन्न होकर पुनः उदास हो गयीं। उसके बाद गिरिराजने गन्धमादन पर्वतसे कहा— (गन्धमादन!) जाओ! सभी पर्वतोंको आनेके लिये आमन्त्रित कर आओ। उसके पश्चात् वेगशाली पर्वत (गन्धमादन)ने चारों ओर शीघ्रतापूर्वक घर-घर जाकर मेरु आदि सभी श्रेष्ठ पर्वतोंको आनेके लिये निमन्त्रण दे दिया। वे सभी पर्वत भी कार्यकी महत्ता समझकर शीघ्रतासे आ गये और सुवर्णमय आसनोंपर उत्सुकतापूर्वक बैठ गये॥ ४२—४५॥ | | उदयो हेमकूटश्च रम्यको मन्दरस्तथा।<br>उद्दालको वारुणश्च वराहो गरुडासनः॥ ४६<br>शक्तिमान् वेगसानुश्च दृढशृङ्गोऽथ शृङ्गवान्।<br>चित्रकूटस्त्रिकूटश्च तथा मन्दरकाचलः॥ ४७<br>विन्ध्यश्च मलयश्चैव पारियात्रोऽथ दुर्दरः।<br>कैलासाद्रिर्महेन्द्रश्च निषधोऽञ्जनपर्वतः॥ ४८<br>एते प्रधाना गिरयस्तथाऽन्ये क्षुद्रपर्वताः।<br>उपविष्टाः सभायां वै प्रणिपत्य ऋषींश्च तान्॥ ४९ | उदय, हेमकूट, रम्यक, मन्दर, उद्दालक, वारुण, वराह, गरुडासन, शक्तिमान्, वेगसानु, दृढशृङ्ग, शृङ्गवान्, चित्रकूट, त्रिकूट, मन्दरकाचल, विन्ध्य, मलय, पारियात्र, दुर्दर, कैलास, महेन्द्र, निषध, अञ्जन—ये सभी प्रमुख पर्वत तथा छोटे-छोटे अन्य पर्वत उन ऋषियोंको प्रणाम कर सभामें बैठ गये॥ ४६—४९॥ | | ततो गिरीशः स्वां भार्यां मेनामाहूतवांश्च सः।<br>समागच्छत कल्याणी समं पुत्रेण भामिनी॥ ५०<br>साऽभिवन्द्य ऋषीणां हि चरणांश्च तपस्विनी।<br>सर्वाञ् ज्ञातीन् समाभाष्य विवेश ससुता ततः॥ ५१<br>ततोऽद्रिषु महाशैल उपविष्टेषु नारद।<br>उवाच वाक्यं वाक्यज्ञः सर्वानाभाष्य सुस्वरम्॥ ५२ | उसके पश्चात् उन गिरीशने अपनी भार्या मेनाको बुलाया। (वे) कल्याणी भामिनी अपने पुत्रके साथ आयीं और तब उन साध्वीने ऋषियोंके चरणोंमें प्रणाम किया एवं समस्त ज्ञातियोंसे अनुज्ञा लेकर वे पुत्रके साथ बैठ गयीं। नारदजी! उसके बाद सभी पर्वतोंके भी बैठ जानेपर उनकी अनुमति लेकर उक्ति के अभिप्रायके विज्ञाता महाशैलने मधुर वचन कहा—॥ ५०—५२॥ | | हिमवानुवाच<br>इमे सप्तर्षयः पुण्या याचितारः सुतां मम।<br>महेश्र्वरार्थं कन्यां तु तच्चावेद्यं भवत्सु वै॥ ५३ | हिमवान्ने निवेदन किया— (उपस्थित सज्जनो!) ये पुण्यात्मा सप्तर्षि भगवान् शङ्करके लिये मेरी कन्याकी याचना कर रहे हैं। शङ्करके लिये कन्या देनेका प्रस्ताव है— |
अध्याय ५२ ] शिवजीका महर्षियोंको स्मृतकर उन्हें हिमवान्के यहाँ भेजना [ २२९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| तद् वदध्वं यथाप्रज्ञं ज्ञातयो यूयमेव मे।<br>नोल्लङ्घ्य युष्मान् दास्यामि तत्क्षमं वक्तुमर्हथ ॥ ५४ | यही आपलोगोंसे निवेदन करना है। आपलोग ही मेरे ज्ञाति-बन्धु हैं, अतः अपनी बुद्धिके अनुसार परामर्श दें। आप-(के मत)-का उल्लङ्घन कर मैं (कन्याका) दान नहीं करूँगा; अतः आपलोग उचित परामर्श दें ॥ ५३-५४ ॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>हिमवद्वचनं श्रुत्वा मेर्वाद्याः स्थावरोत्तमाः।<br>सर्व एवाब्रुवन् वाक्यं स्थिताः स्वेष्वासनेषु ते ॥ ५५<br>याचितारश्च मुनयो वरस्त्रिपुरहा हरः।<br>दीयतां शैल कालीयं जामाताऽभिमतो हि नः ॥ ५६<br>मेनाप्यथाह भर्तारं शृणु शैलेन्द्र मद्द्वचः।<br>पितॄनाराध्य देवैस्तैर्दत्ताऽनेनैव हेतुना ॥ ५७<br>यस्त्वस्यां भूतपतिना पुत्रो जातो भविष्यति।<br>स हनिष्यति दैत्येन्द्रं महिषं तारकं तथा ॥ ५८ | **पुलस्त्यजी बोले—**हिमवान्के प्रस्तावकी बात सुनकर मेरु आदि सभी श्रेष्ठ गिरिवरोंने अपने-अपने आसनपर आसीन होते हुए ही कहा—(गिरिराज!) याचना करनेवाले सप्तर्षि हैं और त्रिपुरासुरका वध करनेवाले शङ्कर वर हैं। शैलराज! इस कालीको आप उनके लिये प्रदान करें। जामाता हमलोगोंके मनपसंद हैं। उसके बाद मेनाने अपने पतिसे कहा—शैलेन्द्र! मेरी बात सुनिये। पितरोंकी आराधना करनेके बाद उन देवोंने (इस कन्याको) मुझे इसीलिये दिया था कि भूतपति (शिव)-द्वारा इससे जो पुत्र उत्पन्न होगा, वह दैत्येन्द्र महिष एवं तारकका वध करेगा ॥ ५५-५८ ॥ |
| इत्येवं मेनया प्रोक्तः शैलैः शैलेश्वरः सुताम्।<br>प्रोवाच पुत्रि दत्ताऽसि शर्वाय त्वं मयाऽधुना ॥ ५९<br>ऋषीनुवाच कालीयं मम पुत्री तपोधनाः।<br>प्रणामं शङ्करवधूर्भक्तिनम्रा करोति वः ॥ ६०<br>ततोऽप्यरुन्धती कालीमङ्कमारोप्य चाटुकैः।<br>लज्जमानां समाश्वास्य हरनामोदितैः शुभैः ॥ ६१<br>ततः सप्तर्षयः प्रोचुः शैलराज निशामय।<br>जामित्रगुणसंयुक्तां तिथिं पुण्यां सुमङ्गलाम् ॥ ६२<br>उत्तराफाल्गुनीयोगं तृतीयेऽह्नि हिमांशुमान्।<br>गमिष्यति च तत्रोक्तो मुहूर्तो मैत्रनामकः ॥ ६३ | मेना तथा पर्वतोंके इस प्रकार कहनेपर हिमवान्ने अपनी कन्यासे कहा—पुत्रि! अब मैंने तुझे शङ्करको दे दिया। फिर उन्होंने ऋषियोंसे कहा—हे तपोधनो! यह मेरी पुत्री तथा शङ्करकी वधू काली भक्तिसहित विनम्र-भावसे आपलोगोंको प्रणाम करती है। उसके बाद अरुन्धतीने लज्जित हो रही कालीको (अपनी) गोदमें बैठाकर शङ्करके प्रेमभरे शुभ नामोंके उच्चारणसे उसे भलीभाँति आश्वस्त किया। उसके बाद सप्तर्षियोंने कहा—शैलराज! (अब आप) जामित्र (सप्तम भावकी शुद्धता) गुणसे संयुक्त मङ्गलमय पवित्र तिथिको सुनिये। (आजके) तीसरे दिन चन्द्रमा उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रसे योग करेगा। उसे मैत्र नामक मुहूर्त कहते हैं ॥ ५९-६३ ॥ |
| तस्यां तिथ्यां हरः पाणिं ग्रहीष्यति समन्त्रकम्।<br>तव पुत्र्या वयं यामस्तदनुज्ञातुमर्हसि ॥ ६४<br>ततः सम्पूज्य विधिना फलमूलादिभिः शुभैः।<br>विसर्जयामास शनैः शैलराड् ऋषिपुङ्गवान् ॥ ६५<br>तेऽप्याजग्मुर्महावेगात् त्वाक्रम्य मरुदालयम्।<br>आसाद्य मन्दरगिरिं भूयोऽवन्दन्त शङ्करम् ॥ ६६<br>प्रणम्योचुर्महेशानं भवान् भर्ताऽद्रिजा वधूः।<br>सब्रह्माकास्त्रयो लोका द्रक्ष्यन्ति घनवाहनम् ॥ ६७ | उस तिथिमें शङ्कर मन्त्रपूर्वक आपकी पुत्रीका पाणिग्रहण करेंगे। आप अनुमति दें; (अब) हमलोग जा रहे हैं। उसके बाद शैलराजने उन ऋषिश्रेष्ठोंको सुन्दर फल-मूलोंसे विधिपूर्वक पूजितकर विदा किया। वे ऋषि भी आकाशमार्गसे अत्यन्त वेगसे मन्दरगिरिपर आ गये और शङ्करको प्रणाम किया। उन महर्षिजनोंने पुनः महेशको प्रणाम कर कहा—शङ्कर! आप वर हैं एवं गिरिजा वधू हैं। ब्रह्माके साथ तीनों लोक आप घनवाहन (शिव)-का (इस रूपमें) दर्शन करेंगे। (—ऐसी सबकी लालसा है) ॥ ६४-६७ ॥ |
| २३० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५३ |
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| ततो महेश्वरः प्रीतो मुनीन् सर्वाननुक्रमात्।<br>पूजयामास विधिना अरुन्धत्या समं हरः॥ ६८<br>ततः सम्पूजिता जग्मुः सुराणां मन्त्रणाय ते।<br>तेऽप्याजग्मुर्हरं द्रष्टुं ब्रह्मविष्ण्विन्द्रभास्कराः॥ ६९<br>गेहं ततोऽभ्येत्य महेश्वरस्य<br>कृतप्रणामा विविशुर्महर्षे।<br>सस्मार नन्दिप्रमुखांश्च सर्वा-<br>नभ्येत्य ते वन्द्य हरं निषण्णाः॥ ७०<br>देवैर्गणैश्चापि वृतो गिरीशः<br>स शोभते मुक्तजटाग्रभारः।<br>यथा वने सर्ज्जकदम्बमध्ये<br>प्ररोहमूलोऽथ वनस्पतिर्वै॥ ७१ | उसके बाद शङ्करने प्रसन्न होकर क्रमानुसार अरुन्धतीके साथ सप्तर्षियोंका विधिपूर्वक पूजन (सत्कार) किया। (शिवद्वारा) भलीभाँति पूजित होकर वे सभी ऋषि देवोंसे मन्त्रणा करनेके लिये चले गये। फिर ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र एवं सूर्य आदि (देवता) भी शिवका दर्शन करने आ गये। (पुलस्त्यजी कहते हैं—) महर्षे! वहाँ जाकर (शङ्करको ) प्रणाम करनेके बाद वे लोग शङ्करके गृहमें प्रविष्ट हुए। उन्होंने नन्दी आदिका स्मरण किया। (फलतः) वे सभी आकर शङ्करको प्रणाम करनेके बाद बैठ गये। देवों एवं गणोंसे घिरे खुली जटावाले वे शङ्करजी वनमें सर्ज्ज और कदम्बके मध्य प्ररोहयुक्त (बरोहवाले) वटवृक्षके समान सुशोभित हो रहे थे॥ ६८–७१॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५२॥
तिरपनवाँ अध्याय
हिमालय-पुत्री उमाका भगवान् शिवके साथ विवाह और बालखिल्योंकी उत्पत्ति
| पुलस्त्य उवाच<br>समागतान् सुरान् दृष्ट्वा नन्दिराख्यातवान् विभोः।<br>अथोत्थाय हरिं भक्त्या परिष्वज्य न्यपीडयत्॥ १<br>ब्रह्माणं शिरसा नत्वा समाभाष्य शतक्रतुम्।<br>आलोक्यान्थान् सुरगणान् संभावयत् स शङ्करः॥ २<br>गणाश्च जय देवेति वीरभद्रपुरोगमाः।<br>शैवाः पाशुपताद्याश्च विविशुर्मन्दराचलम्॥ ३<br>ततस्तस्मान्महाशैलं कैलासं सह दैवतैः।<br>जगाम भगवान् शर्वः कर्तुं वैवाहिकं विधिम्॥ ४<br>ततस्तस्मिन् महाशैले देवमाताऽदितिः शुभा।<br>सुरभिः सुरसा चान्याश्चक्रुर्मण्डनमाकुलाः॥ ५<br>महास्थिशेखरी चारुरोचनातिलको हरः।<br>सिंहाजिनी चालिनीलभुजङ्गकृतकुण्डलः॥ ६ | पुलस्त्यजी बोले—नन्दीने आये हुए सभी देवताओंको देखकर शङ्करको बताया। शङ्करने उठकर भक्तिपूर्वक विष्णुका गाढ आलिङ्गन किया। उन शङ्करने ब्रह्माको सिरसे (झुककर) प्रणाम किया एवं इन्द्रसे कुशल-समाचार पूछा तथा अन्य देवोंकी ओर देखकर उनका आदर किया। वीरभद्र आदि शैव एवं पाशुपतगण 'जय देव' कहते हुए मन्दराचलमें प्रविष्ट हुए। उसके बाद भगवान् शिव वैवाहिक विधि सम्पन्न करनेके लिये देवताओंके साथ महान् कैलास पर्वतपर गये॥ १–४॥<br>तत्पश्चात् उस महान् पर्वतपर कल्याणी देवमाता अदिति, सुरभि, सुरसा एवं अन्य स्त्रियोंने शीघ्रतासे शङ्करका शृङ्गार किया। (गलेमें) मुण्डमाल धारण किये, कटिमें व्याघ्रचर्म, कानोंमें भ्रमरके समान नीले (काले) सर्पका कुण्डल, (कलाईमें) महान् सर्पोंका रत्नरूपी |
५५- देवीद्वारा नमुचिका वध; शुम्भ-निशुम्भका वृत्तान्त, धूम्रलोचनका वध, देवीका चण्ड-मुण्डसे युद्ध और असुरसैन्यसहित चण्ड-मुण्डका विनाश
| अध्याय ५३ ] | हिमालय-पुत्री उमाका भगवान् शिवके साथ विवाह और बालखिल्योंकी उत्पत्ति | २३१ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| महाहिरत्नवलयो हारकेयूरनूपुरः।<br>समुन्नतजटाभारो वृषभस्थो विराजते॥ ७<br><br>तस्याग्रतो गणाः स्वैः स्वैरारूढा यान्ति वाहनैः।<br>देवाश्च पृष्ठतो जग्मुर्हुताशनपुरोगमाः॥ ८ | कङ्कण पहने, कण्ठमें हार, बाहुओंमें भुजबंद, पैरोंमें नूपुर धारण किये, सिरपर ऊँची जटा बाँधे, ललाटपर गोरोचनका तिलक लगाये हुए भगवान् शङ्कर वृषभपर विराजमान हुए। शङ्करके आगे अपनी-अपनी सवारियोंपर बैठे उनके गण एवं उनके पीछे अग्नि आदि देवता (बारात) चले॥ ५-८॥ |
| वैनतेयं समारूढः सह लक्ष्म्या जनार्दनः।<br>प्रयाति देवपार्श्वस्थो हंसेन च पितामहः॥ ९<br><br>गजाधिरूढो देवेन्द्रश्छत्रं शुक्लपटं विभुः।<br>धारयामास विततं शच्या सह सहस्त्रदृक्॥ १०<br><br>यमुना सरितां श्रेष्ठा बालव्यजनमुत्तमम्।<br>श्वेतं प्रगृह्य हस्तेन कच्छपे संस्थिता ययौ॥ ११<br><br>हंसकुन्देन्दुसंकाशं बालव्यजनमुत्तमम्।<br>सरस्वती सरिच्छ्रेष्ठा गजारूढा समादधे॥ १२ | शङ्करकी बगलमें लक्ष्मीके साथ गरुडपर बैठे हुए विष्णु एवं हंसपर आरूढ ब्रह्मा चलने लगे। शचीके साथ ऐरावत हस्तीपर चढ़कर सहस्र नेत्रधारी इन्द्रने श्वेत वस्त्रके बने विशाल छत्रको धारण किया। (एक ओर) नदियोंमें श्रेष्ठ यमुना कच्छपपर सवार होकर अपने हाथमें उत्तम श्वेत चँवर लेकर डुलाने लगी और (दूसरी ओर) सरिताओंमें श्रेष्ठ सरस्वती भी हाथीपर आरूढ़ होकर हंस, कुन्द एवं इन्दुके समान उत्तम चँवर लेकर डुलाने लगी॥ ९-१२॥ |
| ऋतवः षट् समादाय कुसुमं गन्धसंयुतम्।<br>पञ्चवर्णं महेशानं जग्मुस्ते कामचारिणः॥ १३<br><br>मत्तमैरावतनिभं गजमारुह्य वेगवान्।<br>अनुलेपनमादाय ययौ तत्र पृथूदकः॥ १४<br><br>गन्धर्वास्तुम्बुरुमुखा गायन्तो मधुरस्वरम्।<br>अनुजग्मुर्महादेवं वादयन्तश्च किन्नराः॥ १५<br><br>नृत्यन्त्योऽप्सरसश्चैव स्तुवन्तो मुनयश्च तम्।<br>गन्धर्वा यान्ति देवेशं त्रिनेत्रं शूलपाणिनम्॥ १६ | कामचारी छः ऋतुएँ पाँचरंगे सुगन्धित पुष्पोंको लेकर शङ्करके साथ चलने लगीं। ऐरावतके समान मतवाले हाथीपर चढ़कर पृथूदक अनुलेपन लेकर चला। तुम्बुरु आदि गन्धर्व मधुर स्वरसे गाते एवं किन्नर बाजा बजाते हुए शङ्करके पीछे-पीछे चले। नृत्य करती हुई अप्सराएँ तथा शूलपाणि त्रिलोचन देवेशकी स्तुति करते हुए मुनि और गन्धर्व (मङ्गलमयी वरयात्रामें) चले॥ १३-१६॥ |
| एकादश तथा कोट्यो रुद्राणां तत्र वै ययुः।<br>द्वादशैवादित्यानामष्टौ कोट्यो वसूनपि॥ १७<br><br>सप्तषष्टिस्तथा कोट्यो गणानामृषिसत्तम।<br>चतुर्विंशत् तथा जग्मूर्ऋषीणामूर्ध्वरेतसाम्॥ १८<br><br>असंख्यातानि यूथानि यक्षकिन्नररक्षसाम्।<br>अनुजग्मुर्महेशानं विवाहाय समाकुलाः॥ १९<br><br>ततः क्षणेन देवेशः क्ष्माधराधिपतेस्तलम्।<br>संप्राप्तास्त्वागमन् शैलाः कुञ्जरस्थाः समन्ततः॥ २० | ऋषिसत्तम! ग्यारह कोटि रुद्र, बारह कोटि आदित्य, आठ कोटि वसु, सड़सठ कोटि गण एवं चौबीस (कोटि) ऊर्ध्वरेता ऋषियोंने (भी साथ ही) प्रस्थान किया। महेशके पीछे यक्ष, किन्नर एवं राक्षसोंके अनगिनत झुंड विवाहके लिये उत्साहपूर्वक चले। तत्पश्चात् देवेश (भगवान् शङ्कर) क्षणमात्रमें पर्वतराज हिमालयपर पहुँच गये। चारों ओरसे हाथियोंपर बैठे पर्वत उनके पास इकट्ठे हो गये॥ १७-२०॥ |
| ततो ननाम भगवांस्त्रिनेत्रः स्थावराधिपम्।<br>शैलाः प्रणेमुरीशानं ततोऽसौ मुदितोऽभवत्॥ २१<br><br>समं सुरैः पार्षदैश्च विवेश वृषकेतनः।<br>नन्दिना दर्शिते मार्गे शैलराजपुरं महत्॥ २२ | उसके बाद त्रिलोचन भगवान् शङ्करने पर्वतराजको प्रणाम किया। उसके पश्चात् अन्य पर्वतोंने भी शिवजीको प्रणाम किया जिससे वे प्रसन्न हो गये। नन्दीद्वारा दिखाये गये मार्गसे देवताओं एवं पार्षदोंके साथ वृषकेतु शङ्कर |
| २३२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५३ |
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| जीमूतकेतुरायात इत्येवं नगरस्त्रियः।<br>निजं कर्म परित्यज्य दर्शनव्यापृताभवन्॥ २३<br><br>माल्यार्द्धमन्या चादाय करेणैकेन भामिनी।<br>केशपाशं द्वितीयेन शङ्कराभिमुखी गता॥ २४ | पर्वतराजके महान् पुरमें प्रविष्ट हुए। जीमूतकेतु शङ्करको आया हुआ जानकर नगरकी स्त्रियाँ (स्वागतके उल्लासमें इतनी विह्वल हो गयीं कि) अपना काम छोड़कर उन्हें देखने लगीं। एक स्त्री एक हाथमें आधी माला और दूसरे हाथमें अपने केशपाशको पकड़े हुए शङ्करकी ओर दौड़ पड़ी॥ २१—२४॥ | | अन्याऽलक्तकरागाढ्यं पादं कृत्वाकुलेक्षणा।<br>अनलक्तकमेकं हि हरं द्रष्टुमुपागता॥ २५<br><br>एकेनाक्ष्णाञ्जितेनैव श्रुत्वा भीममुपागतम्।<br>साञ्जनां च प्रगृह्यान्या शलाकां सुष्ठु धावति॥ २६<br><br>अन्या सरसनं वासः पाणिनादाय सुन्दरी।<br>उन्मत्तेवागमन्नग्ना हरदर्शनलालसा॥ २७<br><br>अन्यातिक्रान्तमीशानं श्रुत्वा स्तनभरालसा।<br>अनिन्दत रुषा बाला यौवनं स्वं कृशोदरी॥ २८ | लालसाभरी नेत्रोंवाली अन्य स्त्री एक पैरमें महावर लगाकर तथा दूसरेमें बिना महावर लगाये शङ्करको देखने चली आयी। कोई स्त्री शङ्करको आया सुनकर एक आँखमें अञ्जन लगाये और दूसरी आँखमें अञ्जन लगानेके लिये अञ्जनयुक्त सलाई लिये दौड़ पड़ी। शङ्करके दर्शनकी उत्सुकतासे दूसरी सुन्दरी उन्मत्ताकी भाँति करधनीके साथ पहननेके वस्त्रको हाथमें लिये नंगी ही चली आयी। दूसरी कोई महादेवका आना सुनकर स्तनके भारसे अलसायी कृशोदरी बाला रोषसे अपने यौवनकी निन्दा करने लगी॥ २५—२८॥ | | इत्थं स नगरस्त्रीणां क्षोभं संजनयन् हरः।<br>जगाम वृषभारूढो दिव्यं श्वशुरमन्दिरम्॥ २९<br>ततः प्रविष्टं प्रसमीक्ष्य शम्भुं<br>शैलेन्द्रवेश्मन्यबला ब्रुवन्ति।<br>स्थाने तपो दुश्चरमम्बिकाया-<br>श्रीर्णं महानेष सुरस्तु शम्भुः॥ ३०<br>स एष येनाङ्गमनङ्गतां कृतं<br>कन्दर्पनाम्नः कुसुमायुधस्य ।<br>क्रतोः क्षयी दक्षविनाशकर्ता<br>भगाक्षिहा शूलधरः पिनाकी॥ ३१<br>नमो नमः शङ्कर शूलपाणे<br>मृगारिचर्माम्बर कालशत्रो।<br>महाहिहाराङ्कितकुण्डलाय<br>नमो नमः पार्वतिवल्लभाय॥३२ | इस प्रकार नगरकी महिलाओंको क्षुभित करते हुए बैलपर चढ़े शङ्कर अपने श्वशुरके दिव्य महलमें गये। तदनन्तर घरमें प्रविष्ट हुए शम्भुको देखकर घरमें आयी हुई स्त्रियाँ स्पष्ट कहने लगीं कि पार्वतीद्वारा किया गया कठिन तप सर्वथा उचित है; क्योंकि ये शङ्कर महान् देव हैं। ये वही हैं, जिन्होंने कन्दर्प नामके कामदेवके शरीरको भस्म कर दिया। ये ही क्रतुक्षयी, दक्षयज्ञविनाशक, भगाक्षिहन्ता, शूलधर एवं पिनाकी हैं। (फिर वे उन्हें बार-बार नमन करने लगीं—) हे शङ्कर! हे शूलपाणे! हे व्याघ्रचर्मधारिन्! हे कालशत्रो! हे महान् सर्पोंका हार और कुण्डल धारण करनेवाले पार्वतीवल्लभ! आपको बार-बार नमस्कार है॥ २९—३२॥ | | इत्थं संस्तूयमानः सुरपतिविधृतेनातपत्रेण शम्भुः<br>सिद्धैर्वन्द्यः सयक्षैरहिकृतवलयी चारुभस्मोपलिप्तः।<br>अग्रस्थेनाग्रजेन प्रमुदितमनसा विष्णुना चानुगेन<br>वैवाहीँ मङ्गलाढ्यां हुतवहमूदितामारुरोहाथ वेदीम्॥ ३३<br>आयाते त्रिपुरान्तके सहचरैः सार्धं च सप्तर्षिभि-<br>र्व्यग्रोऽभूद्गिरिराजवेश्मनि जनः काल्याः समालङ्कृतौ।<br>व्याकुल्यं समुपागताश्च गिरयः पूजादिना देवताः<br>प्रायो व्याकुलिता भवन्ति सुहृदः कन्याविवाहोत्सुकाः॥ ३४ | इस प्रकार संस्तुत तथा इन्द्रके द्वारा धारण किये छत्रसे युक्त, सिद्धों एवं यक्षोंद्वारा वन्दनीय, सर्पका कंकण पहने, सुन्दर भस्म रमाये, ब्रह्माको आगे किये हुए एवं विष्णुद्वारा अनुगत शिव मङ्गलमयी अग्निशोभित विवाह-मण्डपकी वेदीपर गये। सहचरों और सप्तर्षियोंके साथ त्रिपुरान्तक शिवके आ जानेपर हिमवान्के घरके लोग |
| अध्याय ५३ ] | हिमालय-पुत्री उमाका भगवान् शिवके साथ विवाह और बालखिल्योंकी उत्पत्ति | २३३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| प्रसाध्य देवीं गिरिजां ततः स्त्रियो<br>दुकूलशुक्लाभिवृताङ्गयष्टिकाम्।<br>भ्रात्रा सुनाभेन तदोत्सवे कृते<br>सा शङ्कराभ्याशमथोपपादिता॥ ३५<br><br>ततः शुभे हर्म्यतले हिरण्मये<br>स्थिताः सुराः शङ्करकालिचेष्टितम्।<br>पश्यन्ति देवोऽपि समं कृशाङ्ग्या<br>लोकानुजुष्टं पदमाससाद॥ ३६ | कालीका शृङ्गार करनेमें एवं आये हुए पर्वत-देवताओंकी पूजा और सत्कार करनेमें व्यस्त हो गये। कन्याके विवाहमें उछाहभरे प्रेमीजन प्रायः व्याकुल हो ही जाते हैं। फिर तो पार्वतीके दुबले-पतले शरीरको स्त्रियोंने उज्ज्वल रेशमी वस्त्र पहनाकर अलङ्कृत कर दिया एवं भाई सुनाभने वैवाहिक उत्सवके लिये उसे शङ्करके पास पहुँचाया। उसके बाद सोनेके बने महलके अंदर बैठे हुए देवगण शङ्कर और पार्वतीकी विवाह-विधि देखने लगे और महादेवजीने भी दुबले-पतले शरीरवाली पार्वतीके साथ जगत्पूज्य स्थानको प्राप्त कर लिया॥ ३३—३६॥ |
| यत्र क्रीडा विचित्राः सुकुसुमतरो वारिणो विन्दुपातै-<br>र्गन्धाढ्यैर्गन्धचूर्णैः प्रविरलमवनौ गुण्डितौ गुण्डिकायाम्।<br>मुक्तादामैः प्रकामं हरगिरितनया क्रीडनार्थं तदाऽऽच्छत्<br>पश्चात् सिन्दूरपुञ्जैरविरतविततैश्चक्रतुः क्ष्मां सुरक्ताम्॥ ३७<br><br>एवं क्रीडां हरः कृत्वा समं च गिरिकन्यया।<br>आगच्छद् दक्षिणां वेदिमृषिभिः सेवितां दृढाम्॥ ३८<br><br>अथाजगाम हिमवान् शुक्लाम्बरधरः शुचिः।<br>पवित्रपाणिरादाय मधुपर्कमथोज्ज्वलम्॥ ३९<br><br>उपविष्टस्त्रिनेत्रस्तु शाक्रीं दिशमपश्यत।<br>सप्तर्षिकांश्च शैलेन्द्रः सूपविष्टोऽवलोकयन्॥ ४०<br><br>सुखासीनस्य शर्वस्य कृताञ्जलिपुटो गिरिः।<br>प्रोवाच वचनं श्रीमान् धर्मसाधनमात्मनः॥ ४१ | सुन्दर पुष्पोंवाले वृक्षोंसे सुशोभित भूमिके घेरेमें क्रीडा करते हुए शङ्कर और पार्वतीने एक-दूसरेपर सुगन्धित जलसीकरों (फुहारों) और गन्धचूर्णोंकी लगातार वर्षा की। उसके बाद उन दोनोंने क्रीडा-हेतु एक-दूसरेको मुक्तादाम (मोतीकी मालाओं)-से आहरण-क्रीडा करनेके बाद सिन्दूरकी मुट्ठी भर-भरकर विवाह-स्थलको सिन्दूरसे रँग दिया—पृथ्वीपर सिन्दूर-ही-सिन्दूर कर दिया। इस प्रकार शङ्करजी पार्वतीके साथ क्रीडा करनेके पश्चात् ऋषियोंसे सेवित सुदृढ़ (वैवाहिक मण्डपकी) दक्षिण वेदीपर आये। उसके बाद पवित्रक पहने तथा श्वेत वस्त्र धारण किये हिमवान् श्वेत-मधुर मधुपर्क लिये हुए आये। बैठे हुए त्रिनेत्र ऐन्द्री (पूर्व) दिशाकी ओर देख रहे थे। शैलेन्द्रने सप्तर्षियोंकी ओर देखते हुए भलीभाँति आसन ग्रहण किया। आरामसे आसनपर आसीन शङ्करसे गिरिने हाथ जोड़कर अपने धर्मका साधक वचन कहा—॥ ३७—४१॥ |
| हिमवानुवाच<br>मत्पुत्रीं भगवन् कालीं पौत्रीं च पुलहाग्रजे।<br>पितॄणामपि दौहित्रीं प्रतीच्छेमां मयोद्यताम्॥ ४२ | हिमवान्ने कहा— भगवन्! मेरे द्वारा दी जा रही पुलहाग्रजकी पौत्री, पितरोंकी दौहित्री एवं मेरी पुत्री कालीको आप कृपया स्वीकार करें॥ ४२॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्त्वा शैलेन्द्रो हस्तं हस्तेन योजयन्।<br>प्रादात् प्रतीच्छ भगवन् इदमूच्चैरुदीरयन्॥ ४३ | पुलस्त्यजी बोले— यह कहकर शैलेन्द्रने (शङ्करके) हाथसे (पार्वतीके) हाथको संयोजितकर उच्च स्वरसे यह कहते हुए कि 'हे भगवन्! इसे आप स्वीकार करें' दान दे दिया॥ ४३॥ |
| २३४ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| हर उवाच<br>न मेऽस्ति माता न पिता तथैव<br>न ज्ञातयो वाऽपि च बान्धवाश्च।<br>निराश्रयोऽहं गिरिशृङ्गवासी<br>सुतां प्रतीच्छामि तवाद्रिराज ॥ ४४<br>इत्येवमुक्त्वा वरदोऽवपीडयत्<br>करं करेणाद्रिकुमारिकायाः।<br>सा चापि संस्पर्शमवाप्य शम्भोः<br>परां मुदं लब्धवती सुरर्षे ॥ ४५<br>तथाधिरूढो वरदोऽथ वेदिं<br>सहाद्रिपुत्र्या मधुपर्कमश्नन्।<br>दत्त्वा च लाजान् कमलस्य शुक्लां-<br>स्ततो विरिञ्चो गिरिजामुवाच ॥ ४६<br>कालि पश्यस्व वदनं भर्तुः शशधरप्रभम्।<br>समदृष्टिः स्थिरा भूत्वा कुरुष्वाग्नेः प्रदक्षिणम् ॥ ४७<br>ततोऽम्बिका हरमुखे दृष्टे शैत्यमुपागता।<br>यथार्करश्मिसंतप्ता प्राप्य वृष्टिमिवावनिः ॥ ४८ | शङ्करने कहा— पर्वतराज ! मेरे पिता, माता, दायाद या कोई बान्धव नहीं है। मैं गृह-विहीन होकर पर्वतकी ऊँची चोटीपर रहता हूँ। मैं आपकी पुत्रीको अङ्गीकार करता हूँ। यह कहकर वरदाता शङ्करने पर्वतकी पुत्री पार्वतीके हाथको अपने हाथमें ले लिया। देवर्षे! शङ्करके हाथका स्पर्श प्राप्त कर उसे भी अत्यन्त हर्ष हुआ। इसके बाद मधुपर्कका प्राशन करते हुए वरदायक शङ्कर पर्वतकी पुत्रीके साथ वेदीपर बैठे। उसके बाद धानका सफेद लावा देकर ब्रह्माने गिरिजासे कहा—कालि! पतिके चन्द्रमाके समान मुखको देखो एवं समदृष्टिमें स्थित होकर अग्निकी प्रदक्षिणा करो। उसके बाद शङ्करका मुख देखनेपर अम्बिकाको इस प्रकारकी शीतलता प्राप्त हुई जैसी सूर्यकी किरणोंसे सन्तप्त पृथ्वीको वृष्टि पाकर होती है॥ ४४–४८॥ |
| भूयः प्राह विभोर्वक्त्रमीक्षस्वेति पितामहः।<br>लज्जया साऽपि दृष्टेति शनैर्ब्रह्माणमब्रवीत् ॥ ४९<br>समं गिरिजया तेन हुताशस्त्रिः प्रदक्षिणम्।<br>कृतो लाजाश्च हविषा समं क्षिप्ता हुताशने ॥ ५०<br>ततो हराङ्घ्रिमालिन्या गृहीतो दायकारणात्।<br>किं याचसि च दास्यामि मुञ्चस्वेति हरोऽब्रवीत् ॥ ५१<br>मालिनी शङ्करं प्राह मत्सख्या देहि शङ्कर।<br>सौभाग्यं निजगोत्रीयं ततो मोक्षमवाप्स्यसि ॥ ५२ | पितामहने फिर कहा—विभुका मुख देखो। अब उसने भी लज्जापूर्वक धीरेसे ब्रह्मासे कहा—देख लिया। (इसके बाद) गिरिजाके साथ उन्होंने अग्निकी तीन प्रदक्षिणा की एवं अग्निमें हविष्यके साथ लावाकी आहुति दी। तत्पश्चात् मालिनीने दाय (नेग)-के लिये शङ्करका पैर पकड़ लिया। शङ्करने कहा—क्या माँगती हो? मैं दूँगा। पैर छोड़ दो। मालिनीने शङ्करसे कहा—हे शङ्करजी! मेरी सखीको अपने गोत्रका सौभाग्य दीजिये, तभी छुटकारा मिलेगा॥ ४९–५२॥ |
| अथोवाच महादेवो दत्तं मालिनि मुञ्च माम्।<br>सौभाग्यं निजगोत्रीयं योऽस्यास्तं शृणु वच्मि ते ॥ ५३<br>योऽसौ पीताम्बरधरः शङ्खधृङ्मधुसूदनः।<br>एतदीयो हि सौभाग्यो दत्तोऽस्मद्गोत्रमेव हि ॥ ५४<br>इत्येवमुक्ते वचने प्रमुमोच वृषध्वजम्।<br>मालिनी निजगोत्रस्य शुभचारित्रमालिनी ॥ ५५<br>यदा हरो हि मालिन्या गृहीतश्चरणे शुभे।<br>तदा कालीमुखं ब्रह्मा ददर्श शशिनोऽधिकम् ॥ ५६ | उसके बाद महादेवने कहा—मालिनी! तुम जो माँगती हो उसे मैंने दे दिया। मुझे छोड़ो। इसका जो गोत्रीय सौभाग्य होगा उसे मैं तुम्हें बतलाता हूँ। तुम सुनो! ये जो पीताम्बर पहनने और शङ्ख धारण करनेवाले मधुसूदन हैं मेरा गोत्र इनका सौभाग्य ही है; उसे मैंने दे दिया। इस प्रकार शङ्करके कहनेपर अपने कुलकी शुभ सच्चरित्रताकी माला धारण करनेवाली मालिनीने शङ्करको छोड़ दिया। जब मालिनीने शङ्करके दोनों चरण पकड़ रखे थे, तब ब्रह्माने कालीके चन्द्रमासे भी अधिक सुन्दर मुखको देखा॥ ५३–५६॥ |
| तद् दृष्ट्वा क्षोभमगमच्छुक्रच्युतिमवाप च।<br>तच्छुक्रं बालुकायां च खिलीचक्रे ससाध्वसः ॥ ५७ | उसको देखकर वे क्षुब्ध हो गये। उनका शुक्र च्युत हो गया। भयवश उन्होंने उस शुक्रको बालुकामें छिपा दिया। |
अध्याय ५४ ] भगवान् शिवके लिये मन्दरपर विश्वकर्माद्वारा गृहनिर्माण और गजाननकी उत्पत्ति २३५
| ततोऽब्रवीद्धरो ब्रह्मन् न द्विजान् हन्तुमर्हसि।<br>अमी महर्षयो धन्या बालखिल्याः पितामह ॥ ५८<br>ततो महेशवाक्यान्ते समुत्तस्थुस्तपस्विनः।<br>अष्टाशीतिसहस्राणि बालखिल्या इति स्मृताः ॥ ५९<br>ततो विवाहे निर्वृत्ते प्रविष्टः कौतुकं हरः।<br>रेमे सहोमया रात्रिं प्रभाते पुनरुत्थितः ॥ ६०<br>ततोऽद्रिपुत्रीं समवाप्य शम्भुः<br>सुरैः समं भूतगणैश्च हृष्टः।<br>सम्पूजितः पर्वतपार्थिवेन<br>स मन्दरं शीघ्रमुपाजगाम ॥ ६१<br>ततः सुरान् ब्रह्महरीन्द्रमुख्यान्<br>प्रणम्य सम्पूज्य यथाविभागम्।<br>विसर्ज्य भूतैः सहितो महीध्र-<br>मध्यावसन्मन्दरमष्टमूर्तिः ॥ ६२ | उसके बाद शङ्करने कहा—ब्रह्मन्! ब्राह्मणोंका वध मत कीजिये। पितामह! ये सभी बालखिल्य महर्षि हैं, जो बड़े ही धन्य हैं। फिर शङ्करके कहनेके बाद अठासी हजार बालखिल्य नामक तपस्वी उठ खड़े हुए। उसके बाद विवाह हो जानेपर शङ्कर कौतुकागार (कोहवर)-में गये। उन्होंने रात्रिमें पार्वतीके साथ विनोद किया। पुनः प्रातःकाल उठे। उसके बाद पार्वतीको प्राप्तकर प्रसन्न हुए शङ्कर पर्वतराजासे पूजित होनेके बाद देवों एवं भूतगणोंके साथ तुरन्त ही मन्दराचलपर आ गये। उसके बाद अष्टमूर्ति शङ्करने ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र आदि देवताओंका यथोचित पूजन किया तथा उन्हें प्रणाम कर विदा किया। फिर स्वयं अपने भूतगणोंके साथ मन्दर पर्वतपर रहने लगे॥ ५७—६२॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें तिरपनवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५३॥
चौवनवाँ अध्याय
भगवान् शिवके लिये मन्दरपर विश्वकर्माद्वारा गृहनिर्माण, शिवका यज्ञकर्म करना, पार्वतीकी तपस्यासे ब्रह्माका वर देना, कौशिकीकी स्थापना, शिवके प्राङ्गणमें अग्नि-प्रवेश, देवोंकी प्रार्थना आदि और गजाननकी उत्पत्ति
| पुलस्त्य उवाच<br>ततो गिरौ वसन् रुद्रः स्वेच्छया विचरन् मुने।<br>विश्वकर्माणमाहूय प्रोवाच कुरु मे गृहम् ॥ १<br>ततश्चकार शर्वस्य गृहं स्वस्तिकलक्षणम्।<br>योजनानि चतुःषष्टिः प्रमाणेन हिरण्मयम् ॥ २<br>दन्ततोरणनिर्व्यूहं मुक्ताजालान्तरं शुभम्।<br>शुद्धस्फटिकसोपानं वैडूर्यकृतरूपकम् ॥ ३<br>सप्तकक्षं सुविस्तीर्णं सर्वैः समुदितं गुणैः।<br>ततो देवपतिश्चक्रे यज्ञं गार्हस्थ्यलक्षणम् ॥ ४ | **पुलस्त्यजी बोले—**मुने! मन्दरगिरिपर रहते हुए और इच्छानुसार भ्रमण करते हुए शङ्करने विश्वकर्माको आवाहित कर कहा—विश्वकर्मन्! मेरे लिये गृह बना दो। उसके बाद विश्वकर्माने शङ्करके लिये चौंसठ योजन विस्तृत स्वर्णनिर्मित तथा स्वस्तिक चिह्नोंसे युक्त गृहका निर्माण किया। उसमें हाथीके दाँतोंके तोरण तथा मोतियोंकी सुन्दर झालरें लगी हुई थीं और वैदूर्यमणिसे जटित शुद्ध-स्फटिककी सीढ़ियाँ थीं। सात कक्षोंवाला वह लम्बा-चौड़ा घर सभी गुणोंसे भरा-पूरा था। घर बन जानेके बाद देवाधिदेवने गृहस्थ आश्रमके उपयुक्त यज्ञकर्म सम्पन्न किया॥ १—४॥ |
| २३६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५४ |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तं पूर्वचरितं मार्गमनुयाति स्म शङ्करः।<br>तथा सतस्त्रिनेत्रस्य महान् कालोऽभ्यगान्मने॥ ५<br>रमतः सह पार्वत्या धर्मापेक्षी जगत्पतिः।<br>ततः कदाचिन्नर्मार्थं कालीत्युक्ता भवेन हि॥ ६<br>पार्वती मन्युनाविष्टा शङ्करं वाक्यमब्रवीत्।<br>संरोहतीषुणा विद्धं वनं परशुना हतम्।<br>वाचा दुरुक्तं बीभत्सं न प्ररोहति वाक्क्षतम्॥ ७<br>वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति<br>तैराहतः शोचति रात्र्यहानि।<br>न तान् विमुञ्चेत् हि पण्डितो जन-<br>स्तमद्य धर्मं वितथं त्वया कृतम्॥ ८ | शङ्करभगवान् पहलेके श्रेष्ठ जनोंद्वारा आचरित (धर्म्य) पथका अनुसरण करने लगे। मुने! त्रिनेत्रके इस प्रकार रहते हुए बहुत समय बीत गया। पार्वतीके साथ धर्मके अनुसार व्यवहार करते हुए जगत्स्वामी शङ्करने किसी समय विनोदमें गिरिजाको ‘काली’ कह दिया। क्रोधसे भरकर पार्वती ३ने शङ्करसे कहा—(देखिये प्रभु!) बाणसे बिंधा हुआ घाव भर जाता है और कुल्हाड़ीसे काटा हुआ वन पुनः हरा-भरा हो जाता है; किंतु वाणीसे किया गया दोषपूर्ण तथा बीभत्स घाव नहीं भरता। मुखसे निकले हुए वाग्बाणोंसे घायल प्राणी दिन-रात चिन्ता करते रहते हैं; अतः पण्डितजनोंको उन्हें (कुवाच्य—वाक्य-बाणोंको) नहीं प्रयुक्त करना चाहिये। आज आपने उस वाङ्मयधर्मको व्यर्थ कर दिया॥ ५-८॥ |
| तस्माद् व्रजामि देवेश तपस्तप्तुमनुत्तमम्।<br>तथा यतिष्ये न यथा भवान् कालीति वक्ष्यति॥ ९<br>इत्येवमुक्त्वा गिरिजा प्रणम्य च महेश्वरम्।<br>अनुज्ञाता त्रिनेत्रेण दिवमेवोत्पपात ह॥ १०<br>समुत्पत्य च वेगेन हिमाद्रिशिखरं शिवम्।<br>टङ्कच्छिन्नं प्रयत्नेन विधात्रा निर्मितं यथा॥ ११<br>ततोऽवतीर्य सस्मार जयां च विजयां तथा।<br>जयन्तीं च महापुण्यां चतुर्थीमपराजिताम्॥ १२ | देवेश्वर! इसलिये मैं सर्वोत्तम तपस्या करने जा रही हूँ। मैं कठोर परिश्रम करके ऐसा उपाय करूँगी जिससे आप फिर मुझे ‘काली’—ऐसा न कहेंगे। इस प्रकार कहनेके बाद हिमतनया (पार्वती)-ने शङ्करको प्रणाम किया एवं उनसे आदेश लेकर आकाशमें चली गयीं और वे उड़कर मङ्गलमय हिमालयकी चोटीपर पहुँचीं। वह हिमालयकी चोटी ऐसी थी जैसे विधाताने प्रयत्नपूर्वक टाँकीसे काटकर निर्माण किया हो। (आकाशसे पर्वतपर) उतरकर (उन्होंने) जया, विजया, जयन्ती तथा चौथी महापुण्या अपराजिताका स्मरण किया॥ ९-१२॥ |
| ताः संस्मृताः समाजग्मुः कालीं द्रष्टुं हि देवताः।<br>अनुज्ञातास्तथा देव्या शुश्रूषां चक्रिरे शुभाः॥ १३<br>ततस्तपसि पार्वत्यां स्थितायां हिमवद्वनात्।<br>समाजगाम तं देशं व्याघ्रो दंष्ट्रानखायुधः॥ १४<br>एकपादस्थितायां तु देव्यां व्याघ्रस्त्वचिन्तयत्।<br>यदा पतिष्यते चेयं तदादास्यामि वै अहम्॥ १५<br>इत्येवं चिन्तयन्नेव दत्तदृष्टिर्मृगाधिपः।<br>पश्यमानस्तु वदनमेकदृष्टिरजायत॥ १६ | (पार्वतीके) स्मरण करते ही वे (आहूत) देवियाँ कालीको देखनेके लिये आ गयीं। (और) वे कल्याणकारिणी सखियाँ देवीकी आज्ञा पाकर उनकी सेवा करने लगीं। उसके बाद पार्वतीके तपस्यामें लग जानेपर हिमालयके वनसे आयुधके काममें आनेवाले दाँतों और नखोंके आयुधवाला एक बाघ उस स्थानपर आया। पार्वतीको एक पैरपर खड़ी देखकर बाघने सोचा कि जब यह गिरेगी तो मैं अवश्य ही इसे पा जाऊँगा। इस प्रकार सोचता हुआ वह मृगोंका स्वामी पार्वतीके मुखको एकटक देखने लगा॥ १३-१६॥ |
| ततो वर्षशतं देवी गृणन्ती ब्रह्मणः पदम्।<br>तपोऽतप्यत् ततोऽभ्यागाद् ब्रह्मा त्रिभुवनेश्वरः॥ १७ | उसके बाद सौ वर्षोंतक ब्रह्ममन्त्रका जाप करती हुई देवीने तपस्या की। तब स्वर्ग, पृथ्वी तथा पातालके स्वामी ब्रह्मा उपस्थित हुए। ब्रह्माने देवीसे कहा— |
अध्याय ५४] भगवान् शिवके लिये मन्दरपर विश्वकर्माद्वारा गृहनिर्माण और गजाननकी उत्पत्ति २३७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पितामहस्ततोवाच देवीं प्रीतोऽस्मि शाश्वते।<br>तपसा धूतपापाऽसि वरं वृणु यथेप्सितम्॥ १८<br>अथोवाच वचः काली व्याघ्रस्य कमलोद्भव।<br>वरदो भव तेनाहं यास्ये प्रीतिमनुत्तमाम्॥ १९<br>ततः प्रादाद् वरं ब्रह्मा व्याघ्रस्याद्भुतकर्मणः।<br>गाणपत्यं विभौ भक्तिमजेयत्वं च धर्मिताम्॥ २० | सनातनि! मैं प्रसन्न हूँ। तुम तपस्या करके निष्पाप हो गयी हो। इच्छानुकूल वर माँगो। इसके बाद कालीने कहा—हे कमलजन्मा (ब्रह्माजी)! इस व्याघ्रको आप वर दें। इससे मैं उत्तम सुख प्राप्त करूँगी। तब ब्रह्माजीने उस अलौकिक कर्म करनेवाले व्याघ्रको गणनायक हो जाने, शङ्करकी भक्ति प्राप्त करने एवं किसीसे न जीते जाने और धार्मिक हो जानेका वर दिया॥ १७–२०॥ |
| वरं व्याघ्राय दत्त्वैवं शिवकान्तामथाऽब्रवीत्।<br>वृणीष्व वरमव्यग्रा वरं दास्ये तवाऽम्बिके॥ २१<br>ततो वरं गिरिसुता प्राह देवी पितामहम्।<br>वरः प्रदीयतां मह्यं वर्णं कनकसंनिभम्॥ २२<br>तथेत्युक्त्वा गतो ब्रह्मा पार्वती चाभवत् ततः।<br>कोशं कृष्णं परित्यज्य पद्माकिञ्जल्कसन्निभा॥ २३<br>तस्मात् कोशाच्च संजाता भूयः कात्यायनी मुने।<br>तामभ्येत्य सहस्त्राक्षः प्रतिजग्राह दक्षिणाम्।<br>प्रोवाच गिरिशां देवो वाक्यं स्वार्थाय वासवः॥ २४ | इस प्रकार व्याघ्रको वर देकर (उन्होंने) शिवकान्ता (पार्वती)-से कहा—अम्बिके! तुम (भी) शान्त चित्तसे वर माँगो। मैं तुम्हें (भी) वर दूँगा। उसके बाद गिरिनन्दिनी पार्वतीदेवीने पितामहसे कहा—ब्रह्मन्! मुझे यही वर दीजिये कि मेरा वर्ण सुवर्णके समान हो जाय। ब्रह्मा 'ऐसा ही हो' कहकर चले गये। पार्वती भी अपने शरीरका कालापन त्यागकर कमलके केसरके समान हो गयीं। मुने! उस कृष्ण कोशसे फिर कात्यायनी उत्पन्न हुई। हजार आँखोंवाले इन्द्रने उनके पास जाकर दक्षिणा ग्रहण की और अपने लिये गिरिजासे यह वचन कहा— ॥ २१–२४॥ |
| इन्द्र उवाच<br>इयं प्रदीयतां मह्यं भगिनी मेऽस्तु कौशिकी।<br>त्वत्कोशसम्भवा चेयं कौशिकी कौशिकोऽप्यहम्॥ २५<br>तां प्रादादिति संश्रुत्य कौशिकीं रूपसंयुताम्।<br>सहस्त्राक्षोऽपि तां गृह्य विन्ध्यं वेगाज्जगाम च॥ २६<br>तत्र गत्वा तथोवाच तिष्ठस्वात्र महाबले।<br>पूज्यमाना सुरैर्नाम्ना ख्याता त्वं विन्ध्यवासिनी॥ २७<br>तत्र स्थाप्य हरिर्देवीं दत्त्वा सिंहं च वाहनम्।<br>भवामरारिहन्त्रीत्युक्त्वा स्वर्गमुपागमत्॥ २८ | इन्द्रने कहा—आप इसे मेरे लिये दे दें। यह कौशिकी मेरी बहन बनेगी। आपके कोशसे उत्पन्न होनेके कारण यह 'कौशिकी' हुई और मैं भी कौशिक हुआ। उसे मैंने दे दिया—इस (प्रतिज्ञा-वचन)-को सुननेके बाद उस रूपवती कौशिकीको लेकर देवराज इन्द्र शीघ्रतापूर्वक विन्ध्यपर्वतपर चले गये। इसके बाद वहाँ जाकर (उन्होंने उससे) कहा—महाबले! तुम यहाँ रहो। देवताओंद्वारा आराधित होती हुई तुम 'विन्ध्यवासिनी' नामसे प्रसिद्ध होगी। इन्द्रने देवीको वहाँ स्थापितकर उनके वाहनके लिये (उन्हें) सिंह दे दिया और तुम देवताओंके शत्रुओंको मारनेवाली बनो—ऐसा कहकर वे स्वर्ग चले गये॥ २५–२८॥ |
| उमाऽपि तं वरं लब्ध्वा मन्दरं पुनरेत्य च।<br>प्रणम्य च महेशानं स्थिता सविनयं मुने॥ २९<br>ततोऽमरगुरुः श्रीमान् पार्वत्या सहितोऽव्ययः।<br>तस्थौ वर्षसहस्रं हि महामोहनके मुने॥ ३०<br>महामोहस्थिते रुद्रे भुवनाश्रेलुरुद्धताः।<br>चक्षुभुः सागराः सप्त देवाश्च भयमागमन्॥ ३१ | मुने! उमादेवी भी उस वरको प्राप्त करके मन्दर-पर्वतपर चली गयीं और महेशको प्रणाम कर विनीतभावसे रहने लगीं। मुने! उसके पश्चात् पार्वतीके साथ श्रीमान् अव्यय देवगुरु एक हजार वर्षोंतक महामोहनक (सुरतलीलामें) स्थित रहे। रुद्रदेवके महामोहमें स्थित होनेपर समस्त भुवन क्षुब्ध होकर विचलित हो गये। सातों सागर खलबला उठे और देवगण भयभीत हो गये। |
देवीकी स्तुति, देवीद्वारा वरदान और भविष्यमें प्रादुर्भावका कथन
| २३८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५४ |
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| ततः सुराः महेन्द्रेण ब्रह्मणः सदनं गताः।<br>प्रणम्योचुर्महेशानं जगत् क्षुब्धं तु किं त्विदम्॥ ३२ | तब देवतालोग इन्द्रके साथ ब्रह्मलोक गये और महेशान (ब्रह्मा)-को प्रणाम कर बोले—यह जगत् क्यों अशान्त हो गया है—यह क्या बात है?॥ २९—३२॥ | | तानुवाच भवो नूनं महामोहनके स्थितः।<br>तेनाक्रान्तास्त्विमे लोका जग्मुः क्षोभं दुरत्ययम्॥ ३३<br><br>इत्युक्त्वा सोऽभवत् तूष्णीं ततोऽप्यूचुः सुरा हरिम्।<br>आगच्छ शक्र गच्छामो यावत् तन्न समाप्यते॥ ३४<br><br>समाप्ते मोहने बालो यः समुत्पत्स्यतेऽव्ययः।<br>स नूनं देवराजस्य पदमैन्द्रं हरिष्यति॥ ३५<br><br>ततोऽमराणां वचनाद् विवेको बलघातिनः।<br>भयाज्ज्ञानं ततो नष्टं भाविकर्मप्रचोदनात्॥ ३६ | (ब्रह्माने) उन देवताओंसे कहा—निश्चय ही महादेव महामोहनक (सूरतलीला)-में स्थित हैं। उन्हींसे आक्रान्त होनेके कारण यह सारा जगत् अत्यन्त क्षुब्ध हो रहा है। इतना कहकर वे चुप हो गये। तब देवताओंने इन्द्रसे कहा—शक्र! जबतक वह (महामोहनक) समाप्त नहीं हो जाता, तभीतक हमलोग उन (महेश्वर)-के पास चलें। मोह समाप्त हो जानेपर उत्पन्न होनेवाला अविनाशी बालक निश्चय ही देवराजके ऐन्द्रपदका हरण कर लेगा। उसके बाद भवितव्यतावश देवताओंके वचनसे बलघाती (इन्द्र)-का विवेक एवं भयके कारण ज्ञान (भी) नष्ट हो गया॥ ३३—३६॥ | | ततः शक्रः सुरैः सार्धं वह्निना च सहस्त्रदृक्।<br>जगाम मन्दरगिरिं तच्छृङ्गे न्यविशत्ततः॥ ३७<br><br>अशक्ताः सर्व एवैते प्रवेष्टुं तद्भवाजिरम्।<br>चिन्तयित्वा तु सुचिरं पावकं ते व्यसर्जयन्॥ ३८<br><br>स चाभ्येत्य सुरश्रेष्ठो दृष्ट्वा द्वारे च नन्दिनम्।<br>दुष्प्रवेशं च तं मत्वा चिन्तां वह्निः परां गतः॥ ३९<br><br>स तु चिन्तार्णवे मग्नः प्रापश्यच्छम्भुसद्मनः।<br>निष्क्रामन्तीं महापङ्क्तिं हंसानां विमलां तथा॥ ४० | तब हजार आँखवाले इन्द्र अग्नि और देवताओंके साथ मन्दरपर्वतपर गये एवं उस पर्वतकी ऊँची चोटीपर बैठ गये; परंतु वे सभी महादेवके भवनमें प्रवेश न पा सके। अधिक समयतक आपसमें विचार-विमर्श कर उन लोगोंने अग्निदेवको (उनके पास) भेजा। सुरश्रेष्ठ अग्निदेव वहाँ गये और द्वारपर नन्दीको देखकर एवं वहाँ प्रवेश पाना कठिन समझकर चिन्ता-सागरमें डूब गये। शोक-सागरमें डूबे हुए उन्होंने शम्भुके भवनसे निकल रही हंसोंकी विमल लम्बी कतार देखी॥ ३७—४०॥ | | असावुपाय इत्युक्त्वा हंसरूपो हुताशनः।<br>वञ्चयित्वा प्रतीहारं प्रविवेश हराजिरम्॥ ४१<br><br>प्रविश्य सूक्ष्ममूर्तिश्च शिरोदेशे कपर्दिनः।<br>प्राह प्रहस्य गम्भीरं देवा द्वारि स्थिता इति॥ ४२<br><br>तच्छ्रुत्वा सहसोत्थाय परित्यज्य गिरेः सुताम्।<br>विनिष्क्रान्तोऽजिराच्छर्वो वह्निना सह नारद॥ ४३<br><br>विनिष्क्रान्ते सुरपतौ देवा मुदितमानसाः।<br>शिरोभिरवनीं जग्मुः सेन्द्रार्कशशिपावकाः॥ ४४<br><br>ततः प्रीत्या सुरानाह वदध्वं कार्यमाशु मे।<br>प्रणामावनतानां वो दास्येऽहं वरमुत्तमम्॥ ४५ | यही उपाय है—ऐसा कहकर वे अग्निदेव द्वारपालको भुलावा देकर महादेवके गृहमें हंसरूपमें प्रविष्ट हो गये। प्रवेश करनेके पश्चात् सूक्ष्म शरीर धारण करनेवाले अग्निदेवने महादेवके सिरके पास हँसते हुए गम्भीर स्वरमें कहा—(प्रभो!) देवतालोग दरवाजेपर खड़े हैं। (पुलस्त्यजी बोले) नारदजी! महादेवजी उस बातको सुनकर उसी समय सहसा उठे और हिमालयकी कन्याको छोड़कर अग्निके साथ आँगनसे निकल आये। सुरपति शङ्करके निकल जानेपर इन्द्रसहित चन्द्र, सूर्य और अग्नि आदि सभी देवताओंने हर्षित मनवाले होकर पृथ्वीपर सिर रखकर उन्हें प्रणाम किया। उसके बाद (भगवान् महादेवने) प्रेमपूर्वक देवताओंसे कहा—देवताओ! आपलोग मुझे शीघ्र अपना कार्य बतायें। मैं नम्रतापूर्वक प्रणाम करनेवाले आपलोगोंको उत्तम वर दूँगा॥ ४१—४५॥ |
| अध्याय ५४ ] | भगवान् शिवके लिये मन्दरपर विश्वकर्माद्वारा गृहनिर्माण और गजाननकी उत्पत्ति | २३९ | | :--- | :--- |
| देवा ऊचुः<br>यदि तुष्टोऽसि देवानां वरं दातुमिहेच्छसि।<br>तदिदं त्यज्यतां तावन्महामैथुनमीश्वर॥ ४६ | देवताओने कहा— ईश्वर! यदि आप प्रसन्न हैं और हम देवताओंको वर देना चाहते हैं तो आप इस महासुरतलीलाका परित्याग कर दें॥ ४६॥ |
| ईश्वर उवाच<br>एवं भवतु संत्यक्तो मया भावोऽमरोत्तमाः।<br>ममेदं तेज उद्रिक्तं कश्चिद् देवः प्रतीच्छतु॥ ४७ | ईश्वरने कहा— देवश्रेष्ठो! ऐसा ही होगा। मैंने आसक्ति छोड़ दी। किंतु कोई देवता मेरे इस बढ़े हुए तेज (शुक्र)-को ग्रहण करे॥ ४७॥ |
| पुलस्त्य उवाच<br>इत्युक्ताः शम्भुना देवाः सेन्द्रचन्द्रदिवाकराः।<br>असीदन्त यथा मग्नाः पङ्के वृन्दारका इव॥ ४८<br><br>सीदत्सु दैवतेष्वेवं हुताशोऽभ्येत्य शङ्करम्।<br>प्रोवाच मुञ्च तेजस्त्वं प्रतीच्छाम्येष शङ्कर॥ ४९<br><br>ततो मुमोच भगवांस्तद्रेतः स्कन्नमेव तु।<br>जलं तृषान्ते वै यद्वत् तैलपानं पिपासितः॥ ५०<br><br>ततः पीते तेजसि वै शार्वे देवेन वह्निना।<br>स्वस्थाः सुराः समामन्त्र्य हरं जग्मुस्त्रिविष्टपम्॥ ५१ | पुलस्त्यजी बोले— शम्भुके इस प्रकार कहनेपर (प्रकृत समस्यासे) इन्द्रके साथ चन्द्रमा एवं सूर्य आदि देवता कीचड़में फँसे हुए हाथीके समान दुखी हो गये। देवताओंके इस प्रकार दुखी हो जानेपर अग्निने (साहस कर) शङ्करके पास जाकर कहा—शङ्कर! आप (अपने) तेजको छोड़ें—बाहर करें। मैं उसे ग्रहण करूँगा। उसके बाद भगवान्ने (तेजको) छोड़ दिया और उस त्यक्त रेतस्को जैसे जलका प्यासा व्यक्ति तेल पी जाता है, अग्निदेवने उसी प्रकार (उसे) पी लिया। अग्निदेवद्वारा शङ्करके तेजको इस प्रकार पी लिये जानेपर देवतालोग स्वस्थ हो गये और महादेवसे अनुमति लेकर स्वर्गमें लौट गये॥ ४८—५१॥ |
| सम्प्रायातेषु देवेषु हरोऽपि निजमन्दिरम्।<br>समभ्येत्य महादेवीमिदं वचनमब्रवीत्॥ ५२<br><br>देवि देवैरिहाभ्येत्य यत्नात् प्रेष्य हुताशनम्।<br>नीतः प्रोक्तो निषिद्धस्तु पुत्रोत्पत्तिं तवोदरात्॥ ५३<br><br>साऽपि भर्तुर्वचः श्रुत्वा क्रुद्धा रक्तान्तलोचना।<br>शशाप दैवतान् सर्वान् नष्टपुत्रोद्भवा शिवा॥ ५४<br><br>यस्मान्नेच्छन्ति ते दुष्टा मम पुत्रमथौरसम्।<br>तस्मात् ते न जनिष्यन्ति स्वासु योषित्सु पुत्रकान्॥ ५५ | देवताओंके स्वर्ग चले जानेपर महादेवने भी अपने मन्दिरमें जाकर महादेवीसे यह वचन कहा—देवि! देवोंने यहाँ आकर युक्तिसे अग्निको मेरे निकट भेजकर मुझे बुलाया और तुम्हारी कोखसे पुत्र न जननेके लिये कहा। पुत्र न जननेकी बात पतिसे सुनकर क्रोधसे शिवाकी आँखें लाल हो गयीं और (उन्होंने) समस्त देवताओंको शाप दे दिया; यतः वे दुष्ट मेरे उदरसे पुत्रकी उत्पत्ति नहीं चाहते; अतः वे भी अपनी पत्नियोंसे पुत्र नहीं उत्पन्न करेंगे॥ ५२—५५॥ |
| एवं शप्त्वा सुरान् गौरी शौचशालामुपागमत्।<br>आहूय मालिनीं स्नातुं मतिं चक्रे तपोधना॥ ५६<br><br>मालिनी सुरभिं गृह्य श्लक्ष्णमुद्वर्तनं शुभा।<br>देव्यङ्गममुद्वर्तयते कराभ्यां कनकप्रभम्।<br>तत्स्वेदं पार्वती चैव मेने कीदृग्गुणेन हि॥ ५७<br><br>मालिनी तूर्णमगमद् गृहं स्नानस्य कारणात्।<br>तस्यां गतायां शैलेयी मलाच्चक्रे गजाननम्॥ ५८ | इस तरह देवताओंको शाप देकर तपोधना गौरी शुद्धिशालामें गयीं और मालिनीको बुलाकर स्नान करनेका विचार किया। सुन्दरी मालिनी सुगन्धयुक्त मुलायम उबटन लेकर देवीके सोने-जैसे कान्तिवाले शरीरमें (उसे) दोनों हाथोंसे लगाने लगी। (उबटन लगाते समय पसीनेसे मिला उबटनका मैल देखकर) पार्वतीजी (अपने मनमें) विचार करने लगीं कि (देखूँ कि) इस स्वेदमें क्या गुण है। मालिनी स्नान (कराने)-के लिये शीघ्र स्नानगृहमें (पहले) चली गयी। उसके चले जानेपर शैलपुत्रीने (उस) मैलसे गजवदनको बनाया। |
| २४० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५४ |
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| चतुर्भुजं पीनवक्षं पुरुषं लक्षणान्वितम्।<br>कृत्वोत्ससर्ज भूम्यां च स्थिता भद्रासने पुनः॥ ५९ | चार भुजावाले, चौड़ी छातीवाले, सुन्दर लक्षणोंसे युक्त पुरुषको बनाकर उसे भूमिपर रख दिया और वे स्वयं पुनः उत्तम आसनपर बैठ गयीं॥ ५६-५९॥ | | मालिनी तच्छिरःस्नानं ददौ विहसती तदा।<br>ईषद्वद्धासामुमा दृष्ट्वा मालिनीं प्राह नारद॥ ६०<br>किमर्थं भीरु शनकैर्हससि त्वमतीव च।<br>साऽथोवाच हसाम्येवं भवत्यास्तनयः किल॥ ६१<br>भविष्यतीति देवेन प्रोक्तो नन्दी गणाधिपः।<br>तच्छ्रुत्वा मम हासोऽयं संजातोऽद्य कृशोदरि॥ ६२<br>यस्माद् देवैः पुत्रकामः शङ्करो विनिवारितः।<br>एतच्छ्रुत्वा वचो देवी सस्नौ तत्र विधानतः॥ ६३ | उस समय मालिनीने हँसते हुए देवीको सिरसे स्नान कराया। नारदजी! मालिनीको मुसकराते हुए देखकर देवीने कहा—भीरु! तुम धीरे-धीरे इतना क्यों हँस रही हो? मालिनीने कहा—मैं इसलिये हँस रही हूँ कि आपको (अवश्य) पुत्र होगा, ऐसा महादेवने गणपति नन्दीसे कहा था। कृशोदरि! उसे सुनकर (स्मरण कर) आज मुझे हँसी आ गयी है; क्योंकि देवताओंने शङ्करको पुत्रके लिये इच्छा करनेसे रोक दिया है। इस बातको सुनकर देवीने (फिर) वहाँ विधिपूर्वक स्नान किया॥ ६०-६३॥ | | स्नात्वार्च्य शङ्करं भक्त्या समभ्यागाद् गृहं प्रति।<br>ततः शम्भुः समागत्य तस्मिन् भद्रासने त्वपि॥ ६४<br>स्नातस्तस्य ततोऽधस्तात् स्थितः स मलपूरुषः।<br>उमास्वेदं भवस्वेदं जलभूतिसमन्वितम्॥ ६५<br>तत्सम्पर्कात् समुत्तस्थौ फूत्कृत्य करमुत्तमम्।<br>अपत्यं हि विदित्वा च प्रीतिमान् भुवनेश्वरः॥ ६६<br>तं चादाय हरो नन्दिमुवाच भगनेत्रहा।<br>रुद्रः स्नात्वार्च्य देवादीन् वाग्भिरद्भिः पितॄनपि॥ ६७ | स्नान करनेके बाद भक्तिसे शङ्करकी अर्चना कर देवी घरकी ओर चलीं। उसके बाद महादेवने भी आकर उसी पवित्र आसनपर स्नान किया। उसी आसनके नीचे वह मैलसे बनाया पुरुष पड़ा था। उमाके स्वेद एवं जल तथा भस्मसे युक्त शङ्करके स्वेदका सम्मिश्रण होनेसे वह उत्तम शुण्डसे फूत्कार करते हुए उठा। उसे अपना पुत्र जानकर भुवनेश्वर प्रसन्न हो गये। भगनेत्रको नष्ट करनेवाले महादेवने उसे लेकर नन्दीसे कहा—(यह मेरा पुत्र है)। स्नान करनेके बाद शिवने स्तुतियोंसे देवताओंकी तथा जलसे (नित्य) पितरोंकी भी अर्चना की॥ ६४-६७॥ | | जप्त्वा सहस्रनामानमुमापार्श्वमुपागतः।<br>समेत्य देवीं विहसन् शङ्करः शूलधृग् वचः॥ ६८<br>प्राह त्वं पश्य शैलेयि स्वसुतं गुणसंयुतम्।<br>इत्युक्ता पर्वतसुता समेत्यापश्यदद्भुतम्॥ ६९<br>यत्तदङ्गमलाद्दिव्यं कृतं गजमुखं नरम्।<br>ततः प्रीता गिरिसुता तं पुत्रं परिषष्वजे॥ ७०<br>मूर्ध्नि चैनमुपाघ्राय ततः शर्वोऽब्रवीदुमाम्।<br>नायकेन विना देवि तव भूतोऽपि पुत्रकः॥ ७१<br>यस्माज्जातस्ततो नाम्ना भविष्यति विनायकः।<br>एष विघ्नसहस्राणि सुरादीनां हरिष्यति॥ ७२ | वे सहस्रनामका जप कर उमाके निकट गये। देवीके निकट जाकर शूल धारण करनेवाले शङ्करने हँसते हुए यह वचन कहा—शैलजे! तुम अपने गुणवान् पुत्रको देखो। इस प्रकार कहे जानेपर पार्वती ने जाकर यह आश्चर्य देखा कि उनके शरीरके मलसे अलौकिक सुन्दर हाथीके मुखवाला पुरुष हो गया है। उसके बाद गिरिजाने प्रसन्नतापूर्वक उस पुत्रको आलिङ्गित किया। उसके सिरको सूँघकर शम्भुने उमासे कहा—देवि! तुम्हारा यह पुत्र बिना नायकके उत्पन्न हुआ है, अतः इसका नाम 'विनायक' होगा। यह देवादिकोंके सहस्रों विघ्नोंका हरण करेगा॥ ६८-७२॥ |
| अध्याय ५५ ] | देवीद्वारा नमुचिका वध; असुरसैन्यसहित चण्ड-मुण्डका विनाश | २४१ | | :--- | :--- |
| पूजयिष्यन्ति चैवास्य लोका देवि चराचराः।<br>इत्येवमुक्त्वा देव्यास्तु दत्तवांस्तनयाय हि॥ ७३<br>सहायं तु गणश्रेष्ठं नाम्ना ख्यातं घटोदरम्।<br>तथा मातृगणा घोरा भूता विघ्नकराश्च ये॥ ७४<br>ते सर्वे परमेशेन देव्याः प्रीत्योपपादिताः।<br>देवी च स्वसुतं दृष्ट्वा परां मुदमवाप च॥ ७५<br>रेमेऽथ शम्भुना सार्धं मन्दरे चारुकन्दरे।<br>एवं भूयोऽभवद् देवी इयं कात्यायनी विभो।<br>या जघान महादैत्यौ पुरा शुम्भनिशुम्भकौ॥ ७६<br>एतत् तवोक्तं वचनं शुभाख्यं<br>यथोद्भवं पर्वततो मृडान्याः।<br>स्वर्ग्यं यशस्यं च तथाघहारि<br>आख्यानमूर्जस्करमद्रिपुत्र्याः ॥ ७७ | देवि! सारा चर और अचर जगत् इसकी पूजा करेगा। देवीसे इस प्रकार कहकर उन्होंने पुत्र विनायकके लिये घटोदर नामके श्रेष्ठ गणको दे दिया। फिर देवीके प्रेमसे घोर मातृगणों तथा विघ्नकारी भूतोंको अधीनतामें कार्य करनेवाला बना दिया—परमेशने उन सबकी सृष्टि की। अपने पुत्रको देखकर पार्वतीदेवीको भी परम प्रसन्नता प्राप्त हुई। इसके बाद देवी शम्भुके साथ सुन्दर कन्दराओंवाले मन्दराचलपर विचरण करने लगीं। विभो! यह देवी फिर कात्यायनी हुईं, जिन्होंने प्राचीन कालमें शुम्भ और निशुम्भ नामके दो महान् दैत्योंका विनाश किया। (पुलस्त्यजी प्रकृत प्रसङ्गका उपसंहार करते हुए कहते हैं कि) मृडानी जैसे पर्वतसे उत्पन्न हुईं, उस शुभ आख्यानको मैंने आपसे कहा। पर्वतनन्दिनीका यह आख्यान स्वर्ग एवं यशको देनेवाला, पापका हरण करनेवाला एवं ओजस्वी है॥ ७३–७७॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें चौवनवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ५४॥
पचपनवाँ अध्याय
देवीद्वारा नमुचिका वध; शुम्भ-निशुम्भका वृत्तान्त, धूम्रलोचनका वध, देवीका चण्ड-मुण्डसे युद्ध और असुरसैन्यसहित चण्ड-मुण्डका विनाश
| पुलस्त्य उवाच | पुलस्त्यजी बोले— |
|---|---|
| कश्यपस्य दनुर्नाम भार्यासीद् द्विजसत्तम।<br>तस्याः पुत्रत्रयं चासीत् सहस्राक्षाद् बलाधिकम्॥ १<br>ज्येष्ठः शुम्भ इति ख्यातो निशुम्भश्चापरोऽसुरः।<br>तृतीयो नमुचिर्नाम महाबलसमन्वितः॥ २<br>योऽसौ नमुचिरित्येवं ख्यातो दनुसुतोऽसुरः।<br>तं हन्तुमिच्छति हरिः प्रगृह्य कुलिशं करे॥ ३<br>त्रिदिवेशं समायान्तं नमुचिस्तद्भयादथ।<br>प्रविवेश रथं भानोस्ततो नाशकदच्युतः॥ ४ | द्विजसत्तम! कश्यपकी दनु नामकी पत्नी थी। उसके इन्द्रसे अधिक बलशाली तीन पुत्र थे। उनमें बड़ेका नाम था शुम्भ, मझलेका नाम निशुम्भ और महाबलशाली तृतीय पुत्रका नाम नमुचि था। इन्द्रने हाथमें वज्र धारणकर नमुचि नामसे विख्यात (उस) दनुपुत्र असुरको मारना चाहा; तब नमुचि इन्द्रको आते देखकर उनके भयसे सूर्यके रथमें प्रवेश कर गया। इससे इन्द्र उसे मार न सके॥ १–४॥ |
| शक्रस्तेनाथ समयं चक्रे सह महात्मना।<br>अवध्यत्वं वरं प्रादाच्छस्त्रैरस्त्रैश्च नारद॥ ५<br>ततोऽवध्यत्वमाज्ञाय शस्त्रादस्त्राच्च नारद।<br>संत्यज्य भास्कररथं पातालमुपयादथ॥ ६ | नारद! इसके बाद महात्मा इन्द्रने उससे समझौता कर लिया और उसे अस्त्र-शस्त्रोंसे न मारे जानेका वर दे दिया। नारदजी! उसके बाद तो वह (नमुचि) अपनेको अस्त्र-शस्त्रोंसे न मारे जानेवाला जानकर सूर्यके |
| २४२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ५५ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स निमज्जन्नपि जले सामुद्रं फेनमुत्तमम्।<br>ददृशे दानवपतिस्तं प्रगृह्येदमब्रवीत्॥ ७<br><br>यदुक्तं देवपतिना वासवेन वचोऽस्तु तत्।<br>अयं स्पृशतु मां फेनः कराभ्यां गृह्य दानवः॥ ८<br><br>मुखनासक्षिकर्णादीन् सम्ममार्ज यथेच्छया।<br>तस्मिञ्छक्रोऽसृजद् वज्रमन्तर्हितमपीश्वरः॥ ९ | रथको त्यागकर पाताललोकमें चला गया। उस दानवपतिने जलमें स्नान करते हुए समुद्रके उत्तम फेनको देखा और उसे ग्रहण कर यह वचन कहा—'देवराज इन्द्रने जो वचन कहा है वह सफल हो। यह फेन मेरा स्पर्श करे।' ऐसा कहकर वह दानव दोनों हाथोंसे फेन उठाकर अपनी इच्छाके अनुसार उससे अपने मुख, नाक और कर्ण आदिका मार्जन करने लगा। उस (फेन)-में छिपे हुए इन्द्रदेवने वज्रकी सृष्टि की॥ ५–९॥ |
| तेनासौ भग्ननासास्यः पपात च ममार च।<br>समये च तथा नष्टे ब्रह्महत्याऽस्पृशद्धरिम्॥ १०<br><br>स वै तीर्थं समासाद्य स्नातः पापाद्वमुच्यत।<br>ततोऽस्य भ्रातरौ वीरौ क्रुद्धौ शुम्भनिशुम्भकौ॥ ११<br><br>उद्योगं सुमहत्कृत्वा सुरान् बाधितुमागतौ।<br>सुरास्तेऽपि सहस्राक्षं पुरस्कृत्य विनिर्ययुः॥ १२<br><br>जितास्त्वाक्रम्य दैत्याभ्यां सबलाः सपदानुगाः।<br>शक्रस्याहृत्य च गजं याम्यं च महिषं बलात्॥ १३<br><br>वरुणस्य मणिच्छत्रं गदां वै मारुतस्य च।<br>निधयः पद्मशङ्खाद्या हृतास्त्वाक्रम्य दानवैः॥ १४ | उससे उसकी नाक और मुख भग्न हो गये और वह गिर पड़ा तथा मर गया। प्रतिज्ञाके भङ्ग हो जानेसे इन्द्रको ब्रह्महत्याका पाप लगा। (फिर) वे तीर्थोंमें जाकर स्नान करनेसे पापमुक्त हुए। उसके बाद (नमुचिके मर जानेपर) शुम्भ और निशुम्भ नामके उसके दो वीर भाई अत्यन्त कुपित हुए। वे दोनों बहुत बड़ी तैयारी कर देवताओंको मारनेके लिये चढ़ आये। (फिर तो) वे सभी देवता भी इन्द्रको आगे कर निकल पड़े। उन दोनों दैत्योंने धावा बोलकर सेना और अनुचरोंके साथ देवताओंको पराजित कर दिया। दानवोंने आक्रमणकर इन्द्रके हाथी, यमके महिष, वरुणके मणिमय छत्र, वायुकी गदा तथा पद्म और शङ्ख आदि निधियोंको भी छीन लिया॥ १०–१४॥ |
| त्रैलोक्यं वशगं चास्ते ताभ्यां नारद सर्वतः।<br>तदाजग्मुर्महीपृष्ठं ददृशुस्ते महासुरम्॥ १५<br><br>रक्तबीजमथोचुस्ते को भवानिति सोऽब्रवीत्।<br>स चाह दैत्योऽस्मि विभो सचिवो महिषस्य तु॥ १६<br><br>रक्तबीजेति विख्यातो महावीर्यो महाभुजः।<br>अमात्यौ रुचिरौ वीरौ चण्डमुण्डाविति श्रुतौ॥ १७<br><br>तावास्तां सलिले मग्नौ भयाद् देव्या महाभुजौ।<br>यस्त्वासीत् प्रभुरस्माकं महिषो नाम दानवः॥ १८<br><br>निहतः स महादेव्या विन्ध्यशैले सुविस्तृते।<br>भवन्तौ कस्य तनयौ कौ वा नाम्ना परिश्रुतौ।<br>किंवीर्यौ किंप्रभावौ च एतच्छंसितुमर्हथ॥ १९ | नारदजी! उन दोनोंने तीनों लोकोंको अपने अधीन कर लिया। तब वे सभी (देवतालोग) पृथ्वीतलपर आ गये तथा उन लोगोंने रक्तबीज नामके एक महान् असुरको देखा और उससे पूछा—आप कौन हैं? उसने उत्तर दिया—विभो! मैं महिषासुरका मन्त्री एक दैत्य हूँ। मैं रक्तबीज नामसे विख्यात महापराक्रमी एवं विशाल भुजाओंवाला (दैत्य) हूँ। सुन्दर, श्रेष्ठ और विशाल भुजाओंवाले चण्ड और मुण्ड नामसे विख्यात, महिषके दो मन्त्री देवीके डरसे जलमें छिप गये हैं। महादेवीने सुविस्तृत विन्ध्यपर्वतपर हमारे स्वामी महिष नामके दानवको मार डाला है। फिर (देवताओँने पूछा—) आपलोग (हमें) यह बतलावें कि आप दोनों किसके पुत्र हैं तथा आपलोग किस नामसे विख्यात हैं? (और आप दोनों यह भी बतलावें कि) आपलोगोंमें कितना बल एवं प्रभाव है?॥ १५–१९॥ |
| अध्याय ५५ ] | देवीद्वारा नमुचिका वध; असुरसैन्यसहित चण्ड-मुण्डका विनाश | २४३ |
|---|
| शुम्भनिशुम्भावूचतुः | |
|---|---|
| अहं शुम्भ इति ख्यातो दनोः पुत्रस्तथौरसः।<br>निशुम्भोऽयं मम भ्राता कनीयान् शत्रुपूगहा॥ २०<br><br>अनेन बहुशो देवाः सेन्द्ररुद्रदिवाकराः।<br>समेत्य निर्जिता वीरा येऽन्ये च बलवत्तराः॥ २१<br><br>तदुच्यतां कया दैत्यो निहतो महिषासुरः।<br>यावत्तां घातयिष्यावः स्वसैन्यपरिवारितौ॥ २२<br><br>इत्थं तयोस्तु वदतोर्नर्मदायास्तटे मुने।<br>जलवासाद् विनिष्क्रान्तौ चण्डमुण्डौ च दानवौ॥ २३ | शुम्भ और निशुम्भने कहा—(पहले शुम्भ बोला—) मैं दनुका औरस पुत्र हूँ और शुम्भ नामसे प्रसिद्ध हूँ। यह मेरा छोटा भाई है। इसका नाम निशुम्भ है। यह शत्रुसमूहका विनाश करनेवाला (वीर) है। इसने इन्द्र, रुद्र, दिवाकर आदि देवताओं तथा अन्य अनेक अत्यन्त बलशाली वीरोंको भी (बहुत बार चढ़ाई करके) पराजित कर दिया है। अब तुम बतलाओ कि किस देवीने दैत्य महिषासुरको मार दिया है? हम दोनों अपनी सेनाओंको साथ लेकर उस देवीका विनाश करेंगे। मुने! नर्मदाके किनारे इस प्रकार दोनोंके बात करते समय चण्ड और मुण्ड नामके दोनों दानव जलसे बाहर निकल आये॥ २०–२३॥ |
| ततोऽभ्येत्यासुरश्रेष्ठौ रक्तबीजं समाश्रितौ।<br>ऊचतुर्वचनं श्लक्ष्णं कोऽयं तव पुरस्सरः॥ २४<br><br>स चोभौ प्राह दैत्योऽसौ शुम्भो नाम सुरार्दनः।<br>कनीयानस्य च भ्राता द्वितीयो हि निशुम्भकः॥ २५<br><br>एतावाश्रित्य तां दुष्टां महिषघ्नीं न संशयः।<br>अहं विवाहयिष्यामि रत्नभूतां जगत्त्रये॥ २६ | उसके बाद असुरश्रेष्ठ उन दोनोंने रक्तबीजके निकट जाकर मधुर शब्दोंमें पूछा—तुम्हारे सामने यह कौन खड़ा है? उसने उन दोनोंसे कहा—यह देवताओंको कष्ट देनेवाला शुम्भ नामका दैत्य है एवं यह दूसरा इसका छोटा भाई निशुम्भ है। मैं निश्चय ही इन दोनोंकी सहायतासे उस तीनों लोकोंमें रत्नस्वरूपा, (पर) दुष्टासे विवाह करूँगा, जिसने महिषासुरका विनाश किया है॥ २४–२६॥ |
| चण्ड उवाच<br>न सम्यगुक्तं भवता रत्नार्होऽसि न साम्प्रतम्।<br>यः प्रभुः स्यात्स रत्नार्हस्तस्माच्छुम्भाय योज्यताम्॥ २७<br>तदाचचक्षे शुम्भाय निशुम्भाय च कौशिकीम्।<br>भूयोऽपि तद्विधां जातां कौशिकीं रूपशालिनीम्॥ २८<br>ततः शुम्भो निजं दूतं सुग्रीवं नाम दानवम्।<br>दैत्यं च प्रेषयामास सकाशं विन्ध्यवासिनीम्॥ २९<br>स गत्वा तद्वचः श्रुत्वा देव्यागत्य महासुरः।<br>निशुम्भशुम्भावाहेदं मन्युनाभिपरिप्लुतः॥ ३० | **चण्डने कहा—**आपका कहना उचित नहीं है; (क्योंकि) आप अभी उस रत्नके योग्य नहीं हैं। राजा ही रत्नके योग्य होता है। अतः शुम्भके लिये ही यह संयोग बैठाइये। उसके बाद उन्होंने शुम्भ और निशुम्भसे उस प्रकार सम्पन्न स्वरूपवाली कौशिकीका वर्णन किया। तब शुम्भने अपने दूत सुग्रीव नामके दानवको विन्ध्यवासिनीके समीप भेजा। वह महान् असुर सुग्रीव वहाँ गया एवं देवीकी बात सुनकर क्रोधसे तिलमिला उठा। फिर उसने आकर निशुम्भ और शुम्भसे कहा॥ २७–३०॥ |
| सुग्रीव उवाच<br>युवयोर्वचनाद् देवीं प्रदेष्टुं दैत्यनायकौ।<br>गतवानहमद्यैव तामहं वाक्यमब्रुवम्॥ ३१<br>यथा शुम्भोऽतिविख्यातः ककुद्मी दानवेष्वपि।<br>स त्वां प्राह महाभागे प्रभुरस्मि जगत्त्रये॥ ३२<br>यानि स्वर्गे महीपृष्ठे पाताले चापि सुन्दरि।<br>रत्नानि सन्ति तावन्ति मम वेश्मनि नित्यशः॥ ३३<br>त्वमुक्ता चण्डमुण्डाभ्यां रत्नभूता कृशोदरि।<br>तस्माद् भजस्व मां वा त्वं निशुम्भं वा ममानुजम्॥ ३४ | **सुग्रीवने कहा—**दैत्यनायको! आपलोगोंके कथनके अनुसार देवीसे (संवाद) कहनेके लिये मैं गया था। मैंने आज ही जाकर उससे कहा कि भाग्यशालिनि! सुप्रसिद्ध दानवश्रेष्ठ शुम्भने तुमसे कहा है कि मैं तीनों लोकोंका समर्थ स्वामी हूँ। सुन्दरि! स्वर्ग, पृथ्वी एवं पातालके सारे रत्न मेरे घरमें सदा भरे रहते हैं। कृशोदरि! चण्ड और मुण्डने तुम्हें रत्नस्वरूपा बतलाया है। अतः तुम मेरा या मेरे छोटे भाई निशुम्भका वरण करो॥ ३१–३४॥ |