वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६ ततो हरः शरेणाथ उन्मादेनाशु ताडितः। विचचार मदोन्मत्तः काननानि सरांसि च ॥ २८ स्मरन् सतीं महादेवस्तथोन्मादेन ताडितः। न शर्म लेभे देवर्षे बाणविद्ध इव द्विपः ॥ २९ ततः पपात देवेशः कालिन्दीसरितं मुने। निमग्ने शंकरे आपो दग्धाः कृष्णत्वमागताः ॥ ३० तदाप्रभृति कालिन्द्या भृङ्गाञ्जननिभं जलम्। आस्यन्दत् पुण्यतीर्था सा केशपाशमिवावनेः ॥ ३१ ततो नदीषु पुण्यासु सरस्सु च नदेषु च। पुलिनेषु च रम्येषु वापीषु नलिनीषु च ॥ ३२ पर्वतेषु च रम्येषु काननेषु च सानुषु। विचरन् स्वेच्छया नैव शर्म लेभे महेश्वरः ॥ ३३ क्षणं गायति देवर्षे क्षणं रोदिति शंकरः। क्षणं ध्यायति तन्वङ्गीं दक्षकन्यां मनोरमाम् ॥ ३४ ध्यात्वा क्षणं प्रस्वपिति क्षणं स्वप्नायते हरः। स्वप्ने तथे॒दं गदति तां दृष्ट्वा दक्षकन्यकाम् ॥ ३५ निर्घृणे तिष्ठ किं मूढे त्यजसे मामनिन्दिते। मुग्धे त्वया विरहितो दग्धोऽस्मि मदनाग्निना ॥ ३६ सति सत्यं प्रकुपिता मा कोपं कुरु सुन्दरि। पादप्रणामावनतमभिभाषितुमर्हसि ॥ ३७ श्रूयसे दृश्यसे नित्यं स्पृश्यसे वन्द्यसे प्रिये। आलिङ्ग्यसे च सततं किमर्थं नाभिभाषसे ॥ ३८ विलपन्तं जनं दृष्ट्वा कृपा कस्य न जायते। विशेषतः पतिं बाले ननु त्वमतिनिर्घृणा ॥ ३९ त्वयोक्तानि वचांस्येवं पूर्वं मम कृशोदरि। विना त्वया न जीवेयं तदसत्यं त्वया कृतम् ॥ ४० एहोहि कामसंतप्तं परिष्वज सुलोचने। नान्यथा नश्यते तापः सत्येनापि शपे प्रिये ॥ ४१ इत्थं विलप्य स्वप्नान्ते प्रतिबुद्धस्तु तत्क्षणात्। उत्कूजति तथारण्ये मुक्तकण्ठं पुनः पुनः ॥ ४२ आहत होकर शिवजी उन्मत्त होकर वनों और सरोवरोंमें घूमने लगे। देवर्षे ! बाणविद्ध गजके समान उन्मादसे व्यथित महादेव सतीका स्मरण करते हुए बड़े अशान्त हो रहे थे—उन्हें चैन नहीं था ॥ २६–२९ ॥ मुने ! उसके बाद शिवजी यमुना नदीमें कूद पड़े। उनके जलमें निमज्जन करनेसे उस नदीका जल काला हो गया। उस समयसे कालिन्दी नदीका जल भृंग और अंजनके सदृश कृष्णवर्णका हो गया एवं वह पवित्र तीर्थोंवाली नदी पृथ्वीके केशपाशके सदृश प्रवाहित होने लगी। उसके बाद पवित्र नदियों, सरोवरों, नदों, रमणीय नदी-तटों, वापियों, कमलवनों, पर्वतों, मनोहर काननों तथा पर्वत-शृङ्गोंपर स्वेच्छापूर्वक विचरण करते हुए भगवान् शिव कहीं भी शान्ति नहीं प्राप्त कर सके ॥ ३०-३३। देवर्षे ! वे कभी गाते, कभी रोते और कभी कृशाङ्गी सुन्दरी सतीका ध्यान करते। ध्यान करके कभी सोते और कभी स्वप्न देखने लगते थे; स्वप्नकालमें सतीको देखकर वे इस प्रकार कहते थे—निर्दये ! रुको, हे मूढे ! मुझे क्यों छोड़ रही हो ? हे अनिन्दिते ! हे मुग्धे ! तुम्हारे विरहमें मैं कामाग्निसे दग्ध हो रहा हूँ। हे सति ! क्या तुम वस्तुतः क्रुद्ध हो ? सुन्दरि ! क्रोध मत करो। मैं तुम्हारे चरणोंमें अवनत होकर प्रणाम करता हूँ। तुम्हें मेरे साथ बात तो करनी ही चाहिये ॥ ३४-३७॥ प्रिये ! मैं सतत तुम्हारी ध्वनि सुनता हूँ, तुम्हें देखता हूँ, तुम्हारा स्पर्श करता हूँ, तुम्हारी वन्दना करता हूँ और तुम्हारा परिष्वङ्ग करता हूँ। तुम मुझसे बात क्यों नहीं कर रही हो ? बाले ! विलाप करनेवाले व्यक्तिको देखकर किसे दया नहीं उत्पन्न होती ? विशेषतः अपने पतिको विलाप करता देखकर तो किसे दया नहीं आती ? निश्चय ही तुम अति निर्दयी हो । सूक्ष्मकटिवाली ! तुमने पहले मुझसे कहा था कि तुम्हारे बिना मैं जीवित नहीं रहूँगी। उसे तुमने असत्य कर दिया। सुलोचने ! आओ, आओ; कामसन्तप्त मुझे आलिङ्गित करो। प्रिये ! मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि अन्य किसी प्रकार मेरा ताप नहीं शान्त होगा ॥ ३८-४१॥ इस प्रकार वे विलाप कर स्वप्नके अन्तमें उठकर वनमें बार-बार रोने लगे। इस प्रकार मुक्तकण्ठसे
गीताप्रेस, गोरखपुर
भगवान् वामन
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त्वचा वामन
अंगों पर अंकित पुराण-नाम:
- मस्तक: ब्रह्म
- कण्ठ: ब्रह्माण्ड, पद्म
- वक्ष/हृदय: मत्स्य, स्कन्द, गरुड़
- भुजाएँ: विष्णु, शिव
- कटि/नाभि: नारद
- ऊरु/वस्त्र: भागवत, भागवत, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त
- चरण: लिङ्ग, मार्कण्डेय, अग्नि, वाराह
गीताप्रेस, गोरखपुर
वामनावतारी भगवान् विष्णु
दक्ष-यज्ञका विध्वंस
[चित्र: गीताप्रेस, गोरखपुर]
७- उर्वशीकी उत्पत्ति-कथा, प्रह्लाद-प्रसंग—नर-नारायणसे संवाद एवं युद्धोपक्रम
Deolalikar
गीताप्रेस, गोरखपुर
चतुर्मुख ब्रह्मा
शिव-विवाह
गीताप्रेस, गोरखपुर
गीताप्रेस, गोरखपुर
मङ्गलायतन भगवान् विनायक
गीताप्रेस, गोरखपुर
भगवान् कार्तिकेय
गीताप्रेस, गोरखपुर जगन्नाथप्र.
मन्दराचलपर अवस्थित भगवान् शङ्कर
८- प्रह्लाद और नारायणका तुमुल युद्ध, भक्तिसे विजय
अध्याय ६ ] नर-नारायणकी उत्पत्ति, बदरिकाश्रमकी वसन्तकी शोभा, कामकी अङ्गताका वर्णन ३३ तं कूजमानं विलपन्तमारात् समीक्ष्य कामो वृषकेतनं हि। विव्याध चापं तरसा विनाम्य संतापनाम्ना तु शरेण भूयः ॥ ४३ संतापनास्त्रेण तदा स विद्धो भूयः स संतप्ततरो बभूव। संतापयँश्चापि जगत्समग्रं फूत्कृत्य फूत्कृत्य विवासते स्म॥ ४४ तं चापि भूयो मदनो जघान विजृम्भणास्त्रेण ततो विजृम्भे। ततो भृशं कामशरैर्विदुन्नो विजृम्भमाणः परितो भ्रमंश्च ॥ ४५ ददर्श यक्षाधिपतेस्तनूजं पाञ्चालिकं नाम जगत्प्रधानम्। दृष्ट्वा त्रिनेत्रो धनदस्य पुत्रं पार्श्वं समभ्येत्य वचो बभाषे। भ्रातृव्य वक्ष्यामि वचो यदद्य तत् त्वं कुरुष्वामितविक्रमोऽसि ॥ ४६ पाञ्चालिक उवाच यन्नाथ मां वक्ष्यसि तत्करिष्ये सुदुष्करं यद्यपि देवसंघैः । आज्ञापयस्वांतुलवीर्य शंभो दासोऽस्मि ते भक्तियुतस्तथेश ॥ ४७ ईश्वर उवाच नाशं गतायां वरदाम्बिकायां कामाग्निना प्लुष्टसुविग्रहोऽस्मि । विजृम्भणोन्मादशरैर्विभिन्नो धृतिं न विन्दामि रतिं सुखं वा ॥ ४८ विजृम्भणं पुत्र तथैव ताप- मुन्मादमुग्रं मदनप्रणुन्नम् । नान्यः पुमान् धारयितुं हि शक्तो मुक्त्वा भवन्तं हि ततः प्रतीच्छ ॥ ४९ पुलस्त्य उवाच इत्येवमुक्तो वृषभध्वजेन यक्षः प्रतीच्छत् स विजृम्भणादीन् । तोषं जगामाशु ततस्त्रिशूली तुष्टस्तदैवं वचनं बभाषे ॥ ५० हर उवाच यस्मात्त्वया पुत्र सुदुर्धराणि विजृम्भणादीनि प्रतीच्छितानि । विलाप करते हुए भगवान् शंकरको दूरसे देखकर कामने अपना धनुष झुका (चढ़ा)-कर पुनः वेगसे उन्हें संतापक अस्त्रसे वेध डाला। अब वे इससे विद्ध होकर और भी अधिक संतप्त हो गये एवं मुखसे बारंबार (विलख) फूत्कार कर सम्पूर्ण विश्वको दुःखी करते हुए जैसे-तैसे समय बिताने लगे। फिर कामने उनपर विजृम्भण नामक अस्त्रसे प्रहार किया। इससे उन्हें जँभाई आने लगी। अब कामके बाणोंसे विशेष पीड़ित होकर जँभाई लेते हुए वे चारों ओर घूमने लगे। इसी समय उन्होंने कुबेरके पुत्र पाञ्चालिकको देखा और उसको देखकर उसके पास जाकर त्रिनेत्र शंकरने यह बात कही - भ्रातृव्य ! तुम अमित विक्रमशाली हो, मैं जो आज बात कहता हूँ तुम उसे करो ॥ ४२-४६ ॥ पाञ्चालिकने कहा - स्वामिन् ! आप जो कहेंगे, देवताओंद्वारा सुदुष्कर होनेपर भी उसे मैं करूँगा। हे अतुल बलशाली शिव ! आप आज्ञा करें। ईश ! मैं आपका श्रद्धालु भक्त एवं दास हूँ ॥ ४७ ॥ भगवान् शिव बोले - वरदायिनी अम्बिका (सती)-के नष्ट होनेसे मेरा सुन्दर शरीर कामाग्निसे अत्यन्त दग्ध हो रहा है। कामके विजृम्भण और उन्माद शरोंसे विद्ध होनेसे मुझे धैर्य, रति या सुख नहीं प्राप्त हो रहा है। पुत्र ! तुम्हारे अतिरिक्त अन्य कोई पुरुष, कामदेवसे प्रेरित विजृम्भण, संतापन और उन्माद नामक उग्र अस्त्र सहन करनेमें समर्थ नहीं है। अतः तुम इन्हें ग्रहण कर लो ॥ ४८-४९॥ पुलस्त्यजी बोले - भगवान् शिवके ऐसा कहनेपर उस यक्ष (कुबेर-पुत्र पाञ्चालिक)-ने विजृम्भण आदि सभी अस्त्रोंको उनसे ले लिया। इससे त्रिशूलीको तत्काल संतोष प्राप्त हो गया और प्रसन्न होकर उन्होंने उससे ये वचन कहे - ॥ ५० ॥ भगवान् महादेवजी बोले- पुत्र ! तुमने अति भयंकर विजृम्भण आदि अस्त्रोंको ग्रहण कर लिया,
३४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय ६ तस्माद्वरं त्वां प्रतिपूजनाय दास्यामि लोकस्य च हास्यकारि ॥ ५१ यस्त्वां यदा पश्यति चैत्रमासे स्पृशेनरो वार्चयते च भक्त्या। वृद्धोऽथ बालोऽथ युवाथ योषित् सर्वे तदोन्मादधरा भवन्ति ॥ ५२ गायन्ति नृत्यन्ति रमन्ति यक्ष वाद्यानि यत्नादपि वादयन्ति। तवाग्रतो हास्यवचोऽभिरक्ता भवन्ति ते योग्ययुतास्तु ते स्युः ॥ ५३ ममैव नाम्ना भविताऽसि पूज्यः पाञ्चालिकेशः प्रथितः पृथिव्याम्। मम प्रसादाद् वरदो नराणां भविष्यसे पूज्यतमोऽभिगच्छ ॥ ५४ इत्येवमुक्तो विभुना स यक्षो जगाम देशान् सहसैव सर्वान्। कालञ्जरस्योत्तरतः सुपुण्यो देशो हिमाद्रेरपि दक्षिणस्थः ॥ ५५ तस्मिन् सुपुण्ये विषये निविष्टो रुद्रप्रसादादभिपूज्यतेऽसौ । तस्मिन् प्रयाते भगवांस्त्रिनेत्रो देवोऽपि विन्ध्यं गिरिमभ्यगच्छत् ॥ ५६ तत्रापि मदनो गत्वा ददर्श वृषकेतनम्। दृष्ट्वा प्रहर्तुकामं च ततः प्रादुद्रवद्धरः ॥ ५७ ततो दारुवनं घोरं मदनाभिसुतो हरः। विवेश ऋषयो यत्र सपत्नीका व्यवस्थिताः ॥ ५८ ते चापि ऋषयः सर्वे दृष्ट्वा मूर्ध्ना नताभवन्। ततस्तान् प्राह भगवान् भिक्षा मे प्रतिदीयताम् ॥ ५९ ततस्ते मौनिनस्तस्थुः सर्व एव महर्षयः। तदाश्रमाणि सर्वाणि परिचक्राम नारद ॥ ६० तं प्रविष्टं तदा दृष्ट्वा भार्गवात्रेययोषितः। प्रक्षोभमगमन् सर्वा हीनसत्त्वाः समन्ततः ॥ ६१ ऋते त्वरुन्धतीमेकामनसूयां च भामिनीम्। एताभ्यां भर्तृपूजासु तच्चिन्तासु स्थितं मनः ॥ ६२ ततः संक्षुभिताः सर्वा यत्र याति महेश्वरः। तत्र प्रयान्ति कामार्त्ता मदविह्वलितेन्द्रियाः ॥ ६३ त्यक्त्वाश्रमाणि शून्यानि स्वानि ता मुनियोषितः। अनुजग्मुर्यथा मत्तं करिण्य इव कुञ्जरम् ॥ ६४ अतः प्रत्युपकारमें तुम्हें सब लोगोंके लिये आनन्ददायक वर दूँगा। चैत्रमासमें जो वृद्ध, बालक, युवा या स्त्री तुम्हारा स्पर्श करेंगे या भक्तिपूर्वक तुम्हारी पूजा करेंगे वे सभी उन्मत्त हो जायेंगे। यक्ष! फिर वे गायेंगे, नाचेंगे, आनन्दित होंगे और निपुणताके साथ बाजे बजायेंगे। किंतु तुम्हारे सम्मुख हँसीकी बात करते हुए भी वे योगयुक्त रहेंगे। मेरे ही नामसे तुम पूज्य होगे। विश्वमें तुम्हारा पाञ्चालिकेश नाम प्रसिद्ध होगा। मेरे आशीर्वादसे तुमलोगोंके वरदाता और पूज्यतम होगे; जाओ ॥ ५१-५४॥ भगवान् शिवके ऐसा कहनेपर वह यक्ष तुरंत सब देशोंमें घूमने लगा। फिर वह कालञ्जरके उत्तर और हिमालयके दक्षिण परम पवित्र स्थानमें स्थिर हो गया। वह शिवजीकी कृपासे पूजित हुआ। उसके चले जानेपर भगवान् त्रिनेत्र भी विन्ध्यपर्वतपर आ गये। वहाँ भी कामने उन्हें देखा। उसे पुनः प्रहारकी चेष्टा करते देख शिवजी भागने लगे। उसके बाद कामदेवके द्वारा पीछा किये जानेपर महादेवजी घोर दारुवनमें चले गये, जहाँ ऋषिगण अपनी पत्नियोंके साथ निवास करते थे ॥ ५५-५८ ॥ उन ऋषियोंने भी उन्हें देखकर सिर झुकाकर प्रणाम किया। फिर भगवान्ने उनसे कहा-आपलोग मुझे भिक्षा दीजिये। इसपर सभी महर्षि मौन रह गये। नारदजी! इसपर महादेवजी सभी आश्रमोंमें घूमने लगे। उस समय उन्हें आश्रममें आया हुआ देख पतिव्रता अरुन्धती और अनसूयाको छोड़कर ऋषियोंकी समस्त पत्नयाँ प्रक्षुब्ध एवं सत्यहीन हो गयीं। पर अरुन्धती और अनसूया पतिसेवामें ही लगी रहीं ॥ ५९-६२ ॥ अब शिवजी जहाँ-जहाँ जाते थे, वहाँ-वहाँ संक्षुभित, कामार्त एवं मदसे विकल इन्द्रियोंवाली स्त्रियाँ भी जाने लगीं। मुनियोंकी वे स्त्रियाँ अपने आश्रमोंको सूना छोड़ उनका इस प्रकार अनुसरण करने लगीं, जैसे करेणु
अध्याय ६ ] नर-नारायणकी उत्पत्ति, बदरिकाश्रमकी वसन्तकी शोभा, कामकी अङ्गताका वर्णन ३५ ततस्तु ऋषयो दृष्ट्वा भार्गवाङ्गिरसो मुने। क्रोधान्विताब्रुवन्सर्वे लिङ्गोऽस्य पततां भुवि ॥ ६५ ततः पपात देवस्य लिङ्गं पृथ्वीं विदारयन्। अन्तर्द्धानं जगामाथ त्रिशूली नीललोहितः ॥ ६६ ततः स पतितो लिङ्गो विभिद्य वसुधातलम्। रसातलं विवेशाशु ब्रह्माण्डं चोर्ध्वतोऽभिनत् ॥ ६७ ततश्चचाल पृथिवी गिरयः सरितो नगाः। पातालभुवनाः सर्वे जङ्गमाजङ्गमैर्वृताः ॥ ६८ संक्षुब्धान् भुवनान् दृष्ट्वा भूर्लोकादीन् पितामहः। जगाम माधवं द्रष्टुं क्षीरोदं नाम सागरम्॥ ६९ तत्र दृष्ट्वा हृषीकेशं प्रणिपत्य च भक्तितः। उवाच देव भुवनाः किमर्थं क्षुभिता विभो ॥ ७० अथोवाच हरिर्ब्रह्मन् शार्वो लिङ्गो महर्षिभिः। पातितस्तस्य भारार्ता संचचाल वसुंधरा ॥ ७१ ततस्तदद्भुततमं श्रुत्वा देवः पितामहः। तत्र गच्छाम देवेश एवमाह पुनः पुनः ॥ ७२ ततः पितामहो देवः केशवश्च जगत्पतिः। आजग्मतुस्तमुद्देशं यत्र लिङ्गं भवस्य तत् ॥ ७३ ततोऽनन्तं हरिलिङ्गं दृष्ट्वारुह्य खगेश्वरम्। पातालं प्रविवेशाथ विस्मयान्तरितो विभुः ॥ ७४ ब्रह्मा पद्मविमानेन ऊर्ध्वमाक्रम्य सर्वतः। नैवान्तमलभद् ब्रह्मन् विस्मितः पुनरागतः ॥ ७५ विष्णुर्गत्वाऽथ पातालान् सप्त लोकपरायणः। चक्रपाणिर्विनिष्क्रान्तो लेभेऽन्तं न महामुने ॥ ७६ विष्णुः पितामहश्चोभौ हरलिङ्गं समेत्य हि। कृताञ्जलिपुटौ भूत्वा स्तोतुं देवं प्रचक्रतुः ॥ ७७ हरिब्रह्माणावूचतुः नमोऽस्तु ते शूलपाणे नमोऽस्तु वृषभध्वज। जीमूतवाहन कवे शर्व त्र्यम्बक शंकर ॥ ७८ महेश्वर महेशान सुवर्णाक्ष वृषाकपे। दक्षयज्ञक्षयकर कालरूप नमोऽस्तु ते ॥ ७९ त्वमादिरस्य जगतस्त्वं मध्यं परमेश्वर। भवानन्तश्च भगवान् सर्वगस्त्वं नमोऽस्तु ते ॥ ८० मदमत्त गजका अनुसरण करे। मुने! यह देखकर ऋषिगण क्रुद्ध हो गये एवं कहा कि इनका लिङ्ग भूमिपर गिर जाय। फिर तो महादेवका लिङ्ग पृथ्वीको विदीर्ण करता हुआ गिर गया एवं तब नीललोहित त्रिशूली अन्तर्धान हो गये ॥ ६३-६६ ॥ वह पृथ्वीपर गिरा लिंग उसका भेदन कर तुरंत रसातलमें प्रविष्ट हो गया एवं ऊपरकी ओर भी उसने विश्वब्रह्माण्डका भेदन कर दिया। इसके बाद पृथ्वी, पर्वत, नदियाँ, पादप तथा चराचरसे पूर्ण समस्त पाताललोक काँप उठे। पितामह ब्रह्मा भूर्लोक आदि भुवनोंको संक्षुब्ध देखकर श्रीविष्णुसे मिलने क्षीरसागर पहुँचे। वहाँ उन्हें देख भक्तिपूर्वक प्रणाम कर ब्रह्माने कहा- देव ! समस्त भुवन विक्षुब्ध कैसे हो गये हैं ? ॥ ६७-७० ॥ इसपर श्रीहरिने कहा- ब्रह्मन् ! महर्षियोंने शिवके लिङ्गको गिरा दिया है। उसके भारसे कष्टमें पड़ी आर्त पृथ्वी विचलित हो रही है। इसके बाद ब्रह्माजी उस अद्भुत बातको सुनकर देवेश ! हमलोग वहाँ चलें- ऐसा बार-बार कहने लगे। फिर ब्रह्मा और जगत्पति विष्णु वहाँ पहुँचे, जहाँ शंकरका लिङ्ग गिरा था। वहाँ उस अनन्त लिङ्गको देखकर आश्चर्यचकित होकर हरि गरुड़पर सवार हो उसका पता लगानेके लिये पातालमें प्रविष्ट हुए ॥ ७१-७४ ॥ नारदजी ! ब्रह्माजी अपने पद्मायानके द्वारा सम्पूर्ण ऊर्ध्वाकाशको लाँघ गये, पर उस लिङ्गका अन्त नहीं पा सके और आश्चर्यचकित होकर वे लौट आये। मुने ! इसी प्रकार जब चक्रपाणि भगवान् विष्णु भी सातों पातालोंमें प्रवेश कर उस लिङ्गका बिना अन्त पाये ही वहाँसे बाहर आये, तब ब्रह्मा, विष्णु दोनों शिवलिङ्गके पास जाकर हाथ जोड़कर उनकी स्तुति करने लगे ॥ ७५-७७ ॥ ब्रह्मा-विष्णु बोले - शूलपाणिजी ! आपको प्रणाम है। वृषभध्वज ! जीमूतवाहन ! कवि ! शर्व ! त्र्यम्बक ! शंकर ! आपको प्रणाम है। महेश्वर ! महेशान ! सुवर्णाक्ष ! वृषाकपे ! दक्ष-यज्ञ-विध्वंसक ! कालरूप शिव ! आपको प्रणाम है। परमेश्वर ! आप इस जगत्के आदि, मध्य एवं अन्त हैं। आप षडैश्वर्यपूर्ण भगवान् सर्वत्रगामी या सर्वत्र व्याप्त हैं। आपको प्रणाम है ॥ ७८-८० ॥
| ३६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ६ |
|---|
| Sanskrit | Hindi |
|---|---|
| पुलस्त्य उवाच<br>एवं संस्तूयमानस्तु तस्मिन् दारुवने हरः।<br>स्वरूपी ताविदं वाक्यमुवाच वदतां वरः॥ ८१॥ | पुलस्त्यजी बोले— उस दारुवनमें इस प्रकार स्तुति किये जानेपर वक्ताओंमें श्रेष्ठ हरने अपने स्वरूपमें प्रकट होकर (अर्थात् मूर्तिमान् होकर) उन दोनोंसे इस प्रकार कहा— ॥ ८१ ॥ |
| हर उवाच<br>किमर्थं देवतानाथौ परिभूतक्रमं त्विह।<br>मां स्तुवाते भृशास्वस्थं कामतापितविग्रहम्॥ ८२ | भगवान् शंकर बोले— आप दोनों सभी देवताओंके स्वामी हैं। आपलोग चलते-चलते थके हुए तथा कामाग्निसे दग्ध और मुझ सब प्रकारसे अस्वस्थ व्यक्तिकी क्यों स्तुति कर रहे हैं?॥ ८२॥ |
| देवावूचतुः<br>भवतः पातितं लिङ्गं यदेतद् भुवि शंकर।<br>एतत् प्रगृह्यतां भूय अतो देव स्तुवावहे॥ ८३ | (इसपर) ब्रह्मा-विष्णु (दोनों) बोले— शिवजी! पृथ्वीपर आपका जो यह लिङ्ग गिराया गया है, उसे पुनः आप ग्रहण करें। इसीलिये हम आपकी स्तुति कर रहे हैं॥ ८३॥ |
| हर उवाच<br>यद्यर्चयन्ति त्रिदशा मम लिङ्गं सुरोत्तमौ।<br>तदेतत्प्रतिगृह्णीयां नान्यथेति कथंचन॥ ८४<br><br>ततः प्रोवाच भगवानैवमस्त्विति केशवः।<br>ब्रह्मा स्वयं च जग्राह लिङ्गं कनकपिङ्गलम्॥ ८५<br><br>ततश्चकार भगवांश्चातुर्वर्ण्यं हरार्चने।<br>शास्त्राणि चैषां मुख्यानि नानोक्ति विदितानि च॥ ८६<br><br>आद्यं शैवं परिख्यातमन्त्यत्पाशुपतं मुने।<br>तृतीयं कालवदनं चतुर्थं च कपालिनम्॥ ८७ | शिवजीने कहा— श्रेष्ठ देवो! यदि सभी देवता मेरे लिङ्गकी पूजा करना स्वीकार करें, तभी मैं इसे पुनः ग्रहण करूँगा, अन्यथा किसी प्रकार भी इसे नहीं धारण करूँगा। तब भगवान् विष्णु बोले—ऐसा ही होगा। फिर ब्रह्माजीने स्वयं उस स्वर्णके सदृश पिंगल लिङ्गको ग्रहण किया। तब भगवान्ने चारों वर्णोंको हर-लिङ्गकी अर्चनाका अधिकारी बनाया। इनके मुख्य शास्त्र नाना प्रकारके वचनोंसे प्रख्यात हैं। मुने! उन शिव-भक्तोंका प्रथम सम्प्रदाय शैव, द्वितीय पाशुपत, तृतीय कालमुख¹ और चतुर्थ सम्प्रदाय कापालिक या भैरव नामसे विख्यात है²॥ ८४–८७॥ |
| शैवश्चासीत्स्वयं शक्तिर्वसिष्ठस्य प्रियः सुतः।<br>तस्य शिष्यो बभूवाथ गोपायन इति श्रुतः॥ ८८ | महर्षि वसिष्ठके प्रियपुत्र शक्ति ऋषि स्वयं शैव थे। उनके एक शिष्य गोपायन नामसे प्रसिद्ध हुए। उन्होंने शैव सम्प्रदायको दूरतक फैलाया। |
| महापाशुपतश्चासीद्भरद्वाजस्तपोधनः ।<br>तस्य शिष्योऽप्यभूद्राजा ऋषभः सोमकेश्वरः॥ ८९ | तपोधन भरद्वाज महापाशुपत थे और सोमकेश्वर राजा ऋषभ उनके शिष्य हुए, जिनसे पाशुपत-सम्प्रदाय विशेषरूपसे परिवर्तित हुआ। |
| कालास्यो भगवानासीदापस्तम्बस्तपोधनः।<br>तस्य शिष्यो भवद्वैश्यो नाम्ना क्राथेश्वरो मुने॥ ९० | मुने! ऐश्वर्य एवं तपस्याके धनी महर्षि आपस्तम्ब, कालमुख सम्प्रदायके आचार्य थे। क्राथेश्वर नामके उनके वैश्य शिष्यने इस सम्प्रदायका विशेष रूपसे प्रचार |
१-गणेशसहस्रनामके 'खम्भात' भाष्यमें कालमुखमतका विशेष परिचय है।
२-शैवं पाशुपतं कालमुखं भैरवशासनम्। (गणेशसहस्रनाम १२९)
अध्याय ६ ] नर-नारायणकी उत्पत्ति, बदरिकाश्रमकी वसन्तकी शोभा, कामकी अनङ्गताका वर्णन ३७ महाव्रती च धनदस्तस्य शिष्यश्च वीर्यवान्। कर्णोदर इति ख्यातो जात्या शूद्रो महातपाः ॥ ९१ एवं स भगवान् ब्रह्मा पूजनाय शिवस्य तु। कृत्वा तु चातुराश्रम्यं स्वमेव भवनं गतः ॥ ९२ गते ब्रह्मणि शर्वोऽपि उपसंहृत्य तं तदा। लिङ्गं चित्रवने सूक्ष्मं प्रतिष्ठाप्य चचार ह॥ ९३ विचरन्तं तदा भूयो महेशं कुसुमायुधः। आरात्स्थित्वाऽग्रतो धन्वी संतापयितुमुद्यतः ॥ ९४ ततस्तमग्रतो दृष्ट्वा क्रोधाध्मातदृशा हरः। स्मरमालोकयामास शिखाग्राच्चरणान्तिकम् ॥ ९५ आलोकितस्त्रिनेत्रेण मदनो द्युतिमानपि। प्रादह्यत तदा ब्रह्मन् पादादारभ्य कक्षवत् ॥ ९६ प्रदह्यमानौ चरणौ दृष्ट्वाऽसौ कुसुमायुधः। उत्ससर्ज धनुः श्रेष्ठं तज्जगामाथ पञ्चधा ॥ ९७ यदासीन्मुष्टिबन्धं तु रुक्मपृष्ठं महाप्रभम्। स चम्पकतरुर्जातः सुगन्धाढ्यो गुणाकृतिः ॥ ९८ नाहस्थानं शुभाकारं यदासीद्वज्रभूषितम्। तज्जातं केसरारण्यं बकुलं नामतो मुने ॥ ९९ या च कोटी शुभा ह्यासीदिन्द्रनीलविभूषिता। जाता सा पाटला रम्या भृङ्गराजिविभूषिता ॥ १०० नाहोपरि तथा मुष्टौ स्थानं शशिमणिप्रभम्। पञ्चगुल्माऽभवज्जाती शशाङ्ककिरणोज्ज्वला ॥ १०१ ऊर्ध्वं मुष्ट्या अधः कोट्योः स्थानं विद्रुमभूषितम्। तस्माद्बहुपुटा मल्ली संजाता विविधा मुने ॥ १०२ पुष्पोत्तमानि रम्याणि सुरभीणि च नारद। जातियुक्तानि देवेन स्वयमाचरितानि च॥ १०३ मुमोच मार्गणान् भूम्यां शरीरे दह्यति स्मरः। फलोपगानि वृक्षाणि संभूतानि सहस्त्रशः ॥ १०४ किया। महाव्रती साक्षात् कुबेर प्रथम कापालिक या भैरव-सम्प्रदायके आचार्य हुए थे। शूद्रजातिके महातपस्वी कर्णोदर नामक उनके एक प्रसिद्ध शिष्य हुए। इन्होंने इस मतका विशेष प्रचार किया * ॥ ८८-९१॥ इस प्रकार ब्रह्माजी शिवकी उपासनाके लिये चार सम्प्रदायोंका विधान कर ब्रह्मलोकको चले गये। ब्रह्माजीके जानेपर महादेवने उस लिङ्गको उपसंहृत कर लिया - समेट लिया एवं वे चित्रवनमें सूक्ष्म लिङ्ग प्रतिष्ठापित कर विचरण करने लगे। यहाँ भी शिवजीको घूमते देख पुष्पधनुष कामदेव पुनः उनके सामने सहसा बहुत निकट आकर उन्हें संतापन बाणसे बेधनेको उद्यत हुआ। तब उसे इस प्रकार सामने खड़ा देखकर शिवजीने उस कामदेवको सिरसे चरणतक क्रोधभरी दृष्टिसे देखा ॥ ९२-९५ ॥ ब्रह्मन् ! वह कामदेव अत्यन्त तेजस्वी था। फिर भी भगवान्द्वारा इस प्रकार दृष्ट होनेपर वह पैरसे लेकर कटिपर्यन्त दग्ध हो गया। अपने चरणोंको जलते हुए देखकर पुष्पायुध कामने अपने श्रेष्ठ धनुषको दूर फेंक दिया। इससे उसके पाँच टुकड़े हो गये। उस धनुषका जो चमचमाता हुआ सुवर्णयुक्त मुठबंध था, वह सुगन्धपूर्ण सुन्दर चम्पक वृक्ष हो गया। मुने ! उस धनुषका जो हीरा जड़ा हुआ सुन्दर कृतिवाला नाहस्थान था, वह केसरवनमें बकुल (मौलेसरी) नामका वृक्ष बना। इन्द्रनीलसे सुशोभित उसकी सुन्दर कोटि भृंगोंसे विभूषित सुन्दर पाटला (गुलाब)-के रूपमें परिणत हो गयी ॥ ९६-१०० ॥ धनुषनाहके ऊपर मुष्टिमें स्थित चन्द्रकान्तमणिकी प्रभासे युक्त स्थान चन्द्रकिरणके समान उज्ज्वल पाँच गुल्मवाली जाती (चमेली-पुष्प) बन गया। मुने ! मुष्टिके ऊपर और दोनों कोटियोंके नीचेवाले विद्रुममणि- विभूषित स्थानसे अनेक पुटोंवाली मल्लिका (मालती) हो गयी। नारदजी ! देवके द्वारा जातीके साथ अन्य सुन्दर तथा सुगन्धित पुष्पोंकी सृष्टि हुई। ऊर्ध्व शरीरके दग्ध होनेके समय कामदेवने अपने बाणोंको भी पृथ्वीपर फेंका था, इससे हजारों प्रकारके फलयुक्त वृक्ष
- इसपर डॉ० भण्डारकरके 'वैष्णविज्म'-'शैविज्म'में विस्तृत विचार हैं।
| ३८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७ |
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| चूतादीनि सुगन्धीनि स्वादूनि विविधानि च।<br>हरप्रसादाज्जातानि भोज्यान्यपि सुरोत्तमैः ॥ १०५<br><br>एवं दग्ध्वा स्मरं रुद्रः संयम्य स्वतनूं विभुः।<br>पुण्यार्थी शिशिराद्रिं स जगाम तपसेऽव्ययः॥ १०६<br><br>एवं पुरा देववरेण शम्भुना<br>कामस्तु दग्धः सशरः सचापः।<br>ततस्त्वनङ्गेति महाधनुर्द्धरो<br>देवैस्तु गीतः सुरपूर्वपूजितः॥ १०७ | उत्पन्न हो गये। शिवजीकी कृपासे श्रेष्ठ देवताओंद्वारा भी अनेक प्रकारके सुगन्धित एवं स्वादिष्ट आम्र आदि फल उत्पन्न हुए, जो खानेमें स्वादुयुक्त हैं। इस प्रकार कामदेवको भस्म कर एवं अपने शरीरको संयतकर समर्थ, अविनाशी शिव पुण्यकी कामनासे हिमालयपर तपस्या करने चले गये। इस प्रकार प्राचीन समयमें देवश्रेष्ठ शिवजीद्वारा धनुषबाणसहित काम दग्ध किया गया था। तबसे देवताओंमें प्रथम पूजित वह महाधनुर्धर देवोंद्वारा 'अनङ्ग' कहा गया॥ १०१-१०७॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें छठा अध्याय समाप्त हुआ॥ ६ ॥
सातवाँ अध्याय
उर्वशीकी उत्पत्ति-कथा, प्रह्लाद-प्रसंग—नर-नारायणसे संवाद एवं युद्धोपक्रम
</div>| पुलस्त्य उवाच<br>ततोऽनङ्गं विभुर्दृष्ट्वा ब्रह्मन् नारायणो मुनिः।<br>प्रहस्यैवं वचः प्राह कन्दर्प इह आस्यताम्॥ १<br><br>तदक्षुब्धत्वमीक्ष्यास्य कामो विस्मयमागतः।<br>वसन्तोऽपि महाचिन्तां जगामाशु महामुने॥ २<br><br>ततश्चाप्सरसो दृष्ट्वा स्वागतेनाभिपूज्य च।<br>वसन्तमाह भगवानेह्येहि स्थीयतामिति॥ ३<br><br>ततो विहस्य भगवान् मञ्जरीं कुसुमावृताम्।<br>आदाय प्राक्सुवर्णाङ्गीमूर्वोर्बालां विनिर्ममे॥ ४<br><br>ऊरूद्भवां स कन्दर्पो दृष्ट्वा सर्वाङ्गसुन्दरीम्।<br>अमन्यत तदाऽनङ्गः किमियं सा प्रिया रतिः॥ ५<br><br>तदेव वदनं चारु स्वाक्षिभ्रुकुटिलालकम्।<br>सुनासावंशाधरोष्ठमालोकनपरायणम् ॥ ६<br><br>तावेवाहार्यविरलौ पीवरौ मग्नचूचुकौ।<br>राजतेऽस्याः कुचौ पीनौ सज्जनाविव संहतौ॥ ७ | पुलस्त्यजी बोले— नारदजी! उसके बाद समर्थ नारायण ऋषि कामदेवको हँसते हुए देखकर यों बोले—काम! तुम यहाँ बैठो। काम उनकी उस अक्षुब्धता (स्थिरता)-को देखकर चकित हो गया। महामुने! वसन्तको भी उस समय बड़ी चिन्ता हुई। फिर अप्सराओंकी ओर देखकर स्वागतके द्वारा उनकी पूजा कर भगवान् नारायणने वसन्तसे कहा—आओ बैठो। उसके पश्चात् भगवान् नारायण मुनिने हँसकर एक फूलसे भरी मञ्जरी ली और अपने ऊरुपर एक सुवर्ण अङ्गवाली तरुणीका चित्र लिखकर उसकी सजीव रचना कर दी। नारायणकी जाँघसे उत्पन्न उस सर्वाङ्ग सुन्दरीको देखकर कामदेव मनमें सोचने लगा—क्या यह सुन्दरी मेरी पत्नी रति है!॥ १—५॥<br><br>इसकी वैसी ही सुन्दर आँखें, भौंह एवं कुटिल अलकें हैं। इसका वैसा ही मुखमण्डल, वैसी सुन्दर नासिका, वैसा वंश और वैसा ही इसका अधरोष्ठ भी सुन्दर है। इसे देखनेसे तृप्ति नहीं होती है। रतिके समान ही मनोहर तथा अत्यन्त मग्न चूचुकवाले स्थूल (मांसल) स्तन दो सज्जन पुरुषोंके सदृश परस्पर मिले हैं। इस |
९- अन्धकासुरकी विजिगीषा, देवों और असुरोंके वाहनों एवं युद्धका वर्णन
अध्याय ७ ] उर्वशीकी उत्पत्ति-कथा, प्रह्लाद-प्रसंग-नर-नारायणसे संवाद एवं युद्धोपक्रम ३९ तदेव तनु चार्वङ्ग्या वलित्रयविभूषितम्। उदरं राजते श्लक्ष्णं रोमावलिविभूषितम् ॥ ८ सुन्दरीका वैसा ही कृश, त्रिवलीयुक्त, कोमल तथा रोमावलिवाला उदर भी शोभित हो रहा है। उदरपर नीचेसे ऊपरकी ओर स्तनतटतक जाती हुई इसकी रोमराजि रोमावली च जघनाद् यान्ती स्तनतटं त्वियम्। राजते भृङ्गमालेव पुलिनात् कमलाकरम् ॥ ९ सरोवर आदिके तटसे कमलवृन्दकी ओर जाती हुई भ्रमर-मण्डलीके समान सुशोभित हो रही है॥ ६-९॥ जघनं त्वतिविस्तीर्णं भात्यस्या रशनावृतम्। क्षीरोदमथने नद्धं भुजङ्गेनेव मन्दरम् ॥ १० इसका करधनीसे मण्डित स्थूल जघन-प्रदेश क्षीरसागरके मन्थनके समयमें वासुकि नागसे वेष्टित मन्दरपर्वतके समान सुशोभित हो रहा है। कदली- कदलीस्तम्भसदृशैरूर्ध्वमूलैरथोरुभिः । विभाति सा सुचार्वङ्गी पद्मकिञ्जल्कसंनिभा ॥ ११ स्तम्भके समान ऊर्ध्वमूल ऊरुओंवाली कमलके केसरके समान गौरवर्णकी यह सुन्दरी है। इसके दोनों घुटने, गूढ़गुल्फ, रोमरहित सुन्दर जंघा तथा अलक्तकके समान जानुनी गूढगुल्फे च शुभे जङ्घे त्वरोमशे। विभातोऽस्यास्तथा पादावलक्तकसमत्विषौ ॥ १२ कान्तिवाले दोनों पैर अत्यन्त सुशोभित हो रहे हैं। मुने! इस प्रकार उस सुन्दरीके विषयमें सोचते हुए जब यह इति संचिन्तयन् कामस्तामनिन्दितलोचनाम्। कामातुरोऽसौ संजातः किमुतान्यो जनो मुने ॥ १३ कामदेव स्वयमेव कामातुर हो गया तो फिर अन्य पुरुषोंकी तो बात ही क्या थी॥ १०-१३॥ माधवोऽप्युर्वशीं दृष्ट्वा संचिन्तयत नारद। किंस्वित् कामनरेन्द्रस्य राजधानी स्वयं स्थिता ॥ १४ नारदजी! अब वसन्त भी उस उर्वशीको देखकर सोचने लगा कि क्या यह राजा कामकी राजधानी ही स्वयं आयाता शशिनो नूनमियं कान्तिर्निशाक्षये। रविरश्मिप्रतापार्तिभीता शरणमागता ॥ १५ आकर उपस्थित हो गयी है? अथवा रात्रिका अन्त होनेपर सूर्यकी किरणोंके तापके भयसे स्वयं चन्द्रिका ही शरणमें आ गयी है। इस प्रकार सोचते हुए अप्सराओंको रोककर इत्थं संचिन्तयन्नेव अवष्टभ्याप्सरोगणम्। तस्थौ मुनिरिव ध्यानमास्थितः स तु माधवः ॥ १६ वसन्त मुनिके सदृश ध्यानस्थ हो गया। महामुने ! उसके बाद शुभव्रत नारायण मुनिने कामादि सभीको चकित ततः स विस्मितान् सर्वान् कन्दर्पादीन् महामुने। दृष्ट्वा प्रोवाच वचनं स्मितं कृत्वा शुभव्रतः ॥ १७ देखकर हँसते हुए कहा- हे काम, हे अप्सराओ, हे वसन्त ! यह अप्सरा मेरी जाँघसे उत्पन्न हुई है। इसे तुमलोग इयं ममोरुसम्भूता कामाप्सरस माधव। नीयतां सुरलोकाय दीयतां वासवाय च ॥ १८ देवलोकमें ले जाओ और इन्द्रको दे दो। उनके ऐसा कहनेपर वे सभी भयसे काँपते हुए उर्वशीको लेकर स्वर्गमें इत्युक्ताः कम्पमानास्ते जग्मुर्गृह्योर्वशीं दिवम्। सहस्राक्षाय तां प्रादाद् रूपयौवनशालिनीम् ॥ १९ चले गये और उस रूप-यौवनशालिनी अप्सराको इन्द्रको दे दिया। महामुने! उन कामादिने इन्द्रसे उन दोनों धर्मके आचक्षुश्चरितं ताभ्यां धर्मजाभ्यां महामुने। देवराजाय कामाद्यास्ततोऽभूद् विस्मयः परः ॥ २० पुत्रों (नर-नारायण)-के चरित्रको कहा, जिससे इन्द्रको बड़ा विस्मय हुआ। नर और नारायणके इस चरित्रकी एतादृशं हि चरितं ख्यातिमग्र्यां जगाम ह। पातालेषु तथा मर्त्ये दिक्ष्वष्टासु जगाम च ॥ २१ चर्चा आगे सर्वत्र बढ़ती गयी तथा वह पाताल, मर्त्यलोक एवं सभी दिशाओंमें व्याप्त हो गयी ॥ १४-२१॥ एकदा निहते रौद्रे हिरण्यकशिपौ मुने। अभिषिक्तस्तदा राज्ये प्रह्लादो नाम दानवः ॥ २२ मुने! एक बारकी बात है। जब भयंकर हिरण्यकशिपु मारा गया तब प्रह्लाद नामक दानव राजगद्दीपर बैठा।
| ४० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तस्मिन्शासति दैत्येन्द्रे देवब्राह्मणपूजके।<br>मखानि भुवि राजानो यजन्ते विधिवत्तदा॥ २३<br><br>ब्राह्मणाश्च तपो धर्मं तीर्थयात्रांश्च कुर्वते।<br>वैश्याश्च पशुवृत्तिस्थाः शूद्राः शुश्रूषणे रताः॥ २४ | वह देवता और ब्राह्मणोंका पूजक था। उसके शासनकालमें पृथ्वीपर राजा लोग विधिपूर्वक यज्ञानुष्ठान करते थे। ब्राह्मण लोग तपस्या, धर्म-कार्य और तीर्थयात्रा, वैश्य लोग पशुपालन तथा शूद्र लोग सबकी सेवा प्रेमसे करते थे॥ २२—२४॥ |
| चातुर्वर्ण्यं ततः स्वे स्वे आश्रमे धर्मकर्मणि।<br>आवर्तत ततो देवा वृत्त्या युक्ताभवन् मुने॥ २५<br><br>ततस्तु च्यवनो नाम भार्गवेन्द्रो महातपाः।<br>जगाम नर्मदां स्नातुं तीर्थं च नकुलीश्वरम्॥ २६<br><br>तत्र दृष्ट्वा महादेवं नदीं स्नातुमवातरत्।<br>अवतीर्णं प्रजग्राह नागः केकरलोहितः॥ २७<br><br>गृहीतस्तेन नागेन सस्मार मनसा हरिम्।<br>संस्मृते पुण्डरीकाक्षे निर्विषोऽभून्महोरगः॥ २८ | मुने! इस प्रकार चारों वर्ण अपने आश्रममें स्थित रहकर धर्म-कार्योंमें लगे रहते थे। इससे देवता भी अपने कर्ममें संलग्न हो गये।* उसी समय ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ भार्गववंशी महातपस्वी च्यवन नामक ऋषि नर्मदाके नकुलीश्वरतीर्थमें स्नान करने गये। वहाँ वे महादेवका दर्शनकर नदीमें स्नान करनेके लिये उतरे। जलमें उतरते ही ऋषिको एक भूरे वर्णके साँपने पकड़ लिया। उस साँपद्वारा पकड़े जानेपर ऋषिने अपने मनमें विष्णुभगवान्का स्मरण किया। कमलनयन भगवान् श्रीहरिको स्मरण करनेपर वह महान् सर्प विषहीन हो गया॥ २५—२८॥ |
| नीतस्तेनातिरौद्रेण पन्नगेन रसातलम्।<br>निर्विषश्चापि तत्याज च्यवनं भुजगोत्तमः॥ २९<br><br>संत्यक्तमात्रो नागेन च्यवनो भार्गवोत्तमः।<br>चचार नागकन्याभिः पूज्यमानः समन्ततः॥ ३०<br><br>विचरन् प्रविवेशाथ दानवानां महत् पुरम्।<br>संपूज्यमानो दैत्येन्द्रैः प्रह्लादोऽथ ददर्श तम्॥ ३१<br><br>भृगुपुत्रे महातेजाः पूजां चक्रे यथार्हतः।<br>संपूजितोपविष्टश्च पृष्टश्चागमनं प्रति॥ ३२ | फिर उस भयंकर विषरहित सर्पने च्यवन मुनिको रसातलमें ले जाकर छोड़ दिया। सर्पने भार्गवश्रेष्ठ च्यवनको मुक्त कर दिया। फिर वे नागकन्याओंसे पूजित होते हुए चारों ओर विचरण करने लगे। वहाँ घूमते हुए वे दानवोंके विशाल नगरमें प्रविष्ट हुए। इसके बाद श्रेष्ठ दैत्योंद्वारा पूजित प्रह्लादने उन्हें देखा। महातेजस्वी प्रह्लादने भृगुपुत्रकी यथायोग्य पूजा की। पूजाके बाद उनके बैठनेपर प्रह्लादने उनसे उनके आगमनका कारण पूछा॥ २९—३२॥ |
| स चोवाच महाराज महातीर्थं महाफलम्।<br>स्नातुमेवागतोऽस्म्यद्य द्रष्टुं च नकुलीश्वरम्॥ ३३<br><br>नद्यामेवावतीर्णोऽस्मि गृहीतश्चाहिना बलात्।<br>समानीतोऽस्मि पाताले दृष्टश्चात्र भवानपि॥ ३४<br><br>एतच्छ्रुत्वा तु वचनं च्यवनस्य दितीश्वरः।<br>प्रोवाच धर्मसंयुक्तं स वाक्यं वाक्यकोविदः॥ ३५ | उन्होंने कहा—महाराज! आज मैं महाफलदायक महातीर्थमें स्नान एवं नकुलीश्वरका दर्शन करने आया था। वहाँ नदीमें उतरते ही एक नागने मुझे बलात् पकड़ लिया। वही मुझे पातालमें लाया और मैंने यहाँ आपको भी देखा। च्यवनकी इस बातको सुनकर सुन्दर वचन बोलनेवाले दैत्योंके ईश्वर (प्रह्लाद)-ने धर्मसंयुक्त यह वाक्य कहा॥ ३३—३५॥ |
| प्रह्लाद उवाच<br>भगवन् कानि तीर्थानि पृथिव्यां कानि चाम्बरे।<br>रसातले च कानि स्युरेतद् वक्तुं त्वमर्हसि॥ ३६ | प्रह्लादने पूछा—भगवन्! कृपा करके मुझे बतलाइये कि पृथ्वी, आकाश और पातालमें कौन-कौनसे (महान्) तीर्थ हैं?॥ ३६॥ |
* देवताओंके धर्मका वर्णन सुकेशी-उपाख्यानमें आगे आया है।
अध्याय ७ ] उर्वशीकी उत्पत्ति-कथा, प्रह्लाद-प्रसंग-नर-नारायणसे संवाद एवं युद्धोपक्रम ४१ च्यवन उवाच (प्रह्लादके वचनको सुनकर) च्यवनजीने कहा - पृथिव्यां नैमिषं तीर्थमन्तरिक्षे च पुष्करम्। महाबाहो ! पृथ्वीमें नैमिषारण्यतीर्थ, अन्तरिक्षमें पुष्कर, चक्रतीर्थं महाबाहो रसातले विदुः ॥ ३७ और पातालमें चक्रतीर्थ प्रसिद्ध हैं ॥ ३७ ॥ पुलस्त्य उवाच पुलस्त्यजीने कहा - महामुने ! भार्गवकी इसी श्रुत्वा तद्भार्गववचो दैत्यराजो महामुने। बातको सुनकर दैत्यराज प्रह्लादने नैमिषतीर्थमें जानेके नैमिषं गन्तुकामस्तु दानवानिदमब्रवीत् ॥ ३८ लिये इच्छा प्रकट की और दानवोंसे यह बात कही ॥ ३८ ॥ प्रह्लाद उवाच प्रह्लाद बोले-उठो, हम सभी नैमिष- उत्तिष्ठध्वं गमिष्यामः स्नातुं तीर्थं हि नैमिषम् । तीर्थमें स्नान करने जायँगे तथा वहाँ पीताम्बरधारी एवं कमलके समान नेत्रोंवाले भगवान् अच्युत (विष्णु)-के द्रक्ष्यामः पुण्डरीकाक्षं पीतवाससमच्युतम् ॥ ३९ दर्शन करेंगे ॥ ३९ ॥ पुलस्त्य उवाच पुलस्त्यजीने कहा - दैत्यराज प्रह्लादके ऐसा कहनेपर इत्युक्ता दानवेन्द्रेण सर्वे ते दैत्यदानवाः। वे सभी दैत्य और दानव रसातलसे बाहर निकले एवं चक्रुरुद्योगमतुलं निर्जग्मुश्च रसातलात् ॥ ४० अतुलनीय उद्योगमें लग गये। उन महाबलवान् ते समभ्येत्य दैतेया दानवाश्च महाबलाः। दितिपुत्रों एवं दानवोंने नैमिषारण्यमें आकर आनन्दपूर्वक स्नान किया। इसके बाद श्रीमान् दैत्यश्रेष्ठ प्रह्लाद मृगया नैमिषारण्यमागत्य स्नानं चक्रुर्मुदान्विताः ॥ ४१ (आखेट या शिकार)-के लिये वनमें घूमने लगे। ततो दितीश्वरः श्रीमान् मृगव्यां स चचार ह। वहाँ घूमते हुए उन्होंने पवित्र एवं निर्मल जलवाली सरस्वती नदीको देखा। वहीं समीप ही बाणोंसे चरन् सरस्वतीं पुण्यां ददर्श विमलोदकाम् ॥ ४२ खचाखच बिंधे बड़ी-बड़ी शाखाओंवाले एक शाल तस्यादूरे महाशाखं शालवृक्षं शरैश्चितम् । वृक्षको देखा। वे सभी बाण एक-दूसरेके मुखसे लगे ददर्श बाणानपरान् मुखे लग्नान् परस्परम् ॥ ४३ हुए थे ॥ ४०-४३ ॥ ततस्तानद्भुताकारान् बाणान् नागोपवीतकान् । तब उन अद्भुत आकारवाले नागोपवीत (साँपोंसे दृष्ट्वाऽतुलं तदा चक्रे क्रोधं दैत्येश्वरः किल ॥ ४४ लिपटे) बाणोंको देखकर दैत्येश्वरको बड़ा क्रोध हुआ। स ददर्श ततो दूरात्कृष्णाजिनधरौ मुनी। फिर उन्होंने दूरसे ही काले मृगचर्मको धारण किये हुए बड़ी-बड़ी जटाओंवाले तथा तपस्यामें लगे दो मुनियोंको समुन्नतजटाभारौ तपस्यासक्तमानसौ ॥ ४५ देखा। उन दोनोंके बगलमें सुलक्षण शार्ङ्ग और आजगव तयोश्च पार्श्वयोर्दिव्ये धनुषी लक्षणान्विते । नामक दो दिव्य धनुष एवं दो अक्षय तथा बड़े-बड़े शार्ङ्गमाजगवं चैव अक्षय्यौ च महेषुधी ॥ ४६ तरकस वर्तमान थे। उन दोनोंको इस प्रकार देखकर तौ दृष्ट्वाऽमन्यत तदा दाम्भिकाविति दानवः। दानवराज प्रह्लादने उन्हें दम्भसे युक्त समझा। फिर ततः प्रोवाच वचनं तावुभौ पुरुषोत्तमौ ॥ ४७ उन्होंने उन दोनों श्रेष्ठ पुरुषोंसे कहा - ॥ ४४-४७ ॥ किं भवद्भ्यां समारब्धं दम्भं धर्मविनाशनम् । आप दोनों यह धर्मविनाशक दम्भपूर्ण कार्य क्यों क्व तपः क्व जटाभारः क्व चेमौ प्रवरायुधौ ॥ ४८ कर रहे हैं ? कहाँ तो आपकी यह तपस्या और जटाभार, कहाँ ये दोनों श्रेष्ठ अस्त्र ? इसपर नरने उनसे कहा - अथोवाच नरो दैत्यं का ते चिन्ता दितीश्वर । दैत्येश्वर ! तुम उसकी चिन्ता क्यों कर रहे हो ? सामर्थ्य सामर्थ्ये सति यः कुर्यात् तत्संपद्येत तस्य हि ॥ ४९ रहनेपर कोई भी व्यक्ति जो कर्म करता है, उसे वही
| ४२ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय ७ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| अथोवाच दितीशस्तौ का शक्तिर्युवयोरिह।<br>मयि तिष्ठति दैत्येन्द्रे धर्मसेतुप्रवर्तके॥ ५०<br><br>नरस्तं प्रत्युवाचाथ आवाभ्यां शक्तिरूर्जिता।<br>न कश्चिच्छक्नुयाद् योद्धुं नरनारायणौ युधि॥ ५१ | शोभा देता है। तब दितीश्वर प्रह्लादने उन दोनोंसे कहा—धर्मसेतुके स्थापित करनेवाले मुझ दैत्येन्द्रके रहते यहाँ आपलोग (सामर्थ्य-बलसे) क्या कर सकते हैं? इसपर नरने उन्हें उत्तर दिया—हमने पर्याप्त शक्ति प्राप्त कर ली है। हम नर और नारायण—दोनोंसे कोई भी युद्ध नहीं कर सकता॥ ४८–५१॥ |
| दैत्येश्वरस्ततः क्रुद्धः प्रतिज्ञामारुरोह च।<br>यथा कथंचिज्जेष्यामि नरनारायणौ रणे॥ ५२<br><br>इत्येवमुक्त्वा वचनं महात्मा<br>दितीश्वरः स्थाप्य बलं वनान्ते।<br>वितत्य चापं गुणमाविकृष्य<br>तलध्वनिं घोरतरं चकार॥ ५३<br><br>ततो नरस्त्वाजगवं हि चाप-<br>मानम्य बाणान् सुबहूञ्शिताग्रान्।<br>मुमोच तानप्रतिमैः पृषत्कै-<br>श्छिच्छेद दैत्यस्तपनीयपुङ्खैः॥ ५४<br><br>छिन्नान् समीक्ष्याथ नरः पृषत्कान्<br>दैत्येश्वरेणाप्रतिमेन संख्ये।<br>क्रुद्धः समानम्य महाधनुस्ततो<br>मुमोच चान्यान् विविधान् पृषत्कान्॥ ५५ | इसपर दैत्येश्वरने क्रुद्ध होकर प्रतिज्ञा कर दी कि मैं युद्धमें जिस किसी भी प्रकार आप नर और नारायण दोनोंको जीतूँगा। ऐसी प्रतिज्ञाकर दैत्येश्वर प्रह्लादने वनकी सीमापर अपनी सेना खड़ी कर दी और धनुषको फैलाकर उसपर डोरी चढ़ायी तथा घोरतर करतलध्वनि की—ताल ठोंकी। इसपर नरने भी आजगव धनुषको चढ़ाकर बहुत-से तेज बाण छोड़े। परंतु प्रह्लादने अनेक स्वर्ण-पुंखवाले अप्रतिम बाणोंसे उन बाणोंको काट डाला। फिर नरने युद्धमें अप्रतिम दैत्येश्वरके द्वारा बाणोंको नष्ट हुआ देख क्रुद्ध होकर अपने महान् धनुषको चढ़ाकर पुनः अन्य अनेक तीक्ष्ण बाण छोड़े॥ ५२–५५॥ |
| एकं नरो द्वौ दितिजेश्वरश्च<br>त्रीन् धर्मसूनुश्चतुरो दितीशः।<br>नरस्तु बाणान् प्रमुमोच पञ्च<br>षड् दैत्यनाथो निशितान् पृषत्कान्॥ ५६<br><br>सप्तर्षिमुख्यो द्विचतुश्च दैत्यो<br>नरस्तु षट् त्रीणि च दैत्यमुख्ये।<br>षट्त्रीणि चैकं च दितीश्वरेण<br>मुक्तानि बाणानि नराय विप्र॥ ५७<br><br>एकं च षट् पञ्च नरेण मुक्ता-<br>स्त्वष्टौ शराः सप्त च दानवेन।<br>षट् सप्त चाष्टौ नव षण्नरेण<br>द्विसप्ततिं दैत्यपतिः ससर्ज॥ ५८<br><br>शतं नरस्त्रीणि शतानि दैत्यः<br>षड् धर्मपुत्रो दश दैत्यराजः।<br>ततोऽप्यसंख्येयतरान् हि बाणान्<br>मुमोचतुस्तौ सुभृशं हि कोपात्॥ ५९ | नरके एक बाण छोड़नेपर प्रह्लादने दो बाण छोड़े; नरके तीन बाण छोड़नेपर प्रह्लादने चार बाण छोड़े। इसके बाद पुनः नरने पाँच बाण और फिर दैत्यश्रेष्ठ प्रह्लादने छः तेज बाण छोड़े। विप्र! नरके सात बाण छोड़नेपर दैत्यने आठ बाण छोड़े। नरके नव बाण छोड़नेपर प्रह्लादने उनपर दस बाण छोड़े। नरके बारह बाण छोड़नेपर दानवने पंद्रह बाण छोड़े। नरके छत्तीस बाण छोड़नेपर दैत्यपतिने बहत्तर बाण चलाये। नरके सौ बाणोंपर दैत्यने तीन सौ बाण चलाये। धर्मपुत्रके छः सौ बाणोंपर दैत्यराजने एक हजार बाण छोड़े। फिर तो उन दोनोंने अत्यन्त क्रोधसे (एक-दूसरेपर) असंख्य बाण छोड़े॥ ५६–५९॥ |
| ततो नरो बाणगणैरसंख्यै-<br>र्वास्तरद्भूमिमथो दिशः खम्।<br>स चापि दैत्यप्रवरः पृषत्कै-<br>श्छिच्छेद वेगात् तपनीयपुङ्खैः॥ ६० | उसके बाद नरने असंख्य बाणोंसे पृथ्वी, आकाश और दिशाओंको ढक दिया। फिर दैत्यप्रवर प्रह्लादने स्वर्णपुंखवाले बाणोंको बड़े वेगसे छोड़कर उनके |
१०- अन्धकके साथ देवताओंका युद्ध और अन्धककी विजय
| अध्याय ८ ] | प्रह्लाद और नारायणका तुमुल युद्ध, भक्तिसे विजय | ४३ |
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| ततः पतत्त्रिभिर्वीरौ सुभृशं नरदानवौ।<br>युद्धे वरास्त्रैर्युध्येतां घोररूपैः परस्परम्॥ ६१<br>ततस्तु दैत्येन वरास्त्रपाणिना<br>चापे नियुक्तं तु पितामहास्त्रम्।<br>माहेश्वरास्त्रं पुरुषोत्तमेन<br>समं समाहत्य निपेततुस्तौ॥ ६२<br>ब्रह्मास्त्रे तु प्रशमिते प्रह्रादः क्रोधमूर्च्छितः।<br>गदां प्रगृह्य तरसा प्रचस्कन्द रथोत्तमात्॥ ६३<br>गदापाणिं समायान्तं दैत्यं नारायणस्तदा।<br>दृष्ट्वाऽथ पृष्ठतश्चक्रे नरं योद्धुमनाः स्वयम्॥ ६४<br>ततो दितीशः सगदः समाद्रवत्<br>सशार्ङ्गपाणिं तपसां निधानम्।<br>ख्यातं पुराणर्षिमुदारविक्रमं<br>नारायणं नारद लोकपालम्॥ ६५ | बाणोंको काट दिया। तब नर और दानव दोनों वीर बाणों तथा भयंकर श्रेष्ठ अस्त्रोंसे परस्पर युद्ध करने लगे। इसके बाद दैत्यने हाथमें ब्रह्मास्त्र लेकर उस धनुषपर नियोजित कर चला दिया एवं उन पुरुषोत्तमने भी माहेश्वरास्त्रका प्रयोग कर दिया। वे दोनों अस्त्र परस्पर एक-दूसरेसे टक्कर खाकर गिर गये। ब्रह्मास्त्रके व्यर्थ होनेपर क्रोधसे मूर्च्छित हुए प्रह्लाद वेगसे गदा लेकर उत्तम रथसे कूद पड़े॥ ६०—६३॥<br>ऋषि नारायणने उस समय दैत्यको हाथमें गदा लिये अपनी ओर आते देखकर स्वयं युद्ध करनेकी इच्छासे नरको पीछे हटा दिया। नारदजी! तब प्रह्लादजी गदा लेकर तपोनिधान, शार्ङ्गधनुषको धारण करनेवाले, प्रसिद्ध पुरातन ऋषि, महापराक्रमशाली, लोकपति नारायणकी ओर दौड़ पड़े॥ ६४-६५॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सातवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ ७॥
आठवाँ अध्याय
प्रह्लाद और नारायणका तुमुल युद्ध, भक्तिसे विजय
| पुलस्त्य उवाच | पुलस्त्यजी बोले— प्रह्लादने जब हाथमें शार्ङ्गधनुष |
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| शार्ङ्गपाणिनमायान्तं दृष्ट्वाऽग्रे दानवेश्वरः।<br>परिभ्राम्य गदां वेगान्मूर्ध्नि साध्यमताडयत्॥ १<br>ताडितस्याथ गदया धर्मपुत्रस्य नारद।<br>नेत्राभ्यामपतद् वारि वह्निवर्सनिभं भुवि॥ २<br>मूर्ध्नि नारायणस्यापि सा गदा दानवार्पिता।<br>जगाम शतधा ब्रह्मञ्शैलशृङ्गे यथाऽशनिः॥ ३<br>ततो निवृत्य दैत्येन्द्रः समास्थाय रथं द्रुतम्।<br>आदाय कार्मुकं वीरस्तूणाद् बाणं समाददे॥ ४<br>आनम्य चापं वेगेन गार्द्धपत्राञ्शिलीमुखान्।<br>मुमोच साध्याय तदा क्रोधान्धकारिताननः॥ ५<br><br>तानापतत एवाशु बाणांश्चन्द्रार्द्धसन्निभान्।<br>चिच्छेद बाणैरपरैर्निर्बिभेद च दानवम्॥ ६ | लिये भगवान् नारायणको सामनेसे आते देखा तो अपनी गदा घुमाकर वेगसे उनके सिरपर प्रहार कर दिया। नारदजी! गदासे प्रताडित होनेपर नारायणके नेत्रोंसे आगके स्फुलिंगके समान आँसू पृथ्वीपर गिरने लगे। ब्रह्मन्! पर्वतकी चोटीपर गिरकर जैसे वज्र टूट जाता है, उसी प्रकार दानवद्वारा नारायणके सिरपर चलायी गयी वह गदा भी सैकड़ों टुकड़े हो गयी। उसके बाद शीघ्रतापूर्वक लौटकर वीर दैत्येन्द्रने रथपर आरूढ हो धनुष लेकर अपनी तरकससे बाण निकाल लिया॥ १—४॥<br>फिर क्रोधान्ध प्रह्लादने शीघ्रतासे धनुषको चढ़ाकर गृध्रके पंखवाले अनेक बाणोंको नारायणकी ओर चलाया। नारायणने भी बड़ी शीघ्रतासे अपनी ओर आ रहे उन अर्धचन्द्र-तुल्य बाणोंको अपने बाणोंसे काट डाला और कुछ दूसरे बाणोंसे प्रह्लादको विद्ध कर दिया। |