वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
भूमिका १९
अविद्या, जीव में विकार उत्पन्न करती हुई अनात्मस्वरूप अन्तःकरण में धर्मभाव से विद्यमान रहती है। उनके विचार में परममोक्ष प्राप्त करने से पूर्व जीव हिरण्यगर्भभाव को प्राप्त होते हैं, जो वस्तुतः मुक्तावस्था न होकर मोक्ष की पूर्वकालीन अवस्थामात्र है। इस अवस्था में परमात्मा का सान्निध्य हमेशा के लिए विद्यमान रहता है। काम, वासना आदि जीव के धर्म हैं। ब्रह्म एक होने पर भी समुद्र की तरङ्ग के समान द्वैताद्वैत है। जिसप्रकार अद्वैतभाव सत्य है, ठीक उसीप्रकार द्वैत भी सत्य है। (१०) आचार्य भर्तृमित्र-जयन्तभट्ट कृत न्यायमञ्जरी में पृ० 213 से 226 तक तथा यामुनाचार्य के सिद्धित्रय में पृ० 4-5 में नामोल्लेखपूर्वक इनके सिद्धान्तों को प्रतिपादित किया गया है। इसके आधार पर इन्हें वेदान्तदर्शन का आचार्य माना जा सकता है। इनके नाम से मीमांसादर्शन पर भी एक ग्रन्थ उपलब्ध होता है। कुमारिलभट्ट ने अपने श्लोकवार्तिक में अनेकस्थलों पर इनके नाम का उल्लेख किया है (1/1/1/10, 1/1/6/130-131)। साथ ही टीकाकार पार्थसारथि मिश्र ने भी अपनी न्याय रत्नाकर नामक टीका में इसीप्रकार का अभिप्राय अभिव्यक्त किया है। कुमारिलभट्ट के अनुसार-भर्तृमित्र इत्यादि आचार्यों के अपसिद्धान्तों के प्रभाव से मीमांसाशास्त्र लोकायतवत् हो गया। इसलिए विशिष्टाद्वैत दर्शन के ग्रन्थों में उल्लिखित भर्तृमित्र तथा श्लोकवार्तिक में कहे गए मीमांसक भर्तृमित्र एक ही व्यक्ति थे अथवा अलग-अलग, यह निश्चयपूर्वक कहना अत्यन्त कठिन है, किन्तु कुमारिलभट्ट की समालोचना के आधार पर इन्हें भिन्न व्यक्ति मानना ही उचित प्रतीत होता है। आचार्य मुकुलभट्ट ने भी अपने 'अभिधावृत्तिमातृका' नामक ग्रन्थ में इनके नाम का उल्लेख किया है (पृ० 17)। (११) आचार्य भर्तृहरि-यामुनाचार्य के ग्रन्थ 'सिद्धित्रय' में इनके नाम का भी उल्लेख किया गया है। ये प्रसिद्ध वैयाकरण थे। इन्हें महर्षि पतञ्जलि के व्याकरण महाभाष्य का सर्वाधिक प्राचीन एवं प्रामाणिक टीकाकार माना गया है। महाभाष्य पर लिखी गयी इनकी टीका 'महाभाष्य प्रदीप' ने विद्वानों में विशिष्टस्थान प्राप्त किया। इनके नाम से वाक्यपदीय, वाक्यपदीय के पहले दो काण्डों पर 'स्वोपज्ञटीका', वेदान्तसूत्रवृत्ति, मीमांसा
२० वेदान्तसार सूत्रवृत्ति ग्रन्थ उपलब्ध होते हैं।¹ विद्वानों ने शृङ्गारशतक, नीतिशतक एवं वैराग्यशतक के रचयिता राजा भर्तृहरि को इनसे भिन्न माना है।² पुण्यराज के अनुसार-आचार्य भर्तृहरि के गुरु का नाम वसुरात था। चीनी यात्री इत्सिंग ने इन्हें बौद्धधर्मावलम्बी स्वीकार किया है। उनके अनुसार इन्होंने सात बार प्रव्रज्या ग्रहण की थी, किन्तु कुछ विद्वान् इन्हें वैदिक धर्मावलम्बी स्वीकार करते हैं।³ वाक्यपदीय व्याकरणविषयक ग्रन्थ होने पर भी प्रसिद्ध दार्शनिकग्रन्थ है। निःसंदेहरूप से इसका आधार वेदान्तदर्शन के अद्वैतसिद्धान्त को ही स्वीकार किया जा सकता है। कुछ विद्वानों के मत में आचार्य मण्डनमिश्र ने आचार्य भर्तृहरि द्वारा प्रतिपादित शब्दब्रह्मवाद का आश्रय लेकर ही अपने 'ब्रह्मसिद्धि' नामक ग्रन्थ की संरचना की। जिसपर वाचस्पतिमिश्र द्वारा विरचित ब्रह्मतत्त्वसमीक्षा नाम की टीका मिलती है। काश्मीरीय शिवाद्धैत के प्रमुख आचार्य, उत्पलाचार्य के गुरु आचार्य सोमानन्द ने अपने 'शिवदृष्टि' नामक ग्रन्थ में भर्तृहरि के शब्दाद्वयवाद की विशेषरूप से समालोचना की है। इसके अतिरिक्त शान्तरक्षित कृत तत्त्वसंग्रह, अविमुक्तात्मकृत इष्टसिद्धि तथा जयन्तकृत न्यायमञ्जरी में भी शब्द-अद्वैतवाद का विस्तारपूर्वक उल्लेख मिलता है। उत्पलाचार्य एवं सोमानन्द के वचनों से ज्ञात होता है कि आचार्य भर्तृहरि एवं उनके सिद्धान्त का अनुकरण करने वाले शब्दब्रह्मवादी दार्शनिकविद्वान् 'पश्यन्तीवाक्' को ही शब्दब्रह्म का स्वरूप स्वीकार करते थे। इस वाक् को विश्व के नियामक एवं अन्तर्यामी चित् तत्त्व से अभिन्न माना गया है। आचार्य भर्तृहरि ने ब्रह्म को यथार्थसत्ता मानते हुए, शब्द एवं ब्रह्म में अभिन्नता प्रतिपादित करते हुए सम्पूर्ण जगत् को ब्रह्म का विवर्त स्वीकार किया है- अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम्। निवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः॥
- प्राचीन चरित्रकोश-चित्राव, पृ. 553
- वही।
- संस्कृत व्याकरण का इतिहास-युधिष्ठिर मीमांसक- पृ० 257
भूमिका २१ उनके अनुसार-व्याकरण के सिद्धान्तों के अध्ययन एवं मनन द्वारा मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है। इनके परवर्ती आचार्य, मण्डनमिश्र ने इनके सिद्धान्तों एवं मान्यताओं से प्रभावित होकर स्फोटसिद्धि नामक ग्रन्थ की संरचना की। प्रो० मैक्समूलर ने आचार्य भर्तृहरि को ईसा की सप्तम शताब्दी के पूर्वार्द्ध में स्थित माना है। (12) आचार्य उपवर्ष-शङ्कराचार्य¹ एवं शबरस्वामी के भाष्य² में इनके नाम का उल्लेख हुआ है। वहाँ इनके लिए सम्मानजनक 'भगवान्' शब्द का प्रयोग तात्कालिक समय में इनके गौरव तथा श्रेष्ठता को सिद्ध करता है। साथ ही इससे यह भी प्रतीत होता है कि इन्होंने पूर्वमीमांसा एवं उत्तरमीमांसा दोनों पर ही अपनी विद्वत्तापूर्ण व्याख्या की संरचना की थी। मणिमेखले नामक तमिलभाषा में लिखे गए एक प्राचीनग्रन्थ में आचार्य जैमिनि तथा व्यास के साथ ही आठ प्रमाणों को मान्यता प्रदान करने वाले 'कृतकोटि' नामक आचार्य के नाम का उल्लेख हुआ है। इनके साथ उपवर्ष आचार्य का सम्बन्ध स्थापित करने का विद्वानों ने प्रयास किया है। जो न्यायसंगत प्रतीत नहीं होता, क्योंकि आचार्य उपवर्ष वस्तुतः अन्य मीमांसकों एवं वेदान्तियों के समान केवल छः प्रमाणों को ही मान्यता प्रदान करते हैं। आचार्य बलदेव उपाध्याय ने इन्हें 200 ई० के लगभग स्थित माना है। (१३) आचार्य बौधायन-वेदार्थसंग्रह में गुरुदेव, कपर्दी, टङ्क तथा आचार्य भारुचि के साथ इनके नाम का भी उल्लेख मिलता है। डॉ. थीबो आदि विद्वानों का विचार है कि इन्होंने ब्रह्मसूत्र पर एक वृत्ति की संरचना की थी। यद्यपि इस समय यह कृति उपलब्ध नहीं है तथापि रामानुजाचार्य के श्रीभाष्य में इसके उद्धरण प्राप्त होते हैं। प्रसिद्ध जर्मन विद्वान् जैकोबी ने इनका मीमांसासूत्र पर वृत्ति लिखना स्वीकार किया है।³ ये कल्पसूत्रों के प्रवर्तक आचार्य बौधायन से भिन्न हैं। इसके अतिरिक्त प्रपञ्चहृदय नामक
- "इत एव चाकृष्याचार्येण शबरस्वामिना प्रमाणलक्षणे वर्णितम्। अत एव च भगवतोपवर्षेण प्रथमे तन्त्रे आत्मास्तित्वाभिधानप्रसक्तौ शारीरके वक्ष्याम इत्युद्धास्तुकृतः।" (ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्य-3/3/53)
- अथ गौरित्यत्र शब्दः गकारौकारविसर्जनीयः इति भगवानुपवर्षः। (मीमांसा शबरभाष्य-1/1/5)
- जरनल ऑफ दॉ अमेरिकन ओरियण्टल सोसायटी-पृ0 17-191
२२ वेदान्तसार ग्रन्थ से भी यह बात सिद्ध होती है कि इनके द्वारा निर्मित वेदान्तवृत्ति का नाम कृतकोटि था (प्रपञ्चहृदय-त्रिवेन्द्रम्-पृ० 39) अनेक विद्वानों ने इन्हें द्रविड़ देश का निवासी स्वीकार किया है।¹ (१४) आचार्य टङ्क-आचार्य रामानुज ने वेदान्तसंग्रह में इनके नाम का उल्लेख किया है। ये विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त के समर्थक थे। कुछ विद्वान् ब्रह्मनन्दी आचार्य के साथ इनकी अभिन्नता का प्रतिपादन करते हैं, किन्तु इस विषय में निश्चितरूप से कुछ भी कहना कठिन है। (१५) आचार्य ब्रह्मनन्दी-आचार्य मधुसूदन सरस्वती ने संक्षिप्त शारीरक टीका में (3/117) इनके नाम का उल्लेख किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि ये सम्भवतः अद्वैतवेदान्त के आचार्य थे तथा प्राचीन वेदान्त साहित्य में छान्दोग्य वाक्यकार अथवा केवल वाक्यकार के नाम से प्रसिद्ध थे, क्योंकि इन्होंने वाक्य नामक छान्दोग्यव्याख्यान की संरचना की थी। जिसपर द्रमिडाचार्य ने भाष्य लिखा। जैसा कि हम पूर्व में उल्लेख कर चुके हैं, कुछ विद्वानों ने आचार्य टङ्क के साथ इनकी अभिन्नता प्रतिपादित की है। (१६) आचार्य ब्रह्मदत्त-शङ्कराचार्य के पूर्ववर्ती वेदान्ताचार्यों में इनके नाम का उल्लेख भी प्राप्त होता है। ये अद्वैतवादी आचार्य थे (नैष्कर्म्यसिद्धि-1/68)। शङ्कराचार्य ने बृहदारण्यकोपनिषद् (1/4/7) के भाष्य में भी इनके मत का उल्लेख किया है। प्राचीन वेदान्ताचार्य आश्मरथ्य के भेदाभेद के सिद्धान्त से इनके मत की अनुकूलता प्रतीत होती है, क्योंकि उन्होंने ब्रह्म से जीव की उत्पत्ति तथा मुक्ति की स्थिति में उसका उसी में लीन होना स्वीकार किया है। जबकि ब्रह्मदत्त ने भी जीव की उत्पत्ति एवं विनाश की स्थिति को मान्यता प्रदान की है। इनके अनुसार-अज्ञान की निवृत्ति भावनाजन्य ज्ञान से ही होती है, औपनिषदिकज्ञान मुक्ति के लिए पर्याप्त नहीं है, क्योंकि इस ज्ञान के प्राप्त करने के पश्चात् भी जीवनपर्यन्त भावना आवश्यक है। इनके मत में-शरीर के रहने पर भी उपाय के माध्यम से देवता का साक्षात्कार सम्भव है, किन्तु उसके साथ मिलन देह के अभाव में ही सम्भव है। इसप्रकार प्रारब्धकर्मों से प्राप्त की हुई देह उपास्य के साथ उपासक के मिलन में बाधक है।²
- प्राचीन चरित्रकोश, पृ. 525
- बृहदारण्यकोपनिषद् वार्तिक-पृ0 1357 तथा नैष्कर्म्यसिद्धिटीका-‘चन्द्रिका’-पृ0 1-67
भूमिका २३ जिसप्रकार मृत्यु के पश्चात् स्वर्ग की प्राप्ति होती है। उसीप्रकार देह छूटने के पश्चात् ही मोक्ष भी सम्भव है। (१७) आचार्य भारुचि-आचार्य रामानुज ने अपने वेदान्तसंग्रह में पृ० 154 पर प्राचीन वेदान्ताचार्यों का उल्लेख करते हुए इनके नाम का सर्वप्रथम उल्लेख किया है। इन आचार्यों के नाम हैं-भारुचि, टङ्क, बोधायन, गुहदेव, कपर्दिक तथा द्रमिलाचार्य। इसीप्रकार विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा टीका में (1/18, 2/124) माधवाचार्य की पराशर संहिता टीका में (2/3, पृ० 510) तथा सरस्वतीविलास आदि ग्रन्थों में आचार्य भारुचि के नाम का कथन किया गया है। मिताक्षरा का समय विद्वानों ने 1050 ई० निर्धारित किया है। अतः इनका काल इससे पूर्व सिद्ध होता है। डा० पी० वी० काणे ने धर्मशास्त्र के इतिहास में इनका समय नवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध माना है।¹ श्री निवासदास ने यतीन्द्रमत दीपिका में अन्य वेदान्ताचार्यों के नामोल्लेख के प्रसङ्ग में इनका भी कथन किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि इन्होंने आचार्य विष्णुकृत धर्मसूत्र के ऊपर टीका की संरचना की थी। कुछ विद्वान् धर्मशास्त्रकार भारुचि तथा वेदान्ताचार्य भारुचि को भिन्न मानते हैं, किन्तु काणे महोदय ने दोनों के एक होने की सम्भावना व्यक्त करते हुए इन्हें विश्वरूप का समकालीन माना है।² (१८) द्रविडाचार्य-ये भी प्राचीन वेदान्ताचार्य थे। इन्होंने छान्दोग्योपनिषद् पर अत्यन्त वृहद्भाष्य की संरचना की। साथ ही बृहदारण्यकोपनिषद् पर भी भाष्य लिखा। अपने माण्डूक्योपनिषद् भाष्य में (2/32, 2/20) आचार्य शङ्कर ने इन्हें 'आगमवित्' कहकर सम्मानित किया है तथा बृहदारण्यकोपनिषद् भाष्य में 'सम्प्रदायवित्' कहकर सम्बोधित किया है। इन सम्बोधनों से तात्कालिक समय के दार्शनिक विद्वानों में इनके गौरव की अभिव्यक्ति होती है। यही कारण है कि शङ्कराचार्य ने कहीं भी इनके मत का खण्डन नहीं किया है। इनका दूसरा नाम द्रमिलाचार्य भी मिलता है। ये अद्वैतमत के समर्थक थे। इसके अतिरिक्त रामानुजाचार्य ने अपने वेदान्तसंग्रह में भी इनके नाम का उल्लेख किया है। विद्वानों ने यामुनाचार्य
- धर्मशास्त्र का इतिहास-पी० वी० काणे- पृ० 68 प्रथम भाग-हिन्दी अनुवाद।
- वही
२४ वेदान्तसार के सिद्धित्रय में आये 'भाष्यकृत' शब्द का सम्बन्ध इन्हीं द्रविडाचार्य से माना है— “भगवता बादरायणेन इदमर्थमेव सूत्राणि प्रणीतानि विवृतानि च परिमितगम्भीरभाष्यकृता” (सिद्धित्रय-यामुनाचार्य) (१९) गौडपादाचार्य—इन्हें अद्वैतवेदान्त का प्रथम प्रवर्तक एवं प्रधान आचार्य माना गया है, क्योंकि अद्वैतवेदान्त की गुरुपरम्परा अत्यन्त प्राचीन होते हुए भी इसके सिद्धान्तों का क्रमबद्धरूप में प्रस्थापन एवं प्रतिपादन इन्हीं के द्वारा किया गया। कुछ विद्वानों ने इन्हें बौद्धदर्शन से प्रभावित माना है। इनके जीवन के सम्बन्ध में कुछ विशेषबात नहीं मिलती, किन्तु शङ्कराचार्य के शिष्य सुरेश्वराचार्य के नैष्कर्म्यसिद्धि नामक ग्रन्थ से केवल इतना ज्ञात होता है कि ये गौड़प्रदेश के निवासी थे। विद्वानों ने इन्हें ईसा पूर्व द्वितीय शताब्दी के पूर्वभाग में स्थित माना है, जिसका आधार इनके ग्रन्थों में बौद्धमत का स्पष्टरूप से उल्लेख न होना रहा है। इन्होंने माण्डूक्योपनिषद् पर प्रसिद्ध कृति 'माण्डूक्यकारिका' की संरचना की। जिसपर शङ्कराचार्य ने भाष्य की रचना की तथा इसी कारिका पर मिताक्षरा नामक टीका भी मिलती है। परवर्ती आचार्यों ने इस कारिका को प्रमाणरूप में स्वीकार किया है। इस ग्रन्थ को चार प्रकरणों में विभाजित किया गया है (1) आगम (2) वैतथ्य (3) अद्वैत (4) अतीत शान्ति। इनका दूसरा ग्रन्थ 'उत्तरगीताभाष्य' मिलता है। उत्तरगीता महाभारत का ही एक अंश है, किन्तु यह अंश महाभारत की सभी प्रतियों में उपलब्ध नहीं होता। ईश्वरकृष्ण की सांख्यकारिका पर भी आचार्य गौडपाद का भाष्य उपलब्ध है,¹ किन्तु विद्वानों ने इन्हें पूर्वगौडपाद से भिन्न माना है, क्योंकि सांख्यकारिका के भाष्यकार आचार्य गौडपाद का समय ईसा की सप्तम शताब्दी माना गया है।² आचार्य गौडपाद अद्वैतवाद के प्रमुख आचार्य थे। अपनी कारिकाओं में उन्होंने जिन सिद्धान्तों को बीजरूप में प्रदर्शित किया, उन्हीं को आचार्य शङ्कर ने अपने ग्रन्थों में सरलशैली में प्रतिपादित किया। कारिकाओं में निर्दिष्ट उनके मत को विद्वानों ने 'अजातवाद' की संज्ञा प्रदान की।
- लेखककृत सांख्यकारिका 'चन्द्रिका' व्याख्या- संस्कृत ग्रन्थागार, दिल्ली-1998
- वही, भूमिका, पृ० 33
भूमिका २५ इनके अनुसार-वस्तुतः जगत् की उत्पत्ति नहीं हुई, एकमात्र अखण्ड-- चिद्घन सत्ता ही मोहवश प्रपञ्चवत् प्रतीत हो रही है- मनोदृश्यमिदं द्वैतमद्वैतं परमार्थतः। मनसो ह्यमनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते॥ न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बद्धो न च साधकः। न मुमुक्षुर्न वै मुक्त इत्येष परमार्थता॥ अर्थात् उत्पत्ति, प्रलय, बद्धता, साधकत्व, मुमुक्षत्व एवं मुक्तभाव ये सभी परमार्थ नहीं हैं। जिसप्रकार रज्जु में सर्प, सीपी में चांदी तथा स्वर्ण में आभूषणों की प्रतीति होती है, ठीक उसीप्रकार माया की महिमा द्वारा सर्वसङ्गशून्य निर्विशेष चित् तत्त्व में ही समस्त पदार्थों की प्रतीति हो रही है। अतः एकमात्र वही वस्तु सत् एवं परमार्थ है। (२०) आचार्य गोविन्दपाद-ये आचार्य गौडपाद के शिष्य तथा शङ्कराचार्य के गुरु थे। शङ्कराचार्य की जीवनी से केवल इनका नर्मदातट- निवासी होना सिद्ध होता है। ये अपने समय के उद्भट विद्वान् थे। इनका कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होता है। (२१) शङ्कराचार्य एवं उत्तरवर्ती वेदान्ताचार्य-शङ्कराचार्य को अद्वैतवाद का प्रवर्तक आचार्य माना जाता है। अद्वैतमत को शाङ्करमत या शाङ्करदर्शन भी कहते हैं। ब्रह्मसूत्र पर उपलब्ध भाष्यों में सर्वाधिक प्राचीन शाङ्करभाष्य माना जाता है। आचार्य शङ्कर की प्रामाणिक जीवनी का कहीं भी उल्लेख नहीं मिलता, किन्तु परवर्तीकाल में उनके जीवन की घटनाओं का कहीं-कहीं संकलन किया गया है। जिनमें आनन्दगिरि की शङ्करदिग्विजय, चिद्विलास की शङ्करविजय तथा माधवाचार्य की संक्षिप्त शङ्करजय मुख्य हैं। इन्हीं ग्रन्थों के आधार पर हम उनके विषय में यहाँ विवरण प्रस्तुत कर रहे हैं- शङ्कराचार्य का जन्म केरल प्रदेश की पूर्णा नदी के तटवर्ती ग्राम कलादी में वैशाख शुक्ल 5 को 788 ई० में हुआ। इनके पिता का नाम शिवगुरु तथा माता का नाम सुभद्रा था। भगवान् शङ्कर की आराधना से पुत्रप्राप्ति होने के कारण उन्होंने इनका नाम भी शङ्कर रखा। बालक शङ्कर बाल्यावस्था से ही अद्भुत प्रतिभा एवं स्मरणशक्ति के धनी थे अतः सात वर्ष की अवस्था तक इन्होंने वेद, वेदान्त और वेदाङ्गों का विधिवत् अध्ययन
२६ वेदान्तसार कर लिया। इनकी असाधारण प्रतिभा से सभी गुरुजन प्रभावित एवं आश्चर्यचकित थे। विद्याध्ययन समाप्त करने के पश्चात् घर लौटकर इन्होंने माता से संन्यास ग्रहण करने की अनुमति मांगी। मात्राज्ञा प्राप्त कर आठ वर्ष की अवस्था में ये घर से निकल पड़े क्योंकि शङ्कर माता के बहुत बड़े भक्त थे उनकी अनुमति के बिना, उन्हें कष्ट देकर संन्यास लेना नहीं चाहते थे। घर से प्रस्थान करने के बाद उन्होंने नर्मदा के तट पर स्वामी गोविन्दपाद से शिक्षा ग्रहण की। उन्होंने इनका नाम पूज्यपादाचार्य रखा। गुरु की कृपा से शीघ्र ही ये बहुत बड़े योगसिद्ध महात्मा हो गए। उनकी सिद्धि से प्रसन्न होकर गुरु ने इन्हें काशी जाकर वेदान्तसूत्र पर भाष्य लिखने की आज्ञा दी। जहाँ उनके वैदुष्य की ख्याति बढ़ने लगी और लोग उनके पास आकर उनका शिष्यत्व ग्रहण करने लगे। विद्यार्णव नामक ग्रन्थ के अनुसार उनके शिष्यों की संख्या 14 थी। जिनमें पाँच संन्यासी तथा नौ गृहस्थ थे। इनके प्रथम शिष्य का नाम पद्मपाद था। शेष चार संन्यासी शिष्यों में शङ्कर, बोध, गीर्वाण तथा आनन्दतीर्थ का नाम उल्लेखनीय है। सुन्दर, विष्णुशर्मा, लक्ष्मणमल्लिकार्जुन, त्रिविक्रम, श्रीधर, कपर्दी, केशव और दामोदर इनके गृहस्थ शिष्य थे। काशी में रहते हुए इन्होंने सभी विरुद्ध मतावलम्बियों को परास्त किया तथा ब्रह्मसूत्र पर भाष्य की संरचना की। वहाँ से कुरुक्षेत्र होते हुए ये बदरिकाश्रम गए। जहाँ उन्होंने कुछ अन्य ग्रन्थों की रचना की। उन्होंने अपनी 12 वर्ष की अवस्था से सोलह वर्ष की अवस्था तक सभी ग्रन्थों की रचना की। वहाँ से चलकर ये प्रयाग गए, जहाँ कुमारिलभट्ट से इनकी मुलाकात हुई। वहाँ से मगध की माहिष्मती नगरी में मण्डनमिश्र के पास शास्त्रार्थ हेतु गए। मण्डनमिश्र की पत्नी भारती शास्त्रार्थ में निर्णायक के रूप में रहीं। अन्त में मण्डनमिश्र की पराजय होने के पश्चात् उन्होंने आचार्य शङ्कर का शिष्यत्व ग्रहण कर लिया। ये ही आगे चलकर सुरेश्वराचार्य के नाम से प्रख्यात हुए। मगधविजय करके शङ्कराचार्य दक्षिण के ओर गए। जहाँ उन्होंने शैव और कापालिकों को परास्त किया। वहाँ से चलकर दक्षिण में तुङ्गभद्रा के तट पर
भूमिका २७ मन्दिर बनवा कर उसमें शारदादेवी की स्थापना की। इसके साथ ही स्थापित मठ कोशृंगेरीमठ के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त हुई तथा अपने शिष्य सुरेश्वराचार्य को इस मठ में आचार्य पद पर नियुक्त किया। इन्हीं दिनों माता की मृत्यु निकट जानकर माता को दिये वचन के अनुसार वापस घर आकर माता की अन्त्येष्टिक्रिया सम्पन्न की। इनके पिता का देहान्त इनकी तीन वर्ष की आयु में ही हो गया था। पुनःशृंगेरीमठ में वापस आए तथा वहाँ से पुरी जाकर गोवर्धनमठ की स्थापना की एवं अपने प्रथम शिष्य पद्मपादाचार्य को मठाधिपति नियुक्त किया। चोल एवं पाण्ड्यदेश के राजाओं की सहायता से इन्होंने दक्षिण में शाक्त, गाणपत्य तथा कापालिक सम्प्रदाय के अनाचारों को दूर किया। तत्पश्चात् इन्होंने उत्तरभारत की ओर प्रस्थान किया। मार्ग में उज्जैन में होने वाली भैरवों की भीषणसाधना को बन्द किया। पुनः गुजरात आकर द्वारकामठ की स्थापना करके अपने शिष्य हस्तामलकाचार्य को आचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया। पुनः गांगेय प्रदेश के पण्डितों को परास्त करके काश्मीर के शारदाक्षेत्र में आकर वहाँ के पण्डितों को परास्त करके अपने मत की स्थापना की। तत्पश्चात् आसाम के कामरूप स्थान में जाकर शैवों से शास्त्रार्थ किया। पुनः बदरिकाश्रम आकर ज्योतिर्मठ की स्थापना करके अपने शिष्य तोटकाचार्य को वहाँ का मठाधीश नियुक्त किया। वहाँ से केदारक्षेत्र आए, जहाँ इन्होंने कुछ दिन बाद 32 वर्ष की आयु में निर्वाण प्राप्त किया। यद्यपि शङ्कराचार्य के नाम से लिखे गए 272 ग्रन्थ बताए जाते हैं, किन्तु यह कहना कठिन है कि वे सभी आद्य शङ्कराचार्य द्वारा लिखे गए, क्योंकि बाद में शङ्कराचार्य उपाधिधारी विद्वानों ने भी ग्रन्थों की रचना की। जिन्होंने अपने पूरे नामों का उल्लेख नहीं किया। पुनरपि अधिकांश विद्वत्सम्मत ग्रन्थों के नाम इसप्रकार हैं- ब्रह्मसूत्रभाष्य, उपनिषद्भाष्य (ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक, श्वेताश्वतर इत्यादि) गीताभाष्य, विष्णुसहस्रनामभाष्य, सनत्सुजातीयभाष्य, हस्तामलकभाष्य, ललितात्रिशती भाष्य, विवेकचूड़ामणि, प्रबोधसुधाकर, उपदेशसाहस्री, अपरोक्षानुभूति,
२८ वेदान्तसार शतश्लोकी, दशश्लोकी, सर्ववेदान्तसिद्धान्तसारसंग्रह वाक्यसुधा, पञ्चीकरण, प्रपञ्चसारतन्त्र, आत्मबोध, मनीषापञ्चक, आनन्दलहरीस्तोत्र इत्यादि। आचार्य शङ्कर का सिद्धान्त अद्वैतवाद के नाम से प्रसिद्ध है, तदनुसार उन्होंने ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य समस्त जगत् को मिथ्या प्रतिपादित किया (ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या) एतदर्थ उन्होंने मायावाद की स्थापना की। इसे विद्वानों ने उनका अमोघमन्त्र बताया, जिसके माध्यम से उन्होंने ब्रह्म एवं जगत् विषयक पहेली को सुलझाकर विद्वानों के समक्ष रखा। उनके अनुसार सम्पूर्ण दृश्यमान जगत् ब्रह्म का विवर्तमात्र है। जैसे हमें रज्जु में सर्प की भ्रान्ति हो जाती है, ठीक उसीप्रकार ब्रह्मतत्त्व में ही हमें जगत् की भ्रान्ति हो रही है। उन्होंने आत्मा को स्वतःसिद्ध माना। उनके मत में मोक्ष एक व्यावहारिक सत्य है। इसे प्राप्त करने के लिए उन्होंने ज्ञान, कर्म एवं उपासना सभी की उपादेयता को स्वीकार किया। इसीकारण उनका सिद्धान्त केवल विद्वानों, ज्ञानियों एवं योगियों के लिए ही उपयोगी नहीं, अपितु सामान्यव्यक्ति के लिए भी उपयोगी सिद्ध हुआ है। आचार्य शङ्कर के परवर्ती वेदान्तदर्शन के आचार्यों की परम्परा अत्यन्त विशाल रही है। यहाँ हम उनका संक्षेप में उल्लेख कर रहे हैं- (२२) पद्मपादाचार्य-ये शङ्कराचार्य के प्रथम शिष्य थे। इनका पूर्वनाम सञ्दन था। दक्षिण के चोलप्रदेश में इनका जन्म हुआ। ये गुरु के परमभक्त एवं आज्ञापालक थे। पद्मपाद नाम इन्हें शङ्कराचार्य ने दिया था। एक बार जब उग्रभैरव नामक कापालिक ने शङ्कराचार्य की बलि चढ़ानी चाही तो आचार्य पद्मपाद ने ही उसका वध किया। शङ्कराचार्य ने इन्हें पुरी के गोवर्धनमठ का अध्यक्ष बनाया। इन्होंने अपने जीवनपर्यन्त अद्वैतमत का प्रचार किया। इनका एक अपूर्ण ग्रन्थ पञ्चपादिका, आत्मानात्मविवेक, प्रपञ्चसार तथा सुरेश्वराचार्यकृत लघुवार्तिक की टीका उपलब्ध हैं। पञ्चपादिका में शरीरक भाष्य के केवल चार सूत्रों की व्याख्या की गई है। जिसपर प्रकाशात्ममुनि की विवरण नामक टीका तथा इसपर भी अखण्डानन्दमुनि की तत्त्वदीपन नाम की टीका मिलती है। आचार्य पद्मपाद के शिष्यों में से ही दशनामी संन्यासियों की 'आश्रम' और 'अरण्य' शाखाएँ निकली हैं।
भूमिका २९ (२३) आचार्यमण्डनमिश्र-इनका अन्य नाम सुरेश्वराचार्य भी था। ये रेवा नदी के तटवर्ती प्राचीन महिष्मती के निवासी थे। मण्डनमिश्र अपने समय के मगधप्रदेश के सबसे बड़े विद्वान् और पूर्वमीमांसक थे। ऐसी मान्यता है कि पहले ये कुमारिलभट्ट के शिष्य थे तथा उन्होंने ही शङ्कराचार्य को इनसे शास्त्रार्थ करने के लिए भेजा था। आचार्य शङ्कर ने इनके घर पर पहुँच कर इनसे शास्त्रार्थ किया तथा शास्त्रार्थ में इन्हें परास्त किया। अतः शर्त के अनुसार शङ्कराचार्य का शिष्यत्व ग्रहण करके ये संन्यासी हो गए तथा विश्वरूप एवं सुरेश्वराचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुए। शङ्कराचार्य ने बाद में शृंगेरी मठ की स्थापना करके इन्हें वहाँ का आचार्य नियुक्त किया। सुरेश्वराचार्य पाण्डित्य के अगाध सागर थे। उनके ग्रन्थों में विचारों की प्रौढ़ता एवं क्रमबद्धता देखने को मिलती है। चित्सुख, विद्यारण्य, सदानन्द, गोविन्दानन्द, अप्पयदीक्षित आदि परवर्ती आचार्यों ने उनके वचनों को अपने ग्रन्थों में प्रमाणरूप में प्रस्तुत किया है। संन्यास ग्रहण करने से पहले इन्होंने आपस्तम्बीय मण्डनकारिका, भावनाविवेक एवं काशीमोक्षनिर्णय नामक ग्रन्थों की रचना की तथा उसके पश्चात् इन्होंने तैत्तिरीयश्रुतिवार्तिक, नैष्कर्म्यसिद्धि, इष्टसिद्धि, पञ्चीकरण- वार्तिक, बृहदारण्यकोपनिषद्वार्तिक, ब्रह्मसिद्धि, ब्रह्मसूत्रभाष्यवार्तिक, विधिविवेक, मानसोल्लास, लघुवार्तिक, वार्तिकसार तथा वार्तिकसारसंग्रह ग्रन्थों की संरचना की। संन्यास ग्रहण करने के बाद इन्होंने शङ्करमत का ही प्रचार किया तथा अपने ग्रन्थों में भी उन्हीं के मत का समर्थन किया। (२४) सर्वज्ञात्ममुनि-शङ्कराचार्य द्वारा स्थापित शृंगेरीमठ की गद्दी पर आठवीं शताब्दी के अन्त में इन्हें पदस्थापित किया गया। इनका दूसरा नाम नित्यबोधाचार्य था। शङ्करमत के प्रचार की दृष्टि से इन्होंने 'संक्षेपशारीरक' ग्रन्थ की संरचना की। इनके गुरु का नाम देवेश्वराचार्य था। मधुसूदन सरस्वती एवं स्वामीरामतीर्थ ने सुरेश्वराचार्य से इसकी अभिन्नता प्रतिपादित की है। जो कालक्रम की दृष्टि से संगत प्रतीत नहीं होता। शृंगेरीमठ के प्राचीनलेखों से इनका स्थितिकाल 758 ई० से 848 ई० प्रतीत होता है। ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्य के आधार पर लिखे गए 'संक्षेपशारीरक' में श्लोक एवं वार्तिक दोनों की संरचना की गई है। चार अध्यायों में विभक्त इस ग्रन्थ के प्रथम अध्याय में 562, द्वितीय में 248, तृतीय में 365 तथा चतुर्थ में 53 श्लोक हैं। परवर्ती आचार्यों ने इसे प्रमाणरूप में स्वीकार
३० वेदान्तसार किया है तथा मधुसूदनसरस्वती एवं स्वामीरामतीर्थ ने इस ग्रन्थ पर टीकाएँ भी लिखी हैं। (२५) आचार्य वाचस्पतिमिश्र-इनका जन्मस्थान मिथिला माना जाता है। इनके ग्रन्थों से प्रतीत होता है कि ये अपने विषय के धुरन्धर विद्वान् तथा अद्वैतमत के प्रमुख आचार्य थे। विद्वानों ने इनका समय आठवीं शताब्दी के अन्त से लेकर नवम शती का प्रारम्भ निर्धारित किया है। इनके बाद के प्रायः सभी आचार्यों ने इनके वाक्यों को प्रमाणरूप में स्वीकार किया है। इन्होंने शङ्करभाष्य पर भामती टीका का प्रणयन किया। शङ्करमत को समझाने हेतु इसका अध्ययन अनिवार्य माना जाता है। इनके वैदुष्य से प्रभावित होकर इन्हें राजसम्मान की प्राप्ति हुई। कहते हैं ये ग्रन्थ लिखने में इतने अधिक तल्लीन रहते थे कि इन्हें अपने आसपास का भी कोई भान नहीं रहता था। जब ये शारीरकभाष्य की टीका लिख रहे थे तो कमरे में दीपक बुझ गया। तब इनकी धर्मपत्नी भामती ने कमरे में आकर वह दीपक जलाया। उसीसमय इनका परिचय अपनी पत्नी से हुआ, तभी पत्नी ने अपने पातिव्रत्य से इन्हें परिचित कराया तो उससे प्रभावित होकर इन्होंने अपनी टीका का नाम 'भामती' रखने का निश्चय करके अपनी पत्नी को सदैव के लिए अमर बना दिया। वाचस्पतिमिश्र ने छहों दर्शनों पर अपनी टीकाएँ लिखीं। उन्होंने वेदान्त पर 'भामती', सुरेश्वरकृत ब्रह्मसिद्धि पर 'ब्रह्मतत्त्वसमीक्षा', सांख्यकारिका पर 'तत्त्वकौमुदी' पातञ्जलदर्शन पर 'तत्त्ववैशारदी', न्यायदर्शन पर 'न्यायवार्तिक- तात्पर्य', पूर्वमीमांसादर्शन पर 'न्यायसूचीनिबन्ध, भाट्टमत पर 'तत्त्वबिन्दु' तथा मण्डनमिश्र के विधिविवेक पर 'न्यायकणिका' नामक टीका की संरचना की। इनके ग्रन्थों में तत्तत् आचार्य के सिद्धान्तों का निष्पक्षभाव से समर्थन के साथ-साथ, उनमें मौलिकता के दर्शन भी होते हैं। शाङ्करसिद्धान्त के प्रचार में इनका बहुत बड़ा हाथ माना जाता है। ये विद्वान् ही नहीं, अपितु उच्चकोटि के साधक भी थे। (२६) श्रीकृष्णमिश्र यति-नवम एवं दशम शती तक वेदान्त विषयक चर्चा विद्वानों तक सीमित थी, किन्तु इसका प्रभाव बढ़ने के कारण धीरे-धीरे यह सर्वसाधारण में भी लोकप्रिय होने लगी। इस दृष्टि से ग्यारहवीं शती में नाटक-काव्यादि के माध्यम से वेदान्तदर्शन को समझाने
भूमिका ३१ का प्रयास आरम्भ हुआ, क्योंकि काव्यादि सर्वसाधारण पर गद्य की अपेक्षा अधिक प्रभावशाली होते हैं। साथ ही ये सुबोध भी होते हैं। अतः अद्वैतमत का प्रचार करने की दृष्टि से श्रीकृष्णमिश्र ने 'प्रबोधचन्द्रोदय' नामक नाटक की संरचना की। इनका काल ग्यारहवीं शती का उत्तरार्द्ध माना जाता है। ये एक संन्यासी थे। इनके द्वारा विरचित नाटक के माध्यम से ही इनकी कवित्व शक्ति एवं दार्शनिकप्रतिभा का परिचय प्राप्त होता है। (२७) प्रकाशात्मयति-ग्यारहवीं शती में आचार्य रामानुज ने शाङ्कर मत का जोरदार खण्डन किया। उसीसमय इन्होंने शांकरमत की प्रस्थापना का प्रयास किया। इन्होंने पद्मपादाचार्य द्वारा विरचित पञ्चपादिका पर 'पञ्चपादिकाविवरण' नामक टीका का प्रणयन किया। अद्वैतसिद्धान्त की दृष्टि से यह टीका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है, क्योंकि परवर्ती आचार्यों ने अनेकशः इसके वाक्यों को प्रमाणरूप में उद्धृत किया है। विद्वानों ने इनका स्थितिकाल दसवीं शताब्दी एवं तेरहवीं शताब्दी के मध्य निर्धारित किया है। इनके गुरु का नाम अनन्यानुभव था। इनके ग्रन्थों से पता चलता है कि इनके गुरु को ब्रह्म का साक्षात्कार हुआ था। इनका दूसरा नाम प्रकाशानुभव था। (२८) आचार्य अद्वैतानन्द- इनका जन्म 1149 ई० में दक्षिणभारत में स्थित कावेरीनदी के तट पर पञ्चनद नामक स्थान में हुआ। इनके पिता प्रेमनाथ तथा माता पार्वती देवी थीं। कौण्डिन्य गोत्र में उत्पन्न इनका पूर्वनाम सीतानाथ था। इन्होंने सत्रह वर्ष की आयु में संन्यास ग्रहण किया। काञ्ची स्थित शारदामठ के अध्यक्ष भूमानन्द (चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती) इनके गुरु थे। जिन्होंने लगभग 1166 ई० में अद्वैतानन्द को अपने स्थान पर नियुक्त करके काशी के लिए प्रस्थान किया। संन्यास लेने से पूर्व ही अद्वैतानन्द ने न्याय एवं मीमांसादर्शन में पर्याप्त निपुणता प्राप्त कर ली थी। स्वामीरामानन्द से इन्होंने शारीरकसूत्रभाष्य का अध्ययन किया, इनके प्रति अद्वैतानन्द की अगाध श्रद्धा थी। 33 वर्षों तक मठ के अध्यक्ष पद पर रहने के पश्चात् 50 वर्ष की आयु में इन्होंने सन् 1199 ई० में समाधि ग्रहण की। इन्हें चिद्विलास एवं आनन्दबोधाचार्य के नाम से जाना जाता है।
३२ वेदान्तसार इन्होंने ब्रह्मविद्याभरण, शान्तिविवरण तथा गुरुप्रदीप आदि तीन ग्रन्थों की रचना की। इनमें ब्रह्मविद्याभरण ही प्रमुख एवं महत्त्वपूर्ण माना जाता है। इसमें ब्रह्मसूत्र के चारों अध्यायों की व्याख्या प्रस्तुत की गई है। इन्होंने अपने ग्रन्थों में प्रायः वाचस्पतिमिश्र के मत का ही अनुकरण किया है। (२९) श्रीहर्षमिश्र-श्रीहर्ष दार्शनिक और पण्डितकवि दोनों थे। इनके पिता का नाम श्रीहीरपण्डित तथा माता का नाम मामल्ल देवी था। माँ भगवती की उपासना के फलस्वरूप इन्हें पुत्ररत्न (श्रीहर्ष) की प्राप्ति हुई थी। ये अनन्य पितृभक्त तथा दृढ़प्रतिज्ञ थे। कहते हैं चिन्तामणिमन्त्र की सिद्धि के फलस्वरूप इन्हें समस्त विद्याओं में नैपुण्य तथा अद्भुत वाक्चातुर्य की प्राप्ति हुई। तत्पश्चात् कान्यकुब्ज के राजा की सभा में जाकर इन्होंने शास्त्रार्थ करके राजपण्डितों को पराजित किया तथा राज्यानुकम्पा प्राप्त की। उनके आश्रयदाता राजा का नाम जयचन्द्र अथवा जयन्तचन्द्र था। श्रीहर्ष के समय में देश में न्यायदर्शन का विशेष प्रभाव था। साथ ही दक्षिण और उत्तरभारत में रामानुज एवं निम्बार्क के मतों का भी प्रचार हो रहा था। ऐसे समय में इन्होंने अपनी अपूर्वप्रतिभा द्वारा अद्वैतमत का समर्थन किया। न्यायमत का खण्डन करने हेतु उन्होंने 'खण्डनखण्डखाद्य' नामक अद्भुत एवं प्रौढ़ग्रन्थ की संरचना की। इनका दूसरा काव्यग्रन्थ 'नैषधचरित' है। इनमें इनके अपूर्व कवित्व एवं पाण्डित्य की अभिव्यक्ति हुई है। इनके अतिरिक्त उन्होंने अर्णववर्णन, शिवशक्तिसिद्धि, साहसाङ्कचम्पू, छन्दःप्रशस्ति, विजयप्रशस्ति, गौडोर्वीशकुलप्रशस्ति, ईश्वराभिसन्धि तथा स्थैर्यविचारणप्रकरण इत्यादि ग्रन्थों की भी संरचना की। अपने ग्रन्थों में उन्होंने विशेषरूप से उदयनाचार्य के न्यायमत का खण्डन करते हुए अद्वैतमत की स्थापना की है। उनके खण्डनखण्डखाद्य को 'अनिर्वचनीयसर्वस्व' के नाम से भी जाना जाता है। (३०) आनन्दबोधभट्टारकाचार्य-ये बारहवीं शताब्दी में विद्यमान थे। उन्होंने विभिन्नग्रन्थों से संग्रह करके 'न्यायमकरन्द' नामक ग्रन्थ की रचना की। तेरहवीं शताब्दी में विद्यमान चित्सुखाचार्य ने इस ग्रन्थ की व्याख्या प्रस्तुत की। ये संन्यासी थे। इनके जीवन की इससे अधिक कुछ बात ज्ञात नहीं है। इनके तीन ग्रन्थ प्राप्त होते हैं-(1) न्यायमकरन्द, (2) प्रमाण- माला (3) न्यायदीपावली। इन तीनों में ही इन्होंने अद्वैतमत का विवेचन किया है।
भूमिका ३३ ( ३१ ) आचार्य अमलानन्द– इनका आविर्भाव दक्षिणभारत में हुआ। इन्हें देवगिरि के राजा महादेव ( 1260 ई० से-1271 ई०) तथा राजा रामचन्द्र का समसामयिक माना जाता है। अतः इनका स्थितिकाल तेरहवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध मानना उचित प्रतीत होता है। इनके गुरु का नाम अनुभवानन्द था। ये अद्वैतमत के समर्थक थे। इन्होंने तीन ग्रन्थों की रचना की–वेदान्तकल्पतरु, शास्त्रदर्पण तथा पञ्चपादिकादर्पण। इनमें से प्रथम में वाचस्पतिमिश्र की भामती टीका की व्याख्या की गई है। यह ग्रन्थ अद्वैतसिद्धान्त का प्रामाणिकग्रन्थ माना जाता है। द्वितीय में ब्रह्मसूत्र के अधिकरणों की व्याख्या हुई है तथा तृतीय ग्रन्थ पद्मपादाचार्य की 'पञ्चपादिका' नामक ग्रन्थ की व्याख्या है। इन तीनों ग्रन्थों में भाषा प्राञ्जल तथा भावों की गम्भीरता देखने को मिलती है। ( ३२ ) चित्सुखाचार्य–बारहवीं एवं तेरहवीं शताब्दी भारतीय दार्शनिक इतिहास में खण्डन-मण्डन का युग रहा है। इस कालावधि में द्वैत-अद्वैतवादी न्यायमत के आचार्य परस्पर एक-दूसरे के सिद्धान्तों का खण्डन करने में लगे हुए थे। इन दिनों न्यायमत का प्रभाव बढ़ रहा था। अतः बारहवीं शती में श्रीहर्ष ने न्यायमत का खण्डन किया। पुनः तेरहवीं शती के आरम्भ में आचार्य गङ्गेश ने उनके मत को काटकर पुनः न्यायमत की प्रस्थापना की। इसीप्रकार द्वैतवादी वैष्णवाचार्य भी अद्वैतमत के खण्डन में लिप्त थे। ऐसे समय में चित्सुखाचार्य ने अद्वैतमत के समर्थन तथा न्याय आदि मतों का खण्डन करके शाङ्करमत की रक्षा की। एतदर्थ उन्होंने 'तत्त्वप्रदीपिका', 'न्यायमकरन्द' की टीका तथा खण्डनखण्डखाद्य की टीका लिखी। इनमें तत्त्वदीपिका का दूसरा नाम चित्सुखी भी है। इसके मङ्गलाचरण के अनुसार इनके गुरु का नाम 'ज्ञानोत्तम' था। इस ग्रन्थ में इन्होंने 12वीं शती में स्थित न्यायलीलावतीकार वल्लभाचार्य के मत का खण्डन श्रीहर्ष के मत का उद्धरण देते हुए किया है। अतः इनका समय तेरहवीं शताब्दी माना गया है। ( ३३ ) आचार्य शङ्करानन्द–चौदहवीं शताब्दी में स्थित अद्वैतवादी आचार्य शङ्करानन्द, विद्यारण्यस्वामी के शिक्षागुरु थे, क्योंकि उन्होंने पञ्चदशी एवं विवरणप्रमेयसंग्रह के मङ्गलाचरण में इन्हें गुरुरूप में प्रणाम किया है। इन्होंने शाङ्करमत के प्रचारार्थ 'ब्रह्मसूत्रदीपिका', गीता की टीका तथा 108 उपनिषदों की टीका की संरचना की। इनके ग्रन्थों के अध्ययन से इनके
३४ वेदान्तसार अगाधपाण्डित्य की अभिव्यक्ति होती है। एक आत्मपुराण नामक ग्रन्थ भी इनके नाम से मिलता है। इन्होंने अपने ग्रन्थों में सर्वत्र शङ्कराचार्य का ही अनुसरण किया है। (३४) विद्यारण्यमुनि- इनका दूसरा नाम 'माधव' था। ये विजय नगर राज्य के संस्थापक थे। सन् 1336 ई. के लगभग इन्होंने महाराज वीर बुक्क का राजसिंहासन पर अभिषेक किया तथा स्वयं उनके प्रधानमन्त्री बने। ये बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे, क्योंकि ये उच्चकोटि के दार्शनिक, कवि, वैयाकरण, स्मृतिसंग्रहकार और राजनीतिज्ञ थे। प्रसिद्ध विशिष्टाद्वैताचार्य वेदान्तदेशिकाचार्य इनके समकालीन और बालसखा थे। इनका स्थितिकाल विद्वानों ने 1296 ई० से 1386 ई० निर्धारित किया है। लोकमान्यता के अनुसार इनका जन्म तुंगभद्रा नदी के तटवर्ती हाम्पी नगर के पास एक गाँव में हुआ था। इनका सूत्र बोधायन तथा गोत्र भारद्वाज था 'पराशरमाधव' नामक ग्रन्थ के अनुसार इनके पिता का नाम मायण तथा माता का नाम श्रीमती था। सायण और भोगनाथ इनके दो भाई थे। ये दोनों ही भाई अत्यन्त प्रतिभाशाली थे। जिसमें सायण ने वेदों पर विद्वत्तापूर्ण भाष्यों की संरचना की। वृद्धावस्था (1377 ई०) में इन्होंने विद्यारण्यस्वामी के नाम से संन्यास ग्रहण किया। किंवदन्तियों के अनुसार इनकी मृत्यु 90 वर्ष की आयु में हुई। इन्होंने गुरुरूप में विद्यातीर्थ, भारतीतीर्थ एवं शङ्करानन्द को स्मरण किया है।$^1$ अपने जीवनकाल में इन्होंने अनेक ग्रन्थों की रचना की। जिनमें-माधवीयधातुवृत्ति (व्याकरणग्रन्थ), जैमिनीयन्यायमाला एवं उसकी टीका 'विवरण' (पूर्वमीमांसाविषयक ग्रन्थ), पराशरमाधव (स्मृतिशास्त्र- विषयक ग्रन्थ), सर्वदर्शनसंग्रह (समस्त दर्शनों का सारसंग्रह), विवरणप्रमेय- संग्रह (पद्मपादकृत पञ्चपादिकाविवरण की व्याख्या), सूतसंहिता की टीका (स्कन्दपुराण के अन्तर्गत स्थित सूतसंहिता-वेदान्त के सिद्धान्तों की व्याख्या) पञ्चदशी (अद्वैतवेदान्त का प्रकरण ग्रन्थ, 15 प्रकरण, 1500 श्लोकों में निबद्ध), अनुभूति प्रकाश (श्लोकबद्ध उपनिषद् आख्यायिकाएँ), अपरोक्षानुभूति की टीका (शङ्कराचार्य विरचित अपरोक्षानुभूति ग्रन्थ पर वैदुष्यपूर्ण टीका), जीवन्मुक्तिविवेक (संन्यासियों के धर्मों का विस्तृत
- पञ्चदशी एवं विवरणप्रमेय संग्रह- मंगलाचरण।
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निरूपण), ऐतरेयोपनिषद् दीपिका (शांकरभाष्यानुसारी व्याख्या), तैत्तिरीयोपनिषद्दीपिका (शाङ्करभाष्यानुसारी टीका), छान्दोग्योपनिषद्दीपिका (शाङ्करभाष्यानुसारी) बृहदारण्यकवार्तिकसार (शाङ्करभाष्य पर लिखे गए सुरेश्वराचार्यकृत वार्तिक का श्लोकबद्ध सार), शङ्करदिग्विजय (शङ्कराचार्य जीवनचरितविषयक उत्कृष्ट काव्यरचना, कालमाधव (स्मृतिशास्त्रविषयक ग्रन्थ)। उपर्युक्त ग्रन्थों से इनकी सर्वतोमुखी प्रतिभा का परिचय प्राप्त होता है। ये उच्चकोटि के राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ तत्त्वनिष्ठ एवं तपोमयीवृत्ति के धनी थे। संन्यास ग्रहण करने के बाद ये शृंगेरीमठ के अध्यक्षरूप में भी प्रतिष्ठित रहे। (३५) आचार्य आनन्दगिरि—शङ्कराचार्य ने जितने भी भाष्य किए उन सभी पर इन्होंने टीका लिखी है। भाष्यों के अभिप्राय को अभिव्यक्त करने में इनकी टीकाएँ अत्यधिक सहायक रही हैं। इसके अतिरिक्त इन्होंने 'शङ्कर दिग्विजय' नामक एक स्वतन्त्रग्रन्थ की भी रचना की। जिसकी संरचना विद्यारण्य स्वामी की 'शङ्करदिग्विजय' के बाद की है। अतः इन्हें विद्यारण्य स्वामी से परवर्ती तथा अप्ययदीक्षित से पूर्ववर्ती कहा जा सकता है, क्योंकि उन्होंने सिद्धान्तलेशसंग्रह में इनकी न्यायनिर्णयटीका का उल्लेख किया है। इस दृष्टि से इन्हें पन्द्रहवीं शती में स्थित माना जा सकता है, क्योंकि विद्वानों ने विद्यारण्यस्वामी का समय 14वीं शताब्दी तथा अप्ययदीक्षित का सोलहवीं शताब्दी निर्धारित किया है। इनका दूसरा नाम आनन्दज्ञान था, यद्यपि इनके जीवन के सम्बन्ध में अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है तथापि इतना अवश्य कहा जा सकता है कि ये सफल टीकाकार, उन्नत दार्शनिक तथा सरल संन्यासी थे। इनके गुरु शुद्धानन्दस्वामी थे। कुछ विद्वानों ने इन्हें शङ्कराचार्य का शिष्य भी माना है, किन्तु कालक्रम की दृष्टि से यह समीचीन प्रतीत नहीं होता। इन्होंने शङ्कराचार्यकृत उपनिषद्भाष्य, गीताभाष्य, शारीरकभाष्य तथा शतश्लोकी पर वैदुष्यपूर्ण टीकाएँ लिखीं। इसके अतिरिक्त सुरेश्वराचार्यकृत तैत्तिरीयोपनिषद्- वार्तिक तथा बृहदारण्यकोपनिषद्द्वार्तिक पर भी टीका लिखी। (३६) प्रकाशानन्दाचार्य—इन्होंने 'वेदान्तसिद्धान्तमुक्तावली' ग्रन्थ की रचना की। इनका स्थितिकाल पन्द्रहवीं शताब्दी माना गया है, क्योंकि अप्ययदीक्षित ने सिद्धान्तलेशसंग्रह में इनके मत का उल्लेख किया है। अतः
३६ वेदान्तसार ये अप्पयदीक्षित से पूर्ववर्ती हुए। साथ ही अपनी वेदान्तसिद्धान्तमुक्तावली' में पञ्चदशी के उदाहरण प्रस्तुत करने के कारण विद्यारण्यस्वामी से परवर्ती सिद्ध होते हैं। इनके गुरु का नाम ज्ञानानन्द था। 'वेदान्तसिद्धान्तमुक्तावली' वेदान्त का उत्कृष्टकोटि का प्रमाणग्रन्थ माना गया है। इसमें गद्य में विचार-विवेचन करते हुए पद्य में सिद्धान्त निरूपण किया गया है। इस ग्रन्थ पर अप्पयदीक्षित ने 'सिद्धान्तदीपिकावृत्ति' का प्रणयन किया। (३७) आचार्य मल्लनाराध्य-इनका जन्म सोलहवीं शताब्दी के आरम्भ में कोटीश वंश में हुआ। ये दक्षिणभारत के निवासी थे। इन्होंने द्वैतवादियों के मत का खण्डन करने के उद्देश्य से 'अद्वैतरत्न' तथा 'अभेदरत्न' नामक दो प्रकरणग्रन्थों की संरचना की। ये दोनों ग्रन्थ अभी तक प्रकाशित नहीं हुए हैं। (३८) आचार्य नृसिंहाश्रम-अद्वैतसम्प्रदाय के प्रमुख आचार्यों में इनकी गणना की जाती है। इनका स्थितिकाल सोलहवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध माना गया है, क्योंकि इन्होंने अपने 'तत्त्वविवेक' नामक ग्रन्थ का पूर्ण होने का समय सं० 1604 अर्थात् 1547 ई० बताया है। ये उद्भटदार्शनिक एवं प्रौढ़ पण्डित थे। इन्हीं की प्रेरणा से अप्पयदीक्षित ने परिमल, न्यायरक्षामणि तथा सिद्धान्तलेश आदि वेदान्तग्रन्थों की रचना की थी। इन्होंने 'भावप्रकाशिका' (प्रकाशात्मयतिकृत-पञ्चपादिकाविवरण की टीका), 'तत्त्वविवेक' एवं इसी पर स्वयं 'तत्त्वदीपन' टीका, भेदधिक्कार (भेदभाव का खण्डन); अद्वैतदीपिका (अद्वैतवेदान्त का युक्तिप्रधान ग्रन्थ), वैदिकसिद्धान्तसंग्रह (ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों देवों का ऐक्य प्रतिपादित) तथा तत्त्वबोधिनी (सर्वज्ञात्ममुनिकृत संक्षेपशारीरक की व्याख्या) इत्यादि ग्रन्थों की संरचना की। ये सभी उच्चकोटि के ग्रन्थ युक्तिप्रधान शैली में लिखे गए हैं। (३९) आचार्य रंगराजाध्वरी-ये सुप्रसिद्ध विद्वान् अप्पयदीक्षित के पिता थे। इनके पिता अद्वैत सम्प्रदाय के प्रसिद्ध आचार्य दीक्षित थे। अनेक यज्ञों को सम्पादित कराने के कारण इन्हें 'दीक्षित' पदनाम से विभूषित किया गया। इनका मूलनाम वक्षःस्थलाचार्य था। ये काञ्ची के निवासी थे तथा विजयनगर के राजा कृष्णदेव के सभापण्डित थे। इन्होंने दो विवाह किए। इनमें पहली पत्नी शैवमतावलम्बी ब्राह्मण की पुत्री थी तथा दूसरी श्री
भूमिका ३७ बैकुण्ठाचार्य वंश में उत्पन्न रंगमाचार्य की कन्या थी। इसका नाम तोतारम्बा देवी था। इनके चार पुत्रों में सबसे बड़े रंगराजाध्वरी थे। अप्ययदीक्षित ने अपने ग्रन्थों में पिता, पितामह तथा मातामह आदि का विस्तारपूर्वक परिचय दिया है। रंगराजाध्वरी सभी विद्याओं में निपुण थे। उनका पाण्डित्य असाधारण था। उन्होंने अपने पुत्र अप्ययदीक्षित को स्वयं विभिन्न विषयों की शिक्षा प्रदान की। इस बात को अप्ययदीक्षित ने स्वयं स्वीकार किया है- तन्मूलानिह संग्रहेण कतिचित्सिद्धान्तभेदान्धियः। शुद्धयै सङ्कलयामि तातचरणव्याख्यावचः ख्यापितान्॥ रंगराजाध्वरी ने 'अद्वैतविद्यामुकुर' तथा 'विवरणदर्पण' नामक अद्वैतमत का प्रतिपादन करने वाले दो महत्त्वपूर्ण ग्रन्थों की संरचना की। इसमें न्याय, वैशेषिक, सांख्य आदि मतों का खण्डन करके अद्वैतमत की स्थापना की गई है। (४०) आचार्य अप्ययदीक्षित-शङ्कराचार्य के परवर्ती विद्वानों में अद्वैत सम्प्रदाय की परम्परा में अप्ययदीक्षित का नाम अग्रगण्य है। ये आलंकारिक, वैयाकरण एवं धुरन्धर दार्शनिक थे। ये अकबर और जहाँगीर के शासनकाल में हुए। इनका जन्म सन् 1550 ई० में हुआ। इनके पिता रंगराजाध्वरि तथा पितामह आचार्यदीक्षित थे। इनके छोटे भाई का नाम अच्छान दीक्षित था। यद्यपि इन्हें अपने पिता एवं पितामह से अद्वैतमत की शिक्षा प्राप्त हुई थी तथापि ये परम शिवभक्त थे। इन्हें विजयनगर राज्य के सभी राजाओं से अत्यधिक सम्मान प्राप्त हुआ। ये सिद्धान्तकौमुदीकार भट्टोजिदीक्षित के गुरु थे। कुछ समय तक ये दोनों साथ-साथ काशी में रहे। अपने मृत्युकाल में इन्होंने चिदम्बरम् जाने की इच्छा व्यक्त की। इनकी मृत्यु 72 वर्ष की आयु में सन् 1622 ई० में हुई। मृत्यु के समय इनके ग्यारह पुत्र तथा छोटे भाई के पौत्र नीलकण्ठदीक्षित पास ही उपस्थित थे। इन्होंने अलंकार, व्याकरण, मीमांसा, वेदान्त आदि विभिन्न विषयों पर लगभग 104 ग्रन्थों की रचना की। वे सभी वर्तमान समय में उपलब्ध नहीं हैं। प्राप्य ग्रन्थों का यहाँ नामोल्लेख किया जा रहा है-(1) कुवलयानन्द ('चन्द्रालोक' नामक अलंकार ग्रन्थ की विस्तृत व्याख्या), (2) चित्रमीमांसा (अर्थचित्रविषयक ग्रन्थ), (3) वृत्तिवार्तिक (अभिधा, लक्षणा शब्दशक्ति विवेचन, (4) नामसंग्रहमाला (आलंकारिक कोश), (5) नक्षत्रवादावली
३८ वेदान्तसार (सत्ताईस संदिग्ध विषयों का विवेचन), (6) प्राकृतचन्द्रिका (प्राकृत शब्दानुशासन की आलोचना), (7) चित्रपुट, (8) विधिरसायन, (9) सुखोपयोजनी, (10) उपक्रमपराक्रम, (11) वादनक्षत्रमाला (सात से ग्यारह तक मीमांसाग्रन्थ), (12) परिमल (कल्पतरु की व्याख्या), (13) न्यायरक्षामणि (ब्रह्मसूत्र प्रथम अध्याय की व्याख्या), (14) सिद्धान्तलेश (अद्वैतसम्प्रदाय के आचार्यों के मत निरूपण), (15) मतसारार्थसंग्रह (श्रीकण्ठ, शङ्कर, रामानुज आदि आचार्यों के मतों का परिचय 12 से 15 तक वेदान्तग्रन्थ), (16) न्यायमञ्जरी (शाङ्कर सिद्धान्तानुसारी), (17) न्याय मुक्तावली (मध्वमतानुसारी), (18) नियमयूथमालिका (रामानुजमतानुसारी), (19) शिवार्कमणिदीपिका, (20) रत्नत्रयपरीक्षा (श्रीकण्ठमतानुसारी), (21) मणिमालिका, (22) शिखरिणीमाला, (23) शिवतत्त्वविवेक, (24) ब्रह्मतर्कस्तव, (25) शिवार्चनचन्द्रिका, (26) शिवध्यानपद्धति, (27) आदित्यस्तवरत्न, (28) मध्वतन्त्रमुखमर्दन, (29) यादवाभ्युदय का भाष्य (21 से 29 तक सभी ग्रन्थ शैवमतानुसारी) इसके अतिरिक्त शिवकर्णामृत, रामायणतात्पर्यसंग्रह, भारततात्पर्यसंग्रह, शिवाद्धैतविनिर्णय, पञ्चरत्नस्तव एवं उसकी व्याख्या, शिवानन्दलहरी, दुर्गाचन्द्रकलास्तुति एवं व्याख्या, कृष्णध्यानपद्धति व्याख्या सहित तथा आत्मार्पण आदि अनेक ग्रन्थ भी इनकी कृतियों में परिगणित हैं। इनके ग्रन्थों से इनकी सर्वतोमुखी प्रतिभा का परिचय प्राप्त होता है। मीमांसादर्शन के तो ये प्रकाण्डविद्वान् थे। शिवार्कमणिदीपिका से इनके न्याय, मीमांसा, व्याकरण तथा अलंकारशास्त्रविषयक प्रगाढ़पाण्डित्य की अभिव्यक्ति होती है। विद्वानों ने इन्हें एक जीववादी एवं बिम्ब-प्रतिबिम्बवादी कहकर इनका वैशिष्ट्य प्रतिपादित किया है। (४१) आचार्य भट्टोजिदीक्षित- ये प्रसिद्ध वैयाकरण थे। इनके द्वारा लिखे गए ग्रन्थों में आचार्य पाणिनि के सूत्रों पर व्याख्यारूप में लिखा गया ग्रन्थ 'सिद्धान्तकौमुदी' तथा इसकी व्याख्या रूप में लिखा गया ग्रन्थ 'प्रौढमनोरमा' अत्यधिक प्रसिद्ध है। इनका तीसरा ग्रन्थ 'शब्दकौस्तुभ' है। जिसमें पातञ्जलमहाभाष्य के विषय का युक्तिपूर्वक समर्थन किया गया है। चतुर्थ ग्रन्थ 'वैयाकरणभूषण' है। इन व्याकरणग्रन्थों के अतिरिक्त इन्होंने 'तत्त्वकौस्तुभ' एवं 'वेदान्ततत्त्वविवेकटीकाविवरण' नामक दो वेदान्तविषयक ग्रन्थों की भी संरचना की। इन दोनों ग्रन्थों में इन्होंने द्वैतवाद का खण्डन किया है।