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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

सदानन्द योगीन्द्र द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished314 पृष्ठ

भूमिका ५३ (५) अज्ञान की शक्तियाँ-अज्ञान की आवरण और विक्षेप नामक दो शक्तियाँ मानी गई हैं। इनमें आवरणशक्ति द्वारा वस्तु के वास्तविक एवं सत्यरूप को आच्छादित कर दिया जाता है तथा विक्षेपशक्ति उसमें अनेक प्रकार के अवास्तविकरूपों का आभास कराती है। जिसे यहाँ रज्जु में सर्प की भ्रान्ति द्वारा समझाया गया है। तदनुसार अन्धकार में पड़ी हुई रस्सी में अज्ञान की प्रथम आवरणशक्ति द्वारा उसके वास्तविक एवं सत्यरूप रज्जु को पहले आच्छादित किया जाता है। तत्पश्चात् अज्ञान की द्वितीय विक्षेपशक्ति द्वारा अपने सामर्थ्य से उसमें अवास्तविक एवं असत्यरूप सर्प का आभास कराया जाता है। ठीक इसीप्रकार अज्ञान की आवरणशक्ति ब्रह्म अथवा आत्मा के वास्तविकस्वरूप को आच्छादित कर लेती है। तत्पश्चात् इसकी विक्षेपशक्ति द्वारा इसमें आकाशादि सृष्टिप्रपञ्च की उद्भावना कर दी जाती है। इसप्रकार सूक्ष्मशरीर से लेकर स्थूलब्रह्माण्ड पर्यन्त नामरूपात्मकजगत् की रचना इसी विक्षेपशक्ति द्वारा की जाती है। यह सम्पूर्णसृष्टि वस्तुतः पानी के बुलबुले के समान नाशवान् है। इसी आधार पर यहाँ 'ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या' का उद्घोष किया गया। इसके अतिरिक्त आत्मा को कर्तृत्व, भोक्तृत्व एवं सुखदुः खमोहात्मक इत्यादि सांसारिक तुच्छभावनाओं का अनुभव भी इसी विक्षेपशक्ति के कारण होता है। जिसप्रकार प्रकाश पड़ने पर व्यक्ति की सर्पविषयक कल्पना विलीन हो जाती है। ठीक उसीप्रकार ज्ञान होने पर जगत् की सत्य परिकल्पना एवं आत्मा के कर्तृत्व आदि की भावना भी विनष्ट हो जाती है। अतः आत्मा के कर्तृत्व की भावना संसार की वास्तविक प्रतीति दोनों ही रस्सी में सर्पत्व की भावना के समान पूर्णतया मिथ्या है। इसी अभिप्राय को भगवद्गीता में इसप्रकार कहा गया है- "न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः" (5/14) इसप्रकार यह स्पष्ट है कि अज्ञान आवरण एवं विक्षेपशक्ति द्वारा अपने आश्रय आत्मा अथवा ब्रह्म का बल प्राप्त करके उसके स्वयं प्रकाशत्व को आच्छादित कर उसमें ईश्वर, जीव, जगत् की आकृति के रूप में रज्जु में सर्प के समान मिथ्याप्रपञ्च की सृष्टि करता है।¹

  1. आच्छाद्य विक्षिपति संस्फुरदात्मरूपं जीवेश्वर जगदाकृतिभिर्मृषैव। 'अज्ञानमावरणविभ्रमशक्तियोगादात्मत्वमात्रविषयाश्रयताबलेन।। (संक्षेपशारीरक 1/20)

५४ वेदान्तसार इस प्रसङ्ग में एक प्रश्न स्वाभाविकरूप से उठता है कि स्वयंप्रकाश, चित्स्वरूप, अपरिच्छिन्न ब्रह्म अथवा आत्मा को जड़, परिच्छिन्न, अव्यापक अज्ञान द्वारा किसप्रकार आवृत किया जाता है? इस सम्बन्ध में वेदान्तशास्त्रियों ने अत्यन्त सुन्दर उदाहरण प्रस्तुत किया है-'अज्ञान की आवरणशक्ति सीमित होते हुए भी असीम आत्मा अथवा ब्रह्म को उसीप्रकार आवृत कर लेती है, जिसप्रकार विशाल आकार वाले प्रकाशपुञ्ज सूर्य को मेघ का छोटा सा टुकड़ा आच्छादित कर लेता है। अज्ञानी व्यक्ति, मेघ द्वारा दृष्टि के आच्छन्न होने पर सूर्य को मेघ से ढका हुआ मानता है, वैसे ही अज्ञानी व्यक्ति मुक्त आत्मा को बन्धनयुक्त समझता है- घनच्छन्नदृष्टिर्घनच्छन्नमर्कं यथा मन्यते निष्प्रभं चातिमूढः। तथा बद्धवद् भाति यो मूढदृष्टेः स नित्योपलब्धिस्वरूपोऽहमात्मा।। (हस्तामलक-10) (६) ईश्वर- यह सामान्य सिद्धान्त है कि प्रत्येक कार्य का कोई न कोई कारण अवश्य होता है। इसलिए सम्पूर्ण चराचरजगत् को देखकर यह अनुमान सहज ही किया जा सकता है कि इसका भी कोई कारण होना चाहिए, जिससे यह उत्पन्न हुआ है। वेदान्तदर्शन इस प्रपञ्च का कारण ईश्वर को स्वीकार करता है। अब प्रश्न उठता है कि यह ईश्वर क्या है? यद्यपि अद्वैतवेदान्त में एकमात्र चैतन्यतत्त्व परमब्रह्म की सत्ता को सर्वोपरि स्वीकार किया गया है, जो नित्य, शुद्ध-बुद्ध-मुक्तस्वभाव तथा अविकारी है तथापि माया की समष्टिगत उत्कृष्ट उपाधि से युक्त एवं माया की उपाधि से विवर्जित इन दो भेदों को भी मान्यता प्रदान की गई है।¹ माया की समष्टिगत उत्कृष्ट उपाधि से युक्त होकर निर्गुण ब्रह्म ही सगुण बन जाता है। इसीको 'ईश्वर' संज्ञा दी गई है।² इसे सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, सर्वनियन्ता, अन्तर्यामी, जगत् का कारण एवं आनन्दमय माना गया है। ईश्वर के इन गुणों एवं विशेषणों का प्रतिपादन श्रुतिग्रन्थों में अनेकशः देखने को मिलता है।³

  1. द्विरूपं हि ब्रह्म अवगम्यते, नामरूपविकारभेदोपाधिविशिष्टं, तद्विपरीतं च सर्वोपाधिविवर्जितम् (ब्रह्मसूत्र शांकरभाष्य- 1/1/11)
  2. तच्छक्त्युपाधिसंयोगाद् ब्रह्मैवेश्वरतां व्रजेत्। (पञ्चदशी-3/40)।
  3. मुण्डकोपनिषद्-1/1/9, कठोपनिषद्-2/3/3, श्रीमद्भगवद्गीता 18/61,

भूमिका ५५ इसी बात को हम इसप्रकार भी कह सकते हैं कि त्रिगुणात्मिका माया अथवा अज्ञान को शुद्ध-सत्त्वगुण की प्रधानता और अप्रधानता के आधार पर उत्कृष्ट उपाधि एवं निकृष्ट उपाधि के रूप में जाना जा सकता है। इसी विशुद्धसत्त्वप्रधान उत्कृष्ट उपाधिभूतसमष्टिमूलक अज्ञान से उपहित चैतन्य (परमब्रह्म) को ईश्वर तथा निष्कृष्टोपाधिभूतव्यष्टिमूलक अज्ञान से उपहित चैतन्य को अद्वैतवेदान्त 'जीव' मानता है। यहाँ विशुद्धसत्त्वप्रधान से अभिप्राय रजोगुण एवं तमोगुण से अनभिभूत सत्त्वगुण की प्रधानता से ही ग्रहण करना चाहिए। यहाँ इसी ईश्वर को जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और लय का कारण माना गया है। ईश्वर सर्वशक्तिमान् है। अपनी शक्ति द्वारा यह कुछ भी करने में समर्थ है, इसका कोई कारण नहीं है। वह अनादि है। ईश्वर की शक्ति अलौकिक है, क्योंकि हाथ न होने पर भी वह पदार्थों को ग्रहण कर सकता है, पैर न होने पर भी उसकी सर्वत्र गति है। वह आँख न होते हुए भी देखता है, कान न होते हुए भी सुनता है। वह सभी पदार्थों को जानता है किन्तु उसके यथार्थरूप को जानना अत्यन्त दुष्कर कार्य है। सम्पूर्ण चराचररूप प्रपञ्चसमूह का साक्षीरूप में ज्ञाता होने के कारण ईश्वर को 'सर्वज्ञ' कहा गया है। सभी जीवों को उनके कर्म के अनुसार फल प्रदान करने वाला होने के कारण उसे सर्वेश्वर अथवा ईश्वर तथा सभी जीवों के हृदय के अन्दर स्थित होकर बुद्धि का नियामक होने से अन्तर्यामी तथा आनन्द की प्रचुरता होने के कारण इसे आनन्दमय कहा गया है। ईश्वर की अलौकिकशक्ति को अद्वैतवेदान्त में 'माया' कहा गया है। माया की शक्ति से युक्त ईश्वर सृष्टि की रचना में समर्थ होता है। यहाँ सृष्टि के प्रति ईश्वर को उपादान एवं निमित्तकारण दोनों माना गया है। जिसप्रकार एक मकड़ी तन्तुकार्य के प्रति अपनी प्रधानता से निमित्तकारण तथा अपनी उपाधि की प्रधानता से उपादानकारण होती है। उसीप्रकार ईश्वर भी चैतन्य की प्रधानता से सृष्टि का निमित्तकारण एवं मायारूप उपाधि से युक्त होने से उपादानकारण होता है। यह सृष्टि उत्पत्ति उसीप्रकार ईश्वर की बृहदारण्यकोपनिषद्-3/7/15)।

५६ वेदान्तसार स्वाभाविक क्रिया है, जिसप्रकार पुरुष के शरीर से केश और लोम स्वाभाविक रूप से उत्पन्न होते हैं। (७) जीव-जैसा कि पूर्व में हम कह चुके हैं कि अद्वैतवेदान्त निकृष्टोपाधिभूतव्यष्टिमूलक अज्ञान से उपहित चैतन्य को 'जीव' संज्ञा प्रदान करता है। इसप्रकार जीव अविद्या से अवच्छिन्नचैतन्य है तथा अविद्या, कर्म, शरीर, इन्द्रियाँ और अन्तःकरण इसकी उपाधियाँ हैं। यहाँ इसे शरीरेन्द्रियरूपी पिञ्जरे का अध्यक्ष तथा कर्मफल का भोक्ता माना गया है। शङ्कराचार्य ने देहेन्द्रिय, मन, बुद्धि उपाधियों से परिच्छिन्न परब्रह्म को ही शरीरधारी जीव कहा है।¹ इसप्रकार ब्रह्म, ईश्वर एवं जीव इन तीनों में तात्त्विकभेद न होकर केवल उपाधि मात्र का ही भेद है। इनमें जीव स्थूल एवं सूक्ष्मतत्त्वों का संगठन है। चैतन्य इसकी प्रमुख विशेषता है। दूसरे शब्दों में शरीर, बाह्य और अन्तःकरणों से युक्त चैतन्य का नाम ही जीव है। इसका तीन प्रकार के शरीरों से सम्बन्ध रहता है-(1) स्थूल (2) सूक्ष्म एवं (3) कारण शरीर। जीवभाव को प्राप्त करने की स्थिति में चैतन्य स्थूलशरीर धारण करता है, जिसे वह मृत्यु के समय साँप की केंचुली के समान छोड़ देता है। श्रीमद्भगवद्गीता ने इसे पुराने वस्त्र को छोड़ने के समान कहा है- वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही।। (2/22) स्थूलशरीर एवं सूक्ष्मशरीर का सम्बन्ध पञ्चकर्मेन्द्रियों, मन, बुद्धि तथा पञ्चप्राण से है, जिसका हम आगे विस्तारपूर्वक उल्लेख करेंगे। स्थूल भोगों का आयतन होने के कारण स्थूलशरीर को अन्नमयकोश की संज्ञा दी गई है। मन, बुद्धि आदि उपर्युक्त 17 तत्त्वों से युक्त सूक्ष्मशरीर में मनोमय, प्राणमय तथा विज्ञानमय कोशों की स्थिति मानी गई है। अद्वैतवेदान्त की मान्यता के अनुसार जीवात्मा इसी सूक्ष्मशरीर के द्वारा इहलोक का परित्याग करके परलोक में प्रस्थान करता है अथवा एक स्थूलशरीर को छोड़कर दूसरे स्थूलशरीर में प्रवेश करता है। अपनी सूक्ष्मावस्था के कारण यह स्थूल नेत्रों द्वारा दिखाई भी नहीं देता है।

  1. पर एवात्मा देहेन्द्रियमनोबुद्ध्युपाधिभिः परिच्छिद्यमानो बालैः शारीर इत्युपचर्यते (ब्रह्मसूत्र शांकरभाष्य-1/2/6)।

भूमिका ५७ यहाँ उपाधि-वैविध्य के आधार पर जीव की प्राज्ञ, तैजस् और विश्व तीन अवस्थाओं का उल्लेख किया है। मलिनसत्त्वप्रधान अज्ञान की व्यष्टि से उपहित चैतन्य को 'प्राज्ञ- कहा गया है। इसीप्रकार सूक्ष्मशरीर की व्यष्टि से उपहित चैतन्य को 'तैजस्' तथा स्थूलशरीर की व्यष्टि से उपहित चैतन्य को 'विश्व' संज्ञा प्रदान की गई है। जीव के इन तीन भेदों के सम्बन्ध में आचार्य गौडपाद इसप्रकार कहते हैं- बहिष्प्रज्ञो विभुर्विश्वो ह्यन्तः प्रज्ञस्तु तैजसः। घनप्रज्ञस्तथा प्राज्ञ एक एव त्रिधा स्मृतः॥ (माण्डूक्योपनिषद्, गौडपादकारिका-1) वेदान्तदर्शन मनोमय आदि पञ्चकोशों से विशिष्ट चैतन्य अर्थात् जीव को कर्ता, भोक्ता एवं सुख, दुःख का अभिमानी मानता है। इस सम्बन्ध में आचार्य शङ्कर का यह कथन उल्लेखनीय है- “कर्तृत्वभोक्तृत्वविशिष्टजीवो मनोमयादिपञ्चकोशविशिष्टः” (बृहदारण्यकोपनिषद् शाङ्करभाष्य 1/4/15) अद्वैतसिद्धान्त की मान्यता के अनुसार पञ्चकोशों से आवृत होते हुए भी यह जीवात्मा उनसे अलग है। रेशम बनाने वाले कीड़ों के समान अन्नमयादि कोशों से आवृत होकर यह दुःख पाता है एवं इन्हीं में भटकता रहता है। आत्मज्ञान अर्थात् अपने स्वरूप का सही-सही ज्ञान प्राप्त करने पर वह मुक्ति (मोक्ष) को प्राप्त कर लेता है। अन्यथा उसे इस संसार में विविध प्राणियों के शरीरों में (कर्मानुसार) बार-बार जन्म लेना पड़ता है। इस विषय में विद्यारण्यस्वामी का यह कथन विशेषरूप से उल्लेखनीय है- यथा मुञ्जादिषीकैवमात्मा युक्त्या समुद्धृतः। शरीरत्रतीयाद्धोरैः परं ब्रह्मैव जायते॥ (पञ्चदशी-1/33) अर्थात् जिसप्रकार मूँज से सींक युक्ति से प्रयत्नपूर्वक निकाल ली जाती है। ठीक उसीप्रकार युक्तिपूर्वक आत्मा को शरीरत्रय एवं पञ्चकोशों से अलग कर लेने पर जीवात्मा (जीव) परमब्रह्म हो जाता है। (८) जीव की चार अवस्थायें- आचार्य गौडपाद ने जीव की चार अवस्थाओं का कथन किया है-(1) जाग्रत, (2) स्वप्न (3) सुषुप्ति एवं (4) तुरीय। यद्यपि इनका विस्तार से आगे वर्णन किया जाएगा तथापि

५८ वेदान्तसार प्रसंगवश यहां संक्षेप में उल्लेख कर रहे हैं- इनमें प्रथम अवस्था में जीव मन एवं इन्द्रियों के माध्यम से बाह्यपदार्थों का ज्ञान प्राप्त करता है। इस स्थिति में उसका स्थूलशरीर, इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि आदि सचेष्ट रहते हैं। अन्नमयकोष से आबद्ध हुआ वह सांसारिकपदार्थों का उपभोग करता है। आचार्य गौडपाद ने जीव को इस अवस्था में बाह्यविषयों को प्रकाशित करने वाला अर्थात् बहिष्प्रज्ञ एवं स्थूलभुक् कहा है।¹ द्वितीय, स्वप्नावस्था में जीव का शरीर और इन्द्रियाँ विश्राम करती हैं, किन्तु उसका मन क्रियाशील रहता है। इस अवस्था में जीव का सूक्ष्मशरीर से सम्बन्ध होता है तथा वह मनोमय, प्राणमय एवं विज्ञानमय इन तीन कोशों से आबद्ध रहता है। वेदान्ताचार्यों ने इसे अन्तःप्रज्ञ एवं प्रविविक्तभुक् संज्ञा प्रदान की है। मन की वासना के अनुरूप कार्य करने के कारण इसे अन्तःप्रज्ञ भी कहा गया है। तृतीय, सुषुप्ति अवस्था में जीव न तो किसीप्रकार की कामना करता है और न ही कोई स्वप्न देखता है, क्योंकि उसके स्थूलदेह, इन्द्रियाँ अन्तःकरण आदि कार्य नहीं करते हैं। जाग्रत एवं स्वप्नावस्था में जीव आनन्द के साथ दुःख का भी अनुभव करता है, किन्तु इस अवस्था में केवल आनन्द की प्रचुरता रहती है। अतः उसे 'आनन्दभुक्' कहा जाता है। इस अवस्था में जीव चैतन्य से प्रदीप्त अज्ञानवृत्ति की प्रधानता से युक्त हुआ 'चेतोमुख' भी कहलाता है। प्रसुप्त अवस्था में बुद्धि उसीप्रकार स्थित रहती है, जिसप्रकार वट के बीज में वट का वृक्ष छिपा रहता है। यह आनन्दमयकोष से आबद्ध अवस्था है। चतुर्थ, तुरीय अवस्था में सभीप्रकार के प्रपञ्चों का उपशम हो जाता है। इसमें जीव न अन्तःप्रज्ञ रहता है, न बहिष्प्रज्ञ और न ही उभयप्रज्ञ। यह उसका शान्त, शिव एवं अद्वैतरूप माना गया है। सभीप्रकार के दुःखों की निवृत्ति होकर कार्यकारणभाव समाप्त हो जाता है। साथ ही वासना-बीजों का भी नाश हो जाता है। सभी कोशों से मुक्त होकर जीव इस अवस्था में ब्रह्ममय बन जाता है। अनादि माया अथवा अज्ञान उसका साथ छोड़ देता है तथा उसे पूर्णतया अवबुद्ध एवं अद्वैतभाव की प्राप्ति होती है।

  1. माण्डूक्योपनिषद्, आगमप्रकरण-3

भूमिका ५९

(९) जगत्-अद्वैतवेदान्त जगत् को मिथ्या प्रतिपादित करता है-“ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या" ब्रह्म अथवा आत्मज्ञान न होने की स्थिति तक ही यह जगत् हमें सत्य प्रतीत होता है। उसकी यह प्रतीति सीप में चाँदी अथवा रज्जु में सर्प के समान मानी गई है, क्योंकि इसकी सत्ता आत्मज्ञान न होने की स्थिति पर्यन्त ही रहती है। जिसप्रकार अज्ञान की निवृत्ति होने पर सीपी और रज्जु हमें अपने वास्तविकरूप में प्रतीत होते हैं, ठीक उसीप्रकार ब्रह्मबोध होने पर जगत् का मिथ्यात्व स्वतःसिद्ध हो जाता है। वेदान्त सत्कार्यवाद के सिद्धान्त को मानता है। उसकी दृष्टि में यह जगत् ब्रह्म (ईश्वर) का कार्य है। साथ ही प्रातिभासिक, व्यावहारिक एवं पारमार्थिक इन तीन प्रकार की सत्ताओं में से यहाँ जगत् की व्यावहारिक तथा प्रातिभासिक सत्ता को स्वीकार किया गया है, क्योंकि पदार्थ की वह सत्ता जो प्रतीतिकाल में सत्य प्रतीत हो, किन्तु कुछ समय के पश्चात् अन्य ज्ञान द्वारा बाधित हो जाए प्रातिभासिक कहलाती है। जैसे-रज्जु में सर्प की प्रतीति, क्योंकि प्रकाश की स्थिति में रज्जु में सर्पविषयकज्ञान का बाध होकर यथार्थसत्ता रज्जु का भान हो जाता है। उसीप्रकार इस दृश्यमान जगत् की प्रतीति ब्रह्मज्ञान पर्यन्त होती है। अतः यही इसकी प्रातिभासिक सत्ता हुई। इसके अतिरिक्त व्यवहार के समय दिखायी देने वाली पदार्थों की सत्ता को व्यावहारिकसत्ता कहा जाता है, क्योंकि यह सम्पूर्णजगत् तथा इसके घट, पट आदि पदार्थ व्यवहारकाल में सत्य हैं। अतः इसे व्यावहारिकसत्ता वाला भी माना जाएगा। पारममार्थिकसत्ता भौतिकपदार्थों की सत्ता से भिन्न एवं विलक्षण होती है, क्योंकि तीनों कालों में एकरूप में अवस्थित रहने वाली सत्ता पारमार्थिक कहलाती है तथा यह दृश्यमानजगत् एवं इसके घट-पट आदि पदार्थ विकारवान् हैं, नश्वर हैं, कल नहीं रहेंगे। अतः इसकी पारमार्थिकसत्ता का निषेध किया गया है। वेदान्त में एकमात्र ब्रह्म की पारमार्थिकसत्ता स्वीकार की गई है। इस आधार पर यह निष्कर्षरूप में कहा जा सकता है कि ब्रह्म पारमार्थिक दृष्टि से सत्य है तथा जगत् की सत्ता केवल व्यवहारकाल तक सीमित है। पारमार्थिकदृष्टि से जगत् मिथ्या है। दार्शनिकभाषा में दृश्यमान जगत् रस्सी में सर्प के समान केवल आभासित होता है। इसीकारण ब्रह्मज्ञान

६० वेदान्तसार सम्पन्न जीवनमुक्त को यह जगत् परमार्थतः असत् एवं मिथ्या प्रतीत होता है। इस प्रसङ्ग में यह उल्लेखनीय है कि तत्त्वज्ञान की स्थिति में जगत् अर्थात् बाह्यपदार्थों का अभाव नहीं होता है। उसकी सत्ता पूर्ववत् बनी रहती है। यदि ऐसा नहीं होता तो एक जीव के मुक्त होने पर सभी के लिए जगत् का अभाव हो जाता। इसलिए तत्त्वज्ञान की स्थिति में इसे इसप्रकार समझना चाहिए कि दृश्यमानजगत् अपने उसी रूप में विद्यमान रहता है! केवल साधक का दृष्टिकोण बदल जाता है। उसकी भावना या ज्ञान में अन्तर आ जाता है और वह ब्रह्मैक्य को प्राप्त करके जगत् को मिथ्या मानने लगता है। (१०) शरीरत्रय-वेदान्तदर्शन के अनुसार जीव के तीन शरीर होते हैं- (अ) कारणशरीर (ब) सूक्ष्मशरीर तथा (स) स्थूलशरीर। “स्थूलं सूक्ष्मं कारणाख्यमुपाधित्रितयं चित्रेः। एभिर्विशिष्टो जीवः स्याद् विमुक्तः परमेश्वरः॥ (अ) कारणशरीर-सृष्टि के प्रारम्भ में जीव कारणशरीर का आश्रय लेकर विद्यमान रहता है। जैसाकि पूर्व में प्रतिपादित किया जा चुका है कि अद्वैतवेदान्त केवल ब्रह्म की शाश्वतस्थिति को ही स्वीकार करता है तथा द्वैतवेदान्त, ब्रह्म और माया इन दोनों के हमेशा (नित्य) अस्तित्व को मान्यता प्रदान करता है। माया सत्त्व, रजस् तथा तमस् इन तीनों गुणों का नाम है। इसीको अज्ञान भी कहा जाता है। ब्रह्म जब शुद्धसत्त्वप्रधान अज्ञान से आवृत्त होता है तो इसीको ईश्वर कहा जाता है। यही अव्यक्त, अन्तर्यामी संसार का कारणरूप होने से कारणशरीर कहलाता है। इसमें आनन्द का प्राचुर्य रहता है। अतः इसीको 'आनन्दमयकोष' भी कहते हैं। प्रलय की अवस्था में भी इसकी स्थिति बनी रहती है। सूक्ष्म एवं स्थूलशरीरों का यह लयस्थान भी होता है। साथ ही स्थूल एवं सूक्ष्म जगत्प्रपञ्च का लयस्थान होने के कारण इसीको 'सुषुप्ति' भी कहा गया है।

भूमिका ६१ चित्र-१ [ब्रह्म] शुद्ध सत्त्व प्रधान अज्ञान से आवृत्त | मलिन सत्त्व प्रधान अज्ञान │ ┌─ आनन्दमय कोष <──────────────┐ (ब्रह्म) ↓ │ ├─ कारण शरीर <──────────────┤ जीव ईश्वर ─┼─ सुषुप्ति अवस्था <─────────────┤ (1) └─ लय स्थान <───────────────┘ (2) (ब) सूक्ष्मशरीर—इसका केवल अनुमानप्रमाण द्वारा ही ज्ञान होता है। हम इसे किसी भी प्रकार देख अथवा छू नहीं सकते हैं। इसीकारण इसे सूक्ष्मशरीर कहा जाता है। इसका दूसरा नाम 'लिङ्गशरीर' भी है। स्वामी रामतीर्थ ने इसकी व्युत्पत्ति इसप्रकार की है— “लिङ्ग्यते ज्ञाप्यते प्रत्यगात्मसद्भाव एभिरिति लिङ्गानि, लिङ्गानि च शरीराणि चेति लिङ्गशरीराणि" (वेदान्तसार-विद्वन्मनोरञ्जनी-पृ. 100) इसी के माध्यम से जीव सुख-दुःख का अनुभव करता है। वेदान्तदर्शन के अनुसार इसमें सत्रह अवयव होते हैं—पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ, पञ्चकर्मेन्द्रियाँ, पञ्चवायु तथा बुद्धि एवं मन। पञ्चदशीकार के अनुसार— बुद्धिकर्मेन्द्रियप्राणपञ्चकैर्मनसा धिया। शरीरं सप्तदशाभिः सूक्ष्मं तल्लिङ्गमुच्यते।। (1/23) जीव के पापपुण्यों (धर्म-अधर्म) का लेखा-जोखा इसीकारणशरीर में विद्यमान रहता है। यही जीवात्मा का एक प्रकार से घर अथवा निवास स्थान है। कठोपनिषद्कार ने इसे 'रथ' की संज्ञा भी दी है। इसका रथी आत्मा है, क्योंकि एक स्थूलशरीर से दूसरे स्थूलशरीर में प्रवेश करने के लिए यह सूक्ष्मशरीर आश्रय अथवा माध्यम का कार्य करता है। इसी प्रसङ्ग में यह तथ्य उल्लेखनीय है कि सांख्यदर्शन भी सूक्ष्मशरीर के अस्तित्व को स्वीकार करता है। उसने इसके अट्ठारह तत्त्वों को मान्यता प्रदान की है—महत् (बुद्धि), अहङ्कार, मन, पञ्चज्ञानेन्द्रिय, पञ्चकर्मेन्द्रिय, पञ्चप्राण। अतः स्पष्ट है कि सांख्यदर्शन 'अहङ्कार' को सूक्ष्मशरीर में अधिक तत्त्व के रूप में स्वीकार करता है। जबकि वेदान्तसार के टीकाकार

६२ वेदान्तसार स्वामी रामतीर्थ अहङ्कार का अन्तर्भाव मन में करते हैं। उनके अनुसार अहङ्कार भी सङ्कल्पात्मक ही होता है। वेदान्तदर्शन के अनुसार सूक्ष्मशरीर को हम इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं- चित्र-२ सूक्ष्म शरीर (17 अवयव) 5 5 5 1 1 पञ्च ज्ञानेन्द्रिय पञ्च कर्मेन्द्रिय पञ्च वायु बुद्धि मन श्रोत्र त्वक् चक्षु रसना घ्राण प्राण अपान व्यान समान उदान (जिह्वा) वाक् पाणि पाद पायु उपस्थ (वाणी) (हाथ) (पैर) (गुदा) (मूत्रेन्द्रिय) इसी प्रसङ्ग में इनका पृथक्-पृथक् परिचय देना उपयुक्त होगा। (क) पञ्चज्ञानेन्द्रिय-श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना और घ्राण इन्हें ज्ञानेन्द्रियों की श्रेणी में रखा गया है। इनकी उत्पत्ति आकाशादि अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों के सात्त्विक अंशों से पृथक्-पृथक् रूप में मानी गयी है। ज्ञानेन्द्रियाणि श्रोत्रत्वक्चक्षुर्जिह्वाघ्राणाख्यानि। एतान्याकाशादिनां सात्त्विकां- शेभ्यो व्यस्तेभ्यः पृथक्-पृथक् क्रमेणोत्पद्यन्ते (वेदान्तसार)। अर्थात् आकाश के सात्त्विक अंश से श्रोत्र नामक ज्ञानेन्द्रिय की उत्पत्ति हुई है। इसका कार्य श्रवण करना है, क्योंकि शब्द आकाश का गुण है। अतः यह शब्द की ग्राहक है। इसीप्रकार अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत वायु के सात्त्विक अंश से त्वक् नामक ज्ञानेन्द्रिय की उत्पत्ति हुई, क्योंकि स्पर्श वायु का गुण है। अतः त्वगेन्द्रिय शीतल या उष्ण स्पर्श का ज्ञान कराती है। इसके अतिरिक्त अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत अग्नि के सात्त्विक अंश से चक्षु नामक ज्ञानेन्द्रिय की उत्पत्ति हुई और अग्नि का गुण है, रूप। इसलिए चक्षु नामक इन्द्रिय दर्शन कराती है। इसीप्रकार अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत 'जल' के

भूमिका ६३ सात्त्विक अंश से रसना (जिह्वा) नामक ज्ञानेन्द्रिय की उत्पत्ति हुई है, क्योंकि जल का गुण रस है। अतः रसना ज्ञानेन्द्रिय द्वारा हमें रस अर्थात् स्वाद की प्रतीति होती है। साथ ही अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत पृथिवी के सात्त्विक अंश से घ्राण नामक ज्ञानेन्द्रिय की उत्पत्ति हुई है, क्योंकि पृथिवी का गुण है, गन्ध। इसीलिए घ्राणेन्द्रिय द्वारा हम गन्ध को ग्रहण करते हैं। ज्ञान को ग्रहण करने के कारण इन्हें ज्ञानेन्द्रिय कहते हैं। चित्र-३ अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत ┌─────────────┐ │ सात्त्विक अंशों │ ↗ आकाश वायु अग्नि जल पृथिवी │ से पञ्च │    │     │     │     │     │ │ ज्ञानेन्द्रियों की │ ↗ श्रोत्र त्वक् चक्षुष् रसना घ्राण │ उत्पत्ति │    │     │     │     │     │ └─────────────┘ ↘ शब्द स्पर्श रूप रस गन्ध (ग्रहण करना) (ख) पञ्चकर्मेन्द्रिय- कर्म को सम्पादित करने के कारण इन्हें कर्मेन्द्रिय कहा जाता है। इनकी संख्या भी पांच है-वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ। इनकी उत्पत्ति अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों के रजोगुण के अंश से अलग-अलग मानी गई है। अर्थात् रजोगुणप्रधान आकाश नामक अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत से वाक् (वाणी) नामक कर्मेन्द्रिय की, रजोगुण प्रधान 'वायु' नामक सूक्ष्मभूत से पाणि (हाथ) नामक कर्मेन्द्रिय की, रजोगुणप्रधान 'अग्नि' नामक अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत से पाद अर्थात् पैर नामक कर्मेन्द्रिय की, इसीप्रकार रजोगुणप्रधान 'जल' नामक अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत से पायु अर्थात् गुदा नामक कर्मेन्द्रिय की तथा रजोगुणप्रधान पृथिवी नामक अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत से 'उपस्थ' अर्थात् जननेन्द्रिय की उत्पत्ति होती है। रजोगुण के स्वभाव से चञ्चल एवं क्रियाशील होने के कारण सभी कर्मेन्द्रियों में गति एवं क्रियाशीलता देखने को मिलती है। इसी अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं-

६४ वेदान्तसार चित्र-४ अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूत आकाश वायु अग्नि जल पृथिवी [ रजोगुण प्रधान अंशों से क्रमशः ] वाक् पाणि पाद पायु उपस्थ (वाणी) (हाथ) (पैर) (गुदा) (जननेन्द्रिय) बोलना कार्य करना चलना मल उत्सर्जन आनन्द एवं सन्तति उत्पत्ति (ग) पञ्चवायु- प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान ये पाँच वायु हैं। इनकी उत्पत्ति अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों के रजोगुण अंश से स्वीकार की गई है। इनका शरीर के विभिन्न अङ्गों में वास माना गया है। जैसे-नासिका के अग्रभाग पर विराजमान वायु 'प्राण' है। यह ऊर्ध्व गमनशीला है। (प्राणो नाम प्राग्गमनवान् नासाग्रस्थानवर्ती-वेदान्तसार) किन्तु ब्राह्मणग्रन्थों में इसकी स्थिति हृदय में स्वीकार की गयी है। (प्राणी हृदये-तैत्तिरीयब्राह्मण 3/10/8/5)। पुनरपि हृदय में स्थित होते हुए भी प्रत्यक्षरूप से नासिका के अग्रभाग पर अवस्थित होने के कारण इसका नासिका के अग्रभाग पर स्थित होना ही विद्वानों को स्वीकार्य रहा है (वेदान्तसार विद्वन्मनोरञ्जनीकार) अपान नामक वायु को गुदा एवं उपस्थ (जननेन्द्रिय) में स्थित माना गया है। नाभि के नीचे की ओर जाना इसका स्वभाव है। सम्भवतः इसीकारण इसे अधोगमनशीला कहा गया है। इसीप्रकार 'व्यान' नामक वायु का स्वभाव सभी ओर गमन करना है। अतः इसकी स्थिति सम्पूर्णशरीर में स्वीकार की गई है। प्रतिदिन खाए हुए अन्न पानादि को पचाने वाली, उदर में निवास करने वाली वायु ही 'समान' है। इसका प्रमुख कार्य उदरस्थ अन्न से साररूप रस निकालकर उसका रुधिर आदि के रूप में परिपाक करना तथा अवशिष्ट अन्न को मल-मूत्र के रूप में बाहर निकलना है। उदान वायु का निवास कण्ठ में होता है। ऊर्ध्वगमन इसका स्वभाव है। अतः मृत्यु के समय शरीर

भूमिका ६५ से इसका उत्क्रमण माना गया है। पञ्चवायुओं की स्थिति एवं कार्य को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं- चित्र-५ अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों के रजोंऽशों से पञ्चवायु प्राण अपान व्यान समान उदान | | | | | नासिकाग्रवर्ती गुदा-उपस्थवर्ती सम्पूर्णशरीरस्थ उदरस्थ कण्ठस्थ | | | | | श्वास मलमूत्रनिस्सारण रक्तसंचरण पाचन मृत्यु के समय निस्सरण | | | | | ऊर्ध्वगमनशीला अधोगमनशीला सर्वत्रगमनशीला अधोगमनशीला ऊर्ध्वगमनशीला उपर्युक्त पञ्चवायुओं के अतिरिक्त कुछ विद्वानों ने नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त तथा धनञ्जय पाँच अन्य वायुओं के अस्तित्व को भी स्वीकार किया है। उनके अनुसार नागवायु उद्गार एवं वमन लाने वाली, कूर्मवायु आँखों का उन्मीलन, निमीलन कराने वाली, कृकल नामक वायु भूख लगाने वाली, देवदत्त नामक वायु जमुहाई लाने वाली होती है। इसीप्रकार धनञ्जय नामक वायु द्वारा शरीर का पोषण किया जाता है। किन्तु वेदान्तशास्त्र इन सभी का अन्तर्भाव पूर्ववर्णित चारों वायुओं में कर लेता है। (एतेषां प्राणादिष्वन्तर्भावात् प्राणादयः पञ्चैवेति केचित् (वेदान्तसार)। विद्वन्मनो- रञ्जनीकार स्वामीरामतीर्थ ने विस्तारपूर्वक नाग आदि पञ्चवायुओं का अन्तर्भाव पूर्ववर्णित प्राण, अपान इत्यादि वायुओं में ही किया है। (घ) बुद्धि और मन-ये दोनों शरीर के अन्तःभाग में स्थित इन्द्रियाँ हैं। अतः इन्हें अन्तरिन्द्रिय भी कहा जाता है। वस्तुतः ये दोनों ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से विषयों का ग्रहण करती है। इसलिए इन्हें अन्तःकरण भी कहते हैं। अन्तःकरण की निश्चयात्मकवृत्ति को 'बुद्धि' कहा गया है। इसका कार्य अध्यवसाय अर्थात् निश्चय करना है। इसके अतिरिक्त मन अन्तःकरण की ही दूसरी वृत्ति है। इसका कार्य संकल्प-विकल्प करना है। इनकी उत्पत्ति आकाशादिक सात्त्विक अंश के मिश्रितरूप से मानी गयी है। कुछ विद्वानों ने अन्तःकरण की चित्त और अहंकार नामक दो अन्य वृत्तियों का भी उल्लेख

६६ वेदान्तसार किया है, इनमें अनुसन्धानात्मिका अन्तःकरणवृत्ति को चित्त तथा अभिमानात्मिकावृत्ति को अहंकार कहते हैं- मनो बुद्धिरहङ्कारश्चित्तं करणमान्तरम्। संशयी निश्चयो गर्वः स्मरणं विषया इमे॥ (शारीरकोपनिषद्-12) किन्तु आचार्य सदानन्द ने वेदान्तसार में चित्त का बुद्धि में तथा अहङ्कार का मन में ही अन्तर्भाव माना है- (अनयोरेव चित्ताहंकारयोरन्तर्भावः) उनके अनुसार गर्वरूप अहङ्कार जिसमें संशयात्मकरूप में स्थित, अपने उत्कर्ष की सम्भावना का मन में अन्तर्भाव करना चाहिए। इसीप्रकार विषय का परिच्छित्ति (स्मरण) रूप में ज्ञान कराने वाले चित्त का अन्तर्भाव बुद्धि में करना संगत प्रतीत होता है, क्योंकि स्मरण की उत्पत्ति निश्चयात्मक अनुभव से ही होती है। इसप्रकार कारणशरीर के निर्माण में विज्ञानमय, मनोमय तथा प्राणमय इन कोषत्रय की महती भूमिका रहती है, क्योंकि विज्ञानमयकोष में पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ+बुद्धि होता है। मनोमयकोष का निर्माण पञ्चज्ञानेन्द्रियाँ+मन द्वारा होता है। इसीप्रकार पञ्चप्राण सहित कर्मेन्द्रियों का समूह प्राणमयकोष कहलाता है। अतः कोष की दृष्टि से कारणशरीर के स्वरूप का उल्लेख इसप्रकार भी किया जा सकता है- चित्र-६ कारण । शरीर ┌─────────────┼─────────────┐ विज्ञानमयकोश मनोमय कोश प्राणमय कोश (बुद्धि+पञ्चज्ञाने०) (मन+पञ्चज्ञाने०) (पञ्चकर्मे०+पञ्चप्राण) ↓ ↓ ↓ (व्यावहारिक कार्यों का कर्ता) (इच्छाशक्ति सम्पन्न) (क्रियाशीलता का प्राधा.) कर्तृरूप करणरूप कार्यरूप (स) स्थूलशरीर-आकाश आदि सूक्ष्मभूतों के पञ्चीकरण के बाद आकाश आदि स्थूलभूतों की उत्पत्ति होती है, जिसका विस्तृतवर्णन आगे सृष्टिप्रक्रिया के अन्तर्गत किया जाएगा। इन स्थूलभूतों द्वारा ब्रह्माण्ड का निर्माण होता है एवं उसमें चार प्रकार के स्थूल शरीरधारी प्राणी उत्पन्न होते हैं। यहाँ हम इन्हीं चारों स्थूल शरीरों का उल्लेख करेंगे-

भूमिका ६७ जैसा कि कथन किया गया कि स्थूलशरीर का निर्माण आकाश आदि पञ्चीकृत स्थूलभूतों से होता है। यह शरीर ही वस्तुतः जन्म-मरण की स्थिति को प्राप्त होता है। इसी शरीर द्वारा जीवात्मा कर्म करता है तथा उससे प्राप्त होने वाले फल को भोगता है। यह स्थूलशरीर माता-पिता द्वारा खाए हुए तथा जन्म के बाद स्वयं द्वारा खाए अन्न का विकार होने के कारण अन्नमयकोश कहलाता है तथा जीव की यह जाग्रत अवस्था होती है। स्थूलशरीर चार प्रकार के होते हैं-(1) जरायुज (2) अण्डज (3) स्वेदज (4) एवं उद्भिज्ज। जरायु (उदर में रहने वाली पतली झिल्ली-जेर) से उत्पन्न होने वाले मनुष्य, पशु आदि जरायुज हैं। अण्डों से उत्पन्न होने वाले पक्षी, सर्प आदि अण्डज हैं। पसीने से उत्पन्न होने वाले जूँ, मच्छर आदि स्वेदज हैं तथा भूमि को उद्भेद (फाड़) कर उत्पन्न होने वाले लता, वृक्ष आदि उद्भिज्ज नामक स्थूलशरीर हैं। स्थूलभोग का आश्रय होने के कारण इन्हें स्थूलशरीर तथा विषयों का भोग करने के कारण जाग्रत् कहा जाता है। इन चारों स्थूलशरीरों में मनुष्य की योनि को उत्कृष्ट माना गया है, क्योंकि इसमें उसे चिन्तन, बोध, संकल्प शक्ति की सामर्थ्य प्राप्त होती है। इस शरीर द्वारा प्रयत्न करके वह उत्कृष्टस्थिति (देवत्वादि) को भी प्राप्त कर सकता है। यहाँ तक कि जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर सकता है तथा निकृष्टकर्मों का सम्पादन करके निम्न से निम्न योनियों में भी जा सकता है। इनमें शेष उद्भिज्जादि दुष्कर्मों के परिणामस्वरूप प्राप्त होने वाली भोग योनियाँ हैं। चित्र-७ स्थूल शरीर जरायुज अण्डज स्वेदज उद्भिज्ज (मनुष्य, पशु आदि) (पक्षी सर्पादि) (जूँ मच्छरादि) (वृक्ष लतादि) (११) पञ्चकोष-उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि आत्मा के आच्छादक तत्त्वों में प्रमुखरूप से अज्ञान की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है, उसी से ईश्वर, जीव, जगत् आदि की सृष्टि होती है। तीनों प्रकार के शरीरों के निर्माण एवं विकास में कोशों की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका रहती है। इनकी संख्या कुल मिलाकर पाँच मानी गई है। (1) आनन्दमयकोष (2) विज्ञानमयकोष (3) मनोमयकोष (4) प्राणमयकोष तथा (5) अन्नमयकोष।

६८ वेदान्तसार (क) आनन्दमयकोष-आत्मा के आच्छादक होने के कारण अथवा समूह में स्थित होने के कारण ही इन्हें कोष की संज्ञा प्रदान की गई है। इन पञ्चकोषों में प्रथम आनन्दमयकोष की स्थिति सृष्टि के विकास की प्रथम कारणावस्था में विद्यमान होती है। निर्गुणब्रह्म जब शुद्धसत्त्वप्रधान अज्ञान से आच्छादित होता है तो वही कारणशरीर, ईश्वर तथा आनन्द की प्रचुरता के कारण आनन्दमय कोष कहलाता है। प्रलय की अवस्था में भी यह विद्यमान रहता है। यही सूक्ष्मशरीर का लयस्थान भी है। इसीलिए इस अवस्था को सुषुप्ति कहा गया है। ये ही सब स्थितियाँ ब्रह्म के मलिन सत्त्वप्रधान अज्ञान से आच्छादित होने पर 'जीव' पक्ष में भी होती हैं। (द्रष्टव्य चित्र संख्या-1) (ख) विज्ञानमयकोष-जीव की स्वप्नावस्था में स्थित 'सूक्ष्मशरीर' में तीन कोषों की स्थिति को स्वीकार किया गया है, विज्ञानमय, मनोमय तथा प्राणमय। इन तीन कोषों के मिलने पर ही सूक्ष्मशरीर का निर्माण होता है। इनमें विज्ञानमयकोष के अन्तर्गत आकाशादि अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों के सात्त्विक अंशों से उत्पन्न श्रोत्र, त्वक्, चक्षुः, रसना और घ्राण इन पाँच ज्ञानेन्द्रियों के साथ बुद्धितत्त्व विद्यमान रहता है। अन्तःकरण की निश्चयात्मक वृत्ति 'बुद्धि' द्वारा ये पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ नियन्त्रित होती हैं। अतः इस कोष का कार्य 'निश्चय' करना है। (ग) मनोमयकोष-सूक्ष्मशरीर में स्थित तीन कोषों में से इसका द्वितीय स्थान है। इसके अन्तर्गत आकाशादि अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों के रजोगुणप्रधान अंशों से उत्पन्न वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ इन पञ्चकर्मेन्द्रियों के साथ मन की स्थिति विद्यमान रहती है। मन के संकल्प-विकल्पात्मक होने के कारण मनोमयकोष का कार्य संकल्पविकल्प माना गया है। दूसरे शब्दों में यह कोष इच्छाशक्ति से युक्त होता है। (घ) प्राणमयकोष-यह सूक्ष्मशरीर में ही स्थित तृतीयकोष है। शरीर के विभिन्नस्थानों पर रहने वाले प्राण, अपान, व्यान, समान और उदान नाम पञ्चवायु एवं वाक्, पाणि, पाद, पायु और उपस्थ इन पञ्चकर्मेन्द्रियों के साथ मिलकर इस कोष का निर्माण होता है। क्रियाशीलता प्राण का धर्म है अतः इनके प्रभाव से ही कर्मेन्द्रियाँ अपने-अपने कार्यों को सम्पादित करती हैं। इस दृष्टि से इस कोष में क्रियाशीलता का प्राधान्य कहा जा सकता है। वैसे भी पञ्चप्राणों की उत्पत्ति अपञ्चीकृत सूक्ष्मभूतों के रजोंऽशों से मानी

भूमिका ६९ गई है। चञ्चलता, गति रजोगुण की विशेषता है। इसीलिए प्राणों में गतिशीलता देखी जाती है तथा प्राणों के सान्निध्य से कर्मेन्द्रियाँ गतिशील होती हैं। इसीकारण प्राणमयकोष को गतिशील अथवा क्रियाशीलकोष माना गया है। विज्ञानमय तथा मनोमयकोष की क्रियाशीलता केवल अनुभव का विषय होती है, अतः अप्रत्यक्ष होती है। जबकि इसकी क्रियाशीलता को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। विज्ञानमय, मनोमय, प्राणमय ये तीनों कोष जीव की स्वप्नावस्था में विद्यमान होते हैं। (ङ) अन्नमयकोष-पञ्चम एवं अन्तिम अन्नमयकोष होता है। यह जीव की जाग्रत अवस्था में विद्यमान रहता है। अतः इसीको जाग्रत भी कहते हैं। अन्न के विकार का बाहुल्य होने से इसे अन्नमय कहा गया है तथा आत्मा का आच्छादक होने से इसे कोष संज्ञा प्रदान की गई है। जीव इसी कोष के माध्यम से विषयों का उपभोग करता है। भोगों के उपभोग में सभीप्रकार की इन्द्रियाँ भी सहायक होती हैं। इस कोष का निर्माण पञ्चीकृत महाभूतों से होता है। उपर्युक्त पञ्चकोषों को एक साथ इसप्रकार भी समझा जा सकता है- चित्र-८

मलिन सत्त्व प्रधान अज्ञान शुद्ध सत्त्व प्रधान अज्ञान त्वक् चक्षु रसना पाणि पाद पायु (ब्रह्म) (ब्रह्म) (बुद्धि) (मन) (अ) ईश्वर (ब) ईश्वर श्रोत्र घ्राण वाक् उपस्थ (१) आनन्दमय कोष (२) विज्ञानमय कोष (३) मनोमय कोष बुद्धि + पञ्चज्ञानेन्द्रिय मन + पञ्चकर्मेन्द्रिय प्राण पाणि अग्नि अपान + वाक् पाद वायु | जल (उदान / पञ्चप्राण) प्राणमयकोष (पञ्चीकृत महाभूतों द्वारा) व्यान (४) पायु आकाश | पृथिवी समान उपस्थ [(५) अन्नमय कोष]

(१२) पञ्चीकरणप्रक्रिया-स्थूलसृष्टि के निर्माण की प्रक्रिया में अद्वैतवेदान्त पञ्चीकरण के सिद्धान्त को महत्ता प्रदान करता है। इस सिद्धान्त के अनुसार आकाश आदि पञ्चभूतों की तन्मात्राओं के संयोग से

७० वेदान्तसार स्थूलमहाभूतों की उत्पत्ति होती है। यहाँ प्रत्येक भूत में अन्य चार भूतों के मिश्रण को पञ्चीकरण कहा गया है। अर्थात् जो पाँच नहीं है, उन्हें पाँच बना देने का नाम ही पञ्चीकरण है। पञ्चीकरण के सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हुए आचार्य सदानन्द ने पञ्चदशी की निम्नकारिका को उद्धृत किया है— द्विधा विधाय चैकैकं चतुर्धा प्रथमं पुनः। स्व स्वेतरद्वितीयांशैर्योजनात् पञ्च पञ्च ते॥1/27॥ अर्थात् सबसे पहले आकाश आदि पाँच सूक्ष्मभूतों में प्रत्येक को दो-दो समान भागों में विभाजित कर लेते हैं। इसप्रकार विभक्त पञ्चतन्मात्राओं के दस भागों में से पहले पाँच को, छोड़कर दूसरे पाँच भागों को फिर से बराबर चार-चार भागों में विभाजित करते हैं। तत्पश्चात् उन चार बराबर भागों में से एक-एक भाग को अपने-अपने दूसरे आधे भाग को छोड़कर दूसरे चार भूतों के दूसरे अर्धभाग में मिलाने पर एक-एक पञ्चीकृत महाभूत का निर्माण होता है। वेदान्तदर्शन की भाषा में इसी प्रक्रिया को पञ्चीकरण की प्रक्रिया कहते हैं। इस सम्पूर्णप्रक्रिया को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं— चित्र-९ अपञ्चीकृत पञ्चीभूत [चित्र: पाँच चक्र - आकाश (1/2, 1/8, 1/8, 1/8, 1/8), वायु (1/2, 1/8, 1/8, 1/8, 1/8), अग्नि (1/2, 1/8, 1/8, 1/8, 1/8), जल (1/2, 1/8, 1/8, 1/8, 1/8), पृथिवी (1/2, 1/8, 1/8, 1/8, 1/8)] | आकाश सूक्ष्मतन्मात्रा | | वायु सूक्ष्मतन्मात्रा | | अग्नि सूक्ष्मतन्मात्रा | | जल सूक्ष्मतन्मात्रा | | पृथिवी सूक्ष्मतन्मात्रा | चित्र-१० पञ्चीकृत पञ्चमहाभूत [चित्र: पाँच चक्र - आ. 1/2 + चार 1/8 भाग, वायु 1/2 + चार 1/8 भाग, अग्नि 1/2 + चार 1/8 भाग, जल 1/2 + चार 1/8 भाग, पृथिवी 1/2 + चार 1/8 भाग] | आकाश | | वायु | | अग्नि | | जल | | पृथिवी | (1) स्थूल आकाश= 1/2 आकाश + 1/8 अग्नि + 1/8 वायु+1/8जल+1/8 पृथ्वी (2) स्थूल वायु= 1/2 वायु + 1/8 आकाश / 1/8 अग्नि+1/8 जल+ 1/8पृथ्वी। (3) स्थूल अग्नि=1/2 अग्नि+1/8 आकाश+ 1/8 वायु + 1/8 जल + 1/8 पृथ्वी

भूमिका ७१ (4) स्थूल जल=1/2 जल +1/8 आकाश+ 1/8 वायु + 1/8 अग्नि + 1/8 पृथ्‍वी (5) स्थूल पृथिवी= 1/2 पृथिवी +1/8 आकाश+1/8 वायु+1/8 अग्नि+1/8 जल इसप्रकार पञ्चीकरण की प्रक्रिया से प्रत्येक सूक्ष्मभूत महाभूत होकर पिण्ड के रूप में एक इकाई बन जाता है। अतः इस प्रक्रिया के पश्चात् आकाश मात्र आकाश नहीं रहता, अपितु उसमें आकाशीयतत्त्व आधा रहता है तथा शेष चार भूतों में से प्रत्येक का भी 1/8 भाग होने से इस स्थूलभूत में उनके गुण भी विद्यमान रहते हैं। ठीक यही स्थिति शेष चार महाभूतों की भी होती है। इस प्रसंग में यह उल्लेखनीय है कि जिस भूत में जिस अंश की प्रधानता रहती है, उसी के आधार पर उसका नामकरण होता है। वेदान्तदर्शन के अनुसार इन्हीं पञ्चीकृतमहाभूतों से चौदहभुवन तथा उनमें निवास करने वाले सम्पूर्ण प्राणिवर्ग अर्थात् चारप्रकार के स्थूलशरीरों का निर्माण होता है। चित्र-११ आकाशादि पञ्चीकृत स्थूलमहाभूतों द्वारा निर्माण चौदह भुवन | चतुर्विध स्थूलशरीर | 14' 1 2 3 4 सप्त उर्ध्व लोक सप्त अधःलोक | ↓ | | | 1 2 3 4 5 6 7 जरायुज | | | | | | | (मनुष्य पशु) भूः भुवः स्वः महः जनः तपः सत्यम् अण्डज 1 2 3 4 5 6 7 ↓ (पक्षी सर्प) | | | | | | | स्वेदज अतल वितल सुतल रसातल तलातल महातल पाताल (जूं, मच्छर) उद्भिज्ज (वृक्ष-लता) पञ्चीकरण की प्रक्रिया के पश्चात् ही आकाश में शब्दगुण की, वायु में शब्द एवं स्पर्श की, अग्नि में शब्द, स्पर्श, रूप और रस की, तथा पृथिवी में शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध नामक गुणों की अभिव्यक्ति होती है। (१३) त्रिवृत्करण-वेदान्तसार के लेखक आचार्य सदानन्द ने पञ्चीकरण प्रक्रिया के प्रसंग में ही त्रिवृत्करण का उल्लेख करते हुए इसे पञ्चीकरण का ही उपलक्षण माना है—“अस्याप्रामाण्यं नाशङ्कनीयं त्रिवृत्करणश्रुतेः पञ्चीकरणस्याप्युपलक्षणत्वात्” त्रिवृत्करण वस्तुतः उपनिषदों

७२ वेदान्तसार में प्रतिपादित सिद्धान्त है। छान्दोग्योपनिषद् की टीका करते हुए आचार्य आनन्दगिरि लिखते हैं- प्रथममेकैकां देवतां द्विधा विभज्य, पुनरेकैकं भागं द्विधा द्विधा कृत्वा तदितरभागयोर्निक्षिप्य त्रिवृत्करणं विवक्षितम् (6/3/2-3) इसके अनुसार अग्नि, जल, पृथिवी इन तीन भूतों में से सर्वप्रथम एक-एक को दो-दो भागों में विभाजित करके पुनः प्रत्येक एक-एक भाग के दो-दो विभाग करके उन्हें परस्पर इसप्रकार संयुक्त किया जाए- चित्र-१२

(चित्र विवरण: ऊपर: [वृत्त १: 1/2, 1/4, 1/4] अग्नि | [वृत्त २: 1/2, 1/4, 1/4] जल | [वृत्त ३: 1/2, 1/4, 1/4] पृथिवी नीचे: [वृत्त १: 1/2 अग्नि, 1/4 जल, 1/4 पृथिवी] | [वृत्त २: 1/2 जल, 1/4 अ., 1/4 पृथिवी] | [वृत्त ३: 1/2 पृथिवी, 1/4 अ., 1/4 जल])

त्रिवृत्करण इसप्रकार करने पर अग्नि, जल और पृथिवी में प्रत्येक का आधा अपना-अपना भाग होता है तथा शेष दो भूतों का चौथाई-चौथाई भाग होता है। अतः प्रत्येक भूत में अपना प्राधान्य तथा अन्य दो भूतों का गौणभाव होता है। इनके नामकरण का आधार भी यह गुणप्राधान्य ही है। यद्यपि पञ्चीकरणप्रक्रिया का उल्लेख श्रुति में भी हुआ है, तथापि प्रयोग की सरलता की दृष्टि से उपनिषद्ग्रन्थों में त्रिवृत्करण का कथन किया गया है, क्योंकि पञ्चीकरण की प्रक्रिया कुछ जटिल होने के कारण सामान्य- व्यक्ति के लिए सरलतापूर्वक बोधगम्य नहीं है। वस्तुतः त्रिवृत्करण की प्रक्रिया भी पञ्चीकरण की ओर ही संकेत करती है। अतः इसकी प्रामाणिकता में संदेह नहीं करना चाहिए। (१४) प्रमाण- प्रमा अर्थात् यथार्थज्ञान के कारण को दार्शनिक भाषा में प्रमाण कहते हैं। यहाँ किसी भी कथन की सत्यता का आधार प्रमाण को माना गया है। अन्य दर्शनों के समान वेदान्तदर्शन भी प्रमाणों को मान्यता प्रदान करता है। उसकी दृष्टि में एकमात्र ब्रह्म पूर्णतया सत्य, नित्य एवं