यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
चौबीसवां अध्याय
चौबीसवां अध्याय अश्वस्तूपरो गोमृगस्ते प्राजापत्याः कृष्णग्रीव ऽ आग्नेयो रराटे पुरस्तात्सारस्वती मेष्यधस्ताद्धन्वोरावश्विनावधोरामौ बाह्वोः सौमापौष्णः श्यामो नाभ्या ᳪ सौर्यायामौ श्वेतश्च कृष्णश्च पार्श्वयोस्त्वाष्ट्रौ लोमशसक्थौ सक्थ्योर्वायव्यः श्वेतः पुच्छ ऽ इन्द्राय स्वपस्याय वेहद्वैष्णवो वामनः.. (१) घोड़ा, नीलगाय तथा वृषभ प्रजापति देव से संबंधित हैं. काली गरदन वाला अज अग्नि से संबंधित है. सम्मुख स्थित मेष सरस्वती देवी से संबंधित है. नीचे स्थित धन अश्विनी देव से संबंधित है. काली नाभि वाला अश्व सोम और पूषा देव से संबंधित है. काले और सफेद पार्श्व भाग वाले सूर्य और यम देव से संबंधित हैं. अधिक लोम वाले त्वष्टा देव से संबंधित हैं. सफेद पूंछ वाले वायु देव से संबंधित हैं. गर्भ से द्वेष करने वाले इंद्र देव से संबंधित हैं. वामन (ठिगना) पशु विष्णु देव से संबंधित हैं. (१) रोहितो धूम्ररोहितः कर्कन्धुरोहितस्ते सौम्या बभ्रुररुणबभ्रुः शुकबभ्रुस्ते वारुणाः शितिरन्ध्रोन्यतः शितिरन्ध्रः समन्तशितिरन्ध्रस्ते सावित्राः शितिबाहुरन्यतः शितिबाहुः समन्तशितिबाहुस्ते बार्हस्पत्याः पृषती क्षुद्रपृषती स्थूलपृषती ता मैत्रावरुण्यः.. (२) लाल, धुएं जैसे लाल, पके फल जैसे लाल पशु सोम से संबंधित हैं. भूरा लाल, भूरा शुक्र जैसा हरा रंग वरुण देव से संबंधित है. कहींकहीं सफेद छेद वाले और एक ओर सफेद छेद वाले पशु सविता देव से संबंधित हैं. कहींकहीं सफेद बाहु वाले पूरी तरह सफेद बाहु वाले पशु बृहस्पति देव से संबंधित हैं. छोटे चकत्ते वाले व बड़े चकत्ते वाले मित्र देव और वरुण देव से संबंधित हैं. (२) शुद्धवालः सर्वशुद्धवालो मणिवालस्त ऽ आश्विनाः श्येतः श्येताक्षोरुणस्ते रुद्राय पशुपतये कर्णा यामा ऽ अवलिप्ता रौद्रा नभोरूपाः पार्जन्याः.. (३) एकदम शुद्ध बालों वाले, संपूर्ण शुद्ध बालों वाले, मणि के समान बालों वाले, शुद्ध बालों वाले अश्विनीकुमारों से संबंधित हैं. सफेद रंग, सफेद आंख, लाल रंग वाले पशु रुद्र देव के लिए और पशुपति के लिए हैं. सफेद कान वाले यम के लिए ३०४ - यजुर्वेद 632/19
उत्तरार्ध चौबीसवां अध्याय रौद्र स्वभाव वाले रुद्र देव के लिए हैं. नभ रूप वाले पर्जन्य देव से संबंधित हैं. ( ३ ) पृश्निस्तिरश्चीनपृश्निरूर्ध्वपृश्निस्ते मारुताः फल्गूलौर्हितोर्णी पलक्षी ताः सारस्वतयः प्लीहाकर्णः शुण्ठाकर्णोध्यालोहकर्णस्ते त्वाष्ट्राः कृष्णग्रीवः शितिकक्षोज्ज्सक्थस्त ऽ ऐन्द्राग्नाः कृष्णाज्जिरल्पाज्जिर्महाज्ज्रिस्त ऽ उषस्याः.. (४) विचित्र रंग वाले तिरछी रेखा वाले और विचित्र बिंदु वाले मरुद्गण से संबंधित हैं. हलकीफुलकी लाल सफेद ऊन वाली ( भेड़ें ) सरस्वती देवी से संबंधित हैं. प्लीहा ( के रोगी ) कान वाले छोटे तथा लाल रंग के कान वाले त्वष्टा देव से संबंधित हैं. काली गरदन वाले, सफेद कांख वाले, लाल जांघों वाले इंद्र देव से संबंधित हैं. अग्नि देव से संबंधित हैं. काले, छोटे एवं बड़े धब्बे वाले पशु उषा देवी से संबंधित हैं. ( ४ ) शिल्पा वैश्वदेव्यो रोहिण्यस्त्र्यवयो वाचेविज्ञाता आदित्यै सरूपा धात्रे वत्सर्यो देवानां पत्नीभ्यः.. (५) विश्व देवी के पशु चितकबरे ( विचित्र ) रंग के हैं. आदित्य देव के अस्त्र अवयव वाणी अज्ञात व सुरूप हैं. धारक देव हेतु हैं. देवताओं की पत्नियों के लिए ये बछियां हैं. ( ५ ) कृष्णग्रीवा ऽ आग्नेयाः शितिभ्रुवो वसूना १४ रोहिता रुद्राणा १४ श्वेता ऽ अवरोकिण ऽ आदित्यानां नभोरूपाः पार्जन्याः.. (६) काली गरदन वाले पशु अग्नि, सफेद भौंहों वाले पशु वसुदेव व लाल रंग वाले पशु रुद्रदेव से संबंधित हैं. सफेद रंग वाले पशु आदित्य देव व नभ जैसे रूप वाले पशु पर्जन्य ( बादल ) से संबंधित हैं. ( ६ ) उन्नत ऽ ऋषभो वामनस्त ऽ ऐन्द्रावैष्णवा उन्नत ः शितिबाहुःशिति पृष्ठस्त ऽ ऐन्द्रा बार्हस्पत्याः शुकरूपा वाजिनाः कल्माषा ऽ आग्निमारुताः श्यामाः पौष्णाः.. (७) ऊंचे, नाटे, शक्तिमान पशु इंद्र देव और विष्णु, उन्नत, सफेद बाहु व सफेद पीठ वाले पशु इंद्र देव और बृहस्पति देव तथा शुक जैसे रूप वाले पशु वाजी देव से संबंधित हैं. चितकबरे पशु अग्नि और मरुद् देव से संबंधित हैं. श्याम रंग वाले पूषा देव से संबंधित हैं. ( ७ ) एता ऽ ऐन्द्राग्ना द्विरूपा ऽ अग्नीषोमीया वामना ऽ अनड्वाह ऽ आग्नावैष्णवा वशा मैत्रावरुण्योन्यत ऽ एन्यो मैत्र्यः.. (८) दो रूप वाले पशु इंद्र देव और अग्नि से संबंधित हैं. दो रूप वाले पशु सोम और अग्नि व छोटे रूप वाले पशु विष्णु और अग्नि से संबंधित हैं. बांझ पशु मित्र देव और वरुण देव से व अन्य पशु मित्र देव से संबंधित हैं. ( ८ ) यजुर्वेद - ३०५
उत्तरार्ध चौबीसवां अध्याय
उत्तरार्ध चौबीसवां अध्याय कृष्णग्रीवा ऽ आग्नेया बभ्रवः सौम्याः श्वेता वायव्या ऽ अविज्ञाता ऽ अदित्यै सरूपा धात्रे वत्सप्तर्यो देवानां पत्नीभ्यः.. (९) काली गरदन वाले अग्नि, भूरे रंग वाले सोम, सफेद रंग वाले वायु से संबंधित हैं. अज्ञात रंग वाले आदित्य देव से संबंधित हैं. सुंदर रंग वाले धाता देव से संबंधित हैं. बछियां देव पत्नियों से संबंधित हैं. ( ९ ) कृष्णा भौमा धूम्ना ऽ आन्तरिक्षा बृहन्तो दिव्याः शबला वैद्युताः सिध्मास्तारकाः.. (१०) काले रंग के पशु भूमि के लिए, धुएं जैसे अंतरिक्ष हेतु विशाल पशु स्वर्ग के लिए, बहुरंगी विद्युत् हेतु और कुष्ठी पशु तारकों के लिए हैं. ( १० ) धूम्रान्वसन्तायालभेते श्वेतान्ग्रीष्माय कृष्णान्वर्षाभ्योऽरुणाञ्छरदे पृषतो हेमन्ताय पिशङ्गाञ्छिशिराय.. (११) धुएं जैसे रंग के पशु वसंत, सफेद जैसे रंग के पशु ग्रीष्म ऋतु व काले जैसे रंग के पशु वर्षा ऋतु के लिए हैं. गुलाब जैसे रंग के पशु शरद ऋतु के लिए, चितकबरे रंग के पशु हेमंत ऋतु व काले, पीले रंग के पशु शिशिर ऋतु के लिए हैं. ( ११ ) त्र्यवयो गायत्र्यै पञ्चावयस्त्रिष्टुभे दित्यवाहो जगत्यै त्रिवत्सा ऽ अनुष्टुभे तुर्यवाह ऽ उष्णिहे.. (१२) डेढ़ वर्ष के गायत्री हेतु, ढाई वर्ष के त्रिष्टुप् के लिए, तीन वर्ष के अनुष्टुप् हेतु, साढ़े तीन वर्ष के उष्णिग् छंद के लिए हैं. ( १२ ) पष्ठवाहो विराज ऽ उक्षाणो बृहत्या ऽ ऋषभाः ककुभेनड्वाहः पङ्क्त्यै धेनवौतिच्छन्दसे.. (१३) पीछे से भार ढोने वाले विराज छंद के लिए हैं. वीर्य सिंचक बृहती छंद के लिए हैं. बलवान ककुप् छंद के लिए हैं. गाड़ी खींचने वाले पंक्ति छंद के लिए दूध देने वाले अतिच्छंद के लिए हैं. ( १३ ) कृष्णग्रीवा ऽ आग्नेया बभ्रवः सौम्या ऽ उपध्वस्ताः सावित्रा वत्सप्तर्यः सारस्वत्यः श्यामाः पौष्णाः पृश्नयो मारुता बहुरूपा वैश्वदेवा वशा द्यावापृथिवीयाः.. (१४) काली गरदन वाले अग्नि व भूरे सोम से संबंधित हैं. मिश्रित रंग वाले सविता देव व छोटी बछियां सरस्वती देवी से संबंधित हैं. काले रंग के पूषा देव से संबंधित हैं. चितकबरे मरुद्गण से संबंधित हैं. बहुरूप वाले विश्व से संबंधित हैं. वंध्या गाएं स्वर्गलोक व पृथ्वीलोक से संबंधित हैं. ( १४ ) उक्ताः सञ्चरा ऽ एता ऽ ऐन्द्राग्नाः कृष्णा वारुणाः पृश्नयो मारुताः कायास्तूपराः.. (१५) कहे गए संचरणशील पशु इंद्र देव और अग्नि के लिए हैं. काले रंग के पशु ३०६ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध चौबीसवां अध्याय वरुण देव के लिए चितकबरे रंग के पशु मरुद्गण के लिए व सींगरहित पशु प्रजापति के लिए हैं. ( १५ ) अग्नयेनीकवते प्रथमजानालभते मरुद्भ्यः सान्तपनेभ्यः सवात्यान्मरुद्भ्यो गृहमेधिभ्यो बष्किहान्मरुद्भ्यः क्रीडिभ्यः स ᳪ सृष्टान्मरुद्भ्यः स्वतवद्भ्योऽनुसृष्टान्.. ( १६ ) पहले जन्मे पशु सेनापति जैसे अग्नि के लिए हैं. उत्तम तप करने वाले मरुद्गणों के लिए वायु जैसे गतिमान पशु हैं. गृहमेध मरुद्गणों के लिए चिरप्रसूत पशु हैं. क्रीड़ाकारी मरुद्गणों के लिए अच्छे गुणी पशु हैं. स्वप्रेरित मरुद्गणों के लिए साथ रहने वाले पशु हैं. ( १६ ) उक्ताः सञ्चरा ऽ एता ऽ ऐन्द्राग्नाः प्राशृंगा माहेन्द्रा बहुरूपा वैश्वकर्मणाः... ( १७ ) ऊपर कहे गए संचरणशील पशु इंद्र देव एवं अग्नि के लिए हैं. प्रकृष्ट ( श्रेष्ठ ) सींग वाले पशु महेंद्र देव आदि के लिए हैं. बहुत से रंगों वाले विश्वकर्मा देव के लिए हैं. ( १७ ) धूम्रा बभ्रुनीकाशाः पितृणा ᳪ सोमवतां बभ्रवो धूम्रनीकाशाः पितॄणां बर्हिषदां कृष्णा बभ्रुनीकाशाः पितॄणामग्निष्वात्तानां कृष्णाः पृषन्तस्त्रैयम्बकाः.. ( १८ ) धुएं जैसे भूरे रंग के पशु पितरों के लिए हैं. धुएं और नेवले जैसे भूरे रंग के सोम गुणों वाले पशु पितरों के लिए हैं. काले और भूरे रंग के कुश के आसन पर बैठे पशु पितरों के लिए हैं. अग्नि विद्या में निपुण पशु पितरों के लिए हैं. काले रंग के चकत्तेदार पशु पितरों के लिए हैं. ( १८ ) उक्ताः सञ्चरा ऽ एताः शुनासीरीयाः श्वेता वायव्याः श्वेताः सौर्याः... ( १९ ) उपर्युक्त पशुओं के साथ ही संचरणशील पशु शुनासीर के लिए हैं. सफेद रंग के पशु वायु देव के लिए हैं. सफेद आभा वाले पशु सविता देव के लिए हैं. ( १९ ) वसन्ताय कपिञ्जलानालभते ग्रीष्माय कलविङ्कान्वर्षाभ्यस्तित्तिरीञ्छरदे वर्तिका हेमन्ताय ककराञ्छिशिराय विककरान्.. ( २० ) वसंत ऋतु के लिए चातक, गरमी के लिए चटक व वर्षा के लिए तीतर का निर्धारण किया गया है. लवा शरद ऋतु, ककर व शिशिर ऋतु हेतु विककर पक्षियों का निर्धारण किया गया है. ( २० ) समुद्राय शिशुमारानलभते पर्जन्याय मण्डूकान्द्भ्यो मत्स्यान्मित्राय कुलीपयान्वरुणाय नाक्रान्.. ( २१ ) समुद्र हेतु अपने ही बच्चों को मारने वाले पक्षी का निर्धारण किया गया है. यजुर्वेद - ३०७
उत्तरार्ध चौबीसवां अध्याय बादल हेतु मंडूक का निर्धारण किया गया है. जलों के लिए मत्स्य, मित्र देव हेतु कुलीपय तथा वरुण देव के लिए नाक्र नामक पशु का निर्धारण किया गया है. ( २१ ) सोमाय ह १४ सानालभते वायवे बलाका ऽ इन्द्राग्निभ्यां क्रुञ्चान्मित्राय मद्गून्र्वरुणाय चक्रवाकान्.. (२२) सोम के लिए हंस पक्षी, वायु के लिए बगुली. इंद्र देव और अग्नि के लिए सारस, मित्र देव के लिए क्रौंच तथा वरुण देव हेतु चकवे का विधान किया गया है. ( २२ ) अग्नये कुटरूनालभते वनस्पतिभ्य ऽ उलूकानग्नीषोमाभ्यां चाषानश्विभ्यां मयूरान्मित्रावरुणाभ्यां कपोतान्.. (२३) अग्नि के लिए मुरगे व वनस्पतिदेव के लिए उल्लू व अग्नि और सोम हेतु नीलकंठ पक्षी का विधान मिलता है. अश्विनी देवों के लिए मोर व वरुण देव के लिए कबूतर पक्षी का विधान मिलता है. ( २३ ) सोमाय लबानालभते त्वष्ट्रे कौलीकानघोषादीर्देवानां पत्नीभ्यः कुलीका देवजामिभ्योग्नये गृहपतये पारूष्णान्.. (२४) सोम के लिए लबा, त्वष्टा के लिए बया व देव पत्नियों के लिए घोष आदि गुह्यतल पक्षी का विधान मिलता है. देवताओं की बहनों के लिए कुलीक व गृहपति हेतु पारूष्ण का विधान मिलता है. ( २४ ) अह्ने पारावतानालभते रात्र्यै सीचापूरहोरात्रयोः सन्धिभ्यो जतूर्मासेभ्यो दात्यौहान्त्संवत्तराय महतः सुपर्णान्.. (२५) दिन के लिए कबूतर और रात्रि के लिए सीचापू का विधान मिलता है. दिन तथा रात की संधि हेतु चमगादड़, मास हेतु कौए व वर्ष हेतु अच्छे पंख वाले ( गरुड़ ) का विधान मिलता है. ( २५ ) भूम्या ऽ आखूनालभतेन्तरिक्षाय पाङ्क्त्रान्दिवे कशान्दिग्भ्यो नकुलान्बभ्रुकानवान्तरदिशाभ्यः.. (२६) भूमि के लिए चूहों व अंतरिक्ष के लिए पांत में उड़ने वालों का विधान मिलता है. स्वर्ग के लिए कश व दिशाओं के लिए भूरे रंग के जंतु का विधान मिलता है. ( २६ ) वसुभ्य ऽ ऋश्यानालभते रुद्रेभ्यो रूरूनादित्येभ्यो न्यङ्कन्वश्वेभ्यो देवेभ्यः पृषतान्त्साध्येभ्यः कुलुङ्गान्.. (२७) वसुओं के लिए ऋष्य नामक हिरण व रुद्रगणों के लिए रुरु नामक हिरण का ३०८ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध चौबीसवां अध्याय विधान मिलता है. आदित्य के लिए न्यंकु नामक हिरण का विधान मिलता है. विश्वों के लिए चकत्तेदार हिरण व साध्य के लिए कुलुंग हिरण का विधान मिलता है. ( २७ ) ईशानाय परस्वत ऽ आलभते मित्राय गौरान्वरुणाय महिषान्बृहस्पतये गवयांस्त्वष्ट्र ऽ उष्ट्रान्.. ( २८ ) ईशान देव हेतु परस्वत मृग, मित्र देव हेतु गौर मृग व वरुण देव हेतु भैंसों का विधान किया गया है. बृहस्पति देव हेतु गायों का और त्वष्टा देव हेतु ऊंटों का विधान किया गया है. ( २८ ) प्रजापतये पुरुषान्हस्तिन ऽ आलभते वाचे प्लुषीँश्चक्षुषे मशकाञ्छ्रोत्राय भृङ्गाः.. ( २९ ) प्रजापति हेतु हाथियों वाक् देव हेतु प्लुषी, चक्षु देव हेतु मच्छर व कानों हेतु भंवरों का विधान किया गया है. ( २९ ) प्रजापतये च वायवे च गोमृगो वरुणायारण्यो मेषो यमाय कृष्णो मनुष्यराजाय मर्कटः शार्दूलाय रोहित्ऋषभाय गवयी क्षिप्रश्येनाय वर्तिका नीलगङ्गोः कृमिः समुद्राय शिशुमारो हिमवते हस्ती.. ( ३० ) प्रजापति तथा वायु देव हेतु गोमृग, वरुण देव हेतु जंगली मेष, यम हेतु कृष्ण मेष, मनुष्यराज हेतु मर्कट, सिंहराज हेतु लाल मृग, ऋषभ हेतु गाय का विधान किया गया है. बाज हेतु बटेर, नीलांग हेतु कृमि, समुद्र हेतु शिशुमार व हिमवान हेतु हाथी का विधान किया गया है. ( ३० ) मयुः प्राजापत्य उलो हलिक्ष्णो वृषदं श्श शस्ते धात्रे दिशां कङ्को धुङ्क्षाग्नेयी कलविङ्को लोहिताहिः पुष्करसादस्ते त्वाष्ट्रा वाचे क्रुञ्चः.. ( ३१ ) प्रजापति के लिए किन्नर ( गायनवादन में कुशल ) उल को नियोजित करने की कृपा करें. खास तौर का शेर और बिलाव धाता देव हेतु नियोजित करने की कृपा करें. दिशा हेतु कंक को नियोजित करने की कृपा करें. आग्नेय दिशा हेतु धुंक्षा नियोजित करें. चिड़ा, लाल सांप और कमलभक्षी पक्षी त्वष्टा देव हेतु नियोजित करें. वाक् हेतु क्रौंच पक्षी को नियोजित करने की कृपा करें. ( ३१ ) सोमाय कुलुङ्ग ऽ आरण्योजो नकुलः शका ते पौष्णाः क्रोष्टा मायोरिन्द्रस्य गौरमृगः पिद्वो न्यङ्कुः कक्कटस्ते ऽ नुमत्यै प्रतिश्रुत्कायै चक्रवाकः.. ( ३२ ) सोम के लिए कुरंग पशु, पूषा देव के लिए जंगली मेष, नेवला तथा मधुमक्खी हैं. वायु के लिए शृगाल, इंद्र के लिए गौरमृग, अनुमति के लिए न्यंकु व प्रतिश्रुत्क देव के लिए चकवा पक्षी है. ( ३२ ) सौरी बलाका शार्गः सृजयः शयाण्डकस्ते मैत्राः सरस्वत्यै शारिः पुरुषवाक् श्वाविद्धौमी शार्दूलो वृकः पृदाकुस्ते मन्यवे सरस्वते शुकः पुरुषवाक्.. ( ३३ ) यजुर्वेद - ३०९
उत्तरार्ध चौबीसवां अध्याय सूर्य के लिए बगुला पक्षी है. मित्र देव के लिए चातक, सृजय व शयांडक हैं. सरस्वती देवी के लिए मैना, पृथ्वी देवी के लिए सेही पक्षी व मन्यु देव के लिए सिंह, भेड़िया, सांप हैं. समुद्र के लिए मनुष्यवाची तोता पक्षी है. ( ३३ ) सुपर्णः पार्जन्य ऽ आतिर्वाहसो दर्विदा ते वायवे बृहस्पतये वाचस्पतये पैङ्गराजोलज ऽ आन्तरिक्षः प्लवो मद्गुर्मत्स्यस्ते नदीपतये द्यावापृथिवीयः कूर्मः.. (३४) पर्जन्य देव ( बादल ) के लिए गरुड़ पक्षी, वायु के लिए आती, वाहस तथा काष्ठ कुट्ट हैं. वाणीपति बृहस्पति देव के लिए पैंगराज तथा काष्ठ कुट्ट हैं. अंतरिक्ष के लिए अलज है. नदी देव के लिए मत्स्य वाहस तथा काष्ठ कुट्ट हैं. स्वर्गलोक एवं पृथ्वीलोक के लिए कच्छप ( कछुआ ) है. ( ३४ ) पुरुषमृगश्चन्द्रमसो गोधा कालका दार्वाघाटस्ते वनस्पतीनां कृकवाकुः सावित्रो ह १८ सो वातस्य नाक्रो मकरः कुलीपयस्तेकूपारस्य हियै शल्यकः.. (३५) चंद्र देव हेतु नर हिरण, वनस्पति देव हेतु गोह कालका तथा कठफोड़ा, सविता देव हेतु ताम्रचूर, वायु हेतु व समुद्र देव हेतु नक्र, मगरमच्छ एवं कुलीपय जलचर निर्धारित किया गया है. ही देव हेतु सेही को निर्धारित किया गया है. ( ३५ ) एण्यह्नो मण्डूको मूषिका तित्तिरिस्ते सर्पाणां लोपाश ऽ आश्विनः कृष्णो रात्र्या ऽ ऋक्षो जतूः सुषिलीका त ऽ इतरजनानां जहका वैष्णवी.. (३६) अह्न हेतु हरिणी, सर्प हेतु मेढक, चुहिया तथा तीतर का विधान है. अश्विनीकुमार हेतु लोपाश, रात्रि देवी हेतु कृष्ण मृग व अन्य देवगणों हेतु रीछ, जतू और सुषिलीका का विधान है. विष्णु हेतु जहका निर्धारित है. ( ३६ ) अन्यवापोर्धमासानाम्ऋश्यो मयूरः सुपर्णस्ते गन्धर्वाणामपामुद्रो मासां कश्यपो रोहित्कुण्डृणाची गोलत्तिका तेप्सरसां मृत्यवेसितः.. (३७) अर्द्धमास हेतु अन्यवाय ( कोयल ), जलों के लिए ऋष्यमृग और मोर, गंधर्वों के लिए सुपर्ण, जलों के लिए केकड़े, महीनों के लिए कछुए का विधान किया गया है. अप्सराओं के लिए रोहित, कृंडृणाची व गोलत्तिका का विधान है. मृत्यु के लिए काले हिरण का विधान किया गया है. ( ३७ ) वर्षाहूर्ऋतूनामाखुः कशो मान्थालस्ते पितॄणां बलायाजगरो वसूनां कपिञ्जलः कपोत ऽ उलूकः शशस्ते निर्ऋत्यै वरुणायारण्यो मेषः.. (३८) वर्षा को बुलाने वालों के लिए ऋतु, पितरों के लिए चूहे, छछूंदर तथा छिपकली, बलदेव के लिए अजगर, वसुओं के लिए कपिंजल व निर्ऋति देव के लिए कबूतर, उल्लू और खरगोश का विधान है. वरुण के लिए जंगली मेष का विधान किया गया है. ( ३८ ) ३१० - यजुर्वेद
उत्तरार्ध चौबीसवां अध्याय श्वित्र आदित्यानामुष्ट्रो घृणीवान्वाध्रीणसस्ते मत्या ऽ अरण्याय सृमरो रूरू रौद्रः क्वयिः कुटरुर्दात्यौहस्ते वाजिनां कामाय पिकः.. ( ३९) आदित्यगणों के लिए विचित्र पशु, मति देवी के लिए ऊंट, चील और बकरे, अरण्य देव के लिए गाय, रुद्र देव के लिए रुरु मृग व वाजि देव के लिए क्वयि, कौए और मुरगे का विधान किया गया है. काम देव के लिए कोयल का विधान है. ( ३९ ) खड्गो वैश्वदेवः श्वा कृष्णः कर्णो गर्दभस्तरक्षुस्ते रक्षसामिन्द्राय सूकरः सि हो मारुतः कृकलासः पिप्पका शकुनिस्ते शरव्यायै विश्वेषां देवानां पृषतः.. (४०) वैश्वे देव के लिए गैंडे, राक्षसों के लिए कुत्ते, गधे और शेर, इंद्र देव के लिए सुअर व मरु देव के लिए सिंह का विधान किया गया है. शरव्य देवी हेतु गिरगिट, पपीहा और शकुनि तथा सभी देवों हेतु पृषत मृग का विधान है. ( ४० ) यजुर्वेद - ३११
पच्चीसवां अध्याय
पच्चीसवां अध्याय शादं दद्भिरवकां दन्तमूलैर्मृदं वस्वैस्तेगान्द १४ ष्ट्राभ्या १४ सरस्वत्या ऽ अग्रजिह्वं जिह्वाया ऽ उत्सादमवक्रन्देन तालु वाज १४ हनुभ्यामप ऽ आस्येन वृषणमाण्डाभ्यामादित्याँ श्मश्रुभिः पन्थानं भ्रूभ्यां द्यावापृथिवी वर्तोभ्यां विद्युतं कनीनकाभ्या १४ शुक्लाय स्वाहा कृष्णाय स्वाहा पार्याणि पक्ष्माण्यवार्या ऽ इक्षवोवार्याणि पक्ष्माणि पार्या ऽ इक्षवः.. ( १ ) दांतों से शाद देवता ( कोमल घास ), दंतमूल ( दांत की जड़ ) से जल में उपजने वाले शैवाल देव ( जल में उपजने वाली घास ) व दाढ़ों से मिट्टी व दाढ़ों से तेग देव को प्रसन्न करते हैं. जिह्वा के आगे के भाग से सरस्वती देवी व उत्साद देव को प्रसन्न करते हैं. तालु से अवक्रंद देव, ठोड़ी से अन्न देव, मुख से जल देव, अंडकोषों से वृषण देव व दाढ़ीमूंछ से आदित्य देव को प्रसन्न करते हैं. भौंहों से पंथ देव, बरौनियों से स्वर्गलोक व पृथ्वीलोक, आंख की पुतलियों से विद्युत् देव को प्रसन्न करते हैं. शुक्ल देव के लिए स्वाहा. कृष्ण देव के लिए स्वाहा. पार देव के लिए स्वाहा. अवार देव के लिए स्वाहा. ऊपर के लिए स्वाहा. नीचे के लिए स्वाहा. ( १ ) वातं प्राणेनापानेन नासिके उपयाममधरेणौष्ठेन सदुत्तरेण प्रकाशेनान्तरमनूकाशेन बाह्यं निवेष्यं मूर्ध्ना स्तनयित्नुं निर्बाधेनाशर्नि मस्तिक्येण विद्युतं कनीनकाभ्यां कर्णाभ्या १४ श्रोत्र १४ श्रोत्राभ्यां कर्णौ तेदनीमधरकण्ठेनापः शुष्ककण्ठेन चित्तं मन्याभिरदिति १४ शीर्ष्णा निर्ऋतिं निर्जर्जल्पेन शीर्ष्णा संक्रोशौः प्राणान् रेष्माण १४ स्तुपेन.. ( २ ) प्राण से वात देव के लिए स्वाहा. अपान से नासिका देव के लिए स्वाहा. ऊपर के होंठ से सत् देव के लिए स्वाहा. ओष्ठ से उपयाम देव के लिए स्वाहा. उत्तर के प्रकाश से अंतर देव के लिए स्वाहा. भीतर के प्रकाश से बाह्य देव के लिए स्वाहा. मूर्धा से निवेश देव के लिए स्वाहा. सिर में स्थित अस्थि से स्तनयित्नु देव के लिए स्वाहा. मस्तिष्क से अशनि देव के लिए स्वाहा. आंख की पुतलियों से विद्युत् देव के लिए स्वाहा. कानों से श्रोत्र देव के लिए स्वाहा. दोनों कानों से देवशक्ति देव के लिए स्वाहा. नीचे के कंठ से तेदनी देव के लिए स्वाहा. ऊपर के सूखे कंठ से जल देव के लिए स्वाहा. नाड़ियों से चित्त देव के लिए स्वाहा. सिर से अदिति देव के लिए स्वाहा. जर्जर सिर से निर्ऋति देव ३१२ – यजुर्वेद
उत्तरार्ध पच्चीसवां अध्याय
उत्तरार्ध पच्चीसवां अध्याय के लिए स्वाहा. बोलने वाले अंगों से प्राण देव के लिए स्वाहा. चोटी से रेष्म देव के लिए स्वाहा. ( २ ) मशकान् केशैरिन्द्र ४ स्वापसा वहेन बृहस्पति २४ शकुनिसादेन कूर्माञ्छफैराक्रमण ४ स्थूराभ्यामृक्षलाभिः कपिञ्जलाञ्जवं जङ्घाभ्यामध्वानं बाहुभ्यां जाम्बीलेनारण्यमग्निमतरुग्भ्यां पूषणं दोभ्यामश्विनाव ४ साभ्या २४ रुद्र ४ रोराभ्याम्.. ( ३ ) केशों से मशक देव के लिए स्वाहा. कंधों से इंद्र देव के लिए स्वाहा. पक्षी जैसे वेग से बृहस्पति देव के लिए स्वाहा. खुरों से कर्म देव के लिए स्वाहा. गुल्फों से आक्रमण देव के लिए स्वाहा. गुल्फों के नीचे नाड़ियों से कपिंजल के लिए स्वाहा. जंघाओं से वेग की देवी के लिए स्वाहा. बाहुओं से राह देव के लिए स्वाहा. घुटनों से जंगल देव के लिए स्वाहा. घुटनों से पूषा देव के लिए स्वाहा. नीचे के घुटनों से पूषा देव के लिए स्वाहा. दोनों कंधों से अश्विनी देव के लिए स्वाहा. देह की अन्य शक्तियों से रुद्र देव के लिए स्वाहा ( ३ ) अग्नेः पक्षतिर्वायोर्निपक्षतिरिन्द्रस्य तृतीया सोमस्य चतुर्थ्यदित्यै पञ्चमीन्द्राण्यै षष्ठी मरुता २४ सप्तमी बृहस्पतेरष्टम्यर्यम्णो नवमी धातुर्दशमीन्द्रस्यैकादशी वरुणस्य द्वादशी यमस्य त्रयोदशी.. (४) दाईं ओर की पहली अस्थि अग्नि, दूसरी ओर की अस्थि वायु, तीसरी ओर की अस्थि इंद्र देव, चौथी ओर की अस्थि, पांचवीं ओर की अस्थि अदिति देवी व छठी ओर की अस्थि इंद्राणी देवी से संबंधित हैं. सातवीं ओर की अस्थि मरुद् देव, आठवीं ओर की अस्थि बृहस्पति देव नौवीं ओर की अस्थि अर्यमा देव व दसवीं ओर की अस्थि धाता से संबंधित हैं. ग्यारहवीं ओर की अस्थि इंद्र देव से बारहवीं ओर की अस्थि वरुण देव व तेरहवीं ओर की अस्थि यम देव से संबंधित हैं. ( ४ ) इन्द्राग्न्योः पक्षतिः सरस्वत्यै निपक्षतिर्मित्रस्य तृतीयापां चतुर्थी निर्ऋत्यै पञ्चम्यग्नीषोमयोः षष्ठी सर्पाणा २४ सप्तमी विष्णोरष्टमी पूष्णो नवमी त्वष्टुर्दशमीन्द्रस्यैकादशी वरुणस्य द्वादशी यम्यै त्रयोदशी द्यावापृथिव्योर्दक्षिणं पार्श्व विश्वेषां देवानामूत्तरम्.. (५) बाईं ओर की पहली अस्थि इंद्र देव और अग्नि, दूसरी अस्थि सरस्वती देवी, तीसरी अस्थि मित्र देव, चौथी अस्थि जल देव, पांचवीं अस्थि निर्ऋति देव व छठी अस्थि अग्नि और सोम से संबंधित हैं. सातवीं अस्थि सर्प देव, आठवीं अस्थि विष्णु, नौवीं अस्थि पूषा देव, दसवीं अस्थि त्वष्टा देव व ग्यारहवीं अस्थि इंद्र देव व बारहवीं अस्थि वरुण देव, तेरहवीं अस्थि यम देव, दाहिना भाग स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक बायां भाग सभी देवों व उत्तर भाग अन्य देवों से संबंधित हैं. ( ५ ) यजुर्वेद - ३१३
उत्तरार्ध पच्चीसवां अध्याय
उत्तरार्ध पच्चीसवां अध्याय मरुता ᳪ स्कन्धा विश्वेषां देवानां प्रथमा कीकसा रुद्राणां द्वितीयादित्यानां तृतीया वायोः पुच्छमग्नीषोमयोर्भासदौ क्रुञ्चौ श्रोणिभ्यामिन्द्राबृहस्पती ऊरुभ्यां मित्रावरुणावलाभ्यामाक्रमण ᳪ स्थूराभ्यां बलं कुष्ठाभ्याम्.. (६) कंधे की अस्थि मरुद्गणों, प्रथम अस्थि विश्वे देवों, दूसरी अस्थि रुद्रगणों, तीसरी अस्थि आदित्यगणों, पूंछ वायु, नितंब अग्नि और सोम से संबंधित हैं. जंघाएं क्रौंच देव व दोनों जंघाएं इंद्र देव और बृहस्पति देव, दोनों जंघाएं मित्र देव वरुण देव से संबंधित हैं. नीचे का भाग आक्रमण से संबंधित है. ऊपर का भाग बल देव से संबंधित है. ( ६ ) पूषणं वनिष्ठुनान्धाहीन्स्थूलगुदया सर्पान्गुदाभिर्विद्युत ऽ आन्त्रैरपो वस्तिना वृषणमाण्डाभ्यां वाजिन ᳪ शेपेन प्रजा ᳪ रेतसा चाषान् पित्तेन प्रदरान् पायुना कूश्माञ्छकपिण्डैः.. (७) बड़ी आंत पूषा देव, स्थूल गुदा अंधे सर्प देव, सामान्य गुदा अन्य सर्प देवों, बची हुई आंतें विद्युत् देव, वस्ति भाग जल देव, अंडकोष वृषण देव व उपस्थ बल देव से संबंधित हैं. वीर्य प्रजापति देव, पित्त चाष देव, पायु ( गुदा ) प्रदर देव व शक पिंड कूश्म देव से संबंधित हैं. ( ७ ) इन्द्रस्य क्रोडोदित्यै पाजस्यं दिशां जत्र्वोदित्यै भसज्जीमूतान् हृदयौपशेनान्तरिक्षं पुरीतता नभ ऽ उदयैन चक्रवाकौ मतस्नाभ्यां दिवं वृक्काभ्यां गिरीन् प्लाशिभिरुपलान् प्लीह्ना वल्मीकान् क्लोमभिर्गल्लोभिर्गुल्मान् हिराभिः स्रवन्तीर्ह्रदान् कुक्षिभ्या ᳪ समुद्रमुदरेण वैश्वानरं भस्मना.. (८) क्रोड इंद्र देव, पैर अदिति देव, हंसली अदिति देव, मेढ्राग्र अदिति देव, हृदय प्रदेश और नाड़ीप्रदेश अंतरिक्ष देव, पेट आकाश देव व फेफड़े चक्रवाक से संबंधित हैं. दोनों वृक्क ( गुर्दे ) पर्वत देव, क्लोम वाल्मीकि देव, क्लोमादि गुल्म, रक्त शिराएं नदी, कांख हृदय, पेट समुद्र व भस्म वैश्वानर से संबंधित हैं. ( ८ ) विधृतिं नाभ्या घृत ᳪ रसेनापो यूष्णा मरीचीर्विप्रुड्भर्नीहारमूष्मणा शीनं वसया पुष्वा अश्रुभिर्ह्रादुनीर्दूपीकाभिरस्ना रक्षा ᳪ सि चित्राण्यङ्गैर्नक्षत्राणि रूपेण पृथिवीं त्वचा जुम्बकाय स्वाहा.. (९) नाभि विधृति, वीर्य घृत, पकवान जल देव, वसा मरीचि देव, शरीर की गरमाई ओस देव, वसा शनि देव, आंसू फुहार देव गीड़ ( आंख की कीच ) ह्रादुनी आकाशीय विद्युत् देव से संबंधित हैं. खून के कण रक्षा देव, शारीरिक विभिन्न अंग विभिन्न देवों, शारीरिक सौंदर्य, नक्षत्र देवों व त्वचा पृथिवी देवी और त्वचा जुंबक देव से संबंधित हैं. ( ९ ) ३१४ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध पच्चीसवां अध्याय हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक ऽ आसीत्. स दाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (१०) जो प्रथम जन्मा है, हिरण्यगर्भ में रहा, जो उत्पन्न हुई पीढ़ियों का एकमात्र पालक है, जो पृथ्वीलोक और स्वर्गलोक को धारता है, उस देव के अलावा किस देव के लिए हवि का विधान करें. ( १० ) यः प्राणतो निमिषतो महित्वैक ऽ इन्द्राजा जगतो बभूव. य ऽ ईशे अस्य द्विपदश्चतुष्पदः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (११) जो अपने प्राणपण से पल भर में इस जगत् का महिमावान शासक हुआ, जो दोपायों और चौपायों का ईश्वर है, महिमावान हम उस देवता के अलावा और किस देवता के लिए हवि का विधान करें ? ( ११ ) यस्येमे हिमवन्तो महित्वा यस्य समुद्र १४ रस्या सहाहुः. यस्येमाः प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (१२) जिन की इस महिमा से हिमवान पर्वतों का निर्माण हुआ, जिस ने यह रसीले समुद्र निर्मित किए, जिन की भुजाएं दसों दिशाओं में फैली हुई हैं, हम उस देवता के अलावा और किस देवता के लिए हवि का विधान करें ? ( १२ ) य ऽ आत्मदा बलदा यस्य विश्व ऽ उपासते प्रशिषं यस्य देवाः. यस्य छायामृतं यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (१३) जो आत्मशक्ति दाता और बलशक्ति दाता हैं, सारा विश्व जिस की प्रशंसा करता है, सारा विश्व जिस की उपासना करता है, जिस की छत्रच्छाया अमृत सरीखी सुखदायी है, जिस के बिना मृत्यु जैसा कष्ट होता है, उस के अलावा हम और किस देव के लिए हवि का विधान करें. ( १३ ) आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतोदब्धासो अपरीतास ऽ उद्भिदः. देवा नो यथा सदमिद् वृधे असन्नप्रायुवो रक्षितारो दिवेदिवे.. (१४) हम यज्ञ में सब ओर से अबाध रूप से कल्याणकारी व दुर्लभ परिणाम प्राप्त करें. सभी देवगण प्रतिदिन हमारी रक्षा व बढ़ोत्तरी करें. ( १४ ) देवानां भद्रा सुमतिर्ऋजूयतां देवाना १४ रतिरभि नो निवर्त्तताम्. देवाना १४ सख्यमुपसेदिमा वयं देवा न ऽ आयुः प्रतरन्तु जीवसे.. (१५) देवगणों की उत्तम बुद्धि हमारे लिए कल्याणकारिणी हो. देवगणों की सरलता हमारे लिए कल्याणकारिणी हो. देवगणों का दान हमारे लिए अनुकूल हो. देवगणों की मित्रता हम को मिले. हम उस मित्रता से लाभ पाएं. हम देवताओं से दीर्घ आयु प्राप्त कर जीएं. ( १५ ) यजुर्वेद - ३१५
उत्तरार्ध पच्चीसवां अध्याय तान्पूर्वया निविदा हूमहे वयं भगं मित्रमदितिं दक्षमस्रिधम्. अर्यमणं वरुणं १४ सोममश्विना सरस्वती नः सुभगा मयस्करत्.. (१६) हम मित्र देव, भग देव, अदिति देव, दक्ष देव, अर्यमा देव, वरुण देव, अश्विनी देवों व सरस्वती देवी को निमंत्रित करते हैं. हम उन का आह्वान करते हैं. वे सौभाग्यदायिनी हैं. वे हम यजमानों का कल्याण करने की कृपा करें. (१६) तन्नो वातो मयोभु वातु भेषजं तन्माता पृथिवी तत्पिता द्यौः. तद् ग्रावाणः सोमसुतो मयोभुवस्तदश्विना शृणुतं धिष्ण्या युवम्.. (१७) वायु हमारे अनुकूल होने की कृपा करें. वे हमारे लिए ओषधीय गुणों से युक्त हों. वे हमारे लिए सुखदायी वायु प्रवाहित करने की कृपा करें. माता पृथ्वी, स्वर्गलोक हमारे व सोम चुआने वाले पत्थर हमारे अनुकूल होने की कृपा करें. आप हमारी प्रार्थना सुनने की कृपा करें और हमारी प्रार्थना के अनुकूल हमें सुखी बनाएं. (१७) तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियञ्जिन्वमवसे हूमहे वयम्. पूषा नो यथा वेदसामसद् वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये.. (१८) हम उस परम शक्ति का अपनी रक्षा के लिए आह्वान करते हैं, जिस ने इस जगत् को स्थिर बनाया, जो शक्ति सभी को वशीभूत करने वाली है. पूषा देव हमारे ज्ञान व बुद्धि को बढ़ाने की कृपा करें. परम शक्ति एवं पूषा देव का हम अपने कल्याण के लिए आह्वान करते हैं. (१८) स्वस्ति न ऽ इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः. स्वस्ति नस्तार्क्ष्यो अरिष्टनेमिः स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु.. (१९) ऐश्वर्यवान इंद्र देव, सर्वज्ञाता पूषा व अनिष्ट नाशक पंखवान गरुड़ इंद्र देव हमारा कल्याण करने की कृपा करें. बृहस्पति देव व उपर्युक्त सभी देव हमारा कल्याण करने वाले हों. (१९) पृषदश्वा मरुतः पृश्निमातरः शुभंयावानो विदथेषु जग्मयः. अग्निजिह्वा मनवः सूरचक्षसो विश्वे नो देवा ऽ अवसागमन्निह.. (२०) मरुद्गण शक्तिशाली व वेगवान घोड़ों वाले हैं. अदिति देवी मरुद्गण की माता हैं. मरुद्गण सब का कल्याण करने वाले हैं. अग्नि रूपी जीभ व सूर्य रूपी आंख वाले हैं. वे हमारे लिए सभी देवताओं को साथ ले कर यहां यज्ञ में आने की कृपा करें. (२०) भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः. स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा १४ सस्तनूभिर्व्यशेमहि देवहितं यदायूः.. (२१) हे यज्ञ रक्षक देवताओ! हम कानों से कल्याणकारी वचन सुनें. हम आंखों से ३१६ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध पच्चीसवां अध्याय कल्याणकारी दृश्य देखें. हम स्वस्थ अंगों एवं स्वस्थ शरीर से आप की उपासना और वंदना करते रहें. हम आप की कृपा से पूर्ण आयु प्राप्त करें. देवगण हमारा हित साधने की कृपा करें. (२१) शतमिन्नु शरदो अन्ति देवा यत्रा नश्चक्रा जरसं तनूनाम्. पुत्रासो यत्र पितरो भवन्ति मा नो मध्या रीरिषतायुर्गन्तोः.. (२२) हे देवगण! आप की कृपा से हम सौ शरद तक जीएं. आप की कृपा से हम सौ शरद तक स्वस्थ जीएं. आप की कृपा से हम सौ शरद यानी वृद्धावस्था तक जीएं. जैसे पुत्र के लिए पिता होता है, वैसे ही हमें आप का संरक्षण मिले. जीवन के बीच में हम कभी मृत्यु न पाएं. (२२) अदितियोंरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता स पिता स पुत्रः. विश्वे देवा ऽ अदितिः पञ्च जना ऽ अदितिर्जातमदितिर्जनित्वम्.. (२३) स्वर्गलोक, अंतरिक्षलोक, जगत् माता, जगत् पिता व सभी देवगण अविनाशी हैं. पांचों जन और जो कुछ उत्पन्न है, वह अविनाशी है. जो कुछ उत्पन्न होने वाला है, वह अविनाशी है. (२३) मा नो मित्रो वरुणो अर्यमायुरिन्द्र ऽ ऋभुक्षा मरुतः परि ख्यन्. यद्वाजिनो देवजातस्य सप्तेः प्रवक्ष्यामो विदथे वीर्याणि.. (२४) मित्र, वरुण, अर्यमा, आयु, ऋभुक्ष देव, मरुद्गण इंद्र देव कभी भी हम से विमुख न हों. देवताओं में जो बल उपजा है, हम उसी बल और उन के पराक्रम की गाथा बारबार कहते हैं. (२४) यन्निर्णिजा रेक्णसा प्रावृतस्य रातिं गृभीतां मुखतो नयन्ति. सुप्राङ्जो मेम्यद्विश्वरूप ऽ इन्द्रापूष्णोः प्रियमप्येति पाथः.. (२५) जब संस्कार युक्त ऐश्वर्यमय सब को आवृत्त करने वाले देवताओं के मुख के पास हवि का अन्न ले जाया जाता है, तब अज रूप भी 'मैंमैं' करता हुआ पास आता है. वह इंद्र देव और पूषा देव के इस प्रिय पदार्थ को प्राप्त करता है. (२५) एष छागः पुरो अश्वेन वाजिना पूष्णो भागो नीयते विश्वदेव्यः. अभिप्रियं यत्पुरोडाशमर्वता त्वष्टेदेन १७ सौश्रवसाय जिन्वति.. (२६) यह बकरा जब शक्तिशाली घोड़े के सामने लाया जाता है तब यजमान चंचल घोड़े के साथ बकरे को भी मीठा अन्न (पुरोडाश) प्रदान करता है. पुरोडाश सभी को प्रिय लगता है और उस का उत्तम भाग दे कर यश पाया जाता है. (२६) यद्धविष्यमृतुशो देवयानं त्रिर्मानुषाः पर्यश्वं नयन्ति. अत्रा पूष्णः प्रथमो भाग ऽ एति यज्ञं देवेभ्यः प्रतिवेदयन्नजः.. (२७) यजुर्वेद - ३१७
उत्तरार्ध पच्चीसवां अध्याय जब यजमान हवि को तीन देवमार्गों से चारों ओर घोड़े की तरह ले जाते हैं, तब यहां यह अज पोषण का प्रथम भाग पा कर देवताओं के लिए यज्ञ का प्रतिवेदन करता है. ( २७ ) होताध्वर्युरावया अग्निमिन्धो ग्रावग्राभ ऽ उत श ᳵ स्ता सुविप्रः. तेन यज्ञेन स्वंरकृतेन स्विष्टेन वक्षणा ऽ आ पृणध्वम्.. ( २८ ) होता, अध्वर्यु, प्रतिस्थाता, आग्नीध्र, ग्रावस्तोता, प्रशास्ता, विद्वान् ब्रह्मा आदि हे यजमानो! आप उस यज्ञ से इच्छित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रवाहों को पूर्ण करने की कृपा कीजिए. ( २८ ) यूपव्रस्का उत ये यूपवाहाश्चषालं ये अश्वयूपाय तक्षति. ये चार्वते पचन ᳵ सम्भरन्त्युतो तेषामभिगूर्तिर्न ऽ इन्वतु.. ( २९ ) खंभे का निर्माण करने वाले, उस को वहन करने वाले लोहे और लकड़ी की फिरकी के निर्माता घोड़े के लिए खंभे बनाने वाले—इन सभी लोगों का कार्य हमारे यज्ञ का हित साधने वाला हो. ( २९ ) उप प्रागात्सुन्मनेधायि मन्म देवानामाशा ऽ उप वीतपृष्ठः. अन्वेनं विप्रा ऽ ऋषयो मदन्ति देवानां पुष्टे चकृमा सुबन्धुम्.. ( ३० ) हम अच्छे मन से यज्ञ का फल पाएं. यह घोड़ा देवताओं की भी इच्छा पूरी करने का सामर्थ्य रखता है. देवताओं को भी आनंदित करता है. देवगण भी इसे अपना मित्र मानते हैं. ब्राह्मण तथा ऋषिगण इस का अनुमोदन करने की कृपा करें. ( ३० ) यद्वाजिनो दाम सन्दानमर्वतो या शीर्षण्या रशना रज्जुरस्य. यद्वा घास्य प्रभृतमास्ये तृण ᳵ सर्वा ता ते अपि देवेष्वस्तु.. ( ३१ ) इस शक्तिशाली और चंचल को नियंत्रण में रखने के लिए गरदन का बंधन देवताओं को समर्पित हो. इस शक्तिशाली को नियंत्रण में रखने के लिए कमर तथा सिर के बंधन देवताओं को समर्पित हों. इस शक्तिशाली व घास, तृण आदि देवताओं को नियंत्रण में रखने के लिए गरदन का बंधन देवताओं को समर्पित हो. ( ३१ ) यदश्वस्य क्रविषो मक्षिकाश यद्वा स्वरौ स्वधितौ रिप्तमस्ति. यद्धस्तयोः शमितुर्यन्नखेषु सर्वा ता ते अपि देवेष्वस्तु.. ( ३२ ) जिस अश्व का बचाखुचा भाग मक्खियां खाती हैं, जो भाग यजमान के हाथों और अंगुलियों में लगा रहता है, वह सब भी देवताओं के प्रति समर्पित हो. ( ३२ ) यदूवध्यमुदरस्यापवाति य ऽ आमस्य क्रविषो गन्धो अस्ति. सुकृता तच्छमितारः कृण्वन्तूत मेध ᳵ शृतपाकं पचन्तु.. ( ३३ ) ३१८ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध पच्चीसवां अध्याय यज्ञ के उदर ( पेट ) में जो अधपचे अन्न, गंध आदि निकल रहे हैं, उन की शांति भलीभांति किए गए यज्ञ के उपचार से हो. वे पचें यह पाचन देवगणों के अनुसार हो. ( ३३ ) यत्ते गात्रादग्निना पच्यमानादभि शूलं निहतस्यावधावति. मा तद्भूम्यामाश्रिषन्मा तृणेषु देवेभ्यस्तदुशद्भ्यो रातमस्तु.. ( ३४) जो आप के अग्नि से पचाए जाते हुए अंग, ( दर्द ) से शूल इधरउधर दौड़ते हुए गिर गए हैं, उन्हें भूमि पर ही मत पड़ा रहने दीजिए. कहीं वे तिनकों में ही न मिल जाएं. वे भी देवताओं का भोजन बनें. ( ३४ ) ये वाजिनं परिपश्यन्ति पक्वं य ऽ ईमाहुः सुरभिर्निर्हुरेति. ये चार्वतो मा ऴ् सभिक्षामुपासत ऽ उतो तेषामभिगूर्तिर्न ऽ इन्वतु.. ( ३५) जो इस अन्न व पुरोडाश को पकता हुआ देखते हैं, जो इस पुरोडाश को सुगंध युक्त बनाते हैं, जो इस अन्न से बने पुरोडाश को मांगते हैं, उन का पुरुषार्थ भी हमारे लिए फलीभूत हो. ( ३५ ) यन्नीक्षणं माँस्पचन्या ऽ उखाया या पात्राणि यूष्ण ऽ आसेचनानि. ऊष्मण्यापिधाना चरूणामङ्काः सूनाः परि भूषन्त्यश्वम्.. ( ३६) जो पुरोडाश को पात्र में बनता ( पकता ) हुआ देखते हैं, जो पात्र को मांज कर पूरी तरह साफ करते हैं, ऊष्मा को रोकने वाले चरु आदि को गोद में रखते हैं, वे सभी इस यज्ञ को भूषित करने की कृपा करें. ( ३६ ) मा त्वानिन्धर्न्नयीद्धूमगन्धिर्मोखा भ्राजन्त्यभि विक्त जघ्रिः. इष्टं वीतमभिगूर्तं वषट्कृतं तं देवासः प्रति गृभ्णन्त्यश्वम्.. ( ३७) हे पुरोडाश! धुएं वाली आग और गंध आप को पीड़ा न दें. चमकीला उखा आप को पीड़ा न दे. इस प्रकार पके हुए पुरोडाश को देवगण भलीभांति स्वीकार करते हैं. ( ३७ ) निक्रमणं निषदनं विवर्तनं यच्च पड्वीशमर्वतः. यच्च पपौ यच्च घासिं जघास सर्वा ता ते अपि देवेष्वस्तु.. ( ३८) हे यज्ञ अश्व! आप का निकलना, बैठना, हिलना, पलटना, खानापीना आदि सभी क्रियाएं देवताओं के ही बीच में हों. ( ३८ ) यदश्वाय वास ऽ उपस्तृणन्त्यधीवासं या हिरण्यान्यस्मै. सन्दानमर्वन्तं पड्वीशं प्रिया देवेष्वा यामयन्ति.. ( ३९) अश्व का वस्त्र, ऊपर का आवरण वस्त्र, अधिवास ( नीचे का वस्त्र ) सोने के यजुर्वेद - ३१९
उत्तरार्ध पच्चीसवां अध्याय आभूषण, सिर एवं पैर को बांधने की मेखलाएं आदि सभी देवताओं को प्रसन्न करने की कृपा करें. ( ३९ ) यत्ते सादे महसा शूकृतस्य पाष्ण्या वा कशया वा तुतोद. स्रुचेव ता हविषो अध्वरेषु सर्वा ता ते ब्रह्मणा सूदयामि.. (४०) हे अश्व! जो आप के पीड़क हैं, जो पीछे और नीचे के भाग के पीड़क हैं, वे त्रुटियां और यज्ञों में हवि संबंधी अन्य त्रुटियां ब्राह्मण स्रुवा की घी की आहुतियों से सुधारते हैं. ( ४० ) चतुस्त्रि ᳵशद्वाजिनो देवबन्धोर्वङ्क्रीरश्वस्य स्वधितिः समेति. अच्छिद्रा गात्रा वयुना कृणोत परुष्परुरनुघुष्या विशस्त.. (४१) हे यजमानो! यह अश्व देवताओं का बंधु है. यह धारण की क्षमता रखता है. सामर्थ्यवान है. चौंतीस शक्तियों से युक्त हो. शरीर छिद्र रहित ( दोष रहित ) हो. देवगण इस की सभी कमियों को दूर करने की कृपा करें. ( ४१ ) एकस्त्वष्टुरश्वस्या विशस्ता द्वा यन्तारा भवतस्तथ ऋतुः. या ते गात्राणामृतुथा कृणोमि ता ता पिण्डानां प्र जुहोम्यग्नौ.. (४२) वर्ष त्वष्टा ( सूर्य ) रूप अश्व को बांटता है. वह उसे दो भागों ( उत्तरायण व दक्षिणायन ) में बांटता है. दोनों भागों को ऋतुओं ( छह ) में बांटता है. शरीर के अंगों के स्वास्थ्य के लिए ऋतु के अनुसार पदार्थों की आहुति अग्नि में भेंट की जाती है. ( ४२ ) मा त्वा तपत्प्रिय ऽ आत्मापियन्तं मा स्वधितिस्तन्व ऽ आ तिष्ठिपत्ते. मा ते गृध्नुरविशस्तातिहाय छिद्रा गात्राण्यसिना मिथू कः... (४३) हे अश्व! अपना प्यारा आत्मतत्त्व सदा आप धारण करते रहें. वह प्यारा आत्मतत्त्व कभी आप को छोड़ कर न जाएं. बांटने वाली शक्तियां कभी आप के शरीर और अंगों पर अधिकार न कर सकें. अनिपुण व्यक्ति भी आप के शरीर तथा किसी अंग पर तलवार न चला सके. उस की तलवार आप के दोषों पर चले. ( ४३ ) न वा उ एतन्म्रियसे न रिष्यसि देवाँ २ इदेषि पथिभिः सुगेभिः. हरी ते युञ्जा पृषती अभूतामुपास्थाद्वाजी धुरि रासभस्य.. (४४) हे अश्व! न आप मारते हैं, न मरते हैं. आप सुगम पथ से देवताओं के पास जाते हैं. घोड़े आप के रथ में जुड़ कर पुष्ट होते हैं. वे शब्द मात्र से ही रथ में जुड़ जाते हैं. घोड़े बहुत वेगवान हैं. ( ४४ ) सुगव्यं नो वाजी स्वश्व्यं पु ᳵश सः पुत्राँ २ उत विश्वापुषं ᳵश रयिम्. अनागास्त्वं नो अदितिः कृणोतु क्षत्रं नो अश्वो वनतां ᳵश हविष्मान्.. (४५) ३२० - यजुर्वेद 632/20
उत्तरार्ध पच्चीसवां अध्याय यह अच्छी तरह देवताओं को प्राप्त कराने वाला है. यह हमें अपने वश में रखे, पुत्र व पौत्र प्रदान करे. हम सब को धन से पुष्ट करे व गरीबी व पाप से दूर रखे. हमें बलवान बनाए. हम इस के लिए हविमान हैं. ( ४५ ) इमा नु कं भुवना सीषधामेन्द्रश्च विश्वे च देवा:. आदित्यैरिन्द्र: सगणो मरुद्भिरस्मभ्यं भेषजा करत्. यज्ञं च नस्तन्वं च प्रजां चादित्यैरिन्द्र: सह सीषधाति.. (४६) इंद्र देव तथा सभी देव सभी भुवनों को अपने वश में रखें. आदित्यगण मरुद्गण तथा इंद्र देव अपने गण सहित हमें निरोग रखें. यह यज्ञ इंद्र देव और आदित्यगण सहित हमारे शरीर और प्रजाओं को अपने वश में रखें. ( ४६ ) अग्ने त्वं नो अन्तम ऽ उत त्राता शिवो भवा वरूथ्य:. वसुरग्निर्वसुश्रवा ऽ अच्छा नक्षि द्युमत्तम १७ रयिं दा:. तं त्वा शोचिष्ठ दीदिव: सुम्नाय नूनमीमहे सखिभ्य:.. (४७) हे अग्नि! आप अन्यतम, त्राता व कल्याणकारी हैं. हे अग्नि! आप हितैषी हैं. आप हिंसकों व आततायियों से हमारी रक्षा करें. आप प्रख्यात हैं. हमारी रक्षा करें. आप धनवान हैं. हमारी रक्षा करें. आप प्रकाशवान हैं. हमारी रक्षा करें. आप स्वर्गलोक को भी प्रकाशित करते हैं. आप हमें मित्रों सहित धन और वैभव दीजिए. हम अच्छे मन से आप के लिए प्रार्थना करते हैं. ( ४७ ) यजुर्वेद - ३२१
छब्बीसवां अध्याय
छब्बीसवां अध्याय अग्निश्च पृथिवी च सन्नते ते मे सं नमतामदो वायुश्चान्तरिक्षं च सन्नते ते मे सं नमतामद ऽ आदित्यश्च द्यौश्च सन्नते ते मे सं नमतामद ऽ आपश्च वरुणश्च सन्नते ते मे सं नमतामदः. सप्त सꣳसदो अष्टमी भूतसाधनी. सकामाँ २ अध्वनस्कुरु संज्ञानमस्तु मेमुना.. (१) अग्नि और पृथिवी देव हमारे अनुकूल होने की कृपा करें. हमें आनंद प्रदान करने की कृपा करें. वायु और अंतरिक्ष देव हमारे अनुकूल होने की कृपा करें. हमें आनंद प्रदान करने की कृपा करें. आदित्य और स्वर्गलोक हमारे अनुकूल होने की कृपा करें. हमें आनंद प्रदान करने की कृपा करें. जल और वरुण देव हमारे अनुकूल होने की कृपा करें. हमें आनंद प्रदान करने की कृपा करें. सात संसद ( अग्नि, वायु, अंतरिक्ष, सूर्य, आकाश, जल और वरुण ) और आठवीं पृथिवी को हमारे अनुकूल बनाने की कृपा करें. आप की कृपा से हमारे यज्ञ सकाम ( कामना को फलीभूत करने वाले ) हों. आप की कृपा से हमें संज्ञान ( श्रेष्ठ पूर्ण ज्ञान ) हो. ( १ ) यथेमां वाचं कल्याणी मावदानि जनेभ्यः. ब्रह्मराजन्याभ्या ꣳ शूद्राय चार्याय च स्वाय चारणाय च. प्रियो देवानां दक्षिणायै दातुरिह भूयासमयं मे कामः समृध्यतामुप मादो नमतु.. (२) जैसे यह वाणी लोगों के लिए कल्याणकारी होती है, वैसे ही हमारे लिए कल्याणकारी हो. ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के लिए आप की वाणी कल्याणकारी हो. दक्षिणा देने वाले देवताओं के प्रिय हों. हमारी इच्छाएं फलीभूत हों. हमें आनंद प्राप्त हो. ( २ ) बृहस्पते अति यदर्यो अर्हाद् द्युमद्विभाति क्रतुमज्जनेषु. यद्दीदयच्छवस ऽ ऋतप्रजात तदस्मासु द्रविणं धेहि चित्रम्. उपयामगृहीतोसि बृहस्पतये त्वैष ते योनिर्बृहस्पतये त्वा.. (३) हे बृहस्पति देव! आप यज्ञ में लोगों द्वारा पूजनीय हैं. आप स्वर्गलोक में सुशोभित होते हैं. आप सब के स्वामी होने योग्य हैं. आप ऋत और इच्छा शक्ति से सारी प्रजा की रक्षा करते हैं. आप हमें श्रेष्ठ धन प्रदान करने की कृपा कीजिए. आप ३२२ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध छब्बीसवां अध्याय
उत्तरार्ध छब्बीसवां अध्याय अद्भुत हैं. आप को उपयाम पात्र में ग्रहण किया गया है. इसीलिए आप बृहस्पति हैं. उपयाम आप का मूल स्थान है. ( ३ ) इन्द्र गोमन्निहा याहि पिबा सोम ष्ठं शतक्रतो. विद्यद्भिर्ग्रावभिः सुतम्. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा गोमत ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा गोमते.. (४) हे इंद्र देव! आप गोमान और सैकड़ों यज्ञ करने वाले हैं. आप ( यज्ञ में ) पधारिए. सोमरस पीने की कृपा कीजिए. हम ने पत्थरों से कूट कर, निचोड़ कर सोमरस तैयार किया है. आप गोमान हैं. हम आप को गोमान इंद्र देव के लिए उपयाम में ग्रहण करते हैं. उपयाम आप का मूल स्थान है. ( ४ ) इन्द्रा याहि वृत्रहन्पिबा सोम ष्ठं शतक्रतो. गोमद्भिर्ग्रावभिः सुतम्. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा गोमत ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा गोमते.. (५) हे इंद्र देव! आप वृत्र नाशक और सैकड़ों यज्ञ करने वाले हैं. आप पधारिए. आप सोमरस पीने की कृपा कीजिए. आप के पुत्रों ने पत्थरों से कूट कर सोमरस आप के लिए तैयार किया है. हम ने आप को गोमान इंद्र देव के लिए उपयाम में ग्रहण किया है. वही आप का मूल स्थान है. ( ५ ) ऋतावानं वैश्वानरममृतस्य ज्योतिष्पतिम्. अजस्रं घर्ममीमहे. उपयामगृहीतोसि वैश्वानराय त्वैष ते योनिर्वैश्वानराय त्वा.. (६) हे वैश्वानर ( अग्नि )! आप ऋतवान ( सत्यवान ) व अमर हैं. आप प्रकाश के स्वामी हैं. हम आप से अजस्र बल चाहते हैं. आप को उपयाम में ग्रहण किया गया है. आप को अग्नि के लिए उपयाम में ग्रहण किया गया है. वही आप का मूल स्थान है. ( ६ ) वैश्वानरस्य सुमतौ स्याम राजा हि कं भुवनानामभिश्रीः. इतो जातो विश्वमिदं वि चष्टे वैश्वानरो यतते सूर्येण. उपयामगृहीतासि वैश्वानराय त्वैष ते योनिर्वैश्वानराय त्वा.. (७) हम वैश्वानर देव की सुमति जैसी सुमति पाएं. वैश्वानर देव संसार के राजा, संसार की शोभा हैं. व देव संसार का निरीक्षण करते हैं और यहीं उत्पन्न हुए हैं. वे सूर्य के समान प्रकाशवान हैं. हम उन को उपयाम में ग्रहण करते हैं. वही उन का मूल स्थान है. ( ७ ) वैश्वानरो न ऽ ऊतय ऽ आ प्र यातु परावतः. अग्निरुक्थेन वाहसा. उपयामगृहीतोसि वैश्वानराय त्वैष ते योनिर्वैश्वानराय त्वा.. (८) यजुर्वेद - ३२३