योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
उत्पत्ति प्रकरण । २०६
अनुभव संवित् में होता है तैसे ही सिद्धता होती है अन्यथा नहीं होती । जिसके निश्चय में ये शरीरादिक आकाशरूप हैं उनको आधिभौतिकता का अनुभव नहीं होता और जिसके निश्चय में आधिभौतिकता दृढ़ हो रही है उनको अन्तवाहकता का अनुभव नहीं होता । जिस पुरुष को पूर्वार्ध का अनुभव नहीं उनको उत्तरार्ध में गमन नहीं होता-जैसे वायु का चलना ऊर्ध्व नहीं होता, तिरछा स्पर्श होता है, अग्नि का चलना अधः को नहीं होता और जल का ऊर्ध्व को नहीं होता । जैसे आदि चेतन संवित् में प्रवृत्ति हुई है वैसे ही अब तक स्थित है । इससे जिसको अन्त-वाहक शक्ति उदय हुई है उसको आधिभौतिक नहीं रहती और जिसको आधिभौतिकता दृढ़ है उनको अन्तवाहक शक्ति उदय नहीं होती । हे रामजी ! जो पुरुष छाया में बैठा हो उसको धूप का अनुभव नहीं होता और जो धूप में बैठा है उसको छाया का अनुभव नहीं होता । अनुभव उसी का होता है जिसकी चित्त में दृढ़ता होती है अन्यथा किसी को कदाचित् नहीं होता । हे रामजी ! जैसा दृढ़ भाव चित्तसंवित् में होता है तो जब तक और प्रतीत नहीं होती तब तक वैसे ही सिद्धता होती है । जैसे रस्सी में भ्रम से सर्प भासता है और मनुष्य भय से कंपायमान होता है, सो कंपना भी तब तक है जब तक सर्प का अनुभव अन्यथा नहीं होता; जब रस्सी का अनुभव उदय होता है तब सर्पभ्रम नष्ट होता है वैसे ही जैसा अनुभव चित्त संवित् में दृढ़ होता है उसी का अनुभव होता है । यह वार्त्ता बालक भी जानता है कि जैसी जैसी चित्त की भावना होती है वैसा ही रूप भासता है निश्चय और हो और अनुभव और प्रकार हो ऐसा कदाचित् नहीं होता । हे रामजी ! जिनको ये आकार स्वप्न संकल्पपुर की नाईं हुए हैं सो आकाशरूप हैं । जिनको ऐसा निश्चय हो उनको कोई रोक नहीं सकता । औरों का भी चित्तमात्र शरीर है पर जैसा जैसा संवेदन दृढ़ हुआ है वैसा ही वैसा आपको जानता है । हे रामजी ! आदि में सब कुछ आत्मा से स्वाभाविक उपजा है सो अकारणरूप है और पीछे प्रमाद में द्वैतकार्य कारणरूप होके स्थित हुआ है । हे रामजी ! आकाश तीन हैं-एक चिदाकाश, दूसरा चित्ताकाश
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और तीसरा भूताकाश है । उनमें वास्तव एक चिदाकाश है और भावना करके भिन्न २ कल्पना हुई है । आदि शुद्ध अचेत्, चिन्मात्र चिदाकाश में जो संवेदन फुरा है उसका नाम चित्ताकाश है और उसी में यह सम्पूर्ण जगत् हुआ है । हे रामजी ! चित्तरूपी शरीर सर्वगत होकर स्थित हुआ है जैसा जैसा उसमें स्पन्द होता है वैसा ही वैसा होके भासता है । जितने कुछ पदार्थ हैं उन सबों में व्याप रहा है; त्रसरेणु के अन्तर भी सूक्ष्मभाव से स्थित हुआ और आकाश के अन्तर भी व्याप रहा है । पत्र फल उसी से होते हैं, जल में तरङ्ग होके स्थित हुआ है; पर्वत के भीतर यही फुरता, मेघ होके भी यही वर्षता और जल से वरफ भी यह चित्त ही होता है । अनन्त आकाश परमाणुरूप भीतर बाहर सर्वजगत् में यही है । जितना जगत् है वह चित्तरूप ही है और वास्तव में आत्मा से अनन्त रूप है । जैसे समुद्र और तरङ्ग में कुछ भेद नहीं वैसे ही आत्मा और चित्त में कुछ भेद नहीं । जिस पुरुष को ऐसे अखण्डसत्ता आत्मा का अनुभव हुआ है और जिसका सर्ग के आदि में चित्त ही शरीर है और आधिभौतिकता को नहीं प्राप्त हुआ वह महाआकाशरूप है उसको पूर्व का स्वभाव स्मरण रहा है इस कारण उसका अन्तवाहक शरीर है । हे रामजी ! जिस पुरुष को अन्तवाहकता में अहंप्रत्यय है उसको सब जगत् संकल्पमात्र भासता है वह जहाँ जाने की इच्छा करता है वहाँ जाता है । उसको कोई आवरण नहीं रोक सकता । जिसको आधिभौतिकता में निश्चय है उसको अन्तवाहक शक्ति नहीं होती । हे रामजी ! सबही अन्तवाहकरूप हैं और भ्रम से अनहोता आधिभौतिकता देखते हैं । जैसे मरुस्थल में जल भासता है और जैसे स्वप्न में बन्ध्या के पुत्र का सद्भाव होता है वैसे ही आधिभौतिक जगत् भासता है । जैसे जल शीतलता से वरफ हो जाता है वैसे ही जीव प्रमाद से अन्तवाहक से आधिभौतिक शरीर होता है । इतना सुन रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! चित्त में क्या है; कैसे होता है और कैसे नहीं होता; यह जगत् कैसे चित्तरूप है और क्षण में अन्यथा कैसे हो जाता है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! एक एक जीव प्रति चित्त होता है । जैसा जैसा चित्त है वैसी ही वैसी
उत्पत्ति प्रकरण । २११
शक्ति है । चित् में जगत् भ्रम होता है, क्षण में कल्प और सम्पूर्ण जगत् उदय हो आता है और क्षण में सम्पूर्ण लय होता है । किसी को निमेष में कल्प हो आता है और किसी को क्रम भासता है सो मन लगाकर सुनिये । हे रामजी ! जब मरने की मूर्च्छा होती है तो उस महाप्रलय-रूप मृत्यु मूर्च्छा के अनन्तर नाना प्रकार का जगत् फुर आता है जैसे स्वप्न में सृष्टि फुर आती है और जैसे संकल्प का पुर भासता है वैसे ही मृत्यु मूर्च्छा के अनन्तर सृष्टि भासती है । जैसे महाप्रलय के अनन्तर आदि विराटरूप ब्रह्मा होता है वैसे ही मृत्यु के अनन्तर इसका अनुभव होता है । यह भी विराट् होता है, क्योंकि इसका मनरूपी शरीर होता है । रामजी बोले, हे भगवन् ! मृत्यु के अनन्तर जो सृष्टि होती है वह स्मृति से होती है, स्मृति बिना नहीं होती, इसलिये मृत्यु के अनन्तर जो सृष्टि हुई तो सकारणरूप हुई ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब महाप्रलय होता है तब हरि हरादिक सबही विदेहमुक्त होते हैं । फिर स्मृति का सम्भव कैसे हो ? हमसे आदि ले जो बोध आत्मा है जब विदेह मुक्त हुए हैं तब स्मृति कैसे सम्भव हो ? अब के जो जीव हैं उनका जन्म-मरण स्मृति कारण से होता है, क्योंकि मोक्ष नहीं होता-मोक्ष का उनको अभाव है । हे रामजी ! जब जीव मरते हैं तब उन्हें मृत्यु-मूर्च्छा होती है, पर कैवल्यभाव में स्थित नहीं होते; मूर्च्छा से उनका संवित् आकाशरूप होता है उससे फिर चित्तसंवेदन फुर आता है । तब उन्हें क्रम करके जगत् फुर आता है, पर जब बोध होता है तब तन्मात्रा और काल, क्रिया, भाव, अभाव, स्थावर-जङ्गम जगत् सब आकाशरूप हो जाता है । जिनका संवेदन दृश्य की ओर धावता है उनको मृत्यु-मूर्च्छा के अनन्तर अज्ञान संवेदन फुरता है, उससे उन्हें शरीर और इन्द्रियाँ भास आती हैं । वह आन्त-वाहिक शरीर है परन्तु चिरकाल की प्राप्ति करके आधिभौतिक होता भासता है । तब देश, काल, क्रिया, आधार, आधेय उदय होकर स्थित होते हैं । जैसे वायु मन्द और निस्पन्दरूप है, पर जब स्पन्द होता है तब भासता है और निस्पन्द होने से नहीं भासता वैसे ही संवेदन
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से जब जगत् भासता है तब जानता है कि मैं यहाँ उपजा हूँ। जैसे स्वप्न में अङ्गना के स्पर्श का अनुभव होता है वह मिथ्या है वैसे ही भ्रम से जो आपको उपजा देखता है वह भी मिथ्या है। हे रामजी! जहाँ यह जीव मृतक होता है वहीं जगतभ्रम देखता है। वास्तव में जीव भी आकाशरूप है और जगत् भी आकाशरूप है। अज्ञान से जीव आपको उपजा मानता है और नाना जगतभ्रम देखता है कि यह नगर है, यह पर्वत है, ये सूर्य और चन्द्रमा हैं, ये तारागण हैं और जरा-मरण, आधि-व्याधि सङ्कट से व्याकुल होता है। वह भाव-अभाव, भय, स्थूल, सूक्ष्म, चर-अचर, पृथ्वी, नदियाँ, भूत-भविष्य-वर्त्तमान; क्षय-अक्षय और भूमि को भी देखता है और समझता है कि में उपजा हूँ, अमुक का पुत्र हूँ, यह मेरा कुल है, यह मेरी माता है, ये मेरे बांधव हैं, इतना धन हमको प्राप्त हुआ है इत्यादि अनेक वासना-जालों में दुःखी होता है और कहता है कि यह सुकृत है और यह दुष्कृत है; प्रथम में बालक था; अब मेरा यह अवस्था हुई और यह मेरा वर्ण है इत्यादि अनेक जगत् कल्पना हरएक जीव को उदय होती है। हे रामजी! संसाररूपी एक वृक्ष उगा है; चित्तरूपी उसका बीज है; तारागण उसके फूल हैं और चञ्चल मेघ पत्र हैं। जङ्गम, जीव, मनुष्य, देवता, दैत्यादिक पक्षी उस पर बैठनेवाले हैं और रात्रि उसके ऊपर धूलि है; समुद्र उसकी तलावड़ी है; पर्वत उसमें सिलबट्टे हैं और अनुभवरूप अंकुर हैं। जहाँ जीव मरता है वहीं क्षण में ये सब देखता है। इसी प्रकार एक २ जीव को अनेक जगत् भासते हैं। हे रामजी! कितने कोटि ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, पवन और सूर्यादिक हुए हैं। जहाँ सृष्टि है वहीं ये होते हैं इससे चिद्अणु में अनेक सृष्टि हैं, जीव भी अनन्त हुए हैं और उन्हीं में सुमेरु, मण्डल, द्वीप और लोक भी बहुतेरे हुए हैं। जो चिद्अणु में ही सृष्टि का अन्त नहीं तो परब्रह्म में अन्त कहाँ से आवे? वास्तव में है नहीं; जैसे पर्वत की दीवार में शिल्पी पुतलियाँ कल्पे तो कुछ है नहीं वैसे ही जगत् चिदाकाश में नहीं है केवल मनो-मात्र ही है। हे रामजी! मनन और स्मरण भी चिदाकाशरूप है और
उत्पत्ति प्रकरण ।
चिदाकाश में मनन और स्मरण है। जैसे तरङ्ग भी जलरूप हैं और जल ही में होते हैं; जल से इतर तरङ्ग कुछ वस्तु नहीं हैं; वैसे ही मनन और स्मरण भी चिदाकाशरूप जानों। हे रामजी! दृश्य कुछ भिन्न वस्तु नहीं है; द्रष्टा ही दृश्य की नाईं होकर भासता है। जैसे मनाकाश नाना प्रकार हो भासता है वैसे ही चिदाकाश का प्रकाश नाना प्रकार जगत् होकर भासता है। यह विश्व सब चिदाकाशरूप है। हमको तो ऐसे ही भासता है पर तुमको अर्थाकाशरूप भासता है, इसी कारण कहा कि लीला और सरस्वती आकाशरूप, सर्वज्ञ स्वच्छरूप और निराकार थीं। वे जहाँ चाहती थीं वहाँ जाय प्राप्त होती थीं और जैसी इच्छा करती थीं वैसी सिद्धि होती थी, क्योंकि जिसको चिदाकाश का अनुभव हुआ है उसको कोई रोक नहीं सकता। सर्वरूप होकर जो स्थित हुआ उसे गृह में प्रवेश करना क्या आश्चर्य है। वह तो अन्तवाहक रूप है।
इति श्रीयोगवासिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे लीलोपाख्याने स्मृत्यनुभववर्णनन्नामा- ष्टाविंशतितमस्सर्गः ॥ २८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जब दोनों देवियाँ जिनकी चन्द्रमा के समान कान्ति थी राजा के अन्तःपुर में संकल्प मे प्रवेशकर सिंहासन पर स्थित हुईं तो बड़ा प्रकाश अन्तःपुर में हुआ और शीतलता से व्याधि ताप शान्त हुआ। जैसे नन्दनवन होता है वैसे ही अन्तःपुर हो गया और जैसे प्रातःकाल में सूर्य का प्रकाश होता है वैसे ही देवियों के प्रकाश से अन्तःपुर पूर्ण हुआ, मानों देवियों के प्रकाश से राजा पर अमृत की सींचना हुई। तब राजा ने देखा कि मानों सुमेरु के शृङ्ग से दो चन्द्रमा उदय हुए हैं। ऐसे देख के वह विस्मय को प्राप्त हुआ और चिन्तना की कि ये देवियाँ हैं। इसलिये जैसे शेषनाग की शय्या मे विष्णु भगवान् उठते हैं वैसे ही उसने उठके और वस्त्रों को एक ओर करके हाथों में पुष्प लिये और हाथ जोड़ के देवियों के चरणों पर चढ़ाये और माथा टेक के पद्मासन बाँध पृथ्वी पर बैठ गया और कहने लगा, हे देवियो! तुम्हारी जय हो। तुम जन्म दुःख ताप के शान्त करनेवाले चन्द्रमा हो और अपूर्व सूर्य हो-अर्थात् पूर्व सूर्य के प्रकाश से बाह्यतम नष्ट
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होता है और तुम्हारे प्रकाश से अन्तर अज्ञानतम भी नष्ट होता है, इससे अपूर्व सूर्य हो। इसके अनन्तर देवी मन्त्री को जो राजा के पास नदी के तट के फलों के वृक्षों के समान सोया था जन्म और कुल के कहावने के निमित्त संकल्प से जगाया और मन्त्री उठके फूलों से देवियों का पूजन कर राजा के समीप जा बैठ गया। तब सरस्वती कहने लगी, हे राजन्! तू कौन है, किसका पुत्र है और कब तूने जन्म लिया है? हे रामजी! जब इस प्रकार देवी ने पूछा तब मन्त्री, जो निकट बैठा था, बोला हे देवी! तुम्हारी कृपा से राजा का जन्म और कुल में कहता हूँ। इक्ष्वाकुकुल में एक राजा हुआ था जिसके कमल की नाईं नेत्र थे और वह श्रीमान् था, उसका नाम कुन्दरथ था। निदान उसका पुत्र बुधरथ हुआ, बुधरथ के सिंधुरथ हुआ; उसका पुत्र महारथ हुआ; महारथ का पुत्र विष्णुरथ हुआ; उसका पुत्र कलारथ हुआ; कलारथ का पुत्र सयरथ हुआ; सयरथ का पुत्र नभरथ हुआ और उस नभरथ के बड़े पुण्य करके यह विदूरथ पुत्र हुआ। जैसे क्षीरसमुद्र से चन्द्रमा निकला है वैसे ही सुमित्रा माता से यह उपजा है। जैसे गौरीज से स्वामिकार्तिक उत्पन्न हुए हैं वैसे ही यह सुमित्रा से उत्पन्न हुए हैं। हे देवि! इस प्रकार तो हमारे राजा का जन्म हुआ है। जब यह दश वर्ष का हुआ तब पिता इसको राज्य देकर आप वन को चला गया और उस दिन से इसने धर्म की मर्यादा से पृथ्वी की पालना की और बड़े पुण्य किये हैं। उन्हीं पुण्यों का फल तुम्हारा दर्शन अब इसको हुआ है। हे देवि! जो तुम्हारे दर्शन के निमित्त बहुत वर्षों तप करते हैं उनको भी तुम्हारा दर्शन पाना कठिन है, इससे इसके बड़े पुण्य हैं कि तुम्हारा दर्शन प्राप्त हुआ। हे रामजी! इस प्रकार कहके जब मन्त्री तूष्णीम् हुआ तब देवीजी ने कृपा करके राजा विदूरथ के शीश पर हाथ रखकर कहा, हे राजन्! तुम अपने पूर्वजन्म को विवेकदृष्टि करके देखो कि तुम कौन हो? देवी के हाथ रखने से राजा के हृदय का अज्ञानतम निवृत्त हो गया; हृदय प्रफुल्लित हुआ और देवी के प्रसाद से राजा को पूर्व की स्मृति फुर आई। लीला और पद्म का सम्पूर्ण वृत्तान्त स्मरण करके कहने लगा हे देवि
उत्पत्ति प्रकरण । २१५
बड़ा अचरज है कि यह जगत् मन से रचा है। यह मैंने तुम्हारे प्रसाद से जाना कि मैं राजा पद्म था और लीला मेरी स्त्री थी। मुझको मृतक हुए एक दिन ऐसे में भासा और यहाँ में सो वर्ष का हुआ हूँ सो अब तक भ्रम से मैंने नहीं जाना; अब प्रत्यक्ष जानता हूँ। सौ वर्षों में जो अनेक कार्य मैंने किये हैं वह सब मुझको स्मरण होते हैं और अपने प्रपितामह और अपनी बाल्यावस्था व यौवन अवस्था मित्र और बान्धव भी स्मरण आते हैं—यह बड़ा आश्चर्य हुआ है। सरस्वती बोली, हे राजन्! जब जीव मृतक होते हैं तब उनको बड़ी मूर्च्छा होती है। उस मूर्च्छा के अनन्तर और-और लोक भास आते हैं और एक मुहूर्त में वर्षों का अनुभव होता है। जैसे स्वप्न में एक मुहूर्त में अनेक वर्षों का अनुभव होता है, वैसे ही तुझको मृत्यु-मूर्च्छा के अनन्तर यह लोकभ्रम भासता है। हे राजन्! जहाँ तुम पद्म राजा थे उस गृह में मृतक हुए तुमको एक मुहूर्त बीता है और यहाँ तुमको बहुतेरे वर्षों का अनुभव हुआ है। इससे भी जो पिछला वृत्तान्त है वह सुनिये। हे राजन्! पहाड़ के ऊपर एक ग्राम था उसमें एक वशिष्ठ ब्राह्मण रहता था और अरुन्धती उसकी स्त्री थी। वह दोनों मन्दिर में रहते थे। अरुन्धती ने मुझसे वर लिया कि जब मेरा भर्त्ता मृतक हो तब उसका जीव इसी मण्डपाकाश में रहे। निदान जब वह मृतक हुआ तब उसकी पुर्यष्टक उसी मन्दिर में रही पर उसके संवित् में राजा की दृढ़ वासना थी इसलिये उस मण्डपाकाश में उसको पद्म राजा की सृष्टि फुर आई और अरुन्धती उसकी स्त्री लीला होकर उसको प्राप्त हुई राजा पद्म का मण्डप उस ब्राह्मण के मण्डपाकाश में स्थित हुआ और फिर उस मण्डप में जब तू राजा पद्म मृतक हुआ तब तेरे संवित् में नाना प्रकार के आरम्भसंयुक्त यह जगत् फुर आया। हे राजन्! यह तेरा जगत् पद्म राजा के हृदय में फुर आया है और पद्म राजा के मण्डपाकाश में स्थित है। पद्म राजा का जगत् उस वशिष्ठ ब्राह्मण के मण्डपाकाश में स्थित है और वही वशिष्ठ ब्राह्मण तुम विदूरथ राजा हुए हो। हे राजन्! यह सब जगत् प्रतिभामात्र है और मन की कल्पना से भासता है—उपजा कुछ नहीं। इतना सुन विदूरथ बोले, बड़ा आश्चर्य
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है कि जैसे मेरा यह जन्म भ्रमरूप हुआ वैसे ही इक्ष्वाकु का कुल और मेरे माता पिता सब भ्रमरूप हुए हैं। उसमें मैं जन्म लेके बालक हुआ और जब दश वर्ष का था तब पिता ने मुझको राज्य देके वनवास लिया। फिर मैंने दिग्विजय करके प्रजा की पालना की और शत वर्षों का मुझको अनुभव होता है। फिर मुझको दारुण अवस्था युद्ध की इच्छा हुई है और युद्ध करके रात्रि को में गृह में आया। अब तुम दोनों देवियाँ मेरे गृह में आई और मैंने तुम्हारी पूजा की। तब तुम दोनों में से एक देवी ने कृपा करके मेरे शीश पर हाथ रक्खा है उसी से मुझको ज्ञान प्रकाश हुआ है जैसे सूर्य के प्रकाश से कमल प्रफुल्लित होता है वैसे ही मेरा हृदय देवी के प्रकाश से प्रफुल्लित हुआ है। इनकी कृपा से में कृतकृत्य हुआ और अब मेरा सब संताप नष्ट होकर निर्वाण, समता, सुख और निर्मल पद को प्राप्त हुआ हूँ। सरस्वती बोलीं, हे राजन् ! जो कुछ तुझको भासा है वह भ्रममात्र है और नाना प्रकार के व्यवहार और लोकान्तर भी भ्रममात्र हैं, क्योंकि वहाँ मुझको मृतक हुए अभी एक मुहूर्त व्यतीत हुआ है और इसी अनन्तर में उसी मण्डपाकाश में तुझको यह जगत् भासा। पद्म राजा की वह सृष्टि ब्राह्मण के मण्डप में स्थित है और यहाँ तुझको नदियाँ, पर्वत, समुद्र, पृथ्वी आदिक भूत सम्पूर्ण जगत् भासि आये हैं। हे राजन् ! मृत्यु-मूर्च्छा के अनन्तर कभी वही जगत् भासता है, कभी और प्रकार भासता है और कभी पूर्व-अपूर्व भी भासता है। यह केवल मन की कल्पना है, पर वास्तव में असद्रूप है और अज्ञान से सत् की नाईं भासता है। जैसे एक मुहूर्त शयन करके स्वप्न में बहु-तेरे वर्षों का क्रम देखता है वैसे ही जगत् का अनुभव होता है। जैसे संकल्पपुर में अपना जीना, मरना और गन्धर्वनगर भ्रममात्र होता है; जैसे नौका में बैठे हुए मनुष्य को तट के वृक्ष चलते हुए भासते हैं। भ्रमण करने से पर्वत, पृथ्वी और मन्दिर भ्रमते भासते हैं और स्वप्न में अपना शिर कटा भासता है वैसे ही यह जगत् भ्रम से भासता है। हे राजन् ! अज्ञान से तुझको मिथ्या कल्पना उपजी है; वास्तव में न तू मृतक हुआ और न तूने जन्म लिया, तेरा अपना आप जो शुद्ध विज्ञान
उत्पत्ति प्रकरण । २१७
शान्तिरूप आत्मपद है उसी में स्थित है । नाना प्रकार का जगत् अज्ञान से भासता है और सम्यक् ज्ञान से सर्वात्मसत्ता भासती है । आत्मसत्ता ही जगत् की नाईं भासती है । जैसे बड़ी मणि की किरणें नाना प्रकार हो भासती हैं सो वह मणि से भिन्न नहीं; वैसे ही आत्मसत्ता का किञ्चन आकाशरूप जगत् भासता है । गिरि और ग्राम किञ्चनरूप हो जितना जगत् विस्तार तुमको भासता है वह लीला और पद्म राजा के मण्डपाकाश में स्थित है और लीला और पद्म की राजधानी उस वशिष्ठ ब्राह्मण के मण्डपाकाश में स्थित है । हे राजन् ! यह जगत् वशिष्ठ ब्राह्मण के हृदय मण्डपाकाश में फुरता है । वह मण्डपाकाश जो आकाश में स्थित है उसमें न पृथ्वी है, न पर्वत हैं, न मेघ हैं, न समुद्र है और न कोई मुमुक्षु है । केवल शून्य शून्य स्थित है और न कोई जगत् है, न कोई देखनेवाला है—यह सब भ्रान्तिमात्र है । हे राजन् ! यह सब तेरे उस मण्डपाकाश में फुरते हैं । विदूरथ बोले, हे देवि ! जो ऐसा ही है तो यह मेरे भृत्य भी अपने आत्म में सत् हैं वा असत् हैं कृपा कर कहिये ? देवी बोलीं, हे राजन् ! विदित वेद जो पुरुष है वह शुद्ध बोधरूप है । उसको कुछ भी जगत् सत्यरूप नहीं भासता, सब चिदाकाश रूप ही भासता है । जैसे भ्रम निवृत्त होने पर रस्सी में सर्प नहीं भासता वैसे ही जिन पुरुषों को आत्मबोध हुआ है और जिनका जगद्भ्रम निवृत्त हुआ है उनको जगत् सत् नहीं भासता । जैसे सूर्य की किरणों में जल को असत् जाने तो फिर जल सत्ता नहीं भासता वैसे ही जिनको आत्मबोध हुआ है और जगत् को असत् जानते हैं उनको सत् नहीं भासता । हे राजन् ! जैसे स्वप्न में कोई भ्रम से अपना कटा शीश देखे और जागने पर स्वप्न का मरना नहीं देखता वैसे ही ज्ञानवान् को जगत् सत् नहीं भासता । जैसे स्वप्न का मरना भ्रम से देखता है वैसे ही अज्ञानी को जगत् सत् भासता है । परन्तु वास्तव में कुछ नहीं, शुद्धबोध में जगत् भ्रम भासता है । जैसे शरत्काल में मेघ से रहित शुद्ध आकाश होता है वैसे ही शुद्धबोधवालों को अहं त्वं आदि व्यर्थ शब्द का अभाव होता है । हे राजन् ! तुम और तुम्हारे भृत्य इत्यादि जो यह सृष्टि है वह सब
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आत्मा से फुरे हैं और वास्तव में कुछ नहीं हुआ । केवल आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित है और भ्रम से ओर कुछ भासता है, पर शुद्धविज्ञानघनरूप ही उसका शेष रहता है । इतना कहकर वाल्मीकिजी बोले कि इस प्रकार जब देवी और विदूरथ का संवाद वशिष्ठजी ने रामजी से कहा तब सूर्य अस्त होकर सायङ्काल का समय हुआ और सब सभा परस्पर नमस्कार करके स्नान को गई । जब रात्रि बीत गई सूर्य की किरणों के निकलते ही सब अपने स्थानों पर आके बैठे ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे लीलोपाख्याने भ्रान्तिविचारो नामैकोनत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ २६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जो पुरुष अबोध है अर्थात् परमपद में स्थित नहीं हुए उनको जगत् वज्रसार की नाईं दृढ़ है । जैसे मूर्ख बालक को अपनी परछाहीं वैताल भासता है वैसे ही अज्ञानी को असतरूप जगत् सत् ही भासता है और जैसे मरुस्थल में मृग को असतरूप जलाभास सत्य हो भासता है; स्वप्ने में किया अर्थभ्रम करके भासते हैं; जिसको सुवर्णबुद्धि नहीं होती उसको भूषणबुद्धि सत् भासती है और जैसे नेत्रदूषण से आकाश में मुक्तमाला भासती है वैसे ही असम्यग्दर्शी को असतरूप जगत् सत् हो भासता है । हे रामजी ! यह जगत् दीर्घकाल का स्वप्ना है, अहन्ता से दृढ़ जाग्रतरूप हो भासता है और वास्तव में कुछ उपजा नहीं । परमचिदाकाश सर्वदा शान्ति और अचिन्त्य चिन्मात्र स्वरूप सर्वशक्ति सर्व आत्मा ही है; जहाँ जैसा स्पन्द फुरता है वैसा ही जगत् होकर भासता है जैसे स्वप्नसृष्टि भासती है वह स्वप्नभ्रम चिदाकाश में स्थित है । उसे चिदाकाश में एक स्वप्नपुर फुरता है और वहाँ द्रष्टा हो दृश्य को देखता है । वह द्रष्टा और दृश्य दोनों चेतन संवित् में आभासरूप हैं वैसे ही यह जगत् भी आभासरूप है । हे रामजी ! सर्ग का आदि जो शुद्ध आत्मसत्ता थी उसमें आदि संवेदन स्पन्द हुआ है—वहाँ ब्रह्माजी हैं और उसी के संकल्प में वह सम्पूर्ण जगत् स्थित है । यह सम्पूर्ण जगत् स्वप्न की नाईं हैं; उस स्वप्नरूप में तुम्हारा सद्भाव हुआ है । जैसे तुम हो वैसे ही और भी हैं । जैसे स्वप्न में स्वप्ननगर को और
उत्पत्ति प्रकरण ।
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स्वप्ना ही और जैसे स्वप्ननगर वास्तव सत् नहीं होता वैसे ही यह जगत् भी जो दृष्टि आता है भ्रममात्र है । जैसे स्वप्न में असत् ही सत् होके भासता है वैसे ही यह भी अहं त्वं आदि भासते हैं और जैसे स्वप्न में सब कर्म होते हैं वैसे ही यह भी जानो । इतना सुन रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! स्वप्न से जब मनुष्य जागता है तब स्वप्न के पदार्थ उसे असत्-रूप हो भासते हैं, पर ये तो ज्यों के त्यों रहते हैं और जब देखिये तब ऐसे ही हैं, फिर आप जाग्रत् और स्वप्न को कैसे समान कहते हैं । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जैसा स्वप्न है वैसा ही जाग्रत् है; स्वप्न और जाग्रत् में कुछ भेद नहीं । स्वप्न को भी असत् तब जानता है जब जागता है; जब तक जागता नहीं तब तक असत् नहीं जानता वैसे ही मनुष्य भी जब तक आत्मपद में नहीं जागता तब तक असत् नहीं भासता और जब आत्मपद में जागता है तब यह जगत् भी असत्रूप भासता है । हे रामजी ! यह जगत् असत्रूप है और भ्रम से सत् की नांई भासता है । जैसे स्वप्न की स्त्री असत्रूप होती है और उसको पुरुष सत्रूप जानता है वैसे ही यह जगत् भी असत्रूप सत् हो दिखाई देता है । केवल आभासरूप जगत् है और आत्मसत्ता सर्वत्र सर्वदा अद्वैतरूप है, जहाँ जैसा चिन्तता है वहाँ वैसा ही होके भासता है । जैसे डिब्बे में अनेक रत्न होते हैं उसमें जिसको चाहता है लेता है, वैसे ही सर्वगत चिदाकाश, जहाँ जैसा चिन्तता है वहाँ वैसा ही भासता है । हे रामजी ! अब पूर्व का प्रसङ्ग सुनो । जब देवी ने विदूरथ पर अमृत के समान ज्ञानवचनों की वर्षा की तब उसके हृदय में विवेक-रूप सुन्दर अंकुर उत्पन्न हुआ । तब सरस्वती ने कहा, हे राजन् ! जो कुछ कहना था वह मैं तुझसे कह चुकी । अब तुम रणसंग्राम में मृतक होगे यह मैं जानती हूँ । अब हम जाती हैं, लीलादि को दिखाने के लिये हम आई थीं सो सब दिखा चुकीं । इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब इस प्रकार मधुरवाणी से सरस्वती ने कहा तब बुद्धिमान् राजा विदूरथ बोला, हे देवी ! बड़ों का दर्शन निरर्थक नहीं होता वह तो महाफल देने वाला है । हे देवि ! जो अर्थी मेरे पास आता है उसे मैं
२२० योगवाशिष्ठ ।
निरर्थक नहीं जाने देता और सबका अर्थ पूरा करता हूँ। तुम तो साक्षात् ईश्वरी हो इसलिये मुझे यह वर दो कि देह को त्यागकर मैं लोकान्तर में पद्म के शव में प्राप्त होऊँ और मेरे मन्त्री और लीला भी मेरे साथ हों। हे देवि! जो भक्त शरण में प्राप्त होता है उसको बड़े लोग त्याग नहीं करते, बल्कि उसके सब अर्थ सिद्ध करते हैं। सरस्वती बोली, हे राजन्! ऐसा ही होगा। पद्म राजा के शरीर में प्राप्त होगा और बोध सहित निशङ्क होकर राज्य करेगा। हमारी आराधना किसी को व्यर्थ नहीं होती। जैसी कामना करके कोई हमको सेवता है वैसे ही फल को प्राप्त होता है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे लीलापाख्याने स्वप्नपुरुषसत्यता- वर्णनन्नाम त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३० ॥
सरस्वती बोली, हे राजन्! अब तुम रण में मृतक होके पूर्व पद्म राजा के शरीर में प्राप्त होगे और यह तुम्हारी भार्या और मन्त्री भी तुम्हें वहाँ प्राप्त होंगे। हे राजन्! तुम ऐसे चले जावोगे जैसे वायु चली जाती है। जैसे अश्व और मृग ऊँट और हाथी का संग नहीं करते वैसे ही तुम्हारा हमारा क्या संग है—इससे हम जाती हैं। इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जब इस प्रकार देवी ने कहा तब एक पुरुष ने आकर कहा, हे राजन्! जैसे प्रलयकाल में मन्दराचल और अस्ताचल आदि पर्वत वायु से उड़ते हैं वैसे ही शत्रु चले आते हैं और चक्र गदा आदि शस्त्रों की वर्षा करते हैं। जैसे महाप्रलय में सब, स्थान जल से पूर्ण हो जाते हैं वैसे ही सेना से सब स्थान पूर्ण हुए हैं और उन्होंने अग्नि भी लगाई है उससे स्थान जलने लगे हैं। वे शब्द करते हैं और नदी के प्रवाह की नाईं बाण चले आते हैं। अग्नि ऐसी लगी है जैसे महाप्रलय की बड़वाग्नि समुद्र को सोखती है। तब दोनों देवियाँ और राजा और मन्त्री ऊँचे चढ़ के और झरोखे में बैठ के क्या देखने लगे कि जैसे प्रलयकाल में मेघ चले आते हैं वैसे ही सेना चली आती है और जैसे प्रलय की अग्नि से दिशा पूर्ण होती हैं वैसे ही अग्नि की ज्वाला से सब दिशाएँ पूर्ण हुई हैं और उससे ऐसी चिनगारियाँ उड़ती हैं मानों तारागण गिरते हैं और अङ्गारों की वर्षा होती है उससे जीव जलते हैं।
उत्पत्ति प्रकरण । २२१
सुन्दर स्त्रियाँ जो नाना प्रकार के भूषणों से पूर्ण थीं वह तृणों की नाईं अग्नि में जलती हैं और पुरुषों की देह और वस्त्र भी जलते हैं। सब हाय हाय शब्द करते हैं और जलते-जलते बांधव, पुत्र और स्त्रियों को ढूँढ़ते हैं। हे रामजी! यह आश्चर्य देखो कि ऐसे स्नेह से जीव बाँधे हुए हैं कि मृत्युकाल में भी स्नेह नहीं त्याग सकते, पर सेना के लोग दूसरे लोगों को मार के स्त्रियों को ले जाते हैं। हे रामजी! उस काल रणभूमि में चहूँ ओर शब्द छा गया; कोई कहता था हाय पिता; कोई कहता था हाय माता, हाय भाई; हाय पुत्र; हाय स्त्री। घोड़े, गौ, बैल, ऊँट आदि पशु इकट्ठे मिल गये और अग्नि की ज्वाला वृद्धि होती जाती है और बड़ा क्षोभ उदय हुआ। जैसे महाप्रलय की अग्नि होती है वैसे ही सब स्थान अग्नि से पूर्ण हुए और उनमें अनेक जीव और स्थान दग्ध होने लगे।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्ति प्रकरणे लीलोपाख्याने अग्निदाह-वर्णनन्नामैकत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३१ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! इस प्रकार राजा नगर को देखता था कि लीला सहेलियों सहित अपने दूसरे स्थान से जहाँ राजा विदूरथ था आई। उसके महासुन्दर भूषण कुछ टूटे हुए और कुछ शिथिल थे। एक सहेली ने कहा, हे राजन्! तुम्हारे अन्तःपुर में जो स्त्रियाँ थीं उन्हें शत्रु ले गये हैं, पर इस लीला रानी को हम बड़े यत्न से चुराकर ले आई हैं और दूसरे लोगों को उन शत्रुओं ने बड़ा कष्ट दिया है। तुम्हारे द्वारे पर जो सेना बैठी है उसको भी वह चूर्ण करते हैं और समस्त नगर को जलाकर लूट लिया है। हे रामजी! जब इस प्रकार सहेली ने राजा से कहा तब राजा ने सरस्वतीजी से कहा, हे देवीजी! यह लीला तुम्हारी शरण आई है और तुम्हारे चरणकमलों की भ्रमरी है; इसकी रक्षा करो; और अब में युद्ध करने जाता हूँ। जब इस प्रकार कहकर राजा क्रोध संयुक्त युद्ध करने को रण की ओर मत्त हाथी के समान चला तब देवी के साथ जो प्रथम लीला थी उसने क्या देखा कि उस लीला का अपनी ही मूर्ति सा सुन्दर आकार है। जैसे आरसी में प्रतिबिम्ब होता है वैसे ही
३२२ | योगवाशिष्ठ ।
देखके कहने लगी, हे देवि ! इसमें मैं क्योंकर प्राप्त हुई ? जब में प्रथम आई थी तब तो मुझको मन्त्री, टहलुये और अनेक पुरवासी देखते थे और वह संशय मैंने तुमसे निवृत्त किया था; फिर अब में इस प्रकार कैसे आन स्थित हुई । यह दृश्यरूप कैसा आदर्श है जिसके भीतर बाहर प्रति-बिम्ब होता है ? यह मन्त्री और टहलुये और मेरा यह स्वरूप क्या है और दृश्यभाव हो क्योंकर भासता है । मेरा यह संशय दूर करो । देवी बोली, हे लीले ! जैसे चित्तसंवित् में स्पन्द फुरता है वैसे ही तत्काल सिद्ध होता है । जिस अर्थ को चिन्तन करनेवाला चित्तसंवित् शरीर को त्यागता है उसी अर्थ को प्राप्त होता है और उसी क्षण में देश काल और पदार्थ की दीर्घता होती है । जैसे स्वप्न सृष्टि फुर आती है वैसे ही परलोकदृष्टि भास आती है । हे लीले ! जब तेरा भर्त्ता मृतक होने लगा था तब तुझ-में और मन्त्रियों में इसका बहुत स्नेह था इससे वही रूप सत् होकर अपनी वासना के अनुसार उसे भासा है जैसे सङ्कल्पपुर और स्वप्नसेना भासती है वैसे ही यह "देश काल और पदार्थ" भासे हैं । हे लीले ! जो कोई असत् पदार्थ सद्रूप होकर भासते हैं वह अज्ञानकाल में ही भासते हैं, ज्ञानकाल में सब तुल्य हो जाते हैं; न्यूनाधिक कोई नहीं रहता; जाग्रत् में स्वप्न मिथ्या भासता और स्वप्न में जाग्रत् का अभाव हो जाता है । जाग्रत् शरीर मृतक में नष्ट हो जाता है; मृतक जन्म में असत् हो जाता है और मृतक में जन्म असत् हो जाता है । हे लीले ! जब इस प्रकार इनको विचारकर देखिये तो सब अवस्था भ्रान्तिमात्र हैं, वास्तव में कोई सत्य नहीं । हे लीले ! सर्ग से आदि महाप्रलय पर्यन्त कुछ नहीं हुआ । सदा ज्यों का त्यों ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है; जगत् आभासमात्र है और अज्ञान से भासता है । जैसे आकाश में तरुवरे भासते हैं वैसे ही आत्मा में जगत् भ्रम से भासता है और वास्तव में कुछ भी नहीं जैसे समुद्र में तरंग उपजकर लीन होते हैं वैसे ही आत्मा में जगत् उपज-कर लीन होते हैं । इससे 'अहं' 'त्वं' आदि शब्द भ्रान्तिमात्र हैं । हे लीले ! यह जगत् मृगतृष्णा के जलवत् है । इसमें आस्था करनी अज्ञा-नता है और भ्रान्ति भी कुछ वस्तु नहीं । जैसे घनतम में यक्ष भासता
उत्पत्ति प्रकरण । २२३
है पर वह कछु कोई वस्तु नहीं है, ब्रह्मसत्ता ज्यों की त्यों है, वैसे ही भ्रान्ति भी कछु वस्तु नहीं। जन्म, मृत्यु और मोह सब असतरूप हैं। 'अहं' 'त्वं' आदि जितने शब्द हैं उनका महाप्रलय में अभाव हो जाता है उसके पीछे जो शुद्ध शान्तरूप है अब भी वही जान कि ज्यों की त्यों ब्रह्मसत्ता है। हे लीले ! यह जो पृथ्वी आदि भासते हैं सो भी संवित्रूप हैं क्योंकि जब चित्तसंवित् स्पन्दरूप होता है तब यह जगत् होकर भासता है और इसी कारण संवित्रूप है। हे लीले ! जीवरूपी समुद्र में जगत्-रूप तरङ्ग उत्पन्न होते हैं और लीन भी होते हैं, पर वास्तव में जलरूप हैं और कुछ नहीं। जैसे अग्नि में उष्णता होती है वैसे ही जीव में सर्ग है जो ज्ञानवान् है उसको सर्वात्मा भासता है और अज्ञानी को भिन्न-भिन्न कल्पना होती है। हे लीले ! जैसे सूर्य की किरणों में त्रसरेणु भासते हैं, पवन में स्पन्द होता है और उसमें सुगन्ध होती है सो सब निराकार है वैसे ही जगत् भी आत्मा में निर्वेषु है। भाव अभाव; ग्रहण त्याग; सूक्ष्म; स्थूल; चर अचर इत्यादि सब ब्रह्म में आभास हैं। हे लीले ! यह जगत् जो साकाररूप भासता है सो आत्मा से भिन्न नहीं। जैसे वृक्ष के अङ्ग पत्र, फल, टासरूप हो भासते हैं वैसे ही ब्रह्मसत्ता ही जगद्रूप होकर भासती है और कुछ नहीं। जैसे चेतन संवित् में जैसा स्पन्द फुरता है वैसे ही होकर भासता है, पर वह आकाशरूप संवित् ज्यों की त्यों है, उसमें और कल्पना भ्रममात्र है। हे लीले ! यह जो जगत् भासता है वह न सत् है और न असत् है। जैसे रस्सी में भ्रम से सर्प भासता है वैसे ही आत्मा में जगत् भासता है। जिसको असम्यक्ज्ञान होता है उसको रस्सी में सर्प भासता है तो वह असत् न हुआ और जिसको सम्यक् बोध होता है उसको सर्प सत् नहीं। ऐसे ही अज्ञान से जगत् असत् नहीं भासता और आत्मज्ञान होने से सत् नहीं भासता, क्योंकि कछु वस्तु नहीं है। हे लीले ! जैसे जिसके अन्तःकरण में स्पन्द फुरता है उसका वह अनुभव करता है। जब यह जीव मृतक होता है तब इसको एक क्षण में जगत् फुर आता है। किसी को अपूर्वरूप फुर आता है; किसी को पूर्वरूप फुर आता है और किसी को अपूर्व मिश्रित
२२४ योगवाशिष्ठ ।
फुर आता है। इस कारण तेरे भर्त्ता को भी वही मन्त्री, स्त्री और सभा वासना के अनुसार फुर आये हैं, क्योंकि आत्मा सर्वत्ररूप है, जैसा-जैसा इसमें तीव्र स्पन्द फुरता है वैसा ही होकर भासता है। हे लीले! जैसे अपने मनोराज में जो प्रतिभा उदय हो आती है वह सतरूप हो भासती है वैसे ही यह जो लीला तेरे सम्मुख बैठी है सो यहीं हुई है और तेरे भर्त्ता की जो तेरे में तीव्र वासना थी इससे उसको तेरा प्रतिबिम्बरूप होकर यह लीला प्राप्त हुई और तेरा सा शील, आचार, कुल, वपु इसको प्रतिबिम्बित हुआ है। हे लीले! सर्वगत संवित् आकाश है। जैसा-जैसा उसमें फुरना होता है वैसा ही वैसा चिद्रूप आदर्श में प्रतिबिम्ब भासता है। इस सब जगत् का चेतन दर्पण में प्रतिबिम्ब होता है; वास्तव में तू और में, जगत्, आकाश, भवन, पृथ्वी, राजा आदि सब आत्मरूप हैं। आत्मा ही जगतरूप हो भासता है। जैसे बेलि से मज्जा भिन्न नहीं वैसे ही यह जगत् ब्रह्मस्वरूप है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे लीलोपाख्याने अग्निदाहवर्णननाम द्वात्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३२ ॥
देवी बोली, हे लीले! तेरा भर्त्ता राजा विदूरथ रण में संग्राम करके शरीर त्यागेगा और उसी अन्तःपुर में प्राप्त होकर राज्य करेगा। इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जब इस प्रकार देवी ने कहा तब विदूरथ के पुरवाली लीला ने हाथ जोड़ के देवी को प्रणाम किया और कहा, हे देवि! भगवति! मैंने ज्ञप्तिरूप का नित्य पूजन किया और उसने स्वप्न में मुझको दर्शन दिया। जैसे वह ईश्वरी थी वैसे ही तुम भी मुझको दृष्टि आती हो। इससे मुझ पर कृपा करके मनवाञ्छित फल दो। तब देवी अपने भक्त पर प्रसन्न होकर बोली, हे लीले! तूने अनन्य होकर मेरी भक्ति की है और उससे तेरा शरीर भी जीर्ण हो गया है अब में तुझ पर प्रसन्न हूँ जो कुछ तुझको वाञ्छित हो वह वर माँग। लीला बोली, हे भगवति! जब मेरा भर्त्ता रण में देह त्याग दे तो में इसी शरीर से उसकी भार्या होऊँ। देवी बोली, तूने भावना सहित भली प्रकार पुण्यादिकों से निर्विघ्न मेरी सेवा की है इससे ऐसा ही होगा। तब पूर्व
उत्पत्ति प्रकरण । २२५
लीला ने कहा, हे देवि ! तुम तो सत्यसंकल्प, सत्यकाम और ब्रह्मस्वरूप हो मुझको उसी शरीर से तुम विदूरथ के गृह में वशिष्ठ ब्राह्मण की सृष्टि में मुझे क्यों न ले गईं ? देवी बोली, हे लीले ! मैं किसी का कुछ नहीं करती । सब जीवों के संकल्पमात्र देह है और मैं ज्ञप्तिरूप हूँ । एक-एक जीव के अन्तर चैतन्यमात्र देवता होकर मैं स्थित हूँ; जो जो जीव जैसी-जैसी भावना करता है वैसी ही वैसी उसको सिद्धता होती है । हे लीले ! जब तूने मेरा आराधन किया था तब तूने यह प्रार्थना की थी कि मेरे भर्त्ता का जीव इसी आकाशमण्डप में रहे और मुझको ज्ञान की भी प्राप्ति हो । उसी के अनुसार मैंने तुझको ज्ञान का उपदेश दिया और तुझको ज्ञान प्राप्त हुआ । इसी निमित्त उसने पूजन किया था उससे उसके यही प्राप्त हुआ है कि देहसहित भर्त्ता के साथ जावेगी । जैसा-जैसा चित्त संवित् में स्पन्द दृढ़ होता है वैसे ही वैसी सिद्धता होती है । हे लीले ! जो तप करते हैं उनकी दृढ़ता से चिदात्मा ही देवतारूप होके फल को देते हैं । जैसे-जैसे सङ्कल्प की तीव्रता किसी को होती है चैतन्य संवित् से उसको वैसा ही फल प्राप्त होता है । चित्तसंवित् से भिन्न किसी से किसी को कदाचित् कुछ फल नहीं प्राप्त होता । आत्मा सर्वगत और सर्व के अन्तःकरण में स्थित है । जैसे उसमें चैत्यता होती है उसको वैसा ही शुभाशुभ भाव प्राप्त होता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे सत्य कामसङ्कल्पवर्णन-नाम त्रयस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ ३३ ॥
रामजी बोले, हे भगवन् ! राजा विदूरथ जब देवी से कहकर संग्राम में गया तो उसने वहाँ क्या किया ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब राजा गृह से निकला तो तारों में चन्द्रमा के सदृश सम्पूर्ण सेना से सुशोभित हुआ और रथ पर आरूढ़ होकर सभासहित संग्राम में आया । वह रथ मोती और मणियों से पूर्ण था और उसमें आठ घोड़े लगे थे जो वायु से भी तीक्ष्ण चलते थे और उसमें पाँच ध्वजा थीं । उस रथ पर आरूढ़ हो राजा इस भाँति संग्राम में आया जैसे सुमेरु पर्वत पंखों से समुद्र में जा पड़े । तब जैसे प्रलयकाल में समुद्र इकट्ठे हो जाते हैं वैसे ही दोनों सेनाएँ इकट्ठी हो गईं और बड़ा युद्ध होने लगा और मेघों की नाईं
२३६ | योगवाशिष्ठ ।
योद्धों के शब्द होने लगे । जैसे मेघ से बूँदों की वर्षा होती है और अग्नि से चिनगारियाँ निकलती हैं वैसे ही शस्त्रों की वर्षा होने लगी । जैसे प्रलयकाल की बड़वानल अग्नि होती है वैसे ही शस्त्रों से अग्नि निकलती थी और उन शस्त्रों से अनेक जीव मरे । इस प्रकार जब बड़ा युद्ध होने लगा तब विदूरथ की सेना कुछ निर्बल हुई और ऊर्ध्व में जो दोनों लीला देवी की दिव्य दृष्टि से देखती थीं उन्होंने कहा, हे देवि ! तुम तो सर्वशक्तिमान हो और हमारे पर तुम्हारी दया भी है हमारे भर्त्ता की जय क्यों नहीं होती इसका कारण कहो ? देवी बोली, हे लीले ! विदूरथ के शत्रु राजा सिद्ध ने जय के निमित्त चिरकाल पर्यन्त मेरी पूजा की है और तुम्हारे भर्त्ता ने जय के निमित्त पूजा नहीं की, मोक्ष के निमित्त की है इससे जीत सिद्ध राजा की होगी और तेरे भर्त्ता को मोक्ष की प्राप्ति होगी । हे लीले ! जिस जिस निमित्त कोई हमारी सेवा करता है हम उसको वैसा ही फल देती हैं । इससे राजा सिद्ध विदूरथ को जीतकर राज्य करेगा । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! फिर सेना को सब देखने लगीं और दोनों राजा का परस्पर तीव्र युद्ध होने लगा । दोनों राजाओं ने ऐसे बाण चलाये मानों दोनों विष्णु हो खड़े हैं । विदूरथ ने एक बाण चलाया उसके सहस्र हो गये और उसके आगे जाकर लाख हो गये और परस्पर युद्ध करते-करते टुकड़े-टुकड़े होकर गिर पड़े । ऐसे दूर से दूर बाण चले जाते थे कि जैसे निर्वाण किया दीपक नहीं भासता । तब राजा सिद्ध ने मोहरूपी अस्त्र चलाया और उसके आने से विदूरथ के सिवा सब सेना मोहित हुई । जैसे उन्मत्तता से कुछ सुधि नहीं रहती वैसे ही उनको कुछ सुधि न रही और परस्पर देखते ही रह गये मानों चित्र लिखे हैं । तब राजा विदूरथ को भी मोह का आवेश होने लगा तो उसने प्रबोध-रूपी शास्त्र चलाया उससे सबका मोह छूट गया और जैसे सूर्य के उदय होने से सूर्यमुखी कमल प्रफुल्लित हो आते हैं वैसे ही सबके हृदय प्रफुल्लित हो गये । तब सिद्ध राजा ने नागास्त्र बाण चलाया उससे अनेक ऐसे नाग निकल आये मानों पर्वत उड़े आते हैं । निदान सब दिशाएँ नागों से पूर्ण हो गईं और उनके मुख से विष और अग्नि की ज्वाला
उत्पत्ति प्रकरण । २२७
निकली जिससे विदूरथ की सेना ने बहुत कष्ट पाया तब राजा विदूरथ ने गरुड़ास्त्र चलाया उससे अनेक गरुड़ प्रकट हुए और जैसे सूर्य के उदय होने से अन्धकार नष्ट हो जाता है वैसे ही सर्प नष्ट हुए और नागों को नष्ट करके गरुड़ भी अन्तर्धान हो गये । जैसे संकल्प के त्यागने से संकल्पसृष्टि का अभाव हो जाता है वैसे ही गरुड़ अन्तर्धान हो गये और जैसे स्वप्न से जागे हुए को स्वप्नगर का अभाव हो जाता है वैसे ही गरुड़ों का अभाव हो गया । फिर जब कोई बाण सिद्ध चलावे तो विदूरथ उसको नष्ट करे जैसे सूर्य तम को नष्ट करे और उसने बाणों की बड़ी वर्षा की उससे सिद्ध भी क्षोभ को प्राप्त हुआ । तब पिछली लीला ने झरोखे से देखके देवीजी से कहा हे देवि ! अब मेरे भर्त्ता की जय होती है। देवी सुनके मुसकराई पर मुख से कुछ न कह हृदय में विचारा कि जीव का चित्त बहुत चञ्चल है, ऐसे देखते ही थे कि सूर्य उदय हुए—मानों सूर्य भी युद्ध का कौतुक देखने आये हैं—और सिद्ध ने तमरूप अस्त्र चलाया जिससे सर्वदिशा श्याम हो गईं और कुछ भी न भासित होता था—मानों काजल की समष्टिता इकट्ठी हुई है । तब विदूरथ ने सूर्यसा प्रकाशरूपी अस्त्र चलाया जिससे सब तम नष्ट हो गया । जैसे शरदकाल में सब घटा नष्ट हो जाती हैं, केवल शुद्ध आकाश ही रहता है, जैसे आत्मज्ञान से लोभादिक का ज्ञानी को अभाव हो जाता है और जैसे लोभरूपी काजल के निवृत्त होने से ज्ञानवान् की बुद्धि निर्मल होती है वैसे ही प्रकाश से तम नष्ट हो गया और सब दिशा निर्मल हुईं । जैसे अगस्त्यमुनि समुद्र को पान कर गये थे वैसे ही प्रकाश तम का पान कर गया । तब सिद्ध ने वेतालरूपी अस्त्र चलाया जिससे विदूरथ की सेना मोहित हो गई और उसमें से महाविकराल और पर-बाहीं समान मूर्ति धारण किये ऐसे श्यामरूप वेताल भासने लगे, जो ग्रहण न किये जावें और जीव के भीतर प्रवेश कर जावें । जिनके रहने का स्थान शून्य मन्दिर, कीचड़ और पर्वत हैं, शस्त्र से निकलकर विदूरथ की सेना को दुःख देने लगे । पिशाच वह होते हैं जिनकी शास्त्रोक्त क्रिया नहीं होती और जो मरके भूत, पिशाच और वेताल
३२८ योगवाशिष्ठ ।
होते हैं और राग, द्वेष, तृष्णा और भूख से जलते रहते हैं। उनका कोई बड़ा सरदार विदूरथ के निकट आने लगा तब विदूरथ ने रूपका नामक अस्त्र चलाया और उससे महाभयानकरूप बड़े नख, केश, जिह्वा, उदर और होठसहित नग्नरूप भैरव प्रकट होकर वैतालों को भोजन करने और खप्पर में रक्त भरकर पीने और नृत्य करने लगे और सबको दुःख देने लगे। तब सिद्ध ने क्रोध करके राक्षसरूपी अस्त्र चलाया जिससे एक कोटि भयानकरूप और काले राक्षस पाताल और दिशाओं से निकले जिनकी जिह्वा निकली हुई और ऐसा चमत्कार करते थे जैसे श्याम मेघ में बिजली चमत्कार करती है । वे जिसको देखें उसको मुख में डाल- के ले जावें । उनको देखके विदूरथ की सेना बहुत डर गई, क्योंकि जिसके सम्मुख वे हँसके देखें वह भय से मर जावे। तब राजा विदूरथ ने अपनी सेना को कष्टवान् देख विष्णुअस्त्र चलाया जिससे सब राक्षस नष्ट हो गये । फिर राजा सिद्ध ने अग्नि नामक अस्त्र चलाया जिससे सम्पूर्ण दिशाओं में अग्नि फैल गई और लोग जलने लगे । तब राजा विदूरथ ने वरूणरूपी बाण चलाया जिससे जैसे सन्तों के सङ्ग से अज्ञानी के तीनों ताप मिट जाते हैं वैसे ही अग्नि का ताप मिट गया । जल से सब स्थान पूर्ण हो गये और सिद्ध की बहुत सेना जल में बह गई। तब सिद्ध ने शोषणमय अस्त्र चलाया जिससे सब जल सूख गया पर कहीं कहीं कीचड़ रह गई । उसने फिर तेजोमय बाण चलाया जिससे कीचड़ भी सूख गई और विदूरथ की सेना गरमी से व्याकुल होकर ऐसी तपने लगी जैसे मूर्ख का हृदय क्रोध से जलता है। तब विदूरथ ने मेघ नामक अस्त्र चलाया जिससे मेघ वर्षने लगे और शीतल मन्द मन्द वायु चलने लगा जैसे आत्मा की ओर आये जीव का संसरना घटता जाता है वैसे ही विदूरथ की सेना शीतल हुई । फिर सिद्ध ने वायुरूपी अस्त्र चलाया जिससे सूखे पत्र की नाईं विदूरथ फिरने लगा । तब विदूरथ ने पहाड़रूपी अस्त्र चलाया जिससे पहाड़ों की वर्षा होने लगी और वायु का मार्ग रुक गया और वायु के क्षोभ मिट जाने से सब पदार्थ स्थिरभूत हो गये । जेमे संवेदन मे रहित चित्त शान्त होता है वैसे ही सब शान्त