योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
२५० योगवाशिष्ठ ।
आधिभौतिकता बोध से नष्ट हो जाती है । जैसे शरतकाल का मेघ देखनेमात्र होता है तैसे ही ज्ञानवान् योगीश्वरों का शरीर देखनेमात्र होता है और अदृश्यरूप है; और जो शरीर भासता है पर उसको आकाशरूप ही भासता है । हे रामजी ! यह देहादिक आत्मा में भ्रान्ति से दृष्टि आते हैं और आत्मज्ञान से निवृत्त हो जाते हैं । जैसे रस्सी के अज्ञान से सर्प भासता है; जब रस्सी का सम्यक्ज्ञान होता है तब सर्प-भाव उसका नहीं रहता तैसे ही तत्त्वबोध होने से देह कहाँ ही और देह की सत्ता कहाँ रहे, दोनों का अभाव ही हो, केवल अद्वैत ब्रह्मसत्ता भासती है । रामजी बोले; हे भगवन् ! अन्तवाहक मे आधिभौतिक रूप होता है वा आधिभौतिक मे अन्तवाहकरूप होता है यह मुझसे कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! मैंने तुमको बहुत बेर कहा है तुम मेरे कहे को धारण क्यों नहीं करते ? मैंने आगे भी कहा है कि जो कुछ जीव है वह सब अन्तवाहक है आधिभौतिक कोई नहीं । आदि में जो शुद्ध संविन्मात्र मे संवेदन आभास उठा है उससे इस जीव का संकल्परूप अन्तवाहक आदि शरीर हुआ । जब उसमें दृढ़ अभ्यास होता है तब वह संकल्परूपी शरीर आधिभौतिक होकर भासने लगता है । जैसे जल दृढ़ जड़ता से बरफ़रूप हो जाता है तैसे ही प्रमाद मे संकल्प के अभ्यास से आधिभौतिकरूप हो जाता है । उस आधिभौतिक के तीन लक्षण होते हैं भारी शरीर होता है; कठोर भाव होता है और शिथिल होता है उससे अहंप्रतीति होती है इस कारण आधिभौतिक कहाता है । जब तत्त्व का बोध होता है तब आधिभौतिकता आकाशरूप हो जाती है । जैसे स्वप्न में देह से आदि लेकर जगत् बड़ा स्पष्टरूप भासता है और जब स्वप्न में स्वप्न का ज्ञान होता है कि यह स्वप्न है तब वह स्वप्न का शरीर लघु हो जाता है अर्थात् संकल्परूप हो जाता है; तैसे ही परमात्मा के बोध से आधिभौतिक शरीर निवृत्त हो जाता है और संकल्प-रूप भासता है । हे रामजी ! आधिभौतिकता अबोध के अभ्यास से प्राप्त होती है । जब उलट के उसी अभ्यास का बोध हो तब आधिभौतिकता नष्ट हो जावे और अन्तवाहकता उदय हो । हे रामजी ! जीव एक शरीर को
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त्याग के दूसरे को अङ्गीकार करता है-जैसे स्वप्ने से स्वप्नान्तर प्राप्त होता है और जब बोध होता है तब शरीर और कुछ वस्तु नहीं, वही आधिभौतिक शरीर शान्त हो जाता है जैसे स्वप्न से जागके स्वप्नशरीर शान्त हो जाता है। हे रामजी ! जो कुछ जगत् तुमको भासता है वह सब भ्रममात्र है, अज्ञान से सत् की नाईं भासता है। जब आत्मबोध होगा तब सब आकाशरूप होगा।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे लीलोपाख्याने स्वप्ननिरूपणं नाम चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब वह दोनों देवियाँ अन्तःपुर में गई तब प्रबुद्ध लीला कहने लगी, हे देवीजी ! समाधि में लगे मुझको कितना काल व्यतीत हुआ ? में ध्यान से भूपाल की सृष्टि में गई थी ओर मेरा शरीर यहाँ पड़ा था वह कहाँ गया ? देवी बोली-हे लीले ! तुझको समाधि में लगे इकतीस दिन व्यतीत हुए हैं जब तू ध्यान में लगी तब तेरा पुर्यष्टक विदूरथ की सृष्टि में विचरता फिरा जब इस शरीर की वासना तेरी निवृत्त हो गई तब जैसे रस से रहित पत्र सूख जाता है तैसे ही तेरा शरीर निर्जीव होकर गिर पड़ा और जैसे काष्ठ पाषाण होता है तैसे ही हो वरफ की नाईं शीतल हो गया। तब देखके सबने विचार किया कि यह मर गई इसको जलाइये और चन्दन और घृत से लपेट के जला दिया । बान्धवजन रुदन करने लगे और पुत्रों ने पिण्डक्रिया की । हे लीले ! जो तू ध्यान से उतरती तो तुझको देखके लोग आश्चर्यमान होते और अब भी देखके सब आश्चर्यमान होवेंगे कि रानी परलोक से फिर आई है। हे लीले ! अब तुझको बोध उदय हुआ है इसमें शरीर की वासना नष्ट हो गई और अन्तवाहक में दृढ़ निश्चय हुआ इस कारण वह शरीर जीवित हुआ । अब जो उसके समान तेरा शरीर हुआ है वह इस कारण है कि तुझको लीला की वासना में बोध हुआ है कि मैं लीला हूँ, इस कारण तेरा शरीर वैसा ही रहा। यह लीला शरीर की तेरी वासना नष्ट न हुई थी, इस कारण तू निर्वाण न हुई, नहीं तो विदेहमुक्त हो जाती । अब तू सत्यसंकल्प हुई जैसी तेरी इच्छा होगी तैसे ही अनु-भव होगा । हे लीले ! जैसी वासना जिसको होती है उसके अनुसार
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उसको प्राप्त होता है। जैसे बालक को अन्धकार में जैसी भावना होती है तैसा ही भान होता है—जो वेताल की भावना होती है तो वेताल हो भासता है परन्तु वास्तव में वेताल कोई नहीं। तैसे जितनी आधिभौतिकता भासती है वह भ्रममात्र है। सब जीवों का आदि शरीर अन्तर्वाहक है सो प्रमाद से आधिभौतिकता भासता है। हे लीले ! एक लिंगशरीर है; एक अन्तर्वाहक शरीर है—यह दोनों संकल्पमात्र हैं और इनमें इतना भेद है कि लिंगशरीर संकल्परूपी मन है उसमें जिसको आधिभौतिकता का अभिमान होता है उसको गौरव और कठोररूप और वर्णाश्रम का अभिमान होता है। जिस पुरुष को ऐसे अनात्मा में आत्माभिमान हुआ है जिसकी आधिभौतिक लिङ्गदेह है उसकी चिन्तना सत्य नहीं होती। जिसको आधिभौतिक का अभिमान नहीं होता वह अन्तर्वाहक शरीर है। वह जैसा चिन्तवन करता है वैसी ही सिद्धि होती है। हे लीले ! तू अब अन्तर्वाहक में दृढ़ स्थित हुई है, इस कारण तेरा फिर वैसा ही शरीर हुआ है तेरी आधिभौतिकता बुद्धि नष्ट हो गई और वह स्थूल शरीर शव होकर गिर पड़ा है जैसे जल से रहित मेघ हो और जैसे सुगन्ध से रहित फूल हो तैसे ही तेरा शरीर हो गया है और अब तू सत्य संकल्प हुई है। जैसा चिन्तवन कर तैसा ही होगा। हे लीले ! यह कमलनयनी लीला तेरे भर्त्ता के पास बैठी है और उसको इस अन्तःपुर के लोग और सहेलियाँ जान नहीं सकतीं, क्योंकि मैंने इनको निद्रा में मोहित किया था। जब तक मेरा दर्शन इसको न होवेगा तब तक इसको और कोई न जान सकेगा अब यह हमको देखेगी। इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! ऐसे विचारके देवी उसको अपने संकल्प में ध्यान करने लगी तब उस लीला ने देखा कि अन्तःपुर में बहुत से सूर्यों का प्रकाश इकट्ठा हुआ है और चन्द्रमा की नाईं शीतल प्रकाश है। ऐसे दोनों देवियों को देखके उसने नमस्कार कर मस्तक नवाया और दोनों को सुवर्ण के सिंहासन पर बैठाके कहने लगी, हे जीव की दाता ! तुम्हारी जय हो ! तुमने मुझपर बड़ी कृपा की। तुम्हारे ही प्रसाद से मैं यहाँ आई। देवी बोली, हे पुत्री ! तू यहाँ कैसे आई और क्या वृत्तान्त तूने देखा सो कह ?
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विदूरथ की लीला बोली, हे देवी । जब मेरा भर्त्ता संग्राम में घायल हुआ तब उसको देखके में मूर्च्छित हो गिर पड़ी परन्तु मृतक न भई । इसके अनन्तर फिर मुझको चेतना फुरी तो मैंने अपना वही शरीर देखा और उस शरीर से में आकाशमार्ग को उड़ी । जैसे वायु गन्ध लेकर उड़ता है वैसे ही एक कुमार्ग मुझे उड़ाकर परलोक में भर्त्ता के पास बैठा आप अन्तर्धान हो गई । मेरा भर्त्ता जो संग्राम में थका था वह आके सो रहा है ओर में सँभलती देखती मार्ग में आई हूँ, परन्तु मुझको तुम दृष्टि कहीं न आईं । यहाँ कृपाकर तुमने दर्शन दिया है । इतना कहकर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार सुनके देवी ने प्रबुध लीला से कहा कि अब में राजा की जीवकला को छोड़ती हूँ । ऐसे कहके देवी ने नासिका के मार्ग से जीवकला को छोड़ दिया और जैसे कमल के भीतर वायु प्रवेश कर जावे अथवा शरीर में वायु प्रवेश कर जावे वैसे ही शरीर में जीवकला प्रवेश कर गई । जैसे समुद्र जल से पूर्ण होता है वैसे ही पुर्यष्टक वासना से पूर्ण थी । शरीर की कान्ति उज्ज्वल हो गई और जैसे वसन्त ऋतु में फूल ओर वृक्षों में रस फैलता है, अङ्गों में प्राणवायु फैल गई तब सब इन्द्रियाँ खिल आईं जैसे वसन्तऋतु में फूल खिल आते हैं । तब राजा फूलों की शय्या से इस भाँति उठ खड़ा हुआ जैसे रोका हुआ विन्ध्याचल पर्वत उठ आवे । तब दोनों लीला राजा के सम्मुख आ खड़ी हुईं और राजा ने कहा मेरे आगे तुम कौन खड़ी हो ? प्रबुध लीला ने कहा, हे स्वामी ! में तुम्हारी पूर्व पटरानी लीला हूँ; जैसे शब्द के सङ्ग अर्थ रहता है तैसे सदा तुम्हारे सङ्ग रहती हूँ । जब तुम यहाँ शरीर त्याग के परलोक में गये थे तब मुझसे तुम्हारा अतिस्नेह था, इससे मेरा प्रतिबिम्ब यह लीला तुझको भासी थी । अब जो और कथा का वृत्तान्त है सो में तुमसे कहती हूँ । हेराजन् ! हमारे ऊपर इस देवी ने कृपा की है जो हमारे शीश पर स्वर्ण के सिंहासन पर बैठी है । यह सरस्वती सर्व की जननी है; इसने हमारे ऊपर बड़ी कृपा की है ओर परलोक से तुम्हें ले आई है । हे रामजी ! ऐसे सुनके राजा प्रसन्न हो उठ खड़ा हुआ और सरस्वती के चरणों पर मस्तक नवाकर बोला, हे सरस्वती ! तुमको मेरा नमस्कार है । तुम सबकी हितकारिणी हो और तुमने मेरे ऊपर बड़ा
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अनुग्रह किया है । अब कृपा करके मुझको यह वर दो कि मेरी आयु बड़ी हो; निष्कण्टक राज्य करूँ; लक्ष्मी बहुत हो; रोग कष्ट न हो और आत्मज्ञान से सम्पन्न होऊँ अर्थात् भोग और मोक्ष दोनों दो । इतना कह-कर वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जब इस प्रकार राजा ने कहा तब देवी ने उसके शीश पर आशीर्वाद दिया कि हे राजन् ! ऐसा ही होगा । तेरी आयु बड़ी होगी; तेरा शत्रु भी कोई न होगा; निष्कण्टक राज्य करेगा; आपदा तुझको न होगी; लक्ष्मी संपदा से सम्पन्न होगा; तेरी प्रजा भी बहुत सुखी रहकर तुझको देखके प्रसन्न होगी; तेरी प्रजा में आपदा किसी को न होगी और तू आत्मानन्द से पूर्ण होगा ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे जीवजीवन्वर्णनन्नामै- कचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४१ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार कहके देवी अन्तर्धान हो गई और प्रातःकाल का समय हुआ; सब लोग जाग उठे; सूर्य भी उदय हुआ और सूर्यमुखी कमल खिल आये । राजा दोनों लीला को कण्ठ लगा प्रसन्न और आश्चर्यमान हुआ, मन्दिर में नगारे बजने लगे और नाना शब्द होने लगे, मन्दिर में बड़ा हुलास और आनन्द हुआ अनेक अङ्गना नृत्य करने लगीं और उत्साह हुआ । विद्याधर, सिद्ध, देवता, फूलों की वर्षा करने लगे और लोग बड़े आश्चर्यमान हुए कि लीला परलोक से फिर आई है और अपने भर्त्ता और एक आप-सी दूसरी लीला ले आई है। हे रामजी ! यह कथा देश से देशान्तर चली गई और सब लोग सुनके आश्चर्यमान हुए । जब इस प्रकार यह कथा प्रसिद्ध हुई तब राजा ने भी सुना कि मैं मर के फिर जिया हूँ और विचारा कि फिर मेरा अभिषेक हो । निदान मन्त्री और मण्डलेश्वरों ने उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम चारों ओर से सब समुद्र और सर्व तीर्थों का जल मँगा राजा को राज का अभिषेक किया और चारों समुद्रों पर्यन्त राजा निष्कण्टक राज्य करने लगा । राजा और लीला यह पूर्व की कथा को विचारते और आश्चर्यमान होते थे । सरस्वती के उपदेश और प्रसाद से अपना पुरुषार्थ पाके राजा और दोनों लीला ने इस भाँति
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सहस्र वर्ष पर्यन्त जीवन्मुक्त होके राज किया और मन सहित षट्इन्द्रियों को वश करके यथालाभ संतुष्ट रहे और दृश्यभ्रम उनका नष्ट हो गया । ऐसा सुन्दर राजा था कि उसकी सुन्दरता की कणिका मानों चन्द्रमा थी और उसके तेज की कणिका मानों सूर्य थी निदान उसने प्रजा को भली प्रकार संतुष्ट किया और सब प्रजा राजा को देख के प्रसन्न हुई और विदेहमुक्त हो दोनों लीला और तीसरा राजा निर्वाण पद को प्राप्त हुए ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे लीलोपाख्याने निर्वाण-वर्णनन्नाम द्विचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह दोनों कथा एक आकाशज ब्राह्मण की और दूसरी लीला की मैंने तुमको दृश्यदोष के निवृत्ति अर्थ विस्तारपूर्वक सुनाई है । हे रामजी ! दृश्य की दृढ़ता जो हो रही है उसको त्याग करो । अब तुम इन दोनों इतिहासों को संक्षेपमात्र से सुनो । यह जगत् जो तुमको भासता है आभासरूप है—आदि से कुछ उपजा नहीं जो वस्तु सत् होती है उसके निवारण में प्रयत्न होता है और जो वस्तु असत् ही हो उसकी निवृत्ति होने में कुछ यत्न नहीं । इस कारण ज्ञानवान् को सब आकाशरूप भासता है और आकाश की नाईं स्थित होता है । हे रामजी ! आदि जो ब्रह्मसत्ता में आभास संवेदन फुरा है सो ब्रह्मरूप होकर स्थित हुआ है । वह ब्रह्म पृथ्वी आदिक भूतों से रहित है । जो आप ही आभासरूप हो उसके उपजाये जगत् कैसे सत् हो ? हे रामजी ! ज्ञानवान् पुरुष आकाशरूप है । जिसको आत्मपद का साक्षात्कार हुआ उसको दृश्यभ्रम का अभाव हो जाता है और जो अज्ञानी है उसको जगत् भ्रम स्पष्ट भासता है । शुद्ध चिदाकाश का एक अणु जीव है और उस जीव अणु में यह जगत् भासता है, उस जगत् की सृष्टि में तुमको क्या कहूँ; नीति क्या कहूँ; वासना क्या कहूँ और पदार्थों को क्या कहूँ ? हे रामजी ! जगत् कुछ उपजा नहीं; केवल संवेदन के फुरने से जगत् भासता है । शुद्ध संवित् में संवेदनरूपी नदी चली है और उसमें यह जगत् फुरता है । जब संवेदन को यत्न करके रोकोगे तब दृश्यभ्रम नष्ट हो जावेगा । प्रयत्न करना यही है कि संवेदन को अन्तर्मुख करे और
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जब तक आत्मा का साक्षात्कार न हो तब तक श्रवण, मनन और निदिध्यासन में दृढ़ अभ्यास करना चाहिए । जब साक्षात्कार होता है तब दृश्य नष्ट हो जाता है । हे रामजी ! यह सर्व जगत् जो तुमको भासता है सो हमको अखण्ड ब्रह्मसत्ता ही भासता है । जगत् मायामय है, परन्तु माया भी कुछ और वस्तु नहीं, ब्रह्मसत्ता ही अपने आप में स्थित है । रामजी बोले, बड़ा आश्चर्य है ! बड़ा आश्चर्य है !! हे मुनीश्वर ! आपने मुझसे परम दशा कही है । आपका उपदेश दृश्यरूपी तृणों का नाशकर्त्ता दावाग्नि है और आध्यात्मिक आधिभौतिक और आधिदैविक तापों का शान्तकर्त्ता चन्द्रमा है । हे मुनीश्वर ! आपके उपदेश से अब मैं ज्ञातज्ञेय हुआ हूँ और पाँच विकल्प मैंने विचारे हैं । प्रथम यह कि यह जगत् मिथ्या है और इसका स्वरूप अनिर्वचनीय है; दूसरे यह कि आत्मा में आभास है; तीसरे यह कि इसका स्वभाव परिणामी है; चौथे यह कि अज्ञान से उपजा है और पाँचवें यह कि यह अनादि अज्ञान पर्यन्त है । ऐसे जान के ज्ञानवानों और निर्वाण मुक्तों की नाईं शान्तात्मा हुआ । हे मुनीश्वर ! और शास्त्रों से यह आपका उपदेश आश्चर्य है । श्रवणरूपी पात्र आपके वचनरूपी अमृत से तृप्त नहीं होते । इससे मेरा यह संशय दूर करो कि लीला के भर्त्ता को प्रथम वशिष्ठ, फिर पद्म और फिर विदूरथ की सृष्टि का अनुभव कैसे हुआ और उनमें उसको कहीं दिन हुआ, कहीं मास, कहीं वर्षों का अनुभव हुआ, सो काल का व्यतिक्रम कैसे हुआ ? हे मुनीश्वर ! इससे स्पष्ट करके कहिए कि आपके वचन मेरे हृदय में स्थित हों । एक बेर कहने से हृदय में स्थित नहीं होते, इससे फिर कहिये । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! शुद्धसंविद् सबका अपना आप है । उससे जैसा संवेदन फुरता है तैसा रूप हो भासता है । कहीं क्षण में कल्पों के समूह बीते भासते हैं और कहीं कल्प में क्षण का अनुभव होता है । हे रामजी ! जिसको विष में अमृतभावना होती है उसको अमृत ही हो भासता है और जिसको अमृत में विष की भावना होती है तब वही विषरूप हो भासता है । किसी पुरुष का कोई शत्रु होता है, पर उससे वह मित्र की भावना करता है तो वह मित्ररूप ही भासता है और जिसको मित्र में
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शत्रुभावना होती है तब वही शत्रु हो भासता है । हे रामजी ! जैसा संवेदन फुरता है तैसा ही स्वरूप हो भासता है । जिसका संवेदन तीव्र-भाव के अभ्यास से निर्मलभाव को प्राप्त होता है उसका संकल्पसत् होता है और जैसे चेतता है तैसे ही सिद्ध होता है । इससे संवेदन की तीव्रता हुई है । हे रामजी ! रोगी को एक रात्रि कल्प के समान व्यतीत होती है और जो आरोग्य होता है उसको रात्रि एक क्षण की नाईं व्यतीत होती है । एक मुहूर्त्त के स्वप्न में अनेक वर्षों का अनुभव करता है और जानता है कि मैं उपजा हूँ; ये मेरे माता-पिता हैं; अब मैं बड़ा हुआ और ये मेरे बान्धव हैं । हे रामजी ! एक मुहूर्त्त में इतने भ्रम देखता है और जागे पर एक मुहूर्त्त भी नहीं बीतता । हरिश्चन्द्र को एक रात्रि में बारह वर्षों का अनुभव हुआ था और राजा लवण को एक क्षण में सौ वर्षों का अनुभव हुआ था । इससे जैसा जैसा रूप होकर संवेदन फुरता है तैसा ही तैसा होकर भासता है । हे रामजी ! ब्रह्मा के एक मुहूर्त्त में मनुष्य की आयु व्यतीत हो जाती है । ब्रह्मा जितने काल में एक मुहूर्त्त का अनुभव करता है मनुष्य उतने ही में पूर्ण आयु का अनुभव करता है और ब्रह्मा जितने काल में अपनी संपूर्ण आयु का अनुभव करता है सो विष्णु का एक दिन होता है । ब्रह्मा की आयु व्यतीत हो जाती है और विष्णु को एक दिन का अनुभव होता है । इससे जैसे जैसे संवेदन में दृढ़ता होती है तैसा तैसा भाव होता है । हे रामजी ! जो कुछ जगत् तुम देखते हो सो संवेदन फुरने में स्थित है । जब संवेदन स्थित होता है तब न दिन भासता है; न रात्रि भासता है; न कोई पदार्थ भासते हैं और न अपना शरीर भासता है केवल आत्मतत्त्वमात्र सत्ता रहती है । इससे तुम देखो कि सब जगत् मन के फुरने में होता है । जैसा जैसा मन फुरता है तैसा तैसा रूप हो भासता है । कड़वे में जिसको मीठे की भावना होती है तो कडु वा उसको मीठा हो जाता है और मीठे में जिसको कटुक भावना होती है तब मधुर भी उसको कटुकरूप हो जाता है । स्वप्न और शून्य स्थान में नाना प्रकार के व्यवहार होते भासते हैं और स्थित पड़ा स्वप्न में दौड़ता फिरता है । इससे जैसी फुरना मन में होती है
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तैसा ही हो भासता है। हे रामजी! नौका में बैठे हुए पुरुष को नदी के तट वृक्षों सहित दौड़ते भासते हैं। जो विचारवान् हैं वे चलते भासने में उन्हें स्थिर ही जानते हैं। और जो पुरुष भ्रमता है उसको स्थिर भूत मन्दिर भ्रमते भासते हैं और जो विचार में दृढ़ है उसको भ्रमते भासने में भी अचल बुद्धि होती है। इससे जैसा जैसा निश्चय होता है तैसा ही तैसा हो भासता है। हे रामजी! जिसके नेत्र में दूषण होता है उसको श्वेत पदार्थ भी पीतवर्ण भासता है और जिसके शरीर में वात, पित्त, कफ का क्षोभ होता है उसको सब पदार्थ विपर्यय भासते हैं। इसी प्रकार पृथ्वी आकाश-रूप भासती है और आकाश पृथ्वीरूप हो भासता है; चल पदार्थ अचल रूप भासता है और अचल पदार्थ चलता भासता है। हे रामजी! जैसे स्वप्न में अङ्गना असतरूप होती है, परन्तु भ्रान्ति से उसको स्पर्श करके प्रसन्न होता है तो उस काल में प्रत्यक्ष ही भासती है और जैसे बालक को परछाहीं में बेताल भासता है सो असत् ही सतरूप हो भासता है। हे रामजी! शत्रु में जो मित्र भावना होती है तो वह शत्रु भी मित्र सुहृद् हो भासता है और जो मित्र में शत्रुभाव होता है तो वह सुहृद् शत्रुरूप हो भासता है। जैसे रस्सी में सर्प है नहीं, परन्तु भ्रम से सर्प भासता है और भय देता है तैसे ही बान्धव में जो बान्धव की भावना न करे तो बान्धव भी अबान्धव हो भासता है और अबान्धव भी भावना के अभाव से बान्धव हो जाते हैं। हे रामजी! शून्य स्थान में और स्वप्न में बड़े क्षोभ भासते हैं और निकटवर्ती को जाग से कुछ नहीं भासता। स्वप्न-वाले को सुनने का अनुभव होता है और जाग्रत्वाले को जाग्रत् का अनुभव होता है, इत्यादिक पदार्थ विपर्यय भ्रम से भासते हैं। जब मन फुरता है तबही भासता है तैसे ही लीला के भर्त्ता को भी ऐसी सृष्टि का अनुभव हुआ। जैसे जाग्रत् के एक मुहूर्त का स्वप्न में बहुत काल का अनुभव होता है तैसे ही लीला के भर्त्ता को भी हुआ था। जैसी जैसी मन की स्फूर्ति होती है तैसा ही तैसा रूप चैतन्य संवित् में भासता है। हमको सदा ब्रह्मा का निश्चय है इससे हमको सब जगत् ब्रह्मस्वरूप ही भासता है और जिसको जगत् भ्रम दृढ़ है उसको जगत् ही भासता है।
उत्पत्ति प्रकरण । २५६
हे रामजी ! जो कुछ जगत् भासता है सो कुछ आदि से उपजा नहीं- सब आकाशरूप है । रोकनेवाली कोई भीति नहीं है, बड़े विस्तार से जगत् है परन्तु स्वप्नवत् है । जैसे थम्भे में बनाये बिना पुतली शिल्पी के मन में भासती है और थम्भे में कुछ बनी नहीं तैसे ही आत्मरूपी थम्भा है उसमें जगतरूपी पुतलियों को संवेदन रचता है परन्तु वह कुछ पदार्थ नहीं है आत्मसत्ता ही ज्यों की त्यों है । हे रामजी ! जैसे एक स्थान में दो पुरुष लेटे हों और उनमें एक जागता हो और दूसरा स्वप्न में हो तो जो स्वप्न में है उसको बड़े युद्ध होते भासते हैं और जागे हुए को आकाशरूप है तैसे ही जो प्रबोध आत्मज्ञानवान् है उसको जगत् का सुषुप्ति की नाईं अभाव है और जो अज्ञानी है उसको नाना प्रकार के व्यवहारों सहित स्पष्ट भासता है । जैसे वसन्तऋतु में पत्र, फल और गुच्छे रससहित भासते हैं तैसे ही आत्मसत्ता चैतन्यता से जगतरूप भासती है । जैसे स्वर्ण में द्रवता सदा रहती है परन्तु जब अग्नि का संयोग होता है तभी भासती है । हे रामजी ! आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं । जैसे अवयवी और अवयवों में और पृथ्वी और गन्ध में कुछ भेद नहीं तैसे ही आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं । ब्रह्मसत्ता ही संवेदन से जगतरूप होकर भासती है और दूसरी कोई वस्तु नहीं । जब महा- प्रलय होता है और सर्ग नहीं होता तब कार्यकारण की कल्पना कोई नहीं होती, केवल चिन्मात्र सत्ता होती है और उसमें फिर चिदाकाश जगत् भासता है तो वही रूप हुआ । जो तुम कहो कि इस जगत् का कारण स्मृति है तो सुनो जब महाप्रलय होता है तब ब्रह्माजी तो विदेह मुक्त होते हैं फिर वह जगत् के कारण कैसे हों और जो तुम स्मृति का कारण मानो तो स्मृति भी अनुभव में होती है जो स्मृति से जगत् हुआ तो भी अनुभवरूप हुआ । रामजी ने पूछा; हे भगवन् ! पद्म राजा के मन्त्री नौकर और सब लोग विदूरथ को कैसे जाकर मिले ? यह वार्ता फिर कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! केवल चेतनसंवित् सबका अपना आप है उस संवित् के आश्रय में जैसा संवेदन फुरता है तैसा ही रूप हो भासता है । हे रामजी ! जब राजा विदूरथ मृतक होने लगा तब उसकी
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वासना उनमें थी और मन्त्री, नौकर आदिक राजा के अङ्ग हैं इस कारण वैसे ही मन्त्री और नौकर राजा को मिले। हे रामजी ! जैसी भावना संवेदन में दृढ़ होती है तैसा ही रूप हो भासता है। एक चल पदार्थ होते हैं और एक अचल होते हैं, जो अचल पदार्थ हैं उनका प्रतिबिम्ब आदर्श में भासता है और चल पदार्थ रहता नहीं भासता, इससे उसका प्रतिबिम्ब नहीं भासता। तैसे ही जिस पदार्थ की तीव्र संवेग भावना होती है उसी का प्रतिबिम्ब चेतन दर्पण में भासता है, अन्यथा नहीं भासता। जैसे तीव्र वेगवान् बड़ा नद समुद्र में शीघ्र ही जा मिलता है और दूसरे नहीं प्राप्त हो सकते तैसे ही जिसकी दृढ़ वासना होती है वह इसके अनुसार शीघ्र जाकर पाता है। हे रामजी ! जिसके हृदय में अनेक वासना होती हैं और अच्छी तीव्रता होती है उसी की जय होती है। जैसे समुद्र में अनेक तरङ्ग होते हैं तो कोई उपजता है और कोई नष्ट हो जाता है, कोई सदृश होता है कोई विपर्यक होता है; उसके सदृश मन्त्री और नौकर भी हुए। हे रामजी ! एक एक चिद् अणु में अनेक सृष्टि स्थित होती हैं; पर वास्तव में कुछ नहीं केवल चिदाकाश ही चिदाकाश में स्थित है। यह जो जगत् भासता है सो आकाश ही रूप है जो जाग्रतरूप होकर असत् ही सतरूप की नाईं भासता है। जैसे पत्र, फल, फूल सब वृक्षरूप हैं और वृक्ष ही ऐसे रूप होकर स्थित हैं तैसे ही अनन्त शक्ति परमात्मा, अनेकरूप होकर भासता है। हे रामजी ! द्रष्टा, दर्शन, दृश्य, त्रिपुटी ज्ञानी को अजन्मपद भासता है और अज्ञानी को द्वैतरूप जगत् होकर भासता है। कहीं शून्य भासता है, कहीं तम भासता है और कहीं प्रकाश भासता है। देश, काल क्रिया, द्रव्य आदिक सब जगत् आदि, अन्त और मध्य से रहित स्वच्छ आत्मसत्ता अपने आप में स्थित है जैसे सोमजल में तरङ्ग होते हैं सो जल ही रूप हैं तैसे ही अहं, त्वं आदिक जगत् भी बोधरूप है और सदा अपने आपमें स्थित है—उसमें द्वैतकल्पना का अभाव है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे लीलोपाख्याने प्रयोजन वर्णनन्नाम त्रिचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४३ ॥
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उत्पत्ति प्रकरण । २६१
रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! अहं, त्वं आदिक दृश्यभ्रान्ति कारण बिना परमात्मा से कैसे उदय हुई है ? जिस प्रकार में समझूँ उसी प्रकार मुझको समझाइये । वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जो कुछ कारण-कार्य जगत् भासता है वह परमात्मा से उदय हुआ है अर्थात् संवेदन के फुरने से इकट्ठे ही पदार्थ भास आये हैं और सर्वदा, सर्वप्रकार, सर्वात्मा, अजरूप अपने आप में स्थित हैं। हे रामजी ! यह सर्व शब्द और अर्थ-रूप कल्पना जो भासी है, सो ब्रह्मरूप है; ब्रह्म से कुछ भिन्न नहीं और ब्रह्मसत्ता सर्व शब्द अर्थ की कल्पना से रहित अपने आप में स्थित है। जैसे भूषण सुवर्ण से भिन्न नहीं और तरङ्ग जल से भिन्न नहीं तैसे ही ब्रह्म से भिन्न जगत् नहीं-ब्रह्मस्वरूप ही है। हे रामजी ! ईश्वर जो आत्मा है सो जगतरूप है, जगत् ईश्वररूप है। जैसे सुवर्ण भूषणरूप है और भूषण सुवर्णरूप है अर्थात् सुवर्ण में भूषण शब्द और अर्थ कल्पित हैं-वास्तव में नहीं-तैसे ही जगत् आत्मा का आभासरूप है-वास्तव में कुछ नहीं। हे रामजी ! जो कुछ जगत् है सो ब्रह्मरूप है ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं। जैसे अवयव अवयवी से भिन्न नहीं तैसे ही आत्मा से जो कुछ अवयवी जगत् है सो भिन्न नहीं। आत्मा में संवेदन के फुरने से तन्मात्रा फुरी है और आत्मा में ही इनका उपजना सब हुआ है; पीछे विभाग-कल्पना हुई है इसलिये उनसे जो भूत हुए हैं वे आत्मा से अन्य नहीं। जैसे शिला में चितेरा भिन्न-भिन्न पुतली कल्पता है सो शिलारूप ही हैं; भिन्न कुछ नहीं; तैसे ही अहं त्वं आदिक जगत् चिद्घन आत्मा में मन-रूपी चितेरे ने कल्पा है सो चिद्घनरूप ही है; कुछ भिन्न नहीं जैसे जल में तरङ्ग स्थित होते हैं सो जलरूप ही हैं; तरङ्गों का शब्द और अर्थ जल में कोई नहीं, तैसे ही आत्मा जगत् स्थित है, पर जगत् के शब्द और अर्थ से रहित है। हे रामजी ! जगत् परमपद से भिन्न नहीं और परमपद जगत् बिना नहीं; केवल चिद्रूप अपने आपमें स्थित है। जैसे वायु और स्पन्द में कुछ भेद नहीं है स्पन्द और निस्पन्द दोनों रूप वायु के ही हैं। जब स्पन्दरूप होता है तब स्पर्शरूप होकर भासता है और निस्पन्द हुए स्पर्श नहीं भासता; तैसे ही जगत् और ब्रह्म में कुछ भेद नहीं; जब
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संवेदन किञ्चित्रूप होता है तब जगत्रूप ही भासता है और संवेदन के निस्पन्द हुए से जगत् नहीं भासता, पर आत्मसत्ता सदा एकरूप है। हे रामजी ! जब संवेदन फुरने से रहित होकर आत्मपद में स्थित हो तब यदि संकल्परूप जगत् फिर भी भासे तो आत्मरूप ही भासे। जैसे वायु के स्पन्द और निस्पन्द दोनों रूप अपने आप ही भासते हैं तैसे ही इसको भी भासता है। जैसे वायु में स्पन्दता वायुरूप स्थित है तैसे ही आत्मा में जगत् आत्मरूप से स्थित है। जैसे तेज अणु का प्रकाश जब मन्दिर में होता है तब बाहर भी प्रकट होता है तैसे ही जब केवल संवित्मात्र में संवेदन स्थित होता है तब फुरने में संवित्मात्र ही भासता है। हे रामजी ! जैसे रसतन्मात्रा में जल स्थित होता है तैसे ही आत्मा में जगत् स्थित है। जैसे गन्धतन्मात्रा के भीतर सम्पूर्ण पृथ्वी स्थित है तैसे ही किञ्चनरूप जगत् आत्मा में स्थित है। वह निराकार और चिन्मात्ररूप आत्मसत्ता उदय और अस्त से रहित अपने आपमें स्थित है, प्रपञ्चभ्रम उसमें कोई नहीं। हे रामजी ! जो ज्ञानवान् पुरुष हैं उनको दृढ़भूत जगत् भी आकाशरूप भासता है और जो अज्ञानी हैं उनको असतरूप जगत् भी सतरूप हो भासता है। हे रामजी ! जैसा-जैसा संवेदन चित्तसंवित् में फुरता है तैसा ही तैसा रूप जगत् हो भासता है। ये जितने तत्त्व और तन्मात्रा हैं वे सब चित्तसंवेदन के फुरने से स्थित हुए हैं; जैसी-जैसी उससे स्फूर्ति होती है तैसी तैसी होकर भासती है, क्योंकि आत्मा सर्वशक्तिमान् है इसलिये जिस जिस पदार्थ का फुरना फुरता है वही अनुभव में सतरूप होकर भासता है। पञ्चज्ञानेन्द्रिय और छठे मन का जो कुछ विषय होता है वह सब असतरूप है और आत्मसत्ता इनसे अतीत है। विश्व भी क्या रूप है; जैसे समुद्र में तरङ्ग होते हैं तैसे ही आत्मा में जगत् स्थित है। जैसे तेज और प्रकाश अनन्यरूप हैं तैसे ही आत्मा और जगत् अनन्यरूप हैं। जैसे थम्भे में शिल्पी पुतलियाँ देखता है; जैसे मृत्तिका के पिण्ड में कुम्हार वर्तन देखता है और जैसे भीत पर चितेरा रङ्ग की सूरतें लिखता है सो अनन्यरूप है तैसे ही परमात्मा में सृष्टि अनन्यरूप है। हे रामजी ! जैसे मरुस्थल में मृगतृष्णा का जल
उत्पत्ति प्रकरण । २६३
और तरंगें असत् हैं पर सतरूप हो भासती हैं; तैसे ही आत्मा में असत्- रूप जगत् त्रिलोकी भासती है । जब चित्तसंविद् में संवेदन फुरता है तब जगत् भासता है और जब संवेदन नहीं फुरता तब जगत् भी नहीं भासता । जगत् कुछ ब्रह्म से भिन्न नहीं । जैसे बीज और वृक्ष में; क्षीर और मधुरता में; मिर्च और तीक्ष्णता में; समुद्र और तरङ्ग में और वायु और स्पन्द में कुछ भेद नहीं होता तैसे ही आत्मा और जगत् में कुछ भेद नहीं । जैसे अग्नि में उष्णता स्वाभाविक स्थित है तैसे ही निरा- कार आत्मा में सृष्टि स्वाभाविक ही स्थित है । हे रामजी ! यह जगत् ब्रह्मरूपी रत्न का किञ्चन है; जैसा-जैसा किञ्चन होता है तैसा ही तैसा होकर भासता है । अकारण पदार्थ अकारण ही होता और जिस अधि- ष्ठान में भासता है उससे अनन्यरूप होता है; अधिष्ठान से भिन्न उसकी सत्ता नहीं होती; तैसे ही यह जगत् आत्मा में अनन्यरूप होता है कुछ उपजा नहीं, परन्तु संवेदन फुरने से भासता है । जितने जगत् और वासना हैं उनका बीज संवेदन है इसमें वे भ्रम हैं । इसलिये संवेदन के अभाव का पुरुषार्थ करो; जब संवेदन का अभाव होगा तब जगत् भ्रम नष्ट होगा । वास्तव में कुछ न उपजा है और न कुछ नष्ट होता है; सर्व शान्तरूप चिद्घन ब्रह्म शिलाघन की नाईं अपने आपमें स्थित है । हे रामजी ! चित् परमाणु में चैतन्यता से अनेक सृष्टि भासती हैं। उन सृष्टियों में जो परमाणु हैं उन परमाणुओं के भीतर और सृष्टि स्थित हैं उनकी कुछ संख्या नहीं । जैसे जल में अनेक तरङ्ग होते हैं उनमें से कोई गुप्त और कोई प्रकट होते हैं पर वे सब जल की शक्तिरूप हैं और जैसे जाग्रत् स्वप्न और सुषुप्ति अवस्था जीवों के भीतर स्थित हैं, पर कोई गुप्त है कोई प्रकटरूप है । हे रामजी ! जब तक संवेदन द्वैत के साथ मिला हुआ है तब तक सृष्टि का अन्त नहीं । जब चित्त उपसम होगा तब जगद्भ्रम मिट जावेगा । जब भोगों में कुछ भी वृत्ति न उपजे तब जानिये कि आत्मपद प्राप्त होगा । यह श्रुति का निश्चय है । हे रामजी ! ज्यों-ज्यों ममत्व दूर होता है त्यों-त्यों बन्धनों से मुक्त होता है। जब अहंभाव अर्थात् जीवत्वभाव निर्वाण होता है तब जन्मों की संपदा नष्ट हो जाती है, केवल
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शुद्धरूप ही होता है और तब स्थावर जङ्गमरूप जगत् सब आत्मरूप प्रतीत होता है। जैसे समुद्र को तरङ्ग और बुद्बुदे सब अपने आपरूप भासते हैं तैसे ही ज्ञानवान् को सब जगत् आत्मरूप भासता है। हे रामजी! शुद्ध आत्मसत्ता में जो संवेदन फुरा है उसने आपको ब्रह्मरूप जाना और भावना करके संकल्परूप नाना प्रकार का जगत् रचा है पर उसको अन्तर अनुभव असत्यरूप किया। उसमें कहीं निमेष में अनेक युगों का अन्त भासता है और कहीं अनेक युगों में एक निमेष का अनुभव होता है।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे जगत्कियनवर्णनन्नाम चतुश्चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४४ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! चिद् परमाणु में जो एक निमेष होता है उसके लाखवें भाग में जगतों के अनेक कल्प फुरते हैं। और उन सृष्टियों में जो परमाणु हैं उनमें सृष्टि फुरती है। जैसे समुद्र में तरङ्ग फुरते हैं सो जलरूप ही तरङ्ग शब्द और उसका अर्थ भ्रमरूप है—तैसे ही आत्मा में भ्रमरूप अनेक सृष्टि फुरती हैं। जैसे मरुस्थल में मृगतृष्णा की नदी चलती दृष्टि आती है तैसे ही आत्मा में यह जगत् भासता है। जैसे स्वप्न-सृष्टि और गन्धर्वनगर भासते हैं; जैसे कथा के अर्थ चित्त में फुरते हैं और संकल्पपुर भासता है; तैसे ही जगत् असतरूप सत् हो भासता है। इतना सुन रामजी ने पूछा, हे ज्ञानवानों में श्रेष्ठ! जिस पुरुष को विचार द्वारा सम्यक् ज्ञान हुआ और निर्विकल्प आत्मपद की प्राप्ति हुई है उसको अपने साथ देह कैसे भासती है, उसकी देह कैसे रहती है और देह प्रारब्ध से उसका शरीर कैसे रहता है? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! आदि जो ब्रह्मशक्ति में संवेदन फुरा है उसका नाम नीति हुआ है। उसमें जो संभावना की है कि यह पदार्थ ऐसे होगा; इससे होगा और इतने काल रहेगा वैसे ही अनेक कल्प पर्यन्त होता है। जितना काल उसने धारा है उतने काल का नाम नीति है। महासत् भी उर्मी को कहते हैं और महाचेतना भी उसी को कहते हैं। महाशक्ति भी उसी का नाम है और महाअदृष्ट व महाकृपा भी वही है और महाउद्भव भी उसी को कहते हैं। अर्थ यह कि वह नीति अनन्त ब्रह्माण्डों की उपजाने वाली है।
उत्पत्ति प्रकरण । २६५
जैसा फुरना दृढ़ हुआ है तैसा ही रूप होकर स्थित है। यह स्थावररूप है, यह जङ्गम है, यह दैत्य है, यह देवता है, यह नाग है, यह नागिनी है, ब्रह्मा से तृणपर्यन्त जैसा उसमें अभ्यास है उसी प्रकार स्थित है। स्वरूप से ब्रह्मसत्ता का व्यभिचार कदाचित् नहीं हुआ वह तो सदा अपने आपमें स्थित है। जो ज्ञानवान् पुरुष है उसको सब ब्रह्मस्वरूप भासता है और जो अज्ञानी है उसको जगत् और नीति भी भिन्न भासती है। ज्ञानवान् को सब अचल ब्रह्मसत्ता ही भासता है और अज्ञानियों को चलनरूप जगत् भासता है। वह जगत् ऐसा है जैसे कि आकाश में वृक्ष भासते हैं और शिला के उदर में मूर्ति होती है। जो ज्ञानवान् हैं उनको सर्ग और निमित्त सब ज्ञानरूप ही भासते हैं। जैसे अवयवी के अवयव अपना ही रूप होते हैं तैसे ही ब्रह्मसत्ता के अवयव ब्रह्म नित्य सर्गादिक अपना ही रूप हैं। हे रामजी ! उसी नीति को दैव भी कहते हैं। जो कुछ किसी को प्राप्त होता है वह उसी दैव की आज्ञा से प्राप्त होता है, क्योंकि आदि से यही निश्चय धरा है कि इस साधन से यह फल प्राप्त होगा। जैसा साधन होता है तैसा ही फल अवश्य सबको उस दैव से प्राप्त होता है। इस कारण नीति को दैव कहते हैं और दैव को नीति कहते हैं। हे रामजी ! पुरुष जो कुछ पुरुषार्थ करता है उसके अनुसार फल प्राप्त होता है। इसी कारण इसका नाम नीति है और इसी का नाम पुरुषार्थ है। तुमने जो मुझसे दैव और पुरुषों का निर्णय पूछा और मैंने कहा उसी की तुम पालना करो। इसी का नाम पुरुषार्थ है और इसका जो फल तुमको प्राप्त हो उसका नाम दैव है। हे रामजी ! जो पुरुष ऐसा दैवपरायण हुआ है कि मुझको जो कुछ दैव भोजन करावेगा सो ही करूँगा और मौनधारी होके अक्रिय हो बैठे उसको जो आय प्राप्त हो सो भी नीति है और जो पुरुष भोगों के निमित्त पुरुषार्थ करता है वह भोगों को भोगकर मोक्षपर्यन्त अनेक शरीरों को धारेगा; यह भी नीति है। हे रामजी ! जो आदि संवित् में संवेदन फुरकर भवितव्यता धरी है उस ही प्रकार स्थित है उसका नाम भी नीति है। उस नीति को ब्रह्मा विष्णु और रुद्र भी उल्लंघन नहीं कर सकते तो और कैसे
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उल्लङ्घि सके। हे रामजी! जो पुरुष पुरुषार्थ को त्याग बैठे हैं उनको फल नहीं प्राप्त होता—यह भी नीति है और जो पुरुष फल के निमित्त पुरुषार्थ करता है उसको फल प्राप्त होता है—यह भी नीति है। जो पुरुष प्रयत्न को त्यागकर निष्क्रिय हो बैठे हैं और मन से विषयों की चित्त में वासना करते हैं वे निष्फल ही रहते हैं और जो पुरुष कर्तृत्व को त्याग-कर चित्त की वृत्ति से शून्य देवपरायण हो रहे हैं और विषयों की चित्त में वासना नहीं करते उनको सफलता ही होती है, क्योंकि फुरने से रहित होना भी पुरुषार्थ है। यह भी नीति है कि अर्थ चिन्तवन करनेवाले को प्राप्ति नहीं होती और अचानक को प्राप्ति होती है। हे रामजी! पुरुषार्थ सफल भी नहीं है जो आत्मबोध के निमित्त न हो। जब ब्रह्मसत्ता की ओर तीव्र अभ्यास होता है तब परमपद की अवश्य प्राप्ति होती है और जब परमपद पाया तब सब जगत् चिदाकाशरूप हो भासता है। नीति आदिक जो विस्तार कहे हैं सो सर्व भ्रमरूप हैं केवल ब्रह्मसत्ता ही ऐसे हो भासती है। जैसे पृथ्वी में रस सत्ता है और वह तृणवत् गुच्छे और फूलरूप होकर स्थित है तैसे ही नीति आदिक सब जगत् होकर ब्रह्म ही स्थित है; और कुछ वस्तु नहीं।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे देवशब्दार्थविचारो नाम पञ्चचत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी! जो कुछ तुमको भासता है सो सर्व प्रकार सर्वदा और सर्व ओर से ब्रह्मतत्त्वही सर्वात्मा होकर स्थित हुआ है। वह अनन्त आत्मा है; जब उसमें चित्तशक्ति प्रकट होती है अर्थात् शुद्ध चैतन्यमात्र में अहंस्फूर्ति होती है तब जगत् भासता है; कहीं उपजता है; कहीं नष्ट होता है; कहीं हुलास करता है; कहीं चित्त भासता है, कहीं खिन्न है; कहीं प्रकट है और कहीं अप्रकट भासता है। निदान नाना प्रकार का जगत् है जहाँ जैसा तीव्र अभ्यास होता है वहाँ वैसा होकर भासता है। क्योंकि, आत्मा सर्व शक्ति और सर्वरूप है; जैसा जैसा फुरना उसमें दृढ़ होता है, वही रूप होकर भासता है। हे रामजी! ये जो नाना प्रकार की शक्तियाँ कही हैं सो वास्तव में आत्मा से कुछ भिन्न नहीं। बुद्धिमानों
उत्पत्ति प्रकरण । २६७
ने समझाने के निमित्त नाना प्रकार के विकल्पजाल कहे हैं आत्मा में विकल्प जाल कोई नहीं । जैसे जल और उसकी तरङ्ग में; सुवर्ण और भूषण में और अवयवी और अवयव में कुछ भेद नहीं तैसे ही आत्मा और शक्ति में कुछ भेद नहीं । हे रामजी ! एक संवित् है और एक संवेदन है; संवित् वास्तव है और संवेदन कल्पना है । जब संवित् में चिन्मात्र संवेदन फुरता है तो वह जैसे चेतता जाता है तैसे ही होकर स्थित होता है । शुद्ध चिन्मात्र संवित् में भीतर और बाहर कल्पना कोई नहीं । जब स्वभाव से किञ्चनरूप संवेदन होता है तब आगे कुछ देखता है और उसे देखने से नाना प्रकार के आकार भासते हैं पर वह और कुछ नहीं सर्व ब्रह्म ही है । हे रामजी ! शक्ति और शक्तिमान में भेद अज्ञानी देखते हैं और अवयवी और अवयव भेद भी कल्पते हैं । परमार्थ में कुछ भेद नहीं केवल ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है उसके आश्रय संकल्प आभास होता है । जब संकल्प की तीव्रता होती है तब वह सत् हो अथवा असत्, परन्तु उसही का भान होता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे बीजावतारो नाम षट्चत्वारिंशत्तमस्सर्गः ॥ ४६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! यह जो सर्वगत देव, परमात्मा महेश्वर है यह स्वच्छ अनुभव, परमानन्दरूप और आदि अन्त से रहित है। उस शुद्ध चिन्मात्र परमानन्द से प्रथम जीव उपजा, उससे चित्त उपजा और चित्त से जगत् उपजा है। रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! अनुभव परिणाम से जो शुद्ध ब्रह्मतत्त्व; सर्वव्यापी, द्वैत से रहित स्थित है उसमें तुच्छ रूप जीव कैसे सत्यता पाता है ? वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! ब्रह्म सदा भास है अर्थात् असद्रूप जगत् उससे सत् भासता है और स्वच्छ है अर्थात् आभासरूपी जगत् से रहित है । बृहत् है अर्थात् बड़ा है बड़ा भी दो प्रकार का है; अविद्याकृत जगत् से जो बड़ा है सो अविद्या की बड़ाई मिथ्या है । ब्रह्म बड़ाई सर्वात्मकरूप है सो सर्वदेश, सर्वकाल और सर्ववस्तु से पूर्ण है और अविद्याकृत बड़ाई देश काल वस्तु से रहित निराकार है सो ज्ञानी का विषय है इससे बृहत् है और परम चेतन
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है। भैरव है अर्थात् जिसके भय से चन्द्रमा, सूर्य्य, अग्नि, वायु और जल अपनी मर्यादा में चलते हैं। परमानन्द है, अविनाशी है, सर्व ओर से पूर्ण है, सम है, शुद्ध है और अचित्य है अर्थात् वाणी में नहीं कहा जाता और क्षोभ से रहित चिन्मात्र है ऐसी आत्मसत्ता ब्रह्म का जो स्वभाव सम्पत है उसी का नाम जीव है अर्थात् जो शुद्ध चिन्मात्र में अहंकुरना है उसी का नाम जीव है। इस अनुभवरूपी दर्पण में अहं रूपी प्रतिबिम्ब फुरने को जीव कहते हैं। जीव अपने शान्त पद को त्यागे की नाईं स्थित होता है सो चिदात्मा ही फुरने के द्वारा आपको जीवरूप जानता है। जैसे समुद्र द्रवता से तरङ्गरूप होता है पर समुद्र और तरङ्ग में कुछ भेद नहीं; तैसे ही ब्रह्म ही जीवरूप है। जैसे वायु और स्पन्द और वरफ और शीललता में कुछ भेद नहीं तैसे ही ब्रह्म और जीव में कुछ भेद नहीं। हे रामजी ! चित्तरूपी आत्मतत्व को ही अपने स्वभाव-वश से माया करके संवेदन सहित जीवरूप कहते हैं वह जीव आगे फुरने के बड़े विस्तार धारण करता है। जैसे इन्धन में अग्नि के बहुत अणु होते हैं और बड़े प्रकाश को प्राप्त होता है तैसे ही जीव फुरने से जगतरूप को प्राप्त होता है। जैसे आकाश में नीलता भासती है सो नीलता कुछ भिन्न नहीं है तैसे ही अहंभाव से ब्रह्म में जीवरूप भासता है और अहंकृत को अङ्गीकार करके कल्पितरूप की नाईं स्थित होता है। जैसे घन की शून्यता से आकाश में नीलता भासती है तैसे ही स्वरूप के प्रमाद से देश, काल वस्तु के परिच्छेद सहित अहंकाररूपी जीव भासते हैं पर वास्तव चिदाकाश ही चिदाकाश में स्थित है। जैसे वायु से समुद्र तरङ्गरूप होता है तैसे ही संवेदन फुरने से आत्मसत्ता जीवरूप होती है। जीव की चेत्योन्मुखत्वता के कारण इतनी संज्ञा है-चित्त, जीव, मन, बुद्धि, अहङ्कार, माया, प्रकृति सहित ये सब उसी के नाम हैं। उस जीव ने संकल्प संवेष्टित तन्मात्रा को चेता तो उन पश्चतन्मात्रा के आकार में अणुरूप होकर स्थित हुआ; उससे अणु अनउपजे ही उपजे के नाईं स्थित हुए और भासने लगे। फिर उसी चित्त संवेदन ने अणु अङ्गीकार करके जगत् को रचा और जैसे बीज से सत् अंकुर वृक्ष होता
उत्पत्ति प्रकरण । २६६
है तैसे ही संवेदन ने विस्तार पाया । प्रथम वह एक अण्डरूपी होकर स्थित हुआ और फिर उसने अण्ड को फोड़ा । जैसे गन्धर्वनगर और स्वप्न सृष्टि भासती है तैसे ही उसमें जगत् भासने लगा । फिर उसमें भिन्न-भिन्न देह और भिन्न-भिन्न नाम कल्पे । जैसे बालक मृत्तिका की सेना कल्पता है और उनका भिन्न-भिन्न नाम रखता है तैसे ही स्थावर जङ्गम आदिक नाम कल्पना की पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश—इन पाँचों भूतों की सृष्टि संकल्प से उपजी है । हे रामजी ! आदि ब्रह्म से जो जीव फुरा है उसका नाम ब्रह्मा है । वह ब्रह्मा आत्मा में आत्मरूप होकर स्थित है और उससे क्रम करके जगत् हुआ है । जैसे वह चेतता है तैसे ही होकर स्थित होता है । जैसे समुद्र में द्रवता से तरङ्ग होते हैं तैसे ही ब्रह्म में चित्त स्वभाव से जीव होता है । वह जीव जब प्रमाद से अनात्मभाव को धारण करता है तब कर्मों से बन्धवान् होता है जैसे जल जब दृढ़ जड़ता को अंगीकार करता है तब बरफ़रूप होकर पत्थर के समान हो जाता है; तैसे जीव जब अनात्म में अभिमान करता है तब कर्मों के बन्धन में आता है । हे रामजी ! कर्मों का बीज संकल्प है और संकल्प जीव से फुरता है । जीवत्वभाव तब होता है जब शुभचेतना मात्र स्वरूप से उत्थान होता है । उत्थान के अर्थ ये हैं कि जब प्रमाद होता है तब जीवत्वभाव होता है और जब जीवत्वभाव होता है तब अनेक संकल्प कल्पना फुरता है । उन संकल्प कल्पनाओं से कर्म होते हैं; और कर्मों से जन्म, मरण आदिक नाना प्रकार के विकार होते हैं जैसे बीज से अंकुर और पत्र होते हैं; फिर आगे फूल फल और टास होते जाते हैं तैसे ही संकल्प कर्मों से नाना प्रकार के विकार होते हैं । जैसे-जैसे कर्म जीव करता है उनके अनुसार जन्म, मरण और अधः-ऊर्ध्व को प्राप्त होता है । हे रामजी ! मन के फुरने का नाम कर्म है; फुरने का ही नाम चित्त है; फुरने का ही नाम कर्म है और फुरने का ही नाम दैव है । उसही से जीव को शुभ अशुभ जगत् प्राप्त होता है । सबका आदि कारण ब्रह्म है; उसके प्रथम मन उत्पन्न हुआ फिर उस मन ही ने सम्पूर्ण जगत् की रचना की है । जैसे बीज से प्रथम अंकुर