योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
उत्पत्ति प्रकरण । ३८६
तो भी उनको कुछ बन्धन नहीं, उनको किया का बोध कुछ नहीं रहता । जैसे सुषुप्त पुरुष के निकट जाके कोई किया करे तो उसे कुछ बोध नहीं होता तैसे ही उसको भी किया का बोध नहीं होता, वह तो सुषुप्तवत् उन्मीलितलोचन है । हे रामचन्द्र ! जैसे सुषुप्त पुरुष को रूप, इन्द्रिय और उनका अभाव हो जाता है तैसे ही सप्तभूमिका में अभाव हो जाता है । यह ज्ञान की सप्तभूमिका ज्ञानवान् का विषय है, पशु, वृक्ष, म्लेच्छ, मूर्ख और पापाचारियों के चित्त में इनका अधिकार नहीं होता । जिसका मन निर्मल है उसको इन भूमिकाओं में अधिकार है, कदाचित् पशु, म्लेच्छ आदि को भी इनका अभ्यास हो तो वह भी मुक्त हो जाता है, इसमें कुछ संशय नहीं । हे रामचन्द्र ! आत्मज्ञान से जिनके हृदय की गाँठ टूट गयी है उनको संसार मृगतृष्णा के जलवत् मिथ्या भासता है और वे मुक्तरूप हैं और जो संसार से विरक्त होकर इन भूमिकाओं में आये हैं और मोहरूपी समुद्र से नहीं तरे और पूर्ण पद को भी नहीं प्राप्त हुए और सप्तभूमिका में से किसी भूमिका में लगे हैं वे भी आत्मपद को पाकर पूर्ण आत्मा होंगे । हे रामचन्द्र ! कोई तो सप्तभूमिकाओं को प्राप्त हुए हैं, कोई पहली ही भूमिका में, कोई दूसरी और कोई तीसरी को प्राप्त हुए हैं । कोई चौथी को, कोई पाँचवीं को, कोई वन में हैं, कोई अर्द्ध भूमिका को ही प्राप्त हुए हैं । कोई गृह में हैं, कोई वन में हैं, कोई तपसी हैं और कोई अतीत हैं । इससे आदि लेकर वे पुरुष धन्य और बड़े शूरमा हैं कि जिन्होंने इन्द्रियरूपी शत्रु को जीता है । जिस पुरुष ने एक भूमिका को भी जीता है सो वन्दना करने योग्य है, उसको चक्रवर्ती राजा जानना, बल्कि उसके सामने राज्य और बड़ा ऐश्वर्य विभूति भी तृणवत् है । वह परमपद को प्राप्त होता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्टे उत्पत्तिप्रकरणे ज्ञान भूमिकोपदेशो नाम त्रिनवतितमस्सर्गः ॥ ६३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! जैसे सोने में भूषण फुरे और अपना सुवर्णभाव भूल के कहे में भूषण हूँ तैसे ही चित्तसंवेदन जिस स्वरूप से फुरा है उससे भूलकर अहंवेदना हुई उसने अहंकार रूप धरा है
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कि मैं हूँ। रामजी ने पूछा, हे भगवन्! सोने में भूषण होते हैं वे मैं जानता हूँ, परन्तु आत्मा में अहंभाव कैसे होता वह कहिये? वशिष्ठजी बोले, हे रामचन्द्र! अहंकार आदिकों का होना असत्यरूप आगमापायी है। इसका कुछ भिन्न रूप नहीं है, यह आत्मा का चमत्कार है-वास्तव में द्वैत कुछ नहीं। जैसे समुद्र में अधः ऊर्ध्व जल ही जल है और कुछ नहीं, तैसे ही परमतत्त्व में और विभागकल्पना कोई नहीं-शान्तरूप है। जैसे समुद्र में द्रवता से तरंग आदिक भासते हैं तैसे ही संवेदन से जगतभ्रम भासते हैं। आत्मा में नाना प्रकार का भ्रम भासता है परन्तु और कुछ नहीं। जैसे सुवर्ण में भूषण, जल में तरंग और वायु में स्पन्द भासते हैं तैसे ही आत्मा में जगत भासता है। फुरने से रहित शान्तरूप केवल परमपद है। हे रामजी! जैसे मृत्तिका की सेना में जो हाथी, घोड़ा, पशु होते हैं वे सब मृतिकारूप हैं कुछ भिन्न नहीं तैसे ही सब जगत आत्मरूप है, भ्रम से नानात्व भासता है, वास्तव में आत्मा ही पूर्ण आप में स्थित है जैसे आकाश में आकाश स्थित है तैसे ब्रह्म में ब्रह्म स्थित है और सत्य में सत्य स्थित है। जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब होता है तैसे ही आत्मा में जगत् है। जैसे स्वप्न में दूर पदार्थ निकट भासते हैं और निकट दूर भासते हैं सो भ्रममात्र है तैसे ही आत्मा में विपर्ययदृष्टि से जगत् भासता है। हे रामजी! असत्य जगत् भ्रम से सत्यरूप भासता है, वास्तव में असत्यरूप है जैसे दर्पण में नगर का प्रतिबिम्ब, जैसे मृगतृष्णा का जल और आकाश में दूसरा चन्द्रमा भासता है तैसे ही यह जगत् आत्मा में भासता है जैसे इन्द्रजाल के योग से आकाश में नगर भासता है तैसे ही यह असत्यरूप जगत् अज्ञान से सत्य भासता है। जब तक आत्मविचार-रूपी अग्नि से अविद्यारूपी बेलि को तू न जलावेगा तब तक जगतरूपी बेलि निवृत्त न होगी, बल्कि अनेक प्रकार के सुख दुःख दिखावेगी। जब तू विचार करके मूलसहित इसको जलावेगा तब शान्तपद को प्राप्त होगा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे युक्त्युपदेशोनाम चतुर्णवतितमस्सर्गः ॥ ६४ ॥
उत्पत्ति प्रकरण । ३६१
वशिष्ठजी बोले, हे रामचन्द्र ! जैसे सुवर्ण में भूषण मिथ्यारूप हैं तैसे ही आत्मा में 'अहं' 'त्वं' आदिक अविद्यारूप हैं । लवण की कथा जो तुमने सुनी है उसे अब फिर सुनो। लवण राजा दूसरे दिन विचार करने लगा कि यह मुझको भ्रम सा भासा है परन्तु सत्यरूप होकर देखा है। देश, नगर, मनुष्यादिक पदार्थ मुझको प्रत्यक्ष दृष्टि आए हैं इससे अब तो वहाँ जाकर देखूँ कि कैसी बात है। ऐसे विचार से दिग्विजय का मन करके मन्त्री और सेना को साथ लेकर दक्षिण दिशा की ओर चला। देशों को लाँघता लाँघता विन्ध्याचल पर्वत में पहुँचा और पूर्व और दक्षिण के समुद्र के मध्य में मार्ग में भ्रमता भ्रमता किरात देश में जा पहुँचा जो वृत्तांत और देश ग्राम आदिक भ्रम में देखे थे सो प्रत्यक्ष देखे और अति विस्मित हो विचार करने लगा कि हे देव ! यह क्या है? जो कुछ मैंने भ्रम से देखा था वह अब भी मुझको प्रत्यक्ष भासता है। यह बड़ा आश्चर्य है। ऐसे विचार के आगे गया तो क्या देखा कि अग्नि से वृक्ष जले हैं और अकाल पड़ा है। अपने सम्बन्धियों की चेष्टा के स्थान देखे और उनकी कथा सुनी। इस प्रकार देखते-देखते आगे गया तो क्या देखा कि चाण्डाल शरीर की सासु बैठी रुदन करती है कि हे देव ! मेरा पुत्र कहाँ गया । हे पुत्र ! तुम कहाँ गये, जिनका चन्द्रमा की नाईं मुख था ? मेरी मृगनयनी कन्या जीर्ण देह हो गई है—और पौत्र, पौत्रियाँ दुर्भिक्षता से सब जाते रहे। उनके यह खाने के पदार्थ हैं और ये चेष्टा के स्थान हैं। जो रतिका की माला कण्ठ में डाले जीवों के मांस खाते और रुधिर पान करते थे वह कहाँ गये ? इसी प्रकार पुत्र, पुत्री, भर्त्ता, दामाद आदि का नाम लेकर वह रुदन करती थी और लोग जो आ बैठते थे वह भी रुदन करते थे। तब राजा उनका रोना बन्द कराके वृत्तान्त पूछने लगा कि तू किस निमित्त रुदन करती है ? किससे तेरा वियोग हुआ है ?
इति श्रीयोगवाशिष्ठे उत्पत्तिप्रकरणे चाण्डालीशोचनवर्णनन्नाम पञ्चनवतितमस्सर्गः ॥ ९५ ॥
३६२ | योगवाशिष्ठ ।
चाण्डाली बोली, हे राजन् ! एक समय वर्षा न होने से अकाल पड़ा और सब जीवों को बड़ा दुःख हुआ। उस समय मेरे पुत्र, पौत्र, पौत्रियाँ, जामाता, भर्त्ता आदिक बांधव यहाँ से निकल गये और कहीं कष्ट पाके मर गये। उनके वियोग से मैं दुःखी होकर रुदन करती हूँ और उनके बिना मैं शून्य हो गई हूँ। जैसे बिछुरी हुई हथिनी अकुलाती है तैसे ही मैं अकुलाती हूँ। हे रामचन्द्र ! जब इस प्रकार चाण्डाली ने कहा तब राजा अति विस्मित हुआ और मन्त्री के मुख की ओर ऐसे देखने लगा जैसे कागज पर पुतली होती है। निदान राजा विचारे और आश्चर्यवान् हो, उस चाण्डाली से बारम्बार पूछे और वह फिर कहे और राजा आश्चर्य-वान् होवे। तब राजा उसको यथायोग्य धन देकर चिरपर्यन्त वहाँ रहा और फिर अपने राजमन्दिर में आया जब प्रातःकाल हुआ तब सभा में आकर मुझसे पूछने लगा हे मुनीश्वर ! यह स्वप्ना मुझको प्रत्यक्ष कैसे हुआ ? इसको देखकर मैं आश्चर्यवान् हुआ हूँ। तब मैंने प्रश्नानुसार उसको युक्ति से उत्तर दिया और उसके चित्त का संशय ऐसे दूर कर दिया जैसे मेघ को वायु दूर करे, वही तुमसे कहता हूँ। हे रामजी ! अविद्या ऐसी है कि असत्य को शीघ्र ही सत्य और सत्य को असत्य कर दिखाती है और बड़ा भ्रम दिखानेवाली है। रामजी ने पूछा, हे भगवन् ! स्वप्ना कैसे सत्य हुआ, यह मेरे चित्त में बड़ा संशय स्थित हुआ है उसको दूर कीजिये। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इसमें क्या आश्चर्य है ? अविद्या से सब कुछ बनता है। स्वप्न में तुम प्रत्यक्ष देखते हो कि घट से पट और पट से घट हो जाता है। स्वप्न और मृत्यु में मूर्च्छा के अनन्तर बुद्धि विपर्यय हो जाती है। जिनका चित्त वासना से वेष्टित है उनको जैसा संवेदन फुरता है तैसे ही भासता है। हे रामजी ! जिनका चित्त स्वरूप से गिरा है उनको अविद्या अनेक भ्रम दिखाती है। जैसे मद्यपान और विष पीनेवाला भ्रम को प्राप्त होता है वैसे ही अविद्या से जीव भ्रम को प्राप्त होता है। एक और राजा था उसकी भी वही व्यवस्था हुई थी जो लवण राजा के चित्त में फुर आई थी। जैसे उसकी चेष्टा हुई थी तैसे ही इसको भी फुर आई तब उसने जाना कि मैंने यह क्रिया की है। जैसे अभोक्ता पुरुष आपको स्वप्न में
उत्पत्ति प्रकरण । <span style="float:right">३६३</span>
भोक्ता देखता है कि मैं राजा हुआ हूँ, में तृण हूँ, अथवा भूखा सोया हूँ, और यह क्रिया मैंने करी है तैसे ही लवण को फुर आया था सो प्रतिभा (भान) है सभा में बैठे चाण्डाल की चेष्टा लवण को फुर आई अथवा विन्ध्याचल पर्वत के चाण्डालों की प्रतिभा लवण को फुरी सो लवण को वह भ्रम दृढ़ हो गया । एक ही सदृश भ्रम अनेकों को फुर आता है और स्वप्न भी सदृश होता है जैसे एक ही रस्सी में अनेकों को सर्प भासता है इसी प्रकार अनेक जीवों को एक भ्रम अनेकरूप ही भासता है। हे रामजी ! जितने पदार्थ भासते हैं उनकी सत्ता में संवेदन हुआ है । जैसे उनमें संकल्प दृढ़ होता है तैसे ही होकर भासता है । जो पदार्थ सत्यरूप हो भासता है वह सत्य होता है और जो असत्यरूप हो भासता है वह असत्य हो जाता है । सब ही पदार्थ संवेदनरूप हैं और तीनों काल भी संवेदन में उपजे हैं । इनका बीज संवेदन है । सब पदार्थ अविद्यारूप हैं और जैसे रेत में तेल है तैसे ही आत्मा में अविद्या है । आत्मा से अविद्या का सम्बन्ध कदाचित् नहीं क्योंकि सम्बन्ध समरूप का होता है । जैसे काष्ठ और लाख का सम्बन्ध होता है सो आकार सहित है और जो आकार से रहित है उसका सम्बन्ध कैसे हो ? जैसे प्रकाश और तम का सम्बन्ध नहीं होता तैसे ही चेतन से चेतन का सम्बन्ध होता है और विजातीय का सम्बन्ध नहीं, इससे अविद्यारूप देह की आत्मा से सम्बन्ध नहीं। जो जड़ से आत्मा का सम्बन्ध हो तो आत्मा जड़ हो, पर आत्मा तो सदा चेतनरूप है और सर्वदा अनुभव से प्रकाशता है, उसको जड़ कैसे कहिये ? जैसे स्वाद को जिह्वा ग्रहण करती है और अङ्ग नहीं करते तैसे ही चेतन से चेतन की, जड़ से जड़ की, जल से जल की, माटी से माटी की, अग्नि से अग्नि की, प्रकाश से प्रकाश की, तम से तम की, इसी प्रकार सब पदार्थों की सजातीय पदार्थों से एकता होती है, विजातीय से नहीं होती । इससे सब चैतन्याकाश है और पाषाणादिक दृश्यवर्ग कोई नहीं भ्रम से इनके भूषण भासते हैं । जैसे सुवर्ण बुद्धि को त्यागकर नाना प्रकार के भूषण भासते हैं तैसे ही जब अहंवेदना आत्मा में फुरती है तब अनेकरूप होकर विश्व भासता है जैसे सुवर्ण
३६४ योगवाशिष्ठ ।
की ओर देखिये तब सब भूषण स्वर्णरूप भासते हैं तैसे ही जब ब्रह्मसत्ता की ओर देखिये तब सब जगत् ब्रह्मरूप ही भासता है । जैसे मृत्तिका की सेना बालकों को अनेकरूप भासती है और बुद्धिमान् को एक मृत्तिका रूप है तैसे ही अज्ञानी को यह जगतरूप नानारूप भासता है, ज्ञानवान् को एक ब्रह्मसत्ता ही भासती है । वह कौन ब्रह्म है जिसमें द्रष्टा, दर्शन, दृश्य फुरे हैं ? इनके मध्य ओर इनसे रहित जो सत्ता है वह ब्रह्मसत्ता है । हे रामचन्द्र ! जो सत्ता चैतन्यरूप और शिला के कोशवत् निर्विकल्प तन्मय रूप है उसमें जब स्थित हो और समाधि में रहो अथवा उत्थान हो तब तुमको सब वही रूप भासेगा । हे रामचन्द्र ! जो पुरुष निर्मल सत्ता में स्थित भया है वह शरीर के इष्ट में हर्षवान् नहीं होता और अनिष्ट में शोकवान् नहीं होता, वह निर्मल रूप होकर स्थित होता है । जैसे भविष्यत् नगर में जो अनेक चिन्तायुक्त जीव बसते हैं वह सब उसके चित्त में स्थित होते हैं । जैसे पुरुष को देशान्तर जाते अनेक पदार्थ मार्ग में इष्ट अनिष्टरूप भासते हैं परन्तु जहाँ जाना है उसकी ओर वृत्ति रहती है, मार्ग के पदार्थों में उसको राग-द्वेष नहीं होता, तैसे ही तुम हो जाओ । जैसे पत्थर से जल और जल से अग्नि नहीं निकलती, तैसे ही आत्मा में चित्त नहीं, अविचार भ्रम से चित्त जानता है, विचार से नहीं पाता । जैसे भ्रम से आकाश में दूसरा चन्द्रमा भासता है तैसे ही आत्मा में चित्त भासता है, वास्तव में कुछ नहीं । वह सत्ता नित्य, शुद्ध, परमानन्दरूप अपने आपमें स्थित है और अनुभवरूप है, उसके विस्मरण करने से दुःख प्राप्त होता है जैसे अमृतरूपी चन्द्रमा में अग्नि प्राप्त होती है । इससे हे रामचन्द्र ! तुम सावधान हो । यह जो फुरना उठता है इसी का नाम चित्त है और चित्त कोई नहीं । इस चित्त को दूर से त्याग करो जो तुम हो वही स्थित हो । हे रामचन्द्र ! असतरूप चित्त ही संसार है, जो उसको असत्य जानके त्याग नहीं करता वह आकाश के वन में विचरता है, उसको धिक्कार है। जिसका मनन भाव नष्ट हुआ है वह महापुरुष संसार से पार होकर परमपद निश्चितरूप में प्राप्त हुआ है । इति श्रीयो० उत्पत्ति० चित्ताभावप्रतिपादनन्नामपञ्चषष्टितमस्सर्गः ॥ ६६॥
उत्पत्ति प्रकरण ।
३६५
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! मनुष्य जिस प्रकार भूमिका को प्राप्त होता है उसका क्रम सुनो । प्रथम जन्म से पुरुष को कुछ बोध होता है और फिर क्रम से बड़ा होकर सन्तों की संगति करता है । सदा सदृश-रूप जो संसार का प्रवाह है उसके तरने को सत् शास्त्र और सन्तजनों की संगति बिना समर्थ नहीं होता । जब सन्तों का सङ्ग और सत्शास्त्रों का विचार करने लगता है तब उसको ग्रहण और त्याग की बुद्धि उपजती है कि यह कर्त्तव्य है और यह त्यागने योग्य है । इसका नाम शुभेच्छा है । जब यह इच्छा हुई तब शास्त्र द्वारा यह विचार उपजता है कि यह शुभ है और यह अशुभ है शुभ का ग्रहण करना और अशुभ का त्याग करना और यथाशास्त्र विचारना इसका नाम विचार है । जब सम्यक् विचार दृढ होता है तब मिथ्यारूप संसार की वासना त्यागता है और सत्य में स्थित होता है—इसका नाम तनुमानसा है । जब संसार की वासना क्षीण होती है और सत्य का दृढ़ अभ्यास होता है तब उस वैराग्य और अभ्यास से सम्यक् ज्ञान उपजता और आत्मा का साक्षात्कार होता है—उसका नाम सत्त्वापत्ति है । मन से वासना नष्ट होके सिद्धि आदिक पदार्थ प्राप्त होते हैं, इनकी प्राप्ति में भी संसक्त नहीं होता, स्वरूप में सदा सावधान रहता है । सिद्धि आदिक पदार्थ प्रारब्ध मे प्राप्त होते हैं उनको स्वप्नरूप जान कर्मों के फल में बन्धवान् नहीं होता—इसका नाम असंसक्त है इसके अनन्तर जब मन की तनुता हो गई है और स्वरूप की ओर चित्त का परिणाम हुआ तब दृढ़ परिणाम से व्यवहार का भी अभाव हो जाता है जो पल पल में कर्म प्रारब्धवेग से करता है, बल्कि उसके चित्त में फुरना भी नहीं फुरता और वह मन क्षीणभाव में प्राप्त होता है । वह कर्त्ता हुआ भी कुछ नहीं करता और देखता है पर नहीं देखता अर्द्धसुषुप्तिवत् होता है, उसे कर्त्तव्य की भावना नहीं फुरती और मन भी नहीं फुरता—इसका नाम पदार्था भावनी योग भूमिका है । इसमें चित्त लीन हो जाता है । इस अवस्था में जब स्वाभाविक चित्त का कुछ काल इस अभ्यास में व्यतीत होता है और भीतर से सब पदार्थों का अभाव दृढ़ हो जाता है तब तुरीयारूप होता है और जीवन्मुक्त कहलाता है ।
३६६ योगवाशिष्ठ ।
तब वह इष्ट को पाके हर्षवान् नहीं होता और उसकी निवृत्ति में शोक- वान् नहीं होता, केवल विगतसन्देह हो उत्तमपद को प्राप्त होता है । हे रामचन्द्र ! तुम भी अब ज्ञात ज्ञेय हुए हो । जो कुछ जानने के योग्य है सो तुमने ज्यों का त्यों जाना है और अब तुम्हारी पदार्थों की भावना तनुता को प्राप्त हुई है । अब तुम्हारे साथ शरीर रहे अथवा न रहे तुम हर्ष शोक से रहित निरामय आत्मा हो और स्वच्छ आत्मतत्त्व में स्थित सर्वगत सदा उद्यतिरूप जन्म, मरण, जरा, सुख, दुःख से रहित आत्मदृष्टि में अबोधरूप शोक से रहित हो और अद्वैतरूप अपने आपमें स्थित हो। देह उदय भी होता है और लीन भी हो जाता है पर देश, काल वस्तु के भेद से रहित जो आत्मा है वह उदय और अस्त कैसे हो ? हे रामचन्द्र ! तुम अवि- नाशी हो, आपको नाशरूप जानकर शोक काहे को करते हो, तुम अमृतसम स्वच्छरूप हो । जैसे घट के फूटने से घटाकाश नष्ट नहीं होता, तैसे ही शरीर के नाश होने से तुम नष्ट नहीं होते । जैसे सूर्य की किरणों के जाने से मृगतृष्णा के जल का नाश हो जाता है किरणों का नाश नहीं होता । हे रामचन्द्र ! जो कुछ जगत् के पदार्थ भासते हैं सो असत्यरूप हैं और उनकी वासना भ्रान्ति से होती है, पर तुम तो अद्वैतरूप हो और यह सब तुम्हारी मायामात्र है । तुम किसकी वाञ्छा करते हो ? शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध यह जो पाँचों विषयरूप दृश्य हैं सो तुमसे रञ्चकमात्र भी भिन्न नहीं, सब तुम्हारा स्वरूप है । तुम भ्रम मत करो । हे रामजी ! आत्मा सर्वशक्ति है, वही आभास करके अनेकरूप हो भासता है । जैसे आकाश में शून्यता शक्ति आकाश से भिन्न नहीं, तैसे ही आत्मा में सर्वशक्ति है । जो जगत् द्वैतरूप होकर भासता है वही चित्त से दृढ़ हुआ है सो क्रम से तीन प्रकार का त्रैलोक्य जगत् जीव को भ्रम हुआ है-एक सात्त्विक दूसरा राजस और तीसरा तामस । जब इन तीनों का उपशम हो तब कल्याण होता है । जब वासना क्षय हो तब उसके कर्म भी क्षय हो जाते हैं-उससे भी भ्रम का नाश हो जाता है । चित्त के संसरने का नाम वासना है कर्म संसार मायामात्र हैं, उनके नष्ट हुए सब शान्त हो जाते हैं । हे रामजी ! यह संसार घटीयन्त्र की
उत्पत्ति प्रकरण । ३६७
नाईं है और जीव वासना से बँधे हुए भ्रमते हैं । तुम आत्मविचाररूपी शस्त्र से यत्न करके इसको काटो । जब तक अविद्या को जीव नहीं जानता तब तक यह बड़े मोह और भ्रम दिखाती है और जब इसको जानता है तब बड़े सुख को प्राप्त करता है अर्थात् जब तक अविद्या को वास्तव में नहीं जानता तब तक संसार सत्य भासता है और उसमें अनेक भ्रम भासते हैं और जब इसका स्वरूप जाना कि वस्तु नहीं, भ्रमरूप है तब संसारवृत्ति त्याग करता है और स्वरूप को प्राप्त होता है । यह संसार भ्रम में उपजा है और उसी से भोग भोगता और लीला करता है और फिर ब्रह्म में लीन हो जाता है । हे रामचन्द्र ! शिवतत्त्व अनन्तरूप अप्रमेय और निर्दुःखरूप है, सब भूततत्त्व उसी से उपजते हैं । जैसे जल से तरङ्ग और अग्नि में उष्णता होती है तैसे ही ब्रह्म से जगत् होता है उसी में स्थित है और वही रूप है । सबका आत्मा है और वही आत्मा ब्रह्म कहाता है उसके जानने से जगत् को जानता है पर तीनों लोकों को जानने से उसको नहीं जानता । वह जो अव्यक्त और निर्वाणरूप है, उसके जानने के निमित्त शास्त्रकारों ने ब्रह्म, आत्मा आदिक नाम कल्पे हैं, वास्तव में कोई नाम (संज्ञा) नहीं । हे रामचन्द्र ! वह पुरुष रागद्वेष से रहित है और इन्द्रियों और इन्द्रियों के विषयों के संयोग वियोग में द्वेष को नहीं प्राप्त होता । वह तो एक, चेतन शुद्ध, संवित्, अनुभवरूप अविनाशी और आकाश से भी स्वच्छ निर्मल है । उसमें जगत् ऐसे स्थित है जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब अन्तर्बाह्यरूप होकर स्थित है—उसमें द्वैतरूप कुछ नहीं । हे रामचन्द्र ! देह से रहित निर्विकल्प चेतन तुम्हारा आकार है । लज्जा, मोह आदिक विकार तुमको कहाँ हैं ? तुम आदिरूप हो और लज्जा, हर्ष, भयादिक असत्यरूप हैं । तुम क्यों निर्बुद्धि (मूर्ख) की नाईं विकल्प जाल को प्राप्त होते हो ? तुम चेतन आत्म अखण्डरूप हो, देह के खण्डित हुए आत्मा का अभाव नहीं होता । असम्यग्दर्शी भी ऐसा मानते हैं तो बोधवानों का क्या कहना है । हे रामचन्द्र ! जो चित्त संवेद से है उसके अनुभव करनेवाली सत्ता सूर्य के मार्ग से भी नहीं रोकी जाती, उसी को तुम चित्सत्ता जानो, वही पुरुष
३६८ योगवाशिष्ठ ।
है शरीर पुरुषरूप नहीं । हे रामचन्द्र ! शरीर सत्य हो अथवा असत्य, पर पुरुष तो शरीर नहीं । देह के रहने और नष्ट होने से आत्मा ज्यों का त्यों ही है । ये जो सुख-दुःख ग्रहण करते हैं वे देह इन्द्रियादिक चिदात्मा को नहीं ग्रहण करते । जिन पुरुषों को अज्ञान से देह में अभिमान हुआ है उनको सुख-दुःख का अभिमान होता है ज्ञानवान को नहीं होता । आत्मा को दुःख स्पर्श नहीं करता, वह तो सब विकारों से रहित, मन के मार्ग से अतीत, शून्य की नाईं स्थित है, उसको सुख-दुःख कैसे हो ? और देह मिला हुआ जो भासता है सो स्वरूप को त्याग-कर दृश्य के चेतने से देहादिक भ्रम भासते हैं और वासना के अनुसार देह से सम्बन्ध होता है । जैसे भ्रमर और कमलों का संयोग होता है । देहपिंजर नाश होने से आत्मा का नाश तो नहीं होता । जैसे कमल के नाश होने से भ्रमर का नाश नहीं होता । इससे तुम क्यों वृथा शोक करते हो ? हे रामजी ! जगत् को असत्य जानकर अभावना करो । मन के निरीक्षक हो । साक्षीभूत, सम, स्वच्छ, निर्विकल्प चिदात्मा में जगत् ही भासता है । जैसे मणि प्रकाशरूप हो भासता है तो फिर जगत् और आत्मा का सम्बन्ध कैसे हो । जैसे दर्पण में अनिच्छित प्रतिबिम्ब आ प्राप्त होता है, तैसे ही आत्मा को जगत् का सम्बन्ध भासता है । जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब एक रूप होता है, तैसे ही आत्मा में जगत् भेद भी अभेदरूप है । जैसे सूर्य के उदय होने से सब जीवों की क्रिया होती है और दीपक से पदार्थों का ग्रहण होता है तैसे ही आत्मसत्ता से जगत् के पदार्थों का अनुभव होता है । यह जगत् चैतन्यतत्त्व में स्वभाव से उपजा है । प्रथम आत्मा से मन उपजा है और उसमे यह जगत्जाल रचा है—वास्तव में आत्मसत्ता में आत्मसत्ता स्थित है । जैसे शून्याकाश शून्यता में स्थित है और उसमें जगत् भासता है सो ऐसे है जैसे आकाश में नीलता और इन्द्रधनुष है परन्तु वह शून्यस्वरूप है । हे रामचन्द्र ! यह जगत् चित्त में स्थित है और चित्त संकल्परूप है । जब संकल्प क्षय होता है तब चित्त नष्ट हो जाता है और जब चित्त नष्ट हुआ तब संसार-रूपी कुहिरा नष्ट हो जाता है और निर्मल शरत्काल के आकाशवत्
उत्पत्ति प्रकरण । ३६६
आत्मसत्ता प्रकाशती है । वह चेतनमात्र सत्ता एक, अज, आदि-मध्य, अन्त से रहित है, उससे जो स्पन्द फुरा है वह संकल्परूप ब्रह्मा होकर स्थित हुआ है और उसने नाना प्रकार का जगत् रचा है वह शून्यरूप है, मूर्ख बालक को सत्यरूप भासता है । जैसे बालक को परछाहिं में बैताल भासता है और जीवों को अज्ञान से देहाभिमान होता है तैसे ही असत्यरूप ही सत्य-रूप होकर भासता है । जब सम्यक्ज्ञान होता है तब लीन हो जाता है । जैसे समुद्र से तरङ्ग उपजकर समुद्र में लीन होते हैं तैसे ही आत्मा में जगत् उपजकर आत्मा में लीन होता है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे आर्षे महारामायणे सप्तनवतितमस्सर्गः ॥ ६७ ॥
समाप्तमिदं उत्पत्तिप्रकरणं तृतीयम् ॥ ३ ॥
श्रीपरमात्मने नमः ॥
श्रीयोगवाशिष्ठ
चतुर्थ स्थिति प्रकरण प्रारम्भ ।
वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! अब स्थितिप्रकरण सुनिये जिसके सुनने से जगत् निर्वाणता को प्राप्त हो । कैसा जगत् है कि जिसके आदि अहन्ता है । ऐसा जो दृश्यरूप जगत् है सो भ्रान्तिमात्र है । जैसे आकाश में नाना प्रकार के रङ्गों सहित इन्द्रधनुष असतरूप है तैसे ही यह जगत् है। जैसे द्रष्टा बिना अनुभव होता है और निद्रा बिना स्वप्न और भविष्यत् नगर भासता है तैसे ही भ्रम से चित्त में जगत् स्थित हुआ है । जैसे वानर रेत इकट्ठी करके अग्नि की कल्पना करते हैं पर उससे शीत निवृत्त नहीं होती, भावनामात्र अग्नि होती है, तैसे ही यह जगत् भावनामात्र है। जैसे आकाश में रत्न मणि का प्रकाश और गन्धर्वनगर भासता है और जैसे म्रगतृष्णा की नदी भासती है तैसे ही यह असतरूप जगत् भ्रम से सतरूप हो भासता है । जैसे दृढ़ अनुभव से संकल्प भासता है पर वह असतरूप है और जैसे कथा के अर्थ चित्त में भासते हैं तैसे ही निःसार-रूप जगत् चित्त में साररूप हो भासता है । जैसे स्वप्न में पहाड़ और नदियाँ भास आती हैं, तैसे ही सब भूत बड़े भी भासते हैं पर आकाशवत् शून्यरूप । स्वप्न में अङ्गना से प्रेम करना अर्थ से रहित और असत् रूप है सिद्ध नहीं होता तैसे ही यह भी प्रत्यक्ष भासता है परन्तु वास्तव में कुछ नहीं, अर्थ से रहित है जैसे चित्र की लिखी कमलिनी सुगन्ध से रहित होती है तैसे ही यह जगत् शून्यरूप है । जैसे आकाश में इन्द्रधनुष और केले का थम्भ सुन्दर भासता है परन्तु उसमें कुछ सार नहीं निकलता तैसे ही यह जगत् देखने में रमणीय भासता है परन्तु अत्यन्त असतरूप है, इसमें सार कुछ नहीं निकलता । देखने में प्रत्यक्ष
स्थिति प्रकरण । ४०१
अनुभव होता है परन्तु मृगतृष्णा की नदीवत् असतरूप है। रामजी ने पूछा, हे भगवन् सर्व संशयों के नाशकर्त्ता ! जब महाकल्प क्षय होता है तब दृश्यमान सब जगत् आत्मरूप बीज में लीन होता है। जैसे बीज में अंकुर रहता है, उससे उपजता है उसी में स्थित होता है और फिर उसी में लीन होता है। यह बुद्धि ज्ञान की है अथवा अज्ञान की ? सर्व संशयों की निवृत्ति के अर्थ मुझसे स्पष्ट करके कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे रामजी ! इस प्रकार महाकल्प के क्षय होने पर बीजरूप आत्मा में जगत् स्थित होता है। जो ऐसे कहते हैं वह परम अज्ञानी और महा-मूर्ख बालक हैं जो ब्रह्म को जगत् का कारण बीज से अंकुर की नाईं कहते हैं वह मूर्ख हैं। बीज तो दृश्यरूप इन्द्रिय का विषय होता है। जैसे वटबीज में अंकुर होता है और फिर विस्तार पाता है सो इन्द्रियों का विषय है और जो मन सहित षट् इन्द्रियों से अतीत है, अर्थात् इन्द्रियों का विषय नहीं आकाश से भी अधिक निर्मल है, उसको जगत् का बीज कैसे कहिए ? जो आकाश से भी अधिक सूक्ष्म, परम उत्तम अनुभव से उपलब्ध और नित्य प्राप्त है उसको बीजभाव कहना नहीं बनता। हे रामजी ! जो कि शान्त, सूक्ष्म, सदा प्रकाशसत्ता है और जिसमें दृश्य जगत् असतरूप है उसको बीजरूप कैसे कहिये ? और जब बीजरूप कहना नहीं बनता तब उसे जगत् कैसे कहिये ? आकाश से भी अधिक सूक्ष्म निर्मल परमपद में सुमेरु, समुद्र, आकाश आदिक जगत् नहीं बनता । जो किञ्चन और अकिञ्चन है और निराकार, सूक्ष्म सत्ता है उसमें विद्यमान जगत् कैसे हो ? वह महासूक्ष्मरूप है और दृश्य उससे विरुद्धरूप है जैसे धूप में छाया नहीं, जैसे सूर्य में अंधकार नहीं, जैसे अग्नि में बरफ़ नहीं, और जैसे अणु में सुमेरु नहीं होता, तैसे ही आत्मा में जगत् नहीं होता । सत्यरूप आत्मा में असत्यरूप जगत् कैसे हो ? वट का बीज साकाररूप होता है और निराकाररूप आत्मा में साकाररूप जगत् होना अयुक्त है। हे रामजी ! कारण दो प्रकार का होता है—एक समवाय कारण और दूसरा निमित्तकारण, आत्मा दोनों कारणों से रहित है । निमित्तकारण तब होता है जब कार्य से कर्त्ता भिन्न हो,
४०२ योगवाशिष्ठ ।
पर आत्मा तो अद्वैत है, उसके निकट दूसरी वस्तु नहीं है, वह कर्त्ता कैसे हो और किसका हो, सहकारी भी नहीं जिससे कार्य करे, वह तो मन और इन्द्रियों से रहित निराकार अविकृतरूप है और समवाय कारण भी परिणाम से होता है। जैसे वट बीज परिणाम से वृक्ष होता है, पर आत्मा तो अच्युतरूप है, परिणाम को कदाचित् नहीं प्राप्त होता तो समवाय कारण कैसे हो ? जायते, अस्ति, वर्धते, विपरिणमते, क्षीयते, नश्यति, इन षट् विकारों से रहित निर्विकार आत्मा जगत् का कारण कैसे हो ? इससे यह जगत् अकारणरूप भ्रान्ति से भासता है। जैसे आकाश में नीलत्ता, सीप में रूपा निद्रादोष से स्वप्न दृष्टि भासते हैं तैसे ही यह जगत् भ्रान्ति से भासता है और जब स्वरूप में जागे तब जगद्भ्रम मिट जाता है। इससे कारणकार्य भ्रम को त्यागकर तुम अपने स्वरूप में स्थित हो। दुर्बोध से संकल्प रचना हुई है उसको त्याग करो और आदि, मध्य और अन्त से रहित जो सत्ता है उसी में स्थित हो तब जगद्भ्रम मिट जावेगा। इति श्रीयोगवाशिष्ठे स्थितिप्रकरणे जगत् निराकरणन्नाम प्रथमसर्गः ॥ १ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे देवताओं में श्रेष्ठ, रामजी ! बीज से अंकुरवत् आत्मा से जगत् का होना अङ्गीकार कीजिये तो भी नहीं बनता, क्योंकि आत्मा सर्वकल्पनाओं से रहित महाचैतन्य और निर्मल आकाशवत् है, उसको जगत् का बीज कैसे मानिये ? बीज के परिणाम में अंकुर होता है, और कारण समवायियों से होता है, आत्मा में समवाय और निमित्त सहकारी कदाचित् नहीं बनते। जैसे बन्ध्या स्त्री की सन्तान किसी ने नहीं देखी तैसे ही आत्मा से जगत् नहीं होता। जो समवाय और निमित्तकारण बिना पदार्थ भासे तो जानिये कि यह है नहीं, भ्रान्तिमात्र भासता है। आत्मसत्ता अपने आप में स्थित है। और सृष्टि स्थित, प्रलय से ब्रह्मसत्ता ही अपने आप में स्थित है। जो इस प्रकार स्थिति है तो कारण कार्य का क्रम कैसे हो और जो कारण कार्य भाव न हुआ तो पृथ्वी आदिक भूत कहाँ से उपजे ? और जो कारण कार्य मानिये तो पूर्व जो विकार कहे हैं उनका दूषण आता है। इससे न कोई कारण है और न कार्य है, कारण कार्य बिना जो पदार्थ भासे
स्थिति प्रकरण । ४०३
उसको सत्रूप जाने । वह मूर्ख बालक और विवेक से रहित है जो उसे कार्य कारण मानता है—इससे यह जगत् न आगे था, न अब है और न पीछे होगा—स्वच्छ चिदाकाशसत्ता अपने आप में स्थित है । जब जगत् का अत्यन्त अभाव होता है तब सम्पूर्ण ब्रह्म ही दृष्टि आता है । जैसे समुद्र में तरङ्ग भासते हैं तैसे ही आत्मा में जगत् भासता है—अन्यथा कारण कार्यभाव कोई नहीं और न प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव और अन्योन्याभाव ही है । प्रागभाव उसे कहते हैं कि जो प्रथम न हो, जैसे प्रथम पुत्र नहीं होता और पीछे उत्पन्न होता है । और जैसे मृत्तिका से घट उत्पन्न होता है । प्रध्वंसाभाव वह है जो प्रथम होकर नष्ट हो जाता है, जैसे घट था और नष्ट हो गया । अन्योन्याभाव वह है, जैसे घट में पट का अभाव है और पट में घट का अभाव है । ये तीन प्रकार के अभाव जिसके हृदय में हैं उसको जगत् दृढ़ होता है और उसको शान्ति नहीं होती । जब जगत् का अत्यन्ताभाव दीखता है तब चित्त शान्तिमान् होता है । जगत् के अत्यन्ताभाव के शिवाय और कोई उपाय नहीं और अशेष जगत् की निवृत्ति बिना मुक्ति नहीं होती सूर्य आदि लेकर जो कुछ प्रकाश पृथ्वी आदिक तत्त्व, क्षण, वर्ष, कल्प आदिक काल और मैं, यह, रूप, अवलोक, मनस्कार इत्यादिक जगत् सब संकल्पमात्र है और कल्प, कल्पक, ब्रह्माण्ड, ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र से कीट आदि पर्यन्त जो कुछ जगत् जाल है वह उपज उपजकर अन्तर्धान हो जाता है । महाचैतन्य परम आकाश में अनन्त वृत्ति उठती है । जैसे जगत् के पूर्व शान्त सत्ता थी तैसे ही तुम अब भी जानो और कुछ नहीं हुआ । परमाणु के सहस्रांश की नाईं सूक्ष्म चित्तकला है, उस चित्तकला में अनन्त कोटि सृष्टियाँ स्थित हैं, वही चित्तसत्ता फुरने से जगतरूप हो भासती है और प्रकाशरूप और निराकार शान्तरूप है, न उदय होता है, न अस्त होता है, न आता है और न जाता है । जैसे शिला में रेखा होती है तैसे आत्मा में जगत् है । जैसे आकाश में आकाशसत्ता फुरती है तैसे ही आत्मा में जगत् फुरता है और आत्मा ही में स्थित है । निराकार निर्विकाररूप विज्ञान घनसत्ता अपने आप में स्थित और उदय और अस्त से रहित, विस्तृतरूप है । हे
३६८ * योगवाशिष्ठ *
हो जायगा। संसाररूपी वृक्ष के सुमेरु आदिक पर्वत पत्ते हैं, तारागण कली और फूल हैं; मानों समुद्र रस हैं; जन्म-मरण बेल है, सुख-दुःख फल हैं और वह आकाश, दिशा, पाताल को धारण किये स्थित है। अहंकाररूपी वृक्ष पृथ्वी पर उत्पन्न हुआ है; अहंकार ही उसका बीज है। यह वृक्ष मिथ्या भ्रममात्र, असत्य और सत्य की नाईं स्थित है। इससे अहंकाररूप बीज का नाश करो और निरहंकाररूपी अग्नि में इसको जलाओ, तब इसका अत्यन्त अभाव हो जावेगा। यह भ्रम के कारण भय देता है, जैसे रज्जू में सर्पभ्रम डराता है। इससे निरहंकाररूपी अग्नि से उसका नाश करो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शताधिकद्वात्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३२ ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! यह ज्ञान जैसे उत्पन्न होता है सो सुनो। ब्रह्मविद्या-शास्त्र के सुनने और आत्मविचार में यह उपजता है। उस आत्मज्ञानरूपी अग्नि में संसाररूपी वृक्ष को जलाओ। यह आगे भी नहीं था, असत्त्वहीन ही उदय हुआ है और मन के संकल्प में विद्यमान की नाईं स्थित है। जैसे पत्थर में शिल्पी कल्पना करता है कि इतनी पुतलियाँ निकलेंगी, सो हुई कुछ नहीं, वैसे ही मनरूपी शिल्पी यह विश्वरूपी पुतलियाँ कल्पना में लाता है। जब मन का नाश करोगे, तब संसारभ्रम मिट जावेगा; आत्मविचार करके परमपद को प्राप्त होगे और अपना रूप परमात्मारूप प्रत्यक्ष भासित होगा। इसमें अहंता को त्याग कर अपने स्वरूप में स्थित होओ। हे विद्याधर ! यह संसाररूपी वृक्ष अहंतारूपी बीज से उपजता है। उसको जब ज्ञानरूपी अग्नि से जलाओगे, तब फिर यह जगत् न उपजेगा। यदि इसको विचार करके देखिये, तो अहं-त्व नहीं रहता।
हे विद्याधर ! यह अहं-त्व मिथ्या है—इसके अभाव की भावना करो यही उत्तम ज्ञान है। हे साधो ! जब गुरु के वचन सुनकर उनके अनुसार पुरुषार्थ करे, तब परमपद को प्राप्त होता है और जय होती है। हे विद्यारूपी कन्दरा को धारण करनेवाले, पर्वत, और विद्यारूपी पृथ्वी को धारण करनेवाले शेषनाग ! यह संसार एक आडम्बर है। इसके
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ३६६
सुमेरु जैसे कई खम्भे हैं जो रत्नों की पंक्ति से जड़े हुए हैं। वन, दिशा, पहाड़, वृक्ष, कन्दरा, वैताल, देवता, पाताल, आकाश, इत्यादिक सारा ब्रह्माण्ड उनके ऊपर स्थित है। रात्रि, दिन, भूत, प्राणी और इनके जो घर हैं सो चौपड़ के खाने हैं। जो जैसा कर्म करता है, वह उसके अनुसार दुःख-सुख भोगता है। ऐसे ही यह जो क्रियासंयुक्त सम्पूर्ण प्रपञ्च दिखाई देता है सो भ्रम से सिद्ध है—इसलिए मिथ्या है। जैसे स्वप्न की सृष्टि संकल्प से भासित होती है, वैसे ही यह सृष्टि भी भ्रम से भासित होती है और अज्ञान की रची हुई है। आत्मा के अज्ञान से भासित होती है और आत्मा के ज्ञान से लीन हो जाती है। जब सृष्टि है तब भी परमात्मतत्त्व ही है और जब सृष्टि न होगी तब भी परमात्मतत्त्व ही होगा। आगे भी वही था। यह जो कुछ प्रपञ्च तुझे दीखता है सो शून्य आकाश ही है। त्रिगुणमय प्रपञ्च गुणों का रचा हुआ अपने स्वरूप के प्रमाद से स्थित हुआ है। आत्मज्ञान से यह शून्य सदृश हो जावेगा। जब प्रपञ्च ही शून्य हुआ, तब आत्मा और अनात्मा का कहना भी न रहेगा। पीछे जो शेष रहेगा, वह केवल शुद्ध परमतत्त्व और तेरा अपना रूप है। उसमें स्थित हो रहे और दृश्य का त्याग-कर। यह विचार कि न मैं हूँ और न जगत् है। जब तू ऐसा होगा, तब तेरी जय होगी। आत्मपद सबसे उत्तम है। जब तू आत्मपद में स्थित होगा, तब सबसे उत्तम होगा और तेरी जय होगी—इससे आत्मपद में ही स्थित हो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे संगराडम्बरोत्पत्ति- नाम शताधिकत्रयस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३३ ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! यह प्रपञ्च भी आत्मा का चमत्कार है। आत्मा शुद्ध चैतन्य है, जिसमें जड़ और चेतन स्थित हैं। वह सबका अधिष्ठान है। वह सत्तामात्र तेरा अपना रूप है। वह अहं-त्वं शब्द-अर्थ से रहित आत्मत्वमात्र है, पर सत्यस्वरूप होकर असत्य की भाँति स्थित है। हे विद्याधर ! तू इस जड़ और चेतन से अबोध हो रह। जब तू अबोध होगा, तब शान्त और चिद्घन होगा। ये जो
४०० * योगवासिष्ठ *
जड़ और चेतन हैं, इन दोनों का परमार्थ चैतन्य के ऊपर आवरण है । यद्यपि वह अदृश्य है तो भी इनके भीतर ही रहता है, जैसे समुद्र के भीतर बड़वाग्नि रहती है । इन जड़-चेतन रूपों का कारणरूप वही है । इनकी उत्पत्ति भी उर्मी में होती है, और नाश भी वही करता है । हे विद्याधर ! जब ऐसे जाना कि मैं चेतनरूप भी नहीं और जड़ भी नहीं तो पीछे जो रहेगा, वही तेरा स्वरूप है । जब तेरे भीतर इन जड़ और चेतन, दोनों का स्पर्श नहीं हुआ, तब सबके भीतर जो चैतन्य है, वही ब्रह्म तुझे भासित होगा । विश्व और आत्मा में कुछ अन्तर नहीं हुआ । जैसे सूर्य की किरणों का चमत्कार जलाभास होता है, वैसे ही शुद्ध चैतन्य का चमत्कार विश्व होकर दिखता है ।
हे अङ्ग ! जैसे दीवाल पर पुतलियाँ लिखी होती हैं तो वे दीवाल में भिन्न चितेरे ने नहीं लिखी हैं, वैसे ही शून्य आकाश में चित्तरूपी चितेरे ने विश्वरूपी पुतलियों की कल्पना की है । जैसे सुवर्ण कल्पित भूषण सुवर्ण से भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा में अज्ञान से जो विश्व देखते हैं, वह आत्मा से भिन्न नहीं । जगत, ब्रह्म, आत्मा, आकाश, देश, काल सब उर्मी तत्त्व की संज्ञा है । वही शुद्ध चैतन्य आकाश है, जिसका चमत्कार ऐसे स्थित है । उर्मी तत्त्व में तू भी स्थित हो रह । यह जगत् ऐसे है, जैसे दूर-दृष्टि से आकाश में बादल हाथी की मूँड़ में लगते हैं । यह जो अहं-त्वं-रूप जगत् है सो अबोध से भासित होता और बोध से लीन हो जाता है—जैसे मरुस्थल में सूर्य की किरणों में जल दिखता है, वैसे ही यह जगत् है—इसमें डमका त्याग करो ।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे चित्तचमत्कारो नाम शताधिकचतुस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३४ ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! यह सब स्थावर जङ्गम जगत् आत्मा में उत्पन्न हुआ है और आत्मा ही में स्थित है । आत्मा ही विश्व में स्थित है । जैसे स्वप्न का विश्व स्वप्न देखनेवाले में स्थित होता है । आत्मा किसी का कारण नहीं; क्योंकि अद्वैत है । हे अङ्ग ! जो तू उस पद के पाने की इच्छा करता है तो तू ऐसा निश्चय कर कि न मैं हूँ और
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ <span style="float:right;">४०१</span>
न यह जगत् है। जब तू ऐसा जानेगा, तब आत्मपद की प्राप्ति होगी, जो कि देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित है। सर्वत्र सब वही परमात्मतत्त्व है। जगत् का कर्त्ता संकल्प ही है; क्योंकि संकल्प से जगत् उत्पन्न होता है। जैसे पवन से अग्नि उत्पन्न होता है और पवन ही से दीपक का निर्वाण होता है, वैसे ही जब संकल्प बहिर्मुख फुरता है, तब संसार उदय हो भासित होता है, और जब संकल्प अन्तर्मुख होता है, तब आत्मपद प्राप्त होता है, सब प्रपञ्च उरमी में लय हो जाता है। इस प्रकार संसार की नाना प्रकार की संज्ञाएँ फुरने से ही होती हैं, स्वरूप में कुछ नहीं है। न सत्य है, न असत्य है, न स्वतः है, न अन्य से है। यह सब कल्पनामात्र है। सत्, असत् और स्वतः, अन्य का जब अभाव हुआ, तब वहाँ अहं-त्वं कहाँ मिलेंगे? वह है नहीं और बालक के यक्षवत् भ्रममात्र है।
हे साधो! जहाँ अहं-त्वं नष्ट हो गये, वहाँ जो सत्ता बची वही परमपद है। जहाँ जगत् का भ्रम है, वहाँ वह विचार से लीन हो जाता है। वास्तव में पूछो तो ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं—नाम-मात्र दो हैं—जैसे घट और कुम्भ—परन्तु भ्रम से नानात्व भासित होता है। जैसे समुद्र में उठनेवाले आवर्त्त और तरङ्ग जल से कुछ भिन्न नहीं और पवन के संयोग से उनके आकार भासित होते हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् कुछ भिन्न नहीं। संकल्प के उठने से नाना प्रकार का जगत् भासित होता है। हे अङ्ग! संकल्प के साथ मिलकर चित्त जैसी भावना करता है, वैसा ही अपना रूप देखता है स्वरूप से कुछ भिन्न नहीं, परन्तु जीव भावना से और का और देखता है। जैसे शुद्ध मणि के निकट कोई रङ्ग रखिये, वैसा ही रंग भासित होता है, पर मणि में कोई रङ्ग नहीं होता, वैसे ही चित्त शक्ति में कुछ हुआ नहीं, पर हुए की नाईं स्थित है। इससे अपने स्वरूप की भावना करो और जड़ चैतन्य को छोड़कर शुद्ध चैतन्य में स्थित होओ। जब ऐसे जानकर अपने स्वरूप में स्थित होगे, तब तुम्हें उत्थान में भी अपना स्वरूप दिखेगा। जैसे स्थिर समुद्र में जो तरङ्ग उठते हैं, वे कारणरूप जल के
४०२ ☸ योगवाशिष्ट ☸
बिना तो नहीं होते, वैसे ही कारणरूप ब्रह्म बिना जगत् नहीं है; परन्तु ब्रह्मसत्ता अकर्ता, अद्वैत और अच्युत है। इसी से कहा है कि ब्रह्म अकर्ता है और जगत् अकारणरूप है। जो जगत् अकारणरूप है तो वह न उपजता है और न नाश होता है—मरुस्थल के जल की तरह भ्रममात्र है। इसी से कहा है कि जगत् कुछ वस्तु नहीं, केवल अज, अच्युत और शान्तरूप आत्मतत्त्व ही अखण्डित स्थित है और शिला कोश की तरह अद्वैत चिन्मात्र है। जिसके हृदय में चिन्मात्र की भावना नहीं, उस मूर्ख को हम क्या कहें ! हे साधो ! वास्तव में परमार्थ दृष्टि से कुछ भी नहीं बना, पर जहाँ-जहाँ मन है, वहाँ-वहाँ अनेक जगत् हैं। तृण से सुमेरु तक सब जगत् में हैं। जो विचारकर देखिये तो सब वही ब्रह्मरूप है, और कुछ नहीं। जैसे सुवर्ण को जान लेने से भूषण भी सुवर्ण भासित होता है, वैसे ही केवल सत्ता समानपद एक अद्वैत है, भिन्न कुछ नहीं। और भिन्न-भिन्न संज्ञाएँ भी वही हैं।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे शताधिकपञ्चत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥१३५॥
भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! जब आत्मपद प्राप्त होता है, तब ऐसी अवस्था होती है कि जो नग्न शरीर हो और उस पर बहुत शस्त्रों की वर्षा हो तो भी उसमे जीव दुःखी नहीं होता और सुन्दर अप्सरा कण्ठ से लगे तो हर्ष नहीं होता, अर्थात् दोनों ही में समदर्शी रहता है। हे विद्याधर ! तब तक आत्मपद का अभ्यास करे, जब तक संसार में सुपुप्ति की नाईं न हो जाय। अभ्यास ही से आत्मपद प्राप्त होगा। जब आत्मपद की प्राप्ति होगी, तब पाञ्चभौतिक शरीर को ताप या ज्वर स्पर्श न करेंगे, और यदि शरीर के हों भी, तो भी उनके अन्तः-करण में प्रवेश नहीं करते। वह केवल शान्तपद में स्थित रहता है—जैसे जल कमल को स्पर्श नहीं करता। हे देवपुत्र ! जब तक देहादि में अभ्यास है, तब तक आत्मा के प्रमाद से सुख-दुःख स्पर्श करते हैं। जब आत्मा का साक्षात्कार होता है, तब सब प्रपञ्च भी आत्मरूप हो जाते हैं। हे विद्याधर ! जैसे कोई पुरुष विष-पान करता है तो उसको जलन और खाँसी होती है—यह अवस्था विष की है—विष में भिन्न और कुछ