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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

मन्यु ही इंद्र हैं और मन्यु ही समस्त देव हैं. मन्यु देवों का आह्वान करने वाले, वरुण एवं जातवेद अग्नि हैं. जो मानुषी प्रजाएं हैं, वे भी मन्यु की ही स्तुति करती हैं. हे मन्यु! तुम तप से संयुक्त हो कर हमारी रक्षा करो. (२) अभीहि मन्यो तवसस्तवीयान् तपसा युजा वि जहि शत्रून्. अमित्रहा वृत्रहा दस्युहा च विश्वा वसून्या भरा त्वं नः.. (३) हे मन्यु! हमारे सामने आओ एवं महान से भी महान बन कर अपने संताप की सहायता से हमारे शत्रुओं का विनाश करो. स्नेह न करने वाले के हंता, शत्रु वधकारक एवं दस्यु विनाशकारी तुम हमारे लिए सभी धनों को लाओ. (३) त्वं हि मन्यो अभिभूत्योजाः स्वयंभूर्भामो अभिमातिषाहः. विश्वचर्षणिः सहुरिः सहीयानस्मास्वोजः पृतनासु धेहि.. (४) हे मन्यु! तुम्हारा बल पराजित करने वाला है. तुम स्वयंभू, क्रोधी, शत्रुओं को सहन करने वाले, विश्व के द्रष्टा, सहनशील एवं सहने वालों में श्रेष्ठ हो. तुम संग्राम में हमें बल प्रदान करो. (४) अभागः सन्नप परेतो अस्मि तव क्रत्वा तविषस्य प्रचेतः. तं त्वा मन्यो अक्रतुर्जिहीडाहं स्वा तनूर्बलदावा न एहि.. (५) हे उत्तम ज्ञान वाले मन्यु! तुम्हारे महान यज्ञ में भाग न लेने वाला अर्थात् तुम्हारा यजमान न बनने वाला मैं युद्ध से भाग आया हूं. तुम्हारे संतोष के कर्म न करने वाले मैं ने तुम्हें क्रोधित बना दिया. इस समय तुम मेरे बलदाता बन कर आओ. (५) अयं ते अस्म्युप न एह्यर्वाङ् प्रतीचीनः सहुरे विश्वदावन्. मन्यो वज्रिन्नभि न आ ववृत्स्व हनाव दस्यूंरुत बोध्यापेः.. (६) हे मन्यु! मैं तुम्हारा यज्ञ कर्म करने वाला हो गया हूं. तुम मेरे समीप आओ और मेरे सामने हो कर शत्रुओं की ओर चलो. हे सहनशील एवं सभी फल देने वाले! हे वर्जनशील आयुधधारी मित्र! हमारे सामने रहो. हम दोनों अपने शत्रुओं का विनाश करेंगे. तुम हमें अपना बंधु जानो. (६) अभि प्रेहि दक्षिणतो भवा नो ऽ धा वृत्राणि जङ्घनाव भूरि. जुहोमि ते धरुणं मध्वो अग्रमुभावुपांशु प्रथमा पिबाव.. (७) हे मन्यु! हमारे सामने आओ और हमारी दाहिनी ओर रह कर हमारे सचिव का काम करो. इस के पश्चात हम बहुत से शत्रुओं का विनाश करेंगे. हम तुम्हारे लिए धारण करने वाले मधुर सोमरस का सार अंश देते हैं. हम दोनों सब से पहले इस प्रकार सोमरस पिएं कि किसी को पता नहीं चले. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-३३ देवता—अग्नि

सूक्त-३३ देवता—अग्नि अप नः शोशुचदघमग्ने शुशुग्ध्या रयिम्. अप नः शोशुचदघम्.. (१) हे अग्नि! तुम्हारी कृपा से हमारा पाप नष्ट हो जाए. तुम हमारे धन को सभी ओर से समृद्ध करो और हमारे पाप को नष्ट करो. (१) सुक्षेत्रिया सुगातुया वसूया च यजामहे. अप नः शोशुचदघम्.. (२) हे अग्नि! हम शोभन क्षेत्र एवं शोभन मार्ग पाने की इच्छा से तुम्हारा हवन करते हैं. तुम हमारे धन को सभी ओर समृद्ध करो तथा हमारे पाप को नष्ट करो. (२) प्र यद् भन्दिष्ठ एषां प्रास्माकासश्च सूरयः. अप नः शोशुचदघम्.. (३) हे अग्नि! मैं उन स्तोताओं के मध्य श्रेष्ठ स्तोता हूं और मेरे ज्ञानी पुत्र आदि भी स्तोताओं में श्रेष्ठ हैं, इसलिए तुम हमारे पाप को नष्ट करो. (३) प्र यत् ते अग्ने सूरयो जायेमहि प्र ते वयम्. अप नः शोशुचदघम्.. (४) हे अग्नि! तुम्हारे स्तोता जो तुम्हारी कृपा से जन्म लेते हैं. इसलिए हम विद्वान् भी तुम्हारी स्तुति के कारण पुत्र, पौत्र आदि से समृद्ध हों. तुम हमारे पाप को नष्ट करो. (४) प्र यदग्नेः सहस्वतो विश्वतो यन्ति भानवः. अप नः शोशुचदघम्.. (५) बलवान अग्नि की किरणें सभी ओर प्रवर्तित होती हैं, इसलिए तुम हमारे पापों को नष्ट करो. (५) त्वं हि विश्वतोमुख विश्वतः परिभूरसि. अप नः शोशुचदघम्.. (६) हे अग्नि! तुम सभी ओर मुख वाले एवं सर्वव्यापक हो. तुम हमारे पाप नष्ट करो. (६) द्विषो नो विश्वतोमुखाति नावेव पारय. अप नः शोशुचदघम्.. (७) हे सभी ओर मुख वाले अग्नि! जिस प्रकार लोग नाव के द्वारा उस पार पहुंच जाते हैं, उसी प्रकार हमारे शत्रुओं को हम से दूर करो तथा हमारे पापों को नष्ट करो. (७) स नः सिन्धुमिव नावाति पर्षा स्वस्तये. अप नः शोशुचदघम्.. (८) हे उक्त गुणों वाले अग्नि! जिस प्रकार नाव के द्वारा सागर को पार करते हैं, उसी प्रकार हमारे शत्रुओं को हम से दूर करो एवं हमारे पापों को नष्ट करो. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-३४ देवता—ब्रह्मौदन ब्रह्मास्य शीर्षं बृहदस्य पृष्ठं वामदेव्यमुदरमोदनस्य. छन्दांसि पक्षौ मुखमस्य सत्यं विष्टारी जातस्तपसो ऽ धि यज्ञः.. (१) दिए जाते हुए ब्रह्मौदन की स्तुति की जा रही है—"ब्रह्म अर्थात् रथंतर साम इस ओदन का शीश एवं बृहत् साम इस की पीठ है. वामदेव ऋषि द्वारा देखा गया साम इस का पेट तथा गायत्री आदि छंद इस के पक्ष अर्थात् दोनों कोखें हैं. सत्य नाम का साम इस का मुख है. विस्तार वाला ब्रह्मौदन सत्र यज्ञ ब्रह्म के भीतरी भाग से उत्पन्न हुआ है." (१) अनस्थाः पूताः पवनेन शुद्धाः शुचयः शुचिमपि यन्ति लोकम्. नैषां शिश्नं प्र दहति जातवेदाः स्वर्गेलोके बहु स्त्रैणमेषाम्.. (२) सत्र यज्ञ के करने वाले अमृतमय, वायु के द्वारा पवित्र, निर्मल, एवं दीप्तिशाली होते हैं और देहावसान के पश्चात ज्योतिर्मय लोक को जाते हैं. स्वर्गलोक में वर्तमान ब्रह्मौदन सत्र यज्ञ करने वालों की इंद्रियों को अग्नि नहीं जलाती. इन्हें भोगने के लिए स्त्रियों का समूह प्राप्त होता है. (२) विष्टारिणमोदनं ये पचन्ति नैनानवर्तिः सचते कदा चन. आस्ते यम उप याति देवान्त्सं गन्धवैर्मदते सोम्येभिः.. (३) जो यजमान बताई हुई रीति से विस्तृत अवयवों वाले ब्रह्मौदन को पकाते हैं, उन के समीप दरिद्रता कभी नहीं आती. वह यजमान देहांत के पश्चात यमराज के द्वारा पूजित हो कर सुख से निवास करता है तथा यम की अनुमति पा कर देवों के समीप पहुंचता है. वह सोमरस के योग्य विश्वावसु आदि गंधर्वों के साथ प्रसन्न रहता है. (३) विष्टारिणमोदनं ये पचन्ति नैनान् यमः परि मुष्णाति रेतः. रथी ह भूत्वा रथयान ईयते पक्षी ह भूत्वाति दिवः समेति.. (४) जो यजमान बताई हुई रीति से विस्तृत अवयवों वाले ब्रह्मौदन को पकाते हैं, यमराज उन के वीर्य का अपहरण नहीं करते. रथ द्वारा जाने योग्य भूलोक में वे जब तक जीवित रहते हैं, तब तक रथ पर बैठ कर चलते हैं या पक्षों वाले हो कर अंतरिक्ष के ऊपर वर्तमान लोक को पार कर के भोगों से युक्त होते हैं. (४) एष यज्ञानां विततो वहिष्ठो विष्टारिणं पक्त्वा दिवमा विवेश. आण्डीकं कुमुदं सं तनोति बिसं शालूकं शफको मुलाली. एतास्त्वा धारा उप यन्तु सर्वाः स्वर्गे लोके मधुमत् पिन्वमाना उप त्वा तिष्ठन्तु पुष्करिणीः समन्ताः.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

वह ब्रह्मौदन सत्र यज्ञ विस्तृत होने के कारण यज्ञों में सब से अधिक वहन करने वाला है. यजमान इस विस्तीर्ण अवयवों वाले ओदन को पका कर स्वर्ग प्राप्त करता है, अंडे की आकृति वाले कंद से उत्पन्न कुमुद फूल को हृदय पर रखता है तथा कमल तंतुओं को, उत्पल (कमल) के कंद को एवं जल में उत्पन्न तथा खुर की आकृति वाली मृणाली अर्थात् कमलिनी को सीने पर रखता है. हे यजमान! स्वर्ग में तेरे समीप चारों ओर कमल के सरोवर स्थित रहें. ये सभी धाराएं ब्रह्मौदन सत्र यज्ञ के फल के रूप में प्राप्त स्वर्ग में मधुरता पूर्ण सिंचन करती हुई तेरे समीप पहुंचें तथा समीप में वर्तमान सरोवर भी तेरे समीप उपस्थित हों. (५) घृतहदा मधुकूलाः सुरोदकाः क्षीरेण पूर्णा उदकेन दध्ना. एतास्त्वा धारा उप यन्तु सर्वाः स्वर्गे लोके मधुमत् पिन्वमाना उप त्वा तिष्ठन्तु पुष्करिणीः समन्ताः.. (६) हे यजमान! स्वर्गलोक में घी से भरे हुए गड्ढों वाली, शहद के किनारों वाली, मदिरा रूपी जल वाली तथा दूध, दही एवं जल से पूर्ण सभी धाराएं तेरे समीप पहुंचें. ब्रह्मौदन सत्र यज्ञ के फल के रूप में प्राप्त स्वर्ग में मधुरता पूर्ण सिंचन करती हुई ये सभी धाराएं तेरे समीप पहुंचें तथा समीप में वर्तमान सरोवर भी उपस्थित हों. (६) चतुरः कुम्भांश्चतुर्धा ददामि क्षीरेण पूर्णाँ उदकेन दध्ना. एतास्त्वा धारा उप यन्तु सर्वाः स्वर्गे लोके मधुमत् पिन्वमाना उप त्वा तिष्ठन्तु पुष्करिणीः समन्ताः.. (७) मैं दूध, दही, शहद और मदिरा से भरे हुए चार घड़ों को पूर्व, दक्षिण, पश्चिम एवं उत्तर दिशाओं में रखता हूं. हे यजमान! ब्रह्मौदन सत्र यज्ञ के फल के रूप में प्राप्त स्वर्ग में दूध, जल एवं दही से पूर्ण ये सभी धाराएं तेरे समीप पहुंचें एवं माधुर्य का सिंचन करते हुए सरोवर तेरे समीप उपस्थित रहें. (७) इममोदनं नि दधे ब्राह्मणेषु विष्टारिणं लोकजितं स्वर्गम्. स मे मा क्षैष्ट स्वधया पिन्वमानो विश्वरूपा धेनुः कामदुघा मे अस्तु.. (८) इस विस्तृत अवयवों वाले, कर्म फल को जीतने वाले एवं स्वर्ग के साधन ओदन को मैं ब्राह्मणों में रखता हूं. क्षीर आदि रस से बढ़ता हुआ यह नष्ट न हो. इस के फल के रूप में मुझे भांतिभांति के फल देने वाली एवं कामनाएं पूर्ण करने वाली धेनु प्राप्त हो. (८) सूक्त-३५ देवता—अतिमृत्यु यमोदनं प्रथमजा ऋतस्य प्रजापतिस्तपसा ब्रह्मणेऽपचत्. यो लोकानां विधृतिर्नाभिरेषात् तेनौदनेनाति तराणि मृत्युम्.. (१) परब्रह्म से प्रथम उत्पन्न हिरण्यगर्भ नामक प्रजापति ने तप के द्वारा ब्रह्म के लिए जो ebook converter DEMO Watermarks*

ओदन पकाया था तथा जो ओदन पृथ्‍वी आदि लोकों को बांधने वाला है, उस ओदन से मैं मृत्यु को पार करूं. (१) येनातरन् भूतकृतो ऽ ति मृत्युं यमन्वविन्दन् तपसा श्रमेण. यं पपाच ब्रह्मणे ब्रह्म पूर्वं तेनौदनेनाति तराणि मृत्युम्.. (२) प्राणियों के निर्माण कर्ता देवों ने जिस ओदन की सहायता से मृत्यु का अतिक्रमण किया था, जिस ओदन को तप और श्रम के द्वारा प्राप्त किया था तथा जिसे हिरण्यगर्भ प्रजापति ने सब से पहले ब्रह्म के लिए पकाया था, उसी ओदन की सहायता से मैं मृत्यु को पार करूं. (२) यो दाधार पृथिवीं विश्वभोजसं यो अन्तरिक्षमापृणाद् रसेन. यो अस्तभ्नाद् दिवमूर्ध्वो महिम्ना तेनौदनेनाति तराणि मृत्युम्.. (३) जिस ओदन ने समस्त प्राणियों का भोग बनी हुई पृथ्‍वी को धारण किया था, जो ओदन अपने रस से अंतरिक्ष को पूर्ण करता है तथा जिस ओदन ने अपनी महत्ता से द्युलोक अर्थात् स्वर्ग को ऊपर धारण किया था, उसी ओदन की सहायता से मैं मृत्यु को पार करता हूं. (३) यस्मान्मासा निर्मितास्त्रिंशदराः संवत्सरो यस्मान्निर्मितो द्वादशारः. अहोरात्रा यं परियन्तो नापुस्तेनौदनेनाति तराणि मृत्युम्.. (४) जिस ब्रह्मोदन से मास उत्पन्न हुए, जिन में पहिए के 'अरे' के समान तीस दिन स्थित हैं, जिस ब्रह्मोदन से बारह महीनों वाला संवत्सर उत्पन्न हुआ, जिस ब्रह्मोदन को रात और दिन समीप रहते हुए भी प्राप्त नहीं कर पाते, उसी ओदन की सहायता से मैं मृत्यु को पार करूं. (४) यः प्राणदः प्राणदवान् बभूव यस्मै लोका घृतवन्तः क्षरन्ति. ज्योतिष्मतीः प्रदिशो यस्य सर्वास्तेनौदनेनाति तराणि मृत्युम्.. (५) जो ओदन मृत्यु के समीप पहुंचे हुए जनों को प्राण देने वाला हुआ, जिस ओदन के लिए लोक घी की धाराएं बरसाते हैं तथा जिस ओदन के तेज से सभी दिशाएं प्रकाशित हैं, उसी ओदन की सहायता से मैं मृत्यु को पार करता हूं. (५) यस्मात् पक्वादमृतं संबभूव यो गायत्र्या अधिपतिर्बभूव. यस्मिन् वेदा निहिता विश्वरूपास्तेनौदनेनाति तराणि मृत्युम्.. (६) जिस पके हुए ब्रह्मोदन से स्वर्ग का अमृत उत्पन्न हुआ, जो छंदों की प्रमुख गायत्री का अधिपति बना तथा जिस में शाखा भेद से समस्त वेद स्थित हैं, उसी ओदन की सहायता से मैं मृत्यु को पार करता हूं. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-३६ देवता—सत्य ओज वाले अग्नि

अव बाधे द्विषन्तं देवपीयुं सपत्ना ये मे ऽ प ते भवन्तु. ब्रह्मोदनं विश्वजितं पचामि शृण्वन्तु मे श्रद्दधानस्य देवाः.. (७) मैं हिंसा करने वाले शत्रु का वध करता हूं तथा देवों के हिंसकों की हत्या करता हूं. जो मेरे शत्रु हैं, वे भाग जाएं. इस के निमित्त मैं सब को जीतने वाले ब्रह्मोदन को पकाता हूं. मुझ श्रद्धालु के वचनों को देव सुनें और मेरी सहायता करें. (७) सूक्त-३६ देवता—सत्य ओज वाले अग्नि तान्तसत्यौजाः प्र दहत्वग्निर्वैश्वानरो वृषा. यो नो दुरस्याद् दिप्साच्चाथो यो नो अरातियात्.. (१) सच्चे बल वाले, वैश्वानर एवं गर्भाधान में समर्थ अग्नि उन शत्रुओं को जलाएं, जो हमारे प्रति दुष्टों के समान आचरण करें, जो हमारी हिंसा करना चाहें तथा जो हमारे प्रति शत्रु के समान आचरण करें. (१) यो नो दिप्साददिप्सतो दिप्सतो यश्च दिप्सति. वैश्वानरस्य दंष्ट्रयोरग्नेरपि दधामि तम्.. (२) जो शत्रु हिंसा की इच्छा न करने वाले मुझ को मारना चाहता है तथा जिस हिंसा की इच्छा करने वाले को मैं मारना चाहता हूं, उस को मैं वैश्वानर अग्नि की दाढ़ों में रखता हूं. (२) य आगरे मृगयन्ते प्रतिक्रोशे ऽ मावास्ये. क्रव्यादो अन्यान् दिप्सतः सर्वांस्तान्सहसा सहे.. (३) युद्ध भूमि में जो पिशाच हमें खाने के लिए खोजते हैं तथा शत्रुओं द्वारा किए गए आक्रोश के कारण अमावस्या की आधी रात में हमें मारना चाहते हैं, हम मंत्रों के प्रभाव से उन्हें पराजित करते हैं. (३) सहे पिशाचान्त्सहसैषां द्रविणं ददे. सर्वान् दुरस्यतो हन्मि सं म आकूतिर्ऋध्यताम्.. (४) मैं बल के द्वारा राक्षसों को पराजित करता हूं तथा उन राक्षसों के धन को अपने अधिकार में करता हूं. मैं द्वेष करने वाले सभी शत्रुओं को मारता हूं. मेरा इष्ट फल विषयक संकल्प और सुख समृद्ध हो. (४) ये देवास्तेन हासन्ते सूर्येण मिमते जवम्. नदीषु पर्वतेषु ये सं तैः पशुभिर्विदे.. (५) हे अग्नि आदि देवो! जो पशु, राक्षस, पिशाच आदि से बचना चाहते हैं तथा उन्हें छोड़ ebook converter DEMO Watermarks*

कर सूर्य के समान वेग से भागते हैं तथा जो पशु नदियों और तीर्थों में घूमते हैं, तुम्हारे प्रभाव से मैं उन राक्षस आदि को मार कर उन पशुओं के साथ संयुक्त होता हूं. (५) तपनो अस्मि पिशाचानां व्याघ्रो गोमतामिव. श्वानः सिंहमिव दृष्ट्वा ते न विन्दन्ते न्यञ्चनम्.. (६) मैं मंत्रों के सामर्थ्य से पिशाचों को उसी प्रकार संताप देता हूं, जिस प्रकार बाघ गायों के स्वामियों को दुःखी करता है. सिंह को देख कर जिस प्रकार कुत्ता भय से छिप जाता है, उसी प्रकार मेरे मंत्रों के प्रभाव से वे अधोगति पाते हैं. (६) न पिशाचैः सं शक्नोमि न स्तेनैर्न वनर्गूभिः. पिशाचास्तस्मान्नश्यन्ति यमहं ग्राममाविशे.. (७) मैं पिशाचों, चोरों और वन में रहने वाले लुटेरों से न मिलूं. मैं जिस ग्राम में प्रवेश कर के निवास करूं, उस से पिशाच भाग जाएं. (७) यं ग्राममाविशत इदमुग्रं सहो मम. पिशाचास्तस्मान्नश्यन्ति न पापमुप जानते.. (८) मंत्र के प्रभाव से उत्पन्न मेरा यह बल जिस ग्राम में प्रवेश कर के निवास करता है, पिशाच उस ग्राम से भाग जाता है. वहां रहने वाले लोग पिशाचों के हिंसा रूपी पाप को नहीं जानते. (८) ये मा क्रोधयन्ति लपिता हस्तिनं मशका इव. तानहं मन्ये दुर्हितान् जने अल्पशयूनिव.. (९) जो पिशाच मिल कर मुझे इस प्रकार क्रोधित करते हैं, जिस प्रकार मच्छर हाथी को क्रोध बढ़ा देते हैं; मैं उन्हें उसी प्रकार हनन के योग्य दुष्ट जानता हूं, जिस प्रकार जनसंचार के स्थान पर छोटे शरीर वाले कीड़े होते हैं. (९) अभि तं निर्ऋतिर्धत्तामश्वमिवाश्वाभिधान्या. मल्वो यो मह्यं क्रुध्यति स उ पाशान्न मुच्यते.. (१०) पाप देवता मेरे शत्रु को उसी प्रकार बांध लें, जिस प्रकार रस्सी घोड़े को बांधती हैं. जो शत्रु मेरे लिए क्रोध करता है, वह शत्रु पाप देवता निर्ऋति के पाश से न छूटे. (१०) सूक्त-३७ देवता—जड़ीबूटी आदि त्वया पूर्वमथर्वाणो जघ्नु रक्षांस्योषधे. त्वया जघान कश्यपस्त्वया कण्वो अगस्त्यः.. (१)

हे जड़ीबूटियो! प्राचीन काल में तुम्हें साधन बना कर अथर्ववेद संबंधी महर्षियों ने राक्षसों को मारा था. तुम्हारे द्वारा कश्यप, कण्व और अगस्त्य ऋषियों ने राक्षसों का वध किया. (१) त्वया वयमप्सरसो गन्धर्वाञ्चातयामहे. अजशृङ्गयज रक्षः सर्वान् गन्धेन नाशय.. (२) हे अजशृंगी नाम की जड़ी! तुझे साधन बना कर हम उपद्रव करने वाली अप्सराओं और गंधर्वों का नाश करते हैं. तू राक्षसों को यहां से दूर भगा तथा अपनी गंध से सभी राक्षसों का विनाश कर. (२) नदीं यन्त्वप्सरसो ऽ पां तारमवश्वसम्. गुल्गुलूः पीला नलद्यौ ३ क्षगन्धिः प्रमन्दनी. तत् परेताप्सरसः प्रतिबुद्धा अभूतन.. (३) गंधर्वों की पत्नियां अप्सराएं अपने वास स्थान पर उसी प्रकार चली जाएं, जिस प्रकार नदी पार करने वाले मल्लाह के समीप पहुंचते हैं. हे अप्सराओ! गुग्गुलु, पीला, नलवी, ओक्षगंधि एवं प्रमंदिनी के हवन से भयभीत हो कर अपने निवास स्थान को चली जाओ तथा वहीं रहो. (३) यत्राश्वत्था न्यग्रोधा महावृक्षाः शिखण्डिनः. तत् परेताप्सरसः प्रतिबुद्धा अभूतन.. (४) जहां अश्वत्थ, न्यग्रोध आदि महावृक्ष एवं मोर होते हैं, हे अप्सराओ! वहां से अपने निवास स्थान को चली जाओ तथा वहीं रुकी रहो. (४) यत्र वः प्रेङ्खा हरिता अर्जुना उत यत्राघाटाः कर्कर्यः संवदन्ति. तत् परेताप्सरसः प्रतिबुद्धा अभूतनः.. (५) हे अप्सराओ! तुम्हारे खेलने के लिए जहां झूले पड़े हैं, उन झूलों का रंग हरा और सफेद है. जहां कर्करी नाम के बाजे बजाए जाते हैं, वहां से भाग कर अपने निवास स्थान को चली जाओ तथा वहीं रहो. (५) एयमगन्नोषधीनां वीरुधां वीर्यावती. अजशृङ्गयराट्की तीक्ष्णशृङ्गी वृषतु.. (६) जड़ीबूटियों एवं वृक्षों में सब से अधिक शक्ति वाली अजशृंगी, अराटकी तथा तीक्ष्ण शृंगी नाम की जड़ीबूटियां आ गई हैं. इस स्थान से राक्षस भाग जाएं. (६) आनृत्यतः शिखण्डिनो गन्धर्वस्याप्सरापतेः. भिनद्मि मुष्कावपि यामि ebook converter DEMO Watermarks*

शेषः.. (७) मैं मोर के समान नाचते हुए अप्सरा के पति गंधर्व के अंडकोषों को फोड़ता हूं तथा उस के पुरुष जननांग को निष्क्रिय बनाता हूं. (७) भीमा इन्द्रस्य हेतयः शतमृष्टीरयस्मयीः. ताभिर्हविरदान् गन्धर्वानवकादान् व्यृषतु.. (८) इंद्र का आयुध भयंकर, सौ धारों वाला एवं लोहे का बना हुआ है. उसी से वह हवि न देने वाले एवं शैवाल खाने वाले गंधर्वों को मारें. (८) भीमा इन्द्रस्य हेतयः शतमृष्टीर्हिरण्ययीः. ताभिर्हविरदान् गन्धर्वानवकादान् व्यृषतु.. (९) इंद्र के आयुध भयंकर, सौ धारों वाले एवं सोने के बने हैं. इंद्र उन्हीं से हवि न देने वाले तथा शैवाल भक्षण करने वाले गंधर्वों का वध करें. (९) अवकादानभिशोचानप्सु ज्योतय मामकान्. पिशाचान्त् सर्वानोषधे प्र मृणीहि सहस्व च.. (१०) हे अजशृंगी जड़ी! शैवाल खाने वाले, सभी को शोक पहुंचाने वाले उन गंधर्वों को जलों में प्रकाशित करो, जो युद्ध से संबंधित हैं. तुम सभी पिशाचों को मारो तथा पराजित करो. (१०) श्वैवैकः कपिरिवैकः कुमारः सर्वकेशकः. प्रियो दृश इव भूत्वा गन्धर्वः सचते स्त्रियस्तमितो नाशयामसि ब्रह्मणा वीर्यवता.. (११) मायावी होने के कारण एक गंधर्व कुत्ते के समान, दूसरा बंदर के समान है. गंधर्व सारे शरीर पर बाल उगे होने पर भी बालक ही होता है. गंधर्व देखने में प्रिय रूप बना कर स्त्रियों से मिलते हैं. मैं अत्यधिक शक्तिशाली मंत्रों की सहायता से उन्हें यहां से भगाता हूं. (११) जाया इद् वो अप्सरसो गन्धर्वाः पतयो यूयम्. अप धावतामर्त्या मर्त्यान् मा सचध्वम्.. (१२) हे गंधर्वों! ये अप्सराएं तुम्हारी पत्नियां हैं और तुम इन के पति हो. तुम गंधर्व जाति के हो, इसलिए मनुष्यों से दूर भाग जाओ, इन से मत मिलो. (१२) सूक्त-३८ देवता—अप्सराएं, अक्ष शलाका ebook converter DEMO Watermarks*

उद्भिन्दतीं सञ्जयन्तीमप्सरां साधुदेविनीम्. ग्लहे कृतानि कृण्वानामप्सरां तामिह हुवे.. (१) बाजी लगा कर धन का भेदन करती हुई एवं भलीभांति जुए में जीतने वाली एवं अक्ष शलाका आदि से अच्छी तरह जुआ खेलने वाली अप्सरा की मैं स्तुति करता हूं. सदैव दांव पर लगाए गए धन पर जुआ जीतने के चिह्न बनाने वाली उस अप्सरा को मैं यहां बुलाता हूं. (१) विचिन्वतीमाकिरन्तीमप्सरां साधुदेविनीम्. ग्लहे कृतानि गृह्णानामप्सरां तामिह हुवे.. (२) एक निश्चित काठ पर तीनचार अक्षों अर्थात् पासों को एक करती हुई, पुनः उन्हें ही जुए में जीतने के लिए बहुत से काठों पर बिखेरती हुई एवं जय के उपाय जानने के कारण भलीभांति जुआ खेलती हुई अप्सरा को मैं अपने समीप बुलाता हूं. वह जुए में लगाए गए धन को चिह्न बना कर जीत लेती है. (२) यायैः परिनृत्यत्याददाना कृतं ग्लहात्. सा नः कृतानि सीषती प्रहामाप्नोतु मायया. सा नः पयस्वत्यैतु मा नो जैषुरिदं धनम्.. (३) जो अप्सरा जुए में जीते गए धन को 'यह मेरा है' कह कर अधिकार में कर लेती हैं तथा पासों की संख्याओं के द्वारा जुए में जीत कर प्रसन्नतापूर्वक नृत्य करती हैं, वे हमारे कृतों में अर्थात् चार संख्या के दांवों को सोखती हुई पासों को अपनी माया से प्राप्त कर के गाय आदि धन वाली अप्सराएं हमारे समीप आएं. जुए के दांव पर लगा हमारा धन दूसरे न जीत सकें. (३) या अक्षेषु प्रमोदन्ते शुचं क्रोधं च बिभ्रती. आनन्दिनीं प्रमोदिनीमप्सरां तामिह हुवे.. (४) जो अप्सरा जुए में जीतने के कारण प्रसन्नता एवं हार के कारण शोक और क्रोध को धारण करती है, जुए के कारण हर्षित होने वाली तथा ज्वारियों को प्रसन्नता देने वाली उस अप्सरा को मैं बुलाता हूं. (४) सूर्यस्य रश्मीननु याः सञ्चरन्ति मरीचीर्वा या अनुसञ्चरन्ति. यासामृषभो दूरतो वाजिनीवान्त्सद्यः सर्वान् लोकान् पर्येति रक्षन्. स न ऐतु होममिमं जुषाणो ३ न्तरिक्षेण सह वाजिनीवान्.. (५) जो अप्सराएं सूर्य की किरणों के पीछे घूमती हैं अथवा सूर्य की किरणें उन के पीछे चलती हैं, उन अप्सराओं के गर्भाधान में समर्थ पति सदा उषाओं से संबंधित रहते हैं. वे सभी लोकों की रक्षा करने के लिए प्रतिदिन आते हैं. उषा के पति सूर्य अप्सराओं के साथ हमारे ebook converter DEMO Watermarks*

होम के हवि को स्वीकार करते हुए आएं. (५) अन्तरिक्षेण सह वाजिनीवन् कर्कीं वत्सामिह रक्ष वाजिन्. इमे ते स्तोका बहुला एह्यर्वाङिडयं ते मनो ऽ स्तु.. (६) हे बलवान सूर्य! इस स्थान पर धौरे (सफेद) रंग के बछड़ों का पालन करो. तुम्हारी ये दूध की बूंदें हमारे लिए समृद्ध हों. तुम यहां शीघ्र आओ. यह धौरे रंग की गौ तुम्हारी है. तुम्हारे लिए नमस्कार है. (६) अन्तरिक्षेण सह वाजिनीवन् कर्कीं वत्सामिह रक्ष वाजिन्. अयं घासो अयं व्रज इह वत्सां नि बध्नीमः यथानाम व ईश्महे स्वाहा.. (७) हे बलवान सूर्य! इस स्थान पर धौरे रंग के बछड़ों का पालन करो. यह घास और गोशाला पुष्टिकर हो. इस गोशाला में मैं बछड़ों को बांधता हूं. मैं तुम्हें उसी प्रकार बांधता हूं, जिस से तुम्हारा स्वामी बन सकूं. यह हवि उत्तम आहुति वाला हो. (७) सूक्त-३९ देवता—पृथ्वी, अग्नि पृथिव्यामग्नये समनमन्तस् आध्र्नोत्. यथा पृथिव्यामग्नये समनमन्नेवा मह्यं संनमः सं नमन्तु.. (१) पृथ्वी पर देवता रूप में स्थित अग्नि के लिए सभी प्राणी नमन करते हैं. वे अग्नि इस से समृद्ध होते हैं. पृथ्वी पर प्राणी जिस प्रकार अग्नि के लिए नमन करते हैं, उसी प्रकार का नमन मेरे लिए भी हो. (१) पृथिवी धेनुस्तस्या अग्निवत्सः. सा मे ऽ ग्निना वत्सेनेषमूर्जं कामं दुहाम्. आयुः प्रथमं प्रजां पोषं रयिं स्वाहा.. (२) पृथ्वी गाय है और अग्नि उस का बछड़ा है. अग्नि रूपी बछड़े के कारण पृथ्वी मेरे लिए मनचाही मात्रा में बल कारक अन्न दे. पृथ्वी मुझे सौ वर्ष की आयु, प्रजा, पुष्टि एवं धन दे. यह हवि उत्तम आहुति वाला हो. (२) अन्तरिक्षे वायवे समनमन्तस् आध्र्नोत्. यथान्तरिक्षे वायवे समनमन्नेवा मह्यं संनमः सं नमन्तु.. (३) अंतरिक्ष में अधिपति के रूप में स्थित वायु के लिए यक्ष, गंधर्व आदि ने भलीभांति नमस्कार किया. वायु उन के नमस्कार से प्रसन्न हुए. जिस प्रकार गंधर्व आदि ने अंतरिक्ष में वायु के लिए नमस्कार किया, उसी प्रकार वह मेरे लिए नमस्कार करें. (३) ebook converter DEMO Watermarks*

अन्तरिक्षं धेनुस्तस्या वायुर्वत्सः. सा मे वायुना वत्सेनेषमूर्जं कामं दुहाम्. आयुः प्रथमं प्रजां पोषं रयिं स्वाहा.. (४) अंतरिक्ष गाय है और वायु उस का बछड़ा है. वह गाय वायु रूपी बछड़े के कारण मुझे बलकारक अन्न पर्याप्त मात्रा में प्रदान करे. वायु मुझे सौ वर्ष की आयु, प्रजा, पुष्टि एवं धन दे. यह हवि उत्तम आहुति वाला हो. (४) दिव्यादित्याय समनमन्त्या आध्र्नोत्. यथा दिव्यादित्याय समनमन्नेवा मह्यं संनमः सं नमन्तु.. (५) द्युलोक में स्थित सूर्य के लिए वहां के सभी प्राणियों ने नमस्कार किया. उस नमस्कार से सूर्य प्रसन्न हुए. प्राणियों ने जिस प्रकार द्युलोक के सूर्य के लिए नमस्कार किया, उसी प्रकार मेरे लिए भी नमस्कार करें. (५) द्यौर्धेनुस्तस्या आदित्यो वत्सः. सा म आदित्येन वत्सेनेषमूर्जं कामं दुहाम्. आयुः प्रथमं प्रजां पोषं रयिं स्वाहा.. (६) द्यौ गाय है और सूर्य उस का बछड़ा है. वह द्यौ रूपी गाय सूर्य रूपी बछड़े के कारण मेरे लिए मनचाहा बलकारक अन्न प्रदान करे. वह मुझे सौ वर्ष की आयु, प्रजा, पुष्टि और धन प्रदान करे. यह हवि उत्तम आहुति वाला हो. (६) दिक्षु चन्द्राय समनमन्तस आध्र्नोत्. यथा दिक्षु चन्द्राय समनमन्नेवा मह्यं संनमः सं नमन्तु.. (७) दिशाओं में वर्तमान चंद्रमा के लिए वहां के जीवों ने नमस्कार किया. इस से चंद्रमा बहुत प्रसन्न हुए. जीवों ने जिस प्रकार चंद्रमा के लिए नमस्कार किया, उसी प्रकार मेरे लिए भी करेंगे. (७) दिशो धेनवस्तासां चन्द्रो वत्सः. ता मे चन्द्रेण वत्सेनेषमूर्जं कामं दुहाम्. आयुः प्रथमं प्रजां पोषं रयिं स्वाहा.. (८) दिशाएं गाय हैं और चंद्रमा उन का बछड़ा है. वे दिशाएं चंद्रमा रूपी बछड़े के कारण मुझे मनचाहा बलकारक अन्न प्रदान करें. वे मुझे सौ वर्ष की आयु, प्रजा, पुष्टि एवं धन दें. (८) अग्नावग्निश्चरति प्रविष्ट ऋषीणां पुत्रो अभिशस्तिपा उ. नमस्कारेण नमसा ते जुहोमि मा देवानां मिथुया कर्म भागम्.. (९)

अंगार रूप लौकिक अग्नि में प्रवेश कर के देवता रूप अग्नि संचरण करते हैं. अथवा, अंगिरा आदि ऋषियों के पुत्र हमें आरोप के रूप में प्राप्त पाप से बचाएं. मैं नमस्कार के साथ अन्न से तुम्हारे निमित्त हवन करता हूं. हम देवों के भाग हवि को मिथ्या न करें. (९) हृदा पूतं मनसा जातवेदो विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्. सप्तास्यानि तव जातवेदस्तेभ्यो जुहोमि स जुषस्व हव्यत्.. (१०) हे जातवेद अग्नि! मैं तुम्हारे लिए हृदय और मन से पवित्र हवि का हवन करता हूं. हे देव! तुम सभी ज्ञानों को जानते हो. हे जातवेद अग्नि! तुम्हारे सात मुख हैं. उन मुखों के लिए मैं घी का हवन करता हूं. तुम मेरे हव्य को स्वीकार करो. (१०) सूक्त-४० देवता—जातवेद ये पुरस्ताज्जुह्वति जातवेदः प्राच्या दिशोऽभिदासन्त्यस्मान्. अग्निमृत्वा ते पराञ्चो व्यथन्तां प्रत्यगेनान् प्रतिसरेण हन्मि.. (१) हे जातवेद अग्नि! जो शत्रु पूर्व दिशा में हवन करते हुए हम पर जादूटोने तथा पूर्व दिशा से हमारी हिंसा करना चाहते हैं, अग्नि में गिर कर हमारे वे विरोधी दुःखी हों. हम उन के द्वारा किए गए जादूटोने को वापस लौटा कर उन्हें मारते हैं. (१) ये दक्षिणतो जुह्वति जातवेदो दक्षिणाया दिशो ऽ भिदासन्त्यस्मान्. यममृत्वा ते पराञ्चो व्यथन्तां प्रत्यगेनान् प्रतिसरेण हन्मि.. (२) हे जातवेद अग्नि! जो शत्रु हमारे निवास स्थान की दक्षिण दिशा में हवन कर के जादूटोना कर रहे हैं, वे दक्षिण दिशा से हमारी हिंसा करते हैं. वे शत्रु हमारी ओर से मुंह फेर कर जल जाएं. इन जादूटोना करने वालों को हम उन के जादूटोने को उन्हीं की ओर लौटा कर मारते हैं. (२) ये पश्चाज्जुह्वति जातवेदः प्रतीच्या दिशो ऽ भिदासन्त्यस्मान्. वरुणमृत्वा ते पराञ्चो व्यथन्तां प्रत्यगेनान् प्रतिसरेण हन्मि.. (३) हे जातवेद अग्नि! जो शत्रु हमारे निवास स्थान की पश्चिम दिशा में हवन कर के जादूटोना कर रहे हैं, वे पश्चिम दिशा से हमारी हिंसा करते हैं. वे शत्रु हमारी ओर से मुंह फेर कर जल जाएं. उन जादूटोना करने वालों को हम उन के जादूटोने को उन्हीं की ओर लौटा कर मारते हैं. (३) य उत्तरतो जुह्वति जातवेद उदीच्या दिशो ऽ भिदासन्त्यस्मान्. सोममृत्वा ते पराञ्चो व्यथन्तां प्रत्यगेनान् प्रतिसरेण हन्मि.. (४) हे जातवेद अग्नि! जो शत्रु हमारे निवास स्थान की उत्तर दिशा में हवन कर के जादूटोना ebook converter DEMO Watermarks*

कर रहे हैं, वे उत्तर दिशा से हमारी हिंसा करते हैं. वे शत्रु हमारी ओर से मुंह फेर कर जल जाएं. उन जादूटोना करने वालों को हम उन के जादूटोने उन्हीं की ओर लौटा कर मारते हैं. (४) ये ३ ऽ धस्ताज्जुह्वति जातवेदो ध्रुवाया दिशो ऽ भिदासन्त्यस्मान्. भूमिमृत्वा ते पराञ्चो व्यथन्तां प्रत्यगेनान् प्रतिसरेण हन्मि.. (५) हे जातवेद अग्नि! जो शत्रु हमारे निवास से नीचे की दिशा में हवन कर के जादूटोना कर रहे हैं, वे नीचे की दिशा से हमारी हिंसा करते हैं. वे शत्रु हमारी ओर से मुंह फेर कर जल जाएं. उन जादूटोना करने वालों को हम उन के जादूटोने उन्हीं की ओर वापस कर के मारते हैं. (५) ये ३ ऽ न्तरिक्षाज्जुह्वति जातवेदो व्यध्वाया दिशो ऽ भिदासन्त्यस्मान्. वायुमृत्वा ते पराञ्चो व्यथन्तां प्रत्यगेनान् प्रतिसरेण हन्मि.. (६) हे जातवेद अग्नि! जो शत्रु हमारे निवास स्थान से अंतरिक्ष की दिशा में हवन कर के जादूटोना कर रहे हैं, वे अंतरिक्ष की दिशा से हमारी हिंसा करते हैं, वे शत्रु हमारी ओर से मुंह फेर कर जल जाएं. उन जादूटोना करने वालों को हम उन के जादूटोने उन्हीं की ओर वापस कर के मारते हैं. (६) य उपरिष्टाज्जुह्वति जातवेदः ऊर्ध्वाया दिशो ऽ भिदासन्त्यस्मान्. सूर्यमृत्वा ते पराञ्चो व्यथन्तां प्रत्यगेनान् प्रतिसरेण हन्मि.. (७) हे जातवेद अग्नि! जो शत्रु हमारे निवास स्थान से ऊपर की दिशा में हवन कर के जादूटोना कर रहे हैं, वे ऊपर की दिशा से हमारी हिंसा करते हैं. वे शत्रु हमारी ओर से मुंह फेर कर जल जाएं. उन जादूटोना करने वालों को हम उन के जादूटोने उन्हीं की ओर वापस कर के मारते हैं. (७) ये दिशामन्तर्देशेभ्यो जुह्वति जातवेदः सर्वाभ्यो दिग्भ्यो ऽ भिदासन्त्यस्मान्. ब्रह्मर्त्वा ते पराञ्चो व्यथन्तां प्रत्यगेनान् प्रतिसरेण हन्मि.. (८) हे जातवेद अग्नि! जो शत्रु अन्तर्दिशाओं में आहुति डालकर जादूटोने द्वारा दिशाओं के कोणों से हमें नष्ट करना चाहता, वह शत्रु पराजित होते हुए कष्ट भोगे. अपने शत्रुओं को हम प्रतिसर कर्म से नष्ट करते हैं. (८)

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सूक्त-१ देवता—वरुण

पांचवां कांड सूक्त-१ देवता—वरुण ऋधङ्मन्त्रो योनिं य आबभूवामृतासुर्वर्धमानः सुजन्मा. अदब्धासुभ्राजमानो ऽ हेव त्रितो धर्ता दाधार त्रीणि (१) जिस के प्राण मरण रहित हैं, जो जन्म ले कर बढ़ता है, कोई भी जिस की हिंसा नहीं कर सकता, जो दिन के समान प्रकाश वाला है, जो तीनों लोकों का धारणकर्ता और पालक है, वह योनि से उत्पन्न हुआ है. (१) आ यो धर्माणि प्रथमः ससाद ततो वपूंषि कृणुषे पुरूणि. धास्युर्योनिं प्रथम आ विवेशा यो वाचमनुदितां चिकेत.. (२) जो जीवात्मा सब से पहले धर्म का पालन करता है तथा इसी हेतु अनेक शरीरों को धारण करता है, जो संज्ञाओं के द्वारा आकृष्ट वाणी का निर्माण करता है, वह अन्न की इच्छा से योनि में सब से पहले प्रवेश करता है. (२) यस्ते शोकाय तन्वं रिरेच क्षरद्धिरण्‍यं शुचयो ऽ नु स्वाः. अत्रा दधेते अमृतानि नामास्मे वस्त्राणि विश एरयन्ताम्.. (३) हे वरुण! जो जीवात्मा तुम्हारे निमित्त धर्म पालन हेतु कष्ट सहता हुआ सुवर्ण के समान अपनी कीर्ति फैलाने के लिए शरीर में आया है, उसे द्यावा पृथ्वी अमरत्व प्रदान करते हैं तथा प्रजाएं वस्त्र देती हैं. (३) प्र यदेते प्रतरं पूर्व्यं गुः सदःसद अतिष्ठन्तो अजूर्यम्. कविः शुषस्य मातरा रिहाणे जाम्यै धुर्यं पतिमेरयेथाम्.. (४) जो उत्तम स्थान पर बैठ कर उस परमात्मा का चिंतन करते हैं, जो ब्राह्मण के हितैषी हैं तथा उसे प्राप्त कर चुके हैं, वे लोक परमात्मा की उपासना करके उस स्त्री को भी ईश्वर के दर्शन कराएं, जो प्रजा को अपनी बहन समझ कर उस का भार वहन करती है. (४) तदू षु ते महत् पृथुज्मन् नमः कविः काव्येना कृणोमि. यत् सम्यञ्चावभियन्तावभि क्षामत्रा मही रोधचक्रे वावृधेते.. (५) पृथ्‍वी को स्थिर रखने वाले दो राजा पहिए के समान तेज चाल से आगे बढ़ रहे हैं. हे

पृथ्वी! मैं अथर्ववेद का ज्ञाता ब्राह्मण हूं और तुम्हारे लिए अन्न भेंट करता हूं. (५) सप्त मर्यादाः कवयस्ततक्षुस्तासामिदेकामभ्यं हुरो गात्. आयोर्ह स्कम्भ उपमस्य नीडे पथां विसर्गे धरुणेषु तस्थौ.. (६) मनु आदि ऋषियों ने चोरी, गुरुपत्नीगमन, ब्रह्महत्या, भ्रूणहत्या, मद्यपान, मिथ्याभाषण एवं पापकर्म — इन सात कर्मों के रूप में धार्मिक, मर्यादा निश्चित की है. जो इस मर्यादा को नहीं मानता, वह पापी है. इन सात मर्यादाओं का पालन करने वाला पुरुष मृत्यु के पश्चात सूर्य मंडल में स्थित आदित्य को प्राप्त करता है और प्रलय काल तक वहीं स्थित रहता है. (६) उतामृतासुर्व्रत एमि कृण्वन्नसुरात्मा तन्व १ स्तत् समुद्गुः. उत वा शक्रो रत्नं दधात्यूर्जया वा यत् सचते हविर्दाः.. (७) शरीर से संबंधित जो स्वयं प्रकाश उभरता है, मैं उसी का व्रती हूं. मैं अपने बल के सहारे आ रहा हूं. जो व्यक्ति इंद्र को शक्ति वाला हवि देता है, इंद्र उसे रत्न आदि धन प्रदान करते हैं. (७) उत पुत्रः पितरं क्षत्रमीडे ज्येष्ठं मर्यादमह्वयन्त्स्वस्तये. दर्शन् नु ता वरुण यास्ते विष्ठा आवर्व्रततः कुणवो वपूंषि.. (८) क्षत्रिय जाति का पुत्र अपने पिता की पूजा करे तथा उत्तम कल्याण पाने के लिए धर्म पालन में प्रवृत्त हो. हे वरुण! अनेक स्थानों को दिखाते हुए तुम सांसारिक जीवों की रचना करते हो. (८) अर्धमर्धेन पयसा पृणक्ष्यर्धेन शुष्म वर्धसे अमुर. अविं वृधाम शग्मियं सखायं वरुणं पुत्रमदित्या इषिरम्. कविशस्तान्यस्मै वपूंष्यवोचाम रोदसी सत्यवाचा.. (९) मित्र और वरुण अदिति के पुत्र हैं. हम इन दोनों की वृद्धि करते हैं. हे वरुण! तुम आधे दूध, घृत आदि से इस सेना का बल बढ़ाते हो और आधे से अपनी वृद्धि करते हो. हे आकाश और पृथ्वी के देवो! विद्वान् ऋषियों ने जिन शरीरों का वर्णन किया है, हम अपनी सत्य वाणी से उन्हीं का वर्णन करते हैं. (९) सूक्त-२ देवता—वरुण तदिदास भुवनेषु ज्येष्ठं यतो जज्ञ उग्रस्त्वेष्णृम्णः. सद्यो जज्ञानो नि रिणाति शत्रूननु यदेनं मदन्ति विश्व ऊमाः.. (१) इंद्र संसार में धनवान एवं बली होने के कारण श्रेष्ठ माने जाते हैं. इंद्र ने जन्म लेते ही शत्रु का संहार करना आरंभ कर दिया था, इसीलिए इन के सैनिक इन की रक्षा करते हैं एवं ebook converter DEMO Watermarks*

प्रसन्न रहते हैं. (१) वावृधानः शवसा भूर्योजाः शत्रुर्मासाय भियसं दधाति. अव्यनच्च व्यनच्च सस्नि सं ते नवन्त प्रभृता मदेषु.. (२) बढ़ता, शक्तिशाली एवं ओजस्वी शत्रु अपने दासों को भयभीत करता है. चर और अचर सारा विश्व हम में लीन हो जाता है. वेतन पाने वाले सच्चे वीर युद्ध में परमात्मा की प्रार्थना करते हैं. (२) त्वे क्रतुमपि पृञ्चन्ति भूरि द्विर्यद‍्ते त्रिर्भवन्त्यूमाः. स्वादोः स्वादीयः स्वादुना सृजा समदः सु मधु मधुनाभि योधीः.. (३) हे इंद्र! जन्म, संस्कार और युद्ध की दीक्षा से तीन बातें मनुष्य के जन्म के साथ ही निश्चित हो जाती हैं एवं विशाल यज्ञ को तुम तक पहुंचाती हैं. तुम सभी पदार्थों को उत्तम स्वाद वाला बनाने वाले हो तुम हमारे पदार्थों को भी स्वादिष्ट बनाओ एवं सुंदर रीति से युक्त करो. (३) यदि चिन्नु त्वा धना जयन्तं रणेरणे अनुमदन्ति विप्राः. ओजीयः शुष्मिन्त्स्थिरमा तनुष्व मा त्वा दभन् दुरेवासः कशोकाः.. (४) हे बलशाली इंद्र! तुम सभी युद्धों में विजय प्राप्त करते हो. यदि ब्राह्मण तुम्हारी स्तुति करें तो तुम उन्हें स्थिर रहने वाला बल प्रदान करो. जो मुख्य सुखमय वातावरण को दुःखमय बना देते हैं अथवा जिन की गति बुरी है, वे तुम तक न आ सकें. (४) त्वया वयं शाशदमहे रणेषु प्रपश्यन्तो यधेन्यानि भूरि. चोदयामि त आयुधा वचोभिः सं ते शिशामि ब्रह्मणा वयांसि.. (५) हे इंद्र! तुम्हारी सहायता से हम युद्ध में अपने सभी विरोधियों को समाप्त कर देते हैं. मैं तपस्या द्वारा सिद्ध अपनी वाणी से तुम्हारे शस्त्रों को प्रेरणा प्रदान करता हूं तथा तुम्हारी गतिशील वाणी को तीखा बनाता हूं. (५) नि तद् दधिषेऽवरे परे च यस्मिन्नाविथावसा दुरोणे. आ स्थापयत मातरं जिगत्नुमत इन्वत कर्वराणि भूरि.. (६) जिस घर में उत्तम एवं साधारण प्राणियों का पालन हुआ तथा जिस घर में अन्न द्वारा उन की रक्षा की गई, उस घर में कालिका माता की गतिशील शक्ति की स्थापना करो. इस प्रकार वह घर अद्भुत पदार्थों से पूर्ण हो जाएगा. (६) स्तुष्व वर्मन् पुरुवर्त्मानं समृभ्वाणमिनतममाप्तमाप्त्यानाम्. आ दर्शति शवसा भूर्योजाः प्र सक्षति प्रतिमानं पृथिव्याः.. (७) ebook converter DEMO Watermarks*

हे शरीरधारी पुरुष! तू उस राजा की स्तुति कर जो विचरण करने वाला, तेजस्वी, स्वामी एवं उन गुणों से युक्त है, जो आप्त जनों में होते हैं. राजा पृथ्‌वी का प्रतिरूप है एवं युद्ध में जुटा हुआ है. (७) इमा ब्रह्म बृहद्दिवः कृणवदिन्द्राय शूषमग्रियः स्वर्षाः. महो गोत्रस्य क्षयति स्वराजा तुरश्चिद् विश्वमर्णवत् तपस्वान्.. (८) यह राजा स्वर्ग प्राप्ति की अभिलाषा से महान स्तोत्रों द्वारा इंद्र को प्रसन्न कर रहा है. स्वर्ग के स्वामी इंद्र मेघों के द्वारा जल वर्षा कर के विश्व को जल से पूर्ण करते हैं. (८) एवा महान् बृहद्दिवो अथर्वावोचत् स्वां तन्व १ मिन्द्रमेव. स्वसारौ मातरिश्वरी अरिप्रे हिन्वन्ति चैने शवसा वर्धयन्ति च.. (९) अपने शरीर को इंद्र मान कर महर्षि अथर्वा ने कहा था कि पाप रहित भगिनियां इसे बल के द्वारा बढ़ाती हुई प्रसन्न करती हैं. (९) सूक्त-३ देवता—अग्नि ममाग्ने वर्चो विहवेष्वस्तु वयं त्वेन्धानास्तन्वं पुषेम. मह्यं नमन्तां प्रदिशश्चतस्रस्त्वयाध्यक्षेण पृतना जयेम.. (१) हे अग्नि देव! युद्धों में हम वर्चस्वी बनें. हम तुम्हें प्रकट करते हुए अपने शरीर को शक्तिशाली बनाएं. चारों दिशाएं और प्रदिशाएं हमारे सामने तथा आप के संरक्षण में शत्रुओं की इस सेना पर विजय प्राप्त करें. (१) अग्ने मन्युं प्रतिनुदन् परेषां त्वं नो गोपाः परि पाहि विश्वतः. अपाञ्चो यन्तु निवता दुरस्यवो ऽ मैषां चित्तं प्रबुधां वि नेशत्.. (२) हे अग्नि देव! तुम हजारों शत्रुओं का क्रोध समाप्त करते हुए सभी ओर से हमारी रक्षा करो. हमें दुःख देने के इच्छुक लोग हमारे सामने नम्र बनें तथा हमारे सामने से चले जाएं. (२) मम देवा विहवे सन्तु सर्व इन्द्रवन्तो मरुतो विष्णुरग्निः. ममान्तरिक्षमुरुलोकमस्तु मह्यं वातः पवतां कामायास्मै.. (३) इंद्र के साथ मरुत्, विष्णु और अग्नि आदि सभी देव युद्ध भूमि में मेरे अनुकूल बनें. अंतरिक्ष में मेरा यशोगान गूंजे तथा वायु की गति मेरे अनुकूल हो. (३) मह्यं यजन्तां मम यानीष्टाकूतिः सत्या मनसो मे अस्तु. एनो मा नि गां कतमच्चनाहं विश्वे देवा अभि रक्षन्तु मेह.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

मैं जो इच्छा और संकल्प करता हूं, वह सत्य हो. मैं सभी प्रकार के पापों से दूर रहूं तथा विश्वे देव मेरी रक्षा करें. (४) मयि देवा द्रविणमा यजन्तां मय्याशीरस्तु मयि देवहूतिः. दैवा होतारः सनिषन् न एतदरिष्टाः स्याम तन्वा सुवीराः.. (५) मैं जिन देवों को बुलाता हूं, वे मुझे अन्न से संपन्न बनाएं. यज्ञ में देवों के होता हमारे समीप बैठें, जिस से हम रोगरहित और शक्तिशाली बन सकें. (५) दैवीः षडुर्वीरुरु नः कृणोत विश्वे देवास इह मादयध्वम्. मा नो विददभिभा मो अशस्तिर्मा नो विदद् वृजिना द्वेष्या या.. (६) हे विश्वे देव! आप सब हमारे लिए पृथ्‍वी, आकाश, जल, ओषधि, दिन और रात—इन छह दिव्य शक्तियों को बढ़ाइए. आप प्रसन्न हों, जिस से कोई न हमारा तिरस्कार करे और न हमारी निंदा करे. हमें पाप न लगे. (६) तिस्रो देवीर्महि नः शर्म यच्छत प्रजायै नस्तन्वे ३ यच्च पुष्टम्. मा हास्महि प्रजया मा तनूभिर्मा रधाम द्विषते सोम राजन्.. (७) भारती, सरस्वती और पृथ्वी—ये तीन देवियां हमारा कल्याण करें. हमारी प्रजाएं पोषक पदार्थ पा कर पुण्य शरीर वाली हों. हे तेजस्वी सोम! हम संतान एवं पशुओं से हीन न हों तथा शत्रु हमें दुःख न दें. (७) उरुव्यचा नो महिषः शर्म यच्छत्वस्मिन् हवे पुरुहूतः पुरुक्षु. स नः प्रजायै हर्यश्व मृडेन्द्र मा नो रीरिषो मा परा दाः.. (८) हे इंद्र! तुम नदी के समान गतिशील, गुणसंपन्न एवं अन्न के स्वामी हो. तुम हमें इस यज्ञ के कारण सुख प्रदान करो. तुम हमारी संतान का नाश मत करो तथा हमारा त्याग मत करो. (८) धाता विधाता भुवनस्य यस्पतिर्देवः सविताभिमातिषाहः. आदित्या रुद्रा अश्विनोभा देवाः पान्तु यजमानं निर्ऋथात्.. (९) धाता, विधाता, संसार के स्वामी एवं शत्रुहंता सविता देव, आदित्य, रुद्र तथा दोनों अश्विनीकुमार यजमान को पाप से बचाएं और उग्र शत्रुओं से रक्षा करें. (९) ये नः सपत्ना अप ते भवन्त्विन्द्राग्निभ्यामव बाधामह एनान्. आदित्या रुद्रा उपरिस्पृशो न उग्रं चेत्तारमधिराजमक्रत.. (१०) जो हमारे शत्रु हैं, वे हम से दूर भाग जाएं. हम इंद्र और अग्नि के द्वारा अपने शत्रुओं को ebook converter DEMO Watermarks*