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अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,063 pages

सूक्त-८८ देवता—बृहस्पति

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हे बृहस्पति! हे इंद्र! तुम दोनों ही दिव्य तथा पार्थिव धनों के स्वामी हो. तुम अपनी रक्षक शक्तियों के द्वारा हमारी रक्षा करते हुए हम स्तुति कर्ताओं को धन प्रदान करो. (७) सूक्त-८८ देवता—बृहस्पति यस्तस्तम्भ सहसा वि ज्मो अन्तान् बृहस्पतिस्त्रिषधस्थो रवेण. तं प्रत्नास ऋषयो दीध्यानाः पुरो विप्रा दधिरे मन्द्रजिह्वम्.. (१) जिन बृहस्पति ने अपने घोष से पृथ्वी के छोर को भी स्तंभित किया, प्राचीन ऋषि उन का बारबार ध्यान करते हैं. वे बृहस्पति प्रसन्न करने वाली जिह्वा के स्वामी हैं. विद्वान् ब्राह्मण बृहस्पति को प्रथम स्थान देते हैं. (१) धुनेतयः सुप्रकेतं मदन्तो बृहस्पते अभि ये नस्ततस्रे. पृषन्तं सृप्रमदब्धमूर्वं बृहस्पते रक्षतादस्य योनिम्.. (२) हे बृहस्पति! जो ऋत्विज् तुम्हें हमारी ओर आकर्षित करते हैं उन गमनशील, अहिंसक तथा घृत की बूंदें धारण करने वाले ऋत्विजों की तुम रक्षा करो. (२) बृहस्पते या परमा परावदत आ त ऋतस्पृशो नि षेदुः. तुभ्यं खाता अवता अद्रिदुग्धा मध्व श्रोतन्त्यभितो विरप्शम्.. (३) हे बृहस्पति! मृत का स्पर्श करने वाले ऋत्विज् तुम्हारी रक्षा साधनों वाली महान रक्षा के निमित्त बैठे हुए, पर्वतों से एकत्र किए हुए उत्तम मधु की तुम पर वर्षा करते हैं. (३) बृहस्पतिः प्रथमं जायमानो महो ज्योतिषः परमे व्योमन्. सप्तास्यस्तुविजातो रवेण वि सप्तरश्मिरधमत् तमांसि.. (४) बृहस्पति महान ज्योतिष चक्र से परम व्योम में आविर्भूत अर्थात् प्रकट होते हैं. वे बृहस्पति सप्त रश्मि वाले बन कर अंधकार को मिटा देते हैं. (४) स सुष्टुभा स ऋक्वता गणेन वलं रुरोज फलिगं रवेण. बृहस्पतिरुस्रिया हव्यसूदः कनिक्रदद् वावशतीरुदाजत्.. (५) ऋचा वाले गणों के द्वारा वे बृहस्पति मेघों को चीरते हैं. वे हव्य से प्रेरित हो कर इच्छा करने वाली गायों को प्राप्त होते हैं और बारबार शब्द करते हैं. (५) एवा पित्रे विश्वदेवाय वृष्णे यज्ञैर्विधेम नमसा हविर्भिः. बृहस्पते सुप्रजा वीरवन्तो वयं स्याम पतयो रयीणाम्.. (६) हे बृहस्पति! हम सुंदर और वीर संतानों से संपन्न धन के स्वामी बनें. हम उन बृहस्पति ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-८९ देवता—इंद्र

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की हवियों और नमस्कारों के द्वारा पूजा करते हैं. (६) सूक्त-८९ देवता—इंद्र अस्तेव सु प्रतरं लायमस्यन् भूषन्निव प्र भरा स्तोममस्मै. वाचा विप्रास्तरत वाचमर्यो नि रामय जरितः सोम इन्द्रम्.. (१) हे ब्राह्मणो! तुम इंद्र के लिए स्तोमों का गान करो. तुम मंत्र रूप वाणी के पार जाओ. हे स्तुति करने वालो! तुम इंद्र को सोमरस से युक्त बनाओ. (१) दोहेन गामुप शिक्षा सखायं प्र बोधय जरितर्जरिमिन्द्रम्. कोशं न पूर्णं वसुना न्युष्ट्मा च्यावय मघदेयाय शूरम्.. (२) हे स्तोताओ! वाणी तुम्हारी मित्र है. उस का दोहन करो तथा जो इंद्र शत्रुओं को क्षीण करते हैं, उन्हें बुलाओ. जो सोमरस धन से युक्त कोष के समान शुद्ध है, उसे इंद्र के लिए तैयार करो. (२) किमङ्ग त्वा मघवन् भोजमाहुः शिशीहि मा शिशयं त्वा शृणोमि. अप्रस्वती मम धीरस्तु शक्र वसुविदं भगमिन्द्रा भरा नः.. (३) हे इंद्र! तुम भोक्ता हो. तुम शत्रुओं को क्षीण कर देते हो. तुम मुझे क्षीण मत करना. तुम मुझे धन प्राप्त करने वाला सौभाग्य दो. मेरी बुद्धि कर्मों की ओर अग्रसर हो. (३) त्वां जना ममसत्येष्विन्द्र संतस्थाना वि ह्वयन्ते समीके. अत्रा युजं कृणुते यो हविष्मान्नासुन्वता सख्यं वष्टि शूरः.. (४) हे इंद्र! मेरे पुरुष तुम्हीं को बुलाते हैं. जो वीर तुम्हारी मित्रता की कामना करते हैं तथा हवि वाला अनुष्ठान करते हैं, वे सोमरस का संस्कार भी करते हैं. (४) धनं न स्पन्द्रं बहुलं यो अस्मै तीव्रान्सोमाँ आसुनोति प्रयस्वान्. तस्मै शत्रून्सुतुकान् प्रातरह्वो नि स्वघ्नान् युवति हन्ति वृत्रम्.. (५) हवि धारण करने वाला जो पुरुष इंद्र के निमित्त सोमरस का संस्कार नहीं करता, उस का धन सरकता जाता है. इंद्र उसे अपने शत्रुओं में सम्मिलित कर के उस पर वज्र का प्रहार करते हैं. (५) यस्मिन् वयं दधिमा शंसमिन्द्रे यः शिश्राय मघवा काममस्मे. आराच्चित् सन् भयतामस्य शत्रुर्न्‍यस्मै द्युम्ना जन्या नमन्ताम्.. (६) जो इंद्र हमारी इच्छाओं को पूर्ण करने वाले हैं, जिन इंद्र की हम प्रशंसा करते हैं, उन इंद्र ebook converter DEMO Watermarks*

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के समीप आते ही शत्रु भयभीत हो जाते हैं. संसार के सभी प्राणी इंद्र को नमस्कार करते हैं. (६) आराच्छत्रुमप बाधस्व दूरमुग्रो यः शम्बः पुरुहूत तेन. अस्मे धेहि यवमद् गोमदिन्द्र कृधी धियं जरित्रे वाजरत्नाम्.. (७) हे इंद्र! तुम अपने उग्र वज्र से पास के अथवा दूर के शत्रु को व्यथित करो. तुम हम को अन्न वाली बुद्धि प्रदान करते हुए अन्न तथा पशुओं से पूर्ण धन में प्रतिष्ठित करो. (७) प्र यमन्तर्वृषसवासो अग्मन् तीव्राः सोमा बहुलान्तास इन्द्रम्. नाह दामानं मघवा नि यंसन् नि सुन्वते वहति भूरि वामम्.. (८) जिन इंद्र के समीप तीव्र स्वाद वाला सोमरस गमन करता है, वे इंद्र धन की बाधक रस्सी को रोकते हैं तथा सोम का संस्कार करने वाले स्तोता को असीमित धन प्रदान करते हैं. (८) उत प्रहामतिदीवा जयति कृतमिव श्वघ्नी वि चिनोति काले. यो देवकामो न धनं रुणद्धि समित् तं रायः सृजति स्वधाभिः.. (९) अक्षक्रीड़ा में कुशल मनुष्य अपने विरोधी को जुए में हरा देता है, क्योंकि वह कृत नाम के पासे को ही खोजता है. वह खिलाड़ी इंद्र की कामना करता हुआ उस जीते हुए धन को व्यर्थ होने से रोकता है और इंद्र के कार्य में लगता है. इंद्र उसे स्वधाओं वाला बनाते हैं. (९) गोभिष्टरेमाममतिं दुरेवां यवेन वा क्षुधं पुरुहूत विश्वे. वयं राजसु प्रथमा धनान्वरिष्ट सो वृजनीभिर्जयेम.. (१०) हे इंद्र! दरिद्रता के कारण प्राप्त हुई दुर्बुद्धि को हम पशुओं के द्वारा लांघ जाएं तथा अन्न से अपनी भूख शांत करें. जुए में प्रतिपक्षी खिलाड़ी से जीतते हुए हम राजाओं में स्थित उत्कृष्ट धन को बल संपन्न पासों से प्राप्त करें. (१०) बृहस्पतिर्नः परि पातु पश्चादुतोत्तरस्मादधरादघायोः. इन्द्रः पुरस्तादुत मध्यतो नः सखा सखिभ्यो वरीयः कृणोतु.. (११) जो शत्रु हमारे वध रूप पाप की इच्छा करता है, बृहस्पति देवता उस से चारों दिशाओं में हमारी रक्षा करें. वे हमें हमारे अन्न की अपेक्षा उत्कृष्ट बनाएं. (११) सूक्त-९० देवता—बृहस्पति यो अद्रिभित् प्रथमजा ऋतावा बृहस्पतिराङ्गिरसो हविष्मान्. द्विबर्हज्मा प्राघर्मसत् पिता न आ रोदसी वृषभो रोरवीति.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*

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प्रथम प्रकट होने वाले, मेघों को चीरने वाले, सत्यभाषी आंगिरस अर्थात् अंगिरा गोत्र वाले बृहस्पति हवि प्राप्त करने के अधिकारी हैं. वे पालन कर्ता, आकाश और पृथ्वी में शब्द करने वाले, दो बर्हों अर्थात् मोर के पंखों से सुशोभित, धर्म का पालन करने वाले और वर्षा करने वाले हैं. (१) जनाय चिद् य ईवत उ लोकं बृहस्पतिर्देवहूतौ चकार. घ्नन् वृत्राणि वि पुरो दर्देरीति जयं छत्रूंरमित्रान् पृत्सु साहन्.. (२) देवहूति में संतान को उत्पन्न करने वाले एवं मनुष्यों को प्राप्त होने वाले बृहस्पति मेघों को खंडित करें. वे वृत्र के नगर का विनाश करते हैं. वे शत्रुओं पर विजय प्राप्त करते हुए सेनाओं का सामना करते हैं. (२) बृहस्पतिः समजयद वसूनि महो व्रजान् गोमतो देव एषः. अपः सिषासन्त्स्व १ रप्रतीतो बृहस्पतिर्हन्त्यमित्रमर्कैः.. (३) बृहस्पति ने गायों से भरी हुई विशाल गोशालाओं तथा धनों पर विजय प्राप्त कर ली है. वे जल देने के लिए स्वर्ग पर चढ़ते हैं तथा मंत्रों के द्वारा शत्रुओं को नष्ट कर देते हैं. (३) सूक्त-९१ देवता—बृहस्पति इमां धियं सप्तशीर्णीं पिता न ऋतप्रजातां बृहतीमविन्दत्. तुरीयं स्विज्जनयद् विश्वजन्यो ऽ यास्य उक्थमिन्द्राय शंसन्.. (१) बृहस्पति ने सत्य के द्वारा उत्पन्न सात सिरों वाली बुद्धि को प्राप्त किया है. विश्व से उत्पन्न अयास्य ने इंद्र से कह कर तुरीय को उत्पन्न कराया. (१) ऋतं शंसन्त ऋजु दीध्याना दिवसपुत्रासो असुरस्य वीराः. विप्रं पदमङ्गिरसो दधाना यज्ञस्य धाम प्रथमं मनन्त.. (२) सत्य कथन द्वारा प्राण के वीर्य से उत्पन्न हुए अंगिरा यज्ञशाला में प्रथम अर्थात् उत्तम समझे जाते हैं. (२) हंसैरिव सखिभिर्वावदद्भिरश्मन्मयानि नहना व्यस्यन्. बृहस्पतिरभिकनिक्रदद् गा उत प्रास्तौदुच्च विद्वां अगायत.. (३) गर्जन करने वाले मेघों का उद्घाटन करते हुए बृहस्पति स्तुति करते हैं. इसी कारण वे विद्वान् समझे जाते हैं. (३) अवो द्वाभ्यां पर एकया गा गुहा तिष्ठन्तीरनृतस्य सेतौ. बृहस्पतिस्तमसि ज्योतिरिच्छन्नुदुस्रा आकर्वि हि तिस्र आवः.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

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पहले दो से, फिर एक से हृदय रूपी गुफा में स्थित वाणियों को बाहर निकालते हुए तथा अंधकार में प्रकाश की कामना करने वाले बृहस्पति प्रकाशों को प्रकट करते हैं. (४) विभिद्या पुरं शयथेमपाचीं निस्त्रीणि साकमुदधेरकृन्तत्. बृहस्पतिरुषसं सूर्यं गामर्कं विवेद स्तनयन्निव द्यौ:.. (५) बृहस्पति पुर का विनाश कर के पश्चिम दिशा में सोते हैं. वे सागर के भागों का त्याग नहीं करते तथा आकाश में कड़कते हुए उषा, सूर्य तथा सत्य गौ को प्राप्त करते हैं. (५) इन्द्रो वलं रक्षितारं दुघानां करेणेव वि चकती रवेण. स्वेदाञ्जिभिराशिरमिच्छमानो ऽ रोदयत् पणिमा गा अमुष्णात्.. (६) इंद्र कामधेनुओं के पालक मेघ को छिन्नभिन्न कर देते हैं. उन्होंने दधि की इच्छा से गायों को चुराने वाले पणियों को व्यथित किया था. (६) स ईं सत्येभिः सखिभिः शुचद्भिर्गोधायसं वि धनसैरदर्दः. ब्रह्मणस्पतिर्वृषभिर्वराहैर्घर्मस्वेदेभिर्द्रविणं व्यानट्.. (७) इंद्र धन देने वाले तथा धरती को पुष्ट करने वाले मेघों को विदीर्ण करते हैं. ब्रह्मणस्पति आपस में टकराने वाले मेघों के द्वारा धन में व्याप्त होते हैं. (७) ते सत्येन मनसा गोपर्तिं गा इयानास इषणयन्त धीभिः. बृहस्पतिर्मिथोअवद्यपेभिरुदुस्रिया असृजत स्वयुग्भिः.. (८) ये मेघ बैलों और गायों के समीप जाने की कामना करते हुए अपनी वृद्धियों के द्वारा उन्हें प्राप्त करते हैं. शब्द का पालन करते हुए बृहस्पति मेघों के द्वारा गायों से संयुक्त होते हैं. (८) तं वर्धयन्तो मतिभिः शिवाभिः सिंहमिव नानदतं सधस्थे. बृहस्पतिं वृषणं शूरसातौ भरेभरे अनु मदेम जिष्णुम्.. (९) उस युद्ध में सिंह के समान गर्जन करने वाले बृहस्पति को हम अपनी उत्तम बुद्धियों से बढ़ाते हैं. (९) यदा वाजमसनद् विश्वरूपमा द्यामरुक्षदुत्तराणि सद्म. बृहस्पतिं वृषणं वर्धयन्तो नाना सन्तो बिभ्रतो ज्योतिरासा.. (१०) बृहस्पति देव जिस समय संसार से संबंधित सभी हव्यों का सेवन करते हैं. तब वे आकाश के ऊपर जा कर उत्तम लोकों में प्रतिष्ठा पाते हैं. उस समय शक्ति संपन्न बृहस्पति देव को शेष सभी देव अपने वचनों से उत्साह प्रदान करते हैं. कामनाओं को पूर्ण करने वाले ebook converter DEMO Watermarks*

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बृहस्पति को शेष देव अलगअलग दिशाओं में रहते हुए भी उन्नति प्रदान करते हैं. (१०) सत्यामाशिषं कृणुता वयोद्यै कीरिं चिद्द्यावथ स्वेभिरेवैः. पश्चा मृधो अप भवन्तु विश्वास्तद् रोदसी शृणुतं विश्वमिन्वे.. (११) अन्न के पोषक कारणों के आशीर्वाद को सत्य करते हुए बृहस्पति स्तुतिकर्ता के रक्षक बनें. हे द्यावा पृथ्वी! तुम अग्नि संबंधी ऋचाओं का उच्चारण सुनो. जितने भी युद्ध हैं, वे सब तुम्हारी कृपा से समाप्त हो जाएं. (११) इन्द्रो मह्ना महतो अर्णवस्य वि मूर्धानमभिनदर्बुदस्य. अहन्नहिमरिणात् सप्त सिन्धून् देवैर्द्यावापृथिवी प्रावतं नः.. (१२) इंद्र अपनी महिमा के द्वारा मेघ का मस्तक काट देते हैं. वे मेघ पर प्रहार कर के सात नदियों को प्रकट करते हैं. हे आकाश और पृथ्वी! तुम हमारा पोषण करने वाले बनो. (१२) सूक्त-९२ देवता—इंद्र अभि प्र गोपतिं गिरेन्द्रमर्च यथा विदे. सूनुं सत्यस्य सत्पतिम्.. (१) हे स्तोता! मैं गायों के स्वामी इंद्र को जिस प्रकार प्राप्त कर सकूं, तुम उसी प्रकार उन का पूजन करो. (१) आ हरयः ससृजिरे ऽ रुषीरधि बर्हिषि. यत्राभि संनवामहे.. (२) जिन कुशों पर हम इंद्र का पूजन कर रहे हैं, उन पर इंद्र के घोड़े उनके रथ को पहुंचाएं. (२) इन्द्राय गाव आशिरं दुदुह्रे वज्रिणे मधु. यत् सीमुपह्वरे विदत्.. (३) जब गाएं इंद्र के लिए दूध दुहाती हैं, तब इंद्र सभी ओर से मधुर सोमरसों को प्राप्त करते हैं. (३) उद् यद् ब्रध्नस्य विष्टपं गृहमिन्द्रश्च गन्वहि. मध्वः पीत्वा सचेवहि त्रिः सप्त सख्युः पदे.. (४) ऊपर जो वृत्र राक्षस का हनन करने वाला स्वर्ग है, उस में हम इंद्र के साथ गमन करें. हम इक्कीस बार मधु को पी कर इंद्र की मित्रता प्राप्त करें. (४) अर्चत प्रार्चत प्रियमैधासो अर्चत. अर्चन्तु पुत्रका उत पुरं न धृष्ण्वर्चत.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

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हे स्तोताओ! तुम इंद्र का पूजन श्रेष्ठ रीति से करो. अपने शत्रुओं का नाश करने के लिए तुम इंद्र का पूजन करो. (५) अव स्वराति गर्गरो गोधा परि सनिष्पणत्. पिङ्गा परि चनिष्कददिन्द्राय ब्रह्मोद्यतम्.. (६) जब हमारे मंत्र इंद्र के प्रति गमन करते हैं तो कलश शब्द करता है. उस समय पीले रंग का पदार्थ गमन करता हुआ धनुष की प्रत्यंचा के समान शब्द करता है. (६) आ यत् पतन्त्येन्यः सुदुघा अनपस्फुरः. अपस्फुरं गृभायत सोममिन्द्राय पातवे.. (७) हे स्तोताओ! श्वेत वर्ण की जो गाएं हैं, उन में स्थित अविनाशी पदार्थ को ग्रहण करते हुए इंद्र के पीने के लिए सोमरस लाओ. (७) अपादिन्द्रो अपादग्निर्विश्वे देवा अमत्सत. वरुण इदिह क्षयत् तमापो अभ्यनूषत वत्सं संशिश्वरीरिव.. (८) इस पदार्थ को अग्नि, इंद्र ने तथा विश्वे देवों ने पी लिया है. हे जलो! संशिश्वरी के पुत्र के समान वरुण की स्तुति करो. (८) सुदेवो असि वरुण यस्य ते सप्त सिन्धवः. अनुक्षरन्ति काकुदं सूम्यं सुषिरामिव.. (९) हे वरुण! तुम्हारे पास सात नदियां हैं. जिस प्रकार जल नगर के बाहर निकलता हैं. उसी प्रकार तुम इन सात नदियों से जल प्रवाहित करो. (९) यो व्यतीँरफाणयत् सुयुक्ताँ उप दाशुषे. तक्वो नेता तदिद् वपुरुपमा यो अमुच्यत.. (१०) हवि दाता के लिए जो नेता उत्तम युक्तियों का प्रयोग करते हैं, उन की उपमा उन का शरीर ही है. तात्पर्य यह है कि कोई अन्य उन के समान नहीं है. (१०) अतीदु शक्र ओहत इन्द्रो विश्वा अति द्विषः. भिनत् कनीन ओदनं पच्यमानं परो गिरा.. (११) भार को संभालने वाले इंद्र सभी शत्रुओं को वश में करते हैं. मंत्र से पकते हुए ओदन को कठिन होते हुए भी उन्होंने उस का भेदन किया. (११) अर्भको न कुमारको ऽ धि तिष्ठन्नवं रथम्. स पक्षन्महिषं मृगं पित्रे मात्रे विभुकृतम्.. (१२) ebook converter DEMO Watermarks*

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इंद्र श्रेष्ठ राजकुमार के समान अपने रथ पर बैठते हैं. वे अपने पिता द्यावा और माता पृथ्‍वी के निमित्त खाने के लिए भोजन पकाते हैं. (१२) आ तू सुशिप्र दंपते रथं तिष्ठा हिरण्ययम्. अध द्युक्षं सचेवहि सहस्रपादमरुषं स्वस्तिगामनेहसम्.. (१३) हे इंद्र! तुम स्वर्ण से बने इस रथ पर बैठो. तुम्हारी कृपा से हम भी उस स्वर्ग पर चढ़ें, जो सुंदर वाणियों से संपन्न एवं हजारों मार्गों वाला है. (१३) तं घेमित्था नमस्विन उप स्वराजमासते. अर्थं चिदस्य सुधितं यदेतव आवर्तयन्ति दावने.. (१४) उन इंद्र की इस प्रकार की महिमा जानने वाले व्यक्ति अपने राज्य में प्रतिष्ठित होते हैं. ऋत्विक् समूह हवि देने वाले यजमान के लिए इंद्र के पास जो धन होता है, उसे प्राप्त कराते हैं. (१४) अनु प्रत्नस्यौकसः प्रियमेधास एषाम्. पूर्वामनु प्रयतिं वृक्तबर्हिषो हितप्रयस आशत.. (१५) प्रिय मेधा वाले ऋत्विज् इन इंद्र के पूर्व दिशा में बने भवन से हितकारी अन्न प्राप्त कर के प्रगति करते हैं. (१५) यो राजा चर्षणीनां याता रथेभिरध्रिगुः. विश्वासां तरुता पृतनानां ज्येष्ठो वो वृत्रहा गृणे.. (१६) ज्येष्ठ राजा इंद्र अपने रथ के द्वारा गमन करते हुए सभी सेनाओं के पार चले जाते हैं. मैं उन की स्तुति करता हूं. (१६) इन्द्रं तं शुम्भ पुरुहन्मन्नवसे यस्य द्विता विधर्तरि. हस्ताय वज्रः प्रति धायि दर्शतो महो दिवे न सूर्यः.. (१७) इंद्र की सत्ता मध्यलोक में, अंतरिक्ष में तथा स्वर्गलोक में भी हैं. क्रीड़ा के निमित्त ऊंचा वज्र इंद्र के हाथ में है. वे सूर्य के समान दर्शन करने योग्य हैं. इस यज्ञ में अन्न प्राप्ति के लिए उन्हीं इंद्र को आनंदित करो. (१७) नकिष्टं कर्मणा नशद् यश्चकार सदावृधम्. इन्द्रं न यज्ञैर्विश्वगूर्तमृभ्वसमधृष्टं धृष्णवो जसम्.. (१८) जो पुरुष महान पराक्रमी, ऋभुओं का नाश करने वाले, धृष्ट न होने वाले, वृद्धिकर्ता तथा धर्षक तेज से संपन्न इंद्र की उपासना में संलग्न होता है, उसे उस के कर्म से कोई रोक ebook converter DEMO Watermarks*

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नहीं सकता. (१८) अषाळ्हमुग्रं पृतनासु सासहिं यस्मिन् महीरुरुज्रयः. सं धेनवो जायमाने अनोनवुर्द्यावः क्षमो अनोनवुः.. (१९) वे प्रचंड इंद्र विशाल आश्रय के मार्ग वाले, वाणियों के द्वारा स्तुति प्राप्त तथा सेनाओं के द्वारा असहनीय हैं. आकाश और पृथ्वीलोक उन की स्तुति करते हैं. (१९) यद् द्याव इन्द्र ते शतं शतं भूमिरुत स्युः. न त्वा वज्रिन्तसहस्रं सूर्या अनु न जातमष्ट रोदसी.. (२०) हे इंद्र! आकाश और पृथ्वी सौसौ हों अथवा हजारों सूर्य और आकाश बन जाएं, तब भी वे तुम्हारी समानता करने में समर्थ नहीं हैं. (२०) आ पप्राथ महिना वृष्ण्या वृषन् विश्वा शविष्ठ शवसा. अस्माँ अव मघवन् गोमति व्रजे वज्रिंश्चित्राभिरूतिभिः.. (२१) हे इंद्र! हमारी गोचर भूमि में अपने रक्षा साधनों से हमें रक्षित करते हुए हमारी वृद्धि करो. (२१) सूक्त-९३ देवता—इंद्र उत् त्वा मन्दन्तु स्तोमाः कृणुष्व राधो अद्रिवः. अव ब्रह्मद्विषो जहि.. (१) हे वज्रधारी इंद्र! यह स्तुति तुम्हें प्रसन्न करने वाली हो. तुम ब्रह्मद्वेषियों को नष्ट करो तथा हमें धन दो. (१) पदा पर्णींरराधसो नि बाधस्व महाँ असि. नहि त्वा कश्चन प्रति.. (२) हे इंद्र! तुम पणियों का धन छीन लो और उन्हें मार दो. तुम महान हो. कोई भी तुम से प्रतिस्पर्धा कर के तुम्हारे सामने नहीं ठहर सकता. (२) त्वमीशिषे सुतानामिन्द्र त्वमसुतानाम्. त्वं राजा जनानाम्.. (३) हे इंद्र! तुम संस्कारित सोमरस एवं मनुष्यों के स्वामी हो. (३) ईङ्खयन्तीरपस्युव इन्द्रं जातमुपासते. भेजानासः सुवीर्यम्.. (४) जल की कामना करती हुई तथा श्रेष्ठ वीर्य से भरी हुई ओषधियां उत्पन्न होते ही इंद्र की इच्छा करती हैं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*

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त्वमिन्द्र बलादधि सहसो जात ओजसः. त्वं वृषन् वृषेदासि.. (५) हे इंद्र! तुम कामनाओं की वर्षा करने वाले अपने उस ओज के साथ प्रकट हुए हो, जो सभी को पराजित करता है. (५) त्वमिन्द्रासि वृत्रहा व्य १ न्तरिक्षमतिरः. उद् द्यामस्तभ्ना ओजसा.. (६) हे इंद्र! तुम अंतरिक्ष को लांघने में समर्थ हो. वहां तुम वृत्र राक्षस का नाश करते हो. तुम्हारा ओज स्तंभित करने वाला है, जिस से द्युलोक स्थिर हुआ है. (६) त्वमिन्द्र सजोषसमर्कं बिभर्षि बाह्वोः. वज्रं शिशान ओजसा.. (७) हे इंद्र! तुम प्रीतकर मित्र सूर्य को धारण करने के पश्चात तीव्र वज्र को अपने ओज से धारण करते हो. (७) त्वमिन्द्राभिभूरसि विश्वा जातान्योजसा. स विश्वा भुव आभवः.. (८) हे इंद्र! तुम उत्पन्न होने वाले सभी पदार्थों को अपने बल से अधीन कर लेते हो. तुम सभी शक्तियों को अपने वश में करो. (८) सूक्त-९४ देवता—इंद्र आ यात्विन्द्रः स्वपतिर्मदाय यो धर्मणा तूतुजानस्तुविष्मान्. प्रतवक्षाणो अति विश्वा सहांस्यपारेण महता वृष्ण्येन.. (१) जो इंद्र धर्म के ईश्वर एवं स्वभाव से शीघ्रता करने वाले हैं, वे हर्ष प्राप्त करने के लिए यहां आएं तथा अपनी शक्ति से हमारे उन शत्रुओं को सभी प्रकार क्षीण करें जो हमें दबाना चाहते हैं. (१) सुष्ठामा रथः सुयमा हरी ते मिम्यक्ष वज्रो नृपते गभस्तौ. शीभं राजन्त्सुपथा याह्यर्वाङ् वर्धाम ते पपुषो वृष्ण्यानि.. (२) हे इंद्र! तुम अपने हाथ में वज्र धारण करते हो. तुम्हारे घोड़े सभी प्रकार से तुम्हारे अधीन रहते हैं. तुम्हारे रथ में बैठने का स्थान श्रेष्ठ है. तुम सुंदर मार्ग द्वारा स्वर्ग से आओ. हम सोमपान की कामना वाली तुम्हारी शक्ति को बढ़ाते हैं. (२) एन्द्रवाहो नृपतिं वज्रबाहुमुग्रमुग्रासस्तविषाम एनम्. प्रतवक्षसं वृषभं सत्यशुष्ममेमस्मत्रा सधमादो वहन्तु.. (३) इंद्र वज्रधारी, राजा, भयंकर शत्रुओं का विनाश करने वाले, सत्य के कारण शक्तिशाली तथा कामनाओं की वर्षा करने वाले हैं. इंद्र के शक्तिशाली घोड़े उन्हें ले कर हमारे यज्ञ में ebook converter DEMO Watermarks*

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आएं. (३) एवा पतिं द्रोणसाचं सचेतसमूर्जं स्कम्भं धरुण आ वृषायसे. ओजः कृष्व सं गृभाय त्वे अप्यसो यथा केनिपानांमिनो वृधे.. (४) हे ऋत्विज्! ज्ञानी एवं शक्तिशाली द्रोण पात्र से सुसंगत होने वाले स्कंभ को जल में खींचो. मैं शक्तियों को बढ़ाने के हेतु तुम्हारे साथ रहूं. तुम मुझे बल और आश्रय दो. (४) गमन्नस्मे वसून्या हि शंसिषं स्वाशिषं भरमा याहि सोमिनः. त्वमीशिषे सास्मिन्ना सत्सि बर्हिष्यनाधृष्या तव पात्राणि धर्मणा.. (५) हे इंद्र! इस स्तोता को तुम शुभ आशीर्वाद दो तथा इस यजमान में धन को प्रतिष्ठित करो. हे स्वामी इंद्र! इस सोम के गृह में आ कर कुश के इस आसन पर विराजमान हो जाओ. तुम्हारे पात्र धारण शक्ति के कारण अपमान करने योग्य नहीं हैं. (५) पृथक् प्रायन् प्रथमा देवहूतयो ऽ कृण्वत श्रवस्यानि दुष्टरा. न ये शेकुर्यज्ञियां नावमारुहमीमैव ते न्यविशन्त केपयः.. (६) हे इंद्र! जो जन अपने ज्ञान और कर्म के अनुसार देवयान आदि मार्गों में जाने की कामना करते हैं तथा जो सर्वसाधारण के लिए कष्टसाध्य देवहूति आदि कर्म करते हैं, वे तुम्हारी कृपा के अभाव में यज्ञरूपी नौका पर नहीं चढ़ पाते. इस कारण से वे साधारण कर्म करते हुए मृत्युलोक में ही रुके रहते हैं. (६) एवैवापागपरे सन्तु ढूढ्यो ऽ श्वा येषां दुर्युय आयुयुज्रे. इत्था ये प्रागुपरे सन्ति दावने पुरूणि यत्र वयुनानि भोजना.. (७) जिन अश्वों को दुर्युज नाम का सारथी रथ में जोड़ता है, वे कभी वृद्ध न हों. जो दाता को बहुत से भोज्य पदार्थों से युक्त बनाते हैं, वे मेघ हैं. (७) गिरीँरज्रान् रेजमानाँ अधारयद् द्यौः क्रन्ददन्तरिक्षाणि कोपयत्. समीचीने धिषणे वि ष्कभायति वृष्णः पीत्वा मद उक्थानि शंसति.. (८) सोमरस से हर्षित हुए इंद्र पर्वतों को धारण करते हैं, अंतरिक्ष के पदार्थों को कुपित करते हैं तथा द्युलोक को कुंदनमय बनाते हैं. (८) इमं बिभर्मि सुकृतं ते अङ्कुशं येनारुजासि मघवंछफारुजः. अस्मिन्त्सु ते सवने अस्तवोक्थं सुत इष्टौ मघवन् बोध्याभगः.. (९) हे इंद्र! मैं तुम्हारे अंकुश को धारण करता हूं. तुम अपने इस अंकुश के द्वारा नख वाले पीड़ा दाता प्राणियों को नष्ट करते हो. इस सवन में तुम प्रजा प्राप्त करो तथा सोमरस निष्पन्न ebook converter DEMO Watermarks*

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हो जाने पर धन के जानने वाले बनो. (९) गोभिष्टरेमाममतिं दुरेवां यवेन क्षुधं पुरुहूत विश्वाम्. वयं राजभिः प्रथमा धनान्यस्माकेन वृजनेना जयेम.. (१०) हे अनेक पुरुषों द्वारा बुलाए गए इंद्र! हम यजमान तुम्हारे द्वारा दी हुई गायों के कारण दरिद्रता को लांघ जाएं. तुम ने हमें जो अन्न दिया है, उस से हम अपने भृत्यों, पुत्रों आदि की भूख मिटाएं. हम अपनी शक्ति से शत्रुओं पर विजय प्राप्त करें तथा अपने समान पुरुषों में श्रेष्ठ बन कर धन प्राप्त करें. (१०) बृहस्पतिर्नः परि पातु पश्चादुतोत्तरस्मादधरादघायोः. इन्द्रः पुरस्तादुत मध्यतो नः सखा सखिभ्यो वरिवः कृणोतु.. (११) पूर्व दिशा से आते हुए हिंसक शत्रु से इंद्र हमारी रक्षा करें तथा हमें धन दें. पश्चिम, उत्तर और दक्षिण दिशा से आते हुए हिंसक शत्रुओं से बृहस्पति हमारी रक्षा करें. (११) सूक्त-९५ देवता—इंद्र त्रिकद्रुकेषु महिषो यवाशिरं तुविशुष्मस्तृपत् सोममपिबद् विष्णुना सुतं यथावशत्. स ईं ममाद महि कर्म कर्तवे महामुरुं सैनं सश्चद् देवो देवं सत्यमिन्द्रं सत्य इन्दुः.. (१) वे इंद्र त्रिकद्रुक नाम के सोम पात्रों में सोमरस पीते हैं और जौ आदि मिश्रण से तृप्ति प्राप्त करते हैं. इंद्र विष्णु द्वारा तैयार किए गए सोमरस पर अधिकार करते हैं, क्योंकि वह सोमरस उन्हें बल प्रदान करता है और उन में सुसंगत होता है. (१) प्रो ष्वस्मै पुरोरथमिन्द्राय शूषमर्चत. अभीके चिदु लोककृत् संगे समत्सु वृत्रहा ऽ स्माकं बोधि चोदिता नभन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु.. (२) हे ऋत्विजो! इंद्र के बल की पूजा करो तथा इंद्र की आराधना करो. इंद्र युद्धों में शत्रुओं को मारते हैं. अन्य पुरुषों की प्रत्यंचाएं उन के धनुषों पर न चढ़ पाएं. प्रेरणा करने वाले ये इंद्र हमारी स्तुति को जान गए हैं. (२) त्वं सिन्धूँरवासृजो ऽ धराचो अहन्नहिम्. अशत्रुरिन्द्र जज्ञिषे विश्वं पुष्यसि वार्यं तं त्वा परि ष्वजामहे नभन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु.. (३) हे इंद्र! तुम ने मेघ का वध कर के सरिताओं को दक्षिण दिशा की ओर बहने वाला ebook converter DEMO Watermarks*

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बनाया. तुम सब वरणीय पदार्थों को पुष्ट करते तथा शत्रुओं का नाश करते हो. हम तुम्हें हृदय से लगाते हैं. अन्य पुरुषों की प्रत्यंचाएं उन के धनुषों पर न चढ़ सकें. (३) वि षु विश्वा अरातयो ऽ र्यो नशन्त नो धियः. अस्तासि शत्रवे वधं यो न इन्द्र जिघांसति या ते रातिर्ददिर्वसु नभन्तामन्यकेषां ज्याका अधि धन्वसु.. (४) हे स्वामी इंद्र! हमारे सभी शत्रुओं की बुद्धियां नष्ट हों. जो शत्रु हमारी हिंसा की कामना करते हैं, तुम उन पर मृत्यु का साधन अपना वज्र चलाओ तथा हमें धन प्रदान करो. अन्य पुरुषों की प्रत्यंचाएं उन के धनुषों पर न चढ़ पाएं. (४) सूक्त-९६ देवता—इंद्र तीव्रस्याभिवयसो अस्य पाहि सर्व्रथा वि हरी इह मुञ्च. इन्द्र मा त्वा यजमानासो अन्ये नि रीरमन् तुभ्यमिमे सुतासः.. (१) हे इंद्र! यह जो हवि रूप अन्न देने वाला यजमान है, तुम इस के रथियों की रक्षा करो. हे इंद्र! सोमरस का संस्कार किया जा चुका है, इसलिए अपने घोड़ों को छोड़ कर यहां आओ और दूसरे यजमानों के यहां गमन मत करो. (१) तुभ्यं सुतास्तुभ्यमु सोत्वासस्त्वां गिरः श्वात्र्या आ ह्वयन्ति. इन्द्रेदमद्य सवनं जुषाणो विश्वस्य विद्वां इह पाहि सोमम्.. (२) हे इंद्र! इस सोमरस को तुम्हारे लिए ही छाना गया है. ये स्तुतियां तुम्हारा ही आह्वान करती हैं. तुम सब को जानने वाले हो. हमारे यज्ञ में आ कर तुम सोमरस का पान करो. (२) य उशता मनसा सोममस्मै सर्वहृदा देवकामः सुनोति. न गा इन्द्रस्तस्य परा ददाति प्रशस्तमिच्चारुमस्मै कृणोति.. (३) देवों की कामना करने वाला जो पुरुष सोमरस को तैयार करता है, उस के स्रोतों को इंद्र स्वीकार कर लेते हैं तथा मधुर वचनों के द्वारा उसे संतुष्ट करते हैं. (३) अनुस्पष्टो भवत्येषो अस्य यो अस्मै रेवान् न सुनोति सोमम्. निररत्नौ मघवा तं दधाति ब्रह्मद्विषो हन्त्यनानुदिष्टः.. (४) जो पुरुष सोम का संस्कार नहीं करता, वह इंद्र के प्रहार के योग्य होता है. उस ब्रह्मद्वेषी और हवि का दान न करने वाले को इंद्र नष्ट कर देते हैं. (४) अश्वायन्तो गव्यन्तो वाजयन्तो हवामहे त्वोपगन्तवा उ. आभूषन्तस्ते सुमतौ नवायां वयमिन्द्र त्वा शुनं हुवेम.. (५) ebook converter DEMO Watermarks*

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हे इंद्र! अश्व, गौ और अन्न की कामना करने वाले हम तुम्हारा आश्रय पाने के लिए नवीन तथा उत्तम बुद्धि से संगत हो कर तुम्हें बुलाते हैं. (५) मुञ्चामि त्वा हविषा जीवनाय कमज्ञातयक्ष्मादुत राजयक्ष्मात्. ग्राहिर्जग्राह यद्येतदेनं तस्या इन्द्राग्नी प्र मुमुक्तमेनम्.. (६) हे रोगी पुरुष! मैं तेरे जीवन के हेतु हवि देता हुआ तुझे क्षय आदि रोगों से मुक्त करता हूं. हे इंद्र और अग्नि! यदि इस पुरुष को पिशाची ने पकड़ लिया हो तो इसे उस के पाप से छुड़ाओ. (६) यदि क्षितायुर्यदि वा परेतो यदि मृत्योरन्तिकं नीत एव. तमा हरामि निर्ऋतेरुपस्थादस्पार्शमेनं शतशारदाय.. (७) यह पुरुष दुर्गति को प्राप्त हो गया है और इस की आयु क्षीण हो गई है. यह मृत्यु के समीप पहुंच गया है, तब भी मैं इस को, निर्ऋति के अंक को खींचता हूं. मैं ने इस का स्पर्श इस हेतु किया है कि यह सौ वर्ष की आयु प्राप्त करे. (७) सहस्राक्षेण शतवीर्येण शतायुषा हविषाहार्षमेनम्. इन्द्रो यथैनं शरदो नयात्यति विश्वस्य दुरितस्य पारम्.. (८) मैं हवि के द्वारा इस रोगी पुरुष को हजारों सूक्ष्म दृष्टियों, सैकड़ों वीर्यों तथा सौ वर्ष की आयु के लिए मृत्यु से छीन लाया हूं. इसे इंद्र पूरी आयु के लिए पाप के पार लगाएं. (८) शतं जीव शरदो वर्धमानः शतं हेमन्ताञ्छतमु वसन्तान्. शतं त इन्द्रो अग्निः सविता बृहस्पतिः शतायुषा हविषाहार्षमेनम्.. (९) हे रोगी! तू सौ वर्ष तक जीवित रहता हुआ वृद्धि प्राप्त कर. तू सौ हेमंतों तथा सौ वसंतों तक जीवित रह. इंद्र, अग्नि, सविता तथा बृहस्पति तुझे शतायु बनाएं. इस हवि के द्वारा मैं तुझे शतायु बना कर ले आया हूं. (९) आहार्षमविदं त्वा पुनरागाः पुनर्णवः. सर्वाङ्ग सर्वं ते चक्षुः सर्वमायुश्च ते ऽ विदम्.. (१०) हे रोगी पुरुष! तू लौट आ तथा पुनः नव जीवन प्राप्त कर. इस कर्म के द्वारा मैं ने तुझे दर्शन शक्ति तथा पूर्ण आयु देने में सफलता प्राप्त कर ली है. (१०) ब्रह्मणाग्निः संविदानो रक्षोहा बाधतामितः. अमीवा यस्ते गर्भं दुर्णामा योनिमाशये.. (११) अग्नि देवता राक्षसों को नष्ट करने वाले मंत्र से युक्त हो कर तेरे दूषित रोग को रोक दें.

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यह रोग तेरे गर्भाशय में फैल रहा है. (११) यस्ते गर्भममीवा दुर्णामा योनिमाशये. अग्निष्टं ब्रह्मणा सह निष्क्रव्यादमनीनशत्.. (१२) जो दुष्ट रोग तेरे गर्भाशय में व्याप्त हो रहा है, उसे अग्नि देव मंत्र के बल से नष्ट करें. (१२) यस्ते हन्ति पतयन्तं निषत्स्नं यः सरीसृपम्. जातं यस्ते जिघांसति तमितो नाशयामसि.. (१३) जो तेरे गिरते हुए अथवा निकलते हुए गर्भ को नष्ट करने की इच्छा करता है, हम उसे नष्ट करते हैं. (१३) यस्त ऊरु विहरत्यन्तरा दम्पती शये. योनिं यो अन्तरारेळ्हि तमितो नाशयामसि.. (१४) जो रोग तुम पतिपत्नी में व्याप्त है, जो तेरी योनि में तथा तेरी जंघाओं में व्याप्त है, हम उसे दूर करते हैं. (१४) यस्त्वा भ्राता पतिर्भूत्वा जारो भूत्वा निपद्यते. प्रजां यस्ते जिघांसति तमितो नाशयामसि.. (१५) जो पिशाच पति, उपपति अथवा भाई बन कर आता हुआ तेरे गर्भ में स्थित शिशु को नष्ट करना चाहता है, हम उसे मारते हैं. (१५) यस्त्वा स्वप्नेन तमसा मोहयित्वा निपद्यते. प्रजां यस्ते जिघांसति तमितो नाशयामसि.. (१६) जो तेरे स्वप्न रूप अंधकार में व्याप्त हो कर तेरी संतान का नाश करना चाहता है, उसे हम नष्ट करते हैं. (१६) अक्षीभ्यां ते नासिकाभ्यां कर्णाभ्यां छुबुकादधि. यक्ष्मं शीर्षण्यं मस्तिष्काज्जिह्वाया वि वृहामि ते.. (१७) मैं तेरे नेत्रों, नासिका, कानों, ठुड्डी आदि से शीर्षण्य रोग को तथा तेरे मस्तक और जीभ से यक्ष्मा आदि रोगों को बाहर करता हूं. (१७) ग्रीवाभ्यस्त उष्णिहाभ्यः कीकसाभ्यो अनूक्यात. यक्ष्मं दोषण्य १ मंसाभ्यां बाहुभ्यां वि वृहामि ते.. (१८) ebook converter DEMO Watermarks*

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मैं तेरी अस्थियों से, नाड़ियों से, कंधों और भुजाओं में यक्ष्मा रोग को नष्ट करता हूं. (१८) हृदयात् ते परि क्लोम्नो हलीक्ष्णात् पार्श्वभ्याम्. यक्ष्मं मतस्नाभ्यां प्लीह्नो यकन्स्ते वि वृहामसि.. (१९) हे रोगी! मैं तेरे हृदय से यक्ष्मा रोग को निकालता हूं. हृदय के समीप स्थित कलोम से, हलीक्ष्य से, पित्ताशय से, पार्श्वों से, प्लीहा अर्थात् तिल्ली से, यकृत से और तेरे उदर से भी तेरे यक्ष्मा रोग को नष्ट करता हूं. (१९) आन्त्रेभ्यस्ते गुदाभ्यो वनिष्ठोरुदरादधि. यक्ष्मं कुक्षिभ्यां प्लाशोर्नाभ्या वि वृहामि ते.. (२०) हे क्षय रोग से ग्रसित रोगी! मैं तेरी आंखों से, गुदा से, उदर से, दोनों कुक्षियों से, प्लाशी से तथा नाभि से यक्ष्मा रोग को बाहर निकाल कर हटाता हूं. (२०) ऊरुभ्यां ते अष्ठीवद्भ्यां पाष्णिभ्यां प्रपदाभ्याम्. यक्ष्मं भसद्यं १ श्रोणिभ्यां भासदं भंससो वि वृहामि ते.. (२१) मैं तेरे उरुओं अर्थात् जंघाओं, घुटनों तथा पैरों के ऊपर तथा आगे के भाग से, कमर से, कमर के नीचे से यक्ष्मा रोग को बाहर निकाल कर अलग करता हूं. (२१) अस्थिभ्यस्ते मज्जभ्यः स्नावभ्यो धमनिभ्यः. यक्ष्मं पाणिभ्यामङ्गुलिभ्यो नखेभ्यो वि वृहामि ते.. (२२) मज्जा, अस्थि, सूक्ष्म नाड़ियों, उंगलियों, नाखूनों और तेरे शरीर की सभी धातुओं से तेरे यक्ष्मा रोग को बाहर निकाल कर तुझ से दूर करता हूं. (२२) अङ्गे अङ्गे लोम्निलोम्नि यस्ते पर्वणिपर्वणि. यक्ष्मं त्वचस्यं ते वयं कश्यपस्य वीबर्हेण विष्वञ्चं वि वृहामसि.. (२३) हे रोगी! तेरे सब अंगों, सभी रोम कूपों तथा जोड़ों में व्याप्त यक्ष्मा रोग को हम दूर करते हैं. तेरी त्वचा में स्थित तथा नेत्रों में व्याप्त यक्ष्मा रोग को भी मैं मंत्रों द्वारा नष्ट करता हूं. (२३) अपेहि मनसस्पते ऽ प क्राम परश्चर. परो निर्ऋत्या आ चक्ष्व बहुधा जीवतो मनः.. (२४) हे रोग! तू मन पर भी अधिकार करने वाला है. तू दूर हो जा. इस जीवित पुरुष के मन से दूर होने के लिए तू निर्ऋति से कह. (२४) ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-९७ देवता—इंद्र

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सूक्त-९७ देवता—इंद्र वयमेनमिदा ह्योपीपेमेह वज्रिणम्. तस्मा उ अद्य समना सुतं भरा नूनं भूषत श्रुते.. (१) हे स्तोताओ! हम ने इंद्र को सोमरस से पुष्ट किया है. तुम भी प्रसन्न मन से उन्हें संस्कार किया हुआ सोम प्रदान करो तथा उन्हें स्तोत्रों के द्वारा सुसज्जित करो. (१) वृकश्चिदस्य वारण उरामथिरा वयुनेषु भूषति. सेमं न स्तोमं जुजुषाण आ गहीन्द्र प्र चित्रया धिया.. (२) इंद्र का भेड़िया शत्रुओं को भगा देता है तथा भेड़ों को मथ डालता है. हे इंद्र! तुम अपनी श्रेष्ठ बुद्धि के द्वारा इस यज्ञ में आओ तथा स्तुतियों को सुनो. (२) कद् न्व १ स्याकृतमिन्द्रस्यास्ति पौंस्यम्. केनो नु कं श्रोमतेन न शुश्रुवे जनुषः परि वृत्रहा.. (३) यह किस ने नहीं सुना है कि इंद्र ने वृत्र राक्षस का नाश किया. ऐसा कोई पराक्रम नहीं है, जो इंद्र में न हो. (३) सूक्त-९८ देवता—इंद्र त्वामिद्धि हवामहे साता वाजस्य कारवः. त्वां वृत्रेष्विन्द्र सत्पतिं नरस्त्वां काष्ठास्वर्वतः.. (१) हे इंद्र! स्तुति करने वाले हम अन्न प्राप्ति से संबंधित यज्ञ में तुम्हें ही बुलाते हैं. तुम सज्जनों के रक्षक और जलों को प्रेरित करने वाले हो. (१) स त्वं नश्चित्र वज्रहस्त धृष्णुया मह स्तवानो अद्रिवः. गामश्वं रथ्यमिन्द्र सं किर सत्रा वाजं न जिग्युषे.. (२) हे इंद्र! तुम हमारे द्वारा पूजित हो कर विजय की इच्छा करने वाले नरेश के अश्व, रथ, गाय आदि प्रदान करो. हे इंद्र! तुम अपने हाथों में वज्र धारण करने वाले हो. (२) सूक्त-९९ देवता—इंद्र अभि त्वा पूर्वपीतय इन्द्र स्तोमेभिरायवः. समीचीनास ऋभवः समस्वरन् रुद्रा गृणन्त पूर्व्यम्.. (१) हे इंद्र! तुम ने पहले सोमरस पिया था, उसी प्रकार सोमरस पीने के लिए ऋभु और रुद्र ebook converter DEMO Watermarks*

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देवता तुम्हारी स्तुति करते हैं. (१) अस्येदिन्द्रो वावृधे वृष्ण्यं शवो मदे सुतस्य विष्णवि. अद्या तमस्य महिमानमायवो ऽ नु ष्टुवन्ति पूर्वथा.. (२) तैयार किए हुए सोम रस के द्वारा हर्ष प्राप्त होने पर वे इंद्र यजमान के धन और बल की वृद्धि करते हैं. स्तुति करने वाले ये जन उन इंद्र की महिमा को ही पहले के समान गाते हैं. (२) सूक्त-१०० देवता—इंद्र अधा हीन्द्र गिर्वण उप त्वा कामान् महः ससृज्महे. उदेव यन्त उदभिः.. (१) हे इंद्र! जिस प्रकार जल की कामना करते हुए मनुष्य जल में जल को मिलाते हैं, उसी प्रकार तुम्हारी कामना करने वाले मनुष्य तुम्हें सोम रूपी जलों से मिलाते हैं. (१) वार्ण त्वा यव्याभिर्वधंन्ति शूर ब्रह्माणि. वावृध्वांसं चिदद्रिवो दिवेदिवे.. (२) हे वज्रधारी इंद्र! तुम प्रत्येक स्तुति पर अपनी वृद्धि की कामना करते हो, इसलिए ये मंत्र तुम्हें जल की भांति वृद्धियुक्त बनाते हैं. (२) युञ्जन्ति हरी इषिरस्य गाथयोरौ रथ उरुयुगे. इन्द्रवाहा वचोयुजा.. (३) युद्ध के लिए प्रस्थान करने वाले इंद्र के यशोगान संबंधी मंत्रों से रथ में जुड़ने वाले इंद्र के घोड़े रथ में जुड़ते हैं. (३) सूक्त-१०१ देवता—अग्नि अग्निं दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम्. अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम्.. (१) मैं सब के ज्ञाता, होता और यज्ञों को उत्तम बनाने वाले अग्नि का वरण करता हूं. (१) अग्निर्माग्न हवीमभिः सदा हवन्त विशपतिम्. हव्यवाहं पुरुप्रियम्.. (२) हव्यवाहक, बहुतों के प्रिय तथा प्रजापति अग्नि को यजमान हवि प्रदान करते हैं. इस कारण हम भी अग्नि को हवि देते हैं. (२) अग्ने देवाँ इहा वह जज्ञानो वृक्तबर्हिषे. असि होता न ईड्यः.. (३) हे अग्नि! ऋत्विज् के हेतु प्रदीप्त होते हुए तुम हमारे होता हो, इसलिए तुम देवों को ebook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-१०२ देवता—अग्नि

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हमारे इस यज्ञ में ले कर आओ. (३) सूक्त-१०२ देवता—अग्नि ईळेन्यो नमस्य स्तिरस्तमांसि दर्शतः. समग्निरिध्यते वृषा.. (१) अग्नि स्तुतियों और नमस्कारों के योग्य हैं. कामनाओं की वर्षा करने वाले एवं दर्शनीय हैं. अग्नि अपने धूम को तिरछा करते हुए प्रज्वलित होते हैं. (१) वृषो अग्निः समिध्यते ऽ श्वो न देववाहनः. तं हविष्मन्त ईळते.. (२) कामनाओं की वर्षा करने वाले अग्नि देवताओं को वहन करने वाले अश्व के समान प्रदीप्त होते हैं. हवि देने वाले यजमान उन प्रदीप्त अग्नि की पूजा करते हैं. (२) वृषणं त्वा वयं वृषन् वृषणः समिधीमहि. अग्ने दीद्यतं बृहत्.. (३) हे कामनाओं की वर्षा करने वाले अग्नि! हवि की वर्षा करने वाले हम कामनाओं की वर्षा करने वाले तुम को भलीभांति प्रज्वलित करते हैं. इसलिए तुम भलीभांति प्रदीप्त बनो. (३) सूक्त-१०३ देवता—अग्नि अग्निमीळिष्वावसे गाथाभिः शीरशोचिषम्. अग्निं राये पुरुमीळ्ह श्रुतं नरो ऽ ग्निं सुदीतये छर्दिः.. (१) हे मनुष्य! तू अन्न प्राप्ति के लिए अग्नि की गाथाओं के द्वारा अग्नि की स्तुति कर. तू ऐसे अग्नि की पूजा कर जो धन दान के लिए प्रसिद्ध, प्रदीप्त और शोभायमान हैं. (१) अग्न आ याह्यग्निभिर्होतारं त्वा वृणीमहे. आ त्वामनक्तु प्रयता हविष्मती यजिष्ठं बर्हिरासदे.. (२) हे अग्नि! हम श्रोतागण तुम्हें यज्ञ में बुलाते हैं. तुम अपनी सभी शक्तियों के साथ इस यज्ञ में आओ. भली प्रकार प्रस्तुत किए गए, हवि रूप से युक्त बर्हि तुम्हारे साथ सुसंगत बनें. (२) अच्छा हि त्वा सहसः सूनो अङ्गिरः सुचश्चरन्त्यध्वरे. ऊर्जो नपातं घृतकेशमीमहे ऽ ग्निं यज्ञेषु पूर्व्यम्.. (३) हे अंगिरा गोत्र वाले अग्नि! तुम जल के पुत्र के समान हो. यज्ञ के सुच अर्थात् सुवा नाम के पात्र तुम्हारे सामने गति करते हैं. हम यज्ञ में सदा नवीन और शक्तिशाली अग्नि की स्तुति eBook converter DEMO Watermarks*

सूक्त-१०४ देवता—इंद्र

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करते हैं. (३) सूक्त-१०४ देवता—इंद्र इमा उ त्वा पुरूवसो गिरो वर्धन्तु या मम. पावकवर्णाः शुचयो विपश्चितो ऽ भि स्तोमैरनूषत.. (१) हे इंद्र! तुम अपरिमित ऐश्वर्य वाले हो. अग्नि के समान पवित्र हमारी वाणियां तुम्हारी वृद्धि करें. हे स्तोताओ! तुम इंद्र के लिए प्रशंसा मंत्रों का उच्चारण करो. (१) अयं सहस्रमृषिभिः सहस्कृतः समुद्र इव पप्रथे. सत्यः सो अस्य महिमा गृणे शवो यज्ञेषु विप्रराज्ये.. (२) जल के द्वारा बढ़े हुए सागर के समान ये अग्नि ऋषियों द्वारा दी गई हवियों से हजार गुना बढ़ते हैं. मैं इन अग्नि की महिमा का यथार्थ रूप में बखान कर रहा हूं. इन अग्नि का बल यज्ञ में देखने योग्य होता है. (२) आ नो विश्वासु हव्य इन्द्रः समत्सु भूषतु. उप ब्रह्माणि सवनानि वृत्रहा परमज्या ऋचीषमः.. (३) हे इंद्र! तुम हवि प्राप्त करने योग्य हो. तुम हमें सभी यज्ञों में सुशोभित करो. वृत्र राक्षस को मारने वाले इंद्र ऋचाओं के अनुसार अपना रूप प्रकट करते हैं. वे इंद्र हमारे सूक्तों, हवियों तथा मंत्रों को सुशोभित बनाएं. (३) त्वं दाता प्रथमो राधसामस्यसि सत्य ईशानकृत्. तुविद्युम्नस्य युज्या वृणीमहे पुत्रस्य शवसो महः.. (४) हे धनों को देने वाले अग्नि! तुम सब को प्रभुता प्रदान करते हो. तुम जलों के पुत्र हो. हम प्रदीप्त अग्नि का वरण करते हैं. (४) सूक्त-१०५ देवता—इंद्र त्वमिन्द्र प्रतूर्तिष्वभि विश्वा असि स्पृधः. अशास्तिहा जनिता विश्वतूरसि त्वं तूर्य तरुष्यतः.. (१) हे इंद्र! तुम अशक्ति के नाशक, कल्याणकारी तथा हिंसापूर्ण युद्धों में प्रतिस्पर्धा करने वाले हो. तुम सब की अपेक्षा शीघ्रता करने वाले हो. (१) अनु ते शुष्मं तुरयन्तमीयतुः क्षोणी शिशुं न मातरा. विश्वास्ते स्पृधः श्रथयन्त मन्यवे वृत्रं यदिन्द्र तूर्वसि.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*