आयुर्वेद दर्शन
Ayurveda Darshan
वैद्य महादेव चन्द्रशेखर पाठक द्वारा
स्रोत: 1949 Edition · De Ra Ekatara Indoor · 1949 (उद्गम)
श्री.
आयुर्वेद-दर्शन.
विषय प्रवेश.
इस आयुर्वेद-दर्शन में मुख्यतः इस बात पर विचार करना है कि 'भगवान् पुनर्वसु आत्रेय के समय तक देह लोकरोगोत्पादक विशेषतः पुरुषरोगोत्पादक कारणों के विषय में आयुर्वेद में कितने भिन्न २ दार्शनिक संप्रदाय व उनके भिन्न २ मत प्रचलित थे और इनके विषय में अंतिम निर्णय क्या हुआ' ।
दार्शनिक दृष्ट्या पुरुष रोगोत्पादक कारणों का विचार करने वाले ऋषियों के नाम चरक संहिता के 'यज्ञः पुरुषीय,' 'आत्रेय भद्रा काष्पीय' और 'वातकलाकलीय' परिषदों के विवेचन में उल्लिखित हैं और उनके सांप्रदायिक बक्तव्यों के अंश उक्त परिषदों के अतिरिक्त भी सर्वत्र अभिवेश व आत्रेय के संवाद के रूप में उपलब्ध होते हैं । इनमें जो संप्रदाय वैदिक हैं उनका वैदिक मंत्रों में वर्णन है । सिवाय
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आयुर्वेद-दर्शन
इन संप्रदायों से संबंध रखने वाले कतिपय अंश सुश्रुत-संहिता अष्टांगसंग्रह आदि तंत्रों में भी दिखाई देते हैं। चरकाचार्य नागाजुन आदि संस्कारकर्ताओं ने इन वचनों का इस कदर संहितीकरण किया है कि उसका विश्लेषण करके प्रत्येक संप्रदाय के भिन्न २ वक्तव्य को समुचित रूप से जानना कठिन है। फिर भी 'यज्ञः पुरुषीय परिषद्' के आधार पर उन अंशों को जानने का हम यथामति सत्साहस करते हैं।
यह मानना अधिक संतोषजनक है कि यज्ञः—पुरुषीय-परिषद् का आयोजन भारतीय युद्ध के पूर्व किसी समय हुआ। क्योंकि इस परिषद् में जो ऋषि उपस्थित थे उनमें से कतिपय के नाम ब्राह्मण ग्रंथों में उपलब्ध होते हैं। महाभारत के आदि पर्व में लिखित द्रोणाचार्य की जीवनी पर से यह ज्ञात होता है कि द्रोणाचार्य का अध्ययन कुलपति अग्निवेश के आश्रम में हुआ। उक्त अग्निवेश, यदि पुनर्वसु के पट्टशिष्य अग्निवेश ही हों तो यज्ञः—पुरुषीय-परिषद् का समय युद्धपूर्व ही होगा। पुनर्वसु आत्रेय जो कि इस परिषद् के अध्यक्ष थे; त्रेतायुग के अंत तक ही 'युगधर्म' का विवेचन (च. वि. अ. ३) करते हुए दिखाई देते हैं। इस पर से भी यह अनुमान किया जा सकता है कि उनके लिये द्वापर युग वर्तमान समय की घटना थी।
विवेच्य प्रवेश
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इसके अतिरिक्त दो बातों का और भी विचार करना होगा। पहिली यह कि यज्ञः—पुरुषीय—परिषद् में जिन दार्शनिक संप्रदायों का उल्लेख है वे सांख्य-वेदांत-न्याय-योग-सूत्र प्रतिपादित दर्शनों से प्राचीन मालूम होते हैं। अर्थात् श्रीमद् व्यास के वेदांत सूत्रों की रचना यज्ञः—पुरुषीय—परिषद् के बाद हुई है। दूसरी यह कि यह परिषद् उस समय हुई जिस समय बाल्हीक देश में एक मात्र वैदिक संप्रदाय प्रचलित था।
यज्ञः—पुरुषीय—परिषद् में जिन दार्शनिक संप्रदायों का उल्लेख है उनके पूर्वोपपत्थ का निश्चय करना जितना गंभीर है उतना ही आवश्यक है। इस विषय में मैं उनसे सहमत हूँ जो कि यह प्रतिपादन करते हैं कि मानवीयज्ञान की अभिवृद्धि क्रमशः और स्वाभाविकरीत्या पैदा होने वाली आवश्यकताओं के अनुसार हुई है। इस तरह देखा जाय तो सर्व प्रथम आधिदैविक दार्शनिकों का तत्पश्चात् आधिभौतिक दार्शनिकों का और तत्पश्चात् आध्यात्मिक दार्शनिकों का अभ्युत्थान स्वीकार करना स्वाभाविक है। यज्ञः—पुरुषीय—परिषद् की चर्चा में यह क्रम दिखाई नहीं देता और यह कोई आवश्यक भी नहीं है कि सभा समितियों में अपने ऐतिहासिक पूर्वोपपत्थ के अनुसार ही आगे पीछे बोला जाय।
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आयुर्वेद-दर्शन
किसी समय ( अथवा सर्व प्रथम ) आयुर्वेद में वह सृष्टि विज्ञान प्रचलित था जिसका आरंभ सूर्य, चंद्र और वायु इन प्रत्यक्ष जागतिक चमत्कारों अथवा देवताओं से होता है। इन पर टाँछि रखने वालों का संक्षेप में यह कथन था कि ‘ इनके कारण क्रमशः ऋतु, रस, दोष, देह इनकी उत्पत्ति होती है ’। सारांश सचेतन सृष्टि, मनुष्य अथवा पुरुष, सूर्य, सोम, वायु इनका ही परिणाम है अर्थात् ये ही पुरुष को पैदा करते हैं।
इस सृष्टि-विज्ञान का वास्तविक नाम हमको मालूम नहीं है और यह भी मालूम नहीं है कि इसके प्रवर्तक आचार्य कौन थे। सुभोते के लिये हमने इस सृष्टि-विज्ञान का नाम ‘ षड्रसवाद ’ और इसके प्रवर्तकों का नाम ‘ षड्रसवादी ’ रक्खा है। आगे यथा समय इस सृष्टि-विज्ञान के भिन्न २ अंशों पर हम अधिक विचार करेंगे।
अन्य अथवा तदुत्तरकालीन दार्शनिक, सचेतन सृष्ट्युत्पत्ति के संबंध में साधारणतः उक्त सृष्टिक्रम को ही स्वीकार करते थे पर उनका तत्व संख्यान, द्रव्यगुण और कार्य-कारण-भाव विषयक मत भिन्न २ था। अतः वे उक्त षड्रसवाद में अपने २ सिद्धांत के अनुसार संशोधन परिवर्तन करते थे और आपस में पुरुषोत्पादक कारणों के विषय में मतभेद भी रखते थे। यज्ञः-पुरुषीय-परिषद्
विषय प्रवेश
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का आयोजन मुख्यतः इनके पुरुष विषयक उक्त मतभेद को हल करने के लिये ही हुआ ।
इस परिषद् में काशीपति वामक, ( मुख्य प्रस्तावक ) आत्मवादी पारीक्षि मौल्ल्य, सत्त्ववादी शरलोमा, रसवादी उर्फ त्रिधातुसिद्धांत-वादी राजर्षि वार्योविद, षड्धातुवादी उर्फ आद्यसंख्य हिरण्याक्ष कुशिक, परंपरावादी कौशिक, कर्मवादी भद्रकाप्य, स्वभाव उर्फ धातु-पंचकवादी भारद्वाज, प्रजापति-वादी बाल्हीक भिषक् कांकायन, कालवादी भिक्षु आत्रेय और त्रिभागान्तक सिद्धांत में इनका सब का समन्वय करने वाले अध्यक्ष पुनर्वसु आत्रेय सम्मिलित थे । इनके अतिरिक्त पुनर्वसु आत्रेय के पट्टशिष्य अभिवेद्य भी उपस्थित थे ।
यज्ञः—पुरुषीय-परिषद् में इनका संवाद उसी क्रम से हुआ जिस क्रम से हमने उनका नामोलेख किया है । किंतु आयुर्वेद क्षेत्र में उनका प्रवेश इसी क्रम से हुआ हो यह संभव नहीं है ।
हमारी राय में आयुर्वेद के दार्शनिक क्षेत्र में सर्वे प्रथम षड्हरसवाद था । बाद स्वभाववाद, परंपरावाद, कालवाद और रसवाद उर्फ त्रिधातु-सिद्धांत इनका प्रवेश हुआ । षड्हरसवाद को छोड़ दिया जाय तो इनमें स्वभाव अथवा धातु-पंचकवाद और त्रिधातु सिद्धांत ही अधिक प्रभावशाली थे । ये चेतना
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आयुर्वेद-दर्शन
धातु को स्वतः—सिद्ध नहीं मानते थे। इनके बाद आयुर्वेद क्षेत्र में षड्धातुवाद और प्रजापतिवाद का प्रवेश हुआ। ये आत्मा को स्वतःसिद्ध मानते थे। और इनके बाद आत्मवाद, सत्त्ववाद और कर्मवाद का आयुर्वेद के दार्शनिक क्षेत्र में प्रवेश हुआ।
उनमें कुछ पंचात्मक लोकपक्षीय और कुछ द्विधात्मक लोकपक्षीय थे। जैसा कि “लोको हि द्विविधः स्थावरों-जंगमश्च। द्विविधात्मक एव आग्नेयः सौम्यश्च तदभूयस्त्वात् पंचात्मको वा।” (सु. सू. अ. १) इसमें भी स्वीकार किया गया है।
पंचात्मक लोकपक्षीय, लोक को आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी इनमें विभाजित करते थे। किन्तु इनमें भी कुछ गुर्वादि गुणों को प्रधान मानते थे तो कुछ शब्दादि गुणों को। गुर्वादि गुणप्रधान पंचात्मक लोकपक्षीयों में भी एक संप्रदाय आकाशादि को गुर्वादि गुणवत् नित्य द्रव्य मानता था जैसा कि स्वभाववादी-भारद्वाज-संप्रदाय और दूसरा आकाशादिकों को नित्य द्रव्य नहीं अपितु चेतना धातु के अमतीघातकत्वादि गुण मानता था जैसा कि षड्धातुवादी हिरण्यक्ष संप्रदाय। शब्दादिगुण प्रधान पंचात्मक लोकपक्षीय, आकाशादिकों की उत्पत्ति शब्दस्पर्शादितन्मात्राओं से मानते हैं जैसा कि सत्त्ववादी।
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द्विधात्मक लोकपक्षीय, लोक को अग्नीपोम संज्ञक धर्मद्वय में विभाजित करते थे जैसा कि अग्नीपोमवादी। इनका उत्थान षड्स्वाद में से हुआ और पर्यवसान काल-वाद, त्रिधातु-सिद्धांत और प्रजाप्रति पक्षमें अर्थात् त्रिधात्वात्मक लोकपक्ष में हुआ।
उक्त सब संप्रदायों में कुछ सत्त्व को शरीरोत्पन्न तो कुछ शरीर को सत्त्वोत्पन्न कहते थे। जो सत्त्व को शरीरोत्पन्न कहते थे वे चेतना धातु को स्वतःसिद्ध नहीं मानते थे।
यज्ञः पुरुषीय परिषद् का वर्णन चरक संहिता के सूत्र स्थान अध्याय २५ में उपलब्ध होता है। उसके आयोजन के विषय में यह कहा गया है कि:—
पुरा प्रत्यक्ष धर्मीणं भगवंतं पुनर्वसुम्। समेतानां महर्षिणां प्रादुरासीदियं कथा ॥ आत्मेंद्रिय-मनोऽर्थानां योऽयं पुरुष संज्ञकः। राशित्तस्यामयानांच प्रागुत्पत्तिविनिश्चये ॥
अर्थात् प्राचीन काल में साक्षात् धर्ममूर्ति भगवान् पुनर्वसु अत्रेय के पास महर्षि सम्मिलित हुए और उनमें आत्मा इंद्रिय मन अर्थ इनके राशिरूप पुरुष के प्राथमिक उत्पत्ति तथा रोग के विषय में इस प्रकार चर्चा हुई।
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आयुर्वेद-दर्शन
यहां पुरुष को जो आत्मा इत्यादि का राशि कहा गया है वह निर्णीतार्थ-प्रतिपादक नहीं है। किसी निर्णय के पूर्व जिस तरह की सामान्य भाषा बरती जाती है उसी तरह का यह विधान है। ‘ प्राक् ’ शब्द से यह सूचित होता है कि इस परिपद की चर्चा मुख्यतः इस बात का निर्णय करने के लिये हुई कि पुरुष की अथवा ‘सचेतन स्मृति’ की उत्पत्ति का आरंभ किन कारणों से हुआ। इसमें संदेह नहीं कि इस चर्चा का प्रधान विषय ‘सचेतन स्मृति’ ही रहा है।
तदनंतरं काशिपतिर्वामकोवाचमर्थवित् ।
व्याजहारर्षिं समितिमभि-स्तुत्याभिवाद्य च ॥
किंतुस्यात्पुरुषो यज्जःस्तज्जास्तस्यामायाःस्मृताः ।
नवा....
सब ऋषियों के सम्मिलित होने के पश्चात् काशिराज वामक आगे बढे और उन्होंने अभिवादन पूर्वक यह प्रश्न किया कि “ पुरुष, किन कारणों से पैदा हुआ ? और वह जिन कारणों से पैदा हुआ उन कारणों से उसको रोग पैदा होते हैं या नहीं ?
....इत्युक्ते नरेद्रेण प्रोवाचर्षीन्पुनर्वसुः ।
सर्वं एवाभितं ज्ञानं विज्ञानच्छिन्नसंशयाः ॥
भवंतश्छेतुमर्हति काशिराजस्य संशयम् ।
विषय प्रवेश
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नरेंद्र के द्वारा इस तरह सवाल किये जाने पर (अध्यक्ष) पुनर्वसु ने सब ऋषियों के प्रति यह कहा कि 'आप सभी अपने अगाध ज्ञानविज्ञान के कारण संदेह रहित हैं। अतः काशिराज के संशय को आप मिटा सकते हैं।'
इस पर ऋषियों में जो संवाद हुआ वह निम्नलिखित है।
पारीक्षिमौद्गल्य का आत्मवाद
पारीक्षिमौद्गल्यः—सर्वं प्रथम उत्तर देने के लिये आत्मवादी पारीक्षि मौद्गल्य उठे । उन्होंने कहा किः—
आत्मजःपुरुषो रोगाश्चात्मजाः कारणं हि सः । स चिनोत्युप भुक्तेच कर्म कर्मफलानि च । न ह्यतं चेतना धातोः प्रवृत्तिः मुख दुःखयोः ॥
अर्थात् पुरुष ( कर्म पुरुष ) आत्मा (अनादि पुरुष,) से पैदा होता है । रोग भी आत्मा से पैदा होते हैं । क्योंकि आत्मा, कारण है । वह ही कर्मों को करता है और कर्म फलों को भोगता है अथवा वह ही कर्मफलों को पैदा करता व भोगता है । बिना चेतना—धातु के मुख ( आरोग्य ) और दुःख ( रोग ) की प्रवृत्ति ही नहीं होती !
इस पर से सर्वे प्रथम जो बात स्पष्ट होती है वह यह कि मौद्गल्य के आत्मवाद में आत्मा को उदासीन नहीं माना जाता अपितु कारण, कर्ता, ज्ञाता, भोक्ता, माना जाता है ।
आत्मवाद का विवेचन चरकसंहिता के शारीर स्थान के पहिले अध्याय में उपलब्ध होता है । वहां इसको
पारिशिष्टमहत्त्व का आत्मवाद
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त्रयोविंशतिक प्रश्नोत्तरों के रूप में प्रथित किया है और उसमें कहीं २ षड्धातुवाद के मतों को भी शामिल कर दिया है। फलतः यह जानना कठिन है कि उसमें जिन आत्मसमर्थक युक्तियों का संग्रह किया है उनमें षड्धातुवादियों की कितनी और आत्मवादियों की कितनी है।
आत्मवादियों का सृष्टिविज्ञान चतुर्विंशतिक है। वे कर्म-पुरुष को २४ धातुओं का समुदाय कहते हैं। तहां अन्यत्क ( आत्मा या अनादिपुरुष ) बुद्धि, अहंकार, आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी ये आठ धातु 'प्रकृति' अथवा 'भूत प्रकृति' संज्ञक होकर मन, दश इंद्रिय और ५ अर्थ मिलकर सोलह विकार संज्ञक हैं।
अन्यत्क पुरुष के अस्तित्व के विषय में इनका कथन है कि "कर्ता और बोद्धा पुरुष का यदि अस्तित्व न माना जाय तो ज्ञान, अज्ञान, सत्य, असत्य, वेद, शुभाशुभकर्म, आश्रय, सुख, दुःख, गति, अगति, वाणी, विज्ञान, शास्त्र, जन्म, मरण, बंध, मोक्ष, इनका अस्तित्व ही नहीं रहेगा।" "यदि उसको कारण न माना जाय तो उक्त ज्ञान आदि अहेतुक ही सिद्ध होंगे।" "और यदि उसको बोद्धा न माना जाय तो इनके विषय में न तो ज्ञान होगा और ज्ञानाभाव के कारण उनका प्रयोजन भी न रहेगा।" "अतः कारणज्ञों ने इसको 'कारण' कहा है।" "जो यह कहते हैं कि 'केवल
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आयुर्वेद-दर्शन
‘पंचधातु समुदाय ने आत्मनिरपेक्ष होकर देह का रूप धारण किया ’ वे ( स्वभाववादी ) यह भी कह सकते हैं कि ‘कुंभ-कार के बिना ही केवल मिट्टी, चक, दंड आदि से घट बनगया ! ’ जो इस तरह का युक्तिवाद करते हैं वे आगम से बहिष्कृत हैं । सारांश जिन प्रमाणों द्वारा प्रमेय की सिद्धि होती है उनसे यह सिद्ध है कि चेतनाधातुपुरुष ही कारण है ।
कुछ लोग अर्थात् परंपरावादी यह कहते हैं कि “मातृ-पितृ परंपरा से पैदा होने वाले पुरुषों में यद्यपि सारुप्य रहता है और इस कारण उनको पूर्व सहस्र भी कहा जाता है तथापि वे पूर्व के नहीं हैं; क्योंकि उनकी पैदाइश प्रति समय नवीन २ ( शरीर का प्रत्येक अणु-अवयव नष्ट होता है और उसका स्थान नवीन अणु अवयव ग्रहण करता है ) होती है । सारांश प्रत्येक प्राणी आत्म-तत्त्व रहित पंचधातु विकार समुदाय मात्र होने के कारण और इस समुदाय का परिणाम ही ‘सत्त्व ’ संज्ञक होने के कारण चेतना धातु पुरुष, न कुछ करता, न कुछ भोगता और न अस्तित्व ही रखता है ।” इस तरह जो आत्मा का अस्तित्व ही स्वीकार नहीं करते उनके मत से एक के द्वारा किये हुए कर्म का फल दूसरा भोगता है या नहीं ? चूंकि जब कि प्रत्येक प्राणी अपने किये का ही फल भोगना चाहता है तब यह कहो कि अन्यकृत कर्म का फल अन्य नहीं
पारीक्षिमौद्रव्य का आत्मवाद
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भोगता तो संतान में ( अथवा नवागत अणु अवयव में ) पैतृक विकारों का प्रादुर्भाव क्यों होता है ? अर्थात् यदि वह प्रति समय नवीन है तब उसमें पूर्वाश की प्रतीति क्यों होती है ? और यदि यह कहा जाय कि वह अन्य कृत फल भोगता है तब उसको प्रति समय नवीन कहने के बजाय पूर्व का परिणाम कहना उचित है किंतु जब कि प्रत्येक प्राणी अपने किये का ही फल भोगना चाहता है तब इस तरह विधान करना भी अनुचित है । वास्तविक बात यह है कि परिणाम पानेवाले करणों ( अणु अवयवों, इंद्रियों, अथवा शरीरों ) में नवीनता या विभिन्नता होते हुए भी कर्ता, आत्मा नवीन नहीं अपितु वही रहता है । करणों में परिवर्तन होता है पर आत्मा में नहीं होता । कर्ता, करणों से युक्त होकर समस्त कर्मों का कारण है । तत्त्वज्ञों का यह निश्चित मत है कि समस्त भाव, प्रतिक्षण भ्रम होते हैं; भ्रमभाव पुनः पैदा नहीं होते और अन्यकृतकर्म, अन्य को भोगना नहीं पड़ता । नित्य पुरुष ही समस्त भावाभावों का कारण है । वह ही कर्म को करता व कर्मफल को भोगता है । वह बिना देह के भी अहंकार, कर्म, कर्मफल देहांतरगति और स्मृति इनसे युक्त रहता है ।
कर्म पुरुष में आत्मा के परिचायक लक्षण भी उपलब्ध होते हैं । जैसा कि:—
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आधुनिक दर्शन
प्राणापानौ निमेषाद्या जीवनं मनसोगतः । इन्द्रियांतर संचारः प्रेरणधारणं च यत् ॥ देशांतरगतिः स्वप्ने पंचत्व ग्रहणं तथा । दृष्टस्य दक्षिणे नाश्चिन्ना सन्व्येनापगमस्तथा ॥ इच्छाद्वेषः सुखदुःखं प्रयत्नश्रेतनाश्रुतिः । बुद्धिः स्मृतिरहंकारो लिंगानि परमात्मनः ॥ यस्मात्समुपलभ्यते लिंगान्येतानिजीवतः । न मृतस्यात्मलिंगानि तस्माद्गुरुर्महर्षयः ॥ शरीरं हि गते तस्मिन् शून्यागारमचेतनम् । पंचभूतावशेषत्वात् पंचत्वं गतमुच्यते ॥
आत्मवादी आत्मा को यद्यपि कर्ता और ज्ञाता कहते हैं तथापि उनकी दृष्टि से कर्तृत्व और ज्ञातृत्व भिन्न २ नहीं हैं। वे कर्तृत्व का ज्ञातृत्व में ही समन्वय करते हैं अथवा ज्ञातृत्व के कारण ही कर्तृत्व स्वीकार करते हैं। उनका कथन है कि:—
चेतनावान् यतश्चात्माततः कर्ता निरुच्यते ।
अर्थात् आत्मा चेतनावान् होने के कारण ही कर्ता कहा जाता है। इस पर यदि यह कहा जाय कि ‘जिसमें किया रहती है वह कर्ता है’ तो आत्मवादी इसको स्वीकार नहीं करते। क्योंकि वे स्पष्ट ही कहते हैं कि:—
अचेतनत्वाच्चमनः क्रियावदपि नोच्यते ॥
पारिशिष्टीय का आत्मवाद
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अर्थात् मन, क्रियावान् होते हुए भी अचेतन है अतः उस-को कर्ता नहीं कहा जा सकता। यहाँ यह ध्यान में रखना चाहिये कि स्वभाववादी, मन को 'चेतसू' कहते थे और सत्त्ववादी, सत्त्व को कर्ता कहते हैं। आगे चल कर हम देखेंगे कि आयुर्वेद-दर्शन में आत्मा के कर्तृत्व और ज्ञातृत्व को अलग २ ही स्वीकार किया गया है। अस्तु।
आत्मवादी, दो प्रकार के पुरुष मानते हैं; एक अनादि पुरुष और दूसरा समुदायात्मक। इस विषय में उनका कहना है कि अनादि पुरुष उत्पत्ति रहित होकर समुदायात्मक पुरुष की उत्पत्ति होती है। क्योंकि समुदायात्मक पुरुष मोहच्छा-द्वेष-कर्मज है। यह भी नियम है कि 'अकारणवत्' 'सत्' नित्य रहता है और कारणवत् 'सत्' अनित्य। अतः अनादि पुरुष नित्य होकर समुदायात्मक अनित्य है। सिवाय नित्यत्व का ज्ञान भाव पदार्थ से नहीं होता अतः नित्यत्व, अव्यक्त रहता है और जिस का भाव पदार्थ से ज्ञान होता है उसको व्यक्त समझना चाहिये। केवल आत्मा ही अव्यक्त होकर शेष सब व्यक्त है"।
आत्मा, ज्ञाता है पर वह समुदायात्मक अवस्था में करणों (बुद्ध्यादि इंद्रियों) के द्वारा ज्ञान प्राप्त करता है। करण यदि अविमल हों अथवा उनके साथ आत्मा का अयोग हो तो ज्ञान नहीं होता। जैसा कि गँदले जल में या मलिन
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आयुर्वेद-दर्शन
ऐने में प्रतिबिंब नहीं पड़ता। किंतु जब विमल करणों का कर्ता के साथ संबंध होता है तब कर्म, वेदना और बुद्धि की प्रवृत्ति होती है। क्योंकि भूतात्मा, (यह समुदायात्मक-पुरुषगत आत्मा की विशेष संज्ञा है) न तो अकेला कर्म में प्रवृत्त होता है और न अकेला फल ही भोगता है। यह सब करण संयोग पर निर्भर है बिना करण संयोग के कुछ नहीं होता। क्योंकि कोई भी भाव अकेला नहीं रह सकता, वह अहेतुक भी नहीं रहता और वह अपने परिवर्तनशीलता को भी त्याग नहीं सकता।
आत्मा विमु और एक है। (‘असर्वगताः क्षेत्रज्ञाः’ कहनेवालों का यह प्रतिवाद है) उपाधि-भेद के कारण तथा देह कर्मानुपाती मन के साथ नित्य संबंध होने के कारण उसमें यद्यपि अनेकता की प्रतीति होती है तथापि एक योनि-गत आत्मा को भी सर्व योनिगतही समझना चाहिये। साधारण अवस्था में वह भिन्न २ शरीर में भिन्न २ स्पर्शनेन्द्रियों के द्वारा ज्ञान प्राप्त करता है और इस कारण ही उसे सर्वत्र का ज्ञान नहीं होता, इतनाही नहीं तो प्रति शरीर में भी केश नख आदि के जहां कि स्पर्शनेन्द्रिय नहीं है; स्पर्श का ज्ञान नहीं होता तथापि मन को समाध्यवस्थापन्न किये जाने पर वह छिपी हुई वस्तु को भी देख सकता है।
समुदायात्मक पुरुष की उत्पत्ति के विषय में आत्म-वादियों का कथन है कि:—
पारीक्षिमोद्भव का आत्मवाद
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जायते बुद्धिरन्यक्ताद्वबुद्ध्याहमितिमन्यते । परं खादीन्यहंकार उपादत्ते यथा क्रमम् ॥
इसमें सिर्फ प्रकृतिसंज्ञक सत्प्रातुओं के उत्पत्ति का विवेचन है । हमारी राय में यह उत्पत्ति क्रम, सौश्रुतिक ‘तस्मादन्यक्तात्’ से ‘एषा तत्त्वं चतुर्विंशतिव्याख्याता’ तक के विवेचन से और सारुष्यों के विवेचन से भिन्न है । इस भेद को जानना आयुर्वेद-दर्शन के अभ्यासकों के लिए अत्यावश्यक है । इसमें संदेह नहीं कि अन्यत्क आत्मा से पैदा होने वाली बुद्धि आत्मवादियों के मत से भी सत्वरजस्तमात्मिका है । क्योंकि “अन्यक्ताद्व्यक्ततां याति व्यक्ताद्व्यक्ततां पुनः । रजस्तमोभ्यामाविष्टश्चक्रवत्परिवर्तते ” इसमें रजस् और तमस् का स्पष्ट उल्लेख है । और जब कि यह बुद्धि ही अहंभाव में परिणत होती है तब अहंकार भी त्रिगुणात्मक है । किंतु इस त्रिगुणात्मक अहंकार के केवल रजस्तमोबहुल अंश से शब्द स्पर्शादितन्मात्राओं का व उनसे आकाशादिकों का पैदा होना आत्मवादियों को सम्मत नहीं है । उनका कहना है कि “सत्त्व-बहुल अहंकार से आकाश, रजोबहुल अहंकार से वायु, सत्वरजोबहुल अहंकार से अग्नि, सत्त्वतमोबहुल अहंकार से आप् और तमोबहुल अहंकार से पृथ्वी पैदा होती है” । आत्मवादियों के उक्त कथन का संग्रह यद्यपि चरक-संहिता में हो न सका तथापि सुभ्रत
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आयुर्वेद-दर्शन
संहिता में उसका संग्रह किया गया है। जैसाकिः- 'तत्र सत्त्व-बहुलमाकाशं, रजोबहुलोवायुः, सत्त्वरजोबहुलोऽग्निः, सत्त्व-तमोबहुला आपः, तमोबहुला पृथ्वी' इ। सारांश आकाशादिकों की उत्पत्ति में अहंकार के जिस कदर के गुणबाहुल्य को आत्मवादी स्वीकार करते हैं वह उन संप्रदायों से भिन्न है जो यह कहते हैं कि 'भूतादेरपितैजस् साहाय्यात् पंचतन्मात्राणि' अथवा 'भूतादेस्तन्मात्रः सतामसर्तैजसादुभयम्' ।
उक्त मतभेद से भी अधिक महत्त्वपूर्ण मतभेद यह है कि आत्मवादी, तन्मात्राओं का विशेषतः शब्दरूपशीदि बन्मात्राओं का उल्लेख नहीं करते। यहाँ यह ध्यानमें रखना चाहिये कि ऐतिहासिक दृष्ट्या आत्मवाद के पहिले षड्धातु-वादी आद्य-सांख्यों की उपपत्ति प्रचलित थी। उसमें आकाशादिकों को अप्रतीवातकत्वादि मात्र स्वीकार किया जाता था और गोचर गुणों का कार्य गुण के रूप में ही उल्लेख किया जाता था। अतः अधिक संभव यही है कि आत्मवादी भी षड्धातुवादियों के कथन से अधिक दूर न जाते होंगे। फिर भी जब कि आत्मवादी अपना कुछ न कुछ विशिष्ट मत प्रतिपादन करते ही थे तब इस विषय में भी उनका कुछ विशेष कथन होगा ही। इस दृष्टि से देखा जाय तो अधिक से अधिक यह संभव है कि वे आकाशादिकों की 'तन्मात्रता' केवल उनके धात्वर्थों में ही स्वीकार करते
यारीक्षिमौद्रलय का आत्मवाद
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होंगे और अप्रतीघातकत्वादिकों को तथा शब्दादिकों को उनके ( अकाशादिकों के ) क्रमशः लक्षण और गुण कहते होंगे। हमारे इस कथन की पुष्टि आत्मवादियों के एतद्विषयक विवेचन पर से भी होती है। आत्मवादियों ने महाभूतों का विवेचन इस प्रकार किया है:—
महाभूतानिखंवायुरगिरापःक्षितित्स्था । शब्दःस्पर्शश्चरूपं च रसोगंधश्च तद्गुणाः ॥ तपामेकोगुणः पूर्वो गुण बृद्धिः परे परे । पूर्वः पूर्वगुणश्चैव क्रमशो गुणिषुस्मृतः ॥ स्वरद्वचचलोष्णत्वं भूजलानिलतेजसाम् । आकाशस्याप्रतीघातो दृष्टं लिंगं यथा क्रमम् ॥
और:—
गुणाः शरीरे गुणिनां निर्दिष्टाश्चिन्हमेवच । अर्थाः शब्दादयोज्ञेयामोचराविषयगुणाः ॥
इन सब विधानों पर से यही सिद्ध होता है कि आत्मवादी लक्षणों या गुणों को 'कारण' या 'कारणगुण' नहीं मानते अपितु 'कार्यगुण' ही कहते हैं। किंतु जो संप्रदाय आकाशादिकों को शब्दादि तन्मात्र और शब्दादिकों को कारणगुण भी मानते हैं वे आत्मवादियों की अपेक्षा अर्वाचीन होकर उनका मत आत्मवादियों को मान्य नहीं है।
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आयुर्वेद-दर्शन
यहां यह भी सवाल उठता है कि आत्मवादी अप्रती-घातकत्वादि गुणों को प्रधान मानते थे या शब्दादि गोचर गुणों को ? इस विषय में यद्यपि निश्चय से कुछ नहीं कहा जासकता तथापि दो बातें ध्यान में रखने योग्य हैं । पहिली यह कि आत्मवादी, कर्तृत्व को चेतना से भिन्न नहीं रखना चाहते और तदनुसार आत्मा से सर्व प्रथम बुद्धि का ही प्रादुर्भाव मानते हैं । दूसरी यह कि आत्मवादी अप्रतीघातक-त्वादि लक्षणों का ज्ञान केवल स्पर्शनेन्द्रियद्वारा जैसा कि ‘लक्षणं सर्वभैवैतत्स्पर्शनेन्द्रिय गोचरम् । स्पर्शनेन्द्रियविज्ञेयः स्पर्शेहि सविपर्ययः’ । इसमें बतलाया है; होना सूचित करते हैं । फलतः यह संभव है कि वे गोचरगुणों को प्रधान मानते हों । पर इनको वे कारणगुणत्वेन कदापि स्वीकार नहीं करते । अन्यथा आकाशादिकों को प्रकृति कहना भी व्यर्थ है ।
इस तरह गर्भ में अन्वय से अन्य प्रकृति-संज्ञक यद्यर्थ बनजाने पर इंद्रिय-रचना पैदा होती है । यह इंद्रिय-रचना भौतिक रहती है । इसके साधारण ग्यारह विभाग हैं; पांच कर्मेन्द्रिय, पांच ज्ञानेन्द्रिय और एक अतीन्द्रिय । इनको सामान्यतः ‘करण’ भी कहते हैं । इनके द्वारा भिन्न २ कर्मा में प्रवृत्ति और इंद्रियार्थों का ग्रहण होता है । आत्मा, जब तत्तद्विद्रियार्थ विषयक राग