ब्रह्मवैवर्त पुराण
Brahma Vaivarta Purana
by महर्षि वेदव्यास
३९- सुतपाके द्वारा सुयज्ञको शिवप्रदत्त परम दुर्लभ महाज्ञानका उपदेश
| .. प्रकृतिखण्ड | २७१ |
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श्रीराधा और श्रीकृष्णके चरित्र तथा श्रीराधाकी पूजा-परम्पराका अत्यन्त संक्षिप्त परिचय
**श्रीमहादेवजी कहते हैं—**पार्वति! एक समयकी बात है, श्रीकृष्ण विरजा नामवाली सखीके यहाँ उसके पास थे। इससे श्रीराधाजीको क्षोभ हुआ। इस कारण विरजा वहाँ नदीरूप होकर प्रवाहित हो गयी। विरजाकी सखियाँ भी छोटी-छोटी नदियाँ बनीं। पृथ्वीकी बहुत-सी नदियाँ और सातों समुद्र विरजासे ही उत्पन्न हैं। राधाने प्रणयकोपसे श्रीकृष्णके पास जाकर उनसे कुछ कठोर शब्द कहे। सुदामाने इसका विरोध किया। इसपर लीलामयी श्रीराधाने उसे असुर होनेका शाप दे दिया। सुदामाने भी लीलाक्रमसे ही श्रीराधाको मानवीरूपमें प्रकट होनेकी बात कह दी। सुदामा माता राधा तथा पिता श्रीहरिको प्रणाम करके जब जानेको उद्यत हुआ तब श्रीराधा पुत्रविरहसे कातर हो आँसू बहाने लगीं। श्रीकृष्णने उन्हें समझा-बुझाकर शान्त किया और शीघ्र उसके लौट आनेका विश्वास दिलाया। सुदामा ही तुलसीका स्वामी शङ्खचूड़ नामक असुर हुआ था, जो मेरे शूलसे विदीर्ण एवं शापमुक्त हो पुनः गोलोक चला गया। सती राधा इसी वाराहकल्पमें गोकुलमें अवतीर्ण हुई थीं। वे व्रजमें वृषभानु वैश्यकी कन्या हुईं। वे देवी अयोनिजा थीं, माताके पेटसे नहीं पैदा हुई थीं। उनकी माता कलावतीने अपने गर्भमें ‘वायु’ को धारण कर रखा था। उसने योगमायाकी प्रेरणासे वायुको ही जन्म दिया; परंतु वहाँ स्वेच्छासे श्रीराधा प्रकट हो गयीं। बारह वर्ष बीतनेपर उन्हें नूतन यौवनमें प्रवेश करती देख माता-पिताने ‘रायाण’ वैश्यके साथ उसका सम्बन्ध निश्चित कर दिया। उस समय श्रीराधा घरमें अपनी छायाको स्थापित करके स्वयं अन्तर्धान हो गयीं। उस छायाके साथ ही उक्त रायाणका विवाह हुआ।
‘जगत्पति श्रीकृष्ण कंसके भयसे रक्षाके बहाने शैशवावस्थामें ही गोकुल पहुँचा दिये गये थे। वहाँ श्रीकृष्णकी माता जो यशोदा थीं, उनका सहोदर भाई ‘रायाण’ था। गोलोकमें तो वह श्रीकृष्णका अंशभूत गोप था, पर इस अवतारके समय भूतलपर वह श्रीकृष्णका मामा लगता था। जगत्स्रष्टा विधाताने पुण्यमय वृन्दावनमें श्रीकृष्णके साथ साक्षात् श्रीराधाका विधिपूर्वक विवाहकर्म सम्पन्न कराया था। गोपगण स्वप्नमें भी श्रीराधाके चरणारविन्दका दर्शन नहीं कर पाते थे। साक्षात् राधा श्रीकृष्णके वक्षःस्थलमें वास करती थीं और छायाराधा रायाणके घरमें। ब्रह्माजीने पूर्वकालमें श्रीराधाके चरणारविन्दका दर्शन पानेके लिये पुष्करमें साठ हजार वर्षोंतक तपस्या की थी; उसी तपस्याके फलस्वरूप इस समय उन्हें श्रीराधा-चरणोंका दर्शन प्राप्त हुआ था। गोकुलनाथ श्रीकृष्ण कुछ कालतक वृन्दावनमें श्रीराधाके साथ आमोद-प्रमोद करते रहे। तदनन्तर सुदामाके शापसे उनका श्रीराधाके साथ वियोग हो गया। इसी बीचमें श्रीकृष्णने पृथ्वीका भार उतारा। सौ वर्ष पूर्ण हो जानेपर तीर्थयात्राके प्रसङ्गसे श्रीराधाने श्रीकृष्णका और श्रीकृष्णने श्रीराधाका दर्शन प्राप्त किया। तदनन्तर तत्त्वज्ञ श्रीकृष्ण श्रीराधाके साथ गोलोकधाम पधारे। कलावती (कीर्तिदा) और यशोदा भी श्रीराधाके साथ ही गोलोक चली गयीं।
प्रजापति द्रोण नन्द हुए। उनकी पत्नी धरा यशोदा हुईं। उन दोनोंने पहले की हुई तपस्याके प्रभावसे परमात्मा भगवान् श्रीकृष्णको पुत्ररूपमें प्राप्त किया था। महर्षि कश्यप वसुदेव हुए थे। उनकी पत्नी सती साध्वी अदिति अंशतः देवकीके रूपमें अवतीर्ण हुई थीं। प्रत्येक कल्पमें जब भगवान् अवतार लेते हैं, देवमाता अदिति तथा देवपिता कश्यप उनके माता-पिताका स्थान ग्रहण करते हैं। श्रीराधाकी माता कलावती (कीर्तिदा)
| २७२ | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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पितरोंकी मानसी कन्या थी। गोलोकसे वसुदाम गोप ही वृषभानु होकर इस भूतलपर आये थे।
दुर्गे! इस प्रकार मैंने श्रीराधाका उत्तम उपाख्यान सुनाया। यह सम्पत्ति प्रदान करनेवाला, पापहारी तथा पुत्र और पौत्रोंकी वृद्धि करनेवाला है। श्रीकृष्ण दो रूपोंमें प्रकट हैं—द्विभुज और चतुर्भुज। चतुर्भुजरूपसे वे वैकुण्ठधाममें निवास करते हैं और स्वयं द्विभुज श्रीकृष्ण गोलोकधाममें। चतुर्भुजकी पत्नी महालक्ष्मी, सरस्वती, गङ्गा और तुलसी हैं। ये चारों देवियाँ चतुर्भुज नारायणदेवकी प्रिया हैं। श्रीकृष्णकी पत्नी श्रीराधा हैं, जो उनके अर्धाङ्गसे प्रकट हुई हैं। वे तेज, अवस्था, रूप तथा गुण सभी दृष्टियोंसे उनके अनुरूप हैं। विद्वान् पुरुषको पहले ‘राधा’ नामका उच्चारण करके पश्चात् ‘कृष्ण’ नामका उच्चारण करना चाहिये। इस क्रमसे उलट-फेर करनेपर वह पापका भागी होता है, इसमें संशय नहीं है।
कार्तिककी पूर्णिमाको गोलोकके रासमण्डलमें श्रीकृष्णने श्रीराधाका पूजन किया और तत्सम्बन्धी महोत्सव रचाया। उत्तम रत्नोंकी गुटिकामें राधा-कवच रखकर गोपोंसहित श्रीहरिने उसे अपने कण्ठ और दाहिनी बाँहमें धारण किया। भक्तिभावसे उनका ध्यान करके स्तवन किया। फिर मधुसूदनने राधाके चबाये हुए ताम्बूलको लेकर स्वयं खाया। राधा श्रीकृष्णकी पूजनीया हैं और भगवान् श्रीकृष्ण राधाके पूजनीय हैं। वे दोनों एक-दूसरेके इष्ट देवता हैं। उनमें भेदभाव करनेवाला पुरुष नरकमें पड़ता है।* श्रीकृष्णके बाद धर्मने, ब्रह्माजीने, मैंने, अनन्तने, वासुकिने तथा सूर्य और चन्द्रमाने श्रीराधाका पूजन किया। तत्पश्चात् देवराज इन्द्र, रुद्रगण, मनु, मनुपुत्र, देवेन्द्रगण, मुनीन्द्रगण तथा सम्पूर्ण विश्वके लोगोंने श्रीराधाकी पूजा की। ये सब द्वितीय आवरणके पूजक हैं। तृतीय आवरणमें सातों द्वीपोंके सम्राट् सुयज्ञने तथा उनके पुत्र-पौत्रों एवं मित्रोंने भारतवर्षमें प्रसन्नतापूर्वक श्रीराधिकाका पूजन किया। उन महाराजको दैववश किसी ब्राह्मणने शाप दे दिया था, जिससे उनका हाथ रोगग्रस्त हो गया था। इस कारण वे मन-ही-मन बहुत दुःखी रहते थे। उनकी राज्यलक्ष्मी छिन गयी थी; परंतु श्रीराधाके वरसे उन्होंने अपना राज्य प्राप्त कर लिया। ब्रह्माजीके दिये हुए स्तोत्रसे परमेश्वरी श्रीराधाकी स्तुति करके राजाने उनके अभेद्य कवचको कण्ठ और बाँहमें धारण किया तथा पुष्करतीर्थमें सौ वर्षोंतक ध्यानपूर्वक उनकी पूजा की। अन्तमें वे महाराज रत्नमय विमानपर सवार होकर गोलोकधाममें चले गये। पार्वति! यह सारा प्रसङ्ग मैंने तुम्हें कह सुनाया। अब और क्या सुनना चाहती हो? (अध्याय ४९)
राजा सुयज्ञकी यज्ञशीलता और उन्हें ब्राह्मणके शापकी प्राप्ति, ऋषियोंद्वारा ब्राह्मणको क्षमाके लिये प्रेरित करते हुए कृतघ्नोंके भेद तथा विभिन्न पापोंके फलका प्रतिपादन
**पार्वतीने पूछा—**प्रभो! राजा सुयज्ञ कौन थे? किस वंशमें उनका जन्म हुआ था? उन्हें ब्राह्मणका शाप कैसे प्राप्त हुआ था और किस तरह श्रीराधाजीको वे पा सके? जो सर्वात्मा श्रीकृष्णकी पत्नी हैं तथा साक्षात् श्रीकृष्णने जिनका पूजन किया है, उन्हीं परमेश्वरी श्रीराधाकी सेवाका सौभाग्य एक मल-मूत्रधारी मनुष्यको कैसे मिल सका? जिनके चरणारविन्दोंकी रजको पानेके लिये ब्रह्माजीने पूर्वकालमें पुष्करतीर्थके भीतर साठ हजार वर्षोंतक तप किया तथा जिनका
* राधा पूज्या च कृष्णस्य तत्पूज्यो भगवान् प्रभुः। परस्पराभीष्टदेवो भेदकृन्नरकं व्रजेत्॥
(प्रकृतिखण्ड ४९। ६४)
प्रकृतिखण्ड २७३ दर्शन पाना आपके लिये भी अत्यन्त कठिन है, उन्हीं पुरातनी महालक्ष्मी श्रीराधादेवीका दर्शन राजा सुयज्ञने कैसे किया ? वे मनुष्योंके दृष्टिपथमें कैसे आयीं ? तीनों लोकोंके स्रष्टा ब्रह्माने राजा सुयज्ञको श्रीराधाका कवच किस प्रकार दिया ? उनके ध्यान, पूजन-विधि तथा स्तोत्रका उपदेश कैसे दिया ? यह सब बतानेकी कृपा कीजिये। श्रीमहादेवजी बोले- देवि ! चौदह मनुओँमें जो सबसे प्रथम हैं, उन्हें स्वायम्भुव मनु कहते हैं। वे ब्रह्माजीके पुत्र और तपस्वी कहे गये हैं। उन्होंने शतरूपासे विवाह किया था। मनु और शतरूपाके पुत्र उत्तानपाद हुए। उत्तानपादके पुत्र केवल ध्रुव हैं। गिरिराजनन्दिनि ! ध्रुवकी कीर्ति तीनों लोकोंमें विख्यात है। ध्रुवके पुत्र उत्कल हुए, जो भगवान् नारायणके अनन्य भक्त थे। उन्होंने पुष्करतीर्थमें एक हजार राजसूय-यज्ञोंका अनुष्ठान किया था, उस यज्ञमें सारे पात्र रत्नोंके बने हुए थे। राजाने बड़ी प्रसन्नताके साथ वे सब पात्र ब्राह्मणोंको दान कर दिये थे। यज्ञान्तमहोत्सवमें राजाने बहुमूल्य वस्त्रोंकी सहस्रों राशियाँ जो तेजःपुञ्जसे उद्भासित होती थीं, ब्राह्मणोंको बाँट दीं। प्रिये ! उस सुन्दर यज्ञको देखकर ब्रह्माजीने देवसभामें राजा उत्कलका नाम सुयज्ञ रख दिया। राजा सुयज्ञ अन्न, रत्न तथा सब प्रकारकी सम्पत्तियोंके दाता थे। वे प्रतिदिन प्रसन्नतापूर्वक उचित दक्षिणाके साथ ब्राह्मणोंको दस-बारह लाख गौएँ दानमें देते थे। उन गौओंके सींग रत्नोंसे मढ़े होते थे तथा दुग्धपात्र आदि सामग्री भी रत्नमयी ही होती थी। वे प्रतिदिन छः करोड़ ब्राह्मणोंको भोजन कराया करते थे। उन्हें प्रतिदिन चूसने, चबाने, चाटने और पीनेयोग्य भोजनसामग्री देकर तृप्त करते थे। नित्यप्रति एक लाख रसोइयोंको भोजन दिया करते थे। पूआ, रोटी-चावल आदि अन्न, दाल आदि व्यञ्जन दहीके साथ परोसे जाते थे। उस भोजनसामग्रीमें मांसका सर्वथा अभाव होता था। ब्राह्मणलोग भोजनके समय मनुवंशी राजा सुयज्ञकी ही नहीं, उनके पितरोंकी भी स्तुति करते थे। सुन्दरि ! यज्ञके दिनोंमें तथा उसकी समाप्तिके दिन कुल मिलाकर छत्तीस लाख करोड़ ब्राह्मणोंने अत्यन्त तृप्तिपूर्वक सु-अन्न भोजन किया था। उन्होंने दक्षिणामें इतने रत्न ग्रहण किये थे कि उन सबको अपने घरतक ढो ले जाना उनके लिये असम्भव हो गया था। कुछ तो उन्होंने शूद्रोंको बाँट दिया और कुछ रास्तेमें छोड़ दिया। ब्राह्मण-भोजनके अन्तमें राजाने ब्राह्मणेतरोंको भी भोजन दिया तथापि वहाँ अन्नकी सहस्रों राशियाँ शेष रह गयीं। इस प्रकार यज्ञ करके महाबाहु राजा सुयज्ञ अपनी राजसभामें रमणीय रत्न-सिंहासनपर बैठे हुए थे। वह सिंहासन रत्नेन्द्रसारसे निर्मित अनेक छत्रोंसे सुशोभित था। उसे अच्छी तरह सजाया गया था। उसपर चन्दन आदि सुगन्धित वस्तुओंका लेप हुआ था। चन्दनपल्लवोंसे उसकी रमणीयता और बढ़ गयी थी। वहाँ वसु, वासव, चन्द्रमा, इन्द्र, आदित्यगण, मुनिवर नारद तथा बड़े-बड़े देवता विराजमान थे। इसी समय वहाँ एक ब्राह्मण आया,
४४- नित्य वैकुण्ठधाममें वनमालाधारी चतुर्भुज नारायणदेवका लक्ष्मी, सरस्वती, गङ्गा तथा तुलसी और सुनन्द, नन्द तथा कुमुद आदि पार्षदोंके साथ निवास
२७४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
जो रूखा और मलिन वस्त्र पहने था। उसके कण्ठ, ओठ और तालु सूखे हुए थे। उसने मुसकराते हुए हाथ जोड़कर रत्नसिंहासनपर बैठे हुए पुष्पमाला और चन्दनसे चर्चित राजाको आशीर्वाद दिया। राजाने भी ब्राह्मणको प्रणाम तो किया, किंतु वे अपने स्थानसे उठे नहीं। उस सभाके सभासद् भी ब्राह्मणकी ओर देखकर खड़े नहीं हुए। वे सभी थोड़ा-थोड़ा हँसते रहे। तब वह श्रेष्ठ ब्राह्मण मुनियों और देवताओंको नमस्कार करके निरङ्कुश-भावसे वहाँ खड़ा हो गया और क्रोधपूर्वक राजाको शाप देता हुआ बोला—'ओ पामर! तू इस राज्यसे दूर चला जा, श्रीहीन हो जा तथा शीघ्र ही गलित कोढ़से युक्त, बुद्धिहीन और उपद्रवोंसे ग्रस्त हो जा।' ऐसा कहकर क्रोधसे काँपता हुआ ब्राह्मण सभासदोंको शाप देनेके लिये उद्यत हो गया। जो लोग वहाँ हँसे थे, वे सब उठकर खड़े हो गये। उन सबने अपने दोषका परिहार कर लिया। अतः उनकी ओरसे ब्राह्मणका क्रोध जाता रहा।
राजा उस ब्राह्मणको प्रणाम करके भयसे कातर हो रोने लगे। वे व्यथित-हृदयसे सभाके बीचसे बाहर निकले। तब गूढ़रूपवाले वे ब्राह्मणदेवता भी ब्रह्मतेजसे प्रकाशित होते हुए चल दिये। उनके पीछे-पीछे भयसे कातर हुए समस्त मुनि भी चले और बारंबार उच्चस्वरसे पुकारने लगे—'हे विप्र! ठहरो, ठहरो।' उन मुनियोंके नाम इस प्रकार हैं—पुलह, पुलस्त्य, प्रचेता, भृगु, अङ्गिरा, मरीचि, कश्यप, वसिष्ठ, क्रतु, शुक्र, बृहस्पति, दुर्वासा, लोमश, गौतम, कणाद, कण्व, कात्यायन, कठ, पाणिनि, जाजलि, ऋष्यशृङ्ग, विभाण्डक, आपिशालि, तैत्तिलि, महातपस्वी मार्कण्डेय, वोढु, पैल, सनक, सनन्दन, सनातन, भगवान् सनत्कुमार, नर-नारायण ऋषि, पराशर, जरत्कारु, संवर्त, करथ, और्व, च्यवन, भरद्वाज, वाल्मीकि, अगस्त्य, अत्रि, उतथ्य, संवर्त, आस्तीक, आसुरि, शिलालि, लाङ्गलि, शाकल्य, शाकटायन, गर्ग, वात्स्य, पञ्चशिख, जमदग्नि, देवल, जैगीषव्य, वामदेव, बालखिल्य आदि, शक्ति, दक्ष, कर्दम, प्रस्कन्न, कपिल, विश्वामित्र, कौत्स, ऋचीक और अघमर्षण—ये तथा और भी मुनि, पितर, अग्नि, हरिप्रिय, दिक्पाल तथा समस्त देवता भी ब्राह्मणके पीछे-पीछे चले। पार्वति! उन नीतिविशारद मुनियोंने
प्रकृतिखण्ड
२७५
ब्राह्मणको समझाया, एक स्थानपर ठहराया और क्रमशः उनसे नीतिकी बातें कहीं।
पार्वतीने पूछा—प्रभो! ब्राह्मणों और ब्रह्माजीके पुत्रोंने, जो नीतिके विद्वान् थे, उस समय उन ब्राह्मणदेवतासे नीतिकी कौन-सी बात कही, यह मुझे बतानेकी कृपा करें।
श्रीमहादेवजी बोले—सुमुखि! उस मुनि-समुदायने स्तुति और विनयसे ब्राह्मणको संतुष्ट करके क्रमशः इस प्रकार कहना आरम्भ किया।
सनत्कुमारने कहा—ब्रह्मन्! तुम्हारे पीछे-पीछे राजाकी लक्ष्मी और कीर्ति भी चली आयी है। सत्त्व, यश, सुशीलता, महान् ऐश्वर्य, पितर, अग्नि और देवता भी राजाको श्रीहीन करके उनके घरसे बाहर चले आये हैं। द्विजश्रेष्ठ! अब तुम संतुष्ट हो जाओ; क्योंकि ब्राह्मण शीघ्र ही संतुष्ट होनेवाला कहा गया है। मुने! ब्राह्मणोंका हृदय नवनीतके समान कोमल होता है। वह तपस्यासे परिमार्जित होनेके कारण अत्यन्त निर्मल और शुद्ध होता है। अतः विप्रवर! अब क्षमा करो। आओ और राजभवनको पवित्र करो। जिसके घरसे अतिथि निराश होकर लौट जाता है, उसके देवता, पितर तथा अग्नि भी निराश होकर लौट जाते हैं; क्योंकि वहाँ अतिथिका सत्कार नहीं हुआ। इसलिये विप्रवर! क्षमा करो, आओ और राजभवनको शुद्ध करो।
पुलस्त्यजी बोले—जो घरपर आये हुए अतिथिको टेढ़ी आँखोंसे देखते हैं, उन्हें अतिथि अपना पाप देकर और उनके पुण्य लेकर चला जाता है। अतः तुम राजाके दोषको क्षमा कर दो। वत्स! तुम्हारी जहाँ मौज हो, जाओ। राजा अपने कर्मदोषसे ही उठकर खड़े नहीं हुए थे। उनके उस दोषको तुम क्षमा कर दो।
पुलहने कहा—जो क्षत्रिय, राजलक्ष्मीके मदसे अथवा जो ब्राह्मण विद्याके मदसे किसी ब्राह्मणका अपमान करता है, वह क्षत्रिय श्रीहीन होता है तथा वह ब्राह्मण त्रिकाल संध्यासे शून्य हो जाता है। वे दोनों ही एकादशीव्रत तथा भगवान् विष्णुके नैवेद्यसे वञ्चित हो जाते हैं।
क्रतु बोले—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र कोई भी क्यों न हो, जो ब्राह्मणका अपमान करता है, वह दीक्षाके पुण्य और अधिकारसे भ्रष्ट हो जाता है। इतना ही नहीं, उसका धन नष्ट हो जाता है तथा वह पुत्र और पत्नीसे भी हीन हो जाता है। यह एक अटल सत्य है, अतः भगवन्! क्षमा करो। आओ और राजाके घरको पवित्र करो।
अङ्गिराने कहा—जो ज्ञानवान् ब्राह्मण होकर किसी ब्राह्मणका अपमान करता है, वह भारतवर्षमें सात जन्मोंतक सवारी ढोनेवाला बैल होता है।
मरीचि बोले—जो पुण्यक्षेत्र भारतवर्षमें देवता, ब्राह्मण तथा गुरुका अपमान करता है, वह भगवान् विष्णुकी भक्तिसे वञ्चित हो जाता है।
कश्यपने कहा—जो वैष्णव ब्राह्मणको देखकर उसका अपमान करता है, वह विष्णुमन्त्रकी दीक्षासे वञ्चित हो विष्णुपूजासे भी विरत हो जाता है।
प्रचेता बोले—जो अतिथि ब्राह्मणको आया देख उसके लिये अभ्युत्थान नहीं करता—उठकर खड़ा नहीं हो जाता, वह भारतभूमिमें माता-पिताकी भक्तिसे रहित होता है। उस मूढ़को सात जन्मोंतक हाथीकी योनिमें जन्म लेना पड़ता है। अतः द्विजश्रेष्ठ! शीघ्र चलो। राजाको आशीर्वाद दो।
दुर्वासाने कहा—जो गुरु, ब्राह्मण अथवा देवताकी प्रतिमाको देखकर शीघ्र ही उसके सामने मस्तक नहीं झुकाता, वह पृथ्वीपर सूअर होता है। अतः ब्रह्मन्! हमारे सब अपराधोंको क्षमा करो और चलकर अतिथि-सत्कार ग्रहण करो।
राजाने पूछा—आप सब लोग श्रेष्ठ मुनि हैं। आपने किसी-न-किसी बहानेसे धर्मका उपदेश किया है। अतः सब कुछ स्पष्ट बताकर
२७६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण मुझ मूर्खको समझाइये। विद्वद्वरो! आपलोग पहले मुझे यह बतावें कि स्त्रीहत्या, गोहत्या, कृतघ्नता, गुरुपत्नीगमन तथा ब्रह्महत्या करनेवालोंको कौन-सा दोष लगता है तथा उसका परिहार कैसे होता है ? वसिष्ठजी बोले- राजन् ! यदि स्वेच्छापूर्वक गो-वधका पाप किया गया हो तो उसके प्रायश्चित्तके लिये मनुष्य एक वर्षतक तीर्थोंमें भ्रमण करता रहे। वह प्रतिदिन जौकी रोटी अथवा जौकी लप्सी खाये और हाथसे ही जल पीये। वर्ष पूरा होनेपर ब्राह्मणोंको दक्षिणासहित सौ अच्छी और दुधारू गौओंका दान करे। प्रायश्चित्तसे पाप क्षीण हो जानेपर भी मनुष्य अपने सम्पूर्ण पापसे मुक्त नहीं होता। जो पाप शेष रह जाता है, उसीके फलसे वह दुःखी एवं चाण्डाल होता है। यदि आतिदेशिक हत्या हुई हो अर्थात् साक्षात् गोवध आदि न होकर उसके समान बताया गया कोई पापकर्म बन गया हो तो उसमें साक्षात् की हुई हत्यासे आधा फल भोगना पड़ता है। अनुकल्परूप प्रायश्चित्तसे उस हत्याका पाप यद्यपि क्षीण हो जाता है तथापि उससे पूर्णतया छुटकारा नहीं मिलता। शुकने कहा - स्त्रीकी हत्या करनेपर निश्चय ही गोहत्यासे दूना पाप लगता है। स्त्रीहत्यारा हजारों वर्षोंतक कालसूत्र नामक नरकमें निवास करता है। तदनन्तर वह महापापी मानव सात जन्मोंतक सूअर और सात जन्मोंतक सर्प होता है। इसके बाद उसकी शुद्धि होती है। बृहस्पति बोले - स्त्रीहत्यासे दूना पाप लगता है ब्रह्महत्यामें। ब्रह्महत्यारा एक लाख वर्षोंतक निश्चय ही महाभयंकर कुम्भीपाक नरकमें निवास करता है। तदनन्तर उस महापापीको सौ वर्षोंतक विष्ठाका कीड़ा होना पड़ता है, इसके बाद सात जन्मोंतक सर्प होकर वह उस पापसे शुद्ध होता है। गौतमने कहा- राजेन्द्र ! कृतघ्नको ब्रह्महत्यासे चौगुना पाप लगता है। वेदमें अवश्य ही कृतघ्नोंकी शुद्धिके लिये कोई प्रायश्चित्त नहीं कहा गया है। राजाने पूछा- वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे ! आप मुझे कृतघ्नोंका लक्षण बताइये। कृतघ्नोंके कितने भेद हैं और उनमेंसे किन्हें किस दोषकी प्राप्ति होती है ? ऋष्यशृङ्गने उत्तर दिया - सामवेदमें सोलह प्रकारके कृतघ्नोंका निरूपण किया गया है। वे सब-के-सब प्रत्येक दोषसे प्रत्येक फलके भागी होते हैं। सत्कर्म, सत्य, पुण्य, स्वधर्म, तप, प्रतिज्ञा, दान, स्वगोष्ठी-परिपालन, गुरुकृत्य, देवकृत्य, कामकृत्य, द्विजपूजन, नित्य-कृत्य, विश्वास, परधर्म और परप्रदान - इनमें स्थित हुए मनुष्योंका जो वध करता है, वह पापिष्ठ कृतघ्न कहा गया है। इनके लिये जो लोक हैं, वे उस जन्मसे भिन्न योनियोंमें उपलब्ध होते हैं। राजेन्द्र ! वे पापी कृतघ्न जिन-जिन नरकोंमें जाते हैं, वे-वे नरक निश्चय ही यमलोकमें विद्यमान हैं। सुयज्ञने पूछा - प्रभो ! किस प्रकारके कृतघ्न कौन-सा कर्म करके किन-किन भयंकर नरकोंमें जाते हैं ? इसे एक-एक करके मैं सुनना चाहता हूँ। आप बतानेकी कृपा करें। कात्यायनने कहा- जो शपथ खाकर भी अपने सत्यको मिटा देता है, उसका पालन नहीं करता, वह कृतघ्न अवश्य ही चार युगोंतक कालसूत्र नरकमें निवास करता है। फिर सात- सात जन्मोंतक कौआ और उल्लू होकर पुनः सात जन्मोंतक महारोगी शूद्र होता है। इसके बाद उसकी शुद्धि होती है। तत्पश्चात् सर्वश्री सनन्दन, सनातन, पराशर, जरत्कारु, भरद्वाज और विभाण्डकने विभिन्न कृतघ्नोंके भेद तथा उनको प्राप्त होनेवाली दुर्गतिका वर्णन किया। तदनन्तर श्रीमार्कण्डेयजी बोले। मार्कण्डेयने कहा- नरेश्वर ! शूद्रजातीय स्त्रीके
प्रकृतिखण्ड २७७
साथ समागम करनेपर ब्राह्मणको जो दोष प्राप्त होता है, उसका वर्णन वेदोंमें किया गया है। उसे बताता हूँ, सावधान होकर सुनो। जो ब्राह्मण शूद्रजातीय स्त्रीके साथ सम्बन्ध स्थापित करता है, वह कृतघ्नोंमें प्रधान है। उसे चौदह इन्द्रोंके स्थितिकालतक कृमिदंष्ट्र नामक नरकमें निवास करना पड़ता है। वहाँ वह ब्राह्मण कीड़ोंके काटनेसे व्याकुल रहता है। यमराजके दूत उससे प्रतिदिन तपायी हुई लोहेकी प्रतिमाका आलिङ्गन करवाते हैं। तदनन्तर निश्चय ही वह व्यभिचारिणी स्त्रीकी योनिका कीड़ा होता है। इस अवस्थामें एक हजार वर्षोंतक रहनेके बाद वह शूद्र होता है। तत्पश्चात् उसकी शुद्धि होती है।
सुयश बोले—मुने! अन्य कृतघ्नोंके भी कर्मोंका फल बताइये। यह ब्राह्मणका शाप मेरे लिये श्लाघ्य है; क्योंकि इसके कारण मुझे सत्संगका लाभ हुआ। भला, विपत्तिमें पड़े बिना किसको सम्पत्ति प्राप्त होती है। मैं धन्य हूँ, कृतकृत्य हूँ। मेरा जीवन सफल हो गया; क्योंकि आज मेरे घरपर मुक्त मुनिगण और देवता पधारे हैं।
(अध्याय ५०-५१)
शेष कृतघ्नोंके कर्मफलोंका विभिन्न मुनियोंद्वारा प्रतिपादन
पार्वतीने पूछा—प्रभो! अन्य कृतघ्नोंको जिस-जिस फलकी प्राप्ति होती है, उसके विषयमें उन वेद-वेदाङ्गके पारंगत विद्वानोंने क्या कहा?
श्रीमहेश्वर बोले—प्रिये! राजेन्द्र सुयज्ञके प्रश्न करनेपर उन सब मुनियोंमें महान् ऋषि नारायणने प्रवचन देना आरम्भ किया।
नारायणने कहा—भूपाल! जो अपनी या दूसरोंकी दी हुई ब्राह्मणवृत्तिका अपहरण करता है, उसे कृतघ्न समझना चाहिये। उसे जो फल मिलता है, उसको सुनो। जिनकी जीविका छिन जाती है, उन ब्राह्मणोंके आँसुओंसे धरतीके जितने धूलिकण भीगते हैं, उतने सहस्र वर्षोंतक वह 'शूलप्रोत' नामक नरकमें रहता है। दहकते हुए अंगार उसे खानेको मिलते हैं और औटाया हुआ मूत्र पीनेको। तपे हुए अंगारोंकी शय्यापर उसे सोना पड़ता है। उठनेकी चेष्टा करनेपर यमराजके दूत उन्हें पीटते हैं। उस नरकयातनाके अन्तमें वह महापापी जीव भारतवर्षमें विष्ठाका कीड़ा होता है। उस योनिमें उसे देवताके वर्षसे साठ हजार वर्षोंतक रहना पड़ता है। तत्पश्चात् वह मानव भूमिहीन, संतानहीन, दरिद्र, कृपण, रोगी और निन्दनीय शूद्र होता है। उसके बाद उसकी शुद्धि होती है।
नारद बोले—जो नराधम अपनी अथवा परायी कीर्तिका हनन करता है, वह कृतघ्न कहा गया है। उसको मिलनेवाले फलका वर्णन सुनो। नरेश्वर! वह अत्यन्त दीर्घकालतक अन्धकूप नामक नरकमें निवास करता है। उसमें सरौते-जैसे कीड़े उसे सदा काटते और खाते रहते हैं। वह पापी वहाँ तपाया हुआ खारा पानी पीता और खाता है। तदनन्तर सात जन्मोंतक सर्प और पाँच जन्मोंतक कौआ होनेके बाद वह शूद्र होता है।
देवलने कहा—जो भारतवर्षमें ब्राह्मण, गुरु अथवा देवताके धनका अपहरण करता है, उसे महान् पापी एवं कृतघ्न समझना चाहिये। वह बहुत लंबे समयतक 'अवटोद' नामक नरकमें निवास करता है। तदनन्तर शराबी और शूद्र होता है। इसके बाद उसकी शुद्धि होती है।
जैगीषव्य बोले—जो पिता, माता तथा गुरुके प्रति भक्तिसे हीन होकर उनका पालन नहीं करता, उलटे वाणीद्वारा उनकी ताड़ना करता है, उसे 'कृतघ्न' कहा गया है। जो कुलटा नारी
२७८ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण प्रतिदिन वाणीद्वारा अपने स्वामीको ताने मारती या फटकारती है, वह 'कृतघ्नी' कही गयी है। भारतवर्षमें वह बहुत बड़ी पापिनी है। कृतघ्न पुरुष हो या स्त्री, दोनों 'वह्रिकुण्ड' नामक महाघोर नरकमें पड़ते हैं। वहाँ बहुत लंबे समयतक वे अग्निमें ही वास करते हैं। तत्पश्चात् सात जन्मोंतक जलौका (जोंक) होकर वह शुद्ध होता है। वाल्मीकिने कहा—राजन् ! जैसे सभी तरुओंमें सर्वत्र वृक्षत्व है, कहीं भी वृक्षत्वका त्याग नहीं है, उसी तरह सम्पूर्ण पापोंमें कृतघ्नता है। जो काम, क्रोध तथा भयके कारण झूठी गवाही देता है तथा सभामें पक्षपातपूर्वक बात करता है, वह कृतघ्न माना गया है। राजन्! जो पुण्यमात्रका हनन करता है, वह भी कृतघ्न ही है। सर्वत्र सबके पुण्यकी हानिमें कृतघ्नता निहित है। नरेश्वर ! जो भारतवर्षमें झूठी गवाही देता या पक्षपातपूर्ण बात करता है, वह निश्चय ही बहुत लंबे समयतक सर्पकुण्डमें निवास करता है। सदा उसके शरीरमें साँप लिपटे रहते हैं; वह डरा रहता है और साँप उसे खाये जाते हैं। यमदूतोंकी मार पड़नेपर वह साँपोंका मल-मूत्र खानेको विवश होता है। तदनन्तर भारतमें सात-सात जन्मोंतक वह अपनी सात पीढ़ीके पूर्वजोंसहित गिरगिट और मेढक होता है। इसके बाद विशाल वनमें सेमलका वृक्ष होता है। तत्पश्चात् गूँगा मनुष्य एवं शूद्र होकर वह शुद्धि-लाभ करता है। आस्तीक बोले- गुरुपत्नीगमन करनेपर मानव मातृगामी समझा जाता है। मातृगमन करनेपर मनुष्योंके लिये प्रायश्चित्त नहीं मिलता। नृपश्रेष्ठ ! भारतवर्षमें मातृगामी पुरुषोंको जो दोष प्राप्त होता है, वह शूद्रोंको ब्राह्मणीके साथ समागम करनेपर लगता है। यदि ब्राह्मणी शूद्रके साथ मैथुन करे तो उसे भी उतना ही दोष प्राप्त होता है। कन्या, पुत्रवधू, सास, गर्भवती भौजाई और भगिनीके साथ समागम करनेपर भी वैसा ही दोष लगता है। राजेन्द्र ! अब ब्रह्माजीके बताये अनुसार दोषका निरूपण करूँगा। जो महापापी मानव इन सबके साथ मैथुन करता है वह जीते-जी ही मृतक- तुल्य होता है, चाण्डाल एवं अस्पृश्य समझा जाता है। उसे सूर्यमण्डलके दर्शनका भी अधिकार नहीं होता। वह शालग्रामका, उनके चरणामृतका, तुलसीदल मिश्रित जलका, सम्पूर्ण तीर्थजलका तथा ब्राह्मणोंके चरणोदकका स्पर्श भी नहीं कर सकता। वह पातकी मनुष्य विष्ठाके तुल्य घृणित होता है। उसे देवता, गुरु और ब्राह्मणको नमस्कार करनेका भी अधिकार नहीं रह जाता है। उसका जल मूत्रसे भी अधिक अपवित्र होता है। भारतमें पृथ्वी उसके भारसे दब जाती है। वह उसके बोझको ढोनेमें असमर्थ हो जाती है। बेटी बेचनेवाले पापीकी भाँति गुरुपत्नीगामीके पापसे भी सारा देश पतित हो जाता है। उसके स्पर्शसे, उसके साथ वार्तालाप करनेसे, सोनेसे, एक स्थानमें रहने और साथ-साथ भोजन करनेसे मनुष्योंको पाप लगता है। वह कुम्भीपाकमें निवास करता है। वहाँ उसे दिन-रात अविरामगतिसे चक्रकी भाँति घूमना पड़ता है। वह आगकी लपटोंसे जलता और यमदूतोंद्वारा पीटा जाता है। इस प्रकार वह महापापी प्रतिदिन नरक-यातना भोगता है। घोर प्राकृतिक महाप्रलय बीतनेपर जब पुनः सृष्टिका आरम्भ होता है तो वह फिर वैसा ही हो जाता है। नरक-यातनाके पश्चात् हजारों वर्षोंतक उसे विष्ठाका कीड़ा होना पड़ता है। तदनन्तर वह पत्नीहीन नपुंसक चाण्डाल होता है। तत्पश्चात् उसे सात जन्मोंतक गलित कोढ़से युक्त शूद्र एवं नपुंसक होना पड़ता है। इसके बाद वह कोढ़ी, अन्धा एवं नपुंसक ब्राह्मण होता है। इस प्रकार सात जन्म धारण करनेके पश्चात् उस महापापीकी शुद्धि होती है। मुनि बोले- इस प्रकार हमने शास्त्रके अनुसार सब बातें बतायीं। राजन्! तुम इन विप्रवरको प्रणाम करो और निश्चय ही इन्हें अपने
४५- सुयज्ञद्वारा श्रीराधाका उत्कृष्ट मन्त्रजप करते हुए दुष्कर तपस्या तथा आकाशमें रथपर बैठी हुई परमेश्वरी श्रीराधाका उन्हें दर्शन
प्रकृतिखण्ड २७९
घरको लौटा ले चलो। वहाँ यत्नपूर्वक ब्राह्मण-देवताका पूजन करके इनका आशीर्वाद लो। महाराज! इसके बाद शीघ्र ही वनको जाओ और तपस्या करो। ब्राह्मणके शापसे छुटकारा मिलने-पर फिर यहाँ आओगे।
पार्वति! ऐसा कहकर सब मुनि, देवता, राजा तथा बन्धुवर्गके लोग तुरंत अपने-अपने स्थानको चले गये। (अध्याय ५२)
सुतपाके द्वारा सुयज्ञको शिवप्रदत्त परम दुर्लभ महाज्ञानका उपदेश
श्रीपार्वतीजीने पूछा— प्रभो! मुनिसमूहोंके चले जानेपर मनुष्योंके कर्मफलका वर्णन सुननेके अनन्तर ब्रह्मशापसे विह्वल हुए नृपश्रेष्ठ सुयज्ञने क्या किया? अतिथि ब्राह्मणने भी क्या किया? वे लौटकर राजाके घरमें गये या नहीं, यह बतानेकी कृपा करें।
महेश्वरने कहा— प्रिये! मुनिसमूहोंके चले जानेपर वे शापग्रस्त नरेश धर्मात्मा पुरोहित वसिष्ठजीकी आज्ञासे भूतलपर ब्राह्मणके दोनों चरणोंमें दण्डकी भाँति गिर पड़े। तब उन श्रेष्ठ द्विजने क्रोध छोड़कर उन्हें शुभ आशीर्वाद दिया। उन कृपामूर्ति ब्राह्मणको क्रोध छोड़कर मुस्कराते देख नृपश्रेष्ठ सुयज्ञने नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए दोनों हाथ जोड़ लिये और अत्यन्त विनम्रभावसे आत्मसमर्पण करते हुए उनसे परिचय पूछा।
राजाकी बात सुनकर वे मुनिश्रेष्ठ हँसने लगे। उन्होंने मेरे दिये हुए सर्वदुर्लभ परम तत्त्वका उन्हें उपदेश दिया।
अतिथि बोले— ब्रह्माजीके पुत्र मरीचि हैं। उनके पुत्र स्वयं कश्यपजी हैं। कश्यपके प्रायः सभी पुत्र मनोवाञ्छित देवभावको प्राप्त हुए हैं। उनमें त्वष्टा बड़े ज्ञानी हुए। उन्होंने सहस्र दिव्य वर्षोंतक पुष्करमें परम दुष्कर तपस्या की। ब्राह्मण-पुत्रकी प्राप्तिके लिये देवाधिदेव परमात्मा श्रीहरिकी समाराधना की। तब भगवान् नारायणसे उन्हें एक तेजस्वी ब्राह्मण-पुत्र वरके रूपमें प्राप्त हुआ। वह पुत्र तपस्याके धनी तेजस्वी विश्वरूपके नामसे प्रसिद्ध हुआ। एक समय बृहस्पतिजी देवराजके प्रति कुपित हो जब कहीं अन्यत्र चले गये, तब इन्द्रने विश्वरूपको ही अपना पुरोहित बनाया था। विश्वरूपके मातामह दैत्य थे। अतः वे देवताओंके यज्ञमें दैत्योंके लिये भी घीकी आहुति देने लगे। जब इन्द्रको इस बातका पता लगा तो उन्होंने अपनी माताकी आज्ञा लेकर ब्राह्मण विश्वरूपके मस्तक काट दिये। नरेश्वर! विश्वरूपके पुत्र विरूप हुए, जो मेरे पिता हैं। मैं उनका पुत्र सुतपा हूँ। मेरा काश्यप गोत्र है और मैं वैरागी ब्राह्मण हूँ। महादेवजी मेरे गुरु हैं। उन्होंने ही मुझे विद्या, ज्ञान और मन्त्र दिये हैं। प्रकृतिसे परवर्ती सर्वात्मा भगवान् श्रीकृष्ण मेरे इष्टदेव हैं। मैं उन्हींके चरण-कमलोंका चिन्तन करता हूँ। मेरे मनमें सम्पत्तिके लिये कोई
४६- दिव्य सुन्दर गोलोकमें राजा सुयज्ञको रत्नसिंहासनपर विराजमान श्रीकृष्णका दर्शन
| २८० | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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इच्छा नहीं है। राधावल्लभ श्रीकृष्ण मुझे सालोक्य, सार्टि, सारूप्य और सामीप्य नामक मोक्ष देते हैं; परंतु मैं उनकी कल्याणमयी सेवाके सिवा दूसरी कोई वस्तु नहीं लेता हूँ। ब्रह्मत्व और अमरत्वको भी मैं जलमें दिखायी देनेवाले प्रतिबिम्बकी भाँति मिथ्या मानता हूँ। नरेश्वर ! भक्तिके अतिरिक्त सब कुछ मिथ्या भ्रममात्र है, नश्वर है। इन्द्र, मनु अथवा सूर्यका पद भी जलमें खींची गयी रेखाके समान मिथ्या है। मैं उसे सत्य नहीं मानता। फिर राजाके पदको कौन गिनता है। सुयज्ञ ! तुम्हारे यज्ञमें मुनियोंका आगमन सुनकर मेरे मनमें भी यहाँ आनेकी लालसा हुई। मैं तुम्हें विष्णुभक्तिकी प्राप्ति करानेके लिये यहाँ आया हूँ। इस समय मैंने तुमपर केवल अनुग्रह किया। तुम्हें शाप नहीं दिया। तुम एक भयानक गहरे भवसागरमें गिर गये थे। मैंने तुम्हारा उद्धार किया है। केवल जलमय तीर्थ ही तीर्थ नहीं है। भगवान्के भक्त भी तीर्थ हैं, मिट्टी और पत्थरकी प्रतिमारूप देवता ही देवता नहीं हैं, भगवद्भक्त भी देवता हैं। जलमय तीर्थ और मिट्टी-पत्थरके देवता मनुष्यको दीर्घकालमें पवित्र करते हैं; परंतु श्रीकृष्णभक्त दर्शन देनेके साथ ही पवित्र कर देते हैं।*
राजन् ! निकलो इस घरसे। दे दो राज्य अपने पुत्रको। वत्स ! अपनी साध्वी पत्नीकी रक्षाका भार बेटेको सौंपकर शीघ्र ही वनको चलो। भूमिपाल ! ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त सब कुछ मिथ्या ही है। जो सबके ईश्वर हैं, उन परमात्मा राधावल्लभ श्रीकृष्णका भजन करो। वे ध्यानसे सुलभ हैं। ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदिके लिये भी उनकी समाराधना कठिन है। वे उत्पत्ति-विनाशशील प्राकृत पदार्थों और प्रकृतिसे भी परे हैं। जिनकी ही मायासे ब्रह्मा सृष्टि, विष्णु पालन तथा रुद्रदेव संहार करते हैं। दिशाओंके स्वामी दिक्पाल जिनकी मायासे ही भ्रमण करते हैं, जिनकी आज्ञासे वायु चलती है, दिनेश सूर्य तपते हैं तथा निशापति चन्द्रमा सदा खेतीको सुस्निग्धता प्रदान करते हैं। सम्पूर्ण विश्वोंमें सबकी मृत्यु कालके द्वारा ही होती है। काल आनेपर ही इन्द्र वर्षा करते और अग्निदेव जलाते हैं। सम्पूर्ण विश्वके शासक तथा प्रजाको संयममें रखनेवाले यम कालसे ही भयभीत-से होकर अपने कार्यमें लगे रहते हैं। काल ही समय आनेपर संहार करता है और वही यथासमय सृष्टि तथा पालन करता है। कालसे प्रेरित होकर ही समुद्र अपने देश (स्थान)-की सीमामें रहता है, पृथ्वी अपने स्थानपर स्थिर रहती है, पर्वत अपने स्थानपर रहते हैं और पाताल अपने स्थानपर। राजेन्द्र ! सात स्वर्गलोक, सात द्वीपोंसहित पृथ्वी, पर्वत और समुद्रोंसहित सात पाताल—इन समस्त लोकोंसहित जो ब्रह्माण्ड है, वह अण्डेके आकारमें जलपर तैर रहा है। प्रत्येक ब्रह्माण्डमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि रहते हैं। देवता, मनुष्य, नाग, गन्धर्व तथा राक्षस आदि निवास करते हैं। राजन् ! पातालसे लेकर ब्रह्मलोकतक जो अण्ड है, यही ब्रह्माजीका कृत्रिम ब्रह्माण्ड है। यह जलमें शयन करनेवाले क्षुद्र विराट् विष्णुके नाभिकमलपर उसी तरह है जैसे कमलकी कर्णिकामें बीज रहा करता है।
इस प्रकार सुविस्तृत जलशय्यापर शयन करनेवाले वे प्राकृत महायोगी क्षुद्र विराट् विष्णु भी प्रकृतिसे परवर्ती ईश्वर, सर्वात्मा, कालेश्वर श्रीकृष्णका ध्यान करते हैं; उनका आधार है महाविष्णुका विस्तृत रोमकूप। महाविष्णुके अनन्त रोमकूपोंमेंसे प्रत्येकमें ऐसे-ऐसे ब्रह्माण्ड स्थित हैं। महाविष्णुके शरीरमें असंख्य रोम हैं और उन रोमकूपोंमें असंख्य ब्रह्माण्ड हैं। अण्डाकार ब्रह्माण्डोंकी
* न ह्यम्मयानि तीर्थानि न देवा मृच्छिलामयाः ॥ ते पुनन्त्युरुकालेन कृष्णभक्ताश्च दर्शनात्।
(प्रकृतिखण्ड ५३। २५-२६)
प्रकृतिखण्ड २८१
उत्पत्तिके स्थानभूत वे महाविष्णु भी सदा श्रीकृष्णकी इच्छासे प्रकृतिके गर्भसे अण्डरूपमें प्रकट होते हैं। सबके आधारभूत वे महाविष्णु भी कालके स्वामी सर्वेश्वर परमात्मा श्रीकृष्णका सदा चिन्तन किया करते हैं। इस प्रकार सम्पूर्ण ब्रह्माण्डोंमें स्थित ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि तथा महान् विराट् और क्षुद्र विराट् इन सबकी बीजरूपा जो मूलप्रकृति ईश्वरी है, वह प्रलयकालमें कालेश्वर श्रीकृष्णमें लीन होती है तथा सदा उन्हींका ध्यान किया करती है। यह सब परम दुर्लभ महाज्ञान तुम्हें बताया गया है। गुरुदेव शिवने यह ज्ञान मुझे दिया था। इसे तो तुमने सुन लिया। अब और क्या सुनना चाहते हो?
(अध्याय ५३)
गोलोक एवं श्रीकृष्णकी उत्कृष्टता, कालमान एवं विभिन्न प्रलयोंका निरूपण, चौदह मनुओंका परिचय, ब्रह्मासे लेकर प्रकृतितकके श्रीकृष्णमें लय होनेका वर्णन, शिवका मृत्युञ्जयत्व, मूलप्रकृतिसे महाविष्णुका प्रादुर्भाव, सुयज्ञको विप्रचरणोदकका महत्त्व तथा राधाका मन्त्र बताकर सुतपाका जाना, पुष्करमें राजाकी दुष्कर तपस्या तथा राधामन्त्रके जपसे सुयज्ञका श्रीराधाकी कृपासे गोलोकमें जाना और श्रीकृष्णका दर्शन एवं कृपाप्रसाद प्राप्त करना
**राजाने पूछा—**मुनीश्वर! सभी कालसे भयभीत रहते हैं तो उनका आधार कहाँ है? कालकी माया कितनी है? क्षुद्र विराट्की आयु कितने कालकी है? ब्रह्मा, प्रकृति, मनु, इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य तथा अन्य प्राकृत जनोंकी परमायु क्या है? वेदवेत्ताओंमें श्रेष्ठ महर्षे! उनकी वेदोक्त आयुका भलीभाँति विचार करके मेरे समक्ष वर्णन कीजिये। महाभाग! समस्त विश्वोंके ऊर्ध्वभागमें कौन-सा लोक है? यह बताइये और मेरे संदेहका निवारण कीजिये।
**मुनि बोले—**राजन्! सम्पूर्ण विश्वोंके ऊर्ध्वभागमें गोलोक विद्यमान है, जो आकाशके समान विस्तृत है। वह श्रीकृष्णकी इच्छासे प्रकट हो सदा नित्य-अण्डके रूपमें प्रकाशित होता है। भूपाल! आदिसर्गमें सृष्टिके लिये उन्मुख हो अपनी कलास्वरूपा प्रकृतिके साथ संयुक्त श्रीकृष्ण जब क्रीडापरायण होकर लीलासे ही थकानका अनुभव करते हैं, उस समय उनके मुखमण्डलसे निर्गत पसीनेकी बूँदोंसे जो जलराशि प्रकट होती है, उसीके द्वारा गोलोकधाम जलसे परिपूर्ण रहता है। प्रकृतिके गर्भसे संयुक्त एवं अण्डाकारमें उत्पन्न जो विश्वके आधारभूत महाविष्णु (या महाविराट्) हैं, उनका आधार वहाँ उपर्युक्त विस्तृत गोलोकधाम ही है। अत्यन्त विस्तृत जलाधार (अथवा जलशय्या)-पर शयन करनेवाले जो महाविराट् हैं, वे श्रीराधावल्लभ श्रीकृष्णका सोलहवाँ अंश कहे गये हैं। उनके श्रीअङ्गोंकी कान्ति दूर्वादलके समान श्याम है। उनके मुखपर मन्द मुसकान खेलती रहती है। उनके चार भुजाएँ हैं। वे वनमाला धारण करते हैं। श्रीमान् महाविष्णु पीताम्बरसे सुशोभित हैं। सर्वोपरि आकाशमें श्रीविष्णुका नित्य वैकुण्ठधाम है, जो आत्माकाशके समान नित्य तथा चन्द्रमण्डलके तुल्य विस्तृत है। ईश्वरकी इच्छासे उसका आविर्भाव हुआ है।
४७- रासेश्वर श्रीकृष्णसहित श्रीराधाका ध्यान-चित्रण
२८२ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
वह अलक्ष्य तथा आश्रयरहित है। आकाशके समान अत्यन्त विस्तृत तथा अमूल्य दिव्य रत्नोंद्वारा निर्मित है। वहाँ वनमालाधारी श्रीमान् चतुर्भुज नारायणदेव, जो लक्ष्मी, सरस्वती, गङ्गा तथा तुलसीके पति हैं; सुनन्द, नन्द तथा कुमुद आदि पार्षदोंसे घिरे हुए निवास करते हैं।
सर्वेश्वर, सर्वसिद्धेश्वर एवं भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही दिव्य विग्रह (अथवा कृपामय शरीर) धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण दो रूपोंमें प्रकट हैं—द्विभुज एवं चतुर्भुज। चतुर्भुजरूपसे वे वैकुण्ठमें वास करते हैं और द्विभुजरूपसे गोलोकधाममें। वैकुण्ठसे पचास करोड़ योजन ऊपर गोलाकार 'गोलोक' धाम विद्यमान है, जो समस्त लोकोंसे श्रेष्ठतम है। बहुमूल्य रत्नोंद्वारा निर्मित विशाल भवन उस धामकी शोभा बढ़ाते हैं। रत्नेन्द्रसारके बने हुए विचित्र खम्भों और सीढ़ियोंसे वे भवन अलंकृत हैं। श्रेष्ठ मणिमय दर्पणोंसे जटित किवाड़ों तथा कलशोंसे उज्ज्वल एवं नाना प्रकारके चित्रोंसे विचित्र शोभा पानेवाले शिविर उस धामकी श्रीवृद्धि करते हैं। उसका विस्तार एक करोड़ योजन है तथा लंबाई उससे सौगुनी है।
विरजा नदीसे घिरा हुआ शतशृङ्ग पर्वत उस धामका परकोटा है। विरजा नदीकी आधी लंबाई-चौड़ाई तथा शतशृङ्ग पर्वतकी आधी ऊँचाईवाले वृन्दावनसे वह धाम सुशोभित है। वृन्दावनकी अपेक्षा आधी लंबाई-चौड़ाईमें निर्मित रासमण्डल गोलोकधामका अलंकार है। उपर्युक्त नदी, पर्वत और वन आदिके मध्यभागमें मुख्य गोलोकधाम है। जैसे कमलमें कर्णिका होती है, उसी प्रकार उक्त नदी, शैल आदिके बीचमें वह मनोहर धाम प्रतिष्ठित है। वहाँ रासमण्डलमें गौओं, गोपों और गोपियोंसे घिरे हुए गोपीवल्लभ श्रीकृष्ण रासेश्वरी श्रीराधाके साथ निरन्तर निवास करते हैं। उनके दो भुजाएँ हैं, वे हाथोंमें मुरली लिये बाल-गोपालका रूप धारण किये रहते हैं। अग्निशुद्ध चिन्मय वस्त्र उनका परिधान है। वे रत्नमय आभूषणोंसे विभूषित हैं। उनके सारे अङ्ग चन्दनसे चर्चित हैं। गलेमें रत्नोंका हार शोभा देता है। वे रत्नमय सिंहासनपर विराजमान हैं। उनके ऊपर रत्नमय छत्र तना हुआ है तथा उनके प्रिय सखा ग्वालबाल श्वेत चवँर लिये सदा उनकी सेवामें तत्पर रहते हैं। वस्त्राभूषणोंसे विभूषित सुन्दर वेषवाली गोपियाँ माला और चन्दनके द्वारा उनका शृङ्गार करती हैं। वे मन्द-मन्द मुस्कराते रहते हैं और वे गोपियाँ कटाक्षपूर्ण चितवनसे उनकी ओर निहारती रहती हैं।
इस प्रकार जैसा मैंने भगवान् शंकरके मुखसे सुना था और आगमोंमें जैसा वर्णन मिलता है, तदनुसार लोकविस्तारकी यथाशक्ति चर्चा की है। अब कालका मान सुनो। छः पल सोनेका बना हुआ एक पात्र हो, जिसकी गहराई चार अंगुलकी हो। उसमें एक-एक माशे सोनेके बने हुए चार-
प्रकृतिखण्ड २८३
चार अंगुल लंबे चार कीलोंसे छेद कर दिये जायँ। फिर उस पात्रको जलके ऊपर रख दिया जाय। उन छिद्रोंसे पानी आकर जितनी देरमें वह पात्र भर दे, उतने समयको एक दण्ड कहते हैं। दो दण्डका एक मुहूर्त और चार मुहूर्तोंका एक प्रहर होता है। आठ प्रहरोंसे एक दिन-रातकी पूर्ति होती है। पंद्रह दिन-रातको एक पक्ष कहते हैं। दो पक्षोंका एक मास और बारह मासका एक वर्ष होता है। मनुष्योंके एक मासमें जितना समय व्यतीत होता है, वह पितरोंका एक दिन-रात है। कृष्णपक्षमें उनका दिन कहा गया है और शुक्लपक्षमें रात्रि। मनुष्योंके एक वर्षमें देवताओंके एक दिन-रातकी पूर्ति होती है। उत्तरायणमें उनका दिन होता है और दक्षिणायनमें रात्रि। नरेश्वर! मनुष्य आदिकी अवस्था युग एवं कर्मके अनुरूप होती है। अब प्रकृति, प्राकृत पदार्थ एवं ब्रह्मा आदिकी आयुका परिमाण सुनो। सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग—इन चारोंको एक चतुर्युग कहते हैं। इनकी काल-संख्या बारह हजार दिव्य वर्ष है। सावधान होकर सुनो, सत्ययुग आदिका कालमान क्रमशः चार, तीन, दो और एक दिव्य वर्ष है। उनकी संध्या और संध्यांशकाल दो हजार दिव्य वर्षोंके बताये गये हैं*। मनुष्योंके मानसे चारों युगोंका परिमाण तैंतालीस लाख बीस हजार वर्ष है। इनमें गणनाके विद्वानोंने सत्ययुगका मान मनुष्योंके वर्षसे सत्रह लाख अट्ठाईस हजार बताया है। इसी तरह त्रेताका कालमान बारह लाख छियानबे हजार मानव-वर्ष है। द्वापरका आठ लाख चौंसठ हजार तथा कलियुगका चार लाख बत्तीस हजार मानव-वर्ष है।
जैसे सात वार, सोलह तिथियाँ, दिन-रात, दो पक्ष, बारह मास और वर्ष चक्रवत् घूमते रहते हैं, उसी प्रकार चारों युगोंका चक्र भी सदा ही चलता रहता है। राजेन्द्र! जैसे युग परिवर्तित होते हैं, उसी प्रकार मन्वन्तर भी। इकहत्तर दिव्य युगोंका एक मन्वन्तर होता है। इसी क्रमसे चौदह मनु भ्रमण करते रहते हैं।
नरेश्वर! मैंने भगवान् शंकरके मुखसे धर्मात्मा मनुओंका जो आख्यान सुना है, वह बता रहा हूँ। तुम मुझसे सुनो। आदिमनु ब्रह्माजीके पुत्र हैं। इसलिये उन्हें स्वायम्भुव मनु कहा गया है। उनकी पत्नी पतिव्रता शतरूपा हैं। स्वायम्भुव मनु धर्मात्माओंमें वरिष्ठ और मनुओंमें गरिष्ठ हैं। वे तुम्हारे प्रपितामह लगते हैं। उन्होंने भगवान् शंकरका शिष्यत्व ग्रहण किया है। वे विष्णुव्रतका पालन करनेवाले जीवन्मुक्त एवं महाज्ञानी थे। उन्होंने भगवान् शंकरकी आज्ञासे भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये प्रतिदिन एक लाख बहुमूल्य रत्न, दस करोड़ स्वर्णमुद्रा, सोनेके सींगसे सुशोभित एवं सुपूजित एक लाख दिव्य धेनु, अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्र, एक लाख श्रेष्ठ मणि, सब प्रकारकी
* इस विषयका स्पष्टीकरण यों समझना चाहिये। सत्ययुग चार हजार दिव्य वर्षोंका होता है। युगके आरम्भमें चार सौ दिव्य वर्षोंकी संध्या होती है और युगके अन्तमें चार सौ दिव्य वर्षोंका संध्यांशकाल होता है। इस प्रकार सत्ययुगका कालमान चार हजार आठ सौ दिव्य वर्ष है। त्रेताका संध्यामान तीन सौ दिव्य वर्ष, युगमान तीन सहस्र दिव्य वर्ष और संध्यांशमान तीन सौ दिव्य वर्ष। इस तरह त्रेताका सम्पूर्ण कालमान तीन हजार छः सौ दिव्य वर्ष है। द्वापरका संध्यामान दो सौ दिव्य वर्ष, युगमान दो हजार दिव्य वर्ष और संध्यांशमान दो सौ दिव्य वर्ष है। ये सब मिलाकर दो हजार चार सौ दिव्य वर्ष होते हैं। इसी तरह कलियुगका संध्यामान एक सौ दिव्य वर्ष, युगमान एक सहस्र दिव्य वर्ष और संध्यांशमान एक सौ दिव्य वर्ष है। इस प्रकार कलियुगका पूरा मान बारह सौ दिव्य वर्ष है। इन चार युगोंका सम्मिलित कालमान बारह हजार दिव्य वर्ष है।
२८४ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण खेतीसे हरी-भरी भूमि, लाखों उत्तमोत्तम गजराज, सोनेके आभूषणोंसे विभूषित तीन लाख रत्न, सहस्रों स्वर्णजटित रथरत्न, एक लाख शिबिका, अन्नसे भरे हुए तीन करोड़ सुवर्णपात्र, जलसे भरे हुए तीन कोटि सुवर्ण-कलश, कर्पूर आदिसे सुवासित ताम्बूल और विश्वकर्माद्वारा रचित तथा श्रेष्ठ रत्नोंके सारभागसे खचित एवं वह्निशुद्ध विचित्र वस्त्रसहित माल्यसमूहोंसे सुशोभित तीन करोड़ विचित्र स्वर्ण-पर्यङ्कका ब्राह्मणोंके लिये दान किया था। भगवान् शंकरसे परम दुर्लभ ज्ञान, श्रीकृष्णका मन्त्र तथा श्रीहरिका दास्यभाव प्राप्त करके वे गोलोकको चले गये। अपने पुत्रको मुक्त हुआ देख प्रजापति ब्रह्मा बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने संतुष्ट होकर भगवान् शंकरकी स्तुति की और आदिमनुके स्थानपर दूसरे मनुकी सृष्टि की। वे भी स्वयम्भूके पुत्र होनेके कारण स्वायम्भुव मनु कहलाये। दूसरे मनुका नाम स्वारोचिष है। ये अग्निदेवके पुत्र हैं। राजा स्वारोचिष भी स्वायम्भुव मनुके समान ही महान् धर्मिष्ठ एवं दानी रहे हैं। दो अन्य मनु राजा प्रियव्रतके पुत्र तथा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ हैं। उनके नाम हैं-तापस और उत्तम। दोनों ही वैष्णव हैं तथा क्रमशः तीसरे और चौथे मनुके पदपर प्रतिष्ठित हैं। वे दोनों भी भगवान् शंकरके शिष्य हैं तथा श्रीकृष्णकी भक्तिमें तत्पर रहते हैं। धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ रैवत पाँचवें मनु हैं। चाक्षुषको छठा मनु जानना चाहिये। वे भी विष्णुभक्तिमें तत्पर रहनेवाले हैं। सूर्यपुत्र श्राद्धदेव जो विष्णुके भक्त हैं, सातवें मनु कहे गये हैं (इन्हींको वैवस्वत मनु कहते हैं)। सूर्यके दूसरे वैष्णव पुत्र सावर्णिक आठवें मनु हैं। विष्णुव्रतपरायण दक्षसावर्णि नवें मनु हैं। ब्रह्मज्ञानविशारद ब्रह्मसावर्णि दसवें मनु हैं। ग्यारहवें मनुका नाम धर्मसावर्णि है। वे धर्मिष्ठ, वरिष्ठ तथा सदा ही वैष्णवोंके व्रतका पालन करनेवाले हैं। ज्ञानी रुद्रसावर्णि बारहवें मनु हैं तथा धर्मात्मा देवसावर्णिको तेरहवाँ मनु कहा गया है। महाज्ञानी चन्द्रसावर्णि चौदहवें मनु हैं। मनुओंकी जितनी आयु होती है, उतनी ही इन्द्रोंकी भी होती है। ब्रह्माका एक दिन चौदह इन्द्रोंसे अविच्छिन्न कहा जाता है। जितना बड़ा उनका दिन होता है, उतनी ही बड़ी उनकी रात भी होती है। नरेश्वर ! उसे ब्राह्मी निशाके नामसे जानना चाहिये। उसीको वेदोंमें 'कालरात्रि' कहा गया है। राजन् ! ब्रह्माका एक दिन एक छोटा कल्प माना गया है। महातपस्वी मार्कण्डेय ऐसे ही कल्पोंसे सात कल्पतक जीवित रहते हैं। ब्रह्माका दिन बीतनेपर ब्रह्मलोकसे नीचेके सारे लोक प्रलयाग्निसे जलकर भस्म हो जाते हैं। वह अग्नि सहसा संकर्षण (शेषनाग) -के मुखसे प्रकट होती है। उस समय चन्द्रमा, सूर्य और ब्रह्माजीके पुत्रगण निश्चय ही ब्रह्मलोकमें चले जाते हैं। जब ब्रह्माकी रात बीत जाती है, तब वे पुनः सृष्टिका कार्य प्रारम्भ करते हैं। ब्रह्माकी रात्रिमें जो लोकोंका संहार होता है, उसे 'क्षुद्र प्रलय' कहते हैं। उसमें देवता, मनु और मनुष्य आदि दग्ध हो जाते हैं। इस प्रकार जब ब्रह्माके तीस दिन-रात व्यतीत हो जाते हैं, तब उनका एक मास पूरा होता है। वैसे ही बारह महीनोंका उनका एक वर्ष होता है। इस प्रकार ब्रह्माके पंद्रह वर्ष व्यतीत होनेपर एक प्रलय होता है, जिसे वेदोंमें 'दैनन्दिन प्रलय' कहा गया है। प्राचीन वेदज्ञोंने उसीको 'मोहरात्रि' की संज्ञा दी है। उसमें चन्द्रमा, सूर्य आदि; दिक्पाल, आदित्य, वसु, रुद्र, मनु, इन्द्र, मानव, ऋषि, मुनि, गन्धर्व तथा राक्षस आदि; मार्कण्डेय, लोमश और पेचक आदि चिरजीवी; राजा इन्द्रद्युम्न, अकूपार नामक कच्छप तथा नाडीजंघ नामक बक-ये सब-के-सब नष्ट हो जाते हैं। ब्रह्मलोकके नीचेके सब लोक तथा नागोंके स्थान भी विनाशको प्राप्त हो जाते हैं। ऐसे समयमें
प्रकृतिखण्ड २८५ ब्रह्मपुत्र आदि सब लोग ब्रह्मलोकमें चले जाते हैं। दैनन्दिन प्रलय व्यतीत होनेपर ब्रह्माजी पुनः लोकोंकी सृष्टि आरम्भ करते हैं। इस प्रकार सौ वर्षोंतक ब्रह्माकी आयु पूरी होती है। तदनन्तर ब्रह्माजीकी आयु पूर्ण होनेपर एक कल्प पूरा हो जाता है। उस समय जो 'महाप्रलय' आता है, उसीको पुरातन महर्षियोंने 'महारात्रि' कहा है। ब्रह्माजीकी आयु पूर्ण होनेपर ब्रह्माण्डसमूह जलमें डूब जाता है। वेदमाता सावित्री, वेद और धर्म आदि सब-के-सब तिरोहित हो जाते हैं। मृत्युका भी विनाश हो जाता है। परंतु देवी प्रकृति और भगवान् शिवका नाश नहीं होता। विश्वके वैष्णवगण भगवान् नारायणमें लीन हो जाते हैं। संहारकारी कालाग्निरुद्र समस्त रुद्रगणोंके साथ मृत्युञ्जय महादेवमें लीन हो जाते हैं। उनके साथ ही तमोगुणका भी लय हो जाता है। तदनन्तर प्रकृतिकी एक पलक गिरती है। साथ ही नारायण, शिव तथा महाविष्णुकी भी पलक गिरती है। नरेश्वर ! निमेषके अन्तमें अर्थात् पलक उठनेपर श्रीकृष्णकी इच्छासे पुनः सृष्टिका आरम्भ होता है। श्रीकृष्ण निमेषसे रहित हैं। उनकी पलक नहीं गिरती है; क्योंकि वे प्रकृतिसे परे तथा प्राकृत गुणोंसे रहित हैं। जो सगुण हैं, उन्हींके निमेष होता है। वह निमेष काल- संख्यात्मक अवस्थासे सीमित होता है। जो नित्य, निर्गुण, अनादि और अनन्त हैं, उनके निमेष कहाँ? जब प्रकृतिकी एक सहस्र बार पलकें गिर जाती हैं, तब उसका एक दण्ड पूरा होता है। ऐसे साठ दण्डोंका उसका एक दिन कहा गया है। तीस दिनोंका एक मास और बारह महीनोंका वर्ष होता है। ऐसे एक सौ वर्ष बीत जानेपर प्रकृतिका श्रीकृष्णमें लय होता है। श्रीकृष्णमें उसके लय होनेपर जो प्रलय होता है, उसे 'प्राकृत प्रलय' कहा गया है। महाविष्णुकी जननी वह एकमात्र मूलप्रकृति ईश्वरी सबका संहार करके स्वयं श्रीकृष्णके वक्षःस्थलमें विलीन हो जाती है। संतपुरुष उसीको सनातनी विष्णुमाया, सर्वशक्तिस्वरूपा दुर्गा, सती नारायणी, श्रीकृष्णकी बुद्धिकी अधिष्ठात्री देवी तथा निर्गुणात्मिका कहते हैं। जिसकी मायासे बड़े-बड़े देवता मोहित होते हैं, उस देवीको वैष्णवजन महालक्ष्मी तथा 'परा राधा' कहते हैं। श्रीकृष्णके आधे अङ्गसे प्रकट हुई महालक्ष्मी नारायणकी प्रिया है। वही राधारूपसे श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी और उनकी प्राणाधिका है। शश्वत् प्रेममयी शक्ति है। निर्गुण परमात्माकी निर्गुणा प्रियतमा है। नारायण और शिव दोनों शुद्ध-सत्त्वस्वरूपी हैं। वे अपने बहुत-से पार्षदगणोंका अपने-आपमें संहार करके निर्गुण श्रीकृष्णमें लीन हो जाते हैं। नरेश्वर ! गोप, गोपियाँ और सवत्सा गौएँ सब- की-सब प्रकृतिस्वरूपा श्रीराधामें लीन हो जाती हैं और वे प्रकृतिदेवी परमेश्वर श्रीकृष्णमें। जो क्षुद्र विष्णु हैं, वे सब महाविष्णुमें लीन होते हैं। महाविष्णु प्रकृतिमें और वह श्रीकृष्णकी मूल- प्रकृति परमात्मा श्रीकृष्णमें लीन होती है। माया तथा ईश्वरकी इच्छासे प्रकृतिने योगनिद्रा बनकर श्रीकृष्णके नेत्रकमलोंमें निवास किया। जितने समयमें प्रकृतिका एक दिन होता है, उतने समयतक वृन्दावनमें परमात्मा श्रीकृष्णको नींद लगी रहती है। वहाँ बहुमूल्य रत्नोंका पर्यङ्क बिछा होता है, जो अग्निशुद्ध चिन्मय वस्त्रोंसे आच्छादित होता है। गन्ध, चन्दन और फूलोंकी वायुसे वह पर्यङ्क सुवासित रहता है। उसीपर श्यामसुन्दर शयन करते हैं। उनके पुनः जागनेपर सारी सृष्टिका कार्य आरम्भ होता है। उन निर्गुण परमात्मा श्रीकृष्णका वन्दन, स्मरण, ध्यान, पूजन और गुण-कीर्तन महापातकोंका नाश करनेवाला है। महाराज ! मैंने मृत्युञ्जय महादेवके मुखसे जैसा सुना था और आगमोंमें जो कुछ कहा गया है, उसके अनुसार यह सब कुछ बता दिया। अब
२८६ संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण
तुम और क्या सुनना चाहते हो?
सुयज्ञने पूछा—ब्रह्माजीकी आयु पूर्ण होनेपर समस्त लोकोंके संहारकारी कालाग्निरुद्र, तमोगुण तथा सत्त्वगुण यदि मृत्युञ्जय शिवमें विलीन होते हैं तथा यदि उस प्राकृत लयकी बेलामें शिव निर्गुण परमात्मा श्रीकृष्णमें लीन होते हैं तो आपके गुरु भगवान् शिवका नाम श्रुतिमें मृत्युञ्जय क्यों रखा गया? तथा जिनके रोमकूपोंमें असंख्य ब्रह्माण्ड निवास करते हैं, उन महाविष्णुकी जननी यह मूलप्रकृति कैसे हुई?
सुतपा बोले—नरेश्वर! ब्रह्माजीकी आयु पूर्ण होनेपर ब्रह्मा आदि समस्त लोकोंका संहार करनेवाली मृत्युकन्या जलबिम्बकी भाँति नष्ट हो जाती है। ऐसी कितनी ही मृत्युकन्याओं और करोड़ों ब्रह्माओंका लय हो जानेपर यथासमय भगवान् शिव सत्त्वरूपधारी निर्गुण श्रीकृष्णमें लीन होते हैं। मेरे गुरु भगवान् शिवने मृत्युकन्यापर सदा ही विजय पायी है। परंतु मृत्युने कभी शिवको पराजित नहीं किया है। यह बात प्रत्येक कल्पमें श्रुतियोंद्वारा सुनी गयी है। अतः भगवान् शिवका मृत्युञ्जय नाम उचित ही है। नरेश्वर! शम्भु, नारायण और प्रकृति—इन तीनों नित्य तत्त्वोंका नित्य परमात्मा श्रीकृष्णमें लय होना लीलामात्र है, वास्तविक नहीं है। स्वयं निर्गुण परमपुरुष परमात्मा ही कालके अनुसार सगुण होते हैं। वे स्वयं ही मायासे नारायण, शिव एवं प्रकृतिके रूपमें प्रकट होते हैं; अतः सदा उनके समान ही हैं। जैसे अग्नि और उसकी चिनगारियोंमें भेद नहीं है, वैसे ही नारायण आदि तथा श्रीकृष्णमें कोई अन्तर नहीं है। ब्रह्माजीके द्वारा प्रत्येक कल्पमें जिन-जिन रुद्र, आदित्य आदिकी सृष्टि हुई है, वे सब मृत्युकन्यासे पराजित होनेके कारण नश्वर हैं। परंतु शिवकी सृष्टि ब्रह्माजीने नहीं की है। शिव सत्य, नित्य एवं सनातन हैं। भूमिपाल! उनके निमेषमात्रमें कितने ही ब्रह्माओंका पतन हो जाता है। आदिसर्गमें जगद्गुरु श्रीकृष्णने प्रकृतिके भीतर वीर्यका आधान किया था। पवित्र वृन्दावनके भीतर रासमें उनके वामांशसे प्रकट हुई रासेश्वरी राधा ही परा प्रकृति हैं। उन्होंने ही गर्भ धारण किया। तदनन्तर समय आनेपर राधाने गोलोकके रासमण्डलमें एक अण्डको जन्म दिया। अपनी संततिको अण्डाकार देख उनके हृदयमें बड़ी व्यथा हुई। वे कुपित हो उठीं तथा उन्होंने उस अण्डेको वहाँसे नीचे विश्वगोलकमें फेंक दिया। उसी अण्डसे सबके आधारभूत महाविराट् (महाविष्णु)-की उत्पत्ति हुई।
सुयज्ञने कहा—प्रभो! आज मेरा जन्म सफल हो गया। जीवन सार्थक हो गया। मेरे लिये आपका शाप भक्तिका कारण होनेसे वरदान बन गया। समस्त मङ्गलोंका भी मङ्गल करनेवाली हरि-भक्ति परम दुर्लभ है। विप्रवर! वेदोंमें जो पाँच प्रकारकी भक्ति बतायी गयी है, वह भी इसके समान नहीं है। महामुने! परमात्मा श्रीकृष्णमें जिस प्रकार भी मेरी भक्ति सम्भव हो सके, वह उपाय कीजिये; क्योंकि वह सभीके लिये परम दुर्लभ है। केवल जलमय तीर्थ ही तीर्थ नहीं है, मिट्टी और पत्थरकी प्रतिमारूप देवता ही देवता नहीं हैं, श्रीकृष्णभक्त ही मुख्य तीर्थ और देवता हैं। वे जलमय तीर्थ और मिट्टी-पत्थरके देवता दीर्घकालमें उपासकको पवित्र करते हैं, परंतु श्रीकृष्णभक्त दर्शनमात्रसे ही पवित्र कर देते हैं। समस्त वर्णोंमें ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं, उनमें भी जो भारतवर्षमें रहकर स्वधर्म-पालनमें लगे रहते हैं, वे श्रेष्ठ हैं। उनमें भी जो श्रीकृष्णमन्त्रका उपासक श्रीकृष्णभक्तिपरायण तथा प्रतिदिन श्रीकृष्णके नैवेद्यको भोजन करनेवाला है, वह सर्वश्रेष्ठ और महान् पवित्र है। आप वैष्णव हैं, अतः ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ हैं। साथ ही महान् ज्ञानके श्रेष्ठ सागर हैं। मुने! आप-जैसे शिव-शिष्य महात्मा पुरुषको पाकर मैं दूसरे किसकी शरण जाऊँ? महामुने!
प्रकृतिखण्ड २८७
आपके शापसे इस समय मैं गलित कुष्ठका रोगी हूँ। अपवित्र हूँ और तपके अधिकारसे वञ्चित हूँ। ऐसी दशामें कैसे तपस्या करूँ?
सुतपा बोले—राजन्! सनातनी विष्णुमाया हरि-भक्ति प्रदान करनेवाली है। वह जिन लोगोंपर कृपा करती है, उन्हें भगवान्की भक्ति देती है। माया जिन्हें मोहित करती है, उन्हें हरि-भक्ति नहीं देती है, अपितु उनको नश्वर धन देकर ठग लेती है। अतः तुम प्राकृत गुणोंसे रहित कृष्णप्रेममयी शक्ति तथा श्रीकृष्णके प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी श्रीराधाकी आराधना करो, जो सम्पूर्ण सम्पदाओंको देनेवाली हैं। उनके अनुग्रह एवं सेवासे शीघ्र ही गोलोकमें चले जाओगे। वे सर्वाराध्य श्रीकृष्णसे भी सेवित एवं पूजित हैं। निर्गुण परमात्मा श्रीकृष्ण ध्यानसे भी वशमें न होनेवाले और दुराराध्य हैं। उनकी सेवा करके भक्त-जन सुदीर्घकाल किंवा अनेक जन्मोंके पश्चात् गोलोकमें जाते हैं। परंतु सर्वसम्पत्स्वरूपिणी श्रीराधा महाविष्णुकी भी जननी हैं, कृपामयी हैं। अतः उनका सेवन करके भक्तजन शीघ्र ही गोलोकमें चले जाते हैं। तुम एक सहस्र वर्षोंतक ब्राह्मणका चरणोदक पीते रहो। इससे कामदेवके समान रूपवान् तथा रोगहीन हो जाओगे। जबतक पृथ्वी ब्राह्मणके चरणोदकसे भीगी रहती है, तबतक उस ब्राह्मणभक्त पुरुषके पितर कमलके पत्तोंमें जल पीते हैं। पृथ्वीपर जो-जो तीर्थ हैं, वे सब समुद्रमें भी हैं और समुद्रमें जो तीर्थ हैं, वे सब ब्राह्मणके चरणोंमें हैं। ब्राह्मणका चरणोदक पापों तथा रोगोंका विनाश करनेवाला है। वह सम्पूर्ण तीर्थोंके जलके समान भोग तथा मोक्ष देनेवाला और शुभ है। ब्राह्मण मनुष्यके रूपमें साक्षात् देवाधिदेव जनार्दन हैं। ब्राह्मणके दिये हुए पदार्थको सब देवता भोग लगाते हैं।
ऐसा कहकर ब्राह्मण सुतपा सुयज्ञके सत्कारको ग्रहण करके अपने घरको चले गये। जाते-जाते यह कह गये कि मैं एक वर्षके बाद फिर आऊँगा। शिवे! राजा प्रतिदिन भक्तिभावसे ब्राह्मणके चरणोदकका पान करने लगे। उन्होंने एक वर्षतक ब्राह्मणोंकी पूजा की और उन्हें भोजन कराया। वर्ष बीतते-बीतते राजा रोग-व्याधिसे मुक्त हो गये। फिर कश्यपकुलके अग्रणी मुनिश्रेष्ठ सुतपा वहाँ आये। उन्होंने श्रीराधाकी पूजाके विधान, स्तोत्र, कवच, मन्त्र और सामवेदोक्त ध्यानका राजा सुयज्ञको उपदेश दिया और कहा—'राजन्! शीघ्र घर छोड़कर निकल जाओ।' ऐसा कहकर मुनि तो तपस्याके लिये चले गये और राजा तुरंत ही घर छोड़कर दुर्गम वनको चल दिये। राजाकी चारों रानियोंने प्राण त्याग दिये तथा उनका पुत्र राजा हुआ। सुयज्ञने पुष्करमें जाकर सुदुष्कर तपस्या की। उन्होंने सौ दिव्य वर्षोंतक श्रीराधाके उत्कृष्ट मन्त्रका जप किया। तब उन्होंने आकाशमें रथपर बैठी हुई परमेश्वरी श्रीराधाके दर्शन किये। उनके दर्शनमात्रसे राजाके सारे पाप-ताप दूर हो गये। उन्होंने मनुष्यदेहको त्याग दिया और दिव्य रूप धारण कर लिया। देवी श्रीराधा उस रत्नेन्द्रनिर्मित
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विमानद्वारा राजाको साथ ले गोलोकमें चली गयीं। राजाने विरजा नदी तथा मनोहर शतशृङ्ग पर्वतसे घिरे हुए, श्रीवृन्दावनसे युक्त तथा रासमण्डलसे मण्डित गोलोकका दर्शन किया। वह धाम गौओं, गोपियों और गोपसमूहोंसे सेवित तथा रत्नेन्द्रसारसे निर्मित अत्यन्त मनोहर भवनोंद्वारा सुशोभित हो रहा था। भाँति-भाँतिके चित्र-विचित्र दृश्य उसकी शोभा बढ़ाते थे तथा वह कल्पवृक्षयुक्त सैंतीस उपवनोंसे शोभायमान था। उन उपवनोंमें पारिजातके वृक्ष भी भरे हुए थे। सारा गोलोक कामधेनुओंसे आवेष्टित था। आकाशकी भाँति विपुल विस्तारसे युक्त तथा चन्द्रमण्डलके समान गोलाकार था। वैकुण्ठसे पचास करोड़ योजन ऊपर वह शून्यमें बिना किसी आधारके स्थित है और भगवान्की इच्छासे ही सुस्थिर है। आत्माकाशके समान नित्य है और हमलोगोंके लिये भी परम दुर्लभ है। मैं, नारायण, अनन्त, ब्रह्मा, विष्णु, महाविराट् धर्म, क्षुद्र विराट्, गङ्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, तुम (पार्वती), विष्णुमाया, सावित्री, तुलसी, गणेश, सनत्कुमार, स्कन्द, नर-नारायण ऋषि, कपिल, दक्षिणा, यज्ञ, ब्रह्मपुत्र, योगी, वायु, वरुण, चन्द्रमा, सूर्य, रुद्र, अग्नि तथा कृष्णमन्त्रके उपासक भारतीय वैष्णव—इन सबने ही गोलोकको देखा है। दूसरोंने इसे कभी नहीं देखा है।
उस गोलोकधाममें श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण निरामय रत्नसिंहासनपर विराजमान हैं। रत्नोंके हार, किरीट तथा रत्नमय भूषणोंसे वे विभूषित हैं। अग्निशुद्ध, अत्यन्त निर्मल चिन्मय पीताम्बर उनके श्रीअङ्गोंकी शोभा बढ़ाता है। उनके सारे अङ्ग चन्दनसे चर्चित हैं। वे किशोर गोपबालकके रूपमें दिखायी देते हैं। नूतन जलधरके समान श्याम कान्ति, श्वेत कमलके समान नेत्र, शरत्की पूर्णिमाके चन्द्रमण्डलको तिरस्कृत करनेवाला मन्द हास्यसे सुशोभित मुख, मनोहर आकृति, दो भुजाएँ और हाथोंमें मुरली—यही उनके रूपकी झाँकी है। भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये ही वे दिव्य विग्रह धारण करते हैं। श्रीकृष्ण स्वेच्छामय (परम स्वतन्त्र), प्रकृतिसे परे, परब्रह्मस्वरूप निर्गुण परमात्मा हैं। ध्यानसे भी वे वशमें आनेवाले नहीं हैं। उनकी आराधना बहुत कठिन है। वे हमारे लिये भी परम दुर्लभ हैं। उनके प्रिय सखा बारह ग्वालबाल सफेद चँवर लिये उनकी सेवा करते हैं। प्रेमपीडिता, सुस्थिरयौवना, वह्निशुद्ध चिन्मय वस्त्रधारिणी, रत्नभूषणभूषिता एवं परम मनोहारिणी गोपिकाएँ मन्द-मन्द मुस्कराती हुई उनकी छवि निहारती रहती हैं। रासमण्डलके मध्यभागमें परात्पर पुरुष श्रीकृष्णके राजा सुयज्ञने इसी रूपमें दर्शन किये। श्रीराधाने ही वहाँ उन्हें अपने प्राणवल्लभके दर्शन कराये थे। चारों वेद मनोहर मूर्ति धारण करके उनके दर्शन करते थे। राग-रागिनियाँ भी मूर्तिमती होकर वाद्ययन्त्र और मुखसे उन्हें अत्यन्त मनोहर संगीत सुनाती थीं। शिवे! नित्य सनातनी प्रकृतिके साथ तुम भी सदा उनके चरणारविन्दोंकी सेवा करती हो। वे तुलसीदलसे मण्डित होते हैं तथा कस्तूरी, कुङ्कुम, गन्ध, चन्दन, दूर्वा, अक्षत,
प्रकृतिखण्ड २८९
पारिजातपुष्प तथा विरजाके निर्मल जलसे उनके लिये नित्य अर्घ्य दिया जाता है। उस समय उनकी बड़ी शोभा होती है। वे सुप्रसन्न, स्वतन्त्र, समस्त कारणोंके भी कारण, सर्वान्तरात्मा, सर्वेश्वर, सर्वजीवन, सर्वाधार, परमपूज्य, सनातन ब्रह्मज्योति, सर्वसम्पत्तिस्वरूप, सम्पूर्ण सम्पदाओंके दाता, सर्वमङ्गलस्वरूप, सर्वमङ्गलकारण, सर्वमङ्गलदाता तथा समस्त मङ्गलोंके भी मङ्गल हैं।
श्रीकृष्णका दर्शन करके सशङ्कित हो राजा सुयज्ञ तुरंत रथसे उतर पड़े और नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए पुलकित शरीरसे भगवान्के चरणोंमें मस्तक रखकर उन्होंने प्रणाम किया। परमात्मा श्रीकृष्णने राजाको अपना दासत्व, शुभाशीर्वाद तथा वह सत्य एवं अविचल श्रीकृष्णभक्ति प्रदान की, जो हमलोगोंके लिये भी परम दुर्लभ है। तदनन्तर श्रीराधा अपने रथसे उतरकर श्रीकृष्णके वक्षमें विराजमान हो गयीं। उनकी अत्यन्त प्यारी गोपियाँ सफेद चँवर लिये उनकी सेवामें लग गयीं। उनके आनेपर श्रीकृष्ण भक्ति और आदरसे सहसा उठकर खड़े हो गये। उन्होंने मन्द मुसकानके साथ श्रीराधाके साथ वार्तालाप और उनका सम्मान किया। प्राचीनकालके वे वेदवेत्ता विद्वान् वेदोंके कथनानुसार पहले राधा नामका उच्चारण करके पीछे कृष्ण या माधव कहते हैं। जो इसके विपरीत उच्चारण करते या उन जगदम्बा श्रीकृष्णप्राणाधिका एवं प्रेममयी शक्ति श्रीराधिकाकी निन्दा करते हैं, वे चन्द्रमा तथा सूर्यकी स्थितिपर्यन्त कालसूत्र नरकमें यातना भोगते हैं। तत्पश्चात् सौ वर्षोंतक स्त्री-पुत्रसे रहित तथा रोगी होते हैं।
दुर्गे! इस प्रकार मैंने परम उत्तम राधिकाख्यानका वर्णन किया है। वह सती भगवती वैष्णवी, सनातनी, नारायणी, विष्णुमाया, मूलप्रकृति एवं ईश्वरी नाम धारण करनेवाली तुम्हीं हो। मायाका आश्रय लेकर मुझसे पूछ रही हो। तुम स्वयं ही सर्वज्ञा, सर्वरूपिणी, स्त्रीजातिकी अधिदेवी तथा पूर्वजन्मकी बातोंको याद रखनेवाली श्रेष्ठ पराशक्ति हो। राधिकाकी कथा तो मैंने सुना दी, अब और क्या सुनना चाहती हो ? (अध्याय ५४)
श्रीराधाके ध्यान, षोडशोपचार-पूजन, परिचारिकापूजन, परिहारस्तवन, पूजन-महिमा तथा स्तुति एवं उसके माहात्म्यका वर्णन
**श्रीपार्वतीने पूछा—**भगवान्! आप पुरुषोंके ईश्वर श्रीकृष्णके मन्त्रके होते हुए उन वैष्णवनरेश सुयज्ञने राधाका मन्त्र क्यों ग्रहण किया ? सुतपाने राजाको श्रीराधाकी पूजाका कौन-सा विधान बताया ? तथा किस ध्यान, किस स्तोत्र, किस कवच और किस मन्त्रका उपदेश दिया ? श्रीराधाकी पूजापद्धति क्या है ? ये सब बातें बताइये।
**श्रीमहेश्वर बोले—**प्रिये! राजाने यह प्रश्न किया था कि 'हे विप्र! हे मुने! मैं किसका भजन करूँ? किसकी आराधनासे शीघ्र गोलोक प्राप्त कर लूँगा?' उनके ऐसा कहनेपर उन ब्राह्मणशिरोमणिने राजेन्द्र सुयज्ञसे कहा—'महाराज! श्रीकृष्णकी सेवासे उनके लोकको तुम बहुत जन्मोंमें प्राप्त करोगे, अतः उनके प्राणोंकी अधिष्ठात्री देवी परात्परस्वरूपा श्रीराधाका भजन करो। वे कृपामयी हैं। उनके प्रसादसे साधक शीघ्र ही उनके धामको प्राप्त कर लेता है'—ऐसा कहकर मुनिने उन्हें राधाके इस षडक्षर-मन्त्रका उपदेश दिया। वह मन्त्र इस प्रकार है—'ॐ राधायै स्वाहा।' इसके बाद प्राणायाम, भूतशुद्धि, मन्त्रन्यास, करन्यास, अङ्गन्यास, उनके सर्व-दुर्लभ ध्यान, स्तोत्र और कवचकी भक्तिभावसे राजाको शिक्षा दी। राजाने उसी क्रमसे उस मन्त्रका जप किया। साथ ही श्रीकृष्णने पूर्वकालमें जिस ध्यानके द्वारा श्रीराधाका चिन्तन एवं पूजन किया था, उसी सामवेदोक्त ध्यानके अनुसार उनके स्वरूपका चिन्तन किया। वह ध्यान मङ्गलोंके लिये भी मङ्गलकारी है।
| २९० | संक्षिप्त ब्रह्मवैवर्तपुराण |
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ध्यान—
श्रीराधाकी अङ्गकान्ति श्वेत चम्पाके समान गौर है। वे अपने अङ्गोंमें करोड़ों चन्द्रमाओंके समान मनोहर कान्ति धारण करती हैं। उनका मुख शरद-ऋतुकी पूर्णिमाके चन्द्रमाको लज्जित करता है। दोनों नेत्र शरत्कालके प्रफुल्ल कमलोंकी शोभाको छीने लेते हैं। उनके श्रोणिदेश एवं नितम्बभाग बहुत ही सुन्दर हैं। अधर पके हुए बिम्बफलकी लाली धारण करते हैं। वे श्रेष्ठ सुन्दरी हैं। मुक्ताकी पंक्तियोंको तिरस्कृत करनेवाली दन्तपङ्क्ति उनके मुखकी मनोहरताको बढ़ाती है। उनके वदनपर मन्द मुस्कानजनित प्रसन्नता खेलती रहती है। वे भक्तोंपर अनुग्रह करनेके लिये व्याकुल रहती हैं। अग्निशुद्ध चिन्मय वस्त्र उनके श्रीअङ्गोंको आच्छादित करते हैं। वे रत्नोंके हारसे विभूषित हैं। रत्नमय केयूर और कंगन धारण करती हैं। रत्नोंके ही बने हुए मंजीर उनके पैरोंकी शोभा बढ़ाते हैं। रत्ननिर्मित विचित्र कुण्डल उनके दोनों कानोंकी श्रीवृद्धि करते हैं। सूर्यप्रभाकी प्रतिमारूप कपोल-युगलसे वे सुशोभित होती हैं। अमूल्य रत्नोंके बने हुए कण्ठहार उनके ग्रीवा-प्रदेशको विभूषित करते हैं। उत्तम रत्नोंके सारतत्त्वसे निर्मित किरीट-मुकुट उनकी उज्ज्वलताको जाग्रत् किये रहते हैं। रत्नोंकी मुद्रिका और पाशक (चेन या पासा आदि) उनकी शोभा बढ़ाते हैं। वे मालतीके पुष्पों और हारोंसे अलंकृत केशपाश धारण करती हैं। वे रूपकी अधिष्ठात्री देवी हैं और गजराजकी भाँति मन्द गतिसे चलती हैं। जो उन्हें अत्यन्त प्यारी हैं, ऐसी गोप-किशोरियाँ श्वेत चँवर लेकर उनकी सेवा करती हैं। कस्तूरीकी बेंदी, चन्दनके बिन्दु और सिन्दूरकी टीकीसे उनके मनोहर सीमन्तका निम्नभाग अत्यन्त उद्दीप्त दिखायी देता है। रासमें रासेश्वरके सहित विराजित रासेश्वरी राधाका मैं भजन करता हूँ।*
* श्वेतचम्पकवर्णाभां कोटिचन्द्रसमप्रभाम्।
शरत्पार्वणचन्द्रास्यां शरत्पङ्कजलोचनाम्। सुश्रोणीं सुनितम्बां च पक्वबिम्बाधरां वराम्॥
मुक्तापङ्क्तिविनिन्दैकदन्तपङ्क्तिमनोहराम् ।
ईषद्व्हासप्रसन्नास्यां भक्तानुग्रहकातराम्। वह्निशुद्धांशुकाधानां रत्नमालाविभूषिताम्॥
रत्नकेयूरवलयां रत्नमञ्जीररञ्जिताम्।
रत्नकुण्डलयुग्मेन विचित्रेण विराजिताम्। सूर्यप्रभाप्रतिकृतिगण्डस्थलविराजिताम् ॥
अमूल्यरत्ननिर्माणग्रैवेयकविभूषित ।
सद्रत्नसारनिर्माणकिरीटमुकुटोज्ज्वलाम् । रत्नाङ्गुलीयसंयुक्तां रत्नपाशकशोभिताम्॥
बिभ्रतीं कबरीभारं मालतीमाल्यभूषिताम् ।
रूपाधिष्ठातृदेवीं च गजेन्द्रमन्दगामिनीम्। गोपीभिः सुप्रियाभिश्च सेवितां श्वेतचामरैः॥
कस्तूरीविन्दुभिः सार्द्धमधश्चन्दनबिन्दुना । सिन्दूरबिन्दुना चारुसीमन्ताधःस्थ्लोज्ज्वलाम् ॥
रासे रासेश्वरयुतां राधां रासेश्वरीं भजे॥
(प्रकृतिखण्ड ५५। १०—१५, १९)