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ब्रह्मसूत्र (शाङ्करभाष्य सहित)

Brahma Sutras with Shankara Bhashya - Gita Press

महर्षि बादरायण / आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर · गीताप्रेस गोरखपुर · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished417 पृष्ठ

सूत्र ७-८ ] अध्याय १ ५१

सूत्र ७-८ ] अध्याय १ ५१ है। फिर अन्तमें प्राणको इन सबकी अपेक्षा बड़ा बताकर उसीकी उपासना करनेके लिये कहा है। उसे सुनकर नारदजीने फिर कोई प्रश्न नहीं किया है। इस वर्णनके अनुसार यदि इस प्रकरणमें सबसे बड़ा प्राण है और उसीको 'भूमा' एवं आत्मा भी कहते हैं; तब तो पूर्व प्रकरणमे भी सबका आधार प्राणशब्दवाच्य जीवात्माको ही मानना चाहिये; इसका समाधान करनेके लिये आगेका प्रकरण आरम्भ किया जाता है-- भूमा संप्रसादादध्युपदेशात् ॥ १ । ३ । ८ ॥ भूमा = ( उक्त प्रकरणमे कहा हुआ ) 'भूमा' ( सबसे बडा ) ब्रह्म ही है; संप्रसादात् = क्योकि उसे प्राणशब्दवाच्य जीवात्मासे भी; अधि=ऊपर (बड़ा); उपदेशात् = बताया गया है । व्याख्या-उक्त प्रकरणमें नाम आदिके क्रमसे एककी अपेक्षा दूसरेको बड़ा बताते हुए पंद्रहवे खण्डमे प्राणको सबसे बड़ा बताकर कहा है—'यथा वा अरा नाभौ समर्पिता एवमस्मिन् प्राणे सर्व समर्पितम् । प्राणः प्राणेन याति प्राणः प्राणं ददाति प्राणाय ददाति । प्राणो ह पिता प्राणो माता प्राणो भ्राता प्राण. स्वसा प्राण आचार्य. प्राणो ब्राह्मण ।' ( छा० उ० ७ । १५ । १ ) अर्थात् 'जैसे अरे. रथचक्रकी नाभिके आश्रित रहते है, उसी प्रकार समस्त जगत् प्राणके आश्रित है, प्राण ही प्राणके द्वारा गमन करता है, प्राण ही प्राण देता है, प्राणके लिये देता है, प्राण पिता है, प्राण माता है, प्राण भ्राता है, प्राण बहिन है, प्राण आचार्य है और प्राण ही ब्राह्मण है।' इससे यह मालूम होता है कि यहाँ प्राणके नामसे जीवात्माका वर्णन है, क्योंकि सूत्रकारने यहाँ उस प्राणका ही दूसरा नाम 'संप्रसाद' रक्खा है और संप्रसाद नाम जीवात्माका है, यह बात इसी उपनिषद् ( छा० उ० ८ । ३ । ४ ) मे स्पष्ट कही गयी है । इस प्राणशब्दवाच्य जीवात्माके विषयमे आगे चलकर यह भी कहा है कि 'यह सब कुछ प्राण ही है, इस प्रकार जो चिन्तन करनेवाला, देखनेवाला और जाननेवाल' है, वह अतिवादी होता है।' इसलिये यहाँ यह धारणा होनी स्वाभाविक है कि इस प्रकरणमे प्राणशब्दवाच्य जीवात्माको ही सबसे बड़ा बताया गया है; क्योंकि इस उपदेशको सुनकर नारदजीने पुन. अपनी ओरसे कोई प्रश्न नहीं उठाया । मानो उन्हे अपने प्रश्नका पूरा उत्तर

प्रकरणमे ‘भूमा’ शब्द सत्य ज्ञानानन्दस्वरूप सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माका

५२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ मिल गया हो। परंतु भगवान् सनत्कुमार तो जानते थे कि इससे आगेकी बात समझाये बिना, इसका ज्ञान अधूरा ही रह जायगा, अतः उन्होंने नारदके बिना पूछे ही सत्य शब्दसे ब्रह्मका प्रकरण उठाया अर्थात् ‘तु’ शब्दका प्रयोग करके यह स्पष्ट कर दिया कि ‘वास्तविक अतिवादी तो वह है, जो सत्यको जानकर उसके बलपर प्रतिवाद करता है।’ इस कथनसे नारदके मनमे सत्य तत्त्वकी जिज्ञासा उत्पन्न करके उसे जाननेके साधनरूप विज्ञान, मनन, श्रद्धा, निष्ठा और क्रियाको बताया। फिर सुखरूपसे भूमाको अर्थात् सबसे महान् परब्रह्म परमात्माको बतलाकर प्रकरणका उपसंहार किया। इस प्रकार प्राण- शब्दवाच्य जीवात्मासे अधिक (बड़ा) भूमाको बताये जानेके कारण इस प्रकरणमे ‘भूमा’ शब्द सत्य ज्ञानानन्दस्वरूप सच्चिदानन्दघन परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है। प्राण, जीवात्मा अथवा प्रकृतिका वाचक नहीं। सम्बन्ध—इतना ही नहीं, अपि तु— धर्मोपपत्तेश्च ॥ १ । ३ । ८ ॥ धर्मोपपत्तेः=(उक्त प्रकरणमे) जो भूमाके धर्म बतलाये गये हैं, वे भी ब्रह्ममे ही सुसंगत हो सकते है—इसलिये; च=भी; (यहाँ ‘भूमा’ ब्रह्म ही है) व्याख्या—पूर्वोक्त प्रकरणमे उस भूमाके धर्मोंका इस प्रकार वर्णन किया गया है—‘यत्र नान्यत् पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद् विजानाति स भूमाथ यत्रान्यत् पश्यत्यन्यच्छृणोत्यन्यद् विजानाति तदल्पं यो वै भूमा तदमृतमथ यदल्पं तन्मर्त्यम् । स भगवः कस्मिन् प्रतिष्ठित इति स्वे महिम्नि।’ (छा० उ० ७ । २४ । १) अर्थात् “जहाँ पहुँचकर न अन्य किसीको देखता है, न अन्यको सुनता है, न अन्यको जानता है, वह भूमा है। जहाँ अन्यको देखता, सुनता और जानता है, वह अल्प है। जो भूमा है, वही अमृत है और जो अल्प है, वह नाशवान् 'है। इसपर नारदने पूछा—‘भगवन् ! वह भूमा किसमे प्रतिष्ठित है?’ उत्तरमे सनत्कुमारने कहा—‘अपनी महिमामे।’ आगे चलकर फिर कहा है कि ‘धन, सम्पत्ति, मकान आदि जो महिमाके नामसे प्रसिद्ध है, ऐसी महिमामे वह भूमा प्रतिष्ठित नहीं है; किन्तु वही नीचे, ऊपर, आगे, पीछे, दाये और बाये है; तथा वही यह सब कुछ है।’ इसके बाद उस भूमाको ही आत्माके नामसे कहा है और यह भी बताया है कि ‘आत्मा ही नीचे, ऊपर, आगे, पीछे, दाये और बाये है तथा वही सब कुछ है। जो इस प्रकार देखने, मानने तथा

सूत्र ९-१० ] अध्याय १ ५३

सूत्र ९-१० ] अध्याय १ ५३ विशेष रूपसे जाननेवाला है, वह आत्मामे ही क्रीडा करनेवाला, आत्मामें ही रति- वाला, आत्मामे ही जुड़ा हुआ तथा आत्मामे ही आनन्दवाला है।' इत्यादि । इन सब धर्मोंकी संगति परब्रह्म परमात्मामे ही लग सकती है, अतः वही इस प्रकरणमे 'भूमा'के नामसे कहा गया है। सम्बन्ध—पूर्व प्रकरणमें भूमाके जो धर्म बताये गये हैं, वे ही बृहदारण्य- कोपनिषद् ( ३ । ८ । ७) में 'अक्षर' के भी धर्म कहे गये हैं। अक्षर शब्द प्रणवरूप वर्णको भी कहते हैं; अतः यहाँ 'अक्षर' शब्द किसका वाचक है ? इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— अक्षरमम्बरान्तधृतेः ॥ १ । ३ । १० ॥ अक्षरम् = ( उक्त प्रकरणमे ) अक्षर शब्द परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है; अम्बरान्तधृतेः = क्योकि उसको आकाशपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्को धारण करने- वाला बताया गया है । व्याख्या—यह प्रकरण इस प्रकार है—'स होवाच यदूर्ध्वं याज्ञवल्क्य दिवो यदवाक् पृथिव्या यदन्तरा द्यावापृथिवी इमे यद् भूतं च भवच्च भविष्यच्चे- त्याचक्षते कस्मिन् तदोतं च प्रोतं चेति ।' ( ३ । ८ । ६) गार्गीने याज्ञवल्क्य- से पूछा—'याज्ञवल्क्य ! जो द्युलोकसे भी ऊपर, पृथिवीसे भी नीचे और इन दोनोंके बीचमे भी है तथा जो यह पृथिवी और द्युलोक है, ये सब-के-सब एवं जिसको भूत, भविष्यत् और वर्तमान कहते हैं, वह काल किसमे ओतप्रोत है ?' इसके उत्तरमें याज्ञवल्क्यने कहा—'गार्गि ! यह सब आकाशमें ओतप्रोत है।' इसपर गार्गीने पूछा—'वह आकाश किसमे ओतप्रोत है ?' ( ३ । ८ । ७) तब याज्ञवल्क्यने कहा—'उस तत्त्वको तो ब्रह्मवेत्तालोग 'अक्षर' कहते हैं।' ( ३ । ८ । ८) इस प्रकार वह अक्षर आकाशपर्यन्त सबको धारण करनेवाला बताया गया है, इसलिये यहाँ 'अक्षर' नामसे उस परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है, अन्य किसीका नहीं । सम्बन्ध—कारण अपने कार्यको धारण करता है, यह सभी मानते हैं । जिनके मतमें प्रकृति ही जगत्का कारण है, वे उसे ही आकाशपर्यन्त सभी भूतोंको धारण करनेवाली मान सकते हैं। अतः उनके मतके अनुसार यहाँ 'अक्षर'

९४ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ शब्द प्रकृतिका ही वाचक हो सकता है । इस शङ्काका निवारण करनेके लिये कहते हैं— सा च प्रशासनात् ॥ १ । ३ । ११ ॥ च=और, सा=वह आकाशपर्यन्त सब भूतोको धारण करनारूप क्रिया, ( परमेश्वरकी ही है ); प्रशासनात्=क्योकि उस अक्षरको सबपर भलीभाँति शासन करनेवाला कहा है । व्याख्या—इस प्रकरणमे आगे चलकर कहा है कि 'इसी अक्षरके प्रशासन- मे द्युलोक, पृथिवी, निमेष, मुहूर्त, दिन-रात आदि नामोसे कहा जानेवाला काल— ये सब विशेषरूपसे धारण किये हुए स्थित है । इसीके प्रशासनमे पूर्व और पश्चिमकी ओर बहनेवाली सब नदियों अपने-अपने निर्गम-स्थान पर्वतोसे निकल- कर बहती है।' इत्यादि । ( बृह० उ० ३ । ८ । ९ ) इस प्रकार उस अक्षरको सबपर भलीभाँति शासन करते हुए आकाशपर्यन्त सबको धारण करने- वाला बताया गया है । यह कार्य जड प्रकृतिका नहीं हो सकता । अतः वह सबको धारण करनेवाला अक्षरतत्त्व ब्रह्म ही है, अन्य कोई नहीं । सम्बन्ध—इसके सिवा— अन्यभावव्यावृत्तेश्च ॥ १ । ३ । १२ ॥ अन्यभावव्यावृत्तेः—यहाँ अक्षरमे अन्य ( प्रधान आदि ) के लक्षणोका निराकरण किया गया है, इसलिये; च=भी; 'अक्षर' शब्द ब्रह्मका ही वाचक है । व्याख्या—उक्त प्रसङ्गमे आगे चलकर कहा गया है —'वह अक्षर देखनेमे न आनेवाला, किन्तु स्वयं सबको देखनेवाला है, सुननेमे न आनेवाला, किन्तु स्वयं सुननेवाला है, मनन करनेमे न आनेवाला, किन्तु स्वयं मनन करनेवाला है; जाननेमे न आनेवाला, किन्तु स्वयं सबको भलीभाँति जाननेवाला है' इत्यादि । ( बृह० उ० ३। ८।११ ) इस प्रकार यहाँ उस अक्षरमे देखने, सुनने और जाननेमे आनेवाले प्रधान आदिके धर्मोका निराकरण किया गया है;* इसलिये भी 'अक्षर' शब्द विनाशशील जड

  • उपर्युक्त श्रुतिमे अक्षरको सर्वद्रष्टा बताकर उसमे प्रकृतिके जडत्व और जीवात्माके अल्पज्ञत्व आदि धर्मोंका निराकरण किया गया है ।

सूत्र ११-१३ ] अध्याय १ ५५

सूत्र ११-१३ ] अध्याय १ ५५ प्रकृतिका वाचक नहीं हो सकता । अतः यही सिद्ध होता है कि यहाँ 'अक्षर' नामसे परब्रह्मका ही प्रतिपादन किया गया है । सम्बन्ध-उपर्युक्त प्रकरणमे 'अक्षर' शब्दको परब्रह्मका वाचक सिद्ध किया गया । किन्तु प्रश्नोपनिषद् ( ५ । २-७ ) में ॐकार अक्षरको परब्रह्म और अपरब्रह्म दोनोंका प्रतीक बताया गया है । अतः वहाँ अक्षरको अपरब्रह्म भी माना जा सकता है, इस शङ्काकी निवृत्तिके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् सः ॥ १ । ३ । १३ ॥ ईक्षतिकर्मव्यपदेशात् = यहाँ परम पुरुषको 'ईक्षते' क्रियाका कर्म बताये जानेके कारण; सः = यह परब्रह्म परमेश्वर ही ( त्रिमात्रासम्पन्न 'ओम्' इस अक्षरके द्वारा चिन्तन करनेयोग्य बताया गया है ) । व्याख्या-इस सूत्रमे जिस मन्त्रपर विचार चल रहा है, वह इस प्रकार है- 'यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण परं पुरुषमभिध्यायीत स तेजसि सूर्ये सम्पन्नः । यथा पादोदरस्त्वचा विनिर्मुच्यत एवं ह वै स पाप्मना विनिर्मुक्तः स सामभिरुन्नीयते ब्रह्मलोकं स एतस्माज्जीवघनात् परात्परं पुरिशयं पुरुषमीक्षते ।' ( प्र० उ० ५ । ५ ) । अर्थात् 'जो तीन मात्राओवाले 'ओम्' रूप इस अक्षरके द्वारा ही इस परम पुरुषका निरन्तर ध्यान करता है, वह तेजोमय सूर्यलोकमे जाता है। तथा जिस प्रकार सर्प केचुलीसे अलग हो जाता है, ठीक उसी तरह, वह पापोंसे सर्वथा मुक्त हो जाता है । इसके बाद वह सामवेदकी श्रुतियोद्वारा ऊपर ब्रह्मलोकमे ले जाया जाता है। वह इस जीव-समुदायरूप परतत्त्वसे अत्यन्त श्रेष्ठ अन्तर्यामी परम पुरुष पुरुषोत्तमको साक्षात् कर लेता है।' इस मन्त्रमे जिसको तीनों मात्राओंसे सम्पन्न ॐकारके द्वारा ध्येय बतलाया गया है, वह पूर्ण- ब्रह्म परमात्मा ही है, अपरब्रह्म नहीं; क्योकि उस ध्येयको, जीव-समुदायके नामसे वर्णित हिरण्यगर्भरूप अपरब्रह्मसे अत्यन्त श्रेष्ठ बताकर 'ईक्षते' क्रियाका कर्म बतलाया गया है । सम्बन्ध-उपर्युक्त प्रकरणमें मनुष्यशरीररूप पुरमें शयन करनेवाले पुरुषको 'परब्रह्म परमात्मा सिद्ध किया गया है । किन्तु छान्दोग्योपनिषद् ( ८ । १ । १ ) में ब्रह्मपुरान्तर्गत दहर ( सूक्ष्म ) आकाशका वर्णन करके उसमे स्थित वस्तुको

जाननेके लिये कहा है। वह एकदेशीय वर्णन होनेके कारण जीवपरक हो सकता है। इसलिये यह जिज्ञासा होती है कि उक्त प्रकरणमें 'दहर' नामसे कहा हुआ तत्त्व क्या है ? इसपर कहते हैं— दहर उत्तरेभ्यः ॥ १ । ३ । १४ ॥ दहरः=उक्त प्रकरणमे 'दहर' शब्दसे जिस ज्ञेय तत्त्वका वर्णन किया गया है, वह ब्रह्म ही है; उत्तरेभ्यः=क्योकि उसके पश्चात् आये हुए वचनोसे यही सिद्ध होता है। व्याख्या—छान्दोग्य ( ८ । १ । १ ) मे कहा है कि 'अथ यदिदमस्मिन्ब्रह्म- पुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन्नन्तराकाशस्तस्मिन् यदन्तस्तदन्वेष्टव्यं तद् वाव विजिज्ञासितव्यम् ।' अर्थात् 'इस ब्रह्मके नगररूप मनुष्य-शरीरमे कमलके आकारवाला एक घर ( हृदय ) है, उसमे सूक्ष्म आकाश है। उसके भीतर जो वस्तु है, उसको जाननेकी इच्छा करनी चाहिये।' इस वर्णनमे जिसे ज्ञातव्य बताया गया है, वह 'दहर' शब्दका लक्ष्य परब्रह्म परमेश्वर ही है; क्योकि आगेके वर्णनमे इसीके भीतर समस्त ब्रह्माण्डको निहित बताया है तथा उसके विषयमे यह भी कहा है कि 'यह आत्मा, सब पापोसे रहित, जरामरणवर्जित, शोकशून्य, भूख-प्याससे रहित, सत्यकाम तथा सत्यसंकल्प है। इत्यादि ( ८ । १ । ५ ) । तदनन्तर आगे चलकर ( छा० उ० ८ । ३ । ४ मे ) कहा है कि 'यही आत्मा, अमृत, अभय और ब्रह्म है । इसीका नाम सत्य है।' इससे यही सिद्ध होता है कि यहाँ 'दहर' शब्द परब्रह्मका ही बोधक है। सम्बन्ध—प्रकारान्तरसे इसी बातको सिद्ध करते हैं— गतिशब्दाभ्यां तथा दृष्टं लिङ्गं च ॥ १ । ३ । १५ ॥ गतिशब्दाभ्याम्=ब्रह्ममे गतिका वर्णन और ब्रह्मवाचक शब्द होनेसे; तथा दृष्टम्=एवं दूसरी श्रुतियोमे ऐसा ही वर्णन देखा गया है; च=और; लिङ्गम्=इस वर्णनमे आये हुए लक्षण भी ब्रह्मके हैं; इसलिये यहाँ 'दहर' नामसे ब्रह्मका ही वर्णन हुआ है। व्याख्या—इस प्रसङ्गमे यह बात कही गयी है कि—'इमाः सर्वाः प्रजा अहरहर्गच्छन्त्य एतं ब्रह्मलोकं न विन्दन्त्यनृतेन हि प्रत्यूढाः ॥ ( छा० उ० ८।

सूत्र १४-१६ ] अध्याय १ ५७

सूत्र १४-१६ ] अध्याय १ ५७ ३ । २) अर्थात् 'ये जीव-समुदाय प्रतिदिन सुषुप्तिकालमे इस ब्रह्मलोकको जाते हैं, परन्तु असत्यसे आवृत रहनेके कारण उसे जानते नहीं हैं।' इस वाक्यमें प्रतिदिन ब्रह्मलोकमे जानेके लिये कहना, तो गतिका वर्णन है और उस 'दहर'को ब्रह्मलोक कहना उसका वाचक शब्द है । इन दोनो कारणोसे यह सिद्ध होता है कि यहाँ 'दहर' शब्द ब्रह्मका ही बोधक है । इसके सिवा दूसरी जगह (६ । ८ । १ मे) भी ऐसा ही वर्णन पाया जाता है--यथा--'सता सोम्य तदा सम्पन्नो भवति ।' अर्थात् 'हे सोम्य ! उस सुषुप्त-अवस्थामें जीव 'सत्' नामसे कहे जानेवाले परब्रह्म परमात्मासे संयुक्त होता है।' इत्यादि । तथा आगे बताये गये अमृत, अभय आदि लक्षण भी ब्रह्ममे ही सुसंगत होते हैं । इन दोनो कारणोंसे भी यही सिद्ध होता है कि यहाँ 'दहर' नामसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन है। सम्बन्ध-उपर्युक्त बातकी सिद्धिके लिये दूसरा कारण बताते हैं— धृतेश्च महिम्नोऽस्यास्मिन्नुपलब्धेः ॥ १ । ३ । १६ ॥ धृतेः = इस 'दहर' मे समस्त लोकोको धारण करनेकी शक्ति बतायी जानेके कारण; च=भी; (यह परब्रह्मका ही वाचक है) क्योकि अस्य = इसकी; महिम्नः = (समस्त लोकोको धारण करनेकी सामर्थ्यरूप) महिमाका; अस्मिन् = इस परब्रह्म परमात्मामे होना; उपलब्धेः = अन्य श्रुतियोंमे भी पाया जाता है, इसलिये ( 'दहर' नामसे ब्रह्मका वर्णन मानना सर्वथा उचित है) । व्याख्या-छान्दोग्य (८ । ४ । १) में कहा गया है कि 'अथ य आत्मा स सेतुर्विधृतिरेषां लोकानाम् ।' अर्थात् 'यह जो आत्मा है, वही इन सब लोकोको धारण करनेवाला सेतु है।' इस प्रकार यहाँ उस 'दहर' शब्दवाच्य आत्मामे समस्त लोकोको धारण करनेकी शक्तिका वर्णन होनेके कारण 'दहर' यहाँ परमात्माका ही वाचक है; क्योकि दूसरी श्रुतियोंमे भी परमेश्वरमे ऐसी महिमा होनेका वर्णन इस प्रकार उपलब्ध होता है—'एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि सूर्याचन्द्रमसौ विधृतौ तिष्ठतः ।' (बृह० उ० ३ । ८ । ९) अर्थात् 'हे गार्गि ! इस अक्षर' परमात्माके ही शासनमे रहकर सूर्य और चन्द्रमा भलीभाँति धारण किये हुए स्थित

५८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ हैं।' इत्यादि। इसके सिवा यह भी कहा है कि 'एष सर्वेश्वर एष भूताधिपतिरेष भूतपाल एष सेतुर्विधरण एषां लोकानामसंभेदाय ।' ( बृह० उ० ४ । ४ । २२ ) अर्थात् 'यह सबका ईश्वर है, यह सम्पूर्ण प्राणियोंका स्वामी है, यह सब भूतोंका पालन-पोषण करनेवाला है, तथा यह इन समस्त लोकोंको विनाशसे बचानेके लिये उनको धारण करनेवाला सेतु है ।' परब्रह्मके अतिरिक्त अन्य कोई भी इन सम्पूर्ण लोकोंको धारण करनेमे समर्थ नहीं हो सकता; इसलिये यहाँ 'दहर' नामसे परब्रह्म परमेश्वरका ही वर्णन है। सम्बन्ध-अब दूसरा हेतु देकर उसी बातकी पुष्टि करते हैं- प्रसिद्धेश्च ॥ १ । ३ । १७ ॥ प्रसिद्धेः=आकाश शब्द परमात्माके अर्थमे प्रसिद्ध है । इस कारण; च= भी ( 'दहर' नाम परब्रह्मका ही है ) । व्याख्या-श्रुतिमे 'दहराकाश' नाम आया है । आकाश शब्द परमात्माके अर्थमे प्रसिद्ध है। यथा-'को ह्येवान्यात् कः प्राण्याद् यदेष आकाश आनन्दो न स्यात् ।' ( तै० उ० २ । ७ । १ ) अर्थात् 'यदि यह आनन्दस्वरूप आकाश सबको ( अवकाश देनेवाला परमात्मा ) न होता तो कौन जीवित रह सकता ? कौन प्राणोंकी क्रिया कर सकता ?" तथा-'सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते ।' ( छा० उ० १ । ९ । १) । अर्थात् 'निश्चय ही ये सब प्राणी आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं ।' इसलिये भी 'दहर' शब्द परब्रह्म परमात्माका ही वाचक है । सम्बन्ध-अब 'दहर' शब्दसे जीवात्माका ग्रहण क्यों न किया जाय-यह शङ्का उठाकर समाधान करते हैं- इतरपरामर्शात् स इति चेन्नासंभवात् ॥ १ । ३ । १८ ॥ चेत्=यदि कहो; इतरपरामर्शात्=दूसरे अर्थात् जीवात्माका सङ्केत होनेके कारण; सः=वही 'दहर' नामसे कहा गया है; इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; असंभावात्=क्योंकि वहाँ कहे हुए लक्षण जीवात्मामे सम्भव नहीं है । व्याख्या-छान्दोग्योपनिषद् ( ८ । १ । ५ ) मे इस प्रकार वर्णन आया है- 'स ब्रूयान्नास्य जरयैतज्जीर्यति न वधेनास्य हन्यत एतत्सत्यं ब्रह्मपुरमस्मिन्

सूत्र १७—१९ ] अध्याय १ ५९

सूत्र १७—१९ ] अध्याय १ ५९ कामाः समाहिता एष आत्मापहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पो यथा ह्येवेह प्रजा अन्वाविशन्ति यथानुशासनं यं यमन्तमभिकामा भवन्ति यं जनपदं यं क्षेत्रभागं तं तमेवोपजीवन्ति ।' अर्थात् '( शिष्योंके पूछनेपर ) आचार्य इस प्रकार कहे कि 'इस ( देह ) की जरावस्थासे यह जीर्ण नहीं होता, इसके वधसे इसका नाश नहीं होता । यह ब्रह्मपुर सत्य है । इसमे सम्पूर्ण कामनाएँ सम्यक् प्रकारसे स्थित हैं । यह आत्मा पुण्य-पापसे रहित, जरा-मृत्युसे शून्य, शोकहीन, भूख-प्याससे रहित, सत्यकाम तथा सत्यसङ्कल्प है । जैसे इस लोकमे प्रजा यदि राजाकी आज्ञाका अनुसरण करती है तो वह जिस-जिस वस्तुकी कामना तथा जिस-जिस जनपद एवं क्षेत्रभागकी अभिलाषा करती है, उसी-उसीको पाकर सुखपूर्वक जीवन धारण करती है ।' इस मन्त्रके अनुसार 'देहकी जरावस्थासे यह जीर्ण नहीं होता और इसके वधसे इसका नाश नहीं होता'—इस कथनसे जीवात्माको लक्ष्य करनेवाला संकेत मिलता है । क्योंकि इसके आगेवाले मन्त्रमे कर्मफलकी अनित्यता बतायी गयी है, और कर्मफल-भोगका सम्बन्ध जीवात्मासे ही है । इस प्रकार जीवात्माको लक्ष्य करनेवाला संकेत होनेके कारण यहाँ 'दहर' नामसे 'जीवात्मा'का ही प्रतिपादन है, ऐसा कहा जाय तो यह ठीक नहीं है; क्योकि पूर्वोक्त मन्त्रमें ही जो 'सत्यसङ्कल्प' आदि लक्षण बताये गये हैं, वे जीवात्मामे होने सम्भव नहीं हैं, इसलिये यहाँ 'दहर' शब्दसे परब्रह्म परमात्माका ही वर्णन हुआ है, ऐसा मानना सर्वथा उचित है । सम्बन्ध—पूर्वोक्त मतकी ही पुष्टिके लिये पुनः शङ्का उठाकर उसका समाधान करते हैं— उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु ॥ १ । ३ । १९ ॥ चेत् = यदि कहो; उत्तरात् = उसके बादवाले वर्णनसे भी 'दहर' शब्द जीवात्माका ही बोधक सिद्ध होता है; तु = तो यह कथन ठीक नहीं है, ( क्योकि ) आविर्भूतस्वरूपः = उस मन्त्रमे जिसका वर्णन है, वह अपने शुद्धस्वरूपको प्राप्त हुआ आत्मा है । व्याख्या—'छान्दोग्योपनिषद् ( ८ । ३ । ४ ) मे कहा है कि 'अथ य एष संप्रसादोऽस्माच्छरीरात्समुत्थाय परं ज्योतिरुपसंपद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यत

६० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति तस्य ह वा एतस्य ब्रह्मणो नाम सत्यम् ।' अर्थात् 'यह जो संप्रसाद है, वह इस शरीरसे निकलकर परम ज्योतिको प्राप्त हो अपने शुद्ध स्वरूपसे सम्पन्न हो जाता है । यह आत्मा है, यह अमृत एवं अभय है और यही ब्रह्म है—ऐसा आचार्यने कहा । उस इस ब्रह्मका नाम सत्य है ।' इस मन्त्रमे 'संप्रसाद'के नामसे स्पष्ट ही जीवात्माका वर्णन है और उसके लिये भी वे ही अमृत, अभय आदि विशेषण दिये गये हैं, जो अन्यत्र ब्रह्मके लिये आते हैं; इसलिये इन लक्षणोंका जीवात्मामे होना असंभव नहीं है, अतएव 'दहर' शब्द- को 'जीवात्मा'का वाचक माननेमे कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिये ।'' ऐसी शङ्का उठायी जाय तो ठीक नहीं है, क्योंकि उक्त मन्त्रमे अपने शुद्ध स्वरूपको प्राप्त हुए जीवात्माके लिये वैसे विशेषण आये है । इसलिये उसके आधारपर 'दहर' शब्दको जीवात्माका वाचक नहीं माना जा सकता । सम्बन्ध—यदि ऐसी बात है, तो उक्त प्रकरणमे जीवात्माको लक्ष्य करानेवाले शब्दोंका प्रयोग क्यों किया गया है ? ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते है— अन्यार्थश्च परामर्शः ॥ १ । ३ । २० ॥ परामर्शः=( उक्त प्रकरणमे ) जीवात्माको लक्ष्य करानेवाला संकेत; च=भी; अन्यार्थः=दूसरे ही प्रयोजनके लिये है । व्याख्या—पूर्वोक्त प्रकरणमें जो जीवात्माको लक्ष्य करानेवाले शब्दोंका प्रयोग हुआ है, वह 'दहर' शब्दसे जीवात्माका ग्रहण करानेके लिये नहीं, अपितु दूसरे ही प्रयोजनसे है । अर्थात् उस दहर शब्दवाच्य परमात्माके यथार्थ स्वरूपका ज्ञान हो जानेपर जीवात्मा भी वैसे ही गुणोवाला बन जाता है, यह भाव प्रदर्शित करनेके लिये ही वहाँ जीवात्माका उस रूपमे वर्णन है । परब्रह्मका ज्ञान हो जानेपर बहुत-से दिव्य गुण जीवात्मामें आ जाते हैं, यह बात भगवद्गीतामे भी कही गयी है ( १४ । २ ) । इसलिये उक्त प्रकरणमे जीवात्माका वर्णन आ जाने- मात्रसे यह नहीं सिद्ध होता कि वहाँ 'दहर' शब्द जीवात्माका वाचक है । सम्बन्ध—इसी बातकी सिद्धिके लिये सूत्रकार पुनः शङ्का उठाकर उसका समाधान करते हैं— अल्पश्रुतेरिति चेत्तदुक्तम् ॥ १ । ३ । २१ ॥ चेत्=यदि कहो; अल्पश्रुतेः=श्रुतिमे 'दहर'को बहुत छोटा बताया गया

सूत्र २०-२३ ] अध्याय १ ६१

सूत्र २०-२३ ] अध्याय १ ६१ है, इसलिये; ( 'दहर' शब्दसे यहाँ जीवात्माका ही ग्रहण है ) इति=ऐसा मानना चाहिये; तदुक्तम्=तो इसका उत्तर दिया जा चुका है । व्याख्या-‘श्रुतिमे दहराकाशको अत्यन्त अल्प ( लघु ) बताया गया है । इससे भी यही सिद्ध होता है कि वह जीवात्मा है; क्योकि उसीका स्वरूप ‘अणु’ माना गया है ।'' परन्तु ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये; क्योकि, इसका उत्तर पहले ( सूत्र १ । २ । ७ मे ) दिया जा चुका है । अतः वारम्बार उसीको दुहराने- की आवश्यकता नहीं है । सम्बन्ध-पूर्वसूत्रमे उठायी हुई शङ्काका उत्तर प्रकारान्तरसं दिया जाता है- अनुकृतेस्तस्य च ॥ १ । ३ । २२ ॥ तस्य=उस जीवात्माका; अनुकृतेः=अनुकरण करनेके कारण; च=भी; ( परमात्माको अल्प परिमाणवाला कहना उचित है ) । व्याख्या-मनुष्यके हृदयका माप अङ्गुष्ठके बराबर माना गया है; उसीमे जीवात्माके साथ परमात्माके प्रविष्ट होनेकी बात श्रुतिमे इस प्रकार बतायी गयी है- 'ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे ।' ( क० उ० १ । ३ । १ ) अर्थात् 'शुभ कर्मोंके फलरूप मनुष्य-शरीरमे परब्रह्मके निवास-स्थानरूप हृदयाकाशके अन्तर्गत बुद्धिरूप गुहामे छिपे हुए सत्यका पान करनेवाले दो ( जीवात्मा और परमात्मा ) है ।' 'तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् ।' ( तै० उ० २ । ६ ) 'परमात्मा उस जड-चेतनात्मक संपूर्ण जगत्‌की रचना करके स्वयं भी जीवात्माके साथ उसमें प्रविष्ट हो गया ।' तथा-'सेयं देवतेमास्तिस्रो देवता अनेनैव जीवेनात्मनानुप्रविश्य नामरूपे व्याकरोत् ।' ( छा० उ० ६ । ३ । ३ ) 'उस परमात्माने त्रिविध तत्त्वरूप देवता अर्थात् उनके कार्यरूप मनुष्य- शरीरमे जीवात्माके सहित प्रविष्ट होकर नाम-रूपका विस्तार किया ।' इत्यादि । इस प्रकार उस परमात्माको जीवात्माका अनुकरण करनेवाला बताया जानेके कारण भी उसे अल्प परिमाणवाला कहना सर्वथा उचित ही है । इसी भावको लेकर वेदोमे जगह-जगह परमात्माका स्वरूप 'अणोरणीयान्'-छोटे-से-छोटा तथा 'महतो महीयान्'-बडे-से-बड़ा बताया गया है । सम्बन्ध-इस विषयमे स्मृतिका भी प्रमाण देते हैं- अपि च स्मर्यते ॥ १ । ३ । २३ ॥

६२ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ च=इसके सिवा; स्मर्यते अपि=यही बात स्मृतिमे भी कही गयी है । व्याख्या—परब्रह्म परमेश्वर सबके हृदयमे स्थित है और वह छोटे-से भी छोटा है—ऐसा वर्णन स्मृतियोंमें इस प्रकार आया है—'सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः।' ( गीता १५। १५ ) । 'हृदि सर्वस्य विष्ठितम्।' ( गीता १३। १७ ) । 'ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।' ( गीता १८। ६१ ) । 'अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्।' ( गीता १३। १६ ) । 'अणोरणीयांसम्।' ( गीता ८। ९) इत्यादि। ऐसा वर्णन होनेके कारण उस सर्वव्यापी परब्रह्म परमेश्वरको स्थानकी अपेक्षासे छोटे आकारवाला कहना उचित ही है । अतः 'दहर' शब्दसे परब्रह्म परमेश्वरका ही वर्णन है, जीवात्माका नहीं। सम्बन्ध—उपर्युक्त विवेचन पढकर यह जिज्ञासा होती है कि कठोपनिषद् ( २। १ । १२, १३ तथा २ । ३ । १७ ) में जिसे अङ्गुष्ठके बराबर बताया गया है, वह जीवात्मा हे या परमात्मा ? अतः इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— शब्दादेव प्रमितः ॥ १ । ३ । २४ ॥ शब्दात्=( उक्त प्रकरणमे आये हुए ) शब्दसे; एव=ही; ( यह सिद्ध होता है कि ) प्रमितः=अङ्गुष्ठमात्र परिमाणवाला पुरुष ( परमात्मा ही है ) । व्याख्या—कठोपनिषद्मे कहा है कि 'अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य आत्मनि तिष्ठति।' ( २ । १ । १२ ) तथा 'अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः । ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः ॥' ( २ । १ । १३ ) । अर्थात् 'अङ्गुष्ठके बराबर मापवाला परम पुरुष शरीरके मध्यभाग ( हृदय ) में स्थित है।' तथा अङ्गुष्ठके बराबर मापवाला परम पुरुष धूमरहित ज्योतिकी भाँति एकरस है, वह भूत, वर्तमान और भविष्यपर शासन करनेवाला है । वह आज भी है और कल भी रहेगा; अर्थात् वह नित्य सनातन है।' इस प्रकरणमे जिसे अङ्गुष्ठके बराबर मापवाला पुरुष बताया गया है, वह परब्रह्म परमात्मा ही है; यह बात उन्हीं मन्त्रोमे कहे हुए शब्दोंसे सिद्ध होती है । क्योंकि वहाँ उस पुरुषको भूत, वर्तमान और भविष्यमे होनेवाली समस्त प्रजाका शासक, धूमरहित अग्निके सदृश एकरस और सदा रहनेवाला बताया गया है तथा आगे चलकर उसीको विशुद्ध अमृतस्वरूप जाननेके लिये कहा गया है ( २ । ३ । १७ ) ।

सूत्र २४—२६ ] अध्याय १ ६३

सूत्र २४—२६ ] अध्याय १ ६३ सम्बन्ध—अब यह जिज्ञासा होती है कि उस परब्रह्म परमात्माको अङ्गुष्ठके बराबर मापवाला क्यों बताया गया है ? इसपर कहते हैं— हृद्यपेक्षया तु मनुष्याधिकारत्वात् ॥ १ । ३ । २५ ॥ तु=उस परमपुरुषको अङ्गुष्ठके बराबर मापवाला कहना तो; हृदि= हृदयमे स्थित बताये जानेकी; अपेक्षया=अपेक्षासे है; मनुष्याधिकारत्वात्= क्योकि ( ब्रह्मविद्यामे ) मनुष्यका ही अधिकार है । व्याख्या—उपनिषदोंमे वर्णित ब्रह्मविद्याके द्वारा ब्रह्मको जाननेका अधिकार मनुष्यको ही है । अन्य पशु-पक्षी आदि अधम योनियोंमे यह जीवात्मा उस परब्रह्म परमात्माको नहीं जान सकता और मनुष्यके हृदयका माप अङ्गुष्ठके बराबर माना गया है; इस कारण यहाँ मनुष्य-हृदयके मापकी अपेक्षासे उस परब्रह्म परमेश्वरको 'अङ्गुष्ठमात्र पुरुष' कहा गया है । सम्बन्ध—पूर्वसूत्रमें अधिकारकी बात आ जानेसे प्रसङ्गवश दूसरा प्रकरण चल पड़ा । पहले यह बताया गया है कि वेदाध्ययनपूर्वक ब्रह्मविद्याके द्वारा ब्रह्मको प्राप्त करनेका अधिकार मनुष्योंका ही है । इसपर यह जिज्ञासा होती है कि क्या मनुष्यको छोड़कर अन्य किसीका भी अधिकार नहीं है ? इसपर कहते हैं— तदुपर्यपि बादरायणः संभवात् ॥ १ । ३ । २६ ॥ बादरायणः=आचार्य बादरायण कहते है कि; तदुपरि=मनुष्यसे ऊपर जो देवता आदि हैं, उनका; अपि=भी ( अधिकार है ), संभवात्=क्योकि उन्हें वेद-ज्ञानपूर्वक ब्रह्मज्ञान होना संभव है । व्याख्या—मनुष्यसे नीचेकी योनियोमे तो वेदविद्याको पढ़ने तथा उसके द्वारा परमात्म-ज्ञान प्राप्त करनेकी सामर्थ्य ही नहीं है, इसलिये उनका अधिकार न बतलाना तो उचित ही है । परन्तु देवादि योनि मनुष्ययोनिसे ऊपर है । जो मनुष्य धर्म तथा ज्ञानमे श्रेष्ठ होते हैं, उन्हींको देवादि योनि प्राप्त होती है । अतः उनमे पूर्वजन्मके अभ्याससे ब्रह्मविद्याको जाननेकी सामर्थ्य होती ही है । अतएव साधन करनेपर उन्हे ब्रह्मका ज्ञान होना सम्भव है । इसलिये भगवान् बादरायणका कहना है कि मनुष्योंसे ऊपरवाली योनियोंमे भी ब्रह्मज्ञान प्राप्त करनेका अधिकार है ।

६४ वेदान्त-दर्शन [ पाद-३ सम्बन्ध—उपर्युक्त बातकी सिद्धिके लिये ही सूत्रकार स्वयं शङ्का उठाकर उसका समाधान करते हैं— विरोधः कर्मणीति चेन्नानेकप्रतिपत्तेर्दर्शनात् ॥ १ । ३ । २७ ॥ चेत्=यदि कहो (देवता आदिको शरीरधारी मान लेनेसे); कर्मणि=यज्ञादि कर्ममे; विरोधः=विरोध आता है; इति न=तो यह कथन ठीक नहीं है; अनेकप्रतिपत्तेः=क्योकि उनके द्वारा एक ही समय अनेक रूप धारण करना संभव है; दर्शनात्=शास्त्रमें ऐसा देखा गया है । व्याख्या—"यदि देवता आदिको भी मनुष्योके समान विशेष आकृतियुक्त या शरीरधारी मान लिया जायगा तो वे एक देशमे ही रहनेवाले माने जा सकते है । ऐसी दशामे एक ही समय अनेक यज्ञोमें उनके निमित्त दी जानेवाली हविष्यकी आहुतिको वे कैसे ग्रहण कर सकते हैं । अतः पृथक्-पृथक् अनेक याज्ञिकोंद्वारा एक समय यज्ञादि कर्ममे जो उनके लिये हवि समर्पित करनेका विधान है, उसमे विरोध आवेगा । इस विरोधकी निवृत्ति तभी हो सकती है, जब देवताओंको एकदेशीय न मानकर व्यापक माना जाय ।' परन्तु ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये; क्योंकि देवोमे अनेक विग्रह धारण करनेकी सहज शक्ति होती है । अतः वे योगीकी भाँति एक ही कालमे अनेक शरीर धारण करके अनेक स्थानोमे एक साथ उनके लिये समर्पित की हुई हविको ग्रहण कर सकते है । शास्त्रमे भी देवताओंके सम्बन्धमे ऐसा वर्णन देखा जाता है । बृहदारण्यकोपनिषद् (३।९।१-२) मे एक प्रसङ्ग आता है, जिसमें शाकल्य तथा याज्ञवल्क्यका संवाद है । शाकल्यने पूछा—'देवता कितने है ?' याज्ञवल्क्य बोले—'तीन और तीन सौ तथा तीन और तीन सहस्र ।' फिर प्रश्न हुआ 'कितने देवता है ?' उत्तर मिला—'तैंतीस ।' बार-बार प्रश्नोत्तर होनेपर अन्तमे याज्ञवल्क्यने कहा—'ये सब तो इनकी महिमा हैं अर्थात् ये एक-एक ही अनेक हो जाते है । वास्तवमें देवता तैंतीस ही है ।' इत्यादि । इस प्रकार श्रुतिने देवताओमे अनेक रूप धारण करनेकी शक्तिका वर्णन किया है । योगियोमे भी ऐसी शक्ति देखी जाती है; इसलिये कोई विरोध नहीं है । सम्बन्ध—देवताओंको शरीरधारी माननेसे उन्हे विनाशशील मानना पड़ेगा; ऐसी दशामें वेदोंमें जिन-जिन देवताओंका वर्णन आता है, उनकी नित्यता नहीं

सूत्र २७-२८ ] अध्याय १ ६५

सूत्र २७-२८ ] अध्याय १ ६५ सिद्ध होगी और इसीलिये वेदको भी नित्य एवं प्रमाणभूत नहीं माना जा सकेगा; इस विरोधका परिहार कैसे हो ? ऐसी जिज्ञासा होनेपर कहते हैं— शब्द इति चेन्नातः प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम् ॥ १ । ३ । २८ ॥ चेत्=यदि कहो; शब्दे=( देवताको शरीरधारी माननेपर ) वैदिक शब्दमे विरोध आता है; इति न=तो ऐसा कहना ठीक नहीं है; अतः प्रभवात्=क्योंकि इस वेदोक्त शब्दसे ही देवता आदि जगत्की उत्पत्ति होती है; प्रत्यक्षानु- मानाभ्याम्=यह बात प्रत्यक्ष ( वेद ) और अनुमान ( स्मृति ) दोनो प्रमाणोंसे सिद्ध होती है। व्याख्या—"देवताओमे अनेक शरीर धारण करनेकी शक्ति मान लेनेसे कर्ममे विरोध नहीं आता, यह तो ठीक है; परन्तु ऐसा माननेसे जो वेदोक्त शब्दोंको नित्य एवं प्रमाणभूत माना जाता है, उसमे विरोध आवेगा; क्योकि शरीरधारी होनेपर देवताओको भी जन्म-मरणशील मानना पड़ेगा। ऐसी दशामे वे नित्य नहीं होंगे तथा नित्य वैदिक शब्दोके साथ उनके नाम-रूपोका नित्य सम्बन्ध भी नहीं रह सकेगा।" ऐसी शङ्का नहीं करनी चाहिये; क्योकि जहाँ कल्पके आदिमे देवादिकी उत्पत्तिका वर्णन आता है, वहाँ यह बताया गया है कि 'किस रूप और ऐश्वर्यवाले देवताका क्या नाम होगा।' इस प्रकार वेदोक्त शब्दसे ही उनके नाम, रूप और ऐश्वर्य आदिकी कल्पना की जाती है अर्थात् पूर्वकल्पमे जितने देवता, जिस-जिस नाम, रूप तथा ऐश्वर्यवाले थे, वर्तमान कल्पमें भी उतने ही देवता वैसे ही नाम, रूप और ऐश्वर्यसे युक्त उत्पन्न किये जाते हैं। इससे यह ज्ञात होता है कि कल्पान्तरमे देवता आदिके जीव तो बदल जाते हैं, परन्तु नाम-रूप पूर्वकल्पके अनुसार ही रहते हैं। यह बात प्रत्यक्ष ( श्रुति ) और अनुमान ( स्मृति ) के प्रमाणसे भी सिद्ध है। श्रुतियो और स्मृतियोमे उपर्युक्त बातका वर्णन इस प्रकार आता है—'स भूरिति व्याहरत् स भूमिमसृजत' 'स भुवरिति व्याहरत् सोऽन्तरिक्षमसृजत।' ( तै० ब्रा० २ । २ । ४ । २ ) 'उसने मन-ही-मन 'भूः' का उच्चारण किया, फिर भूमिकी सृष्टि की।' 'उसने मनमे 'भुवः' का उच्चारण किया, फिर अन्तरिक्षकी सृष्टि की।' इत्यादि। इस वर्णनसे यह सिद्ध होता है कि प्रजापतिने पहले वाचक शब्दका स्मरण करके उसके अर्थभूत स्वरूपका निर्माण किया। इसी प्रकार स्मृतिमे भी कहा है— वे० द० ५—

६६ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक् । वेदशब्देभ्य एवादौ पृथक् संस्थाश्च निर्ममे ॥ ( मनु० १ । २१ ) 'उन सृष्टिकर्ता परमात्माने पहले सृष्टिके प्रारम्भमे सबके नाम और पृथक्- पृथक् कर्म तथा उन सबकी अलग-अलग व्यवस्थाएँ भी वेदोक्त शब्दोके अनुसार ही बनायीं ।' सम्बन्ध—उपर्युक्त कथनको ही वेदकी नित्यतामे हेतु बतलाते हैं— अतएव च नित्यत्वम् ॥ १ । ३ । २९ ॥ अतएव=इसीसे; नित्यत्वम्=वेदकी नित्यता; च=भी; ( सिद्ध होती है )। व्याख्या—सृष्टिकर्त्ता परमेश्वर वैदिक शब्दोके अनुसार ही समस्त जगत्‌की रचना करते हैं, यह कहा गया है। इससे वेदोकी नित्यता स्वतः सिद्ध हो जाती है; क्योकि प्रत्येक कल्पमे परमेश्वरद्वारा वेदोकी भी नयी रचना की जाती है; यह बात कहीं नहीं कही गयी है। सम्बन्ध—प्रत्येक कल्पमें देवताओके नाम-रूप बदल जानेके कारण वेदोक्त शब्दोंकी नित्यतामें विरोध कैसे नही आयेगा ? इस जिज्ञासापर कहते है— समाननामरूपत्वाच्चावृत्तावप्यविरोधो दर्शनात् स्मृतेश्च ॥ १ । ३ । ३० ॥ च=तथा; समाननामरूपत्वात्=( कल्पान्तरमे उत्पन्न होनेवाले देवादिको- के ) नाम-रूप पहलेके ही समान होते है, इस कारण; आवृत्तौ=पुनः आवृत्ति होनेपर; अपि=भी; अविरोधः=किसी प्रकारका विरोध नहीं है; दर्शनात्= क्योकि ( श्रुतिमे ) ऐसा ही वर्णन देखा गया है; च=और; स्मृतेः=स्मृतिसे भी ( यही बात सिद्ध होती है )। व्याख्या—वेदमें यह कहा गया है कि 'सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वम- कल्पयत् ।' ( ऋ० १० । १९० । ३ ) अर्थात् 'जगत्-स्रष्टा परमेश्वरने सूर्य, चन्द्रमा आदि सबको पहलेकी भाँति बनाया।' श्वेताश्वतरोपनिषद् ( ६ । १८ ) मे इस प्रकार वर्णन आता है— यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै । त५ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥

सूत्र २९—३१ ] अध्याय १ ६७

सूत्र २९—३१ ] अध्याय १ ६७ 'जो परमेश्वर निश्चय ही, सृष्टिकालमें सबसे पहले ब्रह्माको उत्पन्न करता है और उन्हें समस्त वेदोंका उपदेश देता है, उस आत्मज्ञानविषयक बुद्धिको प्रकट करनेवाले प्रसिद्ध देव परमेश्वरकी मैं मुमुक्षुभावसे शरण ग्रहण करता हूँ।' इसी प्रकार स्मृतिमें भी कहा गया है कि— तेषां ये यानि कर्माणि प्राक्सृष्ट्या प्रतिपेदिरे । तान्येव ते प्रपद्यन्ते सृज्यमाना पुनः पुनः ॥ ( महा० ) 'पूर्वकल्पकी सृष्टिमें जिन्होंने जिन कर्मोंको अपनाया था, बादकी सृष्टिमें बारंबार रचे हुए वे प्राणी फिर उन्हीं कर्मोंको प्राप्त होते हैं।' इस प्रकार श्रुतियों तथा स्मृतियोंके वर्णनसे यह सिद्ध होता है कि कल्पान्तर- में उत्पन्न होनेवाले देवादिकोंके नाम, रूप पहलेके सदृश ही वेद-वचनानुसार रचे जाते हैं; इसलिये उनकी बार-बार आवृत्ति होती रहनेपर भी वेदोंकी नित्यता तथा प्रामाणिकतामें किसी प्रकारका विरोध नहीं आता है। सम्बन्ध—२६ वें सूत्रमें जो प्रसङ्गवश यह बात कही गयी थी कि ब्रह्म- विद्यामें देवादिका भी अधिकार है, ऐसा वेदव्यासजी मानते हैं, उसीकी पुष्टि तीसवें सूत्रतक की गयी। अब आचार्य जैमिनिके मतानुसार यह बात कही जाती है कि ब्रह्मविद्यामें देवता आदिका अधिकार नहीं है— मध्वादिष्वसंभवादनधिकारं जैमिनिः ॥ १ । ३ । ३१ ॥ जैमिनिः=जैमिनि नामक आचार्य; मध्वादिषु=मधु-विद्या आदिमें; अनधिकारम् (आह) =देवता आदिका अधिकार नहीं बताते हैं; असंभवात्= क्योंकि यह संभव नहीं है। व्याख्या—छान्दोग्योपनिषद्‌के तीसरे अध्यायमें प्रथमसे लेकर ग्यारहवें खण्डतक मधुविद्याका प्रकरण है। यहाँ 'सूर्य' को देवताओंका 'मधु' बताया गया है। मनुष्योंके लिये साधनद्वारा प्राप्त होनेवाली वस्तु देवताओंको स्वतः प्राप्त है, इस कारण देवताओंके लिये मधु-विद्या अनावश्यक है; अतः उस विद्यामें उनका अधिकार मानना सम्भव नहीं है। इसी प्रकार स्वर्गादि देवलोकके भोगोंकी प्राप्तिके लिये जो वेदोंमें यज्ञादिके द्वारा देवताओंकी सकाम उपासनाका वर्णन है, उसका अनुष्ठान भी देवताओंके लिये अनावश्यक होनेके कारण उनके द्वारा किया जाना सम्भव नहीं है। अतएव उसमें भी उनका अधिकार नहीं है,

६८ वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ इसलिये यह सिद्ध होता है कि जैसे मनुष्योंके लिये यज्ञादि कर्मद्वारा स्वर्गादिकी प्राप्ति करानेवाली वेदवर्णित विद्याओंमें देवताओंका अधिकार नहीं है, उसी प्रकार ब्रह्मविद्यामे भी उनका अधिकार नहीं है । यों आचार्य जैमिनि कहते हैं । सम्बन्ध—इसी बातको पुष्ट करनेके लिये आचार्य जैमिनि दूसरी युक्ति देते हैं— ज्योतिषि भावाच्च ॥ १ । ३ । ३२ ॥ ज्योतिषि=ज्योतिर्मय लोकोमें; भावात्=देवताओंकी स्थिति होनेके कारण; च=भी; ( उनका यज्ञादि कर्म और ब्रह्मविद्यामें अधिकार नहीं है ) । व्याख्या—वे देवता स्वभावसे ही ज्योतिर्मय देवलोकोंमें निवास करते हैं, वहाँ उन्हें स्वभावसे ही सब प्रकारका ऐश्वर्य प्राप्त है; नये कर्मोंद्वारा उनको किसी प्रकारका नूतन ऐश्वर्य नहीं प्राप्त करना है; अतएव उन सब लोकोंकी प्राप्तिके लिये बताये हुए कर्मोंमें उनकी प्रवृत्ति सम्भव नहीं है; इसलिये जिस प्रकार वेदविहित अन्य विद्याओंमें उनका अधिकार नहीं है, उसी प्रकार ब्रह्मविद्यामें भी नहीं है । सम्बन्ध—पूर्वोक्त दो सूत्रोंसे जैमिनिके मतानुसार पूर्वपक्षकी स्थापना की गयी । अब उसके उत्तरमें सूत्रकार अपना निश्चित मत बतलाकर देवताओंके अधिकारविषयक प्रकरणको समाप्त करते हैं— भावं तु बादरायणोऽस्ति हि ॥ १ । ३ । ३३ ॥ तु=किन्तु; बादरायणः=बादरायण आचार्य ( यज्ञादि कर्म तथा ब्रह्म- विद्यामें ) देवता आदिके भी अधिकारका; भावम् ( मन्यते ) =भाव ( अस्तित्व ) मानते हैं; हि=क्योकि; अस्ति=श्रुतिमे ( उनके अधिकारका ) वर्णन है । व्याख्या—बादरायण आचार्य अपने मतका दृढ़तापूर्वक प्रतिपादन करते हुए 'तु' इस अव्यय पदके द्वारा यह सूचित करते हैं कि पूर्वपक्षीका मत शब्द- प्रमाणसे रहित होनेके कारण मान्य नहीं है । निश्चय ही यज्ञादि कर्म तथा ब्रह्म- विद्यामे देवताओंका भी अधिकार है; क्योकि वेदमें उनका यह अधिकार सूचित करनेवाले वचन मिलते हैं । जैसे—'प्रजापतिरकामयत प्रजायेयेति स एतदग्नि-

सूत्र ३२-३४ ] अध्याय १ ६९

सूत्र ३२-३४ ] अध्याय १ ६९ होत्रं मिथुनमपश्यत् । तदुदिते सूर्येऽजुहोत् ।' (तै० ब्रा० २ । १ । २ । ८ ) तथा 'देवा वै सत्रमासत ।' ( तै० सं० २ । ३ । ३ ) अर्थात् 'प्रजापतिने इच्छा की कि मैं प्रजारूपसे उत्पन्न होऊँ' उन्होंने अग्निहोत्ररूप मिथुनपर दृष्टिपात किया और सूर्योदय होनेपर उसका हवन किया।' तथा 'निश्चय ही देवताओने यज्ञका अनुष्ठान किया।' इत्यादि वचनोंद्वारा देवताओका कर्माधिकार सूचित होता है। इसी प्रकार ब्रह्मविद्यामे देवताओका अधिकार बतानेवाले वचन ये है—'तद् यो देवानां प्रत्यबुध्यत स एव तदभवत् ।' ( बृह० १ । ४ । १० ) अर्थात् 'देवताओंमेंसे जिसने उस ब्रह्मको जान लिया, वही वह ब्रह्म हो गया।' इत्यादि । इसके सिवा, छान्दोग्योपनिषद्मे ( ८ । ७ । २ से ८ । १२ । ६ तक ) यह प्रसङ्ग आता है कि इन्द्र और विरोचनने ब्रह्माजीकी सेवामे रहकर बहुत वर्षोंतक ब्रह्मचर्य पालन करनेके पश्चात् ब्रह्मविद्या प्राप्त की। इन सब प्रमाणोंसे यही सिद्ध होता है कि देवता आदिका भी कर्म और ब्रह्मविद्यामे अधिकार है। सम्बन्ध—यहाँ यह जिज्ञासा होती है कि क्या सभी वर्णके मनुष्योंका वेदविद्यामें अधिकार है ? क्योंकि छान्दोग्योपनिषद्में ऐसा वर्णन मिलता है कि रैक्वने राजा जानश्रुतिको शूद्र कहते हुए भी उन्हें ब्रह्मविद्याका उपदेश दिया। इससे तो यही सिद्ध होता है कि शूद्रका भी ब्रह्मविद्यामें अधिकार है। अतः इसका निर्णय करनेके लिये अगला प्रकरण आरम्भ किया जाता है— शुगस्य तदनादरश्रवणात्तदाद्रवणात् सूच्यते हि ॥ १ । ३ । ३४ ॥ तदनादरश्रवणात् = उन हंसोंके मुखसे अपना अनादर सुनकर; अस्य= इस राजा जानश्रुतिके मनमे; शुक् = शोक उत्पन्न हुआ; तत्=तदनन्तर; आद्रवणात् = (जिनकी अपेक्षा अपनी तुच्छता सुनकर शोक हुआ था ) उन रैक्वमुनिके पास वह विद्या-प्राप्तिके लिये दौड़ा गया; ( इस कारण उस रैक्वने उसे शूद्र कहकर पुकारा ) हि=क्योकि (इससे); सूच्यते=(रैक्वमुनिकी सर्वज्ञता ) सूचित होती है। व्याख्या—इस प्रकरणमे रैक्वने राजा जानश्रुतिको जो शूद्र कहकर संबोधित किया, इसका यह अभिप्राय नहीं है कि वह जातिसे शूद्र था; अपि तु वह शोकसे व्याकुल होकर दौड़ा आया था, इसलिये उसे शूद्रं कहा। यही बात उस प्रकरणकी समालोचनासे सिद्ध होती है। १- शुचम् आद्रवति इति शूद्रः—जो शोकके पीछे दौड़ता है, वह शूद्र है, इस व्युत्पत्तिके अनुसार रैक्वने उसे 'शूद्र' कहा।

७० वेदान्त-दर्शन [ पाद ३ छान्दोग्योपनिषद्मे ( ४ । १ । १ से ४ तक ) वह प्रकरण इस प्रकार है—'राजा जानश्रुति श्रद्धापूर्वक बहुत दान देनेवाला था । वह अतिथियोंके भोजनके लिये बहुत अधिक अन्न तैयार कराकर रखता था । उनके ठहरनेके लिये उसने बहुत-सी विश्रामशालाएँ भी बनवा रक्खी थीं । एक दिनकी बात है, राजा जानश्रुति रातके समय अपने महलकी छतपर बैठा था । उसी समय उसके ऊपरसे आकाशमे कुछ हंस उड़ते हुए जा रहे थे । उनमेसे एक हंसने दूसरेको पुकारकर कहा—'अरे ! सावधान, इस राजा जानश्रुतिका महान् तेज आकाशमे फैला हुआ है, कहीं भूलसे उसका स्पर्श न कर लेना, नहीं तो वह तुझे भस्म कर देगा ।' यह सुनकर आगे जानेवाले हंसने कहा— 'अरे भाई ! तू किस महत्ताको लेकर इस राजाको इतना महान् मान रहा है, क्या तू इसको गाड़ीवाले रैक्वके समान समझता है !' इसपर पीछेवाले हंसने पूछा—'रैक्व कैसा है ?' अगले हंसने उत्तर दिया—'यह सारी प्रजा जो कुछ भी शुभ कर्म करती है, वह सब उस रैक्वको प्राप्त होता है, तथा जिस तत्त्वको रैक्व जानता है, उसे जो कोई भी जान ले, उसकी भी ऐसी ही महिमा हो जाती है ।' इस प्रकार हसोसे अपनी तुच्छताकी बात सुनकर राजाके मनमे शोक हुआ; फिर वह रैक्वकी खोज कराकर उनके पास विद्या-ग्रहणके लिये गया । रैक्व मुनि सर्वज्ञ थे, वे राजाकी मनःस्थितिको जान गये । उन्होंने उसके मनमें जगे हुए ईर्ष्याभावको दूर करके उसमें श्रद्धाका भाव उत्पन्न करनेका विचार किया और अपनी सर्वज्ञता सूचित करके उसे सावधान करते हुए 'शूद्र' कहकर पुकारा । यह जानते हुए भी कि जानश्रुति क्षत्रिय है, रैक्वने उसे 'शूद्र' इसलिये कहा कि वह शोकके वशीभूत होकर दौड़ा आया था । अतः इससे यह नहीं सिद्ध होता कि वेदविद्यामे शूद्रका अधिकार है । सम्बन्ध—राजा जानश्रुतिका क्षत्रिय होना कैसे सिद्ध होता है ? इस जिज्ञासापर कहते हैं— क्षत्रियत्वावगतेश्चोत्तरत्र चैत्ररथेन लिङ्गात् ॥ १ । ३ । ३५ ॥ क्षत्रियत्वावगतेः = जानश्रुतिका क्षत्रिय होना प्रकरणमें आये हुए लक्षणसे जाना जाता है इससे; च = तथा; उत्तरत्र = बादमे कहे हुए; चैत्ररथेन = चैत्ररथके सम्बन्धसे; लिङ्गात् = जो क्षत्रियत्वसूचक चिह्न या प्रमाण प्राप्त होता है, उससे भी ( उसका क्षत्रिय होना ज्ञात होता है ) ।