चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
by महर्षि चरक व अग्निवेश
Source: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (origin)
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३४१
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३४१ मधुरं बृंहणं बल्यमाम्रातं तर्पणं गुरु । सस्नेहं श्लेष्मलं शीतं वृष्यं विष्टभ्य जीर्यति ॥ १२७ ॥ तालशस्यानि सिद्धानि नारिकेलफलानि च । बृंहणस्निग्धशीतानि बल्यानि मधुराणि च ॥ १२८ ॥ मधुरामलकषायं च विष्टम्भि गुरु शीतलम् । पित्तश्लेष्मकरं भव्यं ग्राहि वक्त्रविशोधनम् ॥ १२९ ॥ अम्लं परूषकं द्राक्षा बदराण्यारुकाणि च । पित्त-श्लेष्म-प्रकोपीणि कर्कन्धुलकुचान्यपि ॥ १३० ॥ नात्युष्णं गुरु संपक्वं स्वादुप्रायं मुखप्रियम् । बृंहणं जीर्यति क्षिप्रं नातिदोषलमारुकम् ॥ १३१ ॥ द्विविधं शीतमुष्णं च मधुरं चाम्लमेव च । गुरु पारावतं ज्ञेयमरुच्यत्यग्निनाशनम् ॥ १३२ ॥ भव्यादल्पान्तरगुणं काश्मर्यफलमुच्यते । तथैवाल्पान्तरगुणं तूदमम्लपरूषकात् ॥ १३३ ॥ कषायमधुरं टङ्कं वातलं गुरु शीतलम् । कपित्थं विषकण्ठघ्नमामं संग्राहि वातलम् ॥ १३४ ॥ मधुरामलकषायत्वात्सौगन्ध्याच्च रुचिप्रदम् । तदेव पक्वं दोषघ्नं विषघ्नं ग्राहि गुर्वपि ॥ १३५ ॥ बिल्वं तु दुर्जरं सिद्धं दोषलं पूतिमारुतम् । स्निग्धोष्णतीक्ष्णं तद्बालं दीपनं कफवातजित् ॥ १३६ ॥ वातपित्तकरं बालमापूर्णं पित्तवर्धनम् । पक्वमाम्रं जयेद्वायुं मांसशुक्रबलप्रदम् ॥ १३७ ॥ कषायमधुरप्रायं गुरु विष्टम्भि शीतलम् । जाम्बवं कफपित्तघ्नं ग्राहि वातकरं परम् ॥ १३८ ॥ मधुरं बदरं स्निग्धं भेदनं वातपित्तजित् । तच्छुष्कं कफवातघ्नं पित्ते न च विरुध्यते ॥ १३९ ॥ कषायमधुरं शीतं ग्राहि सिम्बितिकाफलम् । गाङ्गेरुकं करीरं च बिम्बीतोदनधन्वनम् ॥ १४० ॥ मधुरं सकषायं च शीतं पित्तकफापहम् । संपक्वं पनस मोचं राजादनफलानि च ॥ १४१ ॥ स्वादूनि सकषायाणि स्निग्धशीतगुरूणि च ।
३४२ चरकसंहिता [ अ० २७ कषायविशदत्वाच्च सौगन्ध्याच्च रुचिप्रदम् ॥ १४२ ॥ अवदंशक्षमं रूक्षं वातलं लवलीफलं । नीपं सभागकं पीलु तृणशून्यं१ विकङ्कतम् ॥ १४३ ॥ प्राचीनामलकं चैव दोषघ्नं गरहारि च । ऐङ्गुदं तिक्तमधुरं स्निग्धोष्णं कफवातजित् ॥ १४४ ॥ तिन्दुकं कफपित्तघ्नं कषायमधुरं लघु । विद्यादामलके सर्वान् रसाँल्लवणवर्जितान् ॥ १४५ ॥ स्वेद-मेदः-कफोत्क्लेद-पित्तरोग-विनाशनम् । रूक्षं स्वादु कषायाम्लं कफपित्तहरं परम् ॥ १४६ ॥ रसासृङ्-मांस-मेदो-जान्दोषान् हन्ति बिभीतकम् । स्वरभेद-कफोत्क्लेद-पित्तरोग-विनाशनम् । अम्लं कषायमधुरं वातघ्नं ग्राहि दीपनम् ॥ १४७ ॥ स्निग्धोष्णं दाडिमं हृद्यं कफपित्ताविरोधि च । रूक्षाम्लं दाडिमं यत्तु तत्पित्तानिलकोपनम् ॥ १४८ ॥ मधुरं पित्तनुद्दोषं तद्धि दाडिममुत्तमम् । वृक्षाम्लं ग्राहि रूक्षोष्णं वातश्लेष्मणि शस्यते ॥ १४९ ॥ अम्लिकायाः फलं पक्वं तस्मादल्पान्तरं गुणैः । गुणैस्तैरेव संयुक्तं भेदनं त्वम्लवेतसम् ॥ १५० ॥ शू लेऽरुचौ विबन्धे च मन्देऽग्नौ मद्यविप्लवे । हिक्काकासे च श्वासे च वम्यां वर्चोगदेषु च ॥ १५१ ॥ वातश्लेष्मसमुत्थेषु सर्वेष्वेतेषु दिश्यते । केशरं मातुलुङ्गस्य लघु शीतमतोऽन्यथा ॥ १५२ ॥ गुर्वी त्वगस्य कटुका मारुतस्य च नाशिनी । रोचनो दीपनो हृद्यः सुगन्धिस्त्वग्विवर्जितः ॥ १५३ ॥ कर्चूरः कफवातघ्नः श्वासहिक्कार्शसां हितः । मधुरं किंचिदम्लं च हृद्यं भक्तप्ररोचनम् ॥ १५४ ॥ दुर्जरं वातशमनं नागरङ्गफलं गुरु । वातामाभिषुकाक्षोट-मकूलक-निकोचकाः ॥ १५५ ॥ गुरूष्णस्निग्धमधुराः सोष्माणो बलप्रदाः । वातघ्ना बृंहणा वृष्याः कफपित्ताभिवर्धनाः ॥ १५६ ॥ १. शतातकं, शतातकमिति च पाठौ ।
अ० २७] सूत्रस्थानम् ३४३
अ० २७] सूत्रस्थानम् ३४३
पियालमज्जा सदृशं विद्यादौष्ण्यं विना गुणैः ।
श्लेष्मलं मधुरं शीतं श्लेष्मातकफलं गुरु ॥ १५७ ॥
श्लेष्मलं गुरु विष्टम्भि चाक्षोटफलमग्निजित् ।
गुरूष्णं मधुरं रूक्षं१ केशघ्नं च शमीफलम् ॥ १५८ ॥
विष्टम्भयति कारञ्जं पित्तश्लेष्माविरोधि च ।
आम्रातकं दन्तशठमम्लं सकरमर्दकम् ॥ १५९ ॥
रक्तपित्तकरं विद्यादैरावतकमैव च ।
वातघ्नं दीपनं चैव वार्त्ताकं कटुतिक्तकम् ॥ १६० ॥
वातलं कफपित्तघ्नं विद्यात्पर्यटकीफलम् ।
पित्तश्लेष्मघ्नमम्लं च वातलं चाक्षिकीफलम् ॥ १६१ ॥
मधुराण्यनुपाकीनि वातपित्तहराणि च ।
अश्वत्थोदुम्बर-प्लक्ष-न्यग्रोधानां फलानि च ॥ १६२ ॥
कषायमधुराम्लानि वातलानि गुरूणि च ।
भल्लातकास्थ्यग्निसमं त्वङ्मांसं स्वादु शीतलम् ।
पञ्चमः फलवर्गोऽयमुक्तः प्रायोपयोगिकः ॥ १६३ ॥
फलवर्ग—पकी हुई किशमिश प्यास, जलन, ज्वर, श्वास, रक्त-पित्त, उरः-
क्षत, क्षय, वातपित्त, उदावर्त्त, स्वरभेद, मदात्यय, मुख की कटुता मुखशोष और
और कास को शीघ्र नष्ट करती है। यह बृंहणी पुष्टिकारक, वृष्य, मधुर, स्निग्ध
शीतल है। खजूर-मधुर, पुष्टिकारक, शुक्रवर्धक, गुरु शीतल, क्षय, चोट लगने,
जलन और वात-पित्त रोग में हितकारी है। फल्गु (अंजीर), तृप्तिकारक,
बृंहण, गुरु, विष्टम्भी और शीतल है। फालसा और महुआ वात-पित्त रोग में
उत्तम है। आम्रात (आमड़ा) मधुर, पुष्टिकारक, बलकारक, तृप्तिकारक,
गुरु, स्निग्ध, कफकारक, शीतल, वृष्य और पेट में अफारा करता है। तालके
फल (ताड़फल) और पका हुआ नारियल बृंहण, स्निग्ध, शीतल, बलकारक
और मधुर होते हैं।
भव्य (कमरख) मधुर, अम्ल-कषाय, विष्टम्भि, गुरु, शीतल, पित्तश्लेष्म-
कारक, स्तम्भक और मुख को शोधन करता है। खट्टा फालसा, द्राक्षा, झाड़ी के
बेर, आरुक (आडू या आलूबुखारा), ये पित्तकफ को कुपित करने वाले हैं।
इसी प्रकार बेर और लकुच (बढ़ो), भी पित्त-कफकारक है। आरुक (आलु-
बुखारा) बहुत गरम नहीं, स्वादुमधुर और खाने में स्वादिष्ट, बृंहण पुष्टिकारक,
१. 'शीतं' इति च पाठः ।
३४४ चरकसंहिता [ अ० २७ जल्दी पच जाता है, बहुत अधिक दोषों को नहीं बढ़ाता। पारावत (कामरूप में प्रसिद्ध है) दो प्रकार का है। मधुर और अम्ल। इनमें मधुर शीतल और अम्ल, उष्ण गुरु, अरुचि और अग्नि की तीक्ष्णता को नाश करता है। काश्मरी ( गम्भारी ) का फल लगभग कमरख के फल के समान है, इसी प्रकार खट्टे फाळसे के समान तूद ( औत्तरपथिक शहतूत ) भी है। टंक का फल कषाय मधुर, वातल, गुरु और शीतल है। कच्चा कैथ कण्ठ ( स्वर ) को नाश करने वाला ( स्वर बिठानेवाला ), विषनाशक, आम का संग्राहक, वायुकारक है। पका हुआ कैथ मधुर-अम्लकषाय रस एवं सुगन्धित होने से खाने में रुचिकर और अच्छी तरह पक जाने पर दोषनाशक, विषनाशक, संग्राही और गुरु है। पका हुआ बेल पचने में दुर्जर, दोषकारक, बहुत दुर्गन्धयुक्त वायु पैदा करने वाला है। कच्चा बेल स्निग्ध, उष्ण, तीक्ष्ण, अग्निदीपक, कफ- वायुनाशक है। कच्चा आम (गुठली बैठने से पहिले) रक्तपित्तकारक, पित्तका- रक है। पकने पर आम वायुनाशक, मांस शुक्र और बलवर्द्धक है। पका हुआ जामुन कषाय मधुर रस, गुरु विष्टम्भी, शीतल, कफ-पित्तनाशक संग्राही और वायुकारक है। बेर-मधुर, स्निग्ध, रेचक, वात-पित्तनाशक है, सूखा बेर कफ-वातनाशक और पित्त के लिये अविरोधी है, पित्त का प्रकोप नहीं करता। सिञ्चितिका (सेव, सफरज़ंद) कषाय, मधुररस, शीतल, संग्राही है। गांगेरन ( नागबला ) और करीर (करौंदा), कन्दूरी, तोदन और धाय के फल मधुर-कषाय, शीतल, पित्त-कफनाशक हैं। पका हुआ कटहल, केला और राजादन ( खिरनी ) स्वादु, कषाय, स्निग्ध, शीतल, गुरु हैं। छबकी का फल ( हरफारेवड़ी ) कषाय और विशद एवं सुगन्धित होने से रुचिकर हृद्य, वायुकारक तथा अवदंशक्षम ( इस फलको खाकर दूसरे वस्तुओंमें रुचि होती) है, नीप ( कदम्ब ), शताह्व ( शरका ), पीलु, तृणधान्य ( केतकी फल ), विकङ्कत, प्राचीन आमलक, दोषनाशक और विषनाशक हैं। इंगुद (हिंगोट) का फल तिक्त मधुर स्निग्ध, उष्ण और कफवातनाशक है। तिन्दुक- फल ( तेन्दू ), कफ-पित्तनाशक कषाय, मधुर और लघु है। आंवले में लवण रस को छोड़कर और सब रस हैं और स्वेद मेद, कफ, उत्क्लेद (वमन की रुचि) और पित्त के रोगों को नष्ट करता है, रूक्ष, स्वादु, कषाय, अम्ल, कफ-पित्तना- शक है। विभीतक ( बहेड़ा ), रस, रक्त, मांस, मेदजन्य रोगों को नष्ट करती है स्वर भेद, कफ के उत्क्लेद, तथा पित्त रोग नाशक है। खट्टा अनार कषाय, मधुर, वातनाशक, संग्राही, अग्निदीपक, स्निग्ध और उष्ण है, तथा हृदय के
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३४५
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३४५ लिये रुचिकर कफपित्त का अविरोधी (प्रकोपक नहीं) रूक्ष है। मीठा अनार पित्तनाशक है इन सब में खट्टा अनार श्रेष्ठ है। वृक्षाम्ल (कोकम) संग्राही, रूक्ष, उष्ण, वात-कफ में प्रशस्त है। अम्लिका (इमली) का फल पकने पर लगभग कोकम के समान गुणवाला होता है। अम्लवेतस का गुण भी इसी प्रकार है, परन्तु रेचक है। मातुलुंग (बिजौरे निम्बू) का केशर शूल, अरुचि, विबन्ध, मन्दाग्नि, मदात्यय, हिक्का, कास, श्वास, वमन, मल सम्बन्धी रोगों में और तथा वातकफ-जन्य रोगों में प्रशस्त और लघु है। इसकी छाल, गिरी आदि गुरु और वात-प्रकोपक है। बिना छाल का खजूर रोचक, अग्निदीपक, हृदय के लिये हितकारी, सुगन्धित, कफ-वातनाशक, श्वास, हिचकी और अर्श रोग में हितकारी है। नारंगी का फल—मधुर, कुछ खट्टा, हृद्य, खाने में रुचिकर, पचने में दुर्जर, वातनाशक और गुरु है। बादाम, अभिषुक् (पिस्ता), अखरोट, मकूकक, निकोच, गुरु, उष्ण स्निग्ध, मधुर, शक्तिवर्धक, वायुनाशक, पुष्टिदायक और कफ-पित्त को बढ़ाने वाला है। इनमें पियाल के गुण भी इसी के समान हैं, परन्तु वह उष्ण नहीं है। श्लेष्मातक (लसूड़े) का फल कफकारक, मधुर, शीतल, गुरु है। अंकोटक का फल कफकारक, गुरु, विष्टं भी और अग्निनाशक है। शमी (जंडी) का फल गुरु, उष्ण, मधुर, शीतल और बालों का नाश- कारक है। करंज का फल विष्टम्भी और वात-कफ के लिये अविरोधी है। आम्रातक, दन्तशठ (निम्बू, खट्टा), करौंदा और ऐरावत ये रक्त- पित्तनाशक हैं। वार्त्ताक, वातनाशक, अग्निदीपक, कटुतिक्त रस है। पित्तपापडे का फल वायुकारक और कफ-पित्तनाशक है। आखिकी-फल पित्त-कफनाशक, खट्टा और वायुकारक है। पीपल, गूलर, पिलखन, बड़ इनके फल पकने पर मधुर और वात-पित्तनाशक हैं। कच्चे फल कषाय मधुर, अम्ल, वायुकारक और गुरु हैं। भिलावे का फल अग्नि के समान (छाले डालने वाला) है, भिलावे की छाल, मज्जा स्वादु, शीतल है। इस प्रकार से उपयोगी पांचवां फलवर्ग भी कह दिया है ॥ १२३-१६३ ॥ इति फलवर्गः ।
अथ हरितवर्गः । रोचनं दीपनं हृद्यमार्द्रकं विश्वभेषजम् । वातश्लेष्मविबन्धेषु रसस्तस्योपदिश्यते ॥ १६४ ॥
३४६ • चरकसंहिता [ सू० २७ रोचनो दीपनस्तीक्ष्णः सुगन्धिर्मुखशोधनः । जम्बीरः कफवातघ्नः कृमिघ्नो भुक्तपाचनः ॥ १६५ ॥ बालं दोषहरं, वृद्धं त्रिदोषं, मारुतापहम् । स्निग्धसिद्धं, विशुष्कं तु मूलकं कफवातजित् ॥ १६६ ॥ हिक्का-कास-विष-श्वास-पार्श्व-शूल-विनाशनः । पित्तकृत्कफवातघ्नः सुरसः पूतिगन्धहा ॥ १६७ ॥ यवानी चार्जकञ्चैव शिग्रुशालेयमृष्टकम् । हृद्यान्यास्वादनीयानि पित्तमुत्क्लेशयन्ति च ॥ १६८ ॥ गण्डीरो जलपिप्पल्यस्तुम्बुरुः शृङ्गवेरिका । तीक्ष्णोष्ण-कटु-रूक्षाणि कफवातहराणि च ॥ १६९ ॥ पुंस्त्वघ्नः कटुरूक्षोष्णो भूस्तृणो वक्त्रशोधनः । खराश्वा कफवातघ्नी बस्तिरोगरुजापहा ॥ १७० ॥ धान्यकं चाजगन्धा च सुमुखश्चेति रोचनाः । सुगन्धना नातिकटुका दोषानुत्क्लेशयन्ति च ॥ १७१ ॥ ग्राही गृञ्जनकस्तीक्ष्णो वातश्लेष्मार्शसां हितः । स्वेदनेऽभ्यवहार्ये च योजयेत्तमपित्तिनाम् ॥ १७२ ॥ श्लेष्मलो मारुतघ्नश्च पलाण्डुर्न च पित्तनुत् । आहारयोगी बल्यश्च गुरुर्वृष्योऽथ रोचनः ॥ १७३ ॥ कृमि-कुष्ठ-किलासघ्नो वातघ्नो गुल्मनाशनः । स्निग्धश्चोष्णश्च वृष्यश्च लशुनः कटुको गुरुः ॥ १७४ ॥ शुष्काणि कफवातघ्नान्येतान्येषां फलानि च । हरितानामयं चैषां षष्ठो वर्गः समाप्यते ॥ १७५ ॥ हरितवर्ग—आर्द्रक (अदरक) रोचक, अग्निदीपक, वीर्यवर्धक है। इस का रस वात-कफजन्य अवरोधों में गुणकारी है। नीम्बू, रुचिकारक, दीपक, तीक्ष्ण, सुगन्धित, मुख को साफ करने वाला, कफ-वातनाशक, कृमिनाशक और अन्न का पाचक है। कच्ची मूली दोषनाशक है और बढ़ने पर (पक- जाने पर) त्रिदोषकारक है, स्निग्ध और सिद्ध (पकाई हुई) मूली वायु- नाशक, सूखी मूली कफ-वातनाशक है १। तुलसी-हिचकी, कास, विष, श्वास, पार्श्वशूल का नाश करती तथा पित्तकारक, कफ- वायुनाशक एवं शरीर तथा ( १. मूली—यावद्धि चाव्यक्तरसान्वितानि, नवप्ररूढानि च मूलकानि । ) तावल्लघु दीपदानि पित्तानिलश्लेष्महराणि चैव ॥
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३४७ अन्न के दुर्गन्ध को नष्ट करती है। अजवायन, अर्जक ( अजपका ), शोभा- ञ्जन, शालेयमुष्टक और राई ये हृदय को प्रिय और स्वादिष्ठ तथा पित्तवर्धक हैं। गण्डीर ( लाल और श्वेत भेद से दो प्रकार का है, यहां पर लाल का ग्रहण है और श्वेत को शाकवर्ग में कह दिया है ), जल पिप्पली, तुम्बरु, गोजिह्वा ( गाज़बां ) ये तीक्ष्ण, उष्ण, कटु, रूक्ष, कफ-वायुनाशक हैं। भूस्तृण ( गन्ध- तृण ), पुरुषत्वनाशक, कटु, रूक्ष, उष्ण और मुख का शोषक है। खराश्वा ( कालाजीरा ) कफ-वातनाशक, बस्तिरोग और बस्तिशूलनाशक है। धनिया, अजवायन, सुमुखा ( तुलसी भेद ), रोचक, सुगन्धि बहुत कटु नहीं और दोषों को उत्तेजित करते हैं। गाजर ( गृञ्जन ) या शलजम संग्राही, तीक्ष्ण, वात-कफ अर्श रोग में हितकारी, स्वेदन कार्य में हितकारी है, इसका उपयोग पित्त जहां न बढ़ा हो वहां पर करना चाहिये। पलाण्डु ( प्याज़ ) कफकारक, वायुनाशक है, परन्तु पित्त नाशक नहीं है, भोजन में उपयोगी, बलकारक, गुरु, वृष्य और रुचिकर है। लहसुन कृमि, कुष्ठ, किलास रोग- नाशक, वायुनाशक, गुल्मनाशक, स्निग्ध और उष्ण, वीर्यवर्धक, कटु, और गुरु है। ये सब सूखे होने पर तथा इनके फल कफ-वायु नाशक हैं। यह छठा हरितवर्ग समाप्त हुआ। हरितवर्ग की वस्तुवें प्रायः हरी कच्ची ही बरती जाती हैं; इस लिये इसे हरितवर्ग कहते हैं-जैसे आजकल सलाद, प्याज टमाटर कच्चे खाने का रिवाज़ है ॥ १६४-१७५ ॥ इति हरितवर्गः। अथ मद्यवर्गः। प्रकृत्या मद्यमम्लोष्णमम्लं चोक्तं विपाकतः। सर्वं सामान्यतस्तस्य विशेष उपदेक्ष्यते ॥ १७६ ॥ कृशानां सक्तमूत्राणां ग्रहण्यर्शोविकारिणाम्। सुरा प्रशस्ता वातघ्नी स्तन्यरक्तक्षयेषु च ॥ १७७ ॥ हिक्का-श्वास-प्रतिश्याय-कास-वर्चो-प्रहारुचौ। वम्यानाहविबन्धेषु वातघ्नी मदिरा हिता ॥ १७८ ॥ शूल-प्रवाहिकाटोप-कफ-वातार्शसां हितः। जगलो ग्राहिरूक्षोष्णः शोफघ्नो भुक्तपाचनः ॥ १७९ ॥ शोफार्शो-ग्रहणीदोष-पाण्डुरोगाकबिज्वरान्। हन्त्यरिष्टः कफकृतान् रोगान् रोचनदीपनः ॥ १८० ॥
३४८ चरकसंहिता [ अ० २७ मुखप्रियः सुखमदः सुगन्धिर्बस्तिरोगनुत् । जरणीयः परिणतो हृद्यो वर्ण्यश्च शार्करः ॥ १८१ ॥ रोचनो दीपनो हृद्यः शोषशोफार्शसां हितः । स्नेह-श्लेष्म-विकारघ्नो वर्ण्यः पक्वरसो मतः ॥ १८२ ॥ जरणीयो विबन्धघ्नः स्वरवर्णविशोधनः । कर्शनः शीतरसिको हितः शोफोदरार्शसाम् ॥ १८३ ॥ सृष्टभिन्नशकृद्वातो गौडस्तर्पणदीपनः । पाण्डुरोगव्रणहितो दीपनी चाक्षिकी मता ॥ १८४ ॥ सुरासवस्तीव्रमदो वातघ्नो वदनप्रियः । छेदी मध्वासवस्तीक्ष्णो मैरेयो मधुरो गुरुः ॥ १८५ ॥ धातक्याभिषुतो हृद्यो रूक्षो रोचनदीपनः । माध्वीकवन्न चात्युष्णो मृद्वीकेक्षुरसासवः ॥ १८६ ॥ रोचनं दीपनं हृद्यं बल्यं पित्ताविरोधि च । विबन्धघ्नं कफघ्नं च मधु लघ्वल्पमारुतम् ॥ १८७ ॥ सुरा समण्डा रूक्षोष्णा यवानां वातपित्तला । गुर्वी जीर्यति विष्टभ्य श्लेष्मला तु मधूलिका ॥१८८॥ दीपनं जरणीयं च त्पाण्डुकृमिरोगनुत् । ग्रहण्यार्शोहितं भेदि सौवीरकतुषोदकम् ॥ १८९ ॥ दाहज्वरापहं स्पर्शात्पानाद्वातकफापहम् । विबन्धश्रमविध्वंसि दीपनं चाम्लकाञ्जिकम् ॥ १९० ॥ प्रायशोऽभिनवं मद्यं गुरु दोषसमीरणम् । स्रोतसां शोधनं जीर्णं दीपनं लघु रोचनम् ॥ १९१ ॥ हर्षणं प्रीणनं बल्यं भय-शोक श्रमापहम् । प्रागल्भ्य-वीर्य-प्रतिभा-तुष्टि-पुष्टि-बल-प्रदम् ॥ १९२ ॥ सात्त्विकैर्विधिवद्युक्त्या पीतं स्यादमृतं यथा । वर्गोऽयं सप्तमो मद्यमधिकृत्य प्रकीर्तितः ॥ १९३ ॥ मद्यवर्ग—स्वभाव से मद्य लघु, उष्ण है, वह रस में अम्ल नहीं, विपाक में अम्ल है । पीने पर दांत खट्टे होजाते हैं, मुख से स्राव होता है इसलिये अम्ल¹ है । यह बात सब मद्यों में समान है, विशेष रूप से आगे कहते हैं— • सुरा ( अनुद्धतमण्ड ) कृश पुरुषों के लिये, मूत्र रुक जाने पर, ग्रहणी, अर्श- १. मद्य-सर्वेषां मद्यमम्लानामुपर्य्युपरि वर्त्तते ॥सु०॥
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३४६
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३४६ रोग में हितकारी, वायुनाशक तथा स्तन्य (दूध) और रक्तक्षय में उपकारी है। मदिरा (सुरामण्ड) हिचकी, श्वास, प्रतिश्याय, कास, मलाबरोध, अरुचि, वमन, अफारा, विबन्ध में हितकारी एवं वायुनाशक है। जगल (अन्न से बनी सुरा) शूल, प्रवाहिका, अफारा, कफ-वायु और अर्शरोग में हितकारी संग्राही, रूक्ष, उष्ण, शोफनाशक और अन्न को पचाने वाली है। अरिष्ट (औषध क्वाथ से सम्पादित) शोष, अर्श, ग्रहणी, पाण्डु, अरुचि, ज्वर एवं कफजन्य रोगों को नष्ट करता है, रोचक और अग्निवर्धक है। शर्कर (शर्करा का प्राकृतिक आसव) खाने में प्रिय, सुखपूर्वक नशा करने वाला, सुगन्धित, बस्तिरोगनाशक जीर्ण होकर पचने वाला. हृदय को प्रिय, वर्ण, कान्तिकारक है। पक्व रस (गन्ने के रस को पका कर बनाने पर) रोचक, अग्निदीपक, हृद्य, शोष, शोफ, अर्श रोग में हितकारी, स्नेह-श्लेष्मा के रोगों का नाशक और कान्तिकारक है। शीत रस (गन्ने के अपक्व रस से बनाया) लाघवकारक, विबन्धनाशक, स्वर वर्ण को साफ करने वाला, लेखन, शोफ, उदर, अर्श रोग में हितकारी है। गौड (गुड़ से बना) मद्य रेचक, वायु का अनुलोमक, तृप्तिकारक और अग्निवर्धक है। बहेड़े का मद्य पाण्डुरोग, व्रण में हितकारी और दीपक है। सुरासव (सुरा को ही पानी के स्थान पर जहाँ व्यवहार करें) तीव्र मदकारी, वायु- नाशक, मुख और शरीर के लिये प्रिय है। महुवे के फूलों से बना आसव छेदक और तीक्ष्ण है, मैरेय १ मधुर और गुरु है। धाय के फूलों से बना आसव हृद्य, रूक्ष, रोचक और दीपक है। मृद्वीका रस और गन्ने के रस को मिलाकर तैयार किया हुआ आसव माध्वीक से बने आसव के समान गरम नहीं, रोचक, दीपक, हृद्य, बलकर और पित्त के लिये अविरोधी है। मधु प्रधान आसव विबन्धना- शक, कफनाशक, लघु और थोड़ी वायुकारक है। मण्ड के साथ सुरा (यव- तण्डुलों से बनी) रूक्ष, उष्ण, वात-पित्तकारक है। मधूलक (गेहूँ से बनी मद्य) गुरु, पेट में अफारा करके जीर्ण होती है, कफकारक है। धान्य-तुष से बनी कांजी दीपक, लघु, हृदय पांडु, कृमि, रोगनाशक, ग्रहणी, अर्शरोग में हितकारी और रेचक है। खट्टी कांजी के पीने से दाह, ज्वर नष्ट होता है, वात-कफ- नाशक, विबन्धनाशक, अविदांही, दीपक है। नवीन मद्य प्रायः गुरु और दोष प्रकोपक होता है। पुराना २ मद्य स्रोतों का शोधक, दीपक, लघु, रुचिकर, हर्षों- १. मैरेय—'आसवस्य सुरायाश्च द्वयोरेकत्र भाजने । सन्धानं तद् विजानीयान् मैरेयमुभयाश्रयम् ॥' २. एक वर्ष के पीछे शराब पुरानी मानी जाती है ।
इति मद्यवर्गः।
३५० चरकसंहिता [ अ० २७ त्पादक, पुष्टिदायक, बलकारक, भय, शोक, श्रम को मिटाने वाला है। सात्त्विक विधिपूर्वक सेवन किया हुआ मद्य अमृत के समान होता है, यह मद्य अत्यन्त वीर्यप्रद, प्रतिभा, प्रसन्नता, पुष्टिबल को देता है। यह सातवां मद्यवर्ग समाप्त हुआ ॥ १७६-१६३ ॥ इति मद्यवर्गः। अथ जलवर्गः । जलमेकविधं सर्वं पतत्यैन्द्रं नभस्तलात् । तत्पतत्पतितं चैव देशकालावपेक्षते ॥ १६४ ॥ खात्पतत्सोमवाय्वर्कैः स्पृष्टं कालानुवर्तिभिः । शीतं शुचि शिवं मृष्टं विमलं लघु षड्गुणम् । प्रकृत्या दिव्यमुदकं, भ्रष्टं पात्रमपेक्षते । १६६ ॥ श्वेते कषायं भवति पाण्डुरे चैव तिक्तकम् । कपिले क्षारसंमृष्टमूषरे लवणान्वितम् । कटु पर्वतविस्तारे मधुरं कृष्णमृत्तिके ॥ १६७ ॥ एतत्षाड्गुण्यमाख्यातं महीस्थस्य जलस्य हि । तथाऽव्यक्तरसं विद्यादैन्द्रं कारं हिमं च यत् ॥ १६८ ॥ यदन्तरीक्षात्पततीन्द्रसृष्टं चोक्तैश्च पात्रैः परिगृह्यतेऽम्भः तदैन्द्रमित्येव वदन्ति धीरा नरेन्द्रपेयं सलिलं प्रधानम् ॥ १६६ ॥ श्रुतावृताबिह ख्याताः सर्व एवाम्भसो गुणाः । ईषत्कषायमधुरं सुसूक्ष्मं विशदं लघु ॥ २०० ॥ अरूक्षममभिष्यन्दि सर्वं पानीयमुत्तमम् । गुर्वभिष्यन्दि पानीयं वार्षिकं मधुरं नवम् ॥ २०१ ॥ तनु लघ्वनभिष्यन्दि प्रायः शरदि वर्षति । तत्त ये सुकुमाराः स्युः स्निग्धभूयिष्ठभोजनाः ॥ २०२ ॥ तेषां भोज्ये च भक्ष्ये च लेह्ये पेये च शस्यते । हेमन्ते सलिलं स्निग्धं वृष्यं बलहितं गुरु ॥ २०३ ॥ किंचित्ततो लघुतरं शिशिरे कफवातजित् । कषायमधुरं रूक्षं विद्याद्वासन्तिकं जलम् ॥ २०४ ॥ ग्रैष्मिकं त्वनभिष्यन्दि रूपमित्येष निश्चयः । विभ्रान्तेषु तु कालेषु यत्प्रयच्छन्ति तोयदाः ॥ २०५ ॥
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३५१
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३५१ सलिलं तच्च दोषाय युज्यते नात्र संशयः । राजभी राजमात्रैश्च सुकुमारैश्च मानवैः ॥ २०६ ॥ संगृहीताः शरदद्यापः प्रयोक्तव्या विशेषतः । नद्यः पाषाण-विच्छिन्न-विक्षुब्धाभिहतोदकाः ॥ २०७ ॥ हिमवत्प्रभवाः पथ्याः पुण्या देवर्षिसेविताः । नद्यः पाषाण-सिकतावाहिन्यो विमलोदकाः ॥ २०८ ॥ मलयप्रभवा याश्च जलं तास्वमृतोपमम् । पश्चिमाभिमुखा याश्च पथ्यास्ता निर्मलोदकाः ॥ २०९ ॥ प्रायो मृदुवहा गुर्व्यो याश्च पूर्वसमुद्रगाः । पारियात्रभवा याश्च विन्ध्यसह्यभवाश्च याः ॥ २१० ॥ शिरोहृद्रोगकुष्ठानां ता हेतुः श्लीपदस्य च । वसुधा-कीट-सर्पाखु-मल-संदूषितोदकाः ॥ २११ ॥ वर्षाजलबहा नद्यः सर्वदोषसमीरणाः । वापी-कूप-तडागोत्स-सरः-प्रस्रवणादिषु ॥ २१२ ॥ आनूपशैलधन्वानां गुणदोषैर्विभावयेत् । पिच्छिलं कृमिलं क्लिन्नं पर्णशैवालकर्दमैः ॥ २१३ ॥ विवर्णं विरसं सान्द्रं दुर्गन्धि न हितं जलम् । विस्रं त्रिदोषं लवणमम्बु यद्दूरुणालयम् ॥ २१४ ॥ इत्यम्बुवर्गः प्रोक्तोऽयमष्टमः सुनिश्चितः । जलवर्गः समुद्दिष्टो मानवानां सुखप्रदः ॥ २१५ ॥ सम्पूर्ण पानी एक प्रकार का है । यह पानी बरसात के रूप में आकाश से गिरता है। यह गिरता हुआ, और गिरकर, [ गुण-दोष के लिये ] देश, समय की अपेक्षा करता है। आकाश से गिरता हुआ पानी ऋतु के अनुसार सूर्य, चन्द्रमा और वायु (आकाश में स्थित धूलि, तथा क्षुद्र जन्तु आदि परमाणुओं से मिलकर) तथा भूमि के ऊपर गिर कर उस ऋतु के अनुसार भूमि की शीतलता, उष्णिमा, स्निग्धता, रूक्षता आदि के सम्बन्ध होने पर उसी गुण वाला हो जाता है। आकाश से गिरता हुआ पानी स्वभाव से शीतल, पवित्र, कल्याणकारी, स्वादिष्ट, स्वच्छ, हल्का-इन छः गुणों वाला है। नीचे भूमि पर गिरकर पात्र की अपेक्षा से गुण वाला बन जाता है। श्वेत भूमि पर गिरने से पानी कसैला, पाण्डुर जमीन में तिक्त; कपिल भूमि अर्थात् क्षारमिश्रित (ऊसर में) नमकीन; पहाड़ की भूमि पर कटु और काली भूमि में मधुर हो
३५२ चरकसंहिता [ अ० २७
जाता है। भूमि का जल इन छः गुणों वाला होता है। बरसात का पानी, बर्फ का पानी और कार अर्थात् ओले के पानी में कोई रस व्यक्त नहीं होता । आकाश से गिरते हुए पानी को नदी आदि स्थानों के अतिरिक्त, किसी शुद्ध पात्र में एकत्र कर लिया जाय तो इसे बरसात का पानी कहते हैं। यह पानी राजाओं के पीने योग्य है। ऋतु-ऋतु के अनुसार बरसात के पानी में गुण होते हैं। जो पानी थोड़ा कषाय, मधुर, पतला ( सूक्ष्म ), स्वच्छ, लघु, अरूक्ष अनभिष्यन्दि, कफ न करे, वह पानी उत्तम समझना चाहिये। बरसात का नया पानी गुरु, अभिष्यन्दि और मधुर रस होता है। शरद् ऋतु में बरसात का पानी बहुत स्वच्छ, लघु, अनभिष्यन्दि कफ नहीं करने वाला होता है। यह पानी सुकुमार, एवं विशेषतः स्निग्ध एवं बहुत भोजन खाने वाले पुरुषों के भोजन में, भक्षण ( दांत से काट कर खाने की वस्तुओं ) में, पीने और चाटने में भी प्रशस्त है। हेमन्त ऋतु में बरसात का पानी स्निग्ध, वीर्यवर्धक, बल- कारक, गुरु है। शिशिर ऋतु में बरसात का और हेमन्त ऋतु के पानी से कुछ हल्का एवं कफ-वातनाशक होता है। वसन्त ऋतु में बरसात का पानी कषाय, मधुर रस और रूक्ष होता है। ग्रीष्म ऋतु में बरसात का पानी कफनाशक और रूक्ष होता है, विभ्रान्त अर्थात् बरसात के दिनों में बादलों से जो पानी गिरता है वह निश्चित रूप में दोषकारक होता है। राजाओं, श्रीमन्तों, रईसों तथा सुकुमार पुरुषो को चाहिये कि वे शरद् ऋतु में बरसात के पानी को इकट्ठा करलें और सारे साल इसीका उपयोग करें। हिमालय से उत्पन्न नदियों का पानी पत्थरों की टक्कर के कारण मथे जाने से निर्दोष, पथ्यकारी, पुण्य है। इनको देवता व ऋषि सेवन करते थे, ये अति पुण्यकारी है। मलयाचल पर्वत से उत्पन्न नदियों का पानो पत्थर, रेतीली भूमि में बहने से स्वच्छ हो जाता है। इन का जल भी अमृत के समान है। पश्चिम समुद्र में गिरने वाली नदियां पथ्यकारी एवं स्वच्छ पानी वाली हैं। पूर्वीय समुद्र में गिरने वाली नदियां धीरे धीरे चलती हैं और गुरु पानी वाली हैं। पारियात्र पर्वत से उत्पन्न होनेवाली, विन्ध्याचल एवं सह्याद्रि के पहाड़ों से उत्पन्न नदियां शिरोरोग, हृदयरोग, कुष्ठ और श्लीपद रोग को उत्पन्न करती हैं। बरसात का पानी, मिट्टी, कृमि, कीट, सर्प, चूहा आदि के मलों से दूषित हो कर नदियों में जाकर मिलता है, इसलिये सब नदियों का पानी दूषित होता है इसलिये इस ऋतु में नदियों का पानी दोष बढ़ाने वाला होता है। वलाको,
अ० २७ ] २३ सूत्रस्थानम् ३५३
अ० २७ ] २३ सूत्रस्थानम् ३५३ कूंवा, तड़ाग, चश्मा, सरोवर, झरना आदि का पानी अनूप, पर्वत, और धन्वन् अर्थात् जांगल देश के गुण-दोषों के अनुसार समझना चाहिये १। जो पानी पिच्छिल (चिकास), क्रिमियुक्त क्लिन्न, पत्ते, सरवाळ अथवा कीचड़ से मिला, जिस पानी का रंग बदल गया हो, रस बिगड़ गया हो, सान्द्र (तरल न हो, गाढ़ा हो), दुर्गन्ध युक्त हो, वह जल हितकारी नहीं है। समुद्र का पानी विस्र (आमगन्धी) तीनों दोषों को करने वाला; नमकीन होता है। इसलिये नहीं पीना चाहिये। यह आठवां जलवर्ग समाप्त हुआ॥ २१४-२१५॥ इति जलवर्गः। अथ दुग्धवर्गः। स्वादु शीतं मृदु स्निग्धं बहलं श्लक्ष्णपिच्छिलम्। गुरु मन्दं प्रसन्नं च गव्यं दशगुणं पयः॥ २१६॥ तदेवंगुणमेवौजः सामान्यादभिवर्धयेत्। प्रवरं जीवनीयानां क्षीरमुक्तं रसायनम्॥ २१७॥ महिषीणां गुरुतरं गव्याच्छीततरं पयः। स्नेहाऽन्यूनमनिद्राय हितमत्यग्नये च तत्॥ २१८॥ रूक्षोष्णं क्षीरमुष्ट्रीणामीषत्सलवणं लघु। शस्तं वात-कफानाह-कृमि-शोफोदरार्शसाम्॥ २१९॥ बल्यं स्थैर्यकरं सर्वमुष्णं चैकशफं पयः। साम्लं सलवणं रूक्षं शाखावातहरं लघु॥ २२०॥ छागं कषायमधुरं शीतं ग्राहि पयो लघु। रक्तपित्तातिसारघ्नं क्षय-कास-ज्वरापहम्॥ २२१॥ हिक्काश्वासकरं तूष्णं पित्तश्लेष्मलमाविकम्। हस्तिनीनां पयो बल्यं गुरु स्थैर्यकरं परम्॥ २२२॥ जीवनं बृंहणं सात्म्यं स्नेहनं मानुषं पयः। नावनं रक्तपित्ते च तर्पणं चाक्षिशूलिनाम्॥ २२३॥ १. सुश्रुत में भी कहा है—अनूपदेशे यद् वारि गुरु तत् श्लेष्मवर्धनम्। विपरीतमतो मुख्यं लघु जाङ्गलमुच्यते॥ सुश्रुत में कूप, तडाग, वापि झरने आदि के पानी के गुण पृथक्-पृथक् दिये हैं।
३५४ चरकसंहिता [अ० २७ रोचनं दीपनं वृष्यं स्नेहनं बलवर्धनम् । पाकेऽम्लमुष्णं वातघ्नं मङ्गलं बृंहणं दधि ॥ २२४ ॥ पीनसे चातिसारे च शीतके विषमज्वरे । अरचौ मूत्रकृच्छ्रे च कार्श्ये च दधि शस्यते ॥ २२५ ॥ शरद्-ग्रीष्म-वसन्तेषु प्रायशो दधि गर्हितम् । रक्तपित्तकफोत्येषु विकारेष्वहितं च तत् ॥ २२६ ॥ त्रिदोषं मन्दकं, जातं वातघ्नं दधि, शुक्तकः १। सरः, श्लेष्मानिलघ्नस्तु मण्डः स्रोतोविशोधनः ॥ २२७ शोफार्शो-ग्रहणी-दोष-मूत्र-कृच्छ्रोदरा-२रुचौ । स्नेहव्यापदि पाण्डुत्वे तक्रं दद्याद् गरेषु च ॥ २२८ ॥ संग्राहि दीपनं हृद्यं नवनीतं नवोद्धृतम् । ग्रहण्यर्शो-विकार-हन्मर्दितारुचिनाशनम् ॥ २२९ ॥ स्मृति-बुद्धयग्नि-शुक्रौजः-कफ-मेदो-विवर्धनम् । वात-पित्त-विषोन्माद-शोपालक्ष्मी-विषापहम् ३ ॥ २३० ॥ सर्वस्नेहोत्तमं शीतं मधुरं रसपाकयोः । सहस्रवीर्यं विधिभिर्घृतं कर्मसहस्रकृत् ॥ २३१ ॥ मदापस्मार-मूर्च्छाय-शोषोन्माद-गर-ज्वरान् । योनिकर्णशिरःशूलं घृतं जीर्णमपोहति ॥ २३२ ॥ सर्पिष्याजावि-महिषी-क्षीरवत्त्वानि निर्दिशेत् । पीयूषो मोरटं चैव किलाटा विविधाश्च ये ॥ २३३ ॥ दीप्ताग्नीनामनिद्राणां सर्व एते सुखप्रदाः । गुरवस्तर्पणा वृष्या बृंहणाः पवनापहाः ॥ २३४ ॥ विशदा गुरवो रूक्षा माहिषस्तकपिण्डकाः । गोरसानाभयं वर्गो नवमः परिकीर्तितः ॥ २३५ ॥ क्षीरवर्ग-दूध-मधुर, शीतल, मृदु, स्निग्ध, बहल, श्लक्ष्ण, पिच्छिल, गुरु, मन्द, प्रसन्न इन दस गुणोंवाला गाय का दूध है। ओज के भी ये ही दस गुण हैं। इस लिये सामान्य होने से दूध ओज को बढ़ाता है । इसलिये जीवनीय वस्तुओं में दूध सब से अधिक श्रेष्ठ गिना जाता है । वह रसायन है । भैंस का दूध-गाय के दूध से भारी, गाय के दूध से ठण्डा और उसमें स्नेह अर्थात् घी भी अधिक होता है, निद्रा न आने वाले के लिये तथा अग्नि के बहुत बढ़ने में हितकारी है, अग्नि को कम करता है । १. शुक्लं इति पाठः । २. मूत्रग्रहोदरा इति पाठः । ३. ज्वरापहम् इति पाठः ।
अ० २७ } सूत्रस्थानम् ३५५
अ० २७ } सूत्रस्थानम् ३५५ ऊंटनी का दूध रूक्ष, उष्ण, थोड़ा नमकीन, लघु, वात, कफ, आनाह कृमि, शोफ, उदर एवं अर्श रोग में हितकारी है । एक खुर वाले घोड़ी या गधी, खच्चर आदि जानवरों का दूध बलकारक, शरीर को स्थिर बनाने वाला, उष्ण, अम्ल-लवण रस, रूक्ष, हाथ पांव के वातविकारों को नाश करने वाला और लघु है । बकरी का दूध-कषाय, मधुर, शीतल, संग्राहि, लघु, रक्तपित्त- अतीसार नाशक, क्षय, कास, ज्वर में हितकारी है । भेड़ो का दूध-हिक्का, श्वास रोग करने वाला, गरम, पित्त कफ को उत्पन्न करता है । हथिनी का दूध बल- कारक, गुरु, और शरीर को दृढ़ करने वाला है । स्त्रियों का दूध-जीवनीय, बृंहणीय, शरीर के सात्म्य, स्नेहक, नस्य के लिये और रक्तपित्त में हितकारी, आंख के दुःखने में तर्पण करने के लिये उत्तम है । दही के गुण—दही रुचिकारक, अग्निदीपक, वीर्यवर्धक, स्नेहन के योग्य, बलवर्धक, विपाक में अम्ल, उष्णवीर्य, वातनाशक, मंगलकारी, बृंहण, पौष्टिक है । पीनस, अतिसार, शीतजन्य विषमज्वर में, अरुचि, मूत्रकृच्छ्र, और स्वा- भाविक कृशता में दही उत्तम है । शरद-ग्रीष्म और वसन्त ऋतु में दही का खाना निन्दित है । मन्दक (जब, दही पूरी तरह न जमे उसे मन्दक कहते हैं ) दही त्रिदोषकारक है, और ठीक तरह जमा दही वातनाशक होता है । सरः (दही के ऊपर की मलाई) शुक्रवर्धक (शुक्र की वृद्धि करने वाली) है । दही का मण्ड स्वच्छ द्रवभाग (मस्तु), कफ-वात नाशक और स्रोतों को साफ़ करने वाला है । छाछ के गुण—शोफ, अर्श, ग्रहणी, मूत्राघात (मूत्रावरोध), उदर रोग अरुचि, स्नेहकर्म जन्य रोगों में, पाण्डुरोग में तथा संयोग जन्य विष में छाछ प्रशस्त है । मक्खन-संग्राही, अग्निदीपक, हृद्य, ग्रहणी, अर्शरोग-नाशक, अर्दित तथा अरुचि को मिटाता है । ताजा मक्खन ही अधिक प्रशस्त गुणकारी है, पुराना नहीं । गाय के घी के गुण—स्मरण शक्ति, बुद्धि, अग्नि, शुक्र, ओज, कफ-मेद, को बढ़ानेवाला, वात, पित्त, विष, उन्माद, शोष, दौर्भाग्य, अशुभ-एवं ज्वर का नाशक है । सब स्नेहों में घी उत्तम है, शीतल, मधुर (रस एवं पाक में मधुर) है । नाना प्रकार के कर्म करने वाले द्रव्यों से घी का संस्कार करने पर घी सहस्रों प्रकार के, कर्म कर सकता है । मद, अपस्मार, मूर्च्छा, शोष, उन्माद, विष, ज्वर, योनिरोग, कर्ण रोग, शिर के शूल में पुराना घी (दस साल का पुराना--'जीर्णं तु दशवर्षातीतम्' ) प्रशस्त है । अन्य बकरी-आदि के घी का गुण उनके दूध के समान समझना चाहिये ।
३५६ चरकसंहिता [ अ० २७ पीयूष ( ताजी ब्याई हुई मादा पशु का दूध, खीस ), मोरट ( यही पीयूष जब अगले दिन तक स्वच्छ नहीं होता, इसको मोरट कहते हैं ), किलाट ( जिसमें दूध से स्नेह भाग निकाल लिया जाय ) तथा इस प्रकार की अन्य वस्तुएं जिनकी अग्नि बढ़ी हुई हो, या जिनको अनिद्र रोग हो, उनके लिये सुखदायक हैं, गुरु, तृप्तिकारक, पौष्टिक, वीर्यवर्द्धक, वातनाशक हैं। छच्छ का छाना या पनीर ( छच्छ या दही को कपड़े में लटका कर उसका द्रव भाग निकाल देने पर बचा भाग ) स्वच्छ, गुरु, रूक्ष और संग्राही है। यह नवां गोरस का वर्ग समाप्त हुआ ॥ २१६-२३५ ॥ इति गोरसवर्गः । अथेक्षुवर्गः । वृष्यः शीतः स्थिरः स्निग्धो बृंहणो मधुरो रसः । श्लेष्मलो भक्षितस्येक्षोर्यान्त्रिकस्तु विदह्यते ॥ २३६ ॥ शैत्यात्प्रसादान्माधुर्यात्पौण्ड्रकाद्रांशको वरः ॥ प्रभूत-कृमि-मज्जासृङ् मेदो-मांस-करो गुडः ॥ २३७ ॥ क्षुद्रो गुडश्चतुर्भागत्रिभागार्धावशेषितः । रसो गुरुर्यथापूर्वं धौतः स्वल्पमलो गुडः ॥ २३८ ॥ यतो मत्स्यण्डिकाखण्डशर्करा विमलाः परम् । यथा यथैषां वैमल्यं भवेच्छैत्यं तथा तथा ॥ २३९ ॥ वृष्याः क्षीणक्षतहिताः सस्नेहा गुडशर्कराः । कषायमधुराः शीताः सतिक्ता याः सशर्कराः ॥ २४० ॥ रूक्षा वम्यतिसारघ्नी छेदनी मधुशर्करा । तृष्णासृक्पित्तदाहेषु प्रशस्ताः सर्वशर्कराः ॥ २४१ ॥ माक्षिकं भ्रामरं क्षौद्रं पौत्तकं मधुजातयः । माक्षिकं प्रवरं तेषां विशेषाद् भ्रामरं गुरु ॥ २४२ ॥ माक्षिकं तैलवर्णं स्यात् श्वेतं भ्रामरमुच्यते । क्षौद्रं तु कपिलं विद्याद् घृतवर्णं तु पौत्तिकम् ॥ २४३ ॥ वातलं गुरु शीतं च रक्तपित्तकफापहम् । संधातृ छेदनं रूक्षं कषायमधुरं मधु ॥ २४४ ॥ हन्यान्मधूष्णमुष्णार्तमथवा सविषान्वयात् । गुरु-रूक्ष-कषायत्वाच्छैत्याच्चाल्पं हितं मधु ॥ २४५ ॥
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३५७
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३५७
नातः कष्टतमं किञ्चिन्मध्वामाशाद्धि मानवम् । उपक्रमविरोधित्वात्सद्यो हन्याद्यथा विषम् ॥ २४६ ॥ आमे सोष्णा क्रिया कार्या सा मध्वामे विरुध्यते । मध्वामं दारुणं यस्मात्सद्यो हन्याद्यथा विषम् ॥ २४७ ॥ नानाद्रव्यात्मकत्वाच्च योगवाहि परं मधु । इतीक्षुविकृतिप्रायो वर्गोऽयं दशमो मतः ॥ २४८ ॥ • इक्षुविकारवर्ग—गन्ने का दांतों से चूसकर खाया हुआ रस वीर्य-वर्द्धक, शीतल, रेचक, स्निग्ध, पौष्टिक, मधुर एवं कफकारक होता है । यान्त्रिक (कोल्हू) में पेल कर निकाला हुआ रस विदाहयुक्त हो जाता है । छिलके और गांठ के योग से उसमें विदाह उत्पन्न होता है और बाहर धूप में वायु के योग से भी विदाह उत्पन्न होता है । पौंण्डा (नरम छिलके का) गन्ना अधिक शीतल, अधिक निर्मल (प्रसन्नता देने वाला) और अधिक मीठा होता है, बांस गन्ना इससे उतर कर होता है । गुड़—अतिशय कृमि, मज्जा, रक्त, मेद, और मांस को बढ़ाता है । क्षुद्र गुड़ ( काले रंग का गुड़ ), चार भाग तीन भाग और आधा भाग बचा- कर गन्ने के रस से बनाये गुड़ की अपेक्षा पूर्वापर क्रम से गुरु हैं। अर्थात् क्षुद्र गुड़ चार भाग से बने गुड़ से और चार भाग का गुड़ तीन भाग के गुड़ से अधिक गुरु हैं। साफ़ करके बनाया हुआ अर्थात् थोड़े मल वाला गुड़ कम नुकसान करता । इसके पीछे मत्स्यण्डिका (राब) खांड, शक्कर, उत्तरो- त्तर निर्मल-स्वच्छ होते जाते हैं और जिस प्रकार इनमें स्वच्छता बढ़ती है उसी प्रकार शीतलता भी बढ़ती जाती है । अर्थात् राब से खाण्ड और खाण्ड से शक्कर शीतल है । गुड़ से बनी शक्कर वीर्यवर्धक, क्षीण, उरःक्षत के रोगी के लिये हितकारी स्नेहयुक्त होती है । धमासे के क्वाथ से बनाई शर्करा कषाय, मधुर रस, शीतल और कुछ तिक्त होती है । मधु की शर्करा, रूक्ष, वमन, अतिसार नाशक, छेदक (कफ आदि को तोड़ने वाली) होती है । तृष्णा रक्तपित्त और दाह रोग में सब शर्करायें प्रशस्त हैं । मधु के गुण—मधु की चार जातियां हैं । यथा १. माक्षिक (बड़ी मक्खियों या पिंगल रंग की मक्खियों से बना), २. भ्रामर (भ्रमरोंद्वारा बनाया) ३. क्षौद्र (छोटी मक्खियों द्वारा बना) ४. पौत्तिक (पीली मक्खियों से बना श्वेत रंग का)। इन चारों प्रकार के शहद में 'माक्षिक' शहद श्रेष्ठ है । भ्रमरों से बनाया मधु विशेषतः गुरु होता है । माक्षिक शहद का रंग तेल के समान (पीला) और
३५८ चरकसंहिता [ अ० २७ पौत्तिक शहद का रंग घी के समान ( सफेद ) पीला होता है । क्षौद्र शहद श्वेत होता है' । मधु—वायुकारक, गुरु, शीतल, रक्त-पित्त, कफना शक, व्रणों को जोड़ने वाला, कफ मेद आदि को उखाड़ने वाला, रूक्ष, कषाय और मधुर होता है । मधु नाना प्रकार के फूलों से विषैली मक्खियों द्वारा उत्पन्न किया जाता है, इसलिये इसे गरम करके देने से अथवा गरम अवस्था में मनुष्य को देने से मारक होता है ।* मधु गुरु, रूक्ष और कषाय रस, तथा शीतल होने से थोड़ा सेवन करना उत्तम है । मधु के अधिक खाने से उत्पन्न आम रोग जैसा कष्टसाध्य दूसरा रोग नहीं है । क्योंकि इसकी चिकित्सा में विरोध है । इसलिये विष की भांति मनुष्य को शीघ्र मार देता है । क्योंकि आम-विकार में उष्ण क्रिया करनी चाहिये, वह मधु में विरुद्ध है; और मधु के हितकारी जो शीतल क्रिया है, वह आमरोग के विरुद्ध है । इसलिये मधुजन्य आमरोग दारुण रोग है, इसलिये वह विष की भाँति मनुष्य को शीघ्र मार देता है । नाना प्रकार की रस-वीर्य वाली ओषधियों के पुष्पों से उत्पन्न होने के कारण मधु में नाना प्रकार की शक्तियां छिपी रहती हैं । इसलिये तथा प्रभाव के कारण मधु योगवाही अर्थात् वमनकारक, आस्थापन या वृष्य कर्म करने वाले जिस द्रव्य के साथ दिया जाता है वैसा ही कार्य करता है । इस प्रकार से यह दसवां इक्षुविकार-वर्ग समाप्त हुआ ॥ २३६-२४८ ॥ इतीक्षुवर्गः । अथ कृतान्नवर्गः । क्षुत्तृष्णा-ग्लानि-दौर्बल्य-कुक्षिरोग-विनाशिनी २ । स्वेदाग्निजननी पेया वातवर्चोऽनुलोमनी ॥ २४९ ॥ तर्पणी ग्राहिणी लघ्वी हृद्या चापि विलेपिका । १. सुश्रुत में आठ भेद किये हैं— 'पौत्तिकं भ्रामरं क्षौद्रं माक्षिकं छात्रमेव च । आर्घ्यमौद्दालिकं दात्रमित्यष्टौ मधुजातयः ॥'
- शिलाजतु, तैल आदि भी योगवाही हैं। योगवाही होने पर भी स्नेहन कार्य में शहद प्रयुक्त नहीं होता । वायु में रूक्षादि गुण हैं । मधु में रूक्ष, कषाय गुण विशेषतः स्पष्ट हैं । २. रोगज्वरापहा इति पाठः ।
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३५६
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३५६ मण्डः संदीपनत्यग्निं वातं चाप्यनुलोमयेत् ॥ २५० ॥ मृदूकरोति स्रोतांसि स्वेदं संजनयत्यपि । लङ्घितानां विरिक्तानां जीर्णे स्नेहे च तृष्यताम् ॥ २५१ ॥ दीपनत्वाल्लघुत्वाच्च मण्डः स्यात्प्राणधारणः । लाजपेया श्रमघ्नी तु क्षामकण्ठस्य देहिनः ॥ २५२ ॥ तृष्णातीसारशमनो धातुसाम्यकरः शिवः । लाजमण्डोऽग्निजननो दाहमूर्च्छानिवारणः ॥ २५३ ॥ मन्दाग्निविषमाग्नीनां बाल-स्थविर-योषिताम् । देयश्च सुकुमाराणां लाजमण्डः सुसंस्कृतः ॥ २५४ ॥ क्षुत्पिपासापहः पथ्यः शुद्धानां तु मलापहः । शृतः पिप्पलीशुण्ठीभ्यां युक्तो लाजाम्लदाडिमैः ॥ २५५ ॥ पेया ( ग्यारह गुने पानी में थोड़ी स्विन्न होने पर बनी हुई कांजी ) भूख, प्यास, ग्लानि, दुर्बलता, उदर रोग को नष्ट करती है, स्वेदकारक, अग्नि को बढ़ाती और वायु, मल का अनुलोमन करती है । विलेपी ( चार गुने पानी में बनाई ) तृप्तिकारक, संग्राही लघु, हृदय के अनुकूल होती है । मण्ड ( चौदह गुने पानी में तैयार किया ) अग्नि का दीपन और वायु का अनुलोमन करता है, स्रोतों को कोमल करता तथा पसीना लाता है । उपवास किये, विरेचन किये, स्नेहपान के जीर्ण होने पर, प्यास लगने पर; अग्निदीपक और लघु होने से मण्ड का सेवन करना उत्तम है ( मण्ड, लघु और दीपक गुण वाला है ) । लाजपेया ( लाज अर्थात् खीलों से बनाई पेया ) श्रमनाशक, गले के खुश्क होजाने पर हितकारी है । लाजमण्ड, अग्निवर्धक, दाह-मूर्च्छानाशक है । मन्दाग्नि और विषमाग्नि वाले पुरुषों के लिये, बालक, वृद्ध, स्त्रियों को तथा कोमल-नाजुक प्रकृति वालों को लाजमण्ड पका करके देना चाहिये * । जो भूख और प्यास को सहन न कर सकते हों, पथ्य सेवन करते हों, वमन विरेचन से जो शुद्ध देह वाले हों, परन्तु थोड़ा मल वमन विरेचन के पीछे रुक गया हो इस अवस्था में पिप्पली, सोंठ, अनारदाना ( खट्टे अनार के रस ) से बनाया लाजमण्ड अग्नि को बढ़ावा और वायु का अनुलोमन करता है ॥ २४९-२५५ ॥ सुधौतः प्रस्रुतः स्विन्नः संतप्तश्चौदनो लघुः । अधौतोऽप्रस्रुतोऽस्विन्नः शीतश्चाप्योदनो गुरुः ॥ २५६ ॥ भृष्टतण्डुलमिच्छन्ति गरश्लेष्मामयेष्वपि । मांस-शाक-वसा-तैल-घृत-मज्ज-फलौदनाः ॥ २५७ ॥
- धनिया, पिप्पली, सोंठ, मरिच के साथ पकाना चाहिये ।
बल्याः संतर्पणा हृद्या गुरवो बृंहयन्ति च । तद्वन्माषतिलं क्षीर-मुद्ग-संयोग-साधिता ॥ २५८ ॥ कुल्माषा गुरवो रूक्षा वातला भिन्नवर्चसः । स्विन्नभक्ष्यास्तु ये केचित्सौप्य-गोधूम-यावकाः ॥ २५६ ॥ भिषक् तेषां यथाद्रव्यमादिशेद् गुरुलाघवम् । अकृतं कृतयूषं च तनुं सांस्कारिकं रसम् ॥ २६० ॥ सूपमम्लमनम्लं च गुरुं विद्याद्यथोत्तरम् । भली प्रकार से धोये, मांड निकाले, गलाये हुये, गरम-चावल (भात ) लघु होते हैं । गलाये और ठण्डे चावल गुरु हो जाते हैं । कृत्रिम विष और कफजन्य रोगों में भूने हुए चावलों का भात अच्छा है । पूरे न धोये, बिना मांड उतारे, मांस, शाक, वसा, तैल, घृत, मज्जा और फल इनको मिलाकर तैयार किये चावल बलकारक, सन्तर्पक हृदय प्रिय, गुरु और पौष्टिक होते हैं । इसी प्रकार उड़द, तिल, दूध, मूंग, के योग से बनाये भात भी इसी प्रकार गुणकारक होते हैं । कुल्माष ( जौ को थोड़ा सा पकाकर ) गुरु रूक्ष, वायुका- रक और रेचक होते हैं । स्विन्नभक्ष्या ( भाप देकर तैयार की वस्तुएँ ) जो उड़द, मूंग, गेहुं, जौ आदि से पिठ्ठी करके बनाये जांय, वे जिस वस्तु से बनाये जाते है उसी वस्तु के अनुसार गुरु या लघुगुण वाले होते हैं । अकृतयूष ( धनिया आदि मसाले से संस्कार न किया हुआ यूष ), कृत- यूष ( मसाले से संस्कार किया ), पतला एवं सांस्कारिक [ बहुत-मांस-स्नेहादि से संस्कृत ] मांस रस; अम्लसूप ( खट्टी दाल ) और अनम्ल सूप, ये उत्तरोत्तर भारी हैं X अर्थात् अकृत यूष से कृतयूष भारी है, तनुमांस रस से सांस्कारिक मांस रस भारी है । अम्ल सूप से अनम्ल सूप भारी है ॥ २५६–२६० ॥ सक्तवो वातला रूक्षा बहुवर्चोऽनुलोमिनः ॥ २६१ ॥ तर्पयन्ति नरं सद्यः पीताः सद्योबलाश्च ते । मधुरा लघवः शीताः सक्तवः शालिसंभवाः ॥ २६२ ॥ ग्राहिणो रक्तपित्तघ्नास्तृष्णा-च्छर्दि-ज्वरापहाः । सत्तू वायुकारक, रूक्ष, पुष्कल मल उत्पन्न करने वाले, वायु के अनुलो- मक, पीने पर जल्दी ही तृप्ति करने वाले, एवं शीघ्र बलकारक हैं ॐ शालि X अस्नेहलवणं सर्वमकृतं कटुकैर्विना । विज्ञेयं लवणस्नेहकटुकैः संस्कृतं कृतम् ॥ ॐ सुश्रुत ने—"पवनापहा" वायुनाशक लिखा है ।