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इच्छानुसार संतान

Ichhanusar Santan

by बीरेन्द्र गुप्त (Virendra Gupta)

Source: Mumukshu Bhawan Varanasi Collection - इच्छानुसार सन्तान · अश्विनी कुमार, प्रकाशन मन्दिर / वीरेन्द्र नाथ (origin)

Devanagarihipublished250 pages

भोजन

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दौत

जब बच्चे के दौत निकलने आरम्भ होते हैं उस समय उस को इतना कष्ट होता है कि वह लिखा नहीं जा सकता। बच्चा उस समय तक बोलता नहीं इसी कारण वह अपने कष्ट को नहीं कह सकता। जिसके कारण बच्चों को ज्वर, दस्त, नेत्र रोग आदि अनेक व्याधियाँ लग जाती हैं। ऐसी अवस्था में बच्चे की विशेष सावधानी रखनी चाहिए।

सिरस के बीजों को पानी में भिगो दें जब बीज फूल जायें तो उन्हें सुई द्वारा एक डोरे में पोकर माला बना लें। यह माला बच्चे के गले में कण्ठ से लगी हुई पहिनने से दौत सुगमता से निकल आते हैं या एक लाकेट ताँबे का बनवाकर उसके बीचों बीच में आर-पार एक छिद्र कराकर उसमें जस्ता और चाँदी की मिश्रित कौल लगाकर उस पर बिजली चढ़ा लें। यह लाकेट भी बच्चों के दौत सुगमता से निकलने में साधक है। बच्चे के मसूड़ों पर शहद में सहागे की खोल मिलाकर मलना उपयुक्त है।


नेत्र

गिरती हुई नेत्र ज्योति- यह आश्चर्य की बात है कि वर्तमान पीढ़ी की आँखों की ज्योति गिरती जा रही है। इससे भी अधिक आश्चर्य जनक तथ्य यह है कि इसका कारण स्पष्ट करने वाला कोई वैज्ञानिक सिद्धान्त विद्यमान नहीं है। यद्यपि इसका कारण वंश परम्परा, पौष्टिक पदार्थों की कमी, जीवन का आधुनिक सभ्य ढंग, स्वास्थ्य की दुर्बलता बताये जाते हैं। फिर भी वास्तविक कारण अभी भी कल्पना का विषय बना हुआ है।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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पशु-पक्षियों के जीवन के सूक्ष्म अध्ययन और इस तथ्य के आधार पर कि पुरानी पीढ़ी के लोगों में नेत्र विकार व्यापक रूप धारण किये हुए न था, मैं यह सुझाव देना चाहूँगा कि नेत्र विकार का एक कारण यह है कि जन्म के होते ही बच्चे को तेज, कृत्रिम और अत्यभाविक रोशनी के दर्शन करा दिये जाते हैं। पशु-पक्षी का कोई बच्चा उस दिन आँखें नहीं खोलता जिस दिन वह जन्म लेता है। परन्तु मानवीय बच्चों को जन्म ग्रहण करते समय ही न केवल सूर्य की अपितु कृत्रिम तेज रोशनी दिखा दी जाती है।

पुरानी पीढ़ी की मातायें प्रसव के बाद के सप्ताह में अन्धेरे कमरों में रहती थीं। इस प्रथा से बहुत सम्भवतः शिशु के नेत्र विकारों से मुक्त रहते थे। वैज्ञानिक दृष्टि से भी नवजात बच्चों को अत्यधिक प्राणपद वायु में रखने से उनमें नेत्र विकार का होना सिद्ध हो चुका है।

बच्चों के नेत्र विकार का एक कारण जैसा ऊपर कहा गया है। उनका जन्म के समय अत्यधिक प्रकाश में रखा जाना ही हो सकता है मेरा यह सुझाव नहीं कि प्रसव एकदम घोर अधिधारे कमरे में हो, मेरा सुझाव तो यह है कि नवजात शिशु को एक सप्ताह तक तेज स्वभाविक तथा अस्वाभाविक प्रकाश से बचाया जाय। सम्भव है ऐसा करने से हम बच्चों की आँखों को क्षति पहुँचने से बचा सकें।

बालक के नेत्रों को धुएँ और तीव्र प्रकाश से बचायें, प्रकाश उनके नेत्रों पर न पड़े परन्तु पीछे की ओर प्रकाश रखें। बच्चे के नेत्रों में नित्य सरसों के तेल की पारी हुई स्याही में शुद्ध देसी घी मिलाकर लगाना चाहिए या बिना घी मिलाये भी कोरी स्याही लगा सकते हैं। इससे बच्चों के नेत्र बढ़ते हैं। यदि यह स्याही बच्चों के ५ वर्ष तक लगाते रहें तो बच्चों को नेत्र रोगों के होने का भय नहीं रहता।

★★★

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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भोजन

बच्चों को एक बादाम दूध में घिस कर नित्य चटाना उत्तम है। बच्चों को कम से कम ५ नग मुनक्का नित्य सेवन करानी चाहिए। मुनक्का से शक्ति बढ़ती है और शरीर में रक्त उत्पन्न होता है। बच्चे को अन्न कम से कम १॥ या २ वर्ष के पश्चात् ही देना उत्तम है।

बच्चों को दिन में एक बार या दूसरे दिन सुहागे की खील १ रत्ती दूध में घोलकर देने से पेट ठीक रहता है और यह बच्चों का कैलिशियम है।

बच्चों को ठण्ड का विकार हो जाने पर जायफल और केशर जल में घिस कर दिन में दो बार देना चाहिए। अथवा देसी घी में जायफल घिस कर सीने पर मलना भी उत्तम है।


रक्षा

बच्चों की रक्षा का भार माता-पिता ही पर है। बच्चों को खोटी संगत, खोटे अध्यापक, खोटे सेवक और दुराचारी जनों से सदैव बचाते रहना चाहिए। बच्चों को नाच रंग, श्रृंगारित खेल तमाशे तथा अन्य दूषित वातावरण वाले स्थानों में नहीं भेजना चाहिए तथा साथ भी न ले जाना चाहिए। इससे बच्चों का ब्रह्मचर्य खण्डित हो जाने का भय है। बच्चों के वस्त्र पर मौहल्ले का नाम तथा मकान नम्बर और पिता का नाम लिखवा देना चाहिए, जिससे बच्चा खो जाने पर सुगमता से कोई भी उसे उसके वस्त्र पर लिखे पते पर पहुँचा दे।

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वीरेन्द्र गुप्तः

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शिक्षा

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गन्धारों राजा धृतराष्ट्र की पत्नी बड़ी पतिव्रता थीं। इनके पति अन्धे थे, तो यह भी सारी आयु अपनी आँखों पर पड़ी बाँधे रहیں। वे महाभारत युद्ध समाप्त होने के पश्चात् एक दिन कुन्ती से जो युधिष्ठिर की माता थीं कहने लगीं कि मैं जैसी पतिव्रता हूँ वैसी तु नहीं पर मेरे सब पुत्र युद्ध में मारे गये और तेरे सब जीवित हैं इसका क्या कारण है? क्या परमात्मा के घर भी अन्धे हैं? उसने उत्तर दिया— कदापि नहीं। पतिव्रता होने का फल है कि उसका पति जीवित रहे, सो यह सीमायु तुरन्त प्राप्त है तेरा पति जीवित है, पर उसका यह फल तो नहीं कि उसके पुत्र भी जीवित रहें। इस कार्य को तुने नहीं किया मैंने किया। सो मेरे पुत्र जीवित हैं तेरे नहीं। 'जो औरों का अहित चाहता है उसका स्वयं अहित होता है।' यह बात सत्य और पुरातन है।

तुने मेरे पुत्रों को मारने के अर्थ लाक्षादि भवन बनवाया यह सोच कर कि उसमें आग लगा दी जायेगी तो सब मर जायेंगे, पर मारने वाले से जिलाने वाला बड़ा है। मुझे विदुर द्वारा पता लग गया, मैं अपने बच्चों को उसमें से निकाल ले गई। पीछे आग लगा दी गई और भीलनी पाँच पुत्रों सहित जलकर मर गयी। ऐसी दशा में तेरे पुत्र कैसे जीवित रहते।

'आज भी मूर्ख स्त्रियाँ चौराहों आदि में उतारे कराकर इस लिये रखती हैं कि उनको लौधकर औरों के बच्चे मर जायें और मेरे बच जायें। जिसका परिणाम बहुधा उल्टा ही होता है। कोई दुष्टा तो मेढ़े, बकरे, मुर्गे आदि यह समझ कर कटवाती हैं कि जीव के बदले जीव देने से मेरा बच्चा बच जायगा और एक हत्या का पाप सर पर रखती हैं। परमेश्वर को भोला बुद्ध अपना जैसा जानती हैं। ईश्वर के यहीं भी अन्धे समझ रखा है।'

पुत्रों को जीवित रखने का उपाय मैंने किया।

देख लो मेरा पति जीवित नहीं पर बच्चे जीवित हैं।

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वीरेन्द्र गुप्तः

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मैंने लाक्षागृह से निकल कर एक चकरा नाम के एक नगर में पुत्रों सहित एक ब्राह्मणी के गृह पर निवास किया, उस ब्राह्मणी के एक पुत्र था। उस नगर में एक ब्रह्म नाम के राक्षस ने उपद्रव मचा रखा था। वह एक व्यक्ति को नगर से नित्य उठा ले जाता था और उसे खा जाता था। राजा ने तंग आकर अपनी प्रजा में से बारी नियत कर दी थी। जिसकी बारी होती वही अपने पुत्र को स्वयं एक स्थान पर पहुँचा देती थी।

एक दिन उस ब्राह्मणी के पुत्र की बारी आई। पुत्र की ममता का हाल आपको क्या बताऊँ पुत्रवती स्त्रियाँ ही जानती हैं। वह जल बिना मीन जैसे तड़पती थी। उसे व्याकुल देख मेरा भी हृदय कम्पित हो उठा, मैंने उससे कहा कि तू इतनी व्याकुल, विकल न हो मेरे साथ मेरे पाँच पुत्र हैं मैं उनमें से एक को आज तेरे पुत्र के बदले भेज दूँगी। उसने मेरी बात का विश्वास न करके अपने विद्यारानुकूल उत्तर दिया कि संसार में कहीं ऐसा हुआ है, मुझे जितनी एक की ममता है तुझे उतनी ही पाँच की होगी, हाथ की पाँच उंगलियों में से जिसे काटो उसी में दर्द होता है। क्या तुझे अपना कोई पुत्र भारू है वा कुथारा है मैंने कहा मेरे सब झींझों के तारे और प्राणों से प्यारे हैं, परन्तु सब शुभ कर्मों का निचोड़ (तत्व) परोपकार है।

आत्मार्थ जीवलोकेऽस्मिन्तनको न जीवति मानवः।

परपरोपकारार्थ योजीवति सजीवति॥

परोपकार शून्यस्य धिड् मनुष्यस्य जीवितम्।

धन्यास्ते पशवो येषां चर्मोप्युपकरिष्यति॥

अर्थ- अपने लिए तो सभी जीते हैं पर जीना उसका है जो दूसरों के लिए जीता है। जो उपकारी नहीं उससे तो पशु ही अच्छे हैं जो मरने पर भी चमड़े से उपकार करते हैं।

अन्त को मैंने भीम को उस दुष्ट राक्षस की भेंट के लिये भेजा। इसने जाकर प्रथम तो सब पकवानादि जो स्त्रियाँ लायी थीं

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योगेन्द्र गुप्तः

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खा लिया और कहा जब वह मुझे खायेगा तो सब उसके पेट में पहुँच जायगा। फिर जब वह राक्षस आया और नित्य जैसा मीठा आदि और व्यक्ति नहीं देखा तो बड़े भयंकर शब्द से गंजा, तभी भीम ने भी उससे ऊँचे स्वर से उत्तर दिया कि सामान तो मैंने खा लिया है अब तू मुझे खा ले सब तेरे पेट में पहुँच जावेगा व्यर्थ क्यों चिल्लाता है। पर वह ज्यों ही इसकी ओर झपटा तभी भीम ने उसे पकड़ कर भूमि पर दे पटक और उसके दोनों पैर चीर कर फेंक दिये। उसके मरते ही वहाँ जय-जयकार की ध्वनि चहुँ ओर गुँज उठी। 'भीम ने केवल उस ब्राह्मणी का ही कष्ट दूर नहीं किया वरन् नगर के सभी बालकों को प्राण दान दिया। इसलिए मेरे बच्चे कैसे मरते।'

जो दूसरों की रक्षा करने के लिये अपने आपको और अपने बच्चों की आहुति देता है, उसे तथा उसके बच्चों की रक्षा ईश्वर करता है और चिरंजीवी होने का वरदान देता है।


शिक्षा

भारत में स्वतन्त्र होने से पूर्व राज्य कार्य, बोलचाल तथा शिक्षा आदि सभी कार्य उर्दू भाषा के माध्यम से होते थे। उसी समय में एक धनी पुरुष सेठ मोतीचन्द के एक इकलौता पुत्र था। उनके और कोई सन्तान न थी। देश में उर्दू का प्रचार होने के कारण सेठ मोतीचन्द ने एक मौलाना लड़के को पढ़ाने के लिए लगा लिया। वह मौलाना कई वर्ष तक लड़के को पढ़ाते रहे। अपने स्वभाव के अनुसार मौलाना साहब पौन घण्टा लड़के को उर्दू पढ़ाते और शेष पाव घण्टे में अपने मजहब की प्रशंसा करते। जिसका लड़के पर यह प्रभाव पड़ा कि उसने मुसलमान होना स्वीकार कर लिया और अपने माता-पिता से कह दिया कि मैं मुसलमान मजहब

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वीरेन्द्र गुप्तः

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को ग्रहण करैगा। पिता के अधिक समझाने पर उसने कहा- 'मेरे कुछ प्रश्न हैं उनका समाधान हो जाने पर मैं मुसलमान नहीं बर्नुंगा। पिता ने अनेक विद्वान पण्डितों को बुलाकर लड़के की शंकाओं का समाधान कराया, परन्तु वह सन्तुष्ट न हुआ। तब फिर लड़के ने पिता से कहा- 'मुझे स्वर्ग में जाना है, संसार में ऊँचा उठना है। यह सब मुसलमान बनने से ही हो सकेगा, हिन्दू रहने से नहीं।' पिता ने कहा- 'एक सप्ताह और छहरो।'

एक दिन सार्यकाल समय सेठ जी दुकान पर बैठे थे उस समय एक सन्यासी ने आकर सेठ जी से भोजन की पिशा माँगी। सेठ जी ने सन्यासी को घर ले जाकर भोजन तैयार कराया। सेवक भोजन लेकर आया और सन्यासी के सामने रखकर चला गया। इसी बीच में सन्यासी ने सेठ की मुद्रा देखी फिर सामने भोजन तैयार करते हुए सेठानों को तथा सेवक को भी, यही तक भवन की चाहर दीवारी को भी उदास, चिन्तित और खिन्न देख ऐसा अनुभव होता था कि भवन में चहुँ और दीवारों से औसू टपक रहे हों। यह दृश्य देखकर सन्यासी कम्पित हो उठा और मन ही मन कहने लगा- 'कि हम सन्यासियों का यह कर्तव्य नहीं कि भोजन माँगें और खाकर चले जायें। परन्तु हमारा यह भी कर्तव्य है कि हम गृहस्थियों के कष्ट को सुनें और उसे दूर करने का भरसक प्रयत्न करें।' यह सब विचार कर और अपने ऊपर इस कर्तव्य पालन का भार समझते हुए सन्यासी ने सेठ जी से इस अशान्त वातावरण का कारण जानना चाहा। सेठ जी ने उत्तर दिया- 'महाराज यह सब गृहस्थ के धन्धे हैं आप तो भोजन पाइये।' सन्यासी ने कहा- 'सेठ जी जब तक आप इसका कारण नहीं बतायेंगे मैं भोजन नहीं पाऊँगा।' लाचार हो सेठ जी ने पुत्र को मुसलमान होने की सारी व्यथा सुनाई। सुनकर सन्यासी ने कहा 'सेठ जी आप लड़के को बुलावायें और यह भोजन उठवा लीजिये। मैं अब भोजन तब पाऊँगा जब आपके पुत्र को पुनः

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वीरेन्द्र गुप्तः

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आपके चरणों में न ला दूँ। लड़के और सन्यासी की बातोंलाप हुई। सन्यासी ने अनेक युक्तियाँ देकर लड़के को समझाया, परन्तु वह कुछ न समझा। यह देखकर सन्यासी ने एक प्रश्न लड़के के सामने रखा 'देखो बच्चा एक नदी है उसके पार एक व्यक्ति खड़ा है और एक इस ओर खड़ा है दोनों में संकेतों से बातचीत हो रही है, और दोनों ही एक दूसरे की बात का अर्थ उल्टा लगा रहे हैं। तो यह बताओ दोनों में किस प्रकार बातचीत हो।' लड़के ने कहा, 'दोनों में से किसी को तैर कर एक ही किनारे पहुँचकर बातचीत करनी चाहिए।' सन्यासी ने कहा- 'बस मेरे और तुम्हारे बीच यही अन्तर है।' लड़के ने कहा- 'यह बात मेरी समझ में नहीं आई।' सन्यासी ने कहा- 'देखो बेटा! तुम तो कोरे अरबी, फारसी के विद्वान् हो और मैं संस्कृत का, अब तुम्हें बताओ हम दोनों एक दूसरे की बात को कैसे समझ सकते हैं जब तक दोनों एक भाषा को न जानते हों। देखो मैं तो वृद्ध हूँ इस कारण अरबी आदि पढ़ने में अधिक समय लगेगा, और तुम युवक हो, तुम्हारी पढ़ने में रुचि भी है इस कारण तुम पहले संस्कृत भाषा पढ़ो।'

सन्यासी ने लड़के को संस्कृत पढ़ाना प्रारम्भ कर दी। और अपने लिए अन्य स्थानों से भिक्षा लेकर उदर पूर्ति करने लगे। अपनी तीव्र बुद्धि की कुशलता के कारण लड़के ने कुछ ही समय में संस्कृत भाषा की योग्यता प्राप्त कर ली। सन्यासी ने जब यह देखा कि वह संस्कृत में भली प्रकार चलने लगा है, तो एक दिन उसके सामने संस्कृत का एक वाक्य 'आपः' रखा और कहा कि इसका अर्थ बताओ। लड़के ने शीघ्र ही उत्तर दिया 'आपः' का अर्थ जल होता है। सन्यासी ने कहा- 'क्या इसका और कोई अर्थ हो सकता है' लड़के ने कहा- 'स्वामी जी मेरी समझ में तो इसका अर्थ और कोई नजर नहीं आता।' सन्यासी ने कहा 'बेटा! इस आपः शब्द के अनेक अर्थ हैं, जैसे आपः का अर्थ है अक्षिति (जो कभी क्षीण न होता हो) यज्ञ, वीर्य, प्राण,

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वीरेन्द्र गुप्तः

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श्रद्धा, शान्ति, रस, सूर्य, चन्द्र, अग्नि, जल, वायु, विद्युत और यहाँ तक ही नहीं संस्कृत साहित्य में कहा है 'आपः सर्वे देवाः वसन्ति'। लड़का सुनता रहा और मन ही मन कहने लगा कितनी अपार विद्या है। सन्यासी ने फिर एक निम्नलिखित वेद मन्त्र रखा और कहा कि इसका अर्थ करो।

स पय्यंगाच्छृङ्गकमकायमव्रणमस्नाविर श्च शुद्धमपाविद्धम्।

कविर्मनीषि परिभूः स्वयम्भूयाथातथ्यतोऽथान्

व्यदधाच्छारवतीभ्यः समाभ्यः ॥

यजुर्वेद ४०/८

लड़के ने मन्त्र पढ़ा और उस पर विचार किया, कुछ समझ में न आया। तब लड़के ने कहा 'गुरु जी अब इस पर कल विचार होगा।' रात्रि को चारपाई पर पड़े-पड़े लड़का वेद मन्त्र के अर्थ पर विचार करने लगा। वह उसमें इतना तल्लीन हो गया कि उसे रात्रि के व्यतीत होने का अनुभव ही नहीं हुआ। चारपाई से उठा तो उसके चेहरे पर प्रसन्नता, आनन्दमयी विलक्षणता प्रतीत हो रही थी। उसके मुख को देखने से ऐसा आभास होता था कि मानो इसे कोई विलक्षण वस्तु प्राप्त हुई हो।

प्रातः कालिक नित्य कर्म से निवृत्त हो अत्यन्त हर्ष के साथ सन्यासी के सामने आकर नत मस्तक हो कहने लगा 'गुरुजी आज मेरी समस्त शंकाओं का समाधान हो गया, अब मुझे वह मजहब मिट्टी के ढेर के समान दीखता है। मैं अब कभी भी मुसलमान नहीं बर्नुंगा।'

गुरुजी मैंने अपने माता पिता को जो कष्ट दिया है वह अनजाने का था इसमें मेरा कोई दोष नहीं। क्योंकि! मुझे मेरा धर्म नहीं बताया गया था इस कारण मैं कुछ भी अपने धर्म से तुलना न कर सका। वह कहावत सत्य है 'एक ओर की बात गुड से भी अधिक मीठी होती है।' सो वही हुआ।

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वीरेन्द्र गुप्तः

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व्यवहार और कर्तव्य

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गुरु जी आपने मेरे ऊपर बड़ी दया की जो मेरे मस्तिष्क पर अज्ञान का पर्दा पड़ा हुआ था उसे अपने हटा कर प्रकाश दिखा दिया। सन्यासी ने कहा 'नहीं बेटा यह सब दया तो दयानन्द सरस्वती की है। जो आज हम अपने सत्य स्वरूप को जान कर स्वाभिमान के साथ संसार के सामने खड़े हो सकते हैं। यह जो कल मैंने तुम्हें वेद मन्त्र बताया था वह यजुर्वेद के चालीसवें अध्याय का आठवीं मन्त्र है। सदैव स्मरणीय गुरुवर दयानन्द सरस्वती ने अपनी आर्याभिविनय में इसका अर्थ 'इस प्रकार लिखा है।'

'वह परमात्मा आकाश के समान सब जगह में परिपूर्ण (व्यापक) है, सब जगत का करने वाला वही है और वह कभी शरीर (अवतार) नहीं धारण करता क्योंकि वह अखण्ड और अनन्त, निर्विकार है, इससे देह धारण कभी नहीं करता, उससे अधिक कोई पदार्थ नहीं है, इससे ईश्वर का शरीर धारण करना कभी नहीं बन सकता। वह अखण्डैकरस, अच्छेद्य, अमेद्य, निष्कम्प और अचल है। इससे अंशाशिभाव भी उसमें नहीं है, क्योंकि उसमें छिद्र किसी प्रकार से नहीं हो सकता नाड़ी आदि का प्रतिबन्ध भी उसका नहीं हो सकता, अति सूक्ष्म होने से ईश्वर का कोई आवरण नहीं हो सकता, वह परमात्मा सदैव निर्मल अविद्यादि जन्म-मरण, हर्ष, शोक, क्षुधा, तृषादि दोषोपाधियों से रहित है, शुद्ध की उपासना करने वाला शुद्ध हो होता है और मलिन का उपासक मलिन ही होता है, परमात्मा कभी अन्याय नहीं करता क्योंकि वह सदैव न्यायकारी ही है त्रकालज्ञ महाविद्वान जिसकी विद्या का अन्त कोई कभी नहीं ले सकता सब जीवों के मन (विज्ञान) का साक्षी सब के मन का दमन करने वाला है, सब दिशा और सब जगह में परिपूर्ण हो रहा है। सब के ऊपर विराजमान है, जिसका आदिकरण माता-पिता उत्पादक कोई नहीं, किन्तु वही सब का आदिकरण है, उस ईश्वर ने अपनी प्रजा को यथावत सत्य, सत्यविद्या जो चार वेद उनका सब मनुष्यों के परमहितार्थ उपदेश किया है उस

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वीरेन्द्र गुप्तः

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हमारे दयामय पिता परमेश्वर ने बड़ी कृपा से अविद्यान्धकार का नाशक वेद विद्यारूपी सूर्य प्रकाशित किया है और सबका आदिकरण परमात्मा है ऐसा अवश्य मानना चाहिए। ऐसे विद्या पुस्तक का भी आदिकरण ईश्वर को ही निश्चित मानना चाहिए, विद्या का उपदेश ईश्वर ने अपनी कृपा से किया है, क्योंकि हम लोगों के लिये उसने सब पदार्थों का दान दिया है तो विद्यादान क्यों न करेगा। सर्वोत्कृष्ट विद्या पदार्थ का दान परमात्मा ने अवश्य किया है तो वेद के बिना अन्य कोई पुस्तक संसार में ईश्वरोक्त नहीं है जैसा पूर्ण विद्यावान् और न्यायकारी ईश्वर है वैसा ही वेद पुस्तक भी है अन्य कोई पुस्तक ईश्वर कृत वेद तुल्य वा अधिक नहीं है।

बेटा! उस पारब्रह्म परमेश्वर के गुण गाओ साथ में उसे दिखाने वाले जगत गुरु ऋषिवर दयानन्द के ऋण को न भूलो। अब जाओ अपने माता-पिता से क्षमा माँगे और मेरा भोजन जिसे पाने के लिए मैं यहाँ आया था लाओ। सन्यासी जी भोजन पाकर चल दिए, सेठ जी के लाख कहने पर भी सन्यासी जी ने कुछ भी नहीं लिया और कहा मैंने तुमसे भोजन की भिक्षा माँगी थी उसे पा लिया और चले गये।

माता-पिता को बच्चों की शिक्षा पर विशेष ध्यान देना चाहिए। बच्चे के माता-पिता ही सर्व प्रथम गुरु हैं। वह बच्चे में पाँच वर्ष की आयु तक जैसे संस्कार, विचार, भाव अपने व्यवहार द्वारा भर देते हैं वह अन्त तक विद्यमान रहते हैं। बच्चों पर माता पिता के व्यवहार, कृत्य, वातावरण, खान-पान, रहन-सहन आदि का तत्काल प्रभाव पड़ता है। इसलिए बच्चों का जीवन सफल बनाने के लिए अपने जीवन को सादा, सात्विक, धार्मिक और सत्य मय बनाना पड़ेगा, तभी सन्तान भी वैसी ही होगी। बुद्धिमान जन गुरु के द्वारा सन्तानों को सर्वदा नाना प्रकार के शुभ गुणों में लगावें। यदि वे विद्वान्, शीलवान्, गुणवान् हो जाते हैं। तो वह स्वयं पूजित होते हैं और उनके द्वारा देश जाति का गौरव ऊँचा होता है और

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वीरेन्द्र गुप्तः

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अपने गुण कर्म स्वभाव से देश को उच्च शिखर पर पहुँचा देता है।

माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः।

न शोभते सभामध्ये हैसमध्येबको यथा॥

चाणक्य नीति २/१२

अर्थ- वह माता शत्रु है और वह पिता वैरी है जिसने अपने बालकों को नहीं पढ़ाया। वह सभा के बीच में ऐसे ही सोहता है, जैसे हंसों के बीच बगुला।

विद्या वह गुप्त धन है जिसे कोई चुरा नहीं सकता तथा जो वितरण करने से कम नहीं होता परन्तु बढ़ता है। विद्या में कामधेनु के समान गुण हैं, क्योंकि कुसुमय में भी यह फल देती है और विदेश में यह माता के समान है। इसीलिए विद्या को गुप्त धन कहा गया है। जो माता-पिता अपनी सन्तानों के लिये बहुत-सा पार्थिव धन छोड़ जाते हैं। उनकी सन्तानें उस धन से कुमार्गी होकर धन तथा स्वास्थ्य को खो बैठती हैं। इसलिये माता-पिता को योग्य है कि यदि वह अपनी सन्तानों को सुयोग्य, सुकर्मों देखना चाहते हैं तो वह धन, सम्पत्ति की अपेक्षा विद्यारूपी गुप्त धन ही देकर जायें। क्योंकि मुद्रारूपी धन से भाई-भाई में वैमनस्य हो जाता है और विद्या रूपी धन से स्नेह, प्रीति और सहयोग होता है।


व्यवहार और कर्तव्य

यज्ञोऽनुत्तेन क्षरति तपः क्षरति विस्मयात्।

आयुर्वि प्रापवादेन दान च परिकीर्तनात्॥

मनु ४/२३७

अर्थ- असत्य भाषण से यज्ञ नष्ट होता है, विस्मय से तप तथा ब्राह्मणों की निन्दा से आयु और चारों ओर कहने से दान घटता है।

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मूरामये। भावे हि विद्यते देवस्तस्माद्भावोहि कारणम्॥

चाणक्य नीति ८/११

अर्थ- देवता काठ में नहीं है न पत्थर में है, न मिट्टी की मूर्ति में है, देवता भाव ही में विद्यमान है, इस हेतु भाव ही सबका कारण है।

देवदत्तां पतिभ्यां विन्दते नेच्छात्तमनः। तां साध्वीं विभुयान्नित्यं देवानां प्रियमाचरन्॥

मनु ९/१५

अर्थ- देवतां की दी हुई भार्या को पति पाता है कुछ अपनी इच्छा से नहीं, इसलिये देवतां का प्रियाचरण करता हुआ उस सती का नित्य-पालन करे।

मूर्खा यत्र न पूज्यन्ते धान्यं यत्र सुसन्धितम्। दम्यत्योः कलाहो नास्ति तत्र श्रीः स्वयमागता॥

चाणक्य नीति ३/२१

अर्थ- जहाँ मूर्ख नहीं पूजे जाते, जहाँ अन्न संचित रहता है, और जहाँ स्त्री-पुरुष में कलाह नहीं होता, वहाँ लक्ष्मी स्वयं विद्यमान रहती है।

स्त्री (वज्र) तलवार के समान है। यदि तलवार को म्यान में सुरक्षित रखने के समान स्त्री को भी सुरक्षित रूप से उचित व्यवहार, कर्तव्य और अधिकारों के साथ गृह में रखा जाय तो वह भी तलवार के समान समय पर अपनी तथा परिवार की रक्षा का साधन होती है और अपना सहारा भी होती है। यद्यपि उसे अरक्षित रखा जाय तो वह रखने वाले की ही घातक हो जाती है।

पितृभिर्घ्रातृभिश्चैताः पतिभिर्देवैरस्तथा। पूज्या भूषयितव्याश्च बहुकल्याण मीप्सुभिः॥

मनु ३/५५

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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अर्थ- अपनी बहुत भलाई चाहें तो पिता भाई पति और देवर भी (वस्त्रालंकारादि से) इनका पूजन (सत्कार) करें।

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।

यत्रैतास्सु न पूज्यन्ते सर्वासन्नाऽफलाः क्रियाः॥

मनु ३/५६

अर्थ- क्योंकि जिस कुल में स्त्रियाँ पूजी जाती हैं, वही देवता रमते हैं और जहाँ इनका पूजन सत्कार नहीं होता, वही सम्पूर्ण कर्म (यज्ञादि) निरर्थक हैं।

शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कूलम्।

न शोचन्ति तु यत्रैता वर्थते तद्धि सर्वदा॥

मनु ३/५७

अर्थ- जिस कुल में स्त्रियाँ दुःखित हो शोक करती हैं, वह कुल शीघ्र नाश को प्राप्त हो जाता है, जहाँ ये शोक नहीं करतीं, वह कुल सर्वदा बढ़ता है।

स्त्रियां तु रोचमानायां सर्वं तद्रोचते कुलम्।

तस्यां त्वरोचमानायां सर्वं मेव न रोचते॥

मनु ३/६२

अर्थ- स्त्री (वस्त्राभूषणादि से) शोभित हो तो सम्पूर्ण कुल की शोभा है और उसके मलीन होने से सम्पूर्ण कुल मलीन रहता है।

सन्तुष्टो भायाया भर्ता भर्ता तथैव च।

यस्मिन्नेव कुले नित्यं कल्याणां तत्रैव ध्रुवम्॥

मनु ३/६०

अर्थ- जिस कुल में नित्य स्त्री से पति और पति से स्त्री प्रसन्न रहती है। उस कुल में निश्चय कल्याण होता है।

यदि हि स्त्री न रोचेत पुमांसं न प्रभोदयेत्।

अप्रभोदात् पुनः पुंसः प्रजनं प्रवर्तते॥

मनु ३/६२

इच्छानुसार सन्तान

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वीरेन्द्र गुप्तः

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अर्थ- यदि स्त्री पुरुष पर रुचि न रखे वा पुरुष को प्रहर्षित न करे तो अप्रसन्नता से पुरुष के शरीर में कामोत्पत्ति कभी न होकर सन्तान नहीं होती और यदि होती है तो दुष्ट होती है।

स्त्री पुरुष का मन से, वचन से और कर्म से कभी भी अपमानित न करे, इसी प्रकार पुरुष भी स्त्री का मन, वचन और कर्म से अपमानित न करे।

अनतावृतुकाले च मन्त्रसंस्कारकृत्यतिः।

सुखस्य नित्य दातेह परलोकं च योषितः॥

मनु ५/१५३

अर्थ- मन्त्र संस्कार (विवाह) करने वाला पति ऋतु और अनुतु में सुख देने वाला है, उसकी सेवा से यहाँ और परलोक में भी सुख प्राप्त होता है।

न दानैः शुध्यते नारी नोपवासशत्रैरपि।

न तीर्थं सेवया तद्भ्यदतुः पादोदकैर्यथा॥

चाणक्य नीति १७/१०

अर्थ- न दानों से, न सैकड़ों उपवासों से न तीर्थ के सेवन से, स्त्री वैसी शुद्ध होती है, जैसी स्वामी के चरण सेवा से अर्थात् पति सेवा से।

अशीलः कामवृत्ता वा गुणैर्वा परिर्वजितः।

उपचर्यः स्त्रिया साध्या सतत देववत्पतिः॥

मनु ५/१५४

अर्थ- पति शील रहित कामी तथा विद्यादि गुणों से हीन भी हो तथापित अच्छी स्त्री को देववत् आराधन योग्य है।

नास्ति स्त्रीणां पृथयज्ञो न व्रत नाप्यपोषिताम्।

पतिं शुश्रूषते येन तेन स्वर्गं महीयते॥

मनु ५/१५५

इच्छानुसार सन्तान

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अर्थ- स्त्रियों का अलग कोई यज्ञ नहीं, न व्रत न उपवास केवल एक पति की शुश्रूषा से स्वर्ग में पूज्य हो जाती है।

पाणिग्रहस्थ साध्वी स्त्री जीवतो वा मृतस्य वा।

पतिलोकम भीष्मन्ती नाचरेतिकञ्चदप्रियम्॥

मनु ५/१५६

अर्थ- पति की इच्छा करने वाली स्त्री जीवित या मृत पति को अप्रिय कोई कर्म न करे।

जिस समय श्री रामचन्द्र जी बन जा रहे थे उस समय उनकी माता कौशिल्या ने भी साथ बन चलने को कहा उस समय यह उपदेश रामचन्द्र जी ने अपनी माता को दिया था।

भर्तृः किल परित्राया नृशंसः केवलं स्त्रियाः।

स भवत्या न कर्तव्यो मनसापि विग्रहितः॥

वाल्मीकि रामायण अयोध्या काण्ड २०/१२

अर्थ- स्त्री के लिये पति का त्याग करना बड़ा निन्दित कर्म है, वह निन्दित कर्म आपको मन में भी नहीं लाना चाहिये।

यावज्जीवति काकृत्यस्थः पिता मे जगतीपतिः।

शुश्रूषा क्रियतां तावत्स हि धर्मः सनातनः॥

बा- रा- अयोध्या काण्ड २४/१३

अर्थ- जब तक मेरे पिता जीवित हैं तब तक आप उनकी सेवा करती रहें, यही प्राचीन धर्म है।

जीवन्त्या हि स्त्रिया भर्ता देवतं प्रभुरेव च॥

बा- रा- अयोध्या काण्ड २४/२१

अर्थ- स्त्री के जीते जी उसका पति ही उसका देवता और स्वामी है।

ब्रतोपवासनिरता या नारी परमोत्तमा॥

भर्तारं नानुवर्तत सातु पापगतिर्भवतु।

भर्तुः शुश्रूषया नारी लभते स्वर्गमृतम्॥

बा- रा- अयोध्या काण्ड २४/२५, २६

इच्छानुसार सन्तान

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अर्थ- कोई स्त्री कितनी श्रेष्ठ हो और चाहे नाना प्रकार के व्रत एवं उपवास करती हो, किन्तु यदि वह अपने पति की सेवा करती हुई उसकी अनुयायिनी नहीं होती तो वह नरक में जाती है। पति की सेवा से स्त्री उत्तम स्वर्ग को प्राप्त करती है।

अपि या निर्गमस्कारा निवृत्ता देवपूजनात्।

शुश्रूषामेव कुर्वीत भर्तुः प्रियहिते रता॥

वा० रा० अयोध्या काण्ड २४/२७

अर्थ- वह चाहे किसी पूज्य को नमस्कार भी न करे और चाहे किसी देवता की पूजा तक भी न करे। अपने पति के प्रिय तथा हितकारी कार्य में तत्पर स्त्री स्वामी की सेवा ही करती रहे।

एषधर्मः पुरा दृष्टो लोके वेदे श्रुतः स्मृतः।

अग्निकार्येषु च सदा सुमनोभिश्च देवताः॥

वा० रा० अयोध्या काण्ड २४/२८

अर्थ- स्त्रियों का यही धर्म प्राचीन काल से चला आ रहा है। यही वेद विहित है और यही लोक में प्रचलित है। हे माता जी! आप यहाँ मन लगा कर अग्निहोत्रादि, विद्वान् तथा व्रतशील ब्राह्मणों की सेवा करती रहें।

एक सन्यासी जंगल में तप कर रहे थे। एक दिन उनके ऊपर चिड़िया ने बीट कर दी सन्यासी ने क्रोधित हो चिड़िया की ओर देखा, देखते ही चिड़िया भस्म होकर भूमि पर गिर पड़ी। सन्यासी ने समझा कि अब मेरा तप पूर्ण हो गया। वह जब नगर में भिक्षा मांगने गये तो एक गृह पर जाकर भिक्षा माँगी, अन्दर से स्त्री ने कहा अभी आती है, कुछ देर बाद सन्यासी ने पुनः पुकारा तो अन्दर से ध्वनि आई अभी आती है, जब अन्दर से कोई नहीं आया तो सन्यासी ने पुनः पुकारा और अन्दर से ध्वनि आई, आती है, तत्काल एक स्त्री अन्दर से आटा लेकर आई, सन्यासी ने क्रोध की दृष्टि से स्त्री को देखा। स्त्री सन्यासी को क्रोधित देखकर कहने लगी, महाराज मैं वन की चिड़िया नहीं

इच्छानुसार सन्तान

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हूँ जो भस्म हो जाऊँ। सन््यासी ने चकित होकर स्त्री से पूछा, देवी तुम्हें कौन-सी शक्ति प्राप्त है जिससे तुमने यह जान लिया कि मैंने वन में चिड़िया को भस्म किया था। स्त्री ने कहा महाराज यह शक्ति मुझे पति सेवा से प्राप्त हुई है। जब आपने भिक्षा माँगी थी उस समय मैं अपने पति की सेवा कर रही थी, जब सेवा से निवृत्त हुई तभी आपके लिए आटा लाई हूँ।

महाभारत

पति यानाभिचरति मनो वाग्देहसंयता। सामर्तूलोकमाप्नोति सधिदः साध्वीतिचोच्यते॥

मनु ५/१६५

अर्थ- मन वाणी देह से जो पति को दुःख नहीं देती वह पति लोक को प्राप्त होती है और अच्छे पुरुष उसको साध्वी कहते हैं।

पुरुषों को पर स्त्री गमन नहीं करना चाहिए और स्त्रियों को पर पुरुष गमन नहीं करना चाहिए। क्योंकि इस कर्म के करने से स्त्री पुरुष दोनों को ही इस पाप कर्म का फल भोगना होता है।

न ही दूशमानायुष्यं लोके किञ्चन विद्यते।

यादृशं पुरुषस्येह परदारोपसेवनम्॥

मनु ४/१३४

अर्थ- इस प्रकार का आयुक्षय करने वाला संसार में दूसरा कोई कर्म नहीं है (जैसा मनुष्य की आयु घटाने वाला) दूसरे की स्त्री का सेवन है।

परदारान् गच्छेच्च मनसापि कथञ्चन।

किमु वाचास्थिबन्धोऽपि नास्ति तेषु व्यवधानिम्॥

विष्णु पुराण ३/१२/१२३

अर्थ- पर स्त्री से तो वाणी से क्या मन से भी प्रसंग न करे, क्योंकि उनसे मैथुन करने वालों को अस्थि बन्धन भी नहीं होता अर्थात् उन्हें अस्थि शून्य कीटादि होना पड़ता है।

इस लिये स्त्रियों पतिव्रता और पुरुष पत्नीव्रत धर्म का पालन करें।

इच्छानुसार सन्तान

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साभार्या या शुचिर्दक्षा सा भार्या या पतिव्रता। सा भार्या या पतिप्रीता सा भार्या सत्यवादिनी॥

षाणव्य नीति ४/१३

अर्थ- भार्या वही है जो पवित्र और चतुर हो, भार्या वही है जो पतिव्रता है, भार्या वही है जो पति से प्रीति रखती है भार्या वही है जो सत्य बोलती है।

पिता रक्षति कोमारे भर्ता रक्षति यौवन।

रक्षन्ति स्थिरिरे पुत्रा न स्त्री स्वातन्त्र्यमर्हति॥

मनु १/३

अर्थ- बाल्याऽवस्था में पिता रक्षा करता है। यौवन में पति रक्षा करता है। बुढ़ापे में पुत्र रक्षा करते हैं। स्त्री स्वातन्त्रता के योग्य नहीं।

तथा नित्यं यतेयातां स्त्रीपुंसौ तु कृतक्रियौ।

यथा नाभिचरेतां तौ विमुक्वावितरेतरम्॥

मनु १/१०२

अर्थ- विवाह वाले स्त्री पुरुषों को सदा ऐसा यत्न करना चाहिये जिसमें कभी आपस में जुदाई न हो।

आदर्श नारी के छः रूप

परामर्श में है मन्त्री सी, सेवा में नित दासी है।

भोजन में है माता सम, शयन-समय रंभा-सी है॥

धर्म-कर्म में सदा सगिनी, रोष-सहिष्णु धरा-सी है।

छः आदर्श गुणों से शोभित नारि पुण्य की राशि है॥

अधिकोश देखा गया है विवाह से पूर्व माता पुत्र में प्रेम, स्नेह बना होता है और विवाह के पश्चात् यह बात नहीं रहती। कहीं माता रुष्ट होती है कहीं पुत्र। विवाह से पूर्व पुत्र का पूरा प्रेम माता पर ही रहता है। विवाह के पश्चात् वह प्रेम अपनी पत्नी की ओर स्वभावता खिंचकर माता की ओर से कम हो जाता है।

इच्छानुसार सन्तान

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यह प्राकृतिक बात है। परन्तु मातायें उसको यह समझ बैठती हैं कि वह ने घर में आते ही लड़के को भड़का कर मुझसे बोलना कम करा दिया। बस यहीं सास वह, माता पुत्र के बीच अज्ञानता के कारण वैमनस्य की दीवार खड़ी हो जाती है। जब माता वह को, चेत कर बुरा भला कहती है तो पुत्र समझता है कि माता को हमारे प्रेम से चिढ़ है और माता सोचती है वह ने पुत्र को मेरे विरुद्ध कर दिया। परन्तु ना तो माता दाम्पत्य प्रेम से चिढ़ती है और न वह पुत्र को माता के विरुद्ध करती है। यह दोनों की अज्ञानता का कारण है।

“प्रेम विकसित नहीं सीमित है।”

जो प्रेम विवाह से पूर्व माता-पिता भाई बहिनों आदि में विभक्त रहता है वही प्रेम विवाह के पश्चात् सब ओर से खिंचकर पत्नी में केन्द्रित होने लगता है। यही कारण है कि विवाह के पश्चात् माता-पिता आदि से प्रेम का कुछ अंश में कम हो जाना।

स्त्री प्रेम की प्रतिमा है वह प्रेम चाहती है। चाहे वह प्रेम माता का हो, सास का हो, पुत्र का हो या पति का हो। चूड़्यावस्था में माता को पुत्र के प्रेम की आशा होती है यदि वह उस प्रेम को कम करके विवाह के पश्चात् पत्नी को दे देता है तो उससे माता को स्वाभाविक ठेस पहुँचोगी। परन्तु वह माता यह नहीं सोचती कि यदि पुत्र ने अपने प्रेम का मेरा अंश कम करके अपनी पत्नी को दे दिया तो क्या हो गया। क्या वह अपने माता-पिता के भाग का प्रेम का अंश मुझे नहीं देगी? वह अपने माता-पिता का प्रेम सास ससुर को देती है और यदि पुत्र वधू को सास का भी प्रेम प्राप्त हो जाय तो उसके हृदय में जितना सास का प्रेम स्थान ले चुका है उतना कम स्थान पति का प्रेम लेगा। क्यों?

“जिस प्रकार प्रेम सीमित है उसी प्रकार प्रेम का स्थान भी सीमित है।”

फिर पुत्र का बचा हुआ प्रेम पुनः माता की ओर खिंचेगा

इच्छानुसार सन्तान

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