भारतकोश
संग्रह पर लौटें

कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)

Kabir Sagar (11 Parts Complete)

कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished2,136 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ (सुलतानबोध)

भारतपथिक कबीरपंथी-

स्वामी श्रीयुगलानन्दद्वारा संशोधित

श्री-सुलतानबोध

मुद्रक एवं प्रकाशकः

खेमराजा श्रीकृष्णदासा,

अध्यक्ष : श्रीवेंकटेश्वर प्रेस,

खेमराज श्रीकृष्णदास मार्ग, मुंबई - ४०० ००४.

नं. ६ कबीरसागर - २

सर्वज्ञ साक्षात्पुरुषं विना अविनाशिकं सुखं विना

सर्वज्ञ साक्षात्पुरुषं विना अविनाशिकं सुखं विना

100

सत्यनाम

A black and white woodcut-style illustration of a bearded man, identified as Sri Kaveri Sahib, seated on a raised platform. He is wearing a turban and holding a mala. A lamp is visible to his left, and a decorative canopy is above him.

श्री कवीर साहिब

शिवः

शिवः प्रसन्नः

सुलतानबोध (एकादश तरंग)

सत्यपुरुषाय नमः

अथ श्रीबोधसागरे

एकादशस्तंभः

श्रीग्रन्थ सुलतानबोध

मंगलाचरण दोहा

अजर अमर सत नाम है, भंजि शोक तम पूंज ॥ तासु चरण मन रमि रहह, कमल मौर जिमि गुंज ॥

धर्मदास बचन-चौपाई

धर्मदास उठि विन्ती लाये । सतगुरु मोहि कहो ससुझाये ॥ कैसे करिये तजिय संसारा । ताको समरथ कहो विचारा ॥ आगे भये बलख के मीरा । माया सुख तजि भये फकीरा ॥ कही विधि तिन तजि पादशाई । सब वृत्तांत कहो समझाई ॥

सतगुरु बचन

कहैं कबीर सुनो धर्मदासा । बलख भेद कहूं तुम पास ॥ बलख शहर एक नगर अनूपा । तहैं सुलतान यकज्ञान सरूपा ॥ बादशाह शाहन सरदारू । प्रेम प्रीति मन माहिं विचारू ॥ इब्राहीम अद्दम जेहि माना । राज माहिं भक्ती जिन ठाना ॥ विरह उठी शाह मन माही । कारज अपना कीना चाही ॥ मनुषा जनम अमोलक पायी । ऐसे तन पाई खुदा मिलि जायी ॥ जो यहि अवसर अच्छह न पाया । क्षण महीं विनशि जायगी काया ॥ ऐसी फिकर उठी मन माई । तब षट दर्शन लिये बुलाई ॥

( ३८ )

मुलतानबोध

पण्डित साधु संन्यासी आये । जोगी जंगम यती बुलाये ॥ ज्ञानी ध्यानी सबके पीरा । काजी मुल्ला सेख फकीरा ॥ सब मिलि भेष जुड़े तहँ आयी । तिनसों वचन बूझा अर्थायी ॥ तबहि शाह सब टेर सुनायी । अल्लह रूप मुहि देहु दिखाई ॥ खुदा मिले कह कौन उपाई । कौन राम अरु कौन खुदाई ॥ एक खुदा यक और को होई । काहे भयो एक अस दोई ॥ दोऊ दीन मिलि कहो ससुझायी । दोमैं साँच कौन ठहराई ॥ दोउ कर जोड़ि सबन सो कहेऊ । बहुत अधीन आप तहँ भयऊ ॥ होय अधीन तब शीस नवायी । सबसे बूझे मन चित लायी ॥ सब मिलि कहाँ खुदाई सन्देशा । मेरे मनका मेटो अँदेशा ॥ साहब बसे कौन से देशा । सो मुहि बात कहो डुरवेशा ॥ दोऊ राह यह किनहि चलायी । किन वैकुण्ठ विहिस्त बनायी ॥ एती सब मिलि कहो दिवाना । नातो दूर करो कुफराना ॥ बिन देखे सबही दिल धरहीं । कान छिदाय अरु खतना करहीं ॥ हमरे दिलका मेटो अँदेशा । हम माने तुमरो उपदेशा ॥ हिन्दू सवे वैकुण्ठहि धावैं । सुसलमान विहस्त ठहरावैं ॥ इनमें कहाँ खुदा का बासा । बिन देखे कीनो विश्वासा ॥ किनहु खुदाका घर नहि पाया । झूठ झूठ सब ढ़ंद मचाया ॥ खुदाकी खबर न कोइ बताहीं । सबको जडो कोठरी माहीं ॥ दोऊ दीन यह किन भरमाया । खुदाकी खबर किनहु नहि पाया ॥

सारखी-दोऊ दीन समझावहू, मो मन बहुत अन्देश ॥ कौन खुदा दो दीन रचे, बसे कौन सो देश ॥ कोपे इब्राहीम तब, ये सब भरम भुलाहिं ॥ खुदा भेद कोउ ना कहे, डारो कोठरि माहिं ॥

बोधसागर

(३९)

चौपाई

चली जो बात दशो दिशि जायी । षट दर्शनको साधु रोकायी ॥ इतनी बात काशी सुनि पाई । तब उठि धाये आप गुसाई ॥ जिन्दा रूप गुसाई कीना । जाइ शाह को दर्शन दीना ॥ बैठे तस्ल आप सुलताना । जिन्दा दुआसलामा कीना ॥ दोआ सलाम हमरी नहि माना । माया के मद गर्व भुलाना ॥

सुलतान वचन

कहे सुलतान सुनो डुरवेशा । जिन्दा रूप कौन को भेशा ॥ कहाँ से आये कहाँ तुम जाओ । कौन काज हमरे घर आओ ॥ हम पूछें जो खुदाकी बानी । इल्म अल्लाहकी कहो निशानी ॥ कुदरत की कोइ आदि बतावै । सोई मुर्शिद पीर कहावै ॥ हमरे दिलमें विरह बहु आया । खुदा मिलन कोउ नाहि बताया ॥

जिन्दा वचन

जिन्दा कहे सुनो रे भाई । षट दर्शन तुम देहु बुड़ाई ॥ तब हम तुम सों ज्ञान करावै । संशय तुम्हारो सकल मिटावै ॥ षट दर्शन को छोड़ि तुम देओ । जो चाहो सो हमसो लेओ ॥ अब जनि शंका मानो भाई । जो पूछो सो देऊँ बताई ॥

सुलतान वचन

कहे सुलतान सुनो डुरवेशा । कैसे मिटे हमार अँदेशा ॥ ऐसी बात कहो अधिकार्ई । क्या तुम दुसरे आय खुदाई ॥

जिन्दा वचन

तब हम एक कला दिखलायी । भैंसा पास यक साख भरायी ॥ जब डुरवेश भैंसा लगि जायी । भैंसा से यक वचन सुनायी ॥ भैंसा कहै सांचे दुवैशा । मानो शाह इनको उपदेशा ॥ यहि दुवैश खुदा समजानो । इनसे कर्ता और न मानो ॥

(४०)

सुलतान बोध

सुनिके शाह अचम्भो भयऊ । भैंसा साख सो कैसे भरेऊ ॥ यह तो पीर औलिया आये । भैंसे पास इन साख दिवाये ॥ शाहके दिलपरतीति अस आयी । यह दुरवेश खुद आय रहायी ॥ षट दर्शन को बन्ध छुडाये । बन्दी छोर कहिकहि सब जाये ॥ सारखी-बन्दीछोर कहाइया, शहर बलख मंझार ॥

छूटे बन्ध सब भेषको, धन धन कहे संसार ॥

चौपाई

तब सुलतान अपने मन जाना । यह दुर्वैश अविगत ठाना ॥ भैंसा पास इन साख भराहीं । यह तो गति आदम की नाहीं ॥ एती कला जान जब पाये । फिरि जिन्दा से पूछन लाये ॥

सुलतान वचन

कहे सुलतान सुनो दुर्वैशा । जिन्दा रूप कौनको भेशा ॥ कहाँसे आये कहाँ तुम जाओ । इतनी सुनद कही समझाओ ॥ तुम मुशिंद पीर हमारा । हम अपने दिल कीन विचारा ॥ साखी-कहाँ से आये जिन्द जी, फेर कहाँ तुम जाव ॥

हिन्दु तुरक मैं कौन हो, मोहि कही समझाव ॥

जिन्दा वचन-चौपाई

कहे दुर्वैश सुनो रे भाई । जिन्दा रूप खुदाको आई ॥ अछाह आप सकल घटमाहीं । दोऊ दीन दोउ राह चलाहीं ॥ हम दौजख तजि विहिश्तको जाये । सौपन एक चीज तोहि आये ॥ तुम हो दीन दुनी सुलताना । राखो मियाँ सुई सहिदाना ॥ जब तुम आओगे विहिश्तके माहीं । तब हम सुई लेब तुम पाहीं ॥ यही काज तुम्हरे घर आये । मियाँ सुई धरों तुव ठाये ॥ दीन दुनी के बादशाह कहाओ । इतनी सनद हमारी लाओ ॥ सुई देव जब विहिश्त मंझारा । तब हम माने साँच तुम्हारा ॥ हँसकर शाह सुई कर लीना । सहस्र सुईका कौल तब दीना ॥

बोधसागर

( ४१ )

सुलतान वचन

जाओ विहिश्त मानो विश्वासा । सहस्र सुई लेना हम पास॥

सतगुरु वचन

इतनी गोष्ठि शाह सो कीना । तब तहाँ से पयाना दीना ॥ एक सुई उन हम सो लीना । सहस्र सुईका कौल तब दीना ॥ साखी-इतना कहि हम उठि चले, चानक शाह लगाय ।

नीमशाम के वक्त में, जुड़ी अदालत आय ॥

चौपाई

सब मिलि आय जुडे दरिखाना । बैठे आय तहाँ सुलताना ॥ शाह के हाथ सुई जब देखा । तब वजीर मन कीन विवेखा ॥ हाथ जोड़िके विनती लावा । कैसे सुई हाथ में आवा ॥

वजीर वचन

कैसे सुई हाथमें लीना । कारन कौन कहो हम चीना ॥

सुलतान वचन

कहे सुलतान सुनो दीवानाँ । बन्दा अल्लाह दिया सहिदाना॥ दुरवेश एक यहाँ चलि आया । जिन या सुई दीन हम पाया ॥ कहा दुरवेश विहिश्त तुम आव । तब या सुई लेब तेहि ठाँव ॥ ऐसे वचन कह्यो दुर्वेशा। सुई हम देन कही तेहि देशा ॥ एक सुई हम उनसे लीना । सहस्र सुईका कौल हम दीना ॥ इतना वचन कहे सुलताने । सुनत वचन विन्ती तिन ठाने॥

दीवान वचन

दीवान कहे सुनो हो साई । सुई विहिस्त कौन विधिजाई ॥ गाम परगना और ठकुराई । सबही धरा रहै यहि ठाई ॥ तात मातु सुत सुन्दर दारा । तन धन धाम सकल परिवारा॥

१ दीवान

( ४२ )

मुलतानबोध

अंत समय ये काम न आवैं । आपु चिन्हेतब जिव सुख पावैं॥ जहँ लगि जगमें दृष्टि दिखाहीं । सो सब विनशि जाय क्षणमाहीं॥ जतन करे बहुत सुख पावे । सो तन जले गडे मिटि जावे ॥ ऐसे कहि वजीर शिर नायौ । कैसे सुई संग ले जायौ ॥ समझि देखु अपने दिलमाहीं । सुई संग कौन विधि जाहीं ॥

मुलतान वचन

तब मुलतान वचन अस कहई । सुनो वजीर मता यक आहई॥ इतना लशकर संगलै जायब । हस्ती चार सो सुई भरायब ॥

वजीर वचन

हस्ती संग चले नहिं शाहा । खोजा करो तुम दिलके माहा॥ हस्ती घोडा माल खजाना । यह सब संग चले न निदाना ॥

मुलतान वचन

शाह तबै अस वचन सुनावे । बैठि सुखपालविहिश्तको जावे॥ लेवैं बाँस में सुई भरायी । यहि विधि सुई संग ममजायी॥

वजीर वचन

तब दिवान कर जोरि सुनावे । यह सुखपालकबर लगि जावे॥ आगे कस तुम करहु साई । सो मोहि वचन कहो समझाई॥

मुलतान वचन

आगे हम घोड चढ़ि जायब । लेइ जीन में सुई भरायब ॥ अहो दिवान एसेई करिहौ । ले दरवेश के आगे धरिहौ ॥

कबीर वचन

सुना दिवान तबै हसि दीना । दोइ कर जोरिके विन्ती कीना॥ दादा बाबा तुम्हरे रहैया । घोडे चढ़ि कोऊ ना गैया ॥ साखी-इतने में संग नहिं चले, मुनहु शाह चित लाय ॥ यह बज्रद दिन चार है, सो भी संग न जाय ॥

बोधसागर

(४३)

चौपाई

मनमें चकितशाह तब भयऊ । झूठी माया हम चित दयऊ ॥ सुई संग चले नहीं जाही । झूठी राज पाट सब शाही ॥ सहस्र सुईका का परसंगा । एके सुई चले नहीं संग ॥ अबतो खाना हम तब खावें । जब जिन्दाका दर्शन पावें ॥ इतना ज्ञान शाह घट आवा । जिन्दा दरशको सुरति लगावा ॥ इबराहीम ऐसि मति ठाना । राज माँहि भक्ती जिन जाना ॥ साखी-जिन्दा जिन्दा रट लगी, हिरदय रहा समय ॥ जो जिन्दा अबकी मिले, पूछू सब घर पाय ॥

चौपाई

ऐसी रटना शाह तब लावा । जिन्दा मिलन भयो उर भावा ॥ बहुत दिवस रट लागी ऐसी । आगे कहूँ भयी गति जैसी ॥ शाह कीन माँहि बिचारा । जिन्दा मिले सो कौन प्रकारा ॥ सब सिद्धन को लाउ बुलायी । उनसे पूछो मति अस भाई ॥ जोई सिद्ध अजमत बतलावें । उनसे खबर जिन्दाकी पावें ॥ जवे शाह ऐसी मति ठानी । लिये बुला सिद्ध सब ध्यानी ॥ साखी-सब सिद्धनको टेरिके, शाह किये सन्मान ॥ देउ करामत सिद्ध मोहिं, तब मेरो मन मान ॥

चौपाई

सन्मुख शाह सिद्ध सब आनी । तबही शाह कहे अस बानी ॥

सुलतान वचन

अधिक प्यारे तुमहौ अछः को । करामात दिखलाऔ अब हमको ॥ ना मैं तुम्हको बांधि झुलाऊँ । ना तो तुम्हको छुरी मराऊँ ॥

सिद्ध वचन

तब बोले सिद्ध चौरासी । हम हरि के आहिं उपासी ॥ निशि दिन रामा नाम गुण गावें । करामात ढिग हम नहीं जावें ॥ यह मुनि शाह बहुत रिसियाना । हुकम कीन सब बन्दी खाना ॥

(४४)

सुलतानबोध

सुलतान वचन

तुम काफिर अछ्हाह ते दूजा । भूत प्रेत चित लाये पूजा ॥ चक्की ढिग इनको बैठाओ । निशि दिन इनसे नाज दराओ ॥ जो नहीं करामात तोहि होई । क्यों कर सिद्ध कहाओ सोई ॥

सतगुरु वचन

बैठे सिद्ध सब चाक चलावें । चित विस्मय सब हरिगुणगावे ॥ त्रास देखि मुनि आयी दाय। ततछिन् शाहद्वार चलि आया ॥ सोटा मारा चक्की माहीं । घूमहु सतगुरु दाय। कराहीं ॥ बिदा सिद्ध भये हम भयगुती । देख्यो आय शाहके जपती ॥ कहा साह सों तिन्ह कर जोरी । चक्की सब आपहिं चलि दौरी ॥

सुलतान वचन

मुनि के शाह कैफदिल आयी । कौन शरूश यह चक्कि चलायी ॥ वेगहि दूँडि लाओ यहि वारा । चक्की चलायो सो अछ्हाह प्यारा ॥

सतगुरु वचन

दूंदत नगर थके दिल जबहीं । नहिं पाये व्याकुल चित तबहीं ॥ जबहि शाह घर लगन विचारा । तब हम जीवदया उर धारा ॥ तुरतहि जाय तहां पगु धारा । शाहके महलन चढे गोहारा ॥ महलपर देखत फिरो वहुँ खुठा । करो पुकार हेरानो ऊंटा ॥ मुनि के शाह कोधकरि धाये । कौन हमारे महलन पर आये ॥ कहो तुम कौन कहाँ से आवा । कौन काज महल पर धावा ॥ तब हम कहा ऊंट यक छूटा । दूंदत फिर्ह मैं अपनो ऊंटा ॥ बहुत अधीन ऊंट हम भायो । खोजत ऊंट महल पर आयो ॥ मुनिके शाह तबे हँसि दीन्हा । कैसे ऊंट महल पर चीन्हा ॥ जँगल माहिं तेहि खोजो जाओ । कैसे ऊंट महल पर आओ ॥ तब हम कहा सुनो तुम ज्ञाना । चढे तरक्त अछ्हाह किन जाना ॥ ऐसी बूझ करो मन माहीं । सत्य वचन धरो मन ठाहीं ॥

बोधसत्तार

(४५)

सारखी-तस्वत चढे किन पाइया, सुनो शाह सुलतान ॥

हरदम साहब याद करू, रचा जिन सकल जहान ॥

महल न आवे ऊंट हमारा । तस्वत ऊपर अछ्हाह निहारा ॥

अछ्हाह तस्वत पर कैसे पावे । जहाँ लगि घट महाँ गर्व रहावे ॥

जब तुम छोड़ो राज शरीरा । अछ्हाह लखो तुम अपने पीरा ॥

छोड़ो मान गुमान रे भाई । अछ्हाह रूप तबही मिलि जाई ॥

सुनत शाह सन्मुख जब आवा । तब जिन्दा से पूछन लावा ॥

सुलतान बचन

कौन रूप कौन नाम तुम्हारा । कहो अछ्हाह मिले कौन बिचारा ॥

जिन्दा बचन

सांचे दिलसे सुरति लगाओ । प्रेम प्रीति लौलीन रहाओ ॥

सुख संपति की करो न आशा । निशि दिन दीया प्रेम प्रकाशा ॥

मन अस्थिर करि सुरति लगाओ । तबहि दर्श अछ्हाह को पाओ ॥

कहे कबीर खोजे सो पावे । खोजत खोजत अलख लखावे ॥

सारखी-प्रेम प्रीति करि खोजिये, हियमें आवे ज्ञान ॥

अलख अछ्हाहकी खोजमें, जागत भये सुलतान ॥

जिन ढूढ़ा तिन पाइया, गहरे पानी पैठि ॥

जो बौरा ढूबन डरा, रहा किनारे बैठि ॥

चौपाई

जब कीन मन शाह अन्देशा । नहिं तहाँ ऊंट नहीं दुवैशा ॥

ऐसे बहुत दिन बीता भाई । काल कला घट आन समाई ॥

बहुरि एक दिन बलख मैझारा । शाहके महलनमें पगु धारा ॥

नौरोजा खेले सुलताना । गिलम बिछायबहुविधि जाना ॥

महलन माहीं पहुँचे जायी । देखत फिरे महल चौपायी ॥

इब्राहीम अधम सुलताना । हमको देखत बहु रिसियाना ॥

(४६)

मुलतान बोध

मुलतान वचन

कहे शाह तुम कौन है भाये । केहि कारण तुम महलन आये॥

जिन्दा वचन

हम परदेशी दूर दिशारा । देखत फिरहिं सराय बसोरों ॥

मुलतान वचन

शाह कहे यह महल हमारा । कहाँ सराय जो करइ बसारा ॥

जेहि महल हीरा जडा अपारा । तापर धुनी तुम कैसे बारा ॥

अब तुम जाओ शहर बजारा । तहाँ जाइ करो सराय बसारा ॥

जिन्दा वचन

कहे दुवैशा सुनो तुम शाहा । करि विचार परखो दिल माहा॥

महल तुमारा तुम कहैं पावा । करो खोज यह किन निर्मावा ॥

महल तुम्हारो होय न भाई । तुम भी सुसाफिर बसो सराई ॥

सुनो शाह तुम चतुर सयाना । सुरति निरति बूझो तुम ज्ञाना॥

बहुत बादशाह तुम आगे भयऊ । महल न संग काहुके गयऊ ॥

दादा बाबा तुम्हरा रहिया । महल काहुके संग न गैया ॥

जा तुम थापा महल हमारा । अन्त काल सब छुटे घर बारा ॥

यह जग सकल सराय बसेरा । इनमें नाहि कोउ केहि केरा ॥

जहाँ के ताहाँ छूटहिं धामा । यह सबही दिनचार सुकामा ॥

हरदम साहिबको पहिचानो । महल सराय एक करि जानो ॥

ज्ञान दृष्टि दिलमें जब आवै । राज छोड़ि साहिब गुण गावै ॥

साखी-ज्ञानें दृष्टि दिल आवई, सब तजि होय फकीर ॥

कहे कवीर मुलतानसे, ज्ञानके लागे तीर ॥


१ गुजारा, निबाहि ।

२ इस साखीके आगे एक प्रतियें नीचे लिखे पद हैं । किन्तु यहाँ इनका मेल न मिलनेसे नोटमें

लिखा है ।

बोधसागर

( ४७ )

चौपाई

यक दिन शाह जु चले शिकारा । चुनि चुनि साथ लीन्ह असवारा छोडे बाज पक्षी गहि आने । देखत शाह बहुत सुख माने ॥ बहुविधि मारग करत कलोल्ला । जहँ तहँ फिरे शिकारिन टोला ॥ बहुत समय बीति जब गयऊ । एक शिकार हाथ नहिं अयऊ ॥

चौपाई

ज्ञानदृष्टि जब दिलमें आही । छोडो राज पाट बादशाही ॥ होय फकीर जंगलमें बासा । छोड़ी राज तख्तकी आसा ॥ शाह जो बैठे जंगलमें जाई । नगरकी सब परजा चलि आई ॥ काजी पण्डित मोख मुलाना । महंत महाबत गुलामनकराना ॥ सेठ सेनापति परजा आई । सबही धरे शाह की पाई ॥

प्रजा वचन

ऐसी बात न करहु गुसाई । सबही राज छण्ड होय जाई ॥ ओ तुम तजो तख्त औ राजू । सब परजा का होय अकाजू ॥

मुलतान वचन

नाहीं तख्त निकट हम जाबें । नहिं अपने शिर भार चढ़ाबें ॥ यह बादशाही हमसे नहिं होवे । कौन तख्त चढ़ि दोजख जोवे ॥ हम छोडा तख्त बादशाही । फिरि संराय महँ हम नहिं जाहीं ॥ बिना भक्तिमुक्ति किन पायी । राज करे सो दोजख जायी ॥ हमको जाय मिले यक साई । बहिं साहब मुझको फरसाई ॥ मैं अपराधी उनाहिं न चीन्हा । बिछ छाँडि उन हमको दीन्हा ॥ अबतो करें मैं कौन उपाई । साइ मुझको कस मिलि है आई ॥

परजा वचन

अब तुम चलो महलके माहीं । हम सब संग तुम होहु गुसाहीं ॥ तुमको छाँडि एको नहीं जहँ । सब मिलि संग पयाना देहँ ॥ सबि मिलि लाये महल मेंशारा । शाहके मनमें शोब अपारा ॥ कैसे के जिन्दा मैं पाऊं । कैसेके मैं जिब मुक्तताऊं ॥ मुठे झूठ मिल सब संसारा । दोजख कुंडमें नाखन हारा ॥ साखी-बेर बेर हमको मिले, नाम जिन्दा सो आहि ॥ अमरापन यक मुलतान है, किसविधि मिलेंगे आहि ॥

( ४८ )

सुलतानबोध

तबै शाह बहुत रिसियाना । खोजु शिकार हुकम फरमाना ॥ तबै शिकारी दुहुँ दिशि धावैं । पावैं न शिकार मनहि पछतावैं ॥ यहि विचलीला अस भइ भाई । सुनु धर्मनि तुम चित लगाई ॥ हरिन एक जो कनक रंग देखा । हीरा रतन मणि जडे विशेषा ॥ देखि सरूप शाह ललचाई । यहि मिरगा कहैं घेरो भाई ॥ आज्ञा पाइ चले असवारा । घरयो हिरण सेन मझारा ॥ कहे शाह जो मिरगा जाई । तुमसे मिरगा लेहौं भाई ॥ सेना सब से तब कहे पुकारी । मिरगा भागि शाह तर गयऊ ॥ शाह सब से तब कहे पुकारी । मिरगा मारि लाऊँ यहि बारी ॥ मिरगा संग सुलतान अकेला । नहिं कोइ सेना नहिं कोइ चेला ॥ छिन में मिरगा देखि लुपाना । तेहि पीछे धावहि सुलताना ॥ लागी प्यास शाह को भांरी । महा भयानक बनही मझारी ॥ वट का वृक्ष तहाँ यक देखा । शीतल छाया बहुत विशेषा ॥ मिला फकीर एक तहैं वासा । कुत्ता दोग्य रहै उन पास ॥ शीतल कलशा पानिहि भरिया । जापर ठिलिया मठका धरिया ॥ खोजत नीर शाह चलि आये । दुआ सलाम करि वचन सुनाये ॥

सुलतान वचन

कहे सुलतान प्यास सुहि भारी । जात जान तुम लेहु उबारी ॥

दुर्वेश वचन

हम फकीर दुर्वेश कहावैं । सुरति होय तो भरो पियावैं ॥ पियो शाह जल लियो निवासा । जिन्दे कीना अजब तमाशा ॥

१ दूर से आहू उते आया नजर । पहुँचा उसपर शाह घोडा मारकर ॥ होके वह अपने सवारों से जुड़ा । पीछे दो फरसंग तक उसके गया ॥ जाते जाते हो गया आहू खड़ा । वाफ़िहतत आबिन अब्रम से कहा ॥ तुम्हको इस खातिर नहीं पंदा किया । वहसियों पर ता करे जोरोजका ॥ है गरज ईजाद से तेरे कुछ और । कर जरा तू विलम अपने आप गौर ॥ बात यह कहकर वह गायब होगया । नक्शा उसका शाह के विलपर हुआ ॥

बोधसागर

( ४९ )

साखी-गाकर कठी अगिनसे, मिश्री घूतहि मिलाय ॥ न्यामत धरी रिकाबमें, कुत्तासे कहे खाय ॥

बोपाई

कुत्ता न्यामत खाय न भाई । मार डुरवेश कुत्ता के ताई ॥ ऐसो चरित कीन दुर्वेश । तब शाहके मनमें भयो अंदेशा ॥

मुलतान बचन

कहे शाह तुम सुनो दिवाना । यह पशुजीव न्यामत कहजाना ॥

जिदा बचन

कहे फकीर सुनो बेनादाना । जैसा दिया तैसाही खाना ॥ जौसि करे करतूत कमाई । तैसि देह धरि भुगते भाई ॥ यामें फेर फार नहि होई । जो बोवे लुनिहे वह सोई ॥

मुलतान बचन

दोयकर जोरिके विन्ती कीन्हा । साहब तुमरी गति हम चीन्हा ॥ वानी अगम क.हो समझाई । आगे कौन हते यह साई ॥

दुर्वेश बचन

तब दुर्वेश कहे समझायी । सुनो शाह तुम मन चितलायी ॥ बलख शहर यक नगर रहाई । तहँके हैं यह दोनों राई ॥ इब्राहीम अहै यक राजा । एक बाप अरु दूजो आज्ञा ॥ राज पाय कछु भक्ति न कीना । ताते जन्म श्वान को लीना ॥

१ यहां जो शाह इब्राहीम अदम साहबके बाप दादेको बलखका बादशाह लिखा है यह बात इतिहास और विचार द्वारा एकदम निर्मूल ठहरता है, क्यों, कि बलखके बाद शाह इब्राहीमके बाप दादे नहीं थे बरन इसके उल्टा उनके पिता एक महान संत थे जो परम विरागमान और एकांतवास करने वाले थे । शाह इब्राहीमको उत्पत्तिको कथा बहुतही रोचक और आश्चर्य दायक है । यहां स्थानाभावसे नहीं वे सकता गुरुको कृपा होगी तो कबीर साहबके जीवन चरित्रके सहित मुलतान चरित्र भी बहुत स्वरूपमें लिखेंगे । यहां दोनों कुलों को बलख के बादशाह और शाह इब्राहीम अदमको बाप दादा बतलाना बहुत ही भूल है इस हेतुसे जाना जाता है कि, इस पुस्तकमें भी उत्तरोत्तर मिलावट होती गयी है और मिलावट करनेवाले भी साधारण

( ५० )

सुलतानबोध

सुलतान वचन

तब सुलतान कहे सुनु साईं । एक बात और कहो समझाई॥ दोय खूँटे दोय श्वान बंधाये । तीजा खूँटा क्यों खालि रहाये॥

दुर्वेग वचन

कहे दुर्वेग सुनो रे भाई । याकी गतिहि कहुँ समझाई ॥ इब्राहीम नाम जेहि होई । बलख शहर का राजा सोई ॥ राज माहि बहुत सुख करिहैं । भाव भक्ति नाही मन धरिहैं ॥ विना बन्दगी जिन छूटे देहीं । वे पुनि जनम श्वान को लेहीं॥ इसमें जड़ूँ आनि के ताही । तब ये तीनों रहें एक ठाहीं ॥ इतनी सुन दुर्वेगहि बाता । शाह के मन में लागी घाता॥

सुलतान वचन

मुनि सुलतान अचम्भा भयऊ । तब दुर्वेग हि पूछन लयऊ ॥ श्वान योनि कस छूटे साईं । ताका भेद कहो समझाई ॥

दुर्वेग वचन

कहे दुर्वेग भक्ति जो करई । सो नर श्वान देह ना धरई ॥ करे बन्दगी साहिब केरी । दया मिहिर की दशा जा होरी॥ प्रेम प्रीति परमारथ नीका । माया मोह जाने सब फीका ॥ सब सुख नामहि से लौलावे । सो जिव श्वान जनम नहि पावे॥

सुलतान वचन

शाह कहे जो लेह बचाई । सो दुर्वेग साँच है भाई ॥ सो दुर्वेग खुदा का बन्दा । श्वान योनि का काटे फन्द ॥


विचारके जान पठते हैं । ऐसी ऐसी मिलाव और मूलके कारण कबीरपंथी साहित्यकी निन्दा होती है। किन्तु बुद्धिमानों को विचार पूर्वकही उसे ग्रहण त्याग करना चाहिये।

बोधसागर

( ५१ )

मन में शाह तब ऐसा जाना । यह दुर्वैश है खुदा समाना ॥ बार बार मोहि आनि चितार्ह । सोह दुर्वैश आप है साँई ॥ तब अपने दिल कीन्ह विचारा । इनसे कारज होय हमारा ॥ जो यह कहे सोई चित दीजे । इनका वचन मान शिर लीजे ॥ इतना शाह मन करत अन्देशा । नहीं वहाँ कुत्ता नहीं दुर्वैशा ॥ तबहि शाह मन कीन विचारा । निश्चय है यह सिर्जन हारा ॥ सार्वी-कहे शाह अबकी मिले, पुरवे मनकी आस ॥ कदमें शिरे छुआवहुँ, पलक न छाडूँ पास ॥

चौपाई

बन ते शाह नगर में जाई । मन जिन्दा में रहा समाई ॥

जिन्दा वचन

गुप्त रूप तब शब्द उचारा । इब्राहिम सुनु वचन हमारा ॥ नाहक जिव तुम मारि उडाई । तैसा हाल तुम्हारा भाई ॥ जाहि समय इजराइल ऐहैं । महा भयंकर रूप दिखाहैं ॥ हनिहैं सुगदर धरिहैं चोटी । उठै अगिन तब बोटी बोटी ॥ ताहि समय पुनि करिहो रोरा । काम न आवे सेन करोरा ॥ मारत पंछी दरद न आई । एक दिन ऐसा तुम पर भाई ॥ बैन सुनत सुरछित मन माहीं । गुप्त भये पछताने ताहीं ॥ कहे शाह खोजो तेहि जायी । जिन ऐसी सुहि बात सुनायी ॥ खोजि थके पुनि सुहि नहीं पाये । सुरछित शाह भवन चलि आये ॥ तबहि शाह मन ज्ञान समाना । जिन्दा वचन साँच कर माना ॥ राज पाट सुख सम्पति देहा । यह सब दीखत स्वप्न सनेहा ॥ ज्ञान दृष्टि दिलमें जब आही । छोडेउ तरस्त तबे बादशाही ॥

१ मुसलमानों धर्मके विस्वासके अनुसार इजराइल एक फिरीस्ता है जो सब प्राणियोंके आत्माको शरीरसे अलग करता है तब मृत्यु होती है ।

( ५२ )

सुलतानबोध

होय फकीर जंगल कियो बासा । राज काज की छाडी आसा ॥ सबही लोग नगर के आये । आइ शाह के लागे पाये ॥ काजी वजीर औ शेखमुलाना । महन्त महावत नफर गुलामा ॥ लागे सबही शाह के पाईं । सबहि मिलि के विन्ता लाईं ॥ ऐसी बात न कीजे साईं । तुम विन यह परजा दुःख पाईं ॥ जो तुम तरुत न बैठो राजा । सब परजा को होत अकाजा ॥ राजा से परजा सुख पावे । जहाँ तहाँ आनन्द रहावे ॥

सुलतान वचन

कहे सुलतान सुनो रे भाईं । हमतो तरुत के निकट न जाईं ॥ ना हम पावैं तरुत पर लावैं । ना अपने शिर भार चढावैं ॥ अब हम तरुत न बैठे आईं । बैठे तरुत सो नरकहिं जाईं ॥ अब हम राज तजी बादशाही । यम की मार सही नहिं जाही ॥ भक्ति विना जिव मुक्ति न पावे । राज करे सो नरकहिं जावे ॥ हमको आज मिले यक साईं । सो साहिब ऐसी फरमाईं ॥ मैं अपराधी उन्हे न चान्हा । अधविचछोडिसोमोकोदीन्हा ॥ अब हम करिहैं कौन उपाईं । वह अवसर मुझको कब आईं ॥

प्रजा वचन

प्रजा कहे सुनो हो साईं । अब तुम चलो महल के माईं ॥ जो तुम राज छाडि बन जैहो । तो सब संगं तुम्हारे ऐहों ॥ सार्वी-यहां रहन को छोडि के, तुम सँग करिहैं प्यान ॥ ऐसे वचन प्रजा कहि, लाये गृह सुलतान ॥

चौपाई

जब आये शाह महल मैझारा । उठी बिरह मन माहिं अपारा ॥ अबमैं किस विधिजिन्दा पाऊँ । उन विनु होय न मोर बचाऊँ ॥ यह सब लोक अहै संसारा । नरक कुंड में डारनहारा ॥