कबीर सागर (11 भाग संपूर्ण)
Kabir Sagar (11 Parts Complete)
कबीर साहेब / खेमराज श्रीकृष्णदास द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन, बम्बई - कबीर सागर सम्पूर्ण ११ भाग · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
सत्यनाम
श्री कबीर साहिब
A faint, stylized illustration of a seated figure, likely a deity or saint, wearing a crown and holding a staff or lotus. The figure is surrounded by a decorative border.
श्री श्री गणेशाय नमः
मङ्गलाचरण और उत्थानिका - कृष्णजीका शरीर त्याग देना, बलभद्रजीका संदेश और कृष्णका समझाना
श्रीमुनीन्द्राय नमः
अष्टमस्तरंगः
ग्रन्थ लक्ष्मणबोध
मंगलाचरण-दोहा
जय मुक्त जय मुनीन्द्र प्रभु, जय करणानय ईश ॥
जय कबीर कलि बुध हरण, सदा नवाऊँ शीर ॥
उत्थानिका ( धर्मदास बचन )
दोहा-विनय करतं धर्मदास हैं, दोऊ कर को जोर ॥
लक्ष्मण बोध्यो काहि विधि, कहहु सो बन्दी छोर ॥
सत्य कबीर बचन
प्रथम सो सत्यनाम गुण गाऊँ । भक्त हेतु संसारहि आऊँ ॥ अनन्त बार आयो संसारा । देख्यो जर्मौँ खलकँ मंझारा ॥ साधु संत देखौँ सब ठाऊँ । कतहुँ न देखौँ मुक्त का नाऊँ ॥ झुण्ड झुण्ड बहु देखौँ विरागी । कथहिँ ज्ञान अल्पे बुधि लागी ॥ तत्त्व शब्द सुने नहीं काऊ । कतहुँ न सुनी परे वहि गाऊ ॥ एक दिन चले द्वारका भाई । देह तजी जहाँ त्रिभुवनराई ॥ गड रोके बल भद्र रहाये । बहुत चिंता तिन मन उपजाये ॥ कृष्ण देह नहीं दाग लगायी । तब सपने कृष्ण बात जनायी ॥
१ पृष्ठी । २ संसार ।
बलभद्रजीका कृष्णके शवका दाह करके समुद्रमें बहा देना और कृष्णजीका उड़ीसाके राजाको स्वप्न देना
( १४२ )
लक्ष्मणबोध
बलभद्र सो कहा समझायी । अगली बात सब दर्द बुझायी ॥ बलभद्र तुम भक्त हमारा । तुमसे कहूँ मैं सत व्यवहारा ॥ हमरी सीख मानिकर लीजै । जो हम कहैं सोई अब कीजै ॥
बलभद्र वचन
कहै बलभद्र तुम साहब मेरा । हम तो जनम जनम का चेरा ॥ जो तुम कहो सोई मैं करिहों । मानि सिखापनशिरपर धरिहों ॥
श्रीकृष्ण वचन
जैसे कांचली सर्प तजाई । कांचलि रहे सर्प नहि भाई ॥ याते तनको देहु जलायी । याहिराखी कछु फल नहि आयी ॥ ठाट दहन तब तहवां भयऊ । जरत ठाठ फेफरा रहेऊ ॥ तब बोले अस गोविन्द राई । पेई एक तुम बेगि बनाई ॥ मट्टी धरो पेइके माई । सो पेई तुम देह बहाई ॥ पेई सोह उडीसा जायी । बौद्धावतार की मांड मडायी ॥ ठाकुर कहा सो बलभद्र कीना । एक पेई बनाय कर लीना ॥ ता पेई पर हीरा जड़िया । सो माटी पेई में धरिया ॥ समुद्र माहिं दई पेइ बहाई । सो पेई बहुत उडीसा जाई ॥ तब राजा को सपना भयऊ । सपना में तेहि बात यक कहेऊ ॥
कृष्ण वचन
राजा सीख हमारी लीजै । बुद्धावतार कि थापन कीजै ॥
राजा वचन
राजा कहै कौन हौ भाई । सो मोहि बात कहो समुझाई ॥
श्रीकृष्ण वचन
तब बोले सो गोविन्द राई । हम तो कृष्ण अहैं रे भाई ॥ द्रापर बाचा सम्पूर्ण भयऊ । ताते ठाट हमहुँ तजि दयऊ ॥
१ पेटी, बाकस, सन्दूक ।
राजाका समुद्रमें स्नानको जाना और कृष्णके शवको पाकर स्वप्नको सच्चा समझकर जगन्नाथका मन्दिर बनवाना
बोधसागर
( १४३ )
अब कलियुग बैठेगा सोई । बौद्ध थापना हमरो होई ॥ जगन्नाथ मम नाम है सोई । हमरी थापना यहि विधि होई ॥
सत्यकबीर वचन
राजा जब स्नानको गयऊ । पेई गडी रेत में पयऊ ॥ तब राजा परिकरमा दीना । पेई उठाय कै शिर पर लीना ॥ तुरतहि राजा महल ले आवा । तबहि रानि कहैं तुरत बतावा ॥ करै निछावर मंगल गावै । घर घर नगर में बाजु बधावै ॥ राजा ब्राह्मण लीन बुलायी । सपने की सब बात सुनायी ॥
ब्राह्मण वचन
ब्राह्मण कहै सुनो महाराजा । सुफल जनम सरिहैं सब काजा ॥ शुभ नक्षत्र वार धरि लीजै । तब देवल की थापना कीजै ॥ रोहिणी नक्षत्र वार बुध लीना । तब देवल की नींव जो दीना ॥ जब देवल सम्पूर्ण भयऊ । तबही राजा जग मंडयऊ ॥
पुरातन वार्ता
मंथन उदधि विष्णु जब कीन्हा । निकसी वस्तु बांटि सो लीना ॥ और त्रेता में बांध बैथाये । ताको बैर उदधि मन लाये ॥
उदधि विचार
तबका बैर अबहीं मैं लेऊँ । देवल गाडि रेतमें देऊँ ॥
सत्य कबीर वचन
लगन मुहूरत पहुँचे आयी । तबही देवल गाडि के जायी ॥ छे बार देवल गाडयो भायी । तब हम इतो जगत के माही ॥ पूर्विल कौल सुरति धरि लीना । जाय आशन समुद्र पर कीना ॥ उदधि साजि दल जबही आवा । तब हम डाट समुद्र बतावा ॥ तब हंकार समुद्र बतावा । महा क्रोध करि हम पै आवा ॥
लक्ष्मी और कबीरसाहबकी बातचीत
( १४४ )
लक्ष्मणबोध
तब करि कोध ससुद्र ललकारा । महाफटकार ससुद्र फटकारा ॥ तबही पृथ्वी फाटि सो गयऊ । धसी ससुद्र पतालै गयऊ ॥ तबही खबर लक्ष्मी पाई । बैठा साधु ससुद्र के ठाई ॥ तब लक्ष्मी आपे चलि आयी । तब हम शोभा कर्म बनायी ॥ लक्ष्मी कीन दण्डवत आयी । धँसाइ ससुद्र पताल पटायी ॥
लक्ष्मी वचन
तब लक्ष्मी संतन सो कहेऊ । महाप्रसाद तुम जगको लेऊ ॥
संत वचन
संत कहे सुनु लक्ष्मी आई । नेवता देहु कबीरहि जाई ॥
सत्यकबीर वचन
तबहीं लक्ष्मी हम पै आयी । आइके कहै हमहि गोहरायी ॥ तबहीं संत कहैं सुनु माई । बैठे कबीरा परले ठाई ॥ तब लक्ष्मी ध्यानपुरुषका कीना । करमी सभा मेटि सब दीना ॥
लक्ष्मी वचन
तबहीं हमसों बात जनायी । तुम करो प्रसाद जगतके मायी ॥
सत्यकबीर वचन
तब हम कहा बात समझायी । हम तो प्रसाद पुरुषको पायी ॥
लक्ष्मी वचन
लक्ष्मी कहै तुम कौन हो भाई । तुम कैसे गम पुरुष को पाई ॥
सत्यकबीर वचन
कहै कबीर सुनु लक्ष्मी आई । हम तो सेवें पुरुष को पाई ॥ जिन साहिब तुमको कीन्हा । साहिब पति तुम तनको दीन्हा ॥ तुम तो गरबभुलानी सोई । ताते काज सिद्ध नहीं होई ॥ श्याम देह कीना तुम सोई । तब ते तुमरी मुक्ति न होई ॥
लक्ष्मी वचन
तब लक्ष्मी कहे समझायी । तुम कहो सो हम मानें भाई ॥
बोधसागर
(१४५)
सत्यकबीर वचन
बावन अटका जगन्नाथ चढाओ । चार अटका समरथ अरपाओ ॥ तब हम न्योते तुमरे आवें । जब तुम सेवो पुरुषके पावें ॥ मुनत लक्ष्मी ठाकुरपहँ आयी । जो कुछ सुनीसुकहि समझायी ॥
लक्ष्मी वचन
भक्त कबीर नाम जो आहीं । सो तो बैठे समुद्र की ठाहीं ॥ जब उन डांट समुद्र बताया । तबहीं समुद्र पाताल समाया ॥ तब हम न्योत कबीरहि दीना । तब कबीर हमसों छल कीना ॥ करमी सभा बनाय सो लीन्हा । तब हम ध्यान पुरुषका कीन्हा ॥ मिटिगयी सभा कबीरयकरहेऊ । तब कबीर ऐसे पुनि कहेऊ ॥ जिन साहबने तुमको कीन्हा । काहे विसार तुम उनको दीन्हा ॥ तुम तो गर्व झुलाने सोई । ताते काय्य साधन नहिं होई ॥ छप्पन अटका जगन्नाथ लगाये । सत समरथ को धरे विसराये ॥ कहा कहै प्रसाद तुम्हारा । हमको समरथ देवन हारा ॥ हम बिन्ती सतगुरु सों कीन्हा । तब सतगुरु सिखावन दीन्हा ॥ बावन अटका जगन्नाथ चढाओ । चार अटका समरथकोअरपाओ ॥ तब हम न्योते तुम्हरे आवें । हम तो अंश पुरुष के भावें ॥ उनकी गति मति लखी न जाई । तुम त्रिगुण होय सृष्टि बनायी ॥ हम सतगुरु होय जिव मुक्तावें । हम ती सबें पुरुष के पावें ॥ तुम त्रिगुण का राज कराई । तब बोले गांविन्दे राई ॥
श्रीकृष्ण वचन
ज्योति अंश से हम उत्पानी । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर जानी ॥
लक्ष्मी वचन
तब लक्ष्मी कहै समुझायी । वह तो ज्योति हमारी आई ॥ तुमको तो हम उत्पन कीन्हा । चारिस्वरूप हमहिं रचिदीन्हा ॥ त्रिगुणस्वरूप जो सृष्टि बनायी । चौथे अंश ज्योति थपायी ॥
समुद्र और कबीर साहबकी बातचीत
(१४६)
लक्ष्मणबोध
सत्यकबीर-वचन
तब ठाकुर मन चकित भयऊ । सुनत तब गरव गलि गयऊ ॥ तब गोविन्द आपु चलि आये । तब कबीर उठि मिले जो धाये ॥ लक्ष्मी गोविन्द कबीर बैठाये । तब गोविन्द एक बात सुनाये ॥
गोविन्द वचन
हम तो गतिमति तुमरी न पाई । हमको लक्ष्मी अब समझाई ॥ सार्वी-जो तुम अंशपुरुष के, सतगुरु हौ तुम सोउ । देवल गाडे रेत में, ताहि वन्दन करि लेउ ॥
चौपाई
जबहि उदधिपल सजिके आया । तबहि कबीर पुकार जनाया ॥ घँसि समुद्र पताले भयऊ । देखत गोविन्द चकित भयऊ ॥ तब विन्ती सतगुरु सो कीन्हा । दौयकर जोरि लक्ष्मी आधीना ॥ चलो कबीर यज्ञमें पगधारो । तुमते शोभा रही हमारो ॥
सत्यकबीर-वचन
छप्पन भोग चढाओ जाई । सत्य समरथको भोग लगाई ॥ तब तुम हमको देखो जाओ । अरध प्रसाद रखा जब पाओ ॥ तब गोविन्द स्थान उठि आये । जाई उपदेश राजहि सुनाये ॥ छप्पन भोग चढाओ जायी । सत्य समरथ को भोग लगायी ॥ राजा पंडा कहै बुझाई । छप्पन भोग चढावहु जाई ॥ सो समरथ को भोग लगायी । तब तुम पावो प्रसाद अघायी ॥ आध प्रसाद ऋषी जब पाई । तब तुम हमको दिखाओ भाई ॥ हारि समुद्र तब ब्राह्मण भयऊ । हाथ जोरिके ठाढे रहऊ ॥
समुद्र वचन
कौन हौ भाइ कहाँते आये । वस्ती छोड़ि यहाँ कस बैठाये ॥ यहाँ तो लहर समुद्रकि आई । आओ यज्ञमें भोजन पाई ॥
बोधसागर
( १४७ )
सत्यकबीर वचन
तबहि कबीर कहे समुझायी । तुम समुद्र कस वरण छिपायी॥
समुद्र वचन
तब समुद्र अस वचन सुनाई । कहा है नाम तुम्हारो भाई ॥
सत्यकबीर वचन
हम तो अंश पुरुष सरदारा । भक्त कबीर है नाम हमारा ॥
समुद्र वचन
तब समुद्र बोले ऐसी बानी । हमतो हार तुमहिं से मानी ॥ हमरो मंथन जब इन कीया । बड़दुख तब इन हमको दीया ॥ और त्रेतामें पैज बँधाई । तबका वैर हमको साले भाई ॥ तुम तो हो सतगुरु होड़ु सहाई । तुमते हमार कछू न बसाई ॥
सत्यकबीर वचन
तब समुद्र को हम समझायी । निर्धनको चोर कहा लै जायी ॥ सब जग साख तुम्हारी देई । तुम दाता हम भिक्षुक होई ॥ इतनी दया तुम हमपर कीजो । बोली करी कथा सुनि लीजो ॥ इनको टहल शीश जो दीना । तापर दुष्ट दगा जो कीना ॥ त्रिया हरण इनकी जो भयऊ । जब इन बनहि बसेरा लियऊ ॥ राम लक्ष्मण हनुमान मिलायी । तब तिन मति असकीन बनायी ॥ सागर बाँधनका मता जो कीना । मच्छरूप तुमही धरि लीना ॥ तब तुम ला उनके ठगिरहेऊ । करि विश्वास बहुतै दुख सहेऊ ॥ यह अपने मन गरब झुलाना । हमरे नाम सो शिला तराना ॥ राम नाम जब अंक चढावा । धरे पैर जब लीन चुवावा ॥ खत राम तब चकित भयऊ । तबही शीश धूनि कर रहे ऊ ॥ अतिही शोच करे बल वीरा । शीश डुलावे सागर तीरा ॥ जलमें जंतु देख्यो बड़ भारी । यह तो झूठी पैज हमारी ॥
ब्रह्मायुगकी वार्ता (लक्ष्मणबोध)
( १४८ )
लक्ष्मणबोध
तेहि अतिदुःखित जब हम देखा । तब हम पृथ्वी ओर अवरेखा ॥ चहुँ फेर बना कंचन का कोटा । ता बिच बैठा रावन खोटा ॥ लक्ष्मण इन्द्रजीत कहावैं । हम चेतावन ताको जावैं ॥ प्रथमै हम रावण गढ गयऊ । तब हम तपसी वेष धरयऊ ॥ जब हम रावन सों बात जनाई । वह काठे खडग हम पर भाई ॥ तब हम आडा तृण जो दीना । घाव अठारह तृण पर कीना ॥ कटे न तृण खिसियाना भयऊ । जाय घाव स्वम्भपर कियऊ ॥ कटि गया स्वम्भ भया दो भागा । सो मंदोदरि दृष्टिहि लागा ॥ तृणके ओट सो सृष्टिका करता । जग देखत ही भूले समता ॥ कहैं मंदोदरि गहि ता पाई । गरब न छाडे रावन राई ॥ तब हम चले ताहि वन गयऊ । लक्ष्मण राम दोऊ जहैं रहेऊ ॥ देख लक्ष्मण धायके आया । आवतही अस वचन सुनाया ॥
लक्ष्मण वचन
कहे लक्ष्मण सुनो ऋषिराई । पिता हुकुम मेटो नहिं जाई ॥ भरत दे राज राम बन अयऊ । तापर दुष्ट दगा जो कियऊ ॥ सीता हरी रावन तेहि ठाऊँ । मैं तो शरण तुम्हारे आऊँ ॥
सत्यकबीर वचन
लक्ष्मण देखि भयी मोहि दाय। अर्चित नाम हम ताहि सुनाया ॥ अर्चित नाम का किया विवेका । गिरिपर लिखी सत्यकी रेखा ॥ काष्ठ समान सो गिरिवर तारी । उत्तरी सेना सकल भयि पारी ॥ तबही राम लक्ष्मण फरमावा । हमको सुन्दरी आनि चढावा ॥
मुनीन्द्र वचन
तब कहैं मुनीन्द्र सुनो रघुराई । सुन्दरी धरो कमण्डलमाई ॥ तबहि रामजी आप सिधाये । सुन्दरी डारि ऋषी पै आये ॥ तब मुनीन्द्र यह बात सुनाई । लाओ सुदिका दिखाओ भाई ॥ देखि कमण्डल चकृत भये भाई । सोचे राम अपने मनमाई ॥
समुद्रका द्वारिका डुबा लेना और कबीर साहबका जगन्नाथके यज्ञमें जाना
बोधसागर
( १४९ )
रामचन्द्र वचन
अकथ कथा कहीं नहीं जायी । कहो ऋषिराय बात समझायी॥ तुम तो धोखा बहुत उपजाये । ऐसी मुँदरी कहाँ तुम पाये ॥ सोई बात कहो समझायी । जाते संशय जीका जायी ॥
मुनीन्द्र वचन
मुनीन्द्र बोले राम चित धरिया । एति बार तुमसृष्टि औतरिया ॥ जिते आकाश में तारा ठयऊ । उते लंका में रावण भयऊ ॥
सारखी-नगर अयोध्या राम तुम, भये अनेकहिं वार ।
अपनी आदि भुलाइया, तुम कैसे करतार ॥
रामचन्द्र वचन-चौपाई
रामचन्द्र कहे सुनो ऋषिराई । तुमरी गति मति कही न जाई॥ अजहूँ शिखापन हमको दीजै । जाते काज सिद्धि करि लीजै ॥ काष्ठ समान गिरपर्वत भारी । सेना उतारि सकल भइ पारी ॥
सत्यकबीर वचन
पुरुषोत्तम परतीति बैठायी । ताते काज सिद्धि तब पायी ॥ जाउ ससुद्र तुम अपने ठाई । यहि गुनाह मोहि बखशो भाई॥ तुम दाता हम भिक्षुक तुम्हारे । तुमरी साख बडी संसारे ॥ तुम छीलर न होउ बकशो भाई । हम तो जाते यज्ञके माही ॥ अब तुम जाहु अपने ठाई । कश्चन द्वारिका लेहु बुडाई ॥ जगन्नाथ की महिमा होने दीजै । कश्चन द्वारिका जलमें कीजै ॥ मानि वचन गयो अपने ठाई । या विधि दीन ससुद्र हलाई ॥ इतना कहि हम ठाकुर पर गयऊ । लक्ष्मी रु राम त्रिभुवन रहेऊ॥ छप्पन भोग चढै है द्वारा । लागा भोग ठौरहीं ठौरा ॥ परोसै पण्डा बडी पकौरी । दाल भात और खीर मुंगौरी ॥ बहु अचार गिनो नहीं जायी । छप्पन भोग परोसे आयी ॥
ब्राह्मणका समुद्र तटपर स्नान करने जाना और कबीर साहबसे प्रार्थना करके ब्राह्मणका शरीर अच्छा कराना
( १५० )
लक्ष्मणबोध
ऋषी मुनी सब गरब झुलाये । तब हम एक कला दिखलाये ॥ ऋषि मुनी प्रसाद जब करहीं । जित तित पण्डा परसत फिरहीं ॥ जहाँ तहाँ हम ठाठ रहाये । आदर भाव कछू नहिं पाये ॥ जब पण्डा कोइ देखै मोही । तबहीं वचन कहै अस सोई ॥ ऋषि मुनि जब प्रसाद करिलेई । ता पीछे तुमही धरि देई ॥ तब हमही अस चरित दिखावा । कबीर हो गयो ठावहिं ठावा ॥ पुरुष प्रताप अजर शरीरा । होय अन्तर बिच बैठु कबीरा ॥ जित देखै तित दास कबीरा । भागे ऋषि ससुद के तीरा ॥ भागे पण्डा दूर से भाई । किय अस्नान ससुदैं जाई ॥ जाय अस्नान समुद्रमें कीना । काय देखि तब भये मलीना ॥ गलित कोठ सबहिन को भयऊ । जाय फिरियाद रायसो कियऊ ॥ वहाँ तो देखा एक शरीरा । यहाँ तो देखा सकल कबीरा ॥ ऐसा जादू चेटक कीना । सबका धर्म भ्रष्ट करि दीना ॥ तब राजा छडीदार पठायो । दास कबीर को बेगि बुलायो ॥ करि सलाम छडीदार सिधाये । कबीर मिले द्वार के माये ॥ आये कबीर राजाके ताई । तब राजा उठि टेके पाई ॥
राजा वचन
तबही राजा विन्ती कीना । हम तो सेवक सदा अधीना ॥ करहु दया दरद है देही । ब्राह्मण दुःख पावत है तेही ॥
मुनीन्द्र वचन
बडा अपराध उन ब्राह्मण कीन्हा । अन्नदेवको दूषण दीन्हा ॥ अन्नदेव को रोष उपजी भाई । अन्नदेव मनावहु जाई ॥ ऊंच नीच गनो मति कोई । तब काया कंचन सी होई ॥ जगन्नाथ अयोनि अवतारा । उनका है सब सत्य व्यवहारा ॥ अन्नका छूत करे जनि कोई । करे तो निश्चय कोठी होई ॥
जगन्नाथजीकी काष्ठकी प्रतिमा बनानेके लिये राजाको स्वप्न देना
बोधसागर
(१५१)
किनका किनका चुनि चुनिखायी। तबहीं कोठ दूर होय जायी ॥ तब सब ब्राह्मण सोनाक घसायी। सबका कोठ तबै मिटि जायी ॥ जगन्नाथ का भाव तब भयऊ। राजा रानी मिलि सब गयऊ ॥ जब राजा को दर्शन भयऊ। जगन्नाथ यक बात जनयऊ ॥
जगन्नाथ वचन
मलयागिरि को काठ मँगाओ। ताकी मूरति बेगि बनाओ ॥ तब राजा जाम्बूस पठाई। मलया गिरिको खोज कराई ॥ देख जाम्बूस फिरि नगर मँझारा। आई राजाको कीन जुहारा ॥
जाम्बूस वचन
अहो राजा चन्दन है यक ठाई। लगे भुजंग देखे बहुताई ॥ तब राजा यह बुधि उपजाई। सेना साथै लयी सिधाई ॥ जहाँ चन्दनतहाँ काष्ठ जगकीना। ताके समक्ष अग्नि सो दीना ॥ भयी प्रचण्ड अग्नि तेहि ठाहीं। जरे सर्प तब अगिन के माहीं ॥ काष्ठ चन्दन जबहीं ले आये। तब कारीगर तुरत बुलाये ॥
राजा वचन
बौद्ध औतारकी मूर्ति गढ़ि देहू। हमसे गाम परगना लेहू ॥
कारीगर वचन
तब कारीगर बात जनावे। राजा सुनो बनै नहिं आवे ॥ देखी मूरति सब कोइ गढई। अनदेखा काम कैसे बनई ॥ देवल काज हम चूक पराई। तो हम जरामूल से जाई ॥
१ पुरानी प्रतिले इस चौपाईके आगे नीचे लिखे वचन नहीं हैं, किन्तु नवोन प्रतियों में हैं। किन्तु यह नवीन प्रतिका वचन कबोर पंथके बोहा ग्रन्थोंसे भी नहीं मिलता।
“जगन्नाथ योनि विन अवतारा। उनका है यह सत्य व्यवहारा ॥ उनको भक्ति करे जो कोई। ताको काया काठे न होई ॥
साखी—जगन्नाथ मात ले हेतुकरि जो पाय। जो उनकी निदा करे, निश्चय नरक को जाय ॥”
( १५२ )
लक्ष्मणबोध
सत्यकबीर वचन
ऐसी कहि अपने घर वह गयऊ । तब राजा मनमें सोचत भयऊ ॥ जगन्नाथ की जो मूर्ति बनाई । गाम परगना तेहि देउँ लिखाई ॥ तब लक्ष्मी हमसे विन्ती कीना । यहि शोभा तुमही भल दीना ॥ देखी मूरति तब कोइ गढि देई । अनदेखे सो कैसे करई ॥ जो तुम हमसे टहल कराओ । यही काम करो तुम जाओ ॥ हम पर भार जो सृष्टिका दीना । करो यह काम होहु ना भीना ॥ हमको टहल सृष्टिका देहु । इतना कारज अपने शिर लेहु ॥ लक्ष्मी विन्ती ऐसी लायी । नातो विरद तुम्हारी जायी ॥ तब हम भेष सुतारका लीन्हा । बरस सौकी आयुर्दी कीन्हा ॥ आये पौरि मैं ठाढ़ रहाये । पवरिया राजकहँ वचन सुनाये ॥ राजा मैं तोहि देउँ बधाई । कारीगर आया पौरके माई ॥ कांधे बसुला बोले लौ लीना । हाले गर्दन बोले झीना ॥ राजा मनमें भये अनन्दा । जैसे चकोर पायो निशि चंदा ॥ राज प्रधान पौरीमें आयी । कारीगरसे अस कहे अर्थायी ॥ जगन्नाथकी मूरति बनाओ । तौ तुम ग्राम परगना पाओ ॥ देवलमाहिं मूर्ति धरि दीजै । जो चाहो सो हमसे लीजै ॥
कारीगर वचन
हम तो गुरु सुखा आहैं भाई । लोभ लालच नहिं हमरे ठाई ॥ देवलकाज सिद्ध करि देहों । लालच चित में नहीं करैहों ॥
सत्यकबीर वचन
इतना सुनि राजापहँ गयऊ । राजा सुनि मन हर्षित भयऊ ॥ तबही राजा महलमें जायी । रानीसों सब बात जनायी ॥ तब मुक्ताहलसो थार भरायी । कारीगरको लीन बुलायी ॥
कबीर साहबका निरंजनके अनुरोधसे कारीगरका रूप धरके राजाके द्वार पर जाना और प्रतिमा बनानेको बैठना
बांधवसागर
( १५१ )
कारीगर
राजा कहा हमारा कीजै । सोलह दिनकी अवधी दीजै ॥ हमको साज मूरति का देओ । देवलको द्वार मूँदि कर लेओ ॥ जबही साज देवल ले जाऊ । तबहीं द्वार मूँदि हो भाऊ ॥ तबही कह्यो मूँदि पौरिहि दीजै । सब कोइ गमन यहाँसे कीजै ॥ सोलह दिनमें द्वार खुलै हो । तौ कछु विघ्न नहीं तुम पैहो ॥ देह कपाट तब ताला दीना । चहुँ दिशि पण्डों चौकी कीना ॥ दिन दंश सो बीति जब गयऊ । चलत फिरत गोरख तब अयऊ ॥
गोरख वचन
गोरख कहे दर्शन मोहि दीजै । नहिं तो शाप हमारो लीजै ॥
सत्यकबीर वचन
तब पण्डा राजा पहुँ जायी । राजा से सब बात सुनायी ॥ राजा पण्डा सों कहे बुझाई । कौन शाप गोरखकेर उठाई ॥ तब पंडा गोरख पै आये । हाथ जोरिके विन्ती लाये ॥ दिनछः हम तुमसों माँगे भाई । ता पाछे हम दरश कराई ॥
गोरख वचन
साखी-मैं गोरख प्रसिद्ध हूँ, हमरे आड जनि होइ । मोको दरश करावहू, कै शाप हमरो लेहु ॥
चौपाई
तब राजा गोरख पगु पड़िया । बहु विन्ती भावसों उच्चरिया ॥ जब गोरख नहिं माने राई । तब राजा अस कह्यो बुझायी ॥
१ इस चौपाईमें दशदिनके पश्चात् गोरखका आना बतलाया है किन्तु नवीन प्रतियों में सात ही दिन लिखा है ।
“विना सात बीते पुनि जाई । फिरत फिर गोरख पुनि आई ॥”
नवीन प्रतियोंमें सब ऐसे ही बेतुकी वाणीका ऐसा गढ़बड हुआ है कि सब यहाँ पर लिखना असम्भव है ।
सोलह दिनतक द्वार न खोलनेका वचन टूटनेसे प्रतिमा अपूर्ण रहना
( १५४ )
लक्ष्मणबोध
तब राजा कहे सुन गोरख आयी । ऐसा तुम करिहो तैसा पायी ॥ नहि माना गोरख द्वार उघारा । तब सतगुरु एक कला परचारा ॥ भागा गोरख दूर ते भाई । सतगुरु शरण सो बैठा जाई ॥ जगन्नाथ कहे सुनु गोरख आई । योगी हमरो दरश न पाई ॥ यहि औगुन गोरख से भयऊ । ताते योगी दरश न पयऊ ॥ जगन्नाथ राजा सो कहेऊ । अवधिपूर नहीं सो भयऊ ॥ ताते हाथ ठूंट रहि जायी । दिन सोलह बीते नहि पायी ॥ देह सम्पूर्ण होन न पायी । झगरू पण्डहि को समझायी ॥ झगरू पण्डा शिष्य भयो आयी । केतिक दिन ऐसे बिति जायी ॥ तब जगन्नाथ सो भेंट करायी । जगन्नाथ कह सुनो जी आयी ॥ तुम्हरी हमरी भली बनि आयी । तब हम तेहि कहा समुझायी ॥ कहैं कवीर सुनो त्रिभुवन राई । सिंचल द्वीप हम देखन जाई ॥
साखी-सिंचल द्विप हम जावहीं, जगन्नाथ चित लाउ ।
समुन्दरका भय मेटिके, अटल राज कराउ ॥
इति श्रीबोधसागरे कबीरधर्मदाससम्भावे जगन्नाथ-
स्थापनवर्णनो नाम सप्तमस्तत्रंगः
इति ग्रन्थ लक्ष्मणबोध
संक्षेप सार
मोर
ग्रन्थपर साधारण वृद्धि
यद्यपि इस ग्रन्थमें लक्ष्मणजीको भी बोध करनेकी प्रसंगसे थोड़ी चर्चा आगयी है किन्तु प्रधानतः इस ग्रन्थमें वर्णन जगन्नाथजी की स्थापनाका है । इस जगन्नाथकी स्थापनाके विषयमें भी अनेक ग्रन्थोंमें बहुत मत भेद हैं इस कारण और-और ग्रन्थोंका भी इस विषयमें वर्णन थोडासा लिख देता हूँ ।
बोधसागर
( १५५ )
जब श्रीकृष्णजीका स्वधाम गमन हुआ तब बौद्धावतार हुआ। और जब जगन्नाथजीका अवतार हुआ उस समय उड़ीसा देशका राजा इन्द्रदमन था। उस राजा इन्द्रदमनको कृष्णजीने स्वप्न दिखलाया कि तू मेरा मन्दिर उठा। जगन्नाथजीकी आज्ञानुसार राजा मन्दिर बनाने लगा, जब मन्दिर तैयार होगया तब समुद्र आया और मन्दिरको ढहाकर लेगया और भूमि बराबर कर गया। इसके उपरान्त फिर राजाने मन्दिर बनवाना आरंभ किया फिर उसकी वही दशा हुई। फिर बनवाया फिर वही दशा होगयी। इस प्रकार कई बेर राजाने मन्दिर बनवानेकी इच्छा की पर समुद्रने उसको तैयार होने नहीं दिया तब राजाने दुःखी होकर उस इमारत का बनवाना ही छोड़ दिया इस समय कबीर साहबने अपने वचनका स्मरण किया जैसा कि निरंजनगोष्ठि आदि ग्रन्थोंमें लिखा है कि, निरंजनने कबीर साहबसे निवेदन किया था कि जब मेरा जगन्नाथका अवतार होगा तब समुद्र मेरे मंदिरको तोड़ेगा, उस समय आप कृपा करके समुद्रको हटा देवें और मेरे मंदिरको स्थापित करा देवें तब आप वचनबद्ध हुए थे कि, मैं तुम्हारा मंदिर स्थापित करा दूँगा और समुद्रको हटा दूँगा। उसी वचनके अनुसार कबीर साहब उड़ीसा देशमें आन उतरे और राजा इन्द्रदमनके पास जाकर बोले, कि हे राजा! तुम जगन्नाथके मंदिरको बनाओ तब राजाने निवेदन किया कि, महाराज समुद्र मंदिरको बनाने नहीं देता मेरा कुछ वश नहीं चलता, जब मैं बनाता हूँ तब वह आकर ढहा जाता है मैं क्या कहूँ ? कबीर साहबने कहा कि राजा ! मैं इसी प्रयोजनसे आया हूँ अब प्रसन्नतापूर्वक ठाकुरद्वारा बनवाओ
( १५६ )
लक्ष्मणबोध
मैं समुद्रको हटा दूँगा अब उसका कुछ वश नहीं चलेगा. तब राजाने पुनः मंदिरको बनवाना आरम्भ किया और मंदिर बनने लगा, कबीर साहब समुद्र तटपर गये और एक चबूतरा बनाकर उसपर समुद्रकी ओर मुँह करके बैठ गये। उधर ठाकुरका मंदिर बनकर तैयार होनेके समीप आगया और समुद्र ने देखा कि अब तो ठाकुरका मंदिर बन गया तब बडे वेगसे दौड़ा और लहरें आकाशको उठीं। जब लहरें मारता कबीरके चौराके समीप पहुँचा तब सामने कबीर साहबको बैठे देखा देखते ही समुद्र ठहर गया और आगेको चरण बढ़ा नहीं सका और ब्राह्मणका स्वरूप धरकर कबीर साहबके पास आया और दण्डवत प्रणाम करके निवेदन किया कि, हे महाराज ! मैं तो जगन्नाथके धोखेसे आया और मंदिर ढहाना चाहा अब तो सामने आप बैठे हैं अब मुझमें यह सामर्थ्य नहीं है कि आगेको चरण बढ़ा सकूँ, आप न्यायकर्ता हैं मेरा बदला दिलाओ। तब कबीर साहबने कहा कि हे समुद्र ! मैं तुम्हारा बदला जानता हूँ पर अब इस कलिकालमें जगन्नाथजीका माहात्म्य होगा तथा उनकी पूजा होवेगी इस कारण अब तुम ठाकुरका मंदिर उठने दो और किसी प्रकारकी बाधा उपस्थित मत करो, मैं तुमको इस ॥ मंदिरके बदले द्वारकापुरी देता हूँ तुम जाकर उसको डुबा लो। तब समुद्र प्रसन्नतापूर्वक वहाँसे पीछे पलटा और द्वारकापुरीको डुबा लिया और उधर जगन्नाथजीका मंदिर बनकर पूरा होजुका. समुद्रके हरिमंदिर तोड़नेका कारण यह था कि जब रामचन्द्रका अवतार हुआ था उस समय श्रीरामचन्द्रजीने समुद्रपर बलात्कार किया था और सेतुबन्धपुल बांधकर पार उतरे थे किन्तु समुद्र
बोधसागर
( १५७ )
राम अवतारमें और कृष्णावतारमें भी बदला ले नहीं सका पर जगन्नाथके औतारमें अपना बदला लेने के निमित्त ऊद्यत हुआ और उसके बदले द्वारकापुरीको जुबा दिया । इससे यह सिद्ध होता है कि कियेका बदला अवश्य भोगना पड़ता है । इस प्रकार जब ठाकुरका मन्दिर बनकर भली भाँति प्रस्तुत होगया तब कृष्णजीने अपने पण्डाको स्वप्न दिखलाया कि हे पण्डे ! कबीर साहिबने मेरा मन्दिर स्थापित कर दिया अब तुम लोग आकर मेरी पूजा करो । जब जगन्नाथजीने ऐसा स्वप्न दिखलाया तब पण्डा घरसे चलकर पहले समुद्र तटपर आया और कबीर चौरे पर गया वहाँ कबीर साहबको बैठे देखा । उस समय सत्य गुरुका वेष जिन्दा साधुका था और वैष्णववेष नहीं था । इस कारण वह वेष देखकर उस ब्राह्मणने अपने मनमें अनुमान किया कि प्रथम मैंने अशुभ दर्शन किया ठाकुरका दर्शन नहीं किया, ऐसा अनुमान करके वह पण्डा ठाकुरके मन्दिरमें पहुँचा, तब कबीर साहिबने उसके मनकी समस्त बातें जान लीं और ऐसा कौतुक दिखलाया की जब वह पण्डा ठाकुरके मंडपमें आया तब उसको विचित्र कौतुक दिखलाई दिया कि ठाकुरका समस्त मन्दिर कबीर साहिबकी मूर्तियोंसे भरा हुआ है । जिस ओरको वह ब्राह्मण देखता है उधर वह कबीर साहबकी मूर्तिको उपस्थित पाता है और ठाकुरकी मूर्ति कहीं दिखाई नहीं देती, तब वह ब्राह्मण अक्षत और पुष्प लिये चकित होकर खड़ा रह गया कि मैं किसकी पूजा करूँ । ठाकुर तो कहीं दिखलाई नहीं देते । समस्त मन्दिर कबीरसाहिबकी मूर्तियोंसे भरा हुआ है । तब वह अपने मनमें सोचने लगा
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लक्ष्मण बोध
कि इसका क्या कारण है और फिरसे भोजनके समयमें भी कबीर साहबने सर्वत्र दर्शन दिया जैसा इस ग्रन्थ लक्ष्मणबोधमें वर्णन है। अन्तमें उसने अपने दोषको जान लिया कि मैंने जो कबीर साहब को म्लेच्छ समझा था इस कारण ही मुझको यह दंड मिला है, और मुझको यह कौतुक दिखलाया। यह शोच समझकर वह ब्राह्मण कबीर साहबकी स्तुति और दोषके निमित्त क्षमा प्रार्थना करने लगा। जब इस पण्डाने सत्यगुरुकी बहुत प्रार्थना और स्तुति की और अत्यन्त नम्रतापूर्वक अपने दोषोंके निमित्त क्षमा प्रार्थना की तब आप दयालु हुए और अपनी सब मूर्तियोंको समेट लिया केवल एक मूर्ति रह गई और ठाकुरकी मूर्ति दिखाई देने लगी। तब कबीर साहबने उस ब्राह्मणसे कहा की हे पण्डा! अब तुम ठाकुरको पूजो पर इस बातका ध्यान रखना कि आजके दिनसे इस जगन्नाथपुरीमें छूत न रहेगी और जाति पाँतिका ध्यान तनिक भी न रहेगा। प्रत्येक जाति एक दूसरे जातिके साथ निधडक भोजन करेगी। अबल्लों पुरुषोत्तमपुरीमें वही नियम प्रचलित है। सब जातिके लोग एकही स्थानपर भोजन करते हैं कोई किसीके जूठेका कुछ भी ध्यान नहीं करता।
इस ग्रन्थकी भी कई प्रतियां मेरे पास उपस्थित हैं, कोई प्रति भी किसीके साथ मिलती नहीं है। सब प्रतियोंमें प्रसंगका तो ऐसा उलट पुलट है कि, कहीं किसीका पता नहीं मिलता और कविताकी तो यह दशा है कि चौपाईके किसी चरण में २२ मात्रा हैं और किसीमें १४। और लिखायी की जो बात है उसको कहनेकी आवश्यकता ही नहीं है, इस कारणसे यह