माधव निदान (मधुकोश व्याख्या व हिन्दी अनुवाद सहित)
Madhava Nidana with Madhukosha & Hindi Translation
माधवकर द्वारा
स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
भाषाटीकासमेत । ( ३३१ ) जिसके नेत्रके कोएके बाहर अथवा भीतर काली सूजन होय तथा पीडा होय उसको वर्त्मरोगके जाननेवाले श्याववर्त्म कहते हैं, वह वाताधिक त्रिदोषजन्य है विदेहने लिखा भी है ॥ प्रक्लिन्नवर्त्मके लक्षण । अरुजं बाह्यतः शूनं वर्त्म यस्य नरस्य हि । प्रक्लिन्नवर्त्म तद्विद्यात् क्लिन्नमत्यर्थमंततः ॥ ९१ ॥ जो कोया अल्पपीडा तथा बाहरसे सूजा हुआ अत्यन्त कीचडसे व्याप्त हो उसको प्रक्लिन्नवर्त्म कहते हैं, यह कफज विकार है ॥ अक्लिन्नवर्त्मके लक्षण । यस्य धौतान्यधौतानि संबध्यंते पुनः पुनः । वर्त्मान्यपरिपक्वानि विद्यादक्लिन्नवर्त्म तत् ॥ ९२ ॥ जिसके नेत्रके पलक धोनेसे अथवा नहीं धोनेसे बारंबार चिपक जावें कोएँ पक- कर राधसे नहीं चिकटें तो इस रोगको अक्लिन्नवर्त्म कहते हैं, इस रोगको विदेह पिल्लारूया कहते हैं ॥ वातहतवर्त्मके लक्षण । विमुक्तसंधि निश्चेष्टं वर्त्म यस्य न मील्यते । एतद्वातहतं वर्त्म जानीयादक्षिचिन्तकः ॥ ९३ ॥ जिसके नेत्रके पलक पृथक् पृथक् होयँ तथा जिसके पलक मिचें और खुले नहीं ऐसे नेत्रके कोए मिले नहीं उसको वातहतवर्त्म शालाक्यसिद्धान्तवाला कहता है ॥ अर्बुदके लक्षण । वर्त्मान्तरस्थं विषमं ग्रन्थिभूतमवेदनम् । आचक्षतेऽर्बुदमिति सरक्तमविलंबितम् ॥ ९४ ॥ नेत्रके कोएके भीतर गोल मन्दवेदनायुक्त कुछ लाल जल्दी बढनेवाली ऐसी जो गांठ होय उसको अर्बुद कहते हैं, यह भी सन्निपातज है ॥ निमेषके लक्षण । निमेषिणीः शिरा वायुः प्रविष्टो वर्त्मसंश्रयः । प्रचालयति वर्त्मानि निमेषं नाम तं विदुः ॥ ९५ ॥ ━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━━ १-दुष्टं श्लेष्मानिलात्पित्तं वर्त्मनोऽश्रीयते यदा । अभिदग्धनिभं श्यावं श्याववर्त्मेति तद्विदुः ॥ इति ॥
( ३३४ ) माधवनिदान ।
( ३३४ ) माधवनिदान । वर्त्माश्रित ( कोएमॆं स्थित ) जो वायु, सो निमेष ( पलकके उघाडने मूंदनेवाली नस ) में प्रवेश होकर बारंबार पलकोंको चलायमान करे, उसको निमेष ( नेत्रका मिचकाना ) कहते हैं, विदेहेने भी लिखा है। यह रोग भी सन्निपातज है ॥ शोणितार्शके लक्षण । वर्त्मस्थो यो विवर्द्धेत लोहितो मृदुरंकुरः । तद्रक्तजं शोणितार्शश्छिन्नं छिन्नं प्रवर्द्धते ॥ ९६ ॥ रुधिरके सम्बन्धसे नेत्रके कोएके भीतर भागमें लाल तथा नरम अंकुर बढे उसको शोणितार्श कहते हैं, उसको जैसे जैसे काटे तैसे २ बढता है इस रक्तज व्याधिको विदेह आचार्य असाध्य कहते हैं । लगणके लक्षण अपाकी कठिनः स्थूलो ग्रन्थिर्वर्त्मभवोऽरुजः । सकण्डूः पिच्छिलः कोलसंस्थानो लगणस्तु सः ॥ ९७ ॥ नेत्रके कोएमॆं बेरके समान बडी कठिन खुजलीसंयुक्त चिकनी गांठ होय उसको लगण कहते हैं । यह रोग कफजन्य है, इसमें पीडा और पकना नहीं होय ॥ बिसवर्त्मके लक्षण । त्रयो दोषा बहिः शोथं कुर्युश्छिद्राणि वर्त्मनोः । प्रस्रवत्यंतरुदकं बिसवद्विसवर्त्म तत् ॥ ९८ ॥ तीनों दोष कुपित होकर नेत्रके कोएको सुजाय देवें तथा उनमें छिद्र होजाय, उन कोयौमेंसे कमलतन्तुके समान भीतरसे पानी झरे, इस रोगको बिसवर्त्म कहते हैं ॥ कुञ्चनके लक्षण । वाताद्या वर्त्मसंकोचं जनयंति यदा मलाः । तदा द्रष्टुं न शक्नोति कुंचनं नाम तद्विदुः ॥ ९९ ॥ वातादिदोष जब कोएके मार्गको संकुचित करें तब मनुष्य नेत्रको उघाड कर नहीं देखसके, इस रोगको कुञ्चन कृच्छ्रोन्मीलन कहते हैं, यह रोग सुश्रुताचार्यने नहीं लिखा, माधवाचार्यने ही लिखा है ॥ १ निमेषिणीः शिरा वायुः प्रविश्य व्यवतिष्ठते । अत्यर्थं चलते वर्त्म निमेषः स न सिध्यति ॥ २ वायुः शोणितमादाय शिराणां प्रमुखे स्थितः । जनयत्यंकुरं ताम्रं वर्त्मनि च्छिन्नरोहणम् ॥ तच्छोणितार्शोऽसाध्यं स्याद्रक्तास्राव्यथ रक्तजम् ॥
भाषाटीकासमेत । (३३५) पक्ष्मकोपके लक्षण । प्रचालितानि वातेन पक्ष्माण्यक्षि विशंति हि । घृष्यन्त्यक्षि मुहुस्तानि संरम्भं जनयन्ति च ॥ १०० ॥ असिते सितभागे च मूलकोशात्पतन्त्यपि । पक्ष्मकोपः स विज्ञेयो व्याधिः परमदारुणः ॥ १०१ ॥ वादीसे चलायमान कोएके बाल नेत्रमें प्रवेश करे और वह वारंवार नेत्रसे रगडे जायँ, इसीसे नेत्रके काले वा सफेद भागमें सूजन होय, यह केश (बाल) जडसे टूट जावें, अतएव इस व्याधिको पक्ष्मकोप अथवा उपपक्ष्म कहते हैं। यह बडा दुःखदायक है ॥ पक्ष्मशातके लक्षण । वर्त्म पक्ष्माशयगतं पित्तं रोमाणि शातयेत् । कण्डूं दाहं च कुरुते पक्ष्मशातं तमादिशेत् ॥ १०२ ॥ पलकोंकी जडमें रहनेवाला पित्त कुपित होकर नेत्रोंके बाल जिनको वरुनी अथवा बाफणी कहते हैं उनका नाश करे तथा नेत्रोंमें खुजली चले, दाह होय उसको पक्ष्मशात कहते हैं। इस रोगको भी सुश्रुतने संख्या बढनेके भयसे नहीं लिखा, माधवाचार्यने अन्य ग्रन्थोंके मतसे लिखा है ॥ इति वर्त्मजनिदानम् ॥ नेत्ररोगोंकी संख्या । नव संध्याश्रयास्तेषु वर्त्मजास्त्वेकाविंशतिः । शुक्लभागे दशैकश्च चत्वारः कृष्णभागजाः ॥ १ ॥ सर्वाश्रयाः सप्तदश दृष्टिजा द्वादशैव तु । बाह्यजौ द्वौ समाख्यातौ रोगौ परमदारुणौ ॥ भूय एतान्प्रवक्ष्यामि संख्यारूपचिकित्सितैः ॥ २ ॥ सन्धिमें होनेवाले नेत्ररोग ९ प्रकारके हैं और कोएमें होनेवाले रोग २१ हैं और नेत्रके सफेद भागमें होनेवाले रोग ११ हैं और काले भागके ४ हैं और सर्व- सर अर्थात् सर्व नेत्रमें होनेवाले रोग १७ हैं और दृष्टिके रोग १२ हैं और नेत्रके बाहरके रोग २ हैं (ये हमने संगृहीत श्लोकमें लिखे हैं) ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां नेत्ररोगनिदानं समाप्तम् ॥
( ३३६ ) माधवनिदान ।
( ३३६ ) माधवनिदान । अथ शिरोरोगनिदानम् । —oOo——oOo— शिरोरोगाश्च जायन्ते वातपित्तकफैस्त्रिभिः । सन्निपातेन रक्तेन क्षयेण कृमिभिस्तथा ॥ १ ॥ सूर्यावर्त्तानंतवातार्द्धावभेदकशंखकैः । एकादशप्रकारस्य लक्षणं संप्रवक्ष्यते ॥ २ ॥ वात पित्त कफ इनसे ३, सन्निपातसे १, रुधिरसे १, क्षयसे १, कृमिसे १, सूर्यावर्त १, अनंतवात १, अर्धावभेदक १ और शंखक १ सब मिलकर ११ प्रका- रके शिरोरोग ( मस्तक शूल ) होते हैं । उनके लक्षण आग कहेंगे ॥ वातजके लक्षण । यस्यानिमित्तं शिरसो रुजश्च भवन्ति तीव्रा निशि चातिमात्रम् । बन्धोपतापैः प्रशमश्च यत्र शिरोभितापः स समीरणेन ॥ ३ ॥ जिसका मस्तक अकस्मात् दुखे और रात्रिमें विशेष दुखे, बांधनेसे अथवा सेक- नेसे शांति हो, उसका वातज शिरोरोग जानना चाहिये ॥ पैत्तिक लक्षण । यस्योष्णमङ्गारचितं तथैव भवेच्छिरो दह्यति वाऽक्षिनासम् । शीतेन रात्रौ प्रशमं च याति शिरोभितापः स तु पित्तकोपात् ॥ ४ ॥ जिसका मस्तक अंगारसे तपायेके समान गरम होवे और नेत्रमें तथा नाकमें दाह होय शीतल पदार्थसे रात्रिमें शांति होय, उस मस्तक शूलको पित्तकोपका जानना ॥ श्लैष्मिकके लक्षण । शिरो भवेद्यस्य कफोपदिग्धं गुरु प्रतिस्तब्धमतो हिमं च । शूनाक्षिकूटं वदनं च यस्य शिरोभितापः स कफप्रकोपात् ॥ ५ ॥ जिसका मस्तक भीतरसे कफकरके लिप्त ( लिहसासा ) होवे, भारी बँधासा शीतल होवे तथा नेत्रके कोये सुजाकर मुखको सुजाय देवे, इस मस्तक रोगको कफके कोपका जानना चाहिये ॥ सान्निपातिकके लक्षण । शिरोभितापे त्रितयप्रवृत्ते सर्वाणि लिंगानि समुद्भवंति । त्रिदोषसे उत्पन्न मस्तक रोगमें तीनों दोषोंके सब लक्षण होते हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( ३३७ ) रक्तजके लक्षण । रक्तात्मकः पित्तसमानलिंगः स्पर्शासहत्वं शिरसो भवेच्च । रक्तजन्य मस्तकरोगमें पित्तकृत मस्तकरोगके सब लक्षण होते हैं तथा मस्तकके स्पर्श सहा नहीं जाय, यह विशेष होता है ॥ क्षयजके लक्षण । असृग्वसाश्लेष्मसमीरणानां शिरोगतानामिह संक्षयेण ॥ ६ ॥ क्षवप्रवृत्तिः शिरसोऽभितापः कष्टो भवेदुग्ररुजोऽतिमात्रम् । संस्वेदनच्छर्द्दनधूम्रनस्यैरसृग्विमोक्षैश्च विवृद्धिमेति ॥ ७ ॥ मस्तकके रुधिर वसा कफ और वायु इनके क्षय होनेसे अत्यन्त भयंकर मस्तक- शूल होता है, छींक बहुत आवें, मस्तक गरम होवे, कष्ट होय, अत्यन्त कठिन ( असह्य ) पीडा होय, उसमें स्वेदन, वमन, धूम्रपान, नस्य, रुधिर निकालना ये उप- द्रव करनेसे मस्तक शूल वृद्धिको प्राप्त होता है, इसको क्षयज मस्तक शूल कहते हैं ॥ कृमिजके लक्षण । निस्तुद्यते यस्य शिरोऽतिमात्रं संभक्ष्यमाणं स्फुरतीव चान्तः । घ्राणाच्च गच्छेद्रुधिरं सपूयं शिरोभितापः कृमिभिः स घोरः ॥ ८ ॥ जिसके मस्तकमें सुईके चुभनेके समान पीडा होवे, तथा कृमि मस्तकको खा रही हो तथा मस्तकके भीतरमें फडकत्ता हुआ मालूम हो तथा नाकमें रुधिर राध और कीडे पडें यह कृमिरोग बडा भयंकर है ॥ सूर्यावर्तके लक्षण । सूर्योदयं या प्रति मन्दमन्दमाक्षिध्रुवं रुक्समुपैति गाढा । विवर्द्धते चांशुमता सहैव सूर्यापवृत्तौ विनिवर्तते च ॥ ९ ॥ शीतेन शांतिं लभते कदाचिदुष्णेन जंतुः सुखमाप्नुयाद्वा । सर्वात्मकं कष्टतमं विकारं सूर्यापवर्तं तमुदाहरंति ॥ १० ॥ सूर्यके उदय होनेसे धीरे धीरे मस्तक दुखनेका आरंभ होय और जैसे जैसे सूर्य बढे तैसे तैसे वह शूल नेत्र और भृकुटी ( भौंह ) इत्तमें दो प्रहर दिन चढे तक बढता जाय और सूर्यके साथ बढकर फिर जैसे २ सूर्य अस्त होय तैसे २ पीडा मन्द होती जाय, शीतल और गरम उपचार करनेसे मनुष्यको सुख होय, इस सान्नि- पातिक विकारको सूर्यावर्त्त कहते हैं ॥ अनंतवातके लक्षण । दोषास्तु दुष्टास्त्रय एव मन्यां संपीड्य गाढं सरुजां सुतीव्राम् । CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ३३८ ) माधवनिदान ।
( ३३८ ) माधवनिदान । कुर्वति साक्षिभ्रुवि शंखदेशे स्थितिं करोत्याशु विशेषतस्तु ॥ ११ ॥ गण्डस्य पार्श्वे च करोति कम्पं हनुग्रहं लोचनजांश्च रोगान् । अनन्तवातं तमुदाहरंति दोषत्रयोत्थं शिरसो विकारम् ॥ १२ ॥ तीनों दोष ( वात पित्त कफ ) दुष्ट होकर मन्यानाडीको पीडित कर नेत्र भौंह कनपटी इनमें घोर पीडा करें तथा गंडस्थलके समीपमें कंप होय, ठोडी जकडजाय, नेत्ररोग होयँ, इस त्रिदोषजन्य मस्तकरोगको अनंतवात कहते हैं, सुश्रुतने अनंत- वातरोगको छोडकर मस्तकरोग १० ही कहे हैं ॥ अर्धावभेदक ( आधासीसी ) के लक्षण । रूक्षाशनात्यध्यशनप्राग्वातावश्यायमैथुनैः । वेगसंधारणायासव्यायामैः कुपितोऽनिलः ॥ १३ ॥ केवलः सकफो वाऽर्द्धं गृहीत्वा शिरसो बली । मन्याभ्रूशंखकर्णाक्षिललाटेऽर्धेऽतिवेदनाम् ॥ १४ ॥ शस्त्रारणिनिभां कुर्यात्तीव्रां सोऽर्धावभेदकः । नयनं वाऽथवा श्रोत्रमतिवृद्धो विनाशयेत् ॥ १५ ॥ रूखे अन्नसे, अत्यन्त भोजन, अध्यशन (भोजनके ऊपर भोजन), पूर्वदिशाकी पवन सेवन करनेसे, बर्फसे, मैथुनसे, मलमूत्रादिका वेग धारण करनेसे, परिश्रम और दंडकसरत करनेसे इन कारणोंसे कुपित भई जो केवल वायु अथवा कफयुक्त वायु सो आधे मस्तकको ग्रहण कर मन्यानाडी, भृकुटी, कनपटी, कान, नेत्र, ललाट ये सब एक ओरसे आधे दूखें, कुल्हाडीसे घाव करनेकीसी अथवा अरणी (आंच निकालनेके) काष्ठके मथनेकीसी पीडा होय, उसको अर्धावभेदक (आधासीसी) कहते हैं। यह रोग जब बहुत बढजाता है तब एक ओरके कानसे बहरापन होजाता है अथवा एक ओरकी आंख मारी जाती है। जिस ओरको पीडा होय उधर ये उपद्रव होते हैं। सुश्रुतने इस रोगको त्रिदोषज कहा है ॥ शंखकके लक्षण । पित्तरक्तानिला दुष्टाः शङ्खदेशे विमूर्च्छिताः । तीव्ररुग्दाहरागं हि शोथं कुर्वन्ति दारुणम् ॥ १६ ॥ स शिरो विषवद्वेगी निरुद्ध्याशु गलं तथा । १-स्यादुत्तमांगं रुजतेऽर्द्धमात्रं सतोदभेदभ्रममोहशूलैः । पक्षाद्दशाहादथवाप्यकस्मात्स्यादर्द्धभेदे त्रितयाद्व्यवस्येत् ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
भाषाटीकासमेत । ( ३३९ ) त्रिरात्राज्जीवितं हन्ति शङ्खको नाम नामतः । त्र्यहाज्जीवति भैषज्यं प्रत्याख्यायास्य कारयेत् ॥ १७ ॥ दुष्टभये जो पित्त रक्त और वायु ( इस जगह कफको भी दुष्ट हुआ जानना यह सुश्रुतने कहा है ) सो विशेष बढकर नेत्रोंमें भयंकर सूजन उत्पन्न करे और इसमें घोर पीडा होय, घोर दाह होय तथा नेत्र लाल बहुत हों और यह विषके वेगके समान बढकर गलेमें जाकर गलेको रोक दे, इस शंखरोगसे रोगीके तीन दिनमें प्राणोंका नाश होय, इन तीन दिनमें कुशलवैद्यकी औषधि पहुँचनेसे रोगी बचे, परन्तु बचे या न बचे ऐसा निश्चय करके चिकित्सा करना ॥ इति श्रीपण्डितदत्ताराममाथुरप्रणीतमाधवार्थबोधिनोमाधुरीभाषाटीकायां शिरोरोगनिदानं समाप्तम् ॥ अथ प्रदररोगनिदानम् । विरुद्धमद्याध्यशनादजीर्णाद्गर्भप्रपातादतिमैथुनाच्च । यानाध्वशोकादतिकर्शनाच्च भाराभिघाताच्छयनाद्दिवा च ॥ तं श्लेष्मपित्तानिलसन्निपातैश्चतुष्प्रकारं प्रदरं वदंति ॥ १ ॥ विरुद्ध ( क्षीरमत्स्यादि ), मद्य, अध्यशन ( भोजनके ऊपर भोजन ), अजीर्ण, गर्भपात, अतिमैथुन, अति गमन ( बहुत चलना ), अतिशोक, उपवासादि करके कर्शन अर्थात् व्रतके करनेसे सूखजाना, भारके बहनेसे अर्थात् भारीवस्तु उठाकर चलनेसे, चोटके लगनेसे, दिनमें सोनेसे इन कारणोंसे कफ पित्त वायु और सन्निपात इन भेदोंसे चार प्रकारका प्रदररोग होता है ॥ प्रदररोगके सामान्यरूप । असृग्दरं भवेत्सर्वं सांगमर्दं सवेदनम् ॥ २ ॥ सब प्रदरोंमें अंगोंका टूटना तथा हाथ पैरोंमें पीडा होती है ॥ उपद्रवके लक्षण । तस्यातिवृद्धौ दौर्बल्यं श्रमो मूर्च्छा मदस्तृषा । दाहः प्रलापः पाण्डुत्वं तंद्रा रोगाश्च वातजाः ॥ ३ ॥ जब यह प्रदर बहुत बढ जाता है तब दुर्बलता होय, थकजाय, मूर्च्छा आवे, मस्तपन, प्यास, दाह, प्रलाप ( बकना ), देह पीला होजाय, तन्द्रा और वातजरोग ( आक्षेप अपतान कम्पादिक ) होते हैं ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ३४० ) माधवनिदान ।
( ३४० ) माधवनिदान । श्लैष्मिकके लक्षण । आमं सपिच्छप्रतिमं सपांडु पुलाकतोयप्रतिमं कफात् । कफसे आमरस ( कच्चा रस ) संयुक्त, चिकना, किंचित् पीला, मांसके धुले जलके समान स्राव होय, इसको श्वेत प्रदर अथवा सोमरोग कहते हैं ॥ पैत्तिकके लक्षण । सपीतनीलासितरक्तमुष्णं पित्तार्त्तियुक्तं भृशवेगि पित्तात् ॥ ४ ॥ किंचित् पीला, नीला, काला, लाल, गरम ऐसा प्रदर बहै, उसमें पित्तसे दाह चिमचिमादि पीडा होय तथा उसका वेग अत्यन्त होय ॥ वातिकके लक्षण । रूक्षारुणं फेनिलमल्पमल्पं वातार्त्ति वातात्पिशितोदकाभम् । वातसे रूक्ष, लाल, झागसे युक्त मांसके और सफेद पानीके समान थोडा थोडा प्रदर बहै उसमें बादी ( आक्षेपादि ) की पीडा होय है ॥ त्रिदोषजके लक्षण । सक्षौद्रसर्पिर्हरितालवर्णं मज्जाप्रकाशं कुणपं त्रिदोषम् । तच्चाप्यसाध्यं प्रवदन्ति तज्ज्ञा न तत्र कुर्वीत भिषक् चिकित्साम्॥५॥ जो प्रदर शहद, घृत, हरिताल इनके रंगके समान, चर्बीके समान तथा मुर्दे- कीसी दुर्गंध युक्त होय उसको त्रिदोषप्रदर जानना, यह असाध्य है अर्थात् इसकी वैद्य चिकित्सा न करे ॥ विशुद्धार्त्तवके लक्षण । मासान्निपिच्छदाहार्त्ति पञ्चरात्रानुबन्धि च । नैवातिबहुलं नाल्पमार्त्तवं शुद्धमादिशेत् ॥ ६ ॥ शशासृक्प्रतिमं यच्च यद्वा लाक्षारसोपमम् । तदार्त्तवं प्रशंसन्ति यच्चाप्सु न विरज्यते ॥ ७ ॥ जो आर्त्तव ( रजोधर्शनका रुधिर ) चिकना नहीं होवे तथा जिसमें दाह झूला- दिक न हों, तथा जिसका अनुबन्ध महीनेमें पांच दिवसपर्यन्त होय तथा बहुत न निकले और थोडा भी न होय ( मध्यम प्रमाणका होय ) उसको शुद्ध आर्त्तव जानना चाहिये और जो आर्त्तव खरगोशके रुधिरके समान होवे अथवा लाखके रंगकासा लाल होवे और जिससे रंगे कपडेको जलमें डालनेसे वर्ण नहीं पलटे, उसको शुद्ध आर्त्तव कहते हैं ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां प्रदररोगनिदानं समाप्तम् ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ योनिव्यापत्तिनिदानम् ।
भाषाटीकासमेत । ( ३४१ ) अथ योनिव्यापत्तिनिदानम् । विंशतिर्व्यापदो योनेर्निर्दिष्टा रोगसंग्रहे । मिथ्याचारेण ताः स्त्रीणां प्रदुष्टेनार्त्तवेन च ॥ १ ॥ जायन्ते बीजदोषाच्च दैवाच्च शृणु ताः पृथक् । रोगसंग्रहमें योनिके बीस रोग हैं वह मिथ्या आहार और मिथ्या विहार करके तथा दुष्ट आर्त्तवसे, बीजदोषसे और दैवकी इच्छासे स्त्रियोंके होते हैं, उनके लक्षण पृथक् पृथक् कहताहूं सुनो ॥ सा फेनिलमुदावर्त्ता रजः कृच्छ्रेण मुञ्चति ॥ २ ॥ वन्ध्यां नष्टार्तवां विद्याद्विप्लुतां नित्यवेदनाम् । परिप्लुतायां भवति ग्राम्यधर्मेण रुग्भृशम् ॥ ३ ॥ वातला कर्कशा स्तब्धा शूलनिस्तोदपीडिता । चतसृष्वपि चाद्यासु भवन्त्यनिलवेदनाः ॥ ४ ॥ जिस योनिसे झाग मिला रुधिर बडे कष्टसे बहे उसको उदावर्त्ता योनि कहते हैं और जिसका आर्त्तव नष्ट हो उसको वंध्या कहते हैं, जिसके निरंतर पीडा हो उसको विप्लुता कहते हैं, जिसके मैथुन करनेमें अत्यन्त पीडा हो उसको परिप्लुता कहते हैं, जो योनि कठोर स्तब्ध होकर शूलतोदयुक्त होवे उसको वातला कहते हैं । स्वस्व- लक्षणसंयुक्ता पित्तला श्लेष्मला योनि भी जाननी चाहिये और पहले जो चार योनि (उदावर्त्ता, वंध्या, विप्लुता, परिप्लुता) कही हैं इनमें वातकी पीडा होती है और वातलामें वातकी पीडा विशेष होती है ॥ सदाहं क्षीयते रक्तं यस्याः सा लोहितक्षया । सवातमुद्विरेद्बीजं वामिनी रजसान्वितम् ॥ ५ ॥ प्रस्रंसिनी भ्रंशते तु क्षोभिता दुष्प्रजायिनी । स्थितं स्थितं हन्ति गर्भं पुत्रघ्नी रक्तसंक्षयात् ॥ ६ ॥ अत्यर्थं पित्तला योनिर्दाहपाकज्वरान्विता । चतसृष्वपि चाद्यासु पित्तलिङ्गोच्छ्रयो भवेत् ॥ ७ ॥
( ३४२ ) माधवनिदान ।
( ३४२ ) माधवनिदान । जिस योनिसे दाहयुक्त रुधिर बहे उसको लोहितक्षया कहते हैं, जिसमें से रजोयुक्त शुक्र वायु बराबर बहे उसको वामिनी कहते हैं। जो योनि स्थानभ्रष्ट होय उसको प्रस्रंसिनी कहते हैं, जिसमें अंग बाहर निकल आवे और यह विमर्दित करनेसे प्रसव योग नहीं होय हैं, जिस योनिमें रुधिरक्षय होनेसे गर्भ न रहे उसको पुत्रघ्नी कहते हैं, जो योनि अत्यन्त दाह पाक ( पकना ) और ज्वर इन लक्षणों करके संयुक्त होय उसको पित्तला कहते हैं, इनमें पहली जो चार ( रक्तक्षया वामिनी प्रस्रंसिनी और पुत्रघ्नी ) इनमें पित्तके लक्षण अधिक होते हैं और पित्तलामें पित्तके विशेष लक्षण होते हैं और पित्तलामें जो ज्वर, दाह, पाक कहे हैं सो उपलक्षमात्र हैं अर्थात् इनमें नील पीला सफेद आर्तव बहता है यह जानना सो तन्त्रान्तरोंमें लिखा है॥ १ व्यापल्लवणकट्वम्लक्षारार्थैः पित्तजा भवेत् । दाहपाकज्वरोष्णार्तिनीलपीतसितार्तवा ॥ यवनशास्त्रानुसारेण स्त्रीरोगाः। रिहमगर्भाऽऽशयस्तस्य हारं सुयुल्हिभाजतः । वारिदस्तवयाविस्वा हेतवः प्रतिबन्धकाः॥१॥ तत्रापि द्विविधः सादे माहीति परिकीर्तितः । तत्र योगं प्रतीकारं तत्र वैद्यः समाचरेत् ॥ २ ॥ गर्भीरहमकोष्ठस्था सौदी संगमवर्तिनी । गिल्हत्सौदत्तैर्देहज हिर्कत् चापि भृशं भवेत् ॥ ३ ॥ सभवैरि बकतूदेर आमदम् हैज एव च । दाहत्मविश्च शैत्यत्वं लिंगनिर्देश इत्यसौ ॥ ४ ॥ यकसत्संभवेमुष्मिन्वरांगे शोषणं रजः । सूक्ष्मं प्रवर्तते शीतं परं सौदाप्रकोपजम् ॥ ५ ॥ रतूवत्प्रभवेत्विस्मन्मैलानेरिहमुद्भवैत् । हेइद्दारहेजनामैर्यगर्भस्थितिविघातका ॥ ६ ॥ कदाचिद्दैवयोगेन सम्भवेद्गर्भलक्षणम् । मासत्रयोत्तरं पातो ऋतूसंगतो ध्रुवम् ॥ ७ ॥ मनीतेनाशयनव विशेषेत्प्येन संयुता । सुरतावसरे तत्र वेदना विन्नकृद्भवेत् ॥ ८ ॥ सम्भोगानन्तरं नारी वेगादुत्तिष्ठते द्रुतम् । रिहम्भुखान् मनीयातो बहिरेवम्भवोत्पुनः ॥ ९ ॥ अकरत् वंध्यत्वमाख्यातं मिथुनः स्याद्विशग्वरैः । परीक्षणीयं सद्गीत्या प्रतिकार्यं यथायथम्॥१०॥ मनो हैज क्षिपदप्सु भिन्नं भिन्नं च संतरेत् । दूषितं तद्विजानीयात् तहन् शीननदोषलम्॥११॥ रिहवदूपममयो दोषः प्रदरारूपां दृढां रुजम् । औषधीकीचवदनी द्विविधात्रिविधातयथम् ॥१२॥ कस्याश्चिदंगनायास्तु प्रसवे संकटं भवेत् । अष्टमान्मासतस्तस्यै क्षीरं पातुं दिशोद्भिषक् ॥ १३ ॥ परिपाकाऽनुरूपं तद्रजसोद्रेककृन्न च । तद्विकृत्यारिहं दर्द भवेदुष्णेन वारिणा ॥ १४ ॥ जरायुसुयुकबंधेन मृतित्र्भ्रूणस्य योदरे । जमीनमैत तत्प्रोक्तं शूल्यं तुल्यं विघातकृत् ॥ १५ ॥ अचलं जडवत्तिष्ठेत्रार्यसाक्षयकारकम् । इर्वाजस्तस्य कर्त्तव्यो वनिताशर्मणे शनैः ॥ १६ ॥ हिमहस्तपदं तस्या शीतबाया भवेद्भृशम् । मन्दाग्निबलहानिश्चानुत्साहः श्वाससंभवः ॥ १७ ॥ व्यथा गर्भाशयस्था तु मैथुनाऽतिशयात्तथा । भवेद्रजोविकाराश्च प्रसूतेः प्रागनन्तरम् ॥ १८ ॥ दुष्टोपारदुखारोस्याऽऽमभ्रूणं पातयत्यधः । समग्रविग्रहा भावमकालेऽपि च कल्पयेत् ॥ १९ ॥ हूतवा सूतममुख्यं इस्तिकांत्रान्तिरेव च । अबलौ द्वौ हृदाऽऽभावो भवेद्गर्भसमाकृतिः ॥२०॥ प्रदरोग्यः समाख्यातोऽसमयेर्वाक्स्रवमासतः । हजजारी शवद्रक्तः पीतवर्णै विमिश्रितम् ॥ २१ ॥ अन्तर्मुखो व्रणो घोरः सतांगिरिहमत्स्र्मतः। कर्ककारः कठोरः स्याच्छोथतः सचिरंतनात् ॥२२॥ अन्येऽप्यत्र विकारस्य तन्केयाखिन्नकोपजत् । तकियत्चापि तबई विधेया विविधाऽगदैः ॥२३॥ इति ( एते श्लोकाः शुद्धा वा अशुद्धा वेति न शक्ता विवेक्तुं वयम् । )
भाषाटीकासमेत । ( ३४३ ) अत्यानन्दा न सन्तोषं ग्राम्यधर्मेण गच्छति । कर्णिन्यां कर्णिकायोनौ श्लेष्मासृग्भ्यां प्रजायते ॥ ८ ॥ मैथुनाचरणात्पूर्वं पुरुषादतिरिच्यते । बहुशश्चातिचरणा तयोर्बीजं न विन्दति ॥ ९ ॥ श्लेष्मला पिच्छिला योनिः कण्डूयुक्ताऽतिशीतला । चतसृष्वपि चाद्यासु श्लेष्मलिङ्गोच्छ्रयो भवेत् ॥ १० ॥ जो योनि अति मैथुनसे भी सन्तोषको प्राप्त न होवे, उसको अत्यानन्दा कहते हैं, जिसमें कफ रुधिर करके कर्णिका ( कमलके भीतर जो होता है ऐसा मांसकन्द ) हो, उसको कर्णिणी कहते हैं, जो योनि थोडे मैथुनसे पहले स्रवे उसको चरणा कहते हैं अर्थात् जबतक पुरुषको सुख नहीं हो उसके पहलेही द्रवीभूत होकर वीर्यका ग्रहण नहीं करे, जो योनि बहुवार मैथुन करनेसे पुरुषके पीछे द्रवे ( छूटे ) उसको अति- चरणा योनि कहते हैं यह कफजनित हैं ॥ स्राव और पातके लक्षण । आचतुर्थात्ततो मासात्प्रस्रवेद्गर्भविद्रवः । ततः स्थिरशरीरः स्यात्पातः पञ्चमषष्ठयोः ॥ ११ ॥ पांच मास पर्यन्त गर्भ पतली अवस्थामें होनेसे जो स्रवे उसे स्राव कहते हैं और चौथे महीनेसे लेकर पांचवें छठे महीनेपर स्राव और शरीर बननेपर निकले उसे पात कहते हैं ॥ गर्भ अकालमें कैसे गिरे ? इस विषयमें निदानपूर्वक दृष्टान्त । गर्भोऽभिघातविषमाशनपीडनाद्यैः पक्वं द्रुमादिव फलं पतति क्षणेन । अभिघात ( चोट ), विषमाशन ( विषमभोजन ), पीडनादिक इन कारणोंसे जैसे पकाहुआ फल वृक्षसे चोट लगनेसे क्षणभरमें गिरजाता है इसी प्रकार गर्भ अभि- घातादि कारणोंसे गिरता है ॥ प्रसूत होते समय मूढगर्भ कैसे होता है ? उसके लक्षण । मूढःकरोति पवनःखलु मूढगर्भं शूलं च योनिजठरादिषु मूत्रसंगम् १२ मूढ ( कुंठितगति ) वायु गर्भको मूढ ( टेढा ) कर दे और योनि तथा पेट इनमें शूल तथा मूत्रोत्संग उत्पन्न करे ( धीरे धीरे पीडासहित मूत निकले ) ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( १४४ ) माधवनिदान ।
( १४४ ) माधवनिदान । मूढगर्भकी आठ प्रकारकी गति । भुग्नोऽनिलेन विगुणेन ततः स गर्भः संख्यामतीत्य बहुधा समुपैति योनिम् । द्वारं निरुध्य शिरसा जठरेण कश्चित्कश्चि- च्छरीरपरिवर्तितकुब्जदेहः ॥ १३ ॥ एकेन कश्चिदपरस्तु भुजद्वयेन तिर्यग्गतो भवति कश्चिदवाङ्मुखोऽन्यः । पार्श्व- प्रवृत्तगतिरेति तथैव कश्चिदित्यष्टधा गतिरियं ह्यपरा चतुर्धा ॥ १४ ॥ संकीलकः प्रतिखुरः परिघोऽथ बीजस्तेषूर्ध्वबाहु- चरणैः शिरसा च योनिम् । सङ्गी च यो भवति कीलकव- त्सकीलो दृश्यैः खुरैः प्रतिखुरः स हि कायसंगी ॥ १५ ॥ गच्छेद्भुजद्वयशिराः स च बीजकाख्यो योनौ स्थितः स परिघः परिघेण तुल्यः ॥ १६ ॥ विगुण वायुसे गर्भ विपरीत ( टेढा ) होकर अनेक प्रकार करके योनिके द्वारमें आकर अडजाय है, उसकी आठ प्रकारकी संज्ञा है, सो इस प्रकार है-१ कोई गर्भ मस्तकसे योनिके द्वारको बन्द कर देय है, २ कोई पेटसे योनिके मार्गको रोक देय, ३ कोई शरीरके विपरीतपनेसे योनिके मार्गको रोक दे, ४ कोई एक हाथसे योनिके मार्गको रोक दे, ५ कोई मूढगर्भ दोनों हाथोंको बाहर निकालकर योनिके द्वारको रोक दे, ६ कोई गर्भ तिरछा होकर योनिके मार्ग रोक दे, ७ कोई गर्भ मन्था- नाडीके मुडनेसे नीचेको मुख होय, वह योनिके द्वारको रोक दे, ८ उसी प्रकार कोई पार्श्वभंग ( पसवाडेका भंग ) होनेसे योनिके द्वारको रोक दे, इस प्रकार मूढगर्भके आठ प्रकारकी गति है। दूसरी चार प्रकारकी गति और होती है, उसको कहते हैं-१ संकील, २ प्रतिखुर, ३ परिघ, ४ बीज, इनमें जो गर्भ हाथ पैर ऊपरको कर मस्तकसे योनिको कीलके समान रोक दे उसको संकीलक कहते हैं, जिस गर्भके हाथ पैर खुरके सदृश बाहर निकल आवें और शरीर योनिके भीतर अटका रहे उसको प्रतिखुर कहते हैं, जो गर्भ दोनों हाथ और मस्तक आगे करके अटक जाय उसको बीजक कहते हैं और परिघ ( आगड ) के समान योनिमें गर्भ अटक जाय उसको परिघ कहते हैं॥ असाध्य मूढगर्भ और गर्भिणीके लक्षण । अपविद्धशिरा या तु शीतांगी निरपत्रपा । नीलोद्धतशिरा हन्ति सा गर्भं स च तां तथा ॥ १७ ॥
भाषाटीकासमेत । ( ३४५ ) जिस गर्भिणीका मस्तक नीचेको हो जाय, देह शीतल होय तथा लज्जा जाती रहे और जिसकी कोखमें हरी नीली शिरा (नस) उठ खडी होयँ तो वह गर्भिणी उस गर्भको और गर्भ उस गर्भिणीको अन्योन्य नाश करते हैं ॥ मृतकगर्भके लक्षण । गर्भास्पन्दनमाधीनां प्रणाशः श्यावपाण्डुता । भवेदुच्छ्वासपूतित्वं शूनतांतर्मृते शिशौ ॥ १८ ॥ गर्भ हले चले नहीं, प्रसव वेदना (पीडा) बन्द होजाय, देह हरी नीली होय और जिसकी श्वासमें दुर्गंध आवे और पेटके भीतर सूजन होय अर्थात् पेटमें आंतोंके फूलनेसे पेट सूज जाय ये गर्भमें बालक मरजाय उसके लक्षण हैं ॥ गर्भमरण हेतु । मानसागन्तुभिर्मातुरुपतापैः प्रपीडितः । गर्भो व्यापद्यते कुक्षौ व्याधिभिश्च प्रपीडितः ॥ १९ ॥ माताके मानसिक तथा आगन्तुक दुःखसे अथवा रोगोंसे गर्भको पीडा हो वह बालक गर्भाशयमें मरजाय ॥ गर्भिणीके दूसरे असाध्य लक्षण । योनिसंवररणं संगः कुक्षौ मक्कल्लमेव च । हन्युः स्त्रियं गूढगर्भो यथोक्ताश्चाप्युपद्रवाः ॥ २० ॥ वायुके योगसे योनिका संकोच, गर्भका अटकना और मक्कल्लशूल (वातरक्तकी पीडा) तथा आक्षेपक, खांसी, श्वासादिक उपद्रव होनेसे वह गर्भिणी बचे नहीं अथवा योनिसंवररणनाम रोग ग्रन्थान्तरोंमें लिखा है सो होय ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां योनिव्यापत्तिनिदानं समाप्तम् ॥ १ वातलान्यन्नपानानि ग्राम्यधर्मं प्रजागरम् । अत्यर्थं सेवमानायां गर्भिण्यां योनिमार्गजः ॥ मातरिश्वा प्रकुपितो योनिद्वारस्य संवृतिम् । कुरुते रुद्धमार्गत्वात्पुनरंतर्गतोऽनिलः॥ निरुणद्ध्या- शयद्वारं पीडयन् गर्भसंस्थितम् । निरुद्धवदनोच्छ्वासो गर्भश्चाशु विपद्यते ॥ विपन्नशूनसर्वाङ्गः सर्वाण्यवयवानि च । उच्छ्वासविरुद्धहृदयां नाशयत्याशु गर्भिणीम् ॥ योनिसंवररणं नाम व्याधि- मेनं प्रचक्षते । अन्तकप्रतिमं घोरं नारभेत चिकित्सितम् ॥ इति ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( १४६ ) माधवनिदान ।
( १४६ ) माधवनिदान । अथ सूतिकारोगनिदानम् । अंगमर्दो ज्वरः कंपः पिपासा गुरुगात्रता । शोथः शूलातिसारौ च सूतिकारोगलक्षणम् ॥ १ ॥ अंगोंका टूटना, ज्वर हो, कंप, प्यास, अंगोंका भारी होना, सूजन तथा शूल और अतिसार ये सूतिकारोगके लक्षण होते हैं ॥ प्रसूतिरोगकी उत्पत्ति । मिथ्योपचारात्संक्लेशाद्विषमाजीर्णभोजनात् । सूतिकायाश्च ये रोगा जायन्ते दारुणास्तु ते ॥ २ ॥ जिस स्त्रीके बालक प्रगट हो चुका हो ऐसी स्त्रीके मिथ्या उपचार करनेसे अथवा संक्लेश (दोषजनक अन्नपानका सेवन अथवा अत्यन्त कोप) अथवा विषमाशन अजीर्ण भोजनादिक करनेसे प्रसूतिरोग होता है वह घोर दुःखदायक है ॥ असाध्य लक्षण । ज्वरातिसारशोथाश्च शूलानाहबलक्षयाः । तन्द्रारुचिप्रसेकाद्याः कफवातामयोद्भवाः ॥ ३ ॥ कृच्छ्रसाध्या हि ते रोगाः क्षीणमांसबलाग्नितः । ते सर्वे सूतिकानाम्ना रोगास्ते चाप्युपद्रवाः ॥ ४ ॥ ज्वर, अतिसार, सूजन, शूल, अफरा और बलक्षय तथा कफ, वातजन्य रोगसे उत्पन्न होनेवाले तन्द्रा, अन्नद्वेष और मुखसे पानीका गिरना इत्यादि विकार, अश- क्तता, अग्नि मंद होनेसे कृच्छ्रसाध्य होता है, इन सब ज्वरादिकोंको प्रसूतिरोग कहते हैं। इन सबमें एक रोग प्रधान होता है बाकीके उपद्रवरूप कहलाते हैं ॥ इति श्रीपंडित दत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीमाथुरीभाषाटीकायां सूतिकारोगनिदानं समाप्तम् ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ स्तनरोगनिदानम् ।
भाषाटीकासमेत। (३४७) अथ स्तनरोगनिदानम् । ───◇❁◇─── सक्षीरौ वाप्यदुग्धौ वा दोषः प्राप्य स्तनौ स्त्रियाः । प्रद्रूष्य मांसरुधिरे स्तनरोगाय कल्पते ॥ १ ॥ पञ्चानामपि तेषां हि रक्तजं विद्रधिं विना । लक्षणानि समानानि बाह्यविद्रधिलक्षणैः ॥ २ ॥ वातादि दोष गर्भिणी अथवा प्रसूता स्त्रीके सदुग्ध अथवा अदुग्ध स्तनोंमें प्राप्त हो मांस रक्तको दुष्ट करके स्तनरोग उत्पन्न करे। स्तनरोग वात, पित्त, कफ, सन्निपात, आगंतुजके भेदसे पांच प्रकारके हैं। इन पांचोंके लक्षण रक्तविद्रधिको त्याग कर बाह्यविद्रधिके समान होते हैं, सो विद्रधिनिदान जो पीछे कह आये हैं उससे जानलेना चाहिये ॥ स्तन्य (दूध) के रोग । गुरुभिर्विविधैरन्नैर्दुष्टैर्दोषैः प्रद्रूषितम् । क्षीरं धात्र्याः कुमारस्य नानारोगाय कल्पते ॥ ३ ॥ गुर्वाधिक अनेक प्रकारके अन्नसे दोष (वात पित्त कफ) दुष्ट होकर माताके दूधका नाश करे, उस दुष्टदूधसे बालकके नाना प्रकारके रोग होते हैं ॥ वातादिकसे दूषित दूधके लक्षण । कषायं सलिलप्लावि स्तन्यं मारुतदूषितम् । कट्वम्ललवणं पीतराजिमत्पित्तसंज्ञितम् ॥ ४ ॥ कफदुष्टं घनं तोये निमज्जति सुपिच्छिलम् । द्विलिङ्गं द्वंद्वजं विद्यात्सर्वलिङ्गं त्रिदोषजम् ॥ ५ ॥ जो दुग्ध कसैला अथवा पानीके ऊपर तैरनेवाला होय, उसको वातदूषित जानना तथा जो कडुआ, खट्टा और खारी होकर जिसमें पीली रेखासी प्रतीत होवे उसको पित्तदूषित जानना और जो दूध सघन, चिकनासा होवे और पानीमें डालनेसे नीचेको बैठ जाय, उसको कफसे दुष्ट जानना चाहिये । दो दोषोंकें लक्षण जिसमें मिले उसे द्वंद्वज जाने और जिसमें तीनों दोषोंके लक्षण मिलें उसे त्रिदोषदूषित जाने ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ३४८ ) माधवनिदान ।
( ३४८ ) माधवनिदान । शुद्धदूधके लक्षण । अदुष्टं चाम्बुनि क्षिप्तमेकीभवति पाण्डुरम् । मधुरं चाविवर्णं च तत्प्रसन्नं विनिर्दिशेत् ॥ ६ ॥ जो दूध पानीमें डालनेसे मिलजाय तथा जो दूध कुछ पीला हो और मीठा होकर बेरंगका न हो उसको शुद्ध जानना ॥ अब कहते हैं कि, स्त्रियोंके दूध दीखे नहीं परंतु होता है, क्योंकि बालक पिया करते हैं, इस बातको शुक्र (वीर्य) का दृष्टान्त देकर कहते हैं- विशस्तेष्वपि गात्रेषु यथा शुक्लं न दृश्यते । सर्वदेहाश्रितत्वाच्च शुक्रलक्षणमुच्यते ॥ ७॥ जैसे सर्व पुरुषोंके देहमें व्याप्त भी है परन्तु देहके काटनेसे भी शुक्र दीखता नहीं है, उसी प्रकार सब स्त्रियोंके देहाश्रित जो दुग्ध है सो भी नहीं दीखता है परन्तु निःसन्देह है सही ॥ “ तदेव चेष्टयुवतेर्दर्शनात्स्मरणादपि । शब्दसंश्रवणात्स्पर्शात्सं हर्षाच्च प्रवर्त्तते ॥ ८ ॥ सुप्रसन्नं मनस्त्वेवं हर्षणे हेतुरुच्यते । आहाररसयोनित्वादेवं स्तन्यमपि स्त्रियाः ॥ ९ ॥ तदेवाऽपत्यसंस्पर्शाद्दर्शनात्स्मरणादपि । ग्रहणाच्च शरीरस्य शुक्रवत्सं प्रवर्त्तते ॥ स्नेहो निरन्तरस्तत्र प्रसवे हेतुरुच्यते ॥ १० ॥ वही शुक्र इष्ट (प्रिय) स्त्रीके देखनेसे, उसका स्मरण (याद) करनेसे उसकी वाणी सुननेसे, स्पर्श (आलिंगन) से भया जो आनन्द उस आनन्दसे प्राप्त होय है, इस जगह मनका प्रसन्न होना यही आनन्दका कारण है । शुक्रकी उत्पत्ति आहा- रसे होती है, सो हेतु स्तन्य (दूध) का जानना, अर्थात् दूध भी जब स्त्री अपने बालकका स्पर्श करे, देखे, उसका स्मरण करे तथा बालकको गोदमें लेनेसे दूध शुक्रके सदृश बढता है, इस जगहभी दूधके उतरनेमें स्नेह (प्यार) ही कारण है'’ यह श्लोक संगृहीत है ॥ इति श्रीपण्डितदत्तराममाथुरनिर्मितमाधवार्थबोधिनीभाषाटीकायां स्तनरोगनिदानं समाप्तम् ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
अथ बालरोगनिदानम् ।
भाषाटीकासमेत । ( ३४९ ) अथ बालरोगनिदानम् । ━०००१५००━ त्रिविधः कथितो बालः क्षीरान्नोभयवर्तनः । स्वास्थ्यं ताभ्यामदुष्टाभ्यां दुष्टाभ्यां रोगसंभवः ॥ १ ॥ दूध पीनेवाला और अन्न खानेवाला और दूध अन्न दोनों खानेवाला ऐसे तीन प्रकारके बालक होते हैं, यदि वह अन्न और दूध दुष्ट न होयँ तो बालक निरोग रहे और ये दोनों दुष्ट होयँ तो अनेक रोग होते हैं । वातदूषित दूधके रोग । वातदुष्टं शिशुः स्तन्यं पिबन् वातगदातुरः । क्षामस्वरः कृशांगः स्याद्रुद्धविण्मूत्रमारुतः ॥ २ ॥ जो बालक वातदूषित दूधको पीता है उसके वातके रोग होते हैं, उसका शब्द क्षीण होजाय, शरीर कृश होय और मलमूत्र तथा अधोवायु नहीं उतरे ॥ पित्तदूषित दूधके रोग । स्विन्नो भिन्नमलो बालः कामलापित्तरोगवान् । तृष्णालुरुष्णसर्वांगः पित्तदुष्टं पयः पिबन् ॥ ३ ॥ जो बालक पित्तदूषित दूधको पीवे उसके पसीना आवे, मल पतला हो जाय, कामलारोग होय तथा पित्तके और भी रोग होयँ, प्यासका लगना, सर्वांगमें दाह आदि अनेक रोग होयँ ॥ कफदूषितदूधके रोग । कफदुष्टं पिबन् क्षीरं लालालुः श्लेष्मरोगवान् । निद्रार्दितो जडः शूनः शुक्लाक्षश्छर्दनः शिशुः ॥ ४ ॥ जो बालक कफदूषित दूधको पीवे उसके मुखसे लार बहुत गिरे तथा कफके रोग होयँ, निद्रा आवे, अंग भारी होय, सूजन होय, वमन होय, खुजली चले ॥ बालकोंकी अन्तर्गत पीडा जाननेका उपाय । शिशोस्तीव्रामतीव्रां च रोदनाल्लक्षयेद्रुजम् । स यं स्पृशेद्भृशं देशं यत्र च स्पर्शनाक्षमः ॥ ५ ॥ तत्र विद्याद्रुजं मूर्ध्नि रुजं चाक्षिनिमीलनात् । कोष्ठे विबंधवमथुस्तनदंशांत्रकूजनैः ॥ ६ ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA
( ३५० ) माधवनिदान ।
( ३५० ) माधवनिदान । आध्मानपृष्ठनमनजठरोन्नमनैरपि । बस्तौ गुह्ये च विण्मूत्रसङ्गत्रासदिगीक्षणैः ॥ स्रोतांस्यंगानि संधींश्च पश्येद्यत्नान्मुहुर्मुहुः ॥ ७ ॥ बालकोंके रुदन (रोने) से उसके थोडी वा बहुत पीडा जाननी। यह बालक जिस ठिकाने वारंवार हाथ लगावे उस ठिकाने और जिस जगह औरके हाथको न लगाने दे उस ठिकाने उसके पीडा जाननी चाहिये । नेत्रोंके मूँदनेसे मस्तक पीडा जाने, मलावरोध, वमन, स्तन, (छातीको) चबाना तथा पेटका गूंजना, पेटका फूलना तथा पेटका उछलना इन लक्षणोंसे बालकके पेटमें पीडा जाननी । मलमूत्रके रुकने तथा डरनेसे और सर्वत्र देखनेसे इन लक्षणोंसे उसकी बस्ति (मूत्र- स्थान) और गुदामें पीडा जाननी, वैद्य बालकके स्रोत (नाक मुख कान आदि छिद्रों) को, हाथ पैरसे आदिले अवयवों और सन्धियोंको बारम्बार देखे तो रोगका यथार्थ ज्ञान होय ॥ "द्वन्द्वज और सन्निपातज दूषित दुग्धके रोग । द्विलिङ्गं द्वन्द्वजं विद्यात्सर्वलिङ्गं त्रिदोषजे । पूर्वोक्त जो वातादिदूषित दुग्धके लक्षण कहे हैं उनमें दोषके लक्षण मिलनेसे द्वेद्वज रोग जानना और त्रिदोषके लक्षण मिलनेसे सन्निपातका रोग जानना, यह श्लोक प्रक्षिप्त है माधवाचार्यका नहीं है ॥” कुकूणकके लक्षण । कुकूणकः क्षीरदोषाच्छूनामक्षिवर्त्मनि । जायते तेन नेत्रं च कण्डूरं च स्रवेन्मुहुः ॥ ८ ॥ शिशुः कुर्याल्ललाटाक्षिकूटनासाविघर्षणम् । शक्तो नार्कप्रभां द्रष्टुं न वर्त्मोन्मीलनक्षमः ॥ ९॥ कुकूणक यह रोग बालकोंके दूधके दोषसे होता है, इस रोगके होनेसे बाल- कके नेत्रके कोएमें सूजन, नेत्र खुजावे और पानी बहे, नेत्रोंमें कीचड आनेसे वह ललाट, नेत्र और नाकको रगडे, धूपके सामने देखा न जाय, उसके नेत्र खुले नहीं, इसको लौकिकमें कोयस्राव कहते हैं, यह रोग बालकोंके ही होता हैं सो वाग्भटमें लिखा है ॥ १ कुकूणकः शिशोरेव दंतोत्पत्तिनिमित्तजः ।
भाषाटीकासमेत । ( ३५१ ) पारिगर्भिकके लक्षण । मातुः कुमारो गर्भिण्याः स्तनं प्रायः पिबन्नपि । कासाग्निसादवमथुतंद्राकार्श्यारुचिभ्रमैः ॥ १० ॥ युज्यते कोष्ठवृद्धया च तमाहुः पारिगर्भिकम् । रोगं परिभवाख्यं च दद्यात्तत्राग्निदीपनम् ॥ ११ ॥ बालकके गर्भिणी माताका दूध पीनेसे खांसी, मंदाग्नि, वमन, तन्द्रा, अरुचि, कृशता और भ्रम ये होवें और उसके पेटकी वृद्धि होय, इस रोगको वैद्यगण पारिगर्भिक अथवा परिभव कहते हैं । इस रोगमें अग्निदीपनकर्त्ता औषधि बाल- कको देनी चाहिये ॥ तालुकंटकके लक्षण । तालुमांसे कफः क्रुद्धः कुरुते तालुकंटकम् ॥ १२ ॥ तेन तालुप्रदेशस्य निम्नता मूर्ध्नि जायते । तालुपातः स्तनद्वेषः कृच्छ्रात्पानं शकृद् द्रवम् । तृडक्षिकंठास्यरुजा ग्रीवाधुर्धरता वमिः ॥ १३ ॥ तालुके मांसमें कफ कुपित होकर तालुकंटक रोगको करे, उसके होनेसे तालुके ऊपरका भाग नीचा हो जाय, तथा भीतरसे बालकका तालुआ बिंधजाय, इसीसे बालक स्तन (छाती) को नहीं दावे और पीवेभी तो बडे कष्टसे पीवे, पतला मल होजाय, प्यास लगे, नेत्र कंठ मुख इनमें पीडा होय, लार गिर पडे और जो दूध पीवे उसे डाल दे ॥ महापद्मविसर्पके लक्षण । विसर्पस्तु शिशोः प्राणनाशनो बस्तिशीर्षजः ॥ १४ ॥ पद्मवर्णो महापद्मो रोगो दोषत्रयोद्भवः । शंखाभ्यां हृदयं याति हृदयाद्वा गुदं व्रजेत् ॥ १५ ॥ बालकोंके जो मस्तक और वस्ती (मूत्रस्थान) में विसर्प होय है वह बालकका प्राणनाशक जानना, जो विसर्प कमलके पत्रके समान लाल होय है वह महापद्म रोग त्रिदोषज है, यह कनपटीमें उत्पन्न होकर हृदय पर्यन्त जाता है अथवा हृदयमें होकर गुदापर्यन्त जाता है ॥ और विकार जो बालकोंके होते हैं उनको कहते हैं- क्षुद्ररोगे च कथिते अजगल्ल्यहिपूतने ।
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( ३६२ ) माधवनिदान ।
( ३६२ ) माधवनिदान । ज्वराद्या व्याधयः सर्वे महतां ये पुरेरिताः ॥ बालदेहेऽपि ते तद्वज्ज्ञेयाः कुशलैः सदा ॥ १६ ॥ क्षुद्ररोगनिदानमें जो अजगल्ली और अहिपूतना कही हैं सो और ज्वरादिक सर्व रोग जो बडे मनुष्योंके होते हैं अर्थात् जिन रोगोंको पूर्व कहि आये हैं वे सब रोग बालकोंके देहमें भी होते हैं, ऐसे कुशल वैद्योंको जानना चाहिये ॥ सामान्य ग्रहजुष्टके लक्षण । क्षणादुद्विजते बालः क्षणात्त्रस्यति रोदिति ॥ १७ ॥ नखैर्दन्तैर्दारयति धात्रीमात्मानमेव च । ऊर्ध्वं निरीक्षते दन्तान् खादेत्कूजति जृम्भते ॥ १८ ॥ भ्रुवौ क्षिपति दंतोष्ठं फेनं वमति चासकृत् । क्षामोऽतिनिशि जागर्ति शूनांगो भिन्नविट्स्वरः ॥ १९ ॥ मांसशोणितगन्धिश्च न चाश्नाति यथा पुरा । सामान्यग्रहजुष्टानां लक्षणं समुदाहृतम् ॥ २० ॥ कभी क्षणभरमें बालक विह्वल हो जाय कभी क्षणभरमें डरे, रोवे, नख और दांतोंसे अपने शरीर और माताको खसीटे, ऊपरको देखे, दांतोंको चबावे, किल- कारी मारे, जंभाई लेय, भ्रुव ( भौंह ) को तिरछी करे, दांतोंसे होठोंको खाय, बारंबार मुखसे झाग डाले, वह अत्यन्त क्षीण होय, रात्रिमें सोवे नहीं, सूजन होय, मल पतला होय, स्वर बैठ जाय, उसके देहमें रुधिर मांसकीसी बास आवें जितना पहिले खाता होय उतना नहीं खाय, ये सामान्य ग्रहव्याप्त बालकके लक्षण हैं। अब कहते हैं कि, स्कन्दादिक ग्रह पूजाके अर्थ बालकोंको मारे हैं सो चरकमें लिखा है ॥ स्कन्दग्रहगृहीतबालकके लक्षण । एकनेत्रस्य गात्रस्य स्रावः स्पन्दनकंपनम् । अर्द्धदृष्ट्या निरीक्षेत वक्रास्यो रक्तगंधिकः ॥ २१ ॥ दंतान् खादति वित्रस्तः स्तन्यं नैवाभिनंदति । स्कंदग्रहगृहीतानां रोदनं चालपमेव च ॥ २२ ॥ १ धात्रीमात्रोः प्राक्प्रदिष्टोपचाराच्छौचभ्रंशान्मंगलाचारहीनान् । क्लिष्टांस्वांस्तांस्तर्जितांस्ताडितांश्च पूजाहेतोर्हिंस्युरेते कुमारान् ॥ CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammmu. Digitized by S3 Foundation USA