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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished3,237 pages
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आदत्तासूञ्शरैः कर्णः पतङ्गानामिवानलः ॥ ११२ ॥
‘जैसे आग अपने पास आये हुए पतंगोंके प्राण ले लेती है, उसी प्रकार शूरवीर कर्ण बाणोंद्वारा अपने ऊपर आक्रमण करनेवाले वेगशाली पांचालोंके प्राण ले रहा है ॥
एते द्रवन्ति पञ्चाला द्राव्यन्ते योधिभिर्ध्रुवम् ।
कर्णेन भरतश्रेष्ठ पश्य पश्य तथाकृतान् ॥ ११३ ॥
‘भरतश्रेष्ठ! देखो, ये पांचालयोद्धा दौड़ रहे हैं। निश्चय ही कर्ण और दूसरे-दूसरे योद्धा उन्हें दौड़ा रहे हैं। देखो, वे कैसी बुरी अवस्थामें पड़ गये हैं? ॥ ११३ ॥
तांस्तथाभिमुखान् वीरान् मित्रार्थे त्यक्तजीवितान् ।
क्षयं नयति राधेयः पञ्चालाञ्छतशो रणे ॥ ११४ ॥
‘जो अपने मित्रके लिये प्राणोंका मोह छोड़कर शत्रुके सामने खड़े होकर जूझ रहे हैं, उन सैकड़ों पांचालवीरोंको कर्ण रणभूमिमें नष्ट कर रहा है ॥ ११४ ॥
तद् भारत महेष्वासानगाधे मज्जतोऽप्लवे ।
कर्णार्णवे प्लवो भूत्वा पञ्चालांस्त्रातुमर्हसि ॥ ११५ ॥
‘भारत! कर्णरूपी अगाध महासागरमें महाधनुर्धर पांचाल बिना नावके डूब रहे हैं। तुम नौका बनकर उनका उद्धार करो ॥ ११५ ॥
अस्त्रं हि रामात् कर्णेन भार्गवादृषिसत्तमात् ।
यदुपात्तं महाघोरं तस्य रूपमुदीर्यते ॥ ११६ ॥
‘कर्णने मुनिश्रेष्ठ भृगुनन्दन परशुरामजीसे जो महाघोर अस्त्र प्राप्त किया है, उसीका रूप इस समय प्रकट हो रहा है ॥ ११६ ॥
तापनं सर्वसैन्यानां घोररूपं सुदारुणम् ।
समावृत्य महासेनां ज्वलन्तं स्वेन तेजसा ॥ ११७ ॥
‘यह अत्यन्त भयंकर एवं घोर भार्गवास्त्र पाण्डवोंकी विशाल सेनाको आच्छादित करके अपने तेजसे प्रज्वलित हो सम्पूर्ण सैनिकोंको संतप्त कर रहा है ॥ ११७ ॥
एते चरन्ति संग्रामे कर्णचापच्युताः शराः ।
भ्रमराणामिव वातास्तापयन्ति स्म तावकान् ॥ ११८ ॥
‘ये संग्राममें कर्णके धनुषसे छूटे हुए बाण भ्रमरोंके समूहोंकी भाँति चलते और तुम्हारे योद्धाओंको संतप्त करते हैं ॥ ११८ ॥
एते द्रवन्ति पञ्चाला दिक्षु सर्वासु भारत ।
कर्णास्त्रं समरे प्राप्य दुर्निवार्यमनात्मभिः ॥ ११९ ॥
‘भरतनन्दन! जिन्होंने अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें नहीं कर रखा है, उनके लिये कर्णके अस्त्रको रोकना अत्यन्त कठिन है। समरांगणमें इसकी चोट खाकर ये पांचाल-सैनिक सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग रहे हैं ॥
एष भीमो दृढक्रोधो वृतः पार्थ समन्ततः ।

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सृञ्जयैर्योधयन् कर्णं पीड्यते निशितैः शरैः ॥ १२० ॥ ‘पार्थ! दृढ़तापूर्वक क्रोधको धारण करनेवाले ये भीमसेन सब ओरसे सृंजयोंद्वारा घिरकर कर्णके साथ युद्ध करते हुए उसके पैने बाणोंसे पीड़ित हो रहे हैं ॥ १२० ॥

पाण्डवान् सृञ्जयांश्चैव पञ्चालांश्चैव भारत । हन्यादुपेक्षितः कर्णो रोगो देहमिवागतः ॥ १२१ ॥ ‘भारत! जैसे प्राप्त हुए रोगकी चिकित्सा न की गयी तो वह शरीरको नष्ट कर देता है, उसी प्रकार यदि कर्णकी उपेक्षा की गयी तो वह पाण्डवों, सृंजयों और पांचालोंका भी नाश कर सकता है ॥ १२१ ॥

नान्यं त्वत्तो हि पश्यामि योधं यौधिष्ठिरे बले । यः समासाद्य राधेयं स्वस्तिमानाब्रजेद् गृहम् ॥ १२२ ॥ ‘युधिष्ठिरकी सेनामें मैं तुम्हारे सिवा दूसरे किसी योद्धाको ऐसा नहीं देखता, जो राधापुत्र कर्णका सामना करके कुशलपूर्वक घर लौट सके ॥ १२२ ॥

तमद्य निशितैर्बाणैर्विनिहत्य नरर्षभ । यथाप्रतिज्ञं पार्थ त्वं कृत्वा कीर्तिमवाप्नुहि ॥ १२३ ॥ ‘नरश्रेष्ठ! पार्थ! आज तुम अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार तीखे बाणोंसे कर्णका वध करके उज्ज्वल कीर्ति प्राप्त करो ॥

त्वं हि शक्तो रणे जेतुं सकर्णानपि कौरवान् । नान्यो युधि युधां श्रेष्ठ सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ १२४ ॥ ‘योद्धाओंमें श्रेष्ठ! केवल तुम्हीं संग्राममें कर्णसहित सम्पूर्ण कौरवोंको जीत सकते हो, दूसरा कोई नहीं। यह मैं तुमसे सत्य कहता हूँ ॥ १२४ ॥

एतत् कृत्वा महत् कर्म हत्वा कर्णं महारथम् । कृतार्थः सफलः पार्थ सुखी भव नरोत्तम ॥ १२५ ॥ ‘पुरुषोत्तम पार्थ! अतः महारथी कर्णको मारकर यह महान् कार्य सम्पन्न करनेके पश्चात् तुम कृतकृत्य, सफल-मनोरथ एवं सुखी हो जाओ’ ॥ १२५ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि श्रीकृष्णवाक्ये त्रिसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७३ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें श्रीकृष्णवाक्यविषयक तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७३ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2186)

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⬅ विषय-सूची (TOC)

चतुःसप्ततितमोऽध्यायः

अर्जुनके वीरोचित उद्गार

संजय उवाच

स केशवस्य बीभत्सुः श्रुत्वा भारत भाषितम् ।
विशोकः सम्प्रहृष्टश्च क्षणेन समपद्यत ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—भरतनन्दन! भगवान् श्रीकृष्णका यह भाषण सुनकर अर्जुन एक ही क्षणमें शोकरहित एवं हर्ष और उत्साहसे सम्पन्न हो गये ॥ १ ॥

ततो ज्यामभिमृज्याशु व्याक्षिपद् गाण्डिवं धनुः ।
दध्रे कर्णविनाशाय केशवं चाभ्यभाषत ॥ २ ॥
तत्पश्चात् धनुषकी प्रत्यंचाको साफ करके उन्होंने शीघ्र ही गाण्डीवधनुषकी टंकार की और कर्णके विनाशका दृढ़ निश्चय कर लिया। फिर वे भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार बोले— ॥ २ ॥

त्वया नाथेन गोविन्द ध्रुव एव जयो मम ।
प्रसन्नो यस्य मेऽद्य त्वं लोके भूतभविष्यकृत् ॥ ३ ॥
‘गोविन्द! जब आप मेरे स्वामी और संरक्षक हैं, तब युद्धमें मेरी विजय निश्चित ही है। संसारके भूत और भविष्यका निर्माण करनेवाले आप ही हैं। जिसके ऊपर आप प्रसन्न हैं, उसकी (अर्थात् मेरी) विजयमें आज क्या संदेह है ॥ ३ ॥

त्वत्सहायो ह्यहं कृष्ण त्रीँल्लोकान् वै समागतान् ।
प्रापयेयं परं लोकं किमु कर्णं महाहवे ॥ ४ ॥
‘श्रीकृष्ण! आपकी सहायता मिलनेपर तो मैं युद्धके लिये सामने आये हुए तीनों लोकोंको भी परलोकका पथिक बना सकता हूँ, फिर इस महासमरमें कर्णको जीतना कौन बड़ी बात है? ॥ ४ ॥

पश्यामि द्रवतीं सेनां पञ्चालानां जनार्दन ।
पश्यामि कर्णं समरे विचरन्तमभीतवत् ॥ ५ ॥
‘जनार्दन! मैं समरभूमिमें निर्भय-से विचरते हुए कर्णको और भागती हुई पांचालोंकी सेनाको भी देख रहा हूँ ॥ ५ ॥

भार्गवास्त्रं च पश्यामि ज्वलन्तं कृष्ण सर्वशः ।
सृष्टं कर्णेन वार्ष्णेय शक्रेणेव यथाशनिम् ॥ ६ ॥
‘श्रीकृष्ण! वार्ष्णेय! सब ओरसे प्रज्वलित होनेवाले भार्गवास्त्रपर भी मेरी दृष्टि है, जिसे कर्णने उसी तरह प्रकट किया है, जैसे इन्द्र वज्रका प्रयोग करते हैं ॥ ६ ॥

अयं खलु स संग्रामो यत्र कर्णं मया हतम् ।

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कथयिष्यन्ति भूतानि यावद् भूमिर्धरिष्यति ॥ ७ ॥
‘निश्चय ही यह वह संग्राम है, जहाँ कर्ण मेरे हाथसे मारा जायगा और जबतक यह पृथ्वी विद्यमान रहेगी, तबतक समस्त प्राणी इसकी चर्चा करेंगे ॥ ७ ॥

अद्य कृष्ण विकर्णा मे कर्णं नेष्यन्ति मृत्यवे ।
गाण्डीवमुक्ताः क्षिण्वन्तो मम हस्तप्रचोदिताः ॥ ८ ॥
‘श्रीकृष्ण! आज मेरे हाथसे प्रेरित और गाण्डीव-धनुषसे मुक्त हुए विकर्ण नामक बाण कर्णको क्षत-विक्षत करते हुए उसे यमलोक पहुँचा देंगे ॥ ८ ॥

अद्य राजा धृतराष्ट्रः स्वां बुद्धिमवमंस्यते ।
दुर्योधनमराज्यार्हं यया राज्येऽभ्यषेचयत् ॥ ९ ॥
‘आज राजा धृतराष्ट्र अपनी उस बुद्धिका अनादर करेंगे, जिसके द्वारा उन्होंने राज्यके अनधिकारी दुर्योधनको राजाके पदपर अभिषिक्त कर दिया था ॥ ९ ॥

अद्य राज्यात् सुखाच्चैव श्रियो राष्ट्रात् तथा पुरात् ।
पुत्रेभ्यश्च महाबाहो धृतराष्ट्रो विमोक्ष्यति ॥ १० ॥
‘महाबाहो! आज धृतराष्ट्र अपने राज्यसे, सुखसे, लक्ष्मीसे, राष्ट्रसे, नगरसे और अपने पुत्रोंसे भी बिछुड़ जायँगे ॥

गुणवन्तं हि यो द्वेष्टि निर्गुणं कुरुते प्रभुम् ।
स शोचति नृपः कृष्ण क्षिप्रमेवागते क्षये ॥ ११ ॥
‘श्रीकृष्ण! जो गुणवान्‌से द्वेष करता और गुणहीनको राजा बनाता है, वह नरेश विनाशकाल उपस्थित होनेपर शोकमग्न हो पश्चात्ताप करता है ॥ ११ ॥

यथा च पुरुषः कश्चिच्छित्त्वा चाम्रवणं महत् ।
फलं दृष्ट्वा भृशं दुःखी भविष्यति जनार्दन ।
सूतपुत्रे हते त्वद्य निराशो भविता प्रभुः ॥ १२ ॥
‘जनार्दन! जैसे कोई पुरुष आमके विशाल वनको काटकर उसके दुष्परिणामको उपस्थित देख अत्यन्त दुःखी हो जाता है, उसी प्रकार आज सूतपुत्रके मारे जानेपर राजा दुर्योधन निराश हो जायगा ॥ १२ ॥

अद्य दुर्योधनो राज्याज्जीविताच्च निराशकः ।
भविष्यति हते कर्णे कृष्ण सत्यं ब्रवीमि ते ॥ १३ ॥
‘श्रीकृष्ण! मैं आपसे सच्ची बात कहता हूँ। आज कर्णका वध हो जानेपर दुर्योधन अपने राज्य और जीवन दोनोंसे निराश हो जायगा ॥ १३ ॥

अद्य दृष्ट्वा मया कर्णं शरैर्विशकलीकृतम् ।
स्मरतां तव वाक्यानि शमं प्रति जनेश्वरः ॥ १४ ॥
‘आज मेरे बाणोंसे कर्णके शरीरको टूक-टूक हुआ देखकर राजा दुर्योधन सन्धिके लिये कहे हुए आपके वचनोंका स्मरण करे ॥ १४ ॥

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अद्यासौ सौबलः कृष्ण ग्लहाञ्जानातु वै शरान् । दुरोदरं च गाण्डीवं मण्डलं च रथं प्रति ॥ १५ ॥ ‘श्रीकृष्ण! आज सुबलपुत्र जुआरी शकुनिको यह मालूम हो जाय कि मेरे बाण ही दाँव हैं, गाण्डीवधनुष ही पासा है और मेरा रथ ही मण्डल (चौपड़के खाने) है ॥ १५ ॥ अद्य कुन्तीसुतस्याहं दृढं राज्ञः प्रजागरम् । व्यपनेष्यामि गोविन्द हत्वा कर्णं शितैः शरैः ॥ १६ ॥ ‘गोविन्द! आज मैं अपने पैने बाणोंसे कर्णको मारकर कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिरके चिन्ताजनित जागरणके स्थायी रोगको दूर कर दूँगा ॥ १६ ॥ अद्य कुन्तीसुतो राजा हते सूतसुते मया । सुप्रहृष्टमनाः प्रीतश्चिरं सुखमवाप्स्यति ॥ १७ ॥ ‘आज कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर मेरे द्वारा सूतपुत्र कर्णके मारे जानेपर प्रसन्नचित्त हो दीर्घकालके लिये संतुष्ट एवं सुखी हो जायँगे ॥ १७ ॥ अद्य चाहमनाधृष्यं केशवाप्रतिमं शरम् । उत्स्रक्ष्यामीह यः कर्णं जीविताद् भ्रंशयिष्यति ॥ १८ ॥ ‘आज मैं ऐसा अनुपम और अजेय बाण छोड़ूँगा, जो कर्णको उसके प्राणोंसे वंचित कर देगा ॥ १८ ॥ यस्य चैतद् व्रतं मह्यं वधे किल दुरात्मनः । पादौ न धावये तावद् यावद्धन्यां न फाल्गुनम् ॥ १९ ॥ मृषा कृत्वा व्रतं तस्य पापस्य मधुसूदन । पातयिष्ये रथात् कायं शरैः संनतपर्वभिः ॥ २० ॥ ‘मधुसूदन! जिस दुरात्माने मेरे वधके लिये यह व्रत लिया है कि जबतक अर्जुनको मार न लूँगा, तबतक दूसरोंसे पैर न धुलाऊँगा। उस पापीके इस व्रतको मिथ्या करके झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा उसके इस शरीरको रथसे नीचे गिरा दूँगा ॥ १९-२० ॥ योऽसौ रणे नरं नान्यं पृथिव्यामनुमन्यते । तस्याद्य सूतपुत्रस्य भूमिः पास्यति शोणितम् ॥ २१ ॥ ‘जो भूमण्डलमें दूसरे किसी पुरुषको रणभूमिमें अपने समान नहीं मानता है, आज यह पृथ्वी उस सूतपुत्रके रक्तका पान करेगी ॥ २१ ॥ अपतिर्ह्यसि कृष्णेति सूतपुत्रो यदब्रवीत् । धृतराष्ट्रमते कर्णः श्लाघमानः स्वकान् गुणान् ॥ २२ ॥ अनृतं तत् करिष्यन्ति मामका निशिताः शराः । आशीविषा इव क्रुद्धास्तस्य पास्यन्ति शोणितम् ॥ २३ ॥ ‘सूतपुत्र कर्णने धृतराष्ट्रके मतमें होकर अपने गुणोंकी प्रशंसा करते हुए जो द्रौपदीसे यह कहा था कि ‘कृष्णे! तू पतिहीन है’ उसके इस कथनको मेरे तीखे बाण असत्य कर

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दिखायेंगे और क्रोधमें भरे हुए विषधर सर्पोंके समान उसके रक्तका पान करेंगे ।। २२-२३ ।। मया हस्तवता मुक्ता नाराचा वैद्युतत्विषः । गाण्डीवसृष्टा दास्यन्ति कर्णस्य परमां गतिम् ॥ २४ ॥ ‘मैं बाण चलानेमें सिद्धहस्त हूँ। मेरे द्वारा गाण्डीव धनुषसे छोड़े गये बिजलीके समान चमकते हुए नाराच कर्णको परम गति प्रदान करेंगे ।। २४ ।। अद्य तप्स्यति राधेयः पाञ्चालीं यत्तदाब्रवीत् । सभामध्ये वचः क्रूरं कुत्सयन् पाण्डवान् प्रति ॥ २५ ॥ ‘राधापुत्र कर्णने भरी सभामें पाण्डवोंकी निन्दा करते हुए द्रौपदीसे जो क्रूरतापूर्ण वचन कहा था, उसके लिये उसे बड़ा पश्चात्ताप होगा ।। २५ ।। ये वै षण्ढतिलास्तत्र भवितारोऽद्य ते तिलाः । हते वैकर्तने कर्णे सूतपुत्रे दुरात्मनि ॥ २६ ॥ ‘जो पाण्डव वहाँ थोथे तिलोंके समान नपुंसक कहे गये थे, वे दुरात्मा सूतपुत्र वैकर्तन कर्णके मारे जानेपर आज अच्छे तिल और शूरवीर सिद्ध होंगे ।। २६ ।। अहं वः पाण्डुपुत्रेभ्यस्त्रास्यामीति यदब्रवीत् । धृतराष्ट्रसुतान् कर्णः श्लाघमानोऽत्मनो गुणान् ॥ २७ ॥ अनृतं तत् करिष्यन्ति मामका निशिताः शराः । उद्योगः पाण्डुपुत्राणां समाप्तिमुपयास्यति ॥ २८ ॥ ‘अपने गुणोंकी प्रशंसा करते हुए सूतपुत्र कर्णने धृतराष्ट्रके पुत्रोंसे जो यह कहा था कि ‘मैं पाण्डवोंसे तुम्हारी रक्षा करूँगा’ उसके इस कथनको मेरे तीखे बाण असत्य कर देंगे और पाण्डवोंका युद्धविषयक उद्योग समाप्त हो जायगा ।। २७-२८ ।। हन्ताहं पाण्डवान् सर्वान् सपुत्रानिति योऽब्रवीत् । तमद्य कर्णं हन्तास्मि मिषतां सर्वधन्विनाम् ॥ २९ ॥ ‘जिसने यह कहा था कि मैं ‘पुत्रोंसहित समस्त पाण्डवोंको मार डालूँगा’ उस कर्णको आज समस्त धनुर्धरोंके देखते-देखते मैं नष्ट कर दूँगा ।। २९ ।। यस्य वीर्यं समाश्रित्य धार्तराष्ट्रो महामनाः । अवामन्यत दुर्बुद्धिर्नित्यमस्मान् दुरात्मवान् ॥ ३० ॥ हत्वाहं कर्णमाजौ हि तोषयिष्यामि भ्रातरम् । ‘जिसके बल-पराक्रमका भरोसा करके महामनस्वी दुर्बुद्धि एवं दुरात्मा दुर्योधन सदा हमलोगोंका अपमान करता आया है, उस कर्णका आज युद्धस्थलमें वध करके मैं अपने भाई युधिष्ठिरको संतुष्ट करूँगा ।। ३० १/२ ।। शरान् नानाविधान् मुक्त्वा त्रासयिष्यामि शात्रवान् । आकर्णमुक्तैरिषुभिर्यमराष्ट्रविवर्धनैः ॥ ३१ ॥

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भूमिशोभां करिष्यामि पतितै रथकुञ्जरैः ।
‘नाना प्रकारके बाणोंका प्रहार करके मैं शत्रुसैनिकोंको भयभीत कर दूँगा। धनुषको कानतक खींचकर छोड़े गये यमराष्ट्रवर्धक बाणोंद्वारा धराशायी किये गये रथों और हाथियोंसे रणभूमिकी शोभा बढ़ाऊँगा ।। ३१ १/२ ।।
तत्राहं वै महासंख्ये सम्पन्नं युद्धदुर्मदम् ।। ३२ ।।
अद्य कर्णमहं घोरं सूदयिष्यामि सायकैः ।
‘मैं महासमरमें शक्तिसम्पन्न रणदुर्मद एवं भयंकर कर्णको आज अपने बाणोंद्वारा मार डालूँगा ।। ३२ १/२ ।।
अद्य कर्णे हते कृष्ण धार्तराष्ट्राः सराजकाः ।। ३३ ।।
विद्रवन्तु दिशो भीताः सिंहत्रस्ता मृगा इव ।
‘श्रीकृष्ण! आज कर्णके मारे जानेपर राजासहित धृतराष्ट्रके सभी पुत्र सिंहसे डरे हुए मृगोंके समान भयभीत हो सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग जायें ।। ३३ १/२ ।।
अद्य दुर्योधनो राजा आत्मानं चानुशोचताम् ।। ३४ ।।
हते कर्णे मया संख्ये सपुत्रे ससुहृज्जने ।
‘आज युद्धस्थलमें पुत्रों और सुहृदोंसहित कर्णके मेरे द्वारा मारे जानेपर राजा दुर्योधन अपने लिये निरन्तर शोक करे ।।
अद्य कर्णं हतं दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रोऽत्यमर्षणः ।। ३५ ।।
जानातु मां रणे कृष्ण प्रवरं सर्वधन्विनाम् ।
‘श्रीकृष्ण! अमर्षशील दुर्योधन आज कर्णको रणभूमिमें मारा गया देख मुझे सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ समझ ले ।। ४५ १/२ ।।
सपुत्रपौत्रं सामात्यं सभृत्यं च निराशिषम् ।। ३६ ।।
अद्य राज्ये करिष्यामि धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् ।
‘मैं आज ही पुत्र, पौत्र, मन्त्री और सेवकोंसहित राजा धृतराष्ट्रको राज्यकी ओरसे निराश कर दूँगा ।। ३६ १/२ ।।
अद्य कर्णस्य चक्राङ्गाः क्रव्यादाश्च पृथग्विधाः ।। ३७ ।।
शरैश्छिन्नानि गात्राणि विहरिष्यन्ति केशव ।
‘केशव! आज चक्रवाक तथा भिन्न-भिन्न मांसभोजी पक्षी बाणोंसे कटे हुए कर्णके अंगोंको उठा ले जायँगे ।।
अद्य राधासुतस्याहं संग्रामे मधुसूदन ।। ३८ ।।
शिरश्छेत्स्यामि कर्णस्य मिषतां सर्वधन्विनाम् ।
‘मधुसूदन! आज संग्राममें समस्त धनुर्धरोंके देखते-देखते मैं राधापुत्र कर्णका मस्तक काट डालूँगा ।।

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अद्य तीक्ष्णैर्विपाठैश्च क्षुरैश्च मधुसूदन ॥ ३९ ॥ रणे छेत्स्यामि गात्राणि राधेयस्य दुरात्मनः । ‘श्रीकृष्ण! आज तीखे विपाठों और क्षुरोंसे रणभूमिमें दुरात्मा राधापुत्रके अंगोंको काट डालूँगा ॥ ३९ १/२ ॥

अद्य राजा महत् कृच्छ्रं संत्यक्ष्यति युधिष्ठिरः ॥ ४० ॥ संतापं मानसं वीरश्चिरसम्भृतमात्मनः । ‘आज वीर राजा युधिष्ठिर महान् कष्ट और अपने चिरसंचित मानसिक संतापसे छुटकारा पा जायँगे ॥

अद्य केशव राधेयमहं हत्वा सबान्धवम् ॥ ४१ ॥ नन्दयिष्यामि राजानं धर्मपुत्रं युधिष्ठिरम् । ‘केशव! आज मैं बन्धु-बान्धवोंसहित राधापुत्रको मारकर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरको आनन्दित करूँगा ॥ ४१ १/२ ॥

अद्याहमनुगान् कृष्ण कर्णस्य कृपणान् युधि ॥ ४२ ॥ हन्ता ज्वलनसंकाशैः शरैः सर्पविषोपमैः । ‘श्रीकृष्ण! आज मैं युद्धस्थलमें कर्णके पीछे चलनेवाले दीन-हीन सैनिकोंको सर्पविष और अग्निके समान बाणोंद्वारा भस्म कर डालूँगा ॥ ४२ १/२ ॥

अद्याहं हेमकवचैराबद्धमणिकुण्डलैः ॥ ४३ ॥ संस्तरिष्यामि गोविन्द वसुधां वसुधाधिपैः । ‘गोविन्द! आज मैं सुवर्णमय कवच और मणिमय कुण्डल धारण करनेवाले भूपतियोंकी लाशोंसे रणभूमिको पाट दूँगा ॥ ४३ १/२ ॥

अद्याभिमन्योः शत्रूणां सर्वेषां मधुसूदन ॥ ४४ ॥ प्रमथिष्यामि गात्राणि शिरांसि च शितैः शरैः । ‘मधुसूदन! आज पैने बाणोंसे मैं अभिमन्युके समस्त शत्रुओंके शरीरों और मस्तकोंको मथ डालूँगा ॥ ४४ १/२ ॥

अद्य निर्धार्तराष्ट्रां च भ्रात्रे दास्यामि मेदिनीम् ॥ ४५ ॥ निरर्जुनां वा पृथिवीं केशवानुचरिष्यसि । ‘केशव! या तो आज इस पृथ्वीको धृतराष्ट्रपुत्रोंसे सूनी करके अपने भाईके अधिकारमें दे दूँगा या आप अर्जुनरहित पृथ्वीपर विचरेंगे ॥ ४५ १/२ ॥

अद्याहमनृणः कृष्ण भविष्यामि धनुर्भृताम् ॥ ४६ ॥ कोपस्य च कुरूणां च शराणां गाण्डिवस्य च । ‘श्रीकृष्ण! आज मैं सम्पूर्ण धनुर्धरोंके, क्रोधके, कौरवोंके, बाणोंके तथा गाण्डीव धनुषके भी ऋणसे मुक्त हो जाऊँगा ॥

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अद्य दुःखमहं मोक्ष्ये त्रयोदशसमार्जितम् ॥ ४७ ॥ हत्वा कर्णं रणे कृष्ण शम्बरं मघवानिव । ‘श्रीकृष्ण! जैसे इन्द्रने शम्बरासुरका वध किया था, उसी प्रकार मैं रणभूमिमें कर्णको मारकर आज तेरह वर्षोंसे संचित किये हुए दुःखका परित्याग कर दूँगा ॥ अद्य कर्णे हते युद्धे सोमकानां महारथाः ॥ ४८ ॥ कृतं कार्यं च मन्यन्तां मित्रकार्येिप्सवो युधि । ‘आज युद्धमें कर्णके मारे जानेपर मित्रके कार्यकी सिद्धि चाहनेवाले सोमकवंशी महारथी अपनेको कृतकार्य समझ लें ॥ न जाने च कथं प्रीतिः शैनेयस्याद्य माधव ॥ ४९ ॥ भविष्यति हते कर्णे मयि चापि जयाधिके । ‘माधव! आज कर्णके मारे जाने और विजयके कारण मेरी प्रतिष्ठा बढ़ जानेपर न जाने शिनिपौत्र सात्यकिको कितनी प्रसन्नता होगी? ॥ ४९ १/२ ॥ अहं हत्वा रणे कर्णं पुत्रं चास्य महारथम् ॥ ५० ॥ प्रीतिं दास्यामि भीमस्य यमयोः सात्यकस्य च । ‘मैं रणभूमिमें कर्ण और उसके महारथी पुत्रको मारकर भीमसेन, नकुल, सहदेव तथा सात्यकिको प्रसन्न करूँगा ॥ धृष्टद्युम्नशिखण्डिभ्यां पञ्चालानां च माधव ॥ ५१ ॥ अद्यानृण्यं गमिष्यामि हत्वा कर्णं महाहवे । ‘माधव! आज महासमरमें कर्णका वध करके मैं धृष्टद्युम्न, शिखण्डी तथा पांचालोंके ऋणसे छुटकारा पा जाऊँगा ॥ अद्य पश्यन्तु संग्रामे धनंजयममर्षणम् ॥ ५२ ॥ युध्यन्तं कौरवान् संख्ये घातयन्तं च सूतजम् । ‘आज समस्त सैनिक देखें कि संग्रामभूमिमें अमर्षशील धनंजय किस प्रकार कौरवोंसे युद्ध करता और सूतपुत्र कर्णको मारता है ॥ ५२ १/२ ॥ भवत्सकाशे वक्ष्ये च पुनरेवात्मसंस्तवम् ॥ ५३ ॥ धनुर्वेदे मत्समो नास्ति लोके पराक्रमे वा मम कोऽस्ति तुल्यः । को वाप्यन्यो मत्समोऽस्ति क्षमावां- स्तथा क्रोधे सदृशोऽन्यो न मेऽस्ति ॥ ५४ ॥ ‘मैं आपके निकट पुनः अपनी प्रशंसासे भरी हुई बात कहता हूँ, धनुर्वेदमें मेरी समानता करनेवाला इस संसारमें दूसरा कोई नहीं है। फिर पराक्रममें मेरे-जैसा कौन है? मेरे समान क्षमाशील भी दूसरा कौन है तथा क्रोधमें भी मेरे-जैसा दूसरा कोई नहीं है ॥ ५३-५४ ॥ अहं धनुष्मान् ससुरासुरांश्र्च

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सर्वाणि भूतानि च सङ्गतानि । स्वबाहुवीर्याद् गमये पराभवं मत्पौरुषं विद्धि परं परेभ्यः ॥ ५५ ॥ 'मैं धनुष लेकर अपने बाहुबलसे एक साथ आये हुए देवताओं, असुरों तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको परास्त कर सकता हूँ। मेरे पुरुषार्थको उत्कृष्टसे भी उत्कृष्ट समझो ॥ ५५ ॥

शरार्चिषा गाण्डिवेनाहमेकः सर्वान् कुरून् बाह्लिकांश्चाभिहत्य । हिमात्यये कक्षगतो यथाग्नि- स्तथा दहेयं सगणाम् प्रसह्य ॥ ५६ ॥ 'मैं अकेला ही बाणोंकी ज्वालासे युक्त गाण्डीव धनुषके द्वारा समस्त कौरवों और बाह्लिकोंको दल-बलसहित मारकर ग्रीष्म-ऋतुमें सूखे काठमें लगी हुई आगके समान सबको भस्म कर डालूँगा ॥ ५६ ॥

पाणौ पृषत्का लिखिता ममैते धनुश्च दिव्यं विततं सबाणम् । पादौ च मे सरथौ सध्वजौ च न मादृशं युद्धगतं जयन्ति ॥ ५७ ॥ 'मेरे एक हाथमें बाणके चिह्न हैं और दूसरेमें फैले हुए बाणसहित दिव्य धनुषकी रेखा है। इसी प्रकार मेरे पैरोंमें भी रथ और ध्वजाके चिह्न हैं। मेरे-जैसे लक्षणोंवाला योद्धा जब युद्धमें उपस्थित होता है, तब उसे शत्रु जीत नहीं सकते हैं' ॥ ५७ ॥

इत्येवमुक्त्वार्जुन एकवीरः क्षिप्रं रिपुघ्नः क्षतजोपमाक्षः । भीमं मुमुक्षुः समरे प्रयातः कर्णस्य कायाच्च शिरो जिहीर्षुः ॥ ५८ ॥ भगवान्‌से ऐसा कहकर अद्वितीय वीर शत्रुसूदन अर्जुन क्रोधसे लाल आँखें किये समरभूमिमें भीमसेनको संकटसे छुड़ाने और कर्णके मस्तकको धड़से अलग करनेके लिये शीघ्रतापूर्वक वहाँसे चल दिये ॥ ५८ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि अर्जुनवाक्ये चतुःसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७४ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें अर्जुनवाक्यविषयक चौहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७४ ॥

अध्याय (पृष्ठ 2194)

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पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः

दोनों पक्षोंकी सेनाओंमें द्वन्द्वयुद्ध तथा सुषेणका वध

धृतराष्ट्र उवाच

समागमे पाण्डवसृञ्जयानां
महाभये मामकानामगाधे ।
धनंजये तात रणाय याते
कर्णेन तद् युद्धमथोऽत्र कीदृक् ॥ १ ॥

धृतराष्ट्रने पूछा— तात संजय! मेरे पुत्रों तथा पाण्डवों और सृंजयियोंमें पहलेसे ही अगाध एवं महाभयंकर संग्राम छिड़ा हुआ था। फिर जब धनंजय भी वहाँ कर्णके साथ युद्धके लिये जा पहुँचे, तब उस युद्धका स्वरूप कैसा हो गया? ॥ १ ॥

संजय उवाच

तेषामनीकानि बृहद्ध्वजानि
रणे समृद्धानि समागतानि ।
गर्जन्ति भेरीनिनदोन्मुखानि
नादैर्यथा मेघगणास्तपान्ते ॥ २ ॥

संजय कहते हैं— महाराज! ग्रीष्म-ऋतु बीत जानेपर जैसे मेघसमूह गर्जना करने लगते हैं, उसी प्रकार दोनों पक्षोंकी सेनाएँ एकत्र हो रणभूमिमें गर्जना करने लगीं। उनके भीतर बड़े-बड़े ध्वज फहरा रहे थे और सभी सैनिक अस्त्र-शस्त्रोंसे सम्पन्न थे। रणभेरियोंकी ध्वनि उन्हें युद्धके लिये उत्सुक किये हुए थी ॥ २ ॥

महागजाभ्राकुलमस्त्रतोयं
वादित्रनेमीतलशब्दवच्च ।
हिरण्यचित्रायुधविद्युतं च
शरासिनाराचमहास्त्रधारम् ॥ ३ ॥
तद् भीमवेगं रुधिरौघवाहि
खड्गाकुलं क्षत्रियजीवघाति ।
अनार्तवं क्रूरमनिष्टवर्षं
बभूव तत् संहरणं प्रजानाम् ॥ ४ ॥

क्रमशः वह क्रूरतापूर्ण युद्ध बिना ऋतुकी अनिष्टकारी वर्षाके समान प्रजाजनोंका संहार करने लगा। बड़े-बड़े हाथियोंका समूह मेघोंकी घटा बनकर वहाँ छाया हुआ था। अस्त्र ही जल थे, वाद्यों और पहियोंकी घर्घरहाटका शब्द ही मेघ-गर्जनके समान प्रतीत होता था।

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सुवर्णजटित विचित्र आयुध विद्युत्के समान प्रकाशित होते थे। बाण, खड्ग और नाराच आदि बड़े-बड़े अस्त्रोंकी धारावाहिक वृष्टि हो रही थी। धीरे-धीरे उस युद्धका वेग बड़ा भयंकर हो उठा, रक्तका स्रोत बह चला। तलवारोंकी खचाखच मार होने लगी, जिससे क्षत्रियोंके प्राणोंका संहार होने लगा ।। ३-४ ।।

एकं रथं सम्परिवार्य मृत्युं नयन्त्यनेके च रथाः समेताः । एकस्तथैकं रथिनं रथाग्र्यां- स्तथा रथश्चापि रथाननेकान् ।। ५ ।। बहुत-से रथी एक साथ मिलकर किसी एक रथीको घेर लेते और उसे यमलोक पहुँचा देते थे। इसी प्रकार एक रथी एक रथीको और अनेक श्रेष्ठ रथियोंको भी यमलोकका पथिक बना देता था ।। ५ ।।

रथं ससूतं सहयं च कञ्चित् कश्चिद्रथी मृत्युवशं निनाय । निनाय चाप्येकगजेन कश्चिद् रथान् बहून् मृत्युवशे तथाश्वान् ।। ६ ।। किसी रथीने किसी एक रथीको घोड़ों और सारथिसहित मौतके हवाले कर दिया तथा किसी दूसरे वीरने एकमात्र हाथीके द्वारा बहुत-से रथियों और घोड़ोंको मौतका ग्रास बना दिया ।। ६ ।।

रथान् ससूतान् सहयान् गजांश्च सर्वानरीन् मृत्युवशं शरौघैः । निन्ये हयांश्चैव तथा ससादीन् पदातिसङ्घांश्च तथैव पार्थः ।। ७ ।। उस समय अर्जुनने सारथिसहित रथों, घोड़ों-सहित हाथियों, समस्त शत्रुओं, सवारोंसहित घोड़ों तथा पैदलसमूहोंको भी अपने बाणसमूहोंद्वारा मृत्युके अधीन कर दिया ।। ७ ।।

कृपः शिखण्डी च रणे समेतौ दुर्योधनं सात्यकिरभ्यगच्छत् । श्रुतश्रवा द्रोणपुत्रेण सार्धं युधामन्युश्चित्रसेनेन सार्धम् ।। ८ ।। उस रणभूमिमें कृपाचार्य और शिखण्डी एक-दूसरेसे भिड़े थे, सात्यकिने दुर्योधनपर धावा किया था, श्रुतश्रवा द्रोणपुत्र अश्वत्थामाके साथ जूझ रहा था और युधामन्यु चित्रसेनके साथ युद्ध कर रहे थे ।। ८ ।।

कर्णस्य पुत्रं तु रथी सुषेणं

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समागतं सृंजयश्चोत्तमौजाः । गान्धारराजं सहदेवः क्षुधार्तो महर्षभं सिंह इवाभ्यधावत् ॥ ९ ॥ सृंजयवंशी रथी उत्तमौजाने अपने सामने आये हुए कर्णपुत्र सुषेणपर आक्रमण किया था। जैसे भूखसे पीड़ित हुआ सिंह किसी साँड़पर धावा करता है, उसी प्रकार सहदेव गान्धारराज शकुनिपर टूट पड़े थे ॥ ९ ॥

शतानीको नाकुलिः कर्णपुत्रं युवा युवानं वृषसेनं शरौघैः । समार्पयत् कर्णपुत्रश्च शूरः पाञ्चालेयं शरवर्षैरनेकैः ॥ १० ॥ नकुलपुत्र नवयुवक शतानीकने कर्णके नौजवान बेटे वृषसेनको अपने बाणसमूहोंसे घायल कर दिया तथा शूरवीर कर्णपुत्र वृषसेनने भी अनेक बाणोंकी वर्षा करके पांचालीकुमार शतानीकको गहरी चोट पहुँचायी ॥

रथर्षभः कृतवर्माणमार्ज- न्माद्रीपुत्रो नकुलश्चित्रयोधी । पञ्चालानामधिपो याज्ञसेनिः सेनापतिः कर्णमार्छत् ससैन्यम् ॥ ११ ॥ विचित्र युद्ध करनेवाले, रथियोंमें श्रेष्ठ माद्रीकुमार नकुलने कृतवर्मापर चढ़ाई की। द्रुपदकुमार पांचालराज सेनापति धृष्टद्युम्नने सेनासहित कर्णपर आक्रमण किया ॥

दुःशासनो भारत भारतीं च संशप्तकानां पृतना समृद्धा । भीमं रणे शस्त्रभृतां वरिष्ठं भीमं समार्छत्तमसह्यवेगम् ॥ १२ ॥ भारत! दुःशासन, कौरव-सेना और संशप्तकोंकी समृद्धिशालिनी वाहिनीने असह्य वेगशाली, शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ तथा युद्धमें भयंकर प्रतीत होनेवाले भीमसेनपर चढ़ाई की ॥ १२ ॥

कर्णात्मजं तत्र जघान वीर- स्तथाच्छिनच्चोत्तमौजाः प्रसह्य । तस्योत्तमाङ्गं निपपात भूमौ निनादयद् गां निनदेन खं च ॥ १३ ॥ वीर उत्तमौजाने हठपूर्वक वहाँ कर्णपुत्र सुषेणपर घातक प्रहार किया और उसका मस्तक काट डाला। सुषेणका वह मस्तक अपने आर्तनादसे आकाश और पृथिवीको प्रतिध्वनित करता हुआ भूमिपर गिर पड़ा ॥ १३ ॥

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सुषेणशीर्षं पतितं पृथिव्यां विलोक्य कर्णोऽथ तदार्तरूपः । क्रोधाद्धयांस्तस्य रथं ध्वजं च बाणैः सुधारैर्निशितैरकृन्तत् ॥ १४ ॥ सुषेणके मस्तकको पृथ्वीपर पड़ा देख कर्ण शोकसे आतुर हो उठा। उसने कुपित हो उत्तम धारवाले पैने बाणोंसे उत्तमौजाके रथ, ध्वज और घोड़ोंको काट डाला ॥ १४ ॥

स तूत्तमौजा निशितैः पृषत्कै- र्विव्याध खड्गेन च भास्वरेण । पार्ष्णिं हयांश्चैव कृपस्य हत्वा शिखण्डिवाहं स ततोऽध्यरोहत् ॥ १५ ॥ तब उत्तमौजाने तीखे बाणोंसे कर्णको बींध डाला और (जब कृपाचार्यने बाधा दी तब) चमचमाती हुई तलवारसे कृपाचार्यके पृष्ठरक्षकों और घोड़ोंको मारकर वह शिखण्डीके रथपर आरूढ़ हो गया ॥ १५ ॥

कृपं तु दृष्ट्वा विरथं रथस्थो नैच्छच्छरैस्ताडयितुं शिखण्डी । तं द्रौणिरावार्य रथं कृपस्य समुज्जहे पङ्कगतां यथा गाम् ॥ १६ ॥ कृपाचार्यको रथहीन देख रथपर बैठे हुए शिखण्डीने उनपर बाणोंसे आघात करनेकी इच्छा नहीं की। तब अश्वत्थामाने शिखण्डीको रोककर कीचड़में फँसी हुई गायके समान कृपाचार्यके रथका उद्धार किया ॥ १६ ॥

हिरण्यवर्मा निशितैः पृषत्कै- स्तवात्मजानामनिलात्मजो वै । अतापयत् सैन्यमतीव भीमः काले शुचौ मध्यगतो यथार्कः ॥ १७ ॥ जैसे आषाढ़मासमें दोपहरका सूर्य अत्यन्त ताप प्रदान करता है, उसी प्रकार सुवर्णकवचधारी वायुपुत्र भीमसेन आपके पुत्रोंकी सेनाको तीखे बाणोंद्वारा अधिक संताप देने लगे ॥ १७ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलद्वन्द्वयुद्धे पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७५ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलद्वन्द्वयुद्धविषयक पचहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७५ ॥

भीमसेनका अपने सारथि विशोकसे संवाद

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षट्सप्ततितमोऽध्यायः

भीमसेनका अपने सारथि विशोकसे संवाद

संजय उवाच

अथ त्विदानीं तुमुले विमर्दे
द्विषद्भिरेको बहुभिः समावृतः ।
महारणे सारथिमित्युवाच
भीमश्चमूं वाहय धार्तराष्ट्रीम् ॥ १ ॥

**संजय कहते हैं—**राजन्! उस समय उस घमासान युद्धमें बहुत-से शत्रुओंद्धारा अकेले घिरे हुए भीमसेन महासमरमें अपने सारथिसे बोले—'सारथे! अब तुम रथको धृतराष्ट्रपुत्रोंकी सेनाकी ओर ले चलो ॥ १ ॥

त्वं सारथे याहि जवेन वाहै-
र्नयाम्येतान् धार्तराष्ट्रान् यमाय ।
संचोदितो भीमसेनेन चैवं
स सारथिः पुत्रबलं त्वदीयम् ॥ २ ॥
प्रायात् ततः सत्वरमुग्रवेगो
यतो भीमस्तद् बलं गन्तुमैच्छत् ।
ततोऽपरे नागरथाश्वपत्तिभिः
प्रत्युद्ययुस्तं कुरवः समन्तात् ॥ ३ ॥

'सूत! तुम अपने वाहनोंद्वारा वेगपूर्वक आगे बढ़ो। जिससे इन धृतराष्ट्रपुत्रोंको मैं यमलोक भेज सकूँ।' भीमसेनके इस प्रकार आदेश देनेपर सारथि तुरंत ही भयंकर वेगसे युक्त हो आपके पुत्रोंकी सेनाकी ओर, जिधर भीमसेन जाना चाहते थे, चल दिया। तब अन्यान्य कौरवोंने हाथी, घोड़े, रथ और पैदलोंकी विशाल सेना साथ ले सब ओरसे उनपर आक्रमण किया ॥ २-३ ॥

भीमस्य वाहाग्रयमुदारवेगं
समन्ततो बाणगणैर्निजघ्नुः ।
ततः शरानापततो महात्मा
चिच्छेद बाणैस्तपनीयपुङ्खैः ॥ ४ ॥

वे भीमसेनके अत्यन्त वेगशाली श्रेष्ठ रथपर चारों ओरसे बाणसमूहोंद्वारा प्रहार करने लगे; परंतु महामनस्वी भीमसेनने अपने ऊपर आते हुए उन बाणोंको सुवर्णमय पंखवाले बाणोंद्वारा काट डाला ॥ ४ ॥

ते वै निपेतुस्तपनीयपुङ्खा

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द्विधा त्रिधा भीमशरैर्निकृत्ताः । ततो राजन् नागरथाश्वयूनां भीमाहतानां वरराजमध्ये ॥ ५ ॥ घोरो निनादः प्रबभौ नरेन्द्र वज्राहतानामिव पर्वतानाम् । वे सोनेकी पाँखवाले बाण भीमसेनके बाणोंसे दो-दो तीन-तीन टुकड़ोंमें कटकर गिर गये। राजन्! नरेन्द्र! तत्पश्चात् श्रेष्ठ राजाओंकी मण्डलीमें भीमसेनके द्वारा मारे गये हाथियों, रथों, घोड़ों और पैदल युवकोंका भयंकर आर्तनाद प्रकट होने लगा, मानो वज्रके मारे हुए पहाड़ फट पड़े हों ॥ ५ १/२ ॥

ते वध्यमानाश्च नरेन्द्रमुख्या निर्भिद्यन्तो भीमशरप्रवेकैः ॥ ६ ॥ भीमं समन्तात् समरेऽभ्यरोहन् वृक्षं शकुन्ता इव जातपक्षाः । जैसे जिनके पंख निकल आये हैं, वे पक्षी सब ओरसे उड़कर किसी वृक्षपर चढ़ बैठते हैं, उसी प्रकार भीमसेनके उत्तम बाणोंसे आहत और विदीर्ण होनेवाले प्रधान-प्रधान नरेश समरांगणमें सब ओरसे भीमसेनपर ही चढ़ आये ॥ ६ १/२ ॥

ततोऽभियाते तव सैन्ये स भीमः प्रादुश्चक्रे वेगमनन्तवेगः ॥ ७ ॥ यथान्तकाले क्षपयन् दिधक्षु- र्भूतान्तकृत् काल इवात्तदण्डः । आपकी सेनाके आक्रमण करनेपर अनन्त वेगशाली भीमसेनने अपना महान् वेग प्रकट किया। ठीक उसी तरह, जैसे प्रलयकालमें समस्त प्राणियोंका संहार करनेवाला काल हाथमें दण्ड लिये सबको नष्ट और दग्ध करनेकी इच्छासे असीम वेग प्रकट करता है ॥

तस्यातिवेगस्य रणेऽतिवेगं नाशक्नुवन् वारयितुं त्वदीयाः ॥ ८ ॥ व्यात्ताननस्यापततो यथैव कालस्य काले हरतः प्रजा वै । अत्यन्त वेगशाली भीमसेनके महान् वेगको आपके सैनिक रणभूमिमें रोक न सके। जैसे प्रलयकालमें मुँह बाकर आक्रमण करनेवाले प्रजासंहारकारी कालके वेगको कोई नहीं रोक सकता ॥ ८ १/२ ॥

ततो बलं भारत भारतानां प्रदह्यमानं समरे महात्मना ॥ ९ ॥ भीतं दिशोऽकीर्यत भीममुन्नं

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महानिलेनाभ्रगणा यथैव ।
भारत! तदनन्तर समरांगणमें महामना भीमसेनके द्वारा दग्ध होती हुई कौरव-सेना भयभीत हो सम्पूर्ण दिशाओंमें बिखर गयी। जैसे आँधी बादलोंको छिन्न-भिन्न कर देती है, उसी प्रकार भीमसेनने आपके सैनिकोंको मार भगाया था ॥ ९१/२ ॥

ततो धीमान् सारथिमब्रवीद् बली
स भीमसेनः पुनरेव हृष्टः ॥ १० ॥
सूताभिजानीहि स्वकान् परान् वा
रथान् ध्वजांश्चापततः समेतान् ।
युद्ध्यन् ह्यहं नाभिजानामि किंचि-
न्मा सैन्यं स्वं छादयिष्ये पृषत्कैः ॥ ११ ॥
तत्पश्चात् बलवान् और बुद्धिमान् भीमसेन हर्षसे उल्लसित हो अपने सारथिसे पुनः इस प्रकार बोले—'सूत! ये जो बहुत-से रथ और ध्वज एक साथ इधर बढ़े आ रहे हैं, उन्हें पहचानो तो सही! ये अपने पक्षके हैं या शत्रुपक्षके? क्योंकि युद्ध करते समय मुझे अपने-परायेका ज्ञान नहीं रहता, कहीं ऐसा न हो कि अपनी ही सेनाको बाणोंसे आच्छादित कर डालूँ ॥ १०-११ ॥

अरीन् विशोकाभिनिरीक्ष्य सर्वतो
मनस्तु चिन्ता प्रधुनोति मे भृशम् ।
राजाऽऽतुरो नागमहद् यत् किरीटी
बहूनि दुःखान्यभियातोऽस्मि सूत ॥ १२ ॥
'विशोक! सम्पूर्ण दिशाओंमें शत्रुओंको देखकर उठी हुई चिन्ता मेरे हृदयको अत्यन्त संतप्त कर रही है; क्योंकि राजा युधिष्ठिर बाणोंके आघातसे पीड़ित हैं और किरीटधारी अर्जुन अभीतक उनका समाचार लेकर लौटे नहीं। सूत! इन सब कारणोंसे मुझे बहुत दुःख हो रहा है ॥ १२ ॥

एतद् दुःखं सारथे धर्मराजो
यन्मां हित्वा यातवान् शत्रुमध्ये ।
नैनं जीवं नाद्य जानाम्यजीवं
बीभत्सुं वा तन्ममाद्यातिदुःखम् ॥ १३ ॥
'सारथे! पहले तो इस बातका दुःख हो रहा है कि धर्मराज मुझे छोड़कर स्वयं ही शत्रुओंके बीचमें चले गये। पता नहीं, वे अबतक जीवित हैं या नहीं? अर्जुनका भी कोई समाचार नहीं मिला; इससे आज मुझे अधिक दुःख है ॥

सोऽहं द्विषत्सैन्यमुदग्रकल्पं
विनाशयिष्ये परमप्रतीतः ।
एतन्निहत्याजिमध्ये समेतं

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प्रीतो भविष्यामि सह त्वयाद्य ।। १४ ।।

‘अच्छा, अब मैं अत्यन्त विश्वस्त होकर शत्रुओंकी प्रचण्ड सेनाका विनाश करूँगा।

यहाँ एकत्र हुई इस सेनाको युद्धस्थलमें नष्ट करके मैं तुम्हारे साथ ही आज प्रसन्नताका

अनुभव करूँगा ।। १४ ।।

सर्वांस्तूनान् सायकानामवेक्ष्य

किं शिष्टं स्यात् सायकानां रथे मे ।

का वा जातिः किं प्रमाणं च तेषां

ज्ञात्वा व्यक्तं तत् समाचक्ष्व सूत ।। १५ ।।

(कति वा सहस्राणि कति वा शतानि

ह्याचक्ष्व मे सारथे क्षिप्रमेव ।।

‘सूत! तुम मेरे रथपर रखे हुए बाणोंके सारे तरकसोंकी देख-भाल करके ठीक-ठीक

समझकर मुझे स्पष्टरूपसे बताओ कि अब उनमें कितने बाण अवशिष्ट रह गये हैं? किस-

किस जातिके बाण बचे हैं और उनकी संख्या कितनी है? सारथे! शीघ्र बताओ, कौन बाण

कितने हजार और कितने सौ शेष हैं?’ ।। १५ ।।

विशोक उवाच

सर्वं विदित्वैवमहं वदामि

तवार्थसिद्धिप्रदमद्य वीर ।।

कैकेयकाम्बोजसुराष्ट्रबाह्लिका

म्लेच्छाश्च सुह्माः परतङ्गणाश्च ।

मद्राश्च वङ्गा मगधाः कुलिन्दा

आनर्तकावर्तकाः पर्वतीयाः ।।

सर्वे गृहीतप्रवरायुधास्त्वां

संख्ये समावेष्ट्य ततो विनेदुः ।।)

विशोकने कहा—वीर! मैं आज सब कुछ पता लगाकर आपके मनोरथकी सिद्धि

करनेवाली बात बता रहा हूँ, कैकेय, काम्बोज, सौराष्ट्र, बाह्लिक, म्लेच्छ, सुह्म, परतंगण,

मद्र, वंग, मगध, कुलिन्द, आनर्त, आवर्त और पर्वतीय सभी योद्धा हाथोंमें श्रेष्ठ आयुध लिये

आपको चारों ओरसे घेरकर युद्धस्थलमें शत्रुओंका सामना करनेके लिये गरज रहे हैं।

षण्मार्गणानामयुतानि वीर

क्षुराश्च भल्लाश्च तथायुताख्याः ।

नाराचानां द्वे सहस्रे च वीर

त्रीण्येव च प्रदराणां स्म पार्थ ।। १६ ।।

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वीरवर! अभी अपने पास साठ हजार मार्गण हैं, दस-दस हजार क्षुर और भल्ल हैं, दो हजार नाराच शेष हैं तथा पार्थ! तीन हजार प्रदर बाकी रह गये हैं ।। १६ ।। अस्त्यायुधं पाण्डवेयावशिष्टं न यद् वहेच्छकटं षड्गवीयम् । एतद् विद्वन् मुञ्च सहस्रशोऽपि गदासिबाहुद्रविणं च तेऽस्ति ।। १७ ।। प्रासाश्च मुद्गराः शक्तयस्तोমরাश्च मा भैषीस्त्वं सङ्क्षयादायुधानाम् ।। १८ ।। पाण्डुनन्दन! अभी इतने आयुध शेष हैं कि छः बैलोंसे जुता हुआ छकड़ा भी उन्हें नहीं खींच सकता। विद्वन्! इन सहस्रों अस्त्रोंका आप प्रयोग कीजिये। अभी तो आपके पास बहुत-सी गदाएँ, तलवारें और बाहुबलकी सम्पत्ति हैं। इसी प्रकार बहुतेरे प्रास, मुद्गर, शक्ति और तोमर बाकी बचे हैं। आप इन आयुधोंके समाप्त हो जानेके डरमें न रहिये ।। १७-१८ ।।

भीमसेन उवाच

सूताद्यैनं पश्य भीमप्रयुक्तैः संछिन्दद्भिः पार्थिवानां सुवेगैः । छन्नं बाणैराहवं घोररूपं नष्टादित्यं मृत्युलोकेन तुल्यम् ।। १९ ।। **भीमसेन बोले—**सूत! आज इस युद्धस्थलकी ओर दृष्टिपात करो। भीमसेनके छोड़े हुए अत्यन्त वेगशाली बाणोंने राजाओंका विनाश करते हुए सारे रणक्षेत्रको आच्छादित कर दिया है, जिससे सूर्य भी अदृश्य हो गये हैं और यह भूमि यमलोकके समान भयंकर प्रतीत होती है ।। १९ ।। अद्यैतद् वै विदितं पार्थिवानां भविष्यति ह्याकुमारं च सूत । निमग्नो वा समरे भीमसेन एकः कुरून् वा समरे व्यजैषीत् ।। २० ।। सूत! आज बच्चोंसे लेकर बूढ़ोंतक समस्त भूपालोंको यह विदित हो जायगा कि भीमसेन समरसागरमें डूब गये अथवा उन्होंने अकेले ही समस्त कौरवोंको युद्धमें जीत लिया ।। २० ।। सर्वे संख्ये कुरवो निष्पतन्तु मां वा लोकाः कीर्तयन्त्वाकुमारम् । सर्वानेकस्तानहं पातयिष्ये

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ते वा सर्वे भीमसेनं तुदन्तु ॥ २१ ॥ आज युद्धस्थलमें समस्त कौरव धराशायी हो जायँ अथवा बालकोंसे लेकर वृद्धोंतक सब लोग मुझ भीमसेनको ही रणभूमिमें गिरा हुआ बतावें! मैं अकेला ही उन समस्त कौरवोंको मार गिराऊँगा अथवा वे ही सब लोग मुझ भीमसेनको पीड़ित करें ॥ २१ ॥

आशास्तारः कर्म चाप्युत्तमं ये तन्मे देवाः केवलं साधयन्तु । आयात्विहाद्यार्जुनः शत्रुघाती शक्रस्तूर्णं यज्ञ इवोपहूतः ॥ २२ ॥ जो उत्तम कर्मोंका उपदेश देनेवाले हैं, वे देवता-लोग मेरा केवल एक कार्य सिद्ध कर दें। जैसे यज्ञमें आवाहन करनेपर इन्द्रदेव तुरंत पदार्पण करते हैं, उसी प्रकार शत्रुघाती अर्जुन यहाँ शीघ्र ही आ पहुँचे ॥ २२ ॥

(पश्यस्व पश्यस्व विशोक मे त्वं बलं परेषामभिघातभिन्नम् । नानास्वरान् पश्य विमुच्य सर्वे तथा द्रवन्ते बलिनो धार्तराष्ट्राः ॥) विशोक! देखो, देखो, मेरा बल। मेरे आघातोंसे शत्रुओंकी सेना विदीर्ण हो उठी है। देखो, धृतराष्ट्रके सभी बलवान् पुत्र नाना प्रकारके आर्तनाद करते हुए भागने लगे हैं।

ईक्षस्वैतां भारतीं दीर्यमाणा- मेते कस्माद् विद्रवन्ते नरेन्द्राः । व्यक्तं धीमान् सव्यसाची नराग्र्यः सैन्यं ह्येतच्छादयत्याशु बाणैः ॥ २३ ॥ सारथे! इस कौरव-सेनापर तो दृष्टिपात करो। इसमें भी दरार पड़ती जा रही है। ये राजालोग क्यों भाग रहे हैं? इससे तो स्पष्ट जान पड़ता है कि बुद्धिमान् नरश्रेष्ठ अर्जुन आ गये। वे ही अपने बाणोंद्वारा शीघ्रता-पूर्वक इस सेनाको आच्छादित कर रहे हैं ॥ २३ ॥

पश्य ध्वजांश्च द्रवतो विशोक नागान् हयान् पत्तिसंघांश्च संख्ये । रथान् विर्कीर्णान् शरशक्तिताडितान् पश्यस्वैतान् रथिनश्चैव सूत ॥ २४ ॥ विशोक! युद्धस्थलमें भागते हुए रथोंकी ध्वजाओं, हाथियों, घोड़ों और पैदलसमूहोंको देखो। सूत! बाणों और शक्तियोंसे प्रताड़ित होकर बिखरे पड़े हुए इन रथों और रथियोंपर भी दृष्टिपात करो ॥ २४ ॥

आपूर्यते कौरवी चाप्यभीक्ष्णं सेना ह्यसौ सुभृशं हन्यमाना ।