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महाभारत (खंड ५) - शान्ति पर्व

Mahabharata (Vol 5) - Shanti Parva

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariSanskritpublished2,450 pages
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शयानं यान्तमासीनं प्रवृत्तं विषयेषु च।
शुभाशुभानि कर्माणि प्रपद्यन्ते नरं सदा ॥ ३१ ॥
मनुष्य सोता हो, बैठा हो, चलता हो या विषय-भोगमें लगा हो, उसके शुभाशुभ कर्म सदा उसे प्राप्त होते रहते हैं॥ ३१ ॥

न ह्यन्यत् तीरमासाद्य पुनस्तर्तुं व्यवस्यति।
दुर्लभो दृश्यते ह्यस्य विनिपातो महार्णवे ॥ ३२ ॥
जैसे समुद्रके परलेपार पहुँचकर पुनः कोई उसमें तैरनेका विचार नहीं करता, उसी प्रकार संसार-सागरसे पार हुए मनुष्यका फिर उसमें पड़ना अर्थात् वापस आना दुर्लभ दिखायी देता है॥ ३२ ॥

यथा भावावसन्ना हि नौर्महाम्भसि तन्तुना।
तथा मनोभियोगाद् वै शरीरं प्रचिकीर्षति ॥ ३३ ॥
जैसे गम्भीर जलमें पड़ी हुई नौका नाविकद्वारा रस्सीसे खींची जानेपर उसके मनोभावके अधीन होकर चलती है, उसी प्रकार यह जीव इस शरीररूपी नौकाको अपने मनके अभिप्रायानुसार चलाना चाहता है॥ ३३ ॥

यथा समुद्रमभितः संश्रिताः सरितोऽपराः।
तथाद्या प्रकृतिर्योगादभिसंश्रीयते सदा ॥ ३४ ॥
जैसे बहुत-सी नदियाँ सब ओरसे आकर समुद्रमें मिल जाती हैं, उसी प्रकार योगसे वशमें किया हुआ मन सदाके लिये मूल प्रकृतिमें लीन हो जाता है॥ ३४ ॥

स्नेहपाशैर्बहुविधैरासक्तमनसो नराः।
प्रकृतिस्था विषीदन्ति जले सैकतवेश्मवत् ॥ ३५ ॥
जिनका मन नाना प्रकारके स्नेह-बन्धनोंमें जकड़ा हुआ है, वे प्रकृतिमें स्थित हुए जीव जलमें ढह जानेवाले बालूके मकानकी भाँति महान् दुःखसे नष्टप्राय हो जाते हैं॥ ३५ ॥

शरीरगृहसंज्ञस्य शौचतीर्थस्थ देहिनः।
बुद्धिमार्गप्रयातस्य सुखं त्विह परत्र च ॥ ३६ ॥
शरीर ही जिसका घर है, जो बाहर-भीतरकी पवित्रताको ही तीर्थ मानता है तथा बुद्धिपूर्वक कल्याणके मार्गपर चलता है, उस देहधारी जीवको इहलोक और परलोकमें भी सुख मिलता है॥ ३६ ॥

विस्तराः क्लेशसंयुक्ताः संक्षेपास्तु सुखावहाः।
परार्थं विस्तराः सर्वे त्यागमात्महितं विदुः ॥ ३७ ॥
क्रियाओंका विस्तार क्लेशदायक होता है और संक्षेप सुखदायक है। सभी कर्मविस्तार परार्थरूप अर्थात् मन और इन्द्रियोंकी तृप्तिके लिये होते हैं, परंतु त्याग अपने लिये हितकर माना गया है॥ ३७ ॥

संकल्पजो मित्रवर्गो ज्ञातयः कारणात्मकाः।

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भार्या पुत्रश्च दासश्च स्वमर्थमनुयुज्यते ॥ ३८ ॥ कोई-न-कोई संकल्प (मनोरथ) लेकर ही लोग मित्र बनते हैं, कुटुम्बी जन भी किसी हेतुसे ही नाता रखते हैं, पत्नी, पुत्र और सेवक सभी अपने-अपने स्वार्थका ही अनुसरण करते हैं ॥ ३८ ॥ न माता न पिता किंचित् कस्यचित् प्रतिपद्यते । दानपथ्यौदनो जन्तुः स्वकर्मफलमश्नुते ॥ ३९ ॥ माता और पिता भी परलोक-साधनमें किसीकी कुछ सहायता नहीं कर सकते। परलोकके पथमें तो अपना किया हुआ दान अर्थात् त्याग ही राहखर्चका काम देता है। प्रत्येक जीव अपने कर्मका ही फल भोगता है ॥ ३९ ॥ माता पुत्रः पिता भ्राता भार्या मित्रजनस्तथा । अष्टापदपदस्थाने लक्षमुद्रेव लक्ष्यते ॥ ४० ॥ माता, पिता, पुत्र, भ्राता, भार्या और मित्रगण—ये सब सुवर्णके सिक्कोंके स्थानपर रखी हुई लाखकी मुद्राके समान देखे जाते हैं ॥ ४० ॥ सर्वाणि कर्माणि पुरा कृतानि शुभाशुभान्यात्मनो यान्ति जन्तोः । उपस्थितं कर्मफलं विदित्वा बुद्धिं तथा चोदयतेऽन्तरात्मा ॥ ४१ ॥ पूर्वजन्मके किये हुए सम्पूर्ण शुभाशुभ कर्म जीवका अनुसरण करते हैं। इस प्रकार प्राप्त हुई परिस्थितिको अपने कर्मोंका फल जानकर जिसका मन अन्तर्मुख हो गया है, वह अपनी बुद्धिको वैसी शुभ प्रेरणा देता है जिससे भविष्यमें दुःख न भोगना पड़े ॥ व्यवसायं समाश्रित्य सहायान् योऽधिगच्छति । न तस्य कश्चिदारम्भः कदाचिदवसीदति ॥ ४२ ॥ जो दृढ़ निश्चय एवं पूर्ण उद्योगका सहारा ले तदनुकूल सहायकोंका संग्रह करता है, उसका कोई भी कार्य कभी भी व्यर्थ नहीं होता ॥ ४२ ॥ अद्वैधमनसं युक्तं शूरं धीरं विपश्चितम् । न श्रीः संत्यजते नित्यमादित्यमिव रश्मयः ॥ ४३ ॥ जिसके मनमें दुविधा नहीं होती, जो उद्योगी, शूरवीर, धीर और विद्वान् होता है, उसे सम्पत्ति उसी तरह कभी नहीं छोड़ती, जैसे किरणें सूर्यको ॥ ४३ ॥ आस्तिक्यव्यवसायाभ्यामुपायाद् विस्मयाद् धिया । समारभेदनिन्द्यात्मा न सोऽर्थः परिषीदति ॥ ४४ ॥ जिसका हृदय उदार एवं प्रशस्त है, जो आस्तिक भाव, निश्चय एवं आवश्यक उपायसे गर्वहीनताके साथ उत्तम बुद्धिपूर्वक कार्य आरम्भ करता है, उसका वह कार्य कभी असफल नहीं होता है ॥ ४४ ॥

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सर्वः स्वानि शुभाशुभानि नियतं कर्माणि जन्तुः स्वयं गर्भात् सम्प्रतिपद्यते तदुभयं यत् तेन पूर्वं कृतम्। मृत्युश्चापरिहारवान् समगतिः कालेन विच्छेदिना दारोश्चूर्णमिवाश्मसारविहितं कर्मान्तिकं प्रापयेत्॥ ४५॥

सभी जीव, पूर्वजन्ममें उन्होंने जो कुछ किया है, उन अपने शुभाशुभ कर्मोंके नियत फलोंको गर्भमें प्रवेश करनेके समयसे ही क्रमशः पाने और भोगने लगते हैं। जैसे वायु आरेसे चीरकर बनाये गये लकड़ीके चूरेको उड़ा देती है, उसी प्रकार कभी टाली न जा सकनेवाली मृत्यु विनाशकारी कालकी सहायतासे मनुष्यका अन्त कर देती है॥ ४५॥

स्वरूपतामात्मकृतं च विस्तरं कुलान्वयं द्रव्यसमृद्धिसंचयम्। नरो हि सर्वो लभते यथाकृतं शुभाशुभैरात्मकृतेन कर्मणा॥ ४६॥

सब मनुष्य अपने किये हुए शुभाशुभ कर्मके अनुसार ही सुन्दर या असुन्दर रूप, अपनेसे होनेवाले योग्य-अयोग्य पुत्र-पौत्र आदिका विस्तार, उत्तम या अधम कुलमें जन्म तथा द्रव्य-समृद्धिका संचय आदि पाते हैं॥ ४६॥

भीष्म उवाच

इत्युक्तो जनको राजन् याथातथ्यं मनीषिणा। श्रुत्वा धर्मविदां श्रेष्ठः परां मुदमवाप ह॥ ४७॥

भीष्मजी कहते हैं—राजन्! ज्ञानी महात्मा पराशर मुनिके मुखसे इस यथार्थ उपदेशको सुनकर धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ राजा जनक बहुत प्रसन्न हुए॥ ४७॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि पराशरगीतायामष्टनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः॥ २९८॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें पराशरगीताविषयक दो सौ अट्ठानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २९८॥

हंसगीता-हंसरूपधारी ब्रह्माका साध्यगणोंको उपदेश

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⬅ विषय-सूची (TOC)

नवनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः

हंसगीता-हंसरूपधारी ब्रह्माका साध्यगणोंको उपदेश

युधिष्ठिर उवाच

सत्यं दमं क्षमां प्रज्ञां प्रशंसन्ति पितामह ।
विद्वांसो मनुजा लोके कथमेतन्मतं तव ॥ १ ॥
युधिष्ठिरने पूछा— पितामह! संसारमें बहुत-से विद्वान् सत्य, इन्द्रिय-संयम, क्षमा और प्रज्ञा (उत्तम बुद्धि)-की प्रशंसा करते हैं। इस विषयमें आपका कैसा मत है? ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

अत्र ते वर्तयिष्येऽहमितिहासं पुरातनम् ।
साध्यानामिह संवादं हंसस्य च युधिष्ठिर ॥ २ ॥
भीष्मजीने कहा— युधिष्ठिर! इस विषयमें साध्यगणोंका हंसके साथ जो संवाद हुआ था, वही प्राचीन इतिहास मैं तुम्हें सुना रहा हूँ ॥ २ ॥
हंसो भूत्वाथ सौवर्णस्त्वजो नित्यः प्रजापतिः ।
स वै पर्यति लोकांस्त्रीनथ साध्यानुपागमत् ॥ ३ ॥
एक समय नित्य अजन्मा प्रजापति सुवर्णमय हंसका रूप धारण करके तीनों लोकोंमें विचर रहे थे। घूमते-घामते वे साध्यगणोंके पास जा पहुँचे ॥ ३ ॥

साध्या ऊचुः

शकुने वयं स्म देवा वै साध्यास्त्वामनुयुङ्क्ष्महे ।
पृच्छामस्त्वां मोक्षधर्मं भवांश्च किल मोक्षवित् ॥ ४ ॥
उस समय साध्योंने कहा— हंस! हमलोग साध्य देवता हैं और आपसे मोक्षधर्मके विषयमें प्रश्न करना चाहते हैं; क्योंकि आप मोक्ष-तत्त्वके ज्ञाता हैं, यह बात सर्वत्र प्रसिद्ध है ॥ ४ ॥
श्रुतोऽसि नः पण्डितो धीरवादी
साधुशब्दश्चरते ते पतत्रिन् ।
किं मन्यसे श्रेष्ठतमं द्विज त्वं
कस्मिन् मनस्ते रमते महात्मन् ॥ ५ ॥
महात्मन्! हमने सुना है कि आप पण्डित और धीर वक्ता हैं। पतत्रिन्! आपकी उत्तम वाणीका सर्वत्र प्रचार है। पक्षिप्रवर! आपके मतमें सर्वश्रेष्ठ वस्तु क्या है? आपका मन किसमें रमता है? ॥ ५ ॥
तन्नः कार्यं पक्षिवर प्रशाधि

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यत् कार्याणां मन्यसे श्रेष्ठमेकम्। यत् कृत्वा वै पुरुषः सर्वबन्धै- र्विमुच्यते विहगेन्द्रेह शीघ्रम् ॥ ६ ॥ पक्षिराज! खगश्रेष्ठ! समस्त कार्योंमेंसे जिस एक कार्यको आप सबसे उत्तम समझते हों तथा जिसके करनेसे जीवको सब प्रकारके बन्धनोंसे शीघ्र छुटकारा मिल सके, उसीका हमें उपदेश कीजिये ॥ ६ ॥

हंस उवाच

इदं कार्यममृताशाः शृणोमि तपो दमः सत्यमात्माभिगुप्तिः । ग्रन्थीन् विमुच्य हृदयस्य सर्वान् प्रियाप्रिये स्वं वशमानयीत ॥ ७ ॥ हंसने कहा—अमृतभोजी देवताओ! मैं तो सुनता हूँ कि तप, इन्द्रियसंयम, सत्यभाषण और मनोनिग्रह आदि कार्य ही सबसे उत्तम हैं। हृदयकी सारी गाँठें खोलकर प्रिय और अप्रियको अपने वशमें करे अर्थात् उनके लिये हर्ष एवं विषाद न करे ॥ ७ ॥

नारन्तुदः स्यान्न नृशंसवादी न हीनतः परमभ्याददीत । ययास्य वाचा पर उद्विजेत न तां वदेद्रुषतीं पापलोक्याम् ॥ ८ ॥ किसीके मर्ममें आघात न पहुँचाये। दूसरोंसे निष्ठुर वचन न बोले। किसी नीच मनुष्यसे अध्यात्मशास्त्रका उपदेश न ग्रहण करे तथा जिसे सुनकर दूसरोंको उद्वेग हो, ऐसी नरकमें डालनेवाली अमंगलमयी बात भी मुँहसे न निकाले ॥ ८ ॥

वाक्सायका वदनान्निष्पतन्ति यैराहतः शोचति रात्र्यहानि । परस्य नामर्मसु ते पतन्ति तान् पण्डितो नावसृजेत् परेषु ॥ ९ ॥ वचनरूपी बाण जब मुँहसे निकल पड़ते हैं, तब उनके द्वारा बींधा गया मनुष्य रात-दिन शोकमें डूबा रहता है; क्योंकि वे दूसरोंके मर्मपर आघात पहुँचाते हैं, इसलिये विद्वान् पुरुषको किसी दूसरे मनुष्यपर वाग्बाणका प्रयोग नहीं करना चाहिये ॥ ९ ॥

परश्चेदेनमतिवादबाणै- र्भृशं विध्येच्छम एवेह कार्यः । संरोष्यमाणः प्रतिहृष्यते यः स आदत्ते सुकृतं वै परस्य ॥ १० ॥

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दूसरा कोई भी यदि इस विद्वान् पुरुषको कटु-वचनरूपी बाणोंसे बहुत अधिक चोट पहुँचाये तो भी उसे शान्त ही रहना चाहिये। जो दूसरोंके क्रोध करनेपर भी स्वयं बदलेमें प्रसन्न ही रहता है, वह उसके पुण्यको ग्रहण कर लेता है ।। १० ।। क्षेपायमाणमभिषङ्ग्यलीकं निगृह्णाति ज्वलितं यश्च मन्युम् । अदुष्टचेता मुदितोऽनसूयुः स आदत्ते सुकृतं वै परेषाम् ।। ११ ।। जो जगत्में निन्दा करानेवाले और आवेशमें डालनेके कारण अप्रिय प्रतीत होनेवाले प्रज्वलित क्रोधको रोक लेता है, चित्तमें कोई विकार या दोष नहीं आने देता, प्रसन्न रहता और दूसरोंके दोष नहीं देखता है, वह पुरुष अपने प्रति शत्रुभाव रखनेवाले लोगोंके पुण्य ले लेता है ।। आक्रुश्यमानो न वदामि किंचित् क्षमाम्यहं ताड्यमानश्च नित्यम् । श्रेष्ठं ह्येतद् यत्क्षमामाहुरार्याः सत्यं तथैवार्जवमानृशंस्यम् ।। १२ ।। मुझे कोई गाली दे तो भी बदलेमें कुछ नहीं कहता हूँ। कोई मार दे तो उसे सदा क्षमा ही करता हूँ; क्योंकि श्रेष्ठ जन क्षमा, सत्य, सरलता और दयाको ही उत्तम बताते हैं ।। १२ ।। वेदस्योपनिषत् सत्यं सत्यस्योपनिषद् दमः । दमस्योपनिषन्मोक्ष एतत् सर्वानुशासनम् ।। १३ ।। वेदाध्ययनका सार है सत्यभाषण, सत्यभाषणका सार है इन्द्रियसंयम और इन्द्रियसंयमका फल है मोक्ष। यही सम्पूर्ण शास्त्रोंका उपदेश है ।। १३ ।। वाचो वेगं मनसः क्रोधवेगं विधित्सावेगमुदरोपस्थवेगम् । एतान् वेगान् यो विषहेदुदीर्णां- स्तं मन्येऽहं ब्राह्मणं वै मुनिं च ।। १४ ।। जो वाणीका वेग, मन और क्रोधका वेग, तृष्णाका वेग तथा पेट और जननेन्द्रियका वेग—इन सब प्रचण्ड वेगोंको सह लेता है, उसीको मैं ब्रह्मवेत्ता और मुनि मानता हूँ ।। अक्रोधनः क्रुध्यतां वै विशिष्ट- स्तथा तितिक्षुरतितिक्षोर्विशिष्टः । अमानुषान्मानुषो वै विशिष्ट- स्तथाज्ञानाज्ज्ञानविद् वै विशिष्टः ।। १५ ।।

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क्रोधी मनुष्योंसे क्रोध न करनेवाला मनुष्य श्रेष्ठ है। असहनशीलसे सहनशील पुरुष बड़ा है। मनुष्येतर प्राणियोंसे मनुष्य ही बढ़कर है तथा अज्ञानीसे ज्ञानवान् ही श्रेष्ठ है ॥ १५ ॥ आक्रुश्यमानो नाक्रुश्येन्मन्युरेनं तितिक्षतः । आक्रोष्टारं निर्दहति सुकृतं चास्य विन्दति ॥ १६ ॥

अध्याय (पृष्ठ 1968)

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⬅ विषय-सूची (TOC)

साध्यगणोंको हंसरूपमें ब्रह्माजीका उपदेश

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जो दूसरेके द्वारा गाली दी जानेपर भी बदलेमें उसे गाली नहीं देता, उस क्षमाशील मनुष्यका दबा हुआ क्रोध ही उस गाली देनेवालेको भस्म कर देता है और उसके पुण्यको भी ले लेता है ।। १६ ।।

यो नात्युक्तः प्राह रूक्षं प्रियं वा यो वा हतो न प्रतिहन्ति धैर्यात् । पापं च यो नेच्छति तस्य हन्तु- स्तस्येह देवाः स्पृहयन्ति नित्यम् ।। १७ ।।

जो दूसरोंके द्वारा अपने लिये कड़वी बात कही जानेपर भी उसके प्रति कठोर या प्रिय कुछ भी नहीं कहता तथा किसीके द्वारा चोट खाकर भी धैर्यके कारण बदलेमें न तो मारनेवालेको मारता है और न उसकी बुराई ही चाहता है, उस महात्मासे मिलनेके लिये देवता भी सदा लालायित रहते हैं ।। १७ ।।

पापीयसः क्षमेतैव श्रेयसः सदृशस्य च । विमानितो हतोत्कृष्ट एवं सिद्धिं गमिष्यति ।। १८ ।।

पाप करनेवाला अपराधी अवस्थामें अपनेसे बड़ा हो या बराबर, उसके द्वारा अपमानित होकर, मार खाकर और गाली सुनकर भी उसे क्षमा ही कर देना चाहिये। ऐसा करनेवाला पुरुष परम सिद्धिको प्राप्त होगा ।। १८ ।।

सदाहमार्यान्निभृतोऽप्युपासे न मे विधित्सोत्सहते न रोषः । न वाप्यहं लिप्समानः परैमि न चैव किंचिद् विषयेण यामि ।। १९ ।।

यद्यपि मैं सब प्रकारसे परिपूर्ण हूँ (मुझे कुछ जानना या पाना शेष नहीं है) तो भी मैं श्रेष्ठ पुरुषोंकी उपासना (सत्संग) करता रहता हूँ। मुझपर न तृष्णाका वश चलता है न रोषका। मैं कुछ पानेके लोभसे धर्मका उल्लंघन नहीं करता और न विषयोंकी प्राप्तिके लिये ही कहीं आता-जाता हूँ ।। १९ ।।

नाहं शप्तः प्रतिशपामि कंचिद् दमं द्वारं ह्यमृतस्येह वेद्मि । गुह्यं ब्रह्म तदिदं ब्रवीमि न मानुषाच्छ्रेष्ठतरं हि किंचित् ।। २० ।।

कोई मुझे शाप दे दे तो भी मैं बदलेमें उसे शाप नहीं देता। इन्द्रियसंयमको ही मोक्षका द्वार मानता हूँ। इस समय तुमलोगोंको एक बहुत गुप्त बात बता रहा हूँ, सुनो। मनुष्ययोनिसे बढ़कर कोई उत्तम योनि नहीं है ।। २० ।।

निर्मुच्यमानः पापेभ्यो घनेभ्य इव चन्द्रमाः । विरजाः कालमाकाङ्क्षन् धीरो धैर्येण सिद्ध्यति ।। २१ ।।

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जिस प्रकार चन्द्रमा बादलोंके ओटसे निकलनेपर अपनी प्रभासे प्रकाशित हो उठता है, उसी प्रकार पापोंसे मुक्त हुआ निर्मल अन्तःकरणवाला धीर पुरुष धैर्यपूर्वक कालकी प्रतीक्षा करता हुआ सिद्धिको प्राप्त हो जाता है ॥ २१ ॥

यः सर्वेषां भवति ह्यर्चनीय
उत्सेधनस्तम्भ इवाभिजातः ।
यस्मै वाचं सुप्रसन्नां वदन्ति
स वै देवान् गच्छति संयतात्मा ॥ २२ ॥
जो अपने मनको वशमें रखनेवाला विद्वान् पुरुष ऊँचे उठानेवाले खम्भेकी भाँति उच्चकुलमें उत्पन्न हुआ सबके लिये आदरके योग्य हो जाता है तथा जिसके प्रति सब लोग प्रसन्नतापूर्वक मधुर वचन बोलते हैं, वह मनुष्य देवभावको प्राप्त हो जाता है ॥ २२ ॥

न तथा वक्तुमिच्छन्ति कल्याणान् पुरुषे गुणान् ।
यथैषां वक्तुमिच्छन्ति नैर्गुण्यमनुयुज्जकाः ॥ २३ ॥
किसीसे ईर्ष्या रखनेवाले मनुष्य जिस तरह उसके दोषोंका वर्णन करना चाहते हैं, उस प्रकार उसके कल्याणमय गुणोंका बखान करना नहीं चाहते हैं ॥ २३ ॥

यस्य वाङ्मनसी गुप्ते सम्यक् प्रणिहिते सदा ।
वेदास्तपश्व त्यागश्च स इदं सर्वमाप्नुयात् ॥ २४ ॥
जिसकी वाणी और मन सुरक्षित होकर सदा सब प्रकारसे परमात्मामें लगे रहते हैं, वह वेदाध्ययन, तप और त्याग—इन सबके फलको पा लेता है ॥ २४ ॥

आक्रोशनविमानाभ्यां नाबुधान् बोधयेद् बुधः ।
तस्मान्न वर्धयेदन्यं न चात्मानं विहिंसयेत् ॥ २५ ॥
अतः समझदार मनुष्यको चाहिये कि वह कटुवचन कहने या अपमान करनेवाले अज्ञानियोंको उनके उक्त दोष बताकर समझानेका प्रयत्न न करे। उसके सामने दूसरेको बढ़ावा न दे तथा उसपर आक्षेप करके उसके द्वारा अपनी हिंसा न कराये ॥ २५ ॥

अमृतस्येव संतृप्येदवमानस्य पण्डितः ।
सुखं ह्यवमतः शेते योऽवमन्ता स नश्यति ॥ २६ ॥
विद्वान्‌को चाहिये कि वह अपमान पाकर अमृत पीनेकी भाँति संतुष्ट हो; क्योंकि अपमानित पुरुष तो सुखसे सोता है, किंतु अपमान करनेवालेका नाश हो जाता है ॥ २६ ॥

यत् क्रोधनो यजति यद् ददाति
यद् वा तपस्तप्यति यज्जुहोति ।
वैवस्वतस्तद्धरतेऽस्य सर्वं
मोघः श्रमो भवति हि क्रोधनस्य ॥ २७ ॥

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क्रोधी मनुष्य जो यज्ञ करता है, दान देता है, तप करता है अथवा जो हवन करता है, उसके उन सब कर्मोंके फलको यमराज हर लेते हैं। क्रोध करनेवालेका वह किया हुआ सारा परिश्रम व्यर्थ जाता है ॥ २७ ॥

चत्वारि यस्य द्वाराणि सुगुप्तान्यमरोत्तमः ।
उपस्थमुदरं हस्तौ वाक् चतुर्थी स धर्मवित् ॥ २८ ॥
देवेश्वरो! जिस पुरुषके उपस्थ, उदर, दोनों हाथ और वाणी—ये चारों द्वार सुरक्षित होते हैं, वही धर्मज्ञ है ॥ २८ ॥

सत्यं दमं ह्यार्जवमानृशंस्यं
धृतिं तितिक्षामतिसेवमानः ।
स्वाध्यायनित्योऽस्पृहयन् परेषा-
मेकान्तशील्यूर्ध्वगतिर्भवेत् सः ॥ २९ ॥
जो सत्य, इन्द्रिय-संयम, सरलता, दया, धैर्य और क्षमाका अधिक सेवन करता है, सदा स्वाध्यायमें लगा रहता है, दूसरेकी वस्तु नहीं लेना चाहता तथा एकान्तमें निवास करता है, वह ऊर्ध्वगतिको प्राप्त होता है ॥ २९ ॥

सर्वांश्चैनाननुचरन् वत्सवच्चतुरः स्तनान् ।
न पावनतमं किंचित् सत्यादध्यगमं क्वचित् ॥ ३० ॥
जैसे बछड़ा अपनी माताके चारों स्तनोंका पान करता है, उसी प्रकार मनुष्यको उपर्युक्त सभी सद्गुणोंका सेवन करना चाहिये। मैंने अबतक सत्यसे बढ़कर परम पावन वस्तु कहीं किसीको नहीं समझा है ॥ ३० ॥

आचक्षेऽहं मनुष्येभ्यो देवेभ्यः प्रतिसंचरन् ।
सत्यं स्वर्गस्य सोपानं पारावारस्य नौरिव ॥ ३१ ॥
मैं चारों ओर घूमकर मनुष्यों और देवताओंसे कहा करता हूँ कि जैसे जहाज समुद्रसे पार होनेका साधन है, उसी प्रकार सत्य ही स्वर्गलोकमें पहुँचनेकी सीढ़ी है ॥ ३१ ॥

यादृशैः संनिवसति यादृशांश्चोपसेवते ।
यादृगिच्छेच्च भवितुं तादृग् भवति पूरुषः ॥ ३२ ॥
पुरुष जैसे लोगोंके साथ रहता है, जैसे मनुष्योंका सेवन करता है और जैसा होना चाहता है, वैसा ही होता है ॥ ३२ ॥

यदि सन्तं सेवति यद्यसन्तं
तपस्विनं यदि वा स्तेनमेव ।
वासो यथा रंगवशं प्रयाति
तथा स तेषां वशमभ्युपैति ॥ ३३ ॥
जैसे वस्त्र जिस रंगमें रँगा जाय, वैसा ही हो जाता है, उसी प्रकार यदि कोई सज्जन, असज्जन, तपस्वी अथवा चोरका सेवन करता है तो वह उन्हीं-जैसा हो जाता है अर्थात्

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उसपर उन्हींका रंग चढ़ जाता है ।। ३३ ।।

सदा देवाः साधुभिः संवदन्ते न मानुषं विषयं यान्ति द्रष्टुम् । नेन्दुः समः स्यादसमो हि वायु- रुच्चावचं विषयं यः स वेद ।। ३४ ।।

देवतालोग सदा सत्पुरुषोंका संग—उन्हींके साथ वार्तालाप करते हैं; इसीलिये वे मनुष्योंके क्षणभंगुर भोगोंकी ओर देखने भी नहीं जाते। जो विभिन्न विषयोंके नश्वर स्वभावको ठीक-ठीक जानता है, उसकी समानता न चन्द्रमा कर सकते हैं न वायु ।। ३४ ।।

अदुष्टं वर्तमाने तु हृदयान्तरपूरुषे । तेनैव देवाः प्रीयन्ते सतां मार्गस्थितेन वै ।। ३५ ।।

हृदयगुफामें रहनेवाला अन्तर्यामी आत्मा जब दोषभावसे रहित हो जाता है, उस अवस्थामें उसका साक्षात्कार करनेवाला पुरुष सन्मार्गगामी समझा जाता है। उसकी इस स्थितिसे ही देवता प्रसन्न होते हैं ।। ३५ ।।

शिश्रोदरे ये निरताः सदैव स्तेना नरा वाक्परुषाश्च नित्यम् । अपेतदोषानपि तान् विदित्वा दूराद् देवाः सम्परिवर्जयन्ति ।। ३६ ।।

किंतु जो सदा पेट पालने और उपस्थ-इन्द्रियोंके भोग भोगनेमें ही लगे रहते हैं तथा जो चोरी करने एवं सदा कठोर वचन बोलनेवाले हैं, वे यदि प्रायश्चित्त आदिके द्वारा उक्त कर्मोंके दोषसे छूट जायें तो भी देवतालोग उन्हें पहचानकर दूरसे ही त्याग देते हैं ।। ३६ ।।

न वै देवा हीनसत्त्वेन तोष्याः सर्वाशिना दुष्कृतकर्मणा वा । सत्यव्रता ये तु नराः कृतज्ञा धर्मे रतास्तैः सह सम्भजन्ते ।। ३७ ।।

सत्त्वगुणसे रहित और सब कुछ भक्षण करनेवाले पापाचारी मनुष्य देवताओंको संतुष्ट नहीं कर सकते। जो मनुष्य नियमपूर्वक सत्य बोलनेवाले, कृतज्ञ और धर्मपरायण हैं, उन्हींके साथ देवता स्नेह-सम्बन्ध स्थापित करते हैं ।। ३७ ।।

अव्याहृतं व्याहृताच्छ्रेय आहुः सत्यं वदेद् व्याहृतं तद् द्वितीयम् । धर्मं वदेद् व्याहृतं तत् तृतीयं प्रियं वदेद् व्याहृतं तच्चतुर्थम् ।। ३८ ।।

व्यर्थ बोलनेकी अपेक्षा मौन रहना अच्छा बताया गया है, (यह वाणीकी प्रथम विशेषता है) सत्य बोलना वाणीकी दूसरी विशेषता है, प्रिय बोलना वाणीकी तीसरी विशेषता है।

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धर्मसम्मत बोलना यह वाणीकी चौथी विशेषता है (इनमें उत्तरोत्तर श्रेष्ठता है) ।। ३८ ।।

साध्या ऊचुः केनायमावृतो लोकः केन वा न प्रकाशते । केन त्यजति मित्राणि केन स्वर्गं न गच्छति ।। ३९ ।।

**साध्योंने पूछा—**हंस! इस जगत्‌को किसने आवृत कर रखा है? किस कारणसे उसका स्वरूप प्रकाशित नहीं होता है? मनुष्य किस हेतुसे मित्रोंका त्याग करता है? और किस दोषसे वह स्वर्गमें नहीं जाने पाता? ।। ३९ ।।

हंस उवाच अज्ञानेनावृतो लोको मात्सर्यान्न प्रकाशते । लोभात् त्यजति मित्राणि संगात् स्वर्गं न गच्छति ।। ४० ।।

**हंसने कहा—**देवताओ! अज्ञानने इस लोकको आवृत कर रखा है। आपसमें डाह होनेके कारण इसका स्वरूप प्रकाशित नहीं होता। मनुष्य लोभसे मित्रोंका त्याग करता है और आसक्तिदोषके कारण वह स्वर्गमें नहीं जाने पाता ।। ४० ।।

साध्या ऊचुः कः स्विदेको रमते ब्राह्मणानां कः स्विदेको बहुभिर्जोषमास्ते । कः स्विदेको बलवान् दुर्बलोऽपि कः स्वेदेषां कलहं नान्चवैति ।। ४१ ।।

**साध्योंने पूछा—**हंस! ब्राह्मणोंमें कौन एकमात्र सुखका अनुभव करता है? वह कौन ऐसा एक मनुष्य है, जो बहुतोंके साथ रहकर भी चुप रहता है? वह कौन एक मनुष्य है, जो दुर्बल होनेपर भी बलवान् है तथा इनमें कौन ऐसा है, जो किसीके साथ कलह नहीं करता? ।। ४१ ।।

हंस उवाच प्राज्ञ एको रमते ब्राह्मणानां प्राज्ञश्चैको बहुभिर्जोषमास्ते । प्राज्ञ एको बलवान् दुर्बलोऽपि प्राज्ञ एषां कलहं नान्ववैति ।। ४२ ।।

**हंसने कहा—**देवताओ! ब्राह्मणोंमें जो ज्ञानी है, एकमात्र वही परम सुखका अनुभव करता है। ज्ञानी ही बहुतोंके साथ रहकर भी मौन रहता है। एकमात्र ज्ञानी दुर्बल होनेपर भी बलवान् है और इनमें ज्ञानी ही किसीके साथ कलह नहीं करता है ।। ४२ ।।

साध्या ऊचुः

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किं ब्राह्मणानां देवत्वं किं च साधुत्वमुच्यते ।
असाधुत्वं च किं तेषां किमेषां मानुषं मतम् ॥ ४३ ॥
साध्योंने पूछा— हंस! ब्राह्मणोंका देवत्व क्या है? उनमें साधुता क्या बतायी जाती है? उनके भीतर असाधुता और मनुष्यता क्या मानी गयी है? ॥ ४३ ॥

हंस उवाच

स्वाध्याय एषां देवत्वं व्रतं साधुत्वमुच्यते ।
असाधुत्वं परीवादो मृत्युर्मानुष्यमुच्यते ॥ ४४ ॥
हंसने कहा— साध्यगण! वेद-शास्त्रोंका स्वाध्याय ही ब्राह्मणोंका देवत्व है। उत्तम व्रतोंका पालन करना ही उनमें साधुता बतायी जाती है। दूसरोंकी निन्दा करना ही उनकी असाधुता है और मृत्युको प्राप्त होना ही उनकी मनुष्यता बतायी गयी है ॥ ४४ ॥

भीष्म उवाच

(इत्युक्त्वा परमो देवो भगवान् नित्य अव्ययः ।
साध्यैर्देवगणैः सार्धं दिवमेवारुरोह सः ॥
भीष्मजी कहते हैं— युधिष्ठिर! ऐसा कहकर नित्य अविनाशी परमदेव भगवान् ब्रह्मा साध्य देवताओंके साथ ही ऊपर स्वर्गलोककी ओर चल दिये।
एतद् यशस्यमायुष्यं पुण्यं स्वर्गाय च ध्रुवम् ।
दर्शितं देवदेवेन परमेणाव्ययेन च ॥)
सर्वश्रेष्ठ अविनाशी देवाधिदेव ब्रह्माजीके द्वारा प्रकाशमें लाया हुआ यह पुण्यमय तत्त्वज्ञान यश और आयुकी वृद्धि करनेवाला है तथा यह स्वर्गलोककी प्राप्तिका निश्चित साधन है।
संवाद इत्ययं श्रेष्ठः साध्यानां परिकीर्तितः ।
क्षेत्रं वै कर्मणां योनिः सद्भावः सत्यमुच्यते ॥ ४५ ॥
युधिष्ठिर! इस प्रकार साध्योंके साथ जो हंसका संवाद हुआ था, उसका मैंने तुमसे वर्णन किया। यह शरीर ही कर्मोंकी योनि है और सद्भावको ही सत्य कहते हैं ॥ ४५ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि हंसगीतासमाप्तौ
नवनवत्यधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २९९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें हंसगीताकी समाप्ति विषयक दो सौ निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २९९ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ४७ श्लोक हैं)

सांख्य और योगका अन्तर बतलाते हुए योगमार्गके स्वरूप साधन, फल और प्रभावका वर्णन

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त्रिशततमोऽध्यायः

सांख्य और योगका अन्तर बतलाते हुए योगमार्गके स्वरूप साधन, फल और प्रभावका वर्णन

युधिष्ठिर उवाच

सांख्ये योगे च मे तात विशेषं वक्तुमर्हसि ।
तव धर्मज्ञ सर्वं हि विदितं कुरुसत्तम ॥ १ ॥

**युधिष्ठिरने पूछा—**तात! धर्मज्ञ कुरुश्रेष्ठ! सांख्य और योगमें क्या अन्तर है? यह बतानेकी कृपा करें; क्योंकि आपको सब बातोंका ज्ञान है ॥ १ ॥

भीष्म उवाच

सांख्याः सांख्यं प्रशंसन्ति योगा योगं द्विजातयः ।
वदन्ति कारणं श्रेष्ठं स्वपक्षोद्भावनाय वै ॥ २ ॥

**भीष्मजीने कहा—**युधिष्ठिर! सांख्यके विद्वान् सांख्यकी और योगके ज्ञाता द्विज योगकी प्रशंसा करते हैं। दोनों ही अपने-अपने पक्षकी उत्कृष्टता सूचित करनेके लिये उत्तमोत्तम युक्तियोंका प्रतिपादन करते हैं ॥ २ ॥

अनीश्वरः कथं मुच्येहित्येवं शत्रुकर्शन ।
वदन्ति कारणैः श्रेष्ठ्यं योगाः सम्यङ्‌मनीषिणः ॥ ३ ॥

शत्रुसूदन! योगके मनीषी विद्वान् अपने मतकी श्रेष्ठता बताते हुए यह युक्ति उपस्थित करते हैं कि ईश्वरका अस्तित्व स्वीकार किये बिना किसीकी भी मुक्ति कैसे हो सकती है? (अतः मोक्षदाता ईश्वरकी सत्ता अवश्य स्वीकार करनी चाहिये) ॥ ३ ॥

वदन्ति कारणं चेदं सांख्याः सम्यग् द्विजातयः ।
विज्ञायेह गतीः सर्वा विरक्तो विषयेषु यः ॥ ४ ॥
ऊर्ध्वं स देहात् सूव्यक्तं विमुच्येदेति नान्यथा ।
एतदाहुर्महाप्राज्ञाः सांख्ये वै मोक्षदर्शनम् ॥ ५ ॥

सांख्यमतके माननेवाले महाज्ञानी द्विज मोक्षका युक्तियुक्त कारण इस प्रकार बताते हैं—सब प्रकारकी गतियोंको जानकर जो विषयोंसे विरक्त हो जाता है, वही देहत्यागके अनन्तर मुक्त होता है। यह बात स्पष्टरूपसे सबकी समझमें आ सकती है। दूसरे किसी उपायसे मोक्ष मिलना असम्भव है। इस प्रकार वे सांख्यको ही मोक्षदर्शन कहते हैं ॥ ४-५ ॥

स्वपक्षे कारणं ग्राह्यं समये वचनं हितम् ।
शिष्टानां हि मतं ग्राह्यं त्वद्विधैः शिष्टसम्मतैः ॥ ६ ॥

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अपने-अपने पक्षमें युक्तियुक्त कारण ग्राह्य होता है तथा सिद्धान्तके अनुकूल हितकारक वचन मानने योग्य समझा जाता है। शिष्ट पुरुषोंद्वारा सम्मानित तुम-जैसे लोगोंको श्रेष्ठ पुरुषोंका ही मत ग्रहण करना चाहिये ।।

प्रत्यक्षहेतवो योगाः सांख्याः शास्त्रविनिश्चयाः ।
उभे चैते मते तत्त्वे मम तात युधिष्ठिर ॥ ७ ॥
योगके विद्वान् प्रधानतया प्रत्यक्ष प्रमाणको ही माननेवाले होते हैं और सांख्यमतानुयायी शास्त्र-प्रमाणपर ही विश्वास करते हैं। तात युधिष्ठिर! ये दोनों ही मत मुझे तात्त्विक जान पड़ते हैं ॥ ७ ॥

उभे चैते मते ज्ञाते नृपते शिष्टसम्मते ।
अनुष्ठिते यथाशास्त्रं नयेतां परमां गतिम् ॥ ८ ॥
नरेश्वर! इन दोनों मतोंका श्रेष्ठ पुरुषोंने आदर किया है। इन दोनों ही मतोंको जानकर शास्त्रके अनुसार उनका आचरण किया जाय तो वे परमगतिकी प्राप्ति करा सकते हैं ॥ ८॥

तुल्यं शौचं तपोयुक्तं दया भूतेषु चानघ ।
व्रतानां धारणं तुल्यं दर्शनं न समं तयोः ॥ ९ ॥
बाहर-भीतरकी पवित्रता, तप, प्राणियोंपर दया और व्रतोंका पालन आदि नियम दोनों मतोंमें समान रूपसे स्वीकार किये गये हैं। केवल उनके दर्शनोंमें अर्थात् पद्धतियोंमें समानता नहीं है ॥ ९ ॥

युधिष्ठिर उवाच

यदि तुल्यं व्रतं शौचं दया चात्र फलं तथा ।
न तुल्यं दर्शनं कस्मात् तन्मे ब्रूहि पितामह ॥ १० ॥
युधिष्ठिरने पूछा—पितामह! यदि इन दोनों मतोंमें उत्तम व्रत, बाहर-भीतरकी पवित्रता और दया समान है एवं दोनोंका परिणाम भी एक ही है तो इनके दर्शनमें समानता क्यों नहीं है, यह मुझे बताइये ॥ १० ॥

भीष्म उवाच

रागं मोहं तथा स्नेहं कामं क्रोधं च केवलम् ।
योगाच्छित्त्वा ततो दोषान् पञ्चैतान् प्राप्नुवन्ति तत् ॥ ११ ॥
भीष्मजीने कहा—युधिष्ठिर! योगी पुरुष केवल योगबलसे राग, मोह, स्नेह, काम और क्रोध—इन पाँच दोषोंका मूलोच्छेद करके परमपदको प्राप्त कर लेते हैं ॥ ११ ॥

यथा चानिमिषाः स्थूला जालं छित्त्वा पुनर्जलम् ।
प्राप्नुवन्ति तथा योगास्तत् पदं वीतकल्मषाः ॥ १२ ॥

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जैसे बड़े-बड़े और मोटे मत्स्य जालको काटकर फिर जलमें समा जाते हैं, उसी प्रकार योगी अपने पापोंका नाश करके परमात्मपदको प्राप्त करते हैं ।। १२ ।।

तथैव वागुरां छित्त्वा बलवन्तो यथा मृगाः ।
प्राप्नुयुर्विमलं मार्गं विमुक्ताः सर्वबन्धनैः ।। १३ ।।
लोभजानि तथा राजन् बन्धनानि बलान्विताः ।
छित्त्वा योगाः परं मार्गं गच्छन्ति विमलं शिवम् ।। १४ ।।
राजन्! इसी प्रकार जैसे बलवान् मृग जाल तोड़कर सारे बन्धनोंसे मुक्त हो निर्विघ्न मार्गपर चले जाते हैं, वैसे ही योगबलसे सम्पन्न योगी पुरुष लोभजनित सब बन्धनोंको तोड़कर परम निर्मल कल्याणमय मार्गको प्राप्त कर लेते हैं ।। १३-१४ ।।

अबलाश्च मृगा राजन् वागुरासु तथा परे ।
विनश्यन्ति न संदेहस्तद्वद् योगबलादृते ।। १५ ।।
नरेश्वर! जैसे निर्बल मृग तथा दूसरे पशु जालमें पड़कर निस्संदेह नष्ट हो जाते हैं, उसी प्रकार योगबलसे रहित मनुष्यकी भी दशा होती है ।। १५ ।।

बलहीनाश्च कौन्तेय यथा जालं गता झषाः ।
वधं गच्छन्ति राजेन्द्र योगास्तद्वत् सुदुर्बलाः ।। १६ ।।
कुन्तीनन्दन राजेन्द्र! जैसे निर्बल मत्स्य जालमें फँसकर वधको प्राप्त होते हैं, वही दशा योगबलसे सर्वथा रहित मनुष्योंकी भी होती है ।। १६ ।।

यथा च शकुनाः सूक्ष्मं प्राप्य जालमरिंदम ।
तत्र सक्ता विपद्यन्ते मुच्यन्ते च बलान्विताः ।। १७ ।।
कर्मजैर्बन्धनैर्बद्धास्तद्वद् योगाः परंतप ।
अबला वै विनश्यन्ति मुच्यन्ते च बलान्विताः ।। १८ ।।
शत्रुदमन! जैसे निर्बल पक्षी सूक्ष्म जालमें फँसकर बन्धनको प्राप्त हो अपने प्राण खो देते हैं और बलवान् पक्षी जाल तोड़कर उसके बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं, उसी प्रकार कर्मजनित बन्धनोंसे बँधे हुए निर्बल योगी सर्वथा नष्ट हो जाते हैं, किंतु परंतप! योगबलसे सम्पन्न योगी सब प्रकारके बन्धनोंसे छुटकारा पा जाते हैं ।।

अल्पकश्च यथा राजन् वह्निः शाम्यति दुर्बलः ।
आक्रान्त इन्धनैः स्थूलैस्तद्वद् योगोऽबलः प्रभो ।। १९ ।।
राजन्! जैसे अल्प होनेके कारण दुर्बल अग्निपर बड़े-बड़े मोटे ईंधन रख देनेसे वह जलनेके बजाय बुझ जाती है, प्रभो! उसी प्रकार निर्बल योगी महान् योगके भारसे दबकर नष्ट हो जाता है ।। १९ ।।

स एव च यदा राजन् वह्निर्जातबलः पुनः ।
समीरणगतः क्षिप्रं दहेत् कृत्स्नां महीमपि ।। २० ।।

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राजन्! वही आग जब हवाका सहारा पाकर प्रबल हो जाती है, तब सम्पूर्ण पृथ्वीको भी तत्काल भस्म कर सकती है ।। २० ।। तद्वज्जातबलो योगी दीप्ततेजा महाबलः । अन्तकाल इवादित्यः कृत्स्नं संशोषयेज्जगत् ॥ २१ ॥ इसी तरह योगीका भी योगबल बढ़ जानेसे जब वह उद्दीप्त तेजसे सम्पन्न और महान् शक्तिशाली हो जाता है, तब वह जैसे प्रलयकालीन सूर्य समस्त जगत्‌को सुखा डालता है, वैसे ही समस्त रागादि दोषोंका नाश कर देता है ।। २१ ।। दुर्बलश्च यथा राजन् स्रोतसा ह्रियते नरः । बलहीनस्तथा योगो विषयैर्ह्रियतेऽवशः ॥ २२ ॥ राजन्! जैसे दुर्बल मनुष्य पानीके वेगसे बह जाता है, उसी तरह दुर्बल योगी विवश होकर विषयोंकी ओर खिंच जाता है ।। २२ ।। तदेव च महास्रोतो विष्टम्भयति वारणः । तद्वद् योगबलं लब्ध्वा व्यूहते विषयान् बहून् ॥ २३ ॥ परंतु जलके उसी महान् स्रोतको जैसे गजराज रोक देता है अर्थात् उसमें नहीं बहता, उसी प्रकार योगका महान् बल पाकर योगी भी उन सभी बहुसंख्यक विषयोंको अवरुद्ध कर देता है अर्थात् उनके प्रवाहमें नहीं बहता ।। २३ ।। विशन्ति चावशाः पार्थ योगाद् योगबलान्विताः । प्रजापतीनृषीन् देवान् महाभूतानि चेश्वराः ॥ २४ ॥ कुन्तीनन्दन! योगशक्तिसम्पन्न पुरुष स्वतन्त्रता-पूर्वक प्रजापति, ऋषि, देवता और पञ्चमहाभूतोंमें प्रवेश कर जाते हैं। उनमें ऐसा करनेकी सामर्थ्य आ जाती है ।। २४ ।। न यमो नान्तकः क्रुद्धो न मृत्युर्भीमविक्रमः । ईशते नृपते सर्वे योगस्यामिततेजसः ॥ २५ ॥ नरेश्वर! अमित तेजस्वी योगीपर क्रोधमें भरे हुए यमराज, अन्तक और भयंकर पराक्रम दिखानेवाली मृत्युका भी शासन नहीं चलता है ।। २५ ।। आत्मनां च सहस्राणि बहूनि भरतर्षभ । योगः कुर्याद् बलं प्राप्य तैश्च सर्वैर्महीं चरेत् ॥ २६ ॥ भरतश्रेष्ठ! योगी योगबल पाकर अपने हजारों रूप बना सकता है और उन सबके द्वारा इस पृथ्वीपर विचर सकता है ।। २६ ।। प्राप्नुयाद् विषयांश्चैव पुनश्चोग्रं तपश्चरेत् । संक्षिपेच्च पुनस्तात सूर्यस्तेजोगुणानिव ॥ २७ ॥ तात! वह उन शरीरोंद्वारा विषयोंका सेवन और उग्र तपस्या भी करता है। तदनन्तर अपनी तेजोमयी किरणोंको समेट लेनेवाले सूर्यकी भाँति सभी रूपोंको अपनेमें लीन कर लेता है ।। २७ ।।

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बलस्थस्य हि योगस्य बन्धनेशस्य पार्थिव । विमोक्षप्रभविष्णुत्वमुपपन्नमसंशयम् ॥ २८ ॥ पृथ्वीनाथ! बलवान् योगी बन्धनोंको तोड़नेमें समर्थ होता है, उसमें अपनेको मुक्त करनेकी पूर्ण शक्ति आ जाती है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है ॥ बलानि योगप्राप्तानि मयैतानि विशाम्पते । निदर्शनार्थं सूक्ष्माणि वक्ष्यामि च पुनस्तव ॥ २९ ॥ प्रजापालक नरेश! मैं दृष्टान्तके लिये योगसे प्राप्त होनेवाली कुछ सूक्ष्म शक्तियोंका पुनः तुमसे वर्णन करूँगा ॥ २९ ॥ आत्मनश्च समाधाने धारणां प्रति वा विभो । निदर्शनानि सूक्ष्माणि शृणु मे भरतर्षभ ॥ ३० ॥ प्रभो! भरतश्रेष्ठ! आत्मसमाधिके लिये जो धारणा की जाती है, उसके विषयमें भी कुछ सूक्ष्म दृष्टान्त बतलाता हूँ, सुनो ॥ ३० ॥ अप्रमत्तो तथा धन्वी लक्ष्यं हन्ति समाहितः । युक्तः सम्यक् तथा योगी मोक्षं प्राप्नोत्यसंशयम् ॥ ३१ ॥ जैसे सदा सावधान रहनेवाला धनुर्धर वीर चित्तको एकाग्र करके बाण चलानेपर लक्ष्यको अवश्य बींध डालता है, उसी प्रकार जो योगी मनको परमात्माके ध्यानमें लगा देता है, वह निस्संदेह मोक्षको प्राप्त कर लेता है ॥ ३१ ॥ स्नेहपूर्णे यथा पात्रे मन आधाय निश्चलम् । पुरुषो युक्त आरोहेत् सोपानं युक्तमानसः ॥ ३२ ॥ युक्तस्तथायमात्मानं योगः पार्थिव निश्चलम् । करोत्यमलमात्मानं भास्करोपमदर्शनम् ॥ ३३ ॥ पृथ्वीनाथ! जैसे सिरपर रखे हुए तेलसे भरे पात्रकी ओर मनको स्थिरभावसे लगाये रखनेवाला पुरुष एकाग्रचित्त हो सीढ़ियोंपर चढ़ जाता है और जरा भी तेल नहीं छलकता, उसी तरह योगी भी योगयुक्त होकर जब आत्माको परमात्मामें स्थिर करता है, उस समय उसका आत्मा अत्यन्त निर्मल तथा अचल सूर्यके समान तेजस्वी हो जाता है ॥ ३२-३३ ॥ यथा च नावं कौन्तेय कर्णधारः समाहितः । महार्णवगतां शीघ्रं नयेत् पार्थिवसत्तम ॥ ३४ ॥ तद्वदात्मसमाधानं युक्त्वा योगेन तत्त्ववित् । दुर्गमें स्थानमाप्नोति हित्वा देहमिमं नृप ॥ ३५ ॥ कुन्तीकुमार! नृपश्रेष्ठ! जैसे सावधान नाविक समुद्रमें पड़ी हुई नौकाको शीघ्र ही किनारेपर लगा देता है, उसी प्रकार योगके अनुसार तत्त्वको जाननेवाला पुरुष समाधिके द्वारा मनको परमात्मामें लगाकर इस देहका त्याग करनेके अनन्तर दुर्गम स्थान (परमधाम) को प्राप्त होता है ॥ ३४-३५ ॥

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सारथिश्च यथा युक्त्वा सदश्वान् सुसमाहितः ।

देशमिष्टं नयत्याशु धन्विनं पुरुषर्षभ ।। ३६ ।।

तथैव नृपते योगी धारणासु समाहितः ।

प्राप्नोत्याशु परं स्थानं लक्ष्यं मुक्त इवाशुगः ।। ३७ ।।

पुरुषप्रवर! राजन्! जिस तरह अत्यन्त सावधान रहनेवाला सारथि अच्छे घोड़ोंको

रथमें जोतकर धनुर्धर योद्धाको तुरंत ही अभीष्ट स्थानपर पहुँचा देता है, वैसे ही धारणाओंमें

एकाग्रचित्त हुआ योगी लक्ष्यकी ओर छोड़े हुए बाणकी भाँति शीघ्र परम पदको प्राप्त हो

जाता है ।। ३६-३७।।

प्रवेश्यात्मनि चात्मानं योगी तिष्ठति योऽचलः ।

पापं हन्ति पुनीतानां पदमाप्नोति सोऽजरम् ।। ३८ ।।

जो योगी समाधिके द्वारा आत्माको परमात्मामें स्थिर करके अचल हो जाता है, वह

अपने पापको नष्ट कर देता है और पवित्र पुरुषोंको प्राप्त होनेवाले अविनाशी पदको पा

लेता है ।। ३८ ।।

नाभ्यां कण्ठे च शीर्षे च हृदि वक्षसि पार्श्वयोः ।

दर्शने श्रवणे चापि घ्राणे चामितविक्रम ।। ३९ ।।

स्थानेष्वेतेषु यो योगी महाव्रतसमाहितः ।

आत्मना सूक्ष्ममात्मानं युङ्क्ते सम्यग्वि शाम्पते ।। ४० ।।

स शीघ्रमचलप्रख्यं कर्म दग्ध्वा शुभाशुभम् ।

उत्तमं योगमास्थाय यदीच्छति विमुच्यते ।। ४१ ।।

अमित पराक्रमी नरेश! योगके महान् व्रतमें एकाग्रचित्त रहनेवाला जो योगी नाभि,

कण्ठ, मस्तक, हृदय, वक्षःस्थल, पार्श्वभाग, नेत्र, कान और नासिका आदि स्थानोंमें

धारणाके द्वारा सूक्ष्म आत्माको परमात्माके साथ भलीभाँति संयुक्त करता है, वह यदि

इच्छा करे तो अपने पर्वताकार विशाल शुभाशुभ कर्मोंको शीघ्र ही भस्म करके उत्तम

योगका आश्रय लेकर मुक्त हो जाता है ।। ३९-४१ ।।

युधिष्ठिर उवाच

आहारान् कीदृशान् कृत्वा कानि जित्वा च भारत ।

योगी बलमवाप्नोति तद् भवान् वक्तुमर्हसि ।। ४२ ।।

युधिष्ठिरने पूछा- भरतनन्दन! योगी कैसे आहार करके और किन-किनको जीतकर

योगशक्ति प्राप्त कर लेता है, यह आप मुझे बतानेकी कृपा करें ।। ४२ ।।

भीष्म उवाच

कणानां भक्षणे युक्तः पिण्याकस्य च भारत ।

स्नेहानां वर्जने युक्तो योगी बलमवाप्नुयात् ।। ४३ ।।